गुरुवार, 24 अक्टूबर 2019

गोवत्स द्वादशी को लक्ष्मी पूजा दीपावली की शुरुआत होती है कैसे करें गोवत्स द्वादशी की पूजा

   हमारी मान्यताओं और परंपराओं में 5 प्रकार के धन की बात आती है पहला विद्याधन दूसरा आरोग्य या स्वास्थ्य पर यह कभी किसी के साथ लेनदेन नहीं हो सकती इसे स्वयं के पुरुषार्थ के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है अब जहां से आपस में लेनदेन में उपयोगी धन में सबसे श्रेष्ठ धन को गौ धन फिर अन्य पशुधन और सबसे अंत में हीन धन यानी रतन धन सोना चांदी हीरा  जो  धरती मां को  खोदकर  इसके गर्भ से निकाला जाता है। माना जाता है इस दीपावली में पांचों प्रकार के धनों  के पूजन का विधान है जिसकी शुरुआत गोवत्स द्वादशी से शुरू हो जाता है  इसके बाद स्वास्थ्य के लिए धनतेरस इसी दिन आरोग्य के देवता धन्वंतरि का पूजन का विधान है और सबसे अंत में सोने चांदी की पूजा का विधान होता है
हिन्दू धर्मग्रंथों के अनुसार पौराणिक काल से कार्तिक के महीने में कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि  को गोवत्स द्वादशी मनाई जाती है। दीपावली के पूर्व आने वाली इस द्वादशी को गाय तथा  बछड़ों की पूजा-सेवा की जाती है। द्वादशी के दिन सुबह नित्य कर्म से निवृत्त होकर गाय तथा  बछड़े की पूजा करनी चाहिए। द्वादशी के व्रत में गाय के दूध से बने खाद्य पदार्थों का उपयोग  नहीं किया जाता है।सत्त्वगुणी, अपने सान्निध्यसे दूसरोंको पावन करनेवाली, अपने दूधसे समाजको पुष्ट करनेवाली, अपना अंग-प्रत्यंग समाजके लिए अर्पित करनेवाली, खेतोंमें अपने गोबरकी खादद्वारा उर्वराशक्ति बढानेवाली, ऐसी गौ सर्वत्र पूजनीय है । हिंदू  कृतज्ञतापूर्वक गौको माता कहते हैं । जहां गोमाताका संरक्षण-संवर्धन होता है, भक्तिभावसे उसका पूजन किया जाता है, वहां व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्रका उत्कर्ष हुए बिना नहीं रहता। भारतीय संस्कृतिमें गौको अत्यंत महत्त्व दिया गया है । वसुबारस अर्थात गोवत्स द्वादशी दीपावलीके आरंभमें आती है । यह गोमाताका सवत्स अर्थात उसके बछडेके साथ पूजन करनेका दिन है ।
१. गोमाता काे सम्पूर्ण विश्‍वकी माता क्याें कहते हैं ?
गोमाताकी रीढमें सींगसे पूंछतक ‘सूर्यकेतु’ नामक एक विशेष नाडी होती है । गोमाता अपने सींगोंके माध्यमसे सूर्यकी ऊर्जा अवशोषित करती है तथा ‘सूर्यकेतु’ नाडीमें वाहित करती है । सूर्यसे मिलनेवाली ऊर्जा दो प्रकारकी होती है । क्रिया ऊर्जा एवं ज्ञा ऊर्जा । क्रिया ऊर्जा गति तथा ज्ञा ऊर्जा विचारशक्ति दान करती है । जुगालीकी क्रियाके समय सूर्यसे प्राप्त दोनों ऊर्जाआेंको चबाकर वह अन्नमें मिला देती है । औषधीय वनस्पतियोंके रस, क्रिया ऊर्जा एवं ज्ञा ऊर्जा का संयोग होकर एक अमृत गोमाताके उदरमें पहुंचता है । वहां सर्व पाचन पूर्ण होनेके पश्‍चात यह अमृत तीन भागोंमें बंटता है – पृथ्वीके पोषण हेतु गोमय, वायुमण्डलके पोषण हेतु गोमूत्र तथा प्राणिजगत, विशेषतः मानवके पोषणके लिए दूध । इस कार गोमाताके कारण सम्पूर्ण सृष्टिका पोषण होता है । इसलिए विष्णुधर्मोत्तर पुराणमें कहा गया है कि ‘गावो विश्‍वस्य मातरः ।’ अर्थात गाय सम्पूर्ण विश्‍वकी माता है ।
२. गौमें सभी देवताओंके तत्त्व आकर्षित होते हैं
गौ भगवान श्रीकृष्णको प्रिय हैं । दत्तात्रेय देवताके साथ भी गौ है । उनके साथ विद्यमान गौ पृथ्वीका प्रतीक है । प्रत्येक सात्त्विक वस्तुमें कोई-ना-कोई देवताका तत्त्व आकर्षितहोता है । परंतु गौकी  यह विशेषता है, कि उसमें सभी देवताओंके तत्त्व आकृष्ट होते हैं । इसीलिए कहते हैं, कि गौमें सर्व देवी-देवता वास करते हैं । गौसे प्राप्त सभी घटकोंमें, जैसे दूध, घी, गोबर अथवा गोमूत्रमें सभी देवताओंके तत्त्व संग्रहित रहते हैं ।
३. गोवत्स द्वादशी का अध्यात्मशास्त्रीय महत्त्व
ऐसी कथा है कि समुद्रमंथनसे पांच कामधेनु उत्पन्न हुर्इं । उनमेंसे नंदा नामक धेनुको उद्देशित कर यह व्रत मनाया जाता है । वर्तमान एवं भविष्यके अनेक जन्मोंकी कामनाएं पूर्ण हों एवं पूजित गौके शरीरपर जितने केश हैं, उतने वर्षोंका स्वर्गमें वास हो । शक संवत अनुसार आश्विन कृष्ण द्वादशी तथा विक्रम संवत अनुसार कार्तिक कृष्ण द्वादशी गोवत्स द्वादशीके नामसे जानी जाती है । यह दिन एक व्रतके रूपमें मनाया जाता है । गोवत्स द्वादशी के दिन श्री विष्णुकी आपतत्त्वात्मक तरंगें सक्रिय होकर ब्रह्मांडमें आती हैं । इन तरंगोंका विष्णुलोकसे ब्रह्मांडतकका  वहन विष्णुलोककी एक कामधेनु अविरत करती हैं । उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करनेके लिए कामधेनुके प्रतीकात्मक रूपमें इस दिन गौका पूजन किया जाता है ।
४. गोवत्स द्वादशी व्रतके अंतर्गत उपवास
इस दिन सौभाग्यवती स्त्रियां उपवास एक समय भोजन कर रखाती है । परंतु भोजनमें गायका दूध अथवा उससे बने पदार्थ, जैसे दही, घी, छाछ एवं खीर तथा तेलमें पके पदार्थ, जैसे भुजिया, पकौडी इत्यादि ग्रहण नहीं करते, साथ ही इस दिन तवेपर पकाया हुआ भोजन भी नहीं करते । प्रातः अथवा सायंकालमें सवत्स गौकी पूजा की जाती हैं ।
५. गोवत्स द्वादशी को गौपूजन प्रात अथवा सायंकालमें करनेका शास्त्रीय आधार
प्रातः अथवा सायंकालमें श्री विष्णुके प्रकट रूपकी तरंगें  गौमें अधिक मात्रामें आकर्षित होती हैं । ये तरंगें श्री विष्णुके अप्रकट रूपकी तरंगोंको १० प्रतिशत अधिक मात्रामें गतिमान करती है । इसलिए गोवत्स द्वादशीको गौपूजन सामान्यतः प्रातः अथवा सायंकालमें करनेके लिए कहा गया है ।

उपरांत ‘इस गौके शरीरपर जितने केश हैं, उतने वर्षोंतक मुझे स्वर्गसमान सुख की प्राप्ति हो, इसलिए मैं गौपूजन करता हूं ।  इस प्रकार संकल्प किया जाता है । प्रथम गौ पूजनका संकल्प किया जाता है । तत्पश्चात पाद्य, अर्घ्य, स्नान इत्यादि उपचार अर्पित किए जाते हैं। वस्त्र अर्पित किए जाते हैं । उपरांत गोमाताको चंदन, हलदी एवं कुमकुम अर्पित किया जाता है । उपरांत अलंकार अर्पित किए जाते हैं । पुष्पमाला अर्पित की जाती है । तदुपरांत गौके प्रत्येक अंगको स्पर्श कर न्यास किया जाता है । गौ पूजनके उपरांत बछडेको चंदन, हलदी, कुमकुम एवं पुष्पमाला अर्पित की जाती है । उपरांत गौ तथा उसके बछडेको धूपके रूपमें दो अगरबत्तियां दिखाई जाती हैं । उपरांत दीप दिखाया जाता है । दोनोंको नैवेद्य अर्पित किया जाता है । उपरांत गौकी परिक्रमा की जाती है । पूजनके उपरांत पुनः गोमाताको  भक्तिपूर्वक प्रणाम करना चाहिए । गौ प्राणी है । भयके कारण वह यदि पूजन करने न दें अथवा अन्य किसी कारणवश गौका षोडशोपचार पूजन करना संभव न हों, तो पंचोपचार पूजन भी कर सकते हैं । इस पूजनके लिए पुरोहितकी आवश्यकता नहीं होती ।
६. गोवत्सद्वादशीसे मिलनेवाले लाभ
गोवत्सद्वादशीको गौपूजनका कृत्य कर उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है । इससे व्यक्तिमें लीनता बढती है । फलस्वरूप कुछ क्षण उसका आध्यात्मिक स्तर बढता है । गौपूजन व्यक्तिको चराचरमें ईश्वरीय तत्त्वका दर्शन करनेकी सीख देता है । व्रती सभी सुखोंको प्राप्त करता है ।
 

सोमवार, 7 अक्टूबर 2019

अयोध्या के राजवंस का कीर्ति पताका आज भी विदेशों में फहरा रहा है



    पुर्वी अयोध्या का ऐतिहासिक तथ्य
जयश्रीराम
ये कहानी इतिहास के उन पन्नों की है, जिन्हें आज फड़फड़ाने की भी इजाज़त नहीं!
सदियों पहले, कमसकम आठ सदी पहले, भारत के एक अज्ञात क्षत्रिय राजवंश का युवा राजपुत्र राज्य से निष्कासित कर दिया गया। उसका अपराध क्या था, ये तक उगलने की इजाज़त इतिहास के पन्नों को नहीं।
इतिहास के टूटे पुर्ज़े, कई कड़ियों में, बस इतना बता पाते हैं कि उस राजपुत्र को न केवल राज्य में, बल्कि इस पूरी भारतभूमि में उसके निवास करने पर मनाही थी।
वैसी स्थिति में वो कहाँ जाता?
उत्तर का छोर पकड़ता तो रम्यकवर्ष का अज्ञात क्षेत्र था। जो वो पश्चिम का मार्ग लेता, तो म्लेच्छों के क्षेत्र में निहत्थे क्षत्रिय का होना घोर अदूरदर्शिता कहलाती। और दक्षिण में तो समुद्र तक महान भारतभूमि ही फैली थी, जहाँ उसका निवास निषिद्ध था।
वैसी स्थिति में, वो जाता तो कहाँ जाता? केवल पूरब ही सुरक्षित विकल्प था, सो उस निष्कासित राजपुत्र के पाँव भी पूरब की ओर मुड़ गए। और वो सुदूर पूरब के द्वीप स्यामदेश पर जा पहुँचा।
उस राजपुत्र ने सुदूर पूरब में प्रवास किया, निवास किया, भोजन आदि की नियमित व्यवस्था की और तब कहीं जाकर उस क्षेत्र की लोकमान्यताओं से लेकर संस्कृति और राजनीति तक को समझा!तत्पश्चात् उस निष्कासित राजपुत्र ने सेना निर्मित की, स्यामदेश के तत्कालीन शासक राजवंश पर आक्रमण किया, और विजय के पश्चात् उसने संसार को बताया कि वो अपने आर्य संस्कारों को भूला नहीं है, वो अपने राष्ट्र और उसकी यशस्वी परम्परा के वाहक पुरुषों को भूला नहीं है।
उस राजपुत्र ने अपने जीते हुए भूभाग का नामकरण “अयोध्या” किया। यों तो “अयोध्या” का अर्थ ही यही है कि उस भूभाग पर युद्ध न हो, किंतु पूर्वी “अयोध्या” की स्थापना ही युद्ध के ठीक बाद में हुई थी।
वस्तुतः युद्धपर्व के समापन में ही शांतिपर्व का प्रवेश हो पाता है। युद्ध की सभी संभावनाओं का समापन, केवल एक महायुद्ध से ही संभव है!##
पूरब की “अयोध्या” तो बन गई और तिस पर भी आर्य क्षत्रिय का शासन हो गया, किंतु हमारा धर्म हमें दमन नहीं सिखाता। हमारे ऐतिहासिक राजाओं ने प्रजा की इच्छाओं को ही सर्वोपरि माना है।
पूर्वी “अयोध्या” की प्रजा यशस्वी परम्परा “ताई” से ताल्लुक़ रखती थी। इसी के नाम पर स्यामभूमि को आधुनिक काल में “थाईलैंड” पुकारा गया है।
आर्यावर्त के उस निष्कासित राजपुत्र ने स्यामदेश के सांस्कृतिक परिवेश को नहीं बदला, बल्कि स्वयं अपनी परम्पराओं को “ताई” परिवेश में ढाल लिया। पहला बदलाव था, राज्य के नाम का ताई-उच्चारण शैली में प्रवाहित हो जाना।
पूर्वी “अयोध्या” का ताई-नाम “अयूथया” पुकारा गया! और राजधानी को “अयुध्या” कहा गया!
वस्तुत: राजधानी, राज्य व राजवंश तीनों के नाम, एक ही शब्द “अयोध्या” से प्रणीत थे। वैसा भाषाई आश्चर्य इतिहास में दूजा कोई नहीं मिलता।
“अयूथया” राजवंश के प्रथम इतिहास उल्लिखित राजा का नाम रामाथिबोदी प्रथम मिलता है। अवश्य ही, ये नाम ताई-नामशैली से प्रभावित है।
हालाँकि यों नहीं कहा जा सकता कि वे ही निष्कासित राजपुत्र थे। किंतु इतना अवश्य है कि वे इस वंश के प्रथम यशस्वी सम्राट अवश्य थे!
वे सन् तेरह सौ पचास के काल में राजा थे, किंतु आज भी, थाईलैंड की राजधानी में रामाथिबोदी के नाम पर बड़ा ही प्रसिद्ध हॉस्पिटल है। यानी कि ताई-स्मृतियाँ उन्हें अब भी सहेजे हुए हैं।
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“अयूथया” राज्य की स्थापना के समय, जो भूभाग प्राचीन ताई-राजवंशों के अधीन रह गया था, वो स्यामदेश का पूर्वी भाग था। उस राज्य का नाम “सुखोथाई” था।
किंतु सन् चौदह सौ अड़तीस में, “सुखोथाई” सम्पूर्ण विलय “अयूथया” में हो गया। उन दिनों “अयूथया” के राजा बोरोम्माराचा द्वितीय हुआ करते थे और “सुखोथाई” के राजा पुत्रहीन थे।
“सुखोथाई” की राजकुमारी का विवाह बोरोम्माराचा से हुआ और उन दोनों का पुत्र रामेसुअन, पूरे स्यामदेश का अधिपति बन गया।
यदि इतनी अधिक सत्ता, सम्पत्ति और सेना का उपयोग दिग्विजय में न हुआ, तो उसका अंतिम उपभोग क्या? सो, रामेसुअन ने कम्बोडिया पर आक्रमण कर दिया और उसके प्रमुख नगर “अंगकोर” तक अपना साम्राज्य विस्तार किया।
यही “अंगकोर” नगर, प्रसिद्ध अंकोरवाट मंदिर के लिए प्रसिद्ध है!
अब “अयूथया” की संरचना प्राचीन आर्यवर्त के राज्यों की भाँति हो गयी थी, एक चक्रवर्तिन दिग्विजयी सम्राट और तमाम अधीनस्थ करद राज्य।
इस “अयूथया” की समृद्धि इतनी थी कि उसके व्यापारिक सम्बंध जापान, वियतनाम, चीन और भारत से थे। साथ ही, महाद्वीपीय व्यापारिक तंत्र का फैलाव स्पेन, हॉलैंड, फ्राँस और पुर्तगाल तक था।
ये सुनहरा कालखंड राजा नरई का समय था, सन् सोलह सौ छप्पन से अट्ठासी तक। राजा नरई और राजा लुई चौदहवें के बड़े गहरे मैत्री सम्बंध थे।
किंतु, राजा नरई के उत्तरवर्तियों के हाथ में आई “अयूथया” राज्य की तलवार कमज़ोर पड़ गई। और इस कमज़ोरी के साथ विनाश की घड़ी ने भी प्रवेश किया।
सन् सत्रह सौ पैंसठ में “बर्मा” राज्य की मात्र पचास हज़ार सैनिकों की सेना ने आक्रमण किया और दो बरस तकचले इस युद्ध में “अयूथया” पराजित हो गया। पराजित राज्य का क्या हश्र होता है, ये सर्वविदित है।
बर्मियों ने, सन् सत्रह सौ सरसठ में राजधानी “अयुध्या” को जलाकर सम्पूर्ण भस्म कर दिया। “अयूथया” की सम्पूर्ण सांस्कृतिक थाती को, समृद्ध पुस्तकालय को, निर्दोष कलाकृतियों को और यहाँ तक कि ऐतिहासिक अभिलेखों के गृह तक को जला कर नष्ट कर दिया।
अब वहाँ केवल आधे-अधूरे-से सीमेंटी वस्त्रों से झाँकती, नग्न-अर्धनग्न छोटी लखौरी ईंटें ही शेष हैं। और शेष हैं, ताई-शैली में बनीं तीन शंक्वाकार पथरीली आकृतियाँ, जो तत्कालीन “अयूथया” के वैभव और पराभव की अथक कथा सुना रही हैं।

शनिवार, 5 अक्टूबर 2019

रानू मंडल का संगीत जगत में छा जाना चमत्कार या साजिश


रानू मंडल संगीत जगत में छा जाना प्रतिभा का चमत्कार या  सोची  समझी साजिश .. !! .. ??_*
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*#STEP 1*
आप  लोगों  को याद होगी  बल्कि  ज़ेहन  में ताजा  होगी,  *स्टेशन पर  गाना गाती हुई एक  भिखारिन  रानू मंडल  की  वीडियो ।*
उस वीडियो को जबरदस्त तरीके से सोशल मीडिया पर वायरल  किया गया। इस  क्लिप  को वायरल करते समय उसके गायन  की  तुलना  लता मंगेशकर जी  से  करना पोस्ट-कर्ता  नहीं भूले ।
*#STEP 2*
आश्चर्यजनक रूप से संगीत  जगत से लगभग  गायब  हो चुके   संगीतकार  और  गायक  हिमेश  रेशमिया ने उस  महिला को लपक  लिया और उस महिला  के  ब्यूटी पार्लर में  श्रृंगार की  वीडियो वायरल होने लगी।
*#STEP 3*
चार-पांच दिन बाद एक गाने  के  क्लिप  वायरल  की गई जिसमें वह महिला  हिमेश रेशमिया के  साथ  एक  गीत गा रही थी।
*#STEP 4*
चौथे  स्टैप में  रानू मंडल , जिसका पूरा नाम रानू मारिया मंडल है, उसने लता मंगेशकर जी पर डैरोगेटरी  कमेंट  करना शुरू कर  दिये।
*#STEP 5*
अचानक रानू मंडल देखते देखते  ईसाई चमत्कार  दिखाने  लग। गई  पर  क्या,  यह वास्तव में अचानक हुआ।
शायद नहीं, *_It was a complete plan to launch her and in the script was written for launching...!_*           यह  कहानी (पटकथा) लिखी  कुछ  वामियों ने, जो  _लता मंगेशकर जी के राष्ट्रवादी बयानों_  से व्यथित  थे क्षतथा    *_इस पटकथा  को  स्पॉन्सर किया  धर्मांतरण कराने  के  लिए  ईसाई  संस्थाओं  ने।_*
मुख्य  पात्र के लिए चयन किया गया रानू मंडल  का और सहायक  भूमिकाओं के लिए वीडियो बनाने वाले  चक्रवर्ती  का और काम  की तलाश में भटकते  _संगीत जगत के  हिमेश  रेशमिया का।_                *_अच्छा भुगतान किया गया होगा  इन दोनों को_ ;  ऐसा  लगता है  और इन दोनों को केवल आधी पटकथा बताई गई होगी वीडियो खींचकर  पोस्ट  करने की , और हिमेश को रानू मंडल को चांस देने के लिए थोड़े से पैसे दिए गए होंगे पर इस फिल्म  का  उद्देश्य शायद  इन  दोनों  को ना पता चला हो।*
आधी  कहानी  इंटरवल तक की  पूरी होने  के बाद  फाइनेंसर ने  अपने उद्देश्य को  पूरा करने के  लिए  इंटरवल  के बाद की फिल्म रिलीज करना  अब शुरू कर दिया  है । शायद आपने जरूर देखी होगी ना देखी हो तो  मैं  इस  पोस्ट के साथ  संलग्न  कर  रहा हूं ।
अपने आप से एक सवाल  जरूर पूछियेगा ,
यदि  आपको इस कहानी  पर  भरोसा ना आ रहा हो  तो , _रानू मंडल_  से 10 गुना अधिक  क्षमता वाले 1000 लोगों के वीडियो   मीडिया में भरे पड़े हैं
 *_हिमेश रेशमियां_*  कितने लोगों को  स्पॉन्सर करने को  तैयार है  और *वह  1000  लोग तो  अपने  पहले  गाने  के लिए कोई  शुल्क  भी  नहीं लेंगे।*

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2019

सह अस्तित्व के साथ साथ संघर्ष भी रहते थे शायद यही संघर्ष देवासुर संग्राम कहलाये



कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... सुर-असुर व देवासुर संग्राम वेद और महाभारत के अनुसार आदिकाल में पृथ्वी पर - देव, दैत्य, दानव, राक्षस, यक्ष, गंधर्व, किन्नर, नाग आदि प्रमुख जातियां थीं । देवताओं को सुर तो दैत्यों को असुर कहा जाता था। ऋषि कश्यप की विभिन्न पत्नियों -- देवताओं की अदिति से, दैत्यों की दिति से, दानवों की दनु से, राक्षसों की सुरसा से, गंधर्वों की उत्पत्ति अरिष्टा से हुई। इसी तरह अन्य पत्नियों से यक्ष, किन्नर, नाग आदि की उत्पत्ति मानी गई है। सृष्टि के विकास की नींव में ऋषि कश्यप एक ऐसे ऋषि थे जिन्होंने कुल का विस्तार किया था| ब्रह्माजी के मानस पुत्र मरीची के विद्वान पुत्र ऋषि कश्यप जिन्हें अनिष्टनेमी के नाम से भी जाना जाता है, इनकी माता का नाम 'कला' था जो कर्दम ऋषि की पुत्री और कपिल देव की बहन थी पुराणों अनुसार सुर-असुरों के मूल पुरुष ऋषि कश्यप का आश्रम मेरू पर्वत के शिखर पर स्थित था जहाँ वे परब्रह्म परमात्मा कि तपस्या में लीन रहते थे | कश्यप सागर ..केस्पियन सी.... कश्यप मेरु प्रदेश .. कश्मीर प्रदेश उन्हीं के नाम पर कहे जाते हैं प्रारंभ में सभी महाद्वीप आपस में एक से जुड़े हुए थे। इस दूसरे धरती को प्राचीन काल में सात द्वीपों में बांटा गया था – जम्बू द्वीप, प्लक्ष द्वीप, शाल्मली द्वीप, कुश द्वीप, क्रौंच द्वीप, शाक द्वीप एवं पुष्कर द्वीप। इसमें से जम्बू द्वीप सभी के बीचोबीच स्थित था। जम्बू द्वीप के 9 खंड थे : इलावृत, भद्राश्व, किंपुरुष, भारत, हरिवर्ष, केतुमाल, रम्यक, कुरु और हिरण्यमय। इसी क्षेत्र में सुर और असुरों का साम्राज्य था। चित्र-१ .रामायण कालीन भारत असुर देवताओं के सबसे प्रबल शत्रुओं में गिने जाते थे। पौराणिक धर्म ग्रंथों और हिन्दू मान्यताओं के अनुसार भी असुरों और देवों में सदा युद्ध होता रहा। एक ही पितामह सृष्टिकर्ता ब्रह्मा एवं एक ही पिता कश्यप मुनि की विभिन्न पत्नियों से संतान- देव ‘अदिति’ के पुत्र, दैत्य 'दिति' के पुत्र एवं दानव 'दनु' के पुत्र अर्थात भाई भाई होने पर भी बड़े भाइयों दैत्य व दानवों ने देवों के विरुद्ध दुश्मनी / प्रतियोगिता के कारण श्रेष्ठता सिद्ध करने हेतु पहले तो अति कुछ लोग मानते हैं कि ब्रह्मा और उनके कुल के लोग धरती के नहीं थे। उन्होंने धरती पर आक्रमण करके मधु और कैटभ नाम के दैत्यों का वध कर धरती पर अपने कुल का विस्तार किया था। बस, यहीं से धरती के दैत्यों और स्वर्ग के देवताओं के बीच लड़ाई शुरू हो गई। देवताओं से संघर्ष देवता और असुरों की यह लड़ाई चलती रही। जम्बूद्वीप के इलावर्त क्षेत्र ( रशिया=रूस) में 12 बार देवासुर संग्राम हुआ। असुरों ने वर्चस्व के लिए लगातार देवों के साथ युद्ध किया और इनमें से कई युद्धों में वे प्राय: विजयी भी होते रहे। असुरों में भी बड़े बड़े प्रसिद्द राज्याध्यक्ष, बलवान-शक्तिशाली, वीर, भक्त, धार्मिक, विद्वान् हुए | उनमें से कुछ ने तो सारे विश्व पर अपना साम्राज्य स्थापित किया जब तक कि उनका संहार इन्द्र, विष्णु, शिव आदि देवों ने नहीं किया। देवों, मूलतः इंद्र व विष्णु के शत्रु होने के कारण ही उन्हें असुर, दुष्ट, दैत्य कहा गया है, किंतु सामान्य रूप से वे दुष्ट नहीं थे। उनके गुरु भृगु के पुत्र शुक्राचार्य थे, जो देवगुरु बृहस्पति के तुल्य ही ज्ञानी और राजनयिक थे। महादेव शिव सुर–असुर दोनों के प्रति समभाव रखते थे यद्यपि वे दैत्यों के अति-भौतिकता की संस्कृति एवं देवों की सुखलिप्ततापूर्ण जीवनचर्या की अपेक्षा वनान्चली प्राकृतिक जीवन शैली के समर्थक थे| असुर भी प्रायः प्रकृति-पूजक थे। देव गुरु बृहस्पति के भाई दैत्य गुरु शुक्राचार्य स्वयँ शिव के शिष्य, भक्त व उपासक थे | वे उशना नाम से प्रसिद्द कवि-विद्वान् एवं मृतक को पुनः जीवित कर देने वाली मृतसंजीवनी विद्या के ज्ञाता थे जो भगवान शिव ने उन्हें देवों को अमृत द्वारा अमरता प्राप्त होने पर दोनों वर्गों के समानुपातिक समन्वय व शक्तिसंतुलन के स्वरुप प्रदान की थी | इस प्रकार ब्रहस्पति के शिष्य व समर्थक देव, सुर तथा शुक्राचार्य के शिष्य व समर्थक दैत्य आदि असुर कहे जाने लगे | यद्यपि दोनों संस्कृतियों में प्रेम व विवाह आदि अंतर्संबंध प्रतिबंधित नहीं थे दैत्यराज हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रहलाद के विष्णु भक्त होने के बाद असुर भी मानवीयता एवं भक्तिभावयुत होने लगे एवं विद्याधरों की कोटि में आने लगे एवं असुरों में भी देवताओं के समर्थक होने लगे ---– देव केवल स्वर्ग, देवलोक, भरत-खंड ( मध्य एशिया, उत्तरापथ, उत्तराखंड, भारतवर्ष, ब्रह्मावर्त ) तक सिमट गए समुद्र मंथन में निकली हुई वारुणी को असुरों ने ले लिया। असुरों ने अमृत कलश को भी छीन लिया। उनमें आपस में झगड़ा होने लगा कि पहले कौन पिए। कुछ दुर्बल दैत्‍य ही बलवान दैत्‍यों का ईर्ष्‍यावश विरोध करने तथा न्‍याय की दुहाई देने लगे कि ‘देवताओं ने हमारे बराबर परिश्रम किया, इसलिए उनको यज्ञभाग समान रूप से मिलना चाहिए। नशा उतरने पर असुरों ने देखा कि उनके साथ धोखा हुआ। उन्‍होंने देवताओं पर धावा बोल दिया। पुनः देवासुर संग्राम हुआ। इस बार असुरराज बेहोश हो गए पर शुक्राचार्य ने संजीवनी विद्या से उन्‍हें फिर ठीक कर दिया। नारदजी के आग्रह पर कि देवताओं को अभीष्‍ट प्राप्‍त हो चुका है, युद्ध बंद हुआ। देवता और असुर अपने-अपने लोक को पधारे। परस्‍पर सहयोग तथा एकजुट प्रयत्‍न से एक राष्‍ट्रीय जीवन की खोज हुई। पशुपालन भी समाज ने सीखा और खेती व्‍यापक बनी। इस प्रकार एक ओर जहॉं सामाजिकता के सर्वश्रेष्‍ठ भावों का निर्माण हुआ दूसरी ओर वहॉं लौकिक उन्‍नति भी हुई। यह सभ्‍यता के दोहरे कार्य की ओर पहला प्रयत्‍नपूर्वक उठाया गया कदम था। सबका समन्‍वय करता हुआ, सहिष्‍णु,एकरस सामाजिक जीवन के निर्माण से समाज मे स्‍थायित्‍व एवं अमरत्‍व आया। इस मंथन से एश्वर्य तथा संपदा के साथ मानव को वारूणी भी प्राप्‍त हुई। असुर व असुरों के उपासक, जो प्राकृतिक शक्तियों के ज्ञान में आगे थे, पर रजोगुण एवं तमोगुण प्रधान थे, वारूणी पीकर मदहोश हो गए। इसलिए उनके पल्‍ले अमृत नहीं पड़ा। वे एकरस सांस्‍कृतिक जीवन के अंग न बन बसे। फिर भी एक विशाल प्रयत्‍न सभी प्रकार के लोगों को मिलाकर साथ चलने का अध्‍यवसाय हुआ और इसी से प्रारंभिक समृद्धि, सामर्थ्‍य और लौकिक संपदा एकरस सामाजिक जीवन की खोज में मिलीं। तदुपरांत ब्रह्मा, शिव एवं विष्णु ने वामन-अवतार संधि द्वारा बलि को एवं उसके समर्थक असुरों को पाताल - अमेरिका, आस्ट्रेलिया आदि-- भेज दिया गया एवं देव व उनके समर्थक - मानव, असुर, दैत्य व नाग आदि अन्य मानवेतर जातियां समस्त यूरेशिया, अफ्रीका में फ़ैल गए| इस काल तक असुरों व अन्य देवेतर जातियों के समर्थ, वीर, योद्धा, भक्त एवं महान व्यक्तित्वों को अर्ध-देव व देव श्रेणी में आने का सम्मान मिलना प्रारम्भ होचुका था | यथा इंद्र का मित्र वृषाकपि, बलि को इंद्र पद प्राप्त होना, हनुमान का पूज्य देवों में सम्मिलित होना सुर-असुर का अर्थ एवं ग्रंथों में उनका उल्लेख प्रारंभिक ऋग्वेदिक मंडलों में सृष्टि उत्पत्ति सूक्तों में सुर का अर्थ तात्विक अर्थ पदार्थ रचना के सृजनशील मूल प्राकृतिक सृष्टि कणों (शक्तियों) को कहा गया है एवं असृजनशील व सृजन में बंधता बाधा उत्पन्न करने वाले कठोर रासायनिक बंधनों को बनाने वाले कणों को ( शक्तियों को ) असुर कहा गया है | –-ऋग्वेद १/२२/२२६ में मन्त्र है..तद्विष्णो परमं पदं सदा पश्यति सूरय: दिबीव चक्षुराततम |---अर्थात ..सूरयः (सुर) = विद्वान्, ज्ञानी जन अपने सामान्य नेत्रों ( ज्ञान चक्षुओं ) से अदृष्ट देव ईश्वर विष्णु को देखते हैं| तथा “ ---मद्देवानाम सुरत्वेकम || ( ऋक.3/५५) ..सभी महान देवों का सुरत्व, अर्थात अच्छे कार्य हेतु बल संयुक्त है, एक ही है असुर शब्द 'असु' अर्थात 'प्राण', और 'र' अर्थात 'वाला' (प्राणवान् अथवा शक्तिमान) से मिलकर बना है। बाद के समय में धीरे-धीरे असुर भौतिक शक्ति का प्रतीक हो गया। ऋग्वेद में 'असुर' वरुणतथा दूसरे देवों के विशेषण रूप में व्यवहृत हुआ है, जिसमें उनके रहस्यमय गुणों का पता लगाता है। असुर देवों के बड़े भ्राता हैं एवं दोनों प्रजापति के पुत्र हैं। आर्यों के मूल धर्म में सर्वशक्तिमान भगवान के अंशस्‍वरूप प्राकृतिक शक्तियों की उपासना होती थी। ऋग्‍वेद में सूर्य, वायु, अग्नि, आकाश और इंद्र से ऋद्धि-सिद्धियां मांगी जाती थीं। यही देवता हैं। उक्त देवताओं के ऊपर विष्णु और विष्णु से ऊपर ब्रह्म ही सत्य माना जाता था। बाद में अमूर्त देवताओं की कल्‍पना हुई जिन्‍हें ‘असुर’ कहा गया। जो प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन भी कर सकते थे, मानवता एवं सांसारिक हित एवं भौतिक प्राप्ति हेतु | ‘देव’ तथा ‘असुर’ ये दोनों शब्‍द पहले देवताओं के अर्थ में प्रयोग होते थे। ऋग्‍वेद के प्राचीनतम अंशों में ‘असुर’ इसी अर्थ में प्रयुक्‍त हुआ है। वेदों में ‘वरुण’ को ‘असुर’ कहा गया और सबके जीवनदाता ‘सूर्य’ की गणना ‘सुर’ तथा ‘असुर’ दोनों में है। कृष्ण को भी ऋग्वेद में कृष्णासुर कहा गया है भो त कृष्णमवत स्थिवांस मिस्यामि वो वृषणो || ----हमने अंशुमती तट ( यमुना तट ) पर गुफाओं में घूमते हुए कृष्णासुर को सूर्य के सदृश्य देख लिया है बाद में कर्म के नियमानुशासन की प्रतिबद्धता से संयुक्त होने पर अति-भौतिकता पर चलने वालों को असुर एवं संस्कारित मानवीय व उच्चकोटि के सदाचरण के गुणों को सुर कहा गया | ‘देव’ शब्‍द के लिए सुर का प्रयुक्‍त करने लगे और ‘असुर’ का अर्थ ‘राक्षस’ करने लगे। ऋग्वेद में यम अपनी बहन यमी से उसकी कामेच्छा जनित मांग के अनुचित कार्य हेतु किसी असुर से संपर्क के लिए कहता है न ते सखा सख्यं वष्टये वत्सलक्ष्यामद्वि पुरुषा भवति| महष्पुमान्सो असुरस्य वीरा दिवोध्वरि उर्विया परिख्यानि || --हे सखी! आपका यह सहयोगी आपके साथ इस प्रकार के संपर्क का इच्छुक नहीं है क्योंकि आप सहोदरा बहन हैं| हमें यह अभीष्ट नहीं है परवर्ती युग में असुर का प्रयोग देवों (सुरों) के शत्रु रूप में प्रसिद्ध हो गया। असुर के अन्य अर्थ वैदिक काल में वह जो सुर या देवता न हो, बल्कि उनसे भिन्न और उनका विरोधी हो। ईशोपनिषद में असुर्यानाम ते लोका अन्धें तमावृता ...अन्धकार के अज्ञान में रहने वाले लोग असुर प्राचीन पौराणिक कथाओं के अनुसार दैत्य या राक्षस। इतिहास और पुरातत्त्व से आधुनिक असीरिया देश के उन प्राचीन निवासियों की संज्ञा जिन्हें उन दिनों असुर कहते थे और जिनके देश का नाम पहले असुरिय आधुनिक असीरिया था। वे ही ईरान के अहुर कहलाये| नीच वृत्ति वाला और असंस्कृत पुरूष। भारत में रामायण काल तक दो तरह के लोग हो गए। एक वे जो सुरों को मानते थे और दूसरे वे जो असुरों को मानते थे। अर्थात एक वे जो ऋग्वेद को मानते थे और दूसरे वे जो अथर्ववेद को मानते थे। महाभारत एवं अन्य प्रचलित दूसरी कथाओं के वर्णन में असुरों के गुणों पर प्रकाश डाला गया है। साधारण विश्वास में वे मानव से श्रेष्ठ गुणों वाले विद्याधरों की कोटि में आते हैं। वस्तुतः रामायण काल तक असुरों व अन्य देवेतर जातियों के समर्थ व्यक्तियों, वीर, योद्धा, एवं महान व्यक्तित्वों व देवों के सहायकों, मित्रों, भक्त आदि को अर्ध-देव व देव श्रेणी में सम्मिलित किये जाने का सम्मान मिलना प्रारम्भ होचुका था पुराणों में आये उल्लेखों से स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण के उदय से पूर्व कंस ने यादव गणतंत्र के प्रमुख अपने पिता और मथुरा के राजा उग्रसेन को बंदी बनाकर निरंकुश एकतंत्र की स्थापना करके अपने को सम्राट घोषित किया था। उसने यादव व आभीरों को दबाने के लिए इस क्षेत्र में असुरों को भारी मात्रा में ससम्मान बसाया था, जो प्रजा का अनेक प्रकार से उत्पीड़न करते थे। श्रीकृष्ण ने बाल्यकाल में ही आभीर युवकों को संगठित करके इनसे टक्कर ली थी। ब्रज के विभिन्न भागों में इन असुरों को जागीरें देकर कंस ने सम्मानित किया। मथुरा के समीप दहिता क्षेत्र में दंतवक्र की छावनी थी, पूतना खेंचरी में, अरिष्ठासुर अरोठ में तथा व्योमासुर कामवन में बसे हुए थे। परंतु कंस वध के फलस्वरूप यह असुर समूह या तो मार दिया गया या फिर ये इस क्षेत्र से भाग गये। 'कथासरित्सागर' में एक प्रेम पूर्ण कथा में किसी असुर का वर्णन नायक के साथ हुआ है। संस्कृत के धार्मिक ग्रंथों में असुर, दैत्य एवं दानव में कोई अंतर नहीं दिखाया गया है, किंतु प्रारम्भिक अवस्था में दैत्य एवं दानव, असुर जाति के दो विभाग समझे गये थे। परवर्ती काल में ‘देव’ तथा ‘असुर’ -आर्यों की ही दो शाखाऍं थीं। बाद के काल में सुर–असुर को ही आर्य-अनार्य कहा जाने लगा किसी समुदाय की प्रारंभिक त्रुटियाँ होती हैं मस्तीभरा जीवन, उपभोग्या नारी का स्वरूप, अनेक स्त्रियों के साथ अवैध संबंध आदि अतिशय भोगपूर्ण व विलासी जीवन | इस उन्नत सभ्यता व संस्कृति देव-असुर संस्कृति में भी यही त्रुटियाँ आयीं | सोमरस का देवों द्वारा और सुरा का असुरों द्वारा पान, उन्मुक्त जीवन आदि | इन्हीं त्रुटियों का निराकरण करते हुए महान् चिंतक एवं सिद्धांतनिष्ठ व्यक्तित्व के धनी परमश्रद्धेय वैवस्वत मनु ने जल प्रलयोपरांत मन-मानव संस्कृति की स्थापना की जो मानव त्रुटियों की संस्कृति, विनष्ट देव-संस्कृति का ही संस्कारित रूप था | मानव रक्त में विद्रोह करने की क्षमता पुराकाल से ही चली आ रही है। देव व असुरों के आपसी विद्रोह के पश्चात जब महर्षि अत्रि ने वैवस्वत मनु एवं अपने शिष्य ऋषि उतथ्य के साथ इस मानव स्थापना की संस्कृति की इसकी जड़ों को शक्तिशाली और बलवती बनाने का अदम्य प्रयास किया तब भी इसके विरोध के लिये विरोध हुआ। पुलस्त्य और विश्रवा ने अपनी पूर्ण शक्ति से इसकी स्थापना का विरोध किया तथा रक्ष संस्कृति की स्थापना की क्या देवासुर संग्राम...नियंडरथल व होमोसेपियंस मानवों के द्वंद्व नहीं थे ? प्रारम्भिक शैव प्रारम्भिक वैष्णव – विष्णु के अनुयायी –मैदान व गर्म प्रदेश वासी विक्सित नगरीय सभ्यता के उन्नत निवासी –होमो सेपियंस ...देव – इनके मध्य चलने वाला वर्ग भेद, विभाजन एवं संघर्ष ही शायद प्रारम्भिक देवासुर संग्राम थे समस्त सुमेरु या जम्बू द्वीप देव-सभ्यता का प्रदेश था | यहीं स्वर्ग में गंगा आदि नदियाँ बहती थीं,यहीं ब्रह्मा-विष्णु व शिव, इंद्र आदि के देवलोक थे...शिव का कैलाश, कश्यप का केश्पियन सागर, स्वर्ग, इन्द्रलोक आदि ..यहीं थे जो अति उन्नत सभ्यता थी –-- जीव सृष्टि के सृजनकर्ता प्रथम मनु स्वयंभाव मनु व कश्यप की सभी संतानें ..भाई-भाई होने पर भी स्वभाव व आचरण में भिन्न थे | विविध मानव एवं असुर आदि मानवेतर जातियां साथ साथ ही निवास करती थीं | विकासवाद के विचार से नियंडरथल मानव ....देव संस्कृति की स्थापना से प्रथम उन्नत आदि-मानव थे जो हिमालय उद्भव एवं महाजलप्रलय से पूर्व समस्त पुरानी दुनिया—जम्बू द्वीप....में फैले हुए थे साथ ही साथ अधिक उन्नत नवीन मानव क्रोमेग्नन-मानव व होमो सेपियंस भी थे | यही असुर व सुर कहलाये| सह अस्तित्व के साथ साथ संघर्ष भी रहते थे शायद यही संघर्ष देवासुर संग्राम कहलाये | भारतीय भूखंड में स्थित उन्नत मानव..... स्वर्ग – शिवलोक कैलाश अदि आया जाया करते थे ...देवों से सहस्थिति थी ...जबकि अमेरिकी भूखंड (पाताल लोक) व अन्य सुदूर एशिया –अफ्रीका के असुर आदि मानवेतर जातियों को अपने क्रूर कृत्यों के कारण अधर्मी माना जाता था |....अंतिम हिमयुग में टेथिस सागर के विलुप्तीकरण की जलप्रलय में वे अधिकांशतः विनष्ट होगये एवं इधर-उधर फ़ैल गए ..हिमालय के उद्भव एवं वैवस्वत मनु द्वारा पुनः नवीन मानववंश (होमो सेपियंस ) की स्थापना एवं समस्त विश्व में विस्तार के साथ नियंडर्थल मानव धीरे-धीरे विलीन होते गए कालांतर में देवों और देव समर्थक असुरों में पुनः धार्मिक एवं सांस्‍कृतिक मतभेद उत्‍पन्‍न हुए असुर जनजाति प्रोटो-आस्ट्रेलाइड समूह के अंतर्गत आती है, ऋग्वेद तथा ब्राह्मण, अरण्यक, उपनिषद्, महाभारत आदि ग्रन्थों में असुर शब्द का अनेकानेक स्थानों पर उल्लेख हुआ है। विभिन्न स्थानों पर असुरों की वीरता का वर्णन किया गया है है कि वे पूर्ववैदिक काल से वैदिक काल तक अत्यन्त शक्तिशाली समुदाय के रूप में प्रतिष्ठित थे। शायद असुर साम्राज्य का अन्त आर्यों के साथ संघर्ष में हो गया। प्रागैतिहासिक संदर्भ में असुरों को असीरिया नगर के निवासियों के रूप में वर्णन किया है, जिन्होंने मिस्र और बेबीलोन की संस्कृति अपना ली थी और बाद में उसे भारत और इरान तक फैलाया,जहां उन्हें अहुर कहा गया ईरान या फारस में असुरों को अहुर कहा गया -- असुरों में मूल भिन्नता थी चित्र २, हुविश्क ( कुषाण पूर्व मथुरा शासक ?) –बाह्लीक या बेक्त्रिया या बलख ( मध्य-एशिया ) उत्तरापथ, चक्षु नदी या ओक्सस के आस-पास ..कश्मीर...स्वर्ग मथुरा तक के शासक (? त्रिमूर्ति जरथुस्त्र के अनुसार ईश्वर एक ही है (उस समय फारस में अनेक देवी-देवताओं की पूजा की जाती थी ...सुर या देव, प्रकृति पूजकों का वर्चस्व था )। इस ईश्वर को जरथुस्त्र ने 'अहुरा मजदा' कहा अर्थात 'महान जीवन दाता'। जरथुस्त्र चाहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर तुल्य बने, जीवनदायी ऊर्जा को अपनाए तथा निर्माण, संवर्द्धन एवं प्रगति का वाहक बने। मठवाद, ब्रह्मचर्य, व्रत-उपवास, आत्म दमन आदि की मनाही है। इनसे मनुष्य कमजोर होता है और बुराई से लड़ने की उसकी ताकत कम हो जाती है। मानव इस विश्व का पूरा आनंद उठाए, खुश रहे। वह जो भी करे बस एक बात का ख्याल अवश्य रखे और वह यह कि सदाचार के मार्ग से कभी विचलित न हो। भौतिक सुख-सुविधाओं से संपन्न जीवन की मनाही नहीं है, किसी का हक मारकर या शोषण करके कुछ पाना दुराचार है। जो हमसे कम सम्पन्न हैं, उनकी सदैव मदद करना चाहिए। दैहिक मृत्यु को बुराई की अस्थायी जीत माना गया है। विश्व का अंतिम उद्देश्य अच्छाई की जीत को मानता है, बुराई की सजा को नहीं। अतः यह मान्यता है आत्माओं का अंतिम फैसला होगा। इसके बाद भौतिक शरीर का पुनरोत्थान होगा| चित्र५ – जरथुस्त्र – गूगल से.. शुद्ध अद्वैतवाद के प्रचारक जोरोस्ट्रीय धर्म ने यहूदी धर्म को प्रभावित किया और उसके द्वारा ईसाई और इस्लाम धर्म को। इस धर्म ने एक बार हिमालय पार के प्रदेशों तथा ग्रीक और रोमन विचार एवं दर्शन को प्रभावित किया था किंतु 600 वर्ष AD के लगभग इस्लाम ने इसका स्थान ले लिया। सनातन वैदिक धर्म से प्रकारंतारिता द्वारा धर्मों का क्रमिक विकृतीकरण-----सनातन वैदिक धर्म ,ब्रह्म ईश्वर सुर से àपारसी, जरथुस्त्र, अहुरा-मज़्दा, अहुर àयहोवा, यहूदी à बाइबल ईसा ईसाई à मोहम्मद इस्लाम मुस्लिम...... अहुरा मज्दा के सिद्धांत प्राचीन असुरों के भौतिकवाद एवं मनुष्य की केन्द्रीय भूमिका पर आधारित हैं, जो वेद व देव-सभ्यता या आर्य मतों से मूलरूप में समान होते हुए भी भिन्नता एवं अपभ्रष्ट रूप है आधुनिक काल में असुर- विश्वभर में कबीलाई, जनजाति एवं वनवासी जातियों को अपितु सभी विदेशियों को उनके आचरण, व्यवहार व सभ्यता-संस्कृति के कारण अनार्य या असुर समझा जा सकता है शताब्दियों से अधिक पूर्व भारत भाग आए थे, उन्होंने यहाँ शरण ली। तबसे आज तक पारसियों ने भारत के उदय मे बहुत बड़ा योगदान दिया है। उनमें उस महान प्रभु की वाणी अब भी जीवित है और आज तक उनके घरों और चित्र ६ - अफगान शासक –विष्णु की पूजा करते हुए उपासनागृहों में सुनी जाती है। गीतों के रूप में गाथा नाम से उनके उपदेश सुरक्षित हैं जिनका सांराश है अच्छे विचार, अच्छी वाणी, अच्छे कार्य। भारतवर्ष में असुर कहलाई जाने वाली जातियां यूं तो सारे देश में फ़ैली हुई हैं| प्रायः जनजातियों, आदिवासियों, वन वासियों, वनांचल के निवासियों, गोंड, भील आदि को असुर कह दिया जाता है| आजकल वे संगठित होकर स्वयं को असुर व अनार्य मानने भी लगे हैं एवं अगदी जाती या आर्य विरोधी स्वर भी उठाने लगे हैं आदिम जनजाति असुर की भाषा मुण्डारी वर्ग की है जो आग्नेय (आस्ट्रो एशियाटिक) भाषा परिवार से सम्बद्ध है। परन्तु असुर जनजाति ने अपनी भाषा की आसुरी भाषा की संज्ञा दी है। अपनी भाषा के अलावे ये नागपुरी व हिन्दी का भी प्रयोग करते हैं। असुर जनजाति में पारम्परिक शिक्षा हेतु युवागृह की परम्परा थी जिसे ‘गिति ओड़ा’ कहा जाता था। असुर बच्चे अपनी प्रथम शिक्षा परिवार से शुरू करते थे और 8 से 10 वर्ष की अवस्था में ‘गिति ओड़ा’ के सदस्य बन जाते थे। जहाँ वे अपनी मातृभाषा में जीवन की विभिन्न भूमिकाओं से सम्बन्धित शिक्षा, लोकगीतों और कहावतों के माध्यम से सीखा करते थे असुर प्रकृति-पूजक होते हैं। ‘सिंगबोंगा’ उनके प्रमुख देवता है। ‘सड़सी कुटासी’ इनका प्रमुख पर्व है, जिसमें यह अपने औजारों और लोहे गलाने वाली भट्टियों की पूजा करते हैं। असुर महिषासुर को अपना पूर्वज मानते है। पिछले कुछ सालों से एक पिछड़े वर्ग के संगठन ने ‘महिषासुर शहीद दिवस’ मनाने की शुरुआत भी की है।हिन्दू धर्म में महिषासुर को एक राक्षस (असुर) के रूप में दिखाया गया है जिसकी हत्या दुर्गा ने की थी। पश्चिमी बंगाल व झारखंड में दुर्गा पूजा के दौरान असुर समुदाय के लोग शोक मनाते है। यद्यपि यह गोंड समुदाय की एक भ्रमपूर्ण गाथा के कारण उत्पन्न हुआ है कि – उनके देवता शंभू सेक( जो वास्तव में शिव-शंभू महादेव ही हैं ) को आर्यों द्वारा पार्वती के रूपजाल में फंसाकर उनके समुदाय को पराजित कर दिया | परन्तु वास्तव में यह तथ्य उस कथा व घटना का मिथ्याकरण एवं विकृतीकरण है जब दक्षिण भारत के देवता शिव ने समुद्र मंथन से निकला कालकूट विषपान एवं स्वर्ग से गंगावतरण आदि के उपरांत ब्रह्मा, विष्णु से मैत्री के साथ ही देवलोक, जम्बूद्वीप एवं विश्व के अन्य समस्त खण्डों एवं द्वीपों तथा देव-असुर आदि सभी को एक सूत्र में बांधने हेतु दक्षिण भारत की बजाय कैलाश को अपना आवास बनाया एवं दक्ष की पुत्री सती से विवाह किया और कालांतर में देवाधिदेव कहलाये अतः निश्चय ही देव या सुर व असुर एक ही पिता की संतानें हैं, राजनैतिक द्वेष के कारण ही प्रागैतिहासिक युग में भी हमें आपस में बांटा व लड़ाया गया और आज भी अपनी रोटी सेंकने वालों का यही मंतव्य है | हमें बांटने वाली शक्तियों से सावधान रहकर सम्मिलित रूप से देश व राष्ट्र के विकास व उन्नति में योगदान करना

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...