मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021

चावल एकादशी व्रत में निषेध है क्यों


 एकादशी में चावल वजिर्त क्यों?
वर्ष की चौबीसों एकादशियों में चावल न खाने की सलाह दी जाती है। ऐसा माना गया है कि इस दिन चावल खाने से प्राणी रेंगने वाले जीव की योनि में जन्म पाता है, किन्तु द्वादशी को चावल खाने से इस योनि से मुक्ति भी मिल जाती है। एकादशी के विषय में शास्त्र कहते हैं, ‘न विवेकसमो बन्धुर्नैकादश्या: परं व्रतं’ यानी विवेक के सामान कोई बंधु नहीं है और एकादशी से बढ़ कर कोई व्रत नहीं है।j
पांच ज्ञान इन्द्रियां, पांच कर्म इन्द्रियां और एक मन, इन ग्यारहों को जो साध ले, वह प्राणी एकादशी के समान पवित्र और दिव्य हो जाता है। एकादशी जगतगुरु विष्णुस्वरुप है, जहां चावल का संबंध जल से है, वहीं जल का संबंध चंद्रमा से है। पांचों ज्ञान इन्द्रियां और पांचों कर्म इन्द्रियों पर मन का ही अधिकार है।
मन ही जीवात्मा का चित्त स्थिर-अस्थिर करता है। मन और श्वेत रंग के स्वामी भी चंद्रमा ही हैं, जो स्वयं जल, रस और भावना के कारक हैं, इसीलिए जलतत्त्व राशि के जातक भावना प्रधान होते हैं, जो अक्सर धोखा खाते हैं।
एकादशी के दिन शरीर में जल की मात्र जितनी कम रहेगी, व्रत पूर्ण करने में उतनी ही अधिक सात्विकता रहेगी। महाभारत काल में वेदों का विस्तार करने वाले भगवान व्यास ने पांडव पुत्र भीम को इसीलिए निर्जला एकादशी (वगैर जल पिए हुए) करने का सुझाव दिया था।
आदिकाल में देवर्षि नारद ने एक हजार वर्ष तक एकादशी का निर्जल व्रत करके नारायण भक्ति प्राप्त की थी। वैष्णव के लिए यह सर्वश्रेष्ठ व्रत है।

चंद्रमा मन को अधिक चलायमान न कर पाएं, इसीलिए व्रती इस दिन चावल खाने से परहेज करते हैं। एक और पौराणिक कथा है कि माता शक्ति के क्रोध से भागते-भागते भयभीत महर्षि मेधा ने अपने योग बल से शरीर छोड़ दिया और उनकी मेधा पृथ्वी में समा गई।

वही मेधा जौ और चावल के रूप में उत्पन्न हुईं। ऐसा माना गया है कि यह घटना एकादशी को घटी थी। यह जौ और चावल महर्षि की ही मेधा शक्ति है, जो जीव हैं। इस दिन चावल खाना महर्षि मेधा के शरीर के छोटे-छोटे मांस के टुकड़े खाने जैसा माना गया है, इसीलिए इस दिन से जौ और चावल को जीवधारी माना गया है।
आज भी जौ और चावल को उत्पन्न होने के लिए मिट्टी की भी जरूत नहीं पड़ती। केवल जल का छींटा मारने से ही ये अंकुरित हो जाते हैं। इनको जीव रूप मानते हुए एकादशी को भोजन के रूप में ग्रहण करने से परहेज किया गया है, ताकि सात्विक रूप से विष्णुस्वरुप एकादशी का व्रत संपन्न हो सके।


शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2021

आज की धनदायी विद्या संतानको आर्थिक सक्षमता तो दे रही है पर संस्कार नहीं


संतान को कैसे उत्कृष्ट बनायें **
*-बीज का विशाल वृक्ष होना,कलभ (हाथी का बच्चा) का महागजराज होना,वत्स का महोक्ष( ककुद युक्त सांढ) होना वामन से विराट होने की प्रक्रिया का लघु निदर्शन है।विराटता चैतन्य पुरुष या संचारिणी प्रकृतिकी बढ़ने वाली प्रवृत्ति है।प्रतिभा चाहे जितनी भी हो उसे अनुभव के संग विराटता मिलती है।
*- गर्भ संस्कार के अतिरिक्त भी संतान को श्रेष्ठ बनाने की अनेक प्रक्रियायें होती हैं।इनमें माता-पिता द्वारा दिये जाने वाले संस्कार,शिक्षक-प्रोफेसर द्वारा दिये जाने वाले
संस्कार तथा वातावरण से उत्पन्न होने वाले संस्कार का महत्त्व बहुत अहं होता है।मनुस्मृति में माता को प्रथम गुरु का स्थान दिया गया है।जागरूक पिता भी संस्कार गढ़ता है।आजकल नब्बेप्रतिशत माता-पिता निजसन्तानको उस विद्या को पढ़ाना ही अपना उत्तरदायित्व मानते हैं जिससे अधिक से अधिक धन घर में आ सके।आज की धनदायी विद्या संतानको आर्थिक सक्षमता तो दे रही है पर संस्कार नहीं।संस्कारसे हमारासीधाअर्थहै पारिवारिक,सामाजिक, राष्ट्रीय तथा धर्म-संस्कृति का बोध होना। इस मामले में शिक्षापद्धति ईसाईयतके निकट है। सनातनबोध या भारत की परम्परा के निकट नहीं है।अतःआज यदि श्रेष्ठ डॉक्टर, इंजीनियर, वकील,सी ए , पुलिस अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी संस्कारित दिख रहा हैतो समझ लीजिए उसके
ऊपर परिवार या गुरु का व्यापक प्रभाव है। शिक्षाअवधि का वातावरण तो आज मांस, मदिरा, ड्रग और निशाचरी जीवन पद्धति का हो गया है।
*- इस विषय पर चिंतन करते हुए मैंने २०१२ में हिन्दू जीवन पद्धति का छात्र संस्करण निकाला था पर उसे अंग्रेजी में अनुवादित नहीं करा सका।तैत्तिरीय उपनिषद की शिक्षा वल्ली का व्यापक व्याख्यान भारतके नवयुवकों
में युगबोध के साथ अभिनव संस्कार जागृत कर सकता है।माता पिता को देश में मरने के लिए छोड़ कर विदेश में बसने वाली संतान को पढा कर क्या लाभ जहां न आत्म लाभ हो न राष्ट्र लाभ हो और धर्म लाभ की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती।अतः संतान को उत्कृष्ट बनाने केलिए हमें पारिवारिकस्तर परही बाल्यकालसे सन्तान को गढ़ना
पड़ेगा।
*- १ सत्यं वद ,१ धर्मम् चर ,३ मा अनृतं वद, ४ प्रियं वद,५ अप्रियं सत्यं मा वद,६ मातृ देवो भव, ७ पितृ देवो भव,८ आचार्य देवो भव, ९ अतिथि देवो भव,१० जयैषी भव,११ आस्तिक्यं भज १२ अहिंसको भव १३ धूर्तान् मा परिष्वज१४ परुषवाक्यं मा वद,१५दृढव्रत भव,१६ योगे रमष्व १७ सर्वथा मा विश्वसेत् १८ आत्मरक्षा परायणो भव आदि का उपदेश बच्चों को बचपन से ही देना चाहिए।यदि शिशु बचपन से ही बड़े वृद्धों का चरण स्पर्श करेगा तब उसे माता पिता को प्रणाम करनेमें लज्जा की थोड़ी भी अनुभूति नहीं होगी।यदि कोई मैकाले का शिष्य नमस्ते, प्रणाम कहने पर हंसे, श्रीमान, महोदय ,महोदया कहने पर मुंह बिदकाये तो कहना चाहिए कि ये सर और मैडम क्या है? यदि प्रोफेसर कहे कि चरण स्पर्श करना दकियानूसी हैतो उसे उत्तर मिलना चाहिये कि गुड मॉर्निंग फादर ,गुड मॉर्निंग सिस्टर कहना तो महा मूर्खता है।
घर से जो प्रशिक्षण शुरू होगा वही मृत्युपर्यन्त अभ्यास में बना रहता है। एक परिवार के भीतर कितने प्रकार के सम्बन्ध होते हैं और उनका क्या महत्त्वहै ये बच्चोंको शुरू से बतलाना चाहिये।भाई बहन के सम्बन्ध का क्या महत्त्व है?चाचा चाची क्यों महत्त्वपूर्ण है?सहोदर का क्या महत्त्व है , मामा- मामी ,मौसा-मौसी, फूफा-फूफी का जीवन में क्या भूमिका होती है यह बचपन से बच्चे को मालूम होना चाहिए। माता या घर की ज्येष्ठ महिलाओं द्वारा लड़कियों को वे सभी प्रशिक्षण देने चाहिए जो उसकी रक्षा और चरित्र के लिए अनिवार्य हो।
*- सन्तान को बचपन से ही कोई न कोई कवच पाठ अवश्य याद करादेना चाहिये।उन्हें प्रतिदिन मुह हाथ पैर धोने का अभ्यास कराना चाहिए।स्नान करने का पवित्र कर्म बच्चों को अभ्यास में लाने हेतु प्रेरित करना चाहिए।
व्यंग्य कसने,दूसरे पर हसने की प्रबृत्ति को आरम्भ में ही दबा देना चाहिए। उन्हें व्यायाम करने की आदत डलवानी चाहिए जिससे वे कमजोर न हों।सत्य, ब्रह्मचर्य, व्यायाम, विद्या,देश भक्ति और आत्मत्याग का महत्त्व बच्चों को शुरू से ही अवगत कराना चाहिए।प्राणायाम की आदत डलवाने हेतु बच्चों को प्रेरित करना चाहिए।साथ ही जिस दिशा में बच्चा जाना चाहता है उस क्षेत्र की श्रेष्ठता का स्मरण उसे कराना चाहिए।
*- यदि प्रत्येक माता पिता ने अपनी संतान को श्रेष्ठ बनाने हेतु यत्न नहीं किया तो समझिए व्यक्ति,परिवार, देश,धर्म,संस्कृति और स्वयं उस बच्चे का भी भारी अपकार होगा ही।व्यक्ति व्यक्ति में गुणों के आधान से ही राष्ट्र चमकता है।अतः शास्त्रों में व्यक्तित्व निर्माण के जितने भी आचार, शील और व्यवहार बतलाये गए हैं उन्हें एकत्रित कर लोक में लाना चाहिए। लड़के लड़कियों का परिष्कृत नाम रखने का दायित्व माता पिता का होता है और हजारों की संख्या में श्रेष्ठ नामों की सूची तैयार करने का दायित्व शास्त्रज्ञों का होता है।
एक श्रेष्ठ नागरिक, श्रेष्ठ राष्ट्र की धरोहर होता है जिसे माता पिता या गुरु तैयार करता है। इस तैयारी के षोडश चक्रों को वाल्मीकि रामायण और रघुवंशम में बतलाया गया है।
*** इहा प्रात उठी कर रघुनाथा ।
गुरु पितु मात नवावहीँ माथा।।***
***
" कौशल्या सुप्रजा राम ! प्रातः सन्ध्या प्रवर्तते "
का उद्घोष बच्चे को राम बनने की प्रेरणा देता है। हमें यह तय तो करना ही होगा कि क्या हम अपनी भावी पीढ़ी को
सनातनव्रती बनाना चाहते हैंया पर संस्कृतिजीवी मनुष्य?



बुधवार, 10 फ़रवरी 2021

day या वार की शुरुआत कब से



 

 १. इतिहास-प्रायः यह कहा जाता है कि भारत में वार का प्रचलन नहीं था, यह सुमेरिया से आया था। ६० वर्ष के चक्र को भी कहते हैं कि यह सुमेरिया से आया था। अभी तक सुमेरिया की कोई ऐसी पुस्तक नहीं मिली है जिसमें वार प्रवृत्ति या ६० वर्ष के चक्र का वर्णन हो। यदि कहें कि विष्णु धर्मोत्तर पुराण में ६० वर्ष के चक्र का विस्तृत वर्णन है, तो उसका उत्तर मिलता है कि यह १२०० ई के बाद की रचना है। भारत के अधिकांश बुद्धिजीवियों का विश्वास है कि दिल्ली पर मुस्लिम अधिकार होने के बाद ही भारत में पुराण लिखे गये। आर्यभट का समय खिसका कर कहा गया कि उन्होंने ग्रीस के हिप्पार्कस की ज्या सारणी की नकल की। एक बार डेविड पिंगरी से मैंने पूछा भी था कि हिप्पार्कस की ज्या सारणा कहां है तो उन्होंने कहा कि यह नहीं है। उनको कहा कि अपने मत के समर्थन में कम से कम अब हिप्पार्कस के नाम पर ग्रीक में ज्या सारणी बना दें। उनहोंने कहा किग्रीक नहीं आती है। आर्यभट ने किस विद्यालय में और क्यों ग्रीक पढ़ा था? ग्रीक में अंक की दशमलव पद्धति नहीं थी, अतः उनकी संख्या पद्धति में कोई गणित सारणी नहीं बन सकती है। इस कारण वहां गणना सम्बन्धी कोई पुस्तक नहीं है।
कहा जाता है कि रामायण, महाभारत में उल्लेख नहीं है अतः भारत में वार का उल्लेख नहीं था। भारत विरुद्ध तर्कों के अनुसार यदि विश्व इतिहास की समीक्षा हो तो अभी तक विश्व में कहीं भी वार प्रवृत्ति आरम्भ नहीं हुई है। अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति ने २० जनवरी को शपथ ली। वह कौन सा वार था या वार के अनुसार इस समय का निर्णय हुआ था? भारत १५अगस्त १९४७ को स्वाधीन हुआ? उस दिन कौन सा वार था तथा यह किस पुस्तक में लिखा है?
वार के प्रयोग कहां तथा क्यों है, इसकी समीक्षा की जा रही है।
२. वैदिक प्रयोग-वेद में वार तथा वासर दोनों शब्दों का प्रयोग है।
वासर का स्पष्ट अर्थ दिन है जो सूर्य के उदय से आरम्भ होता है-
आद् इत् प्रत्नस्य रेतसः ज्योतिष्पश्यन्ति वासरम्। परो यदिध्यते दिवा॥
(ऋक्. ८/६/३०, सामवेद १/२०, काण्व सं. २/१४, ऐतरेय आरण्यक, ३/२/४८, छान्दोग्य उपनिषद्, ३/१७/७)
सोम राजन् प्र ण आयूंषि तारीः। अहानीव सूर्यो वासराणि। (ऋक्, ८/४८/७, निरुक्त,४/७)
वार या वाः के अन्य अर्थ भी हैं। वाः या वार् का अर्थ जल है जो सबको अपने में रख लेता है (अवाप्नोति, गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, १/१/२-तद्यदब्रवीदाभिर्वा अहमिदं सर्वमाप्स्यामि यदिदं किञ्चेति तस्मादापो ऽभवंस्तदपामप्त्वमाप्नोति)। कुछ स्थलों पर इसका अर्थ दिन क्रम भी हो सकता है, जो बार-बार आता है।
अश्व्यो वारो अभवस्तदिन्द्र सृके यत्त्वा प्रत्यहन् देव एक।
अजयो गा अजयः शूर स्सोममवासृजः सर्तवे सप्त सिन्धून्॥ (ऋक्, १/३२/१२)
यहां प्रति अहः (दिन) में सूर्य देव (देव = जो प्रकाशित करे) के उदय से वार का निर्देश है।
विश्वस्मा इदिषुध्यते देवत्रा हव्यमोहिषे। विश्वस्मा इत् सुकृते वारमृण्वत्यग्निर्द्वारा व्यृण्वति॥ (ऋक्, १/१२८/६)
यहां एक वार के समाप्त होने पर अन्य वार के उत्पन्न होने का निर्देश है। विश्वस्मै सुकृते वारं ऋण्वति, द्वारा वि-ऋण्वति। विश्वस्मै = सबके लिए। सुकृत -विश्व सृष्टि, जिसमें, कर्ता, कर्म, फल आदि सभी एक ही ब्रह्म हैं( तैत्तिरीय उपनिषद्, २/७)
वार ७ होने का आधार है-७ प्रकार के चक्र।
स॒प्तास्या॑सन्परि॒धय॒स्त्रिः स॒प्त स॒मिधः॑ कृ॒ताः। दे॒वा यद्य॒ज्ञन्त॑न्वा॒नाऽअब॑ध्न॒न्पुरु॑षम्प॒शुम्॥१५॥
(पुरुष सूक्त, वाज. सं. ३१/१५)
यहां यज्ञ के लिए ४ प्रकार के सप्त हैं-त्रि-सप्त समिधा, सप्त परिधि। समिधा का अर्थ यज्ञ की सामग्री। परिधि के कई अर्थ हैं-७ लोक, जो परिधि के भीतर सीमित हैं, काल चक्र में ७ प्रकार के युग, या उसकी प्रतिमा रूप ७ वार के चक्र।
सप्त युञ्जन्ति रथमेक चक्रो एको अश्वो वहति सप्तनामा-(अस्य वामीय सूक्त, ऋक्, १/१६४/२)
काल प्रवाह को ही अश्व कहा गया है-
कालो अश्वो वहति सप्तरश्मिः सहस्राक्षो अजरो भूरिरेताः। तमारोहन्ति कवयो विपश्चितस्तस्य चक्रा भुवनानि विश्वा॥१॥
सप्त चक्रान् वहति काल एष सप्तास्य नाभीरमृतं न्वक्षः। सा इमा विश्वा भुवनान्यञ्जत् कालः स ईषते प्रथमो नु देवः॥२॥
(अथर्व, शौनक, १९/५३)
अश्व का अर्थ है गति का साधन। गति या परिवर्तन से काल का ज्ञान तथा उसकी माप होती है।
रूपान्तरं तद् द्विज कालसंज्ञम् (विष्णु पुराण, २/२/२४)
गति या क्रिया से यज्ञ होता है। यज्ञ से निर्मित पदार्थ ऋक् या मूर्ति रूप है। काल अनुसार निर्माण क्रिया यज्ञ है। पिण्ड या दृश्य जात् के अनुसार ऋक् प्रथम वेद है। क्रिया या यज्ञ के अनुसार यजुर्वेद मुख्य है। ज्ञान के अनुसार साम मुख्य है, हम तक किसी वस्तु का साम या प्रभाव पहुंचने पर उसका ज्ञान होता है (वेदानां सामवेदोऽस्मि-गीता, १०/२२)।
कालो ह भूत भव्यं च पुत्रो अजनयत् पुरा। कालादृचः समभवन् यजुः कालादजायत॥३॥
कालो यज्ञं समैरद् देवेभ्यो भागमक्षितम्। काले गन्धर्वाप्सरसः काले लोकाः प्रतिष्ठिताः॥४॥
इमं च लोकं परमं च लोकं पुण्यांश्च लोकान् विधितिश्च पुण्याः।
सर्वांल्लोकानभिजित्य ब्रह्मणा कालः स ईयते परमो नु देवः॥५॥
(अथर्व, शौनक, १९/५४)
काल गणना का यह रूप ब्रह्मा द्वारा निर्धारित हुआ जब अभिजित् नक्षत्र की दिशा में ध्रुव था (३८,००० ईपू)। उस समय अभिजित् से वर्ष आरम्भ होता था। बाद में कार्त्तिकेय के समय से अभिजित् का पतन होने पर धनिष्ठा से वर्ष तथा वर्षा का आरम्भ हुआ (महाभारत, वन पर्व, २३०/८-१०)
३. वेदाङ्ग ज्योतिष- इस नाम के ३ ग्रन्थ हैं-ऋक्, याजुष, अथर्वण। ऋक् तथा यजुर्वेद में लिखा है कि वेद यज्ञ के लिए हैं, यज्ञ काल के अनुसार करते हैं। अतः काल निर्धारण के लिए ज्योतिष है।
वेदा हि यज्ञार्थमभिप्रवृत्ताः, कालानुपूर्व्या विहिताश्च यज्ञाः।
तस्मादिदं कालविधानशास्त्रं, यो ज्योतिषं वेद स वेद यज्ञान्॥
(ऋक् ज्योतिष, ३६, याजुष ज्योतिष, ३)
ऋक् ज्योतिष में काल की गणना है जिसके अनुसार १९ वर्ष का युग होता है, इसमें ५ वर्ष संवत्सर हैं, अन्य १४ वर्ष अन्य ४ प्रकार के हैं-परिवत्सर, इदावत्सर, अनुवत्सर, इद्वत्सर। पर कौन सा यज्ञ कब किया जाय यह कहीं नहीं लिखा है। याजुष ज्योतिष में यज्ञ काल के संक्षिप्त उल्लेख हैं-श्लोक ३२-३४ में नक्षत्र देवताओं की सूची दे कर श्लोक ३५ में कहा है कि इन देवों के अनुसार यज्ञ होना चाहिए। नक्षत्र के अनुसार नाम रखने का भी विधान है, पर किस नक्षत्र या उसके पाद के अनुसार क्या नाम होगा, वह (अवकहडा चक्र) नहीं है। श्लोक ३६ में उग्र तथा क्रूर नक्षत्रों के नाम हैं। श्लोक ३८ में मुहूर्त्त मान, तथा ४२ में उपयुक्त समय अर्थ में मुहूर्त्त उल्लेख है।
आथर्वण ज्योतिष में विभिन्न कामों के लिए शुभ-अशुभ मुहूर्त्त तथा पञ्चाङ्ग के ५ अंग दिये हैं-तिथि, वार, नक्षत्र, योग तथा करण। इन सभी के अनुसार मुहूर्त्त के शुभ होने का निर्णय दिया है। श्लोक ९३ में वार का वर्तमान क्रम दिया गया है। उसके बाद किस वार में कौन सा काम उपयुक्त है, यह कहा है। तीनों वेदाङ्ग ज्योतिष मिल कर यज्ञ समय के उद्देश्य से वेदाङ्ग हैं
किन्तु ज्योतिष को वेद का नेत्र कहा है, इस अर्थ में वेद का ज्ञान इनसे नहीं हो रहा है। वेद के ७ लोकों की माप पुराणों के भुवन कोष में है। पौराणिक मापों का मान जैन ज्योतिष में है, तथा इन नामों की परिभाषा यजुर्वेद में है। सूर्य सिद्धान्त में पृथ्वी तथा सौरमण्डल का आकार, गति माप तथा युगमान दिया है। ब्रह्माण्ड का आकार दिया है। इसका सृष्टि सिद्धान्त पुरुष सूक्त, सांख्य तथा पाञ्चरात्र दर्शन का समन्वय है। यजुर्वेद वाज. संहिता (१५/१५-१९, १७/५८, १८/४०) तथा कूर्म पुराण (४१/२-८), मत्स्य पुराण (१२८/२९-३३), ब्रह्माण्ड पुराण, १/२/२४-६५-७३) आदि में सूर्य रश्मियों के माध्यम या उसकी गति से मनुष्य पर प्रभाव तथा ग्रह नक्षत्रों द्वारा उसमें परिवर्तन का वर्णन है। यह मनुष्य को विश्व की प्रतिमा रूप में वर्णन करते हैं, जो वेद का आधार है। किन्तु इसकी व्याख्या सम्बन्धी वेदाङ्ग ज्योतिष ग्रन्थ नहीं है। यह होरा का विषय है जिस पर पराशर तथा वराहमिहिर की प्राचीन पुस्तकें हैं। ये सभी वेदाङ्ग हैं।
४. वार की आवश्यकता-ऐतिहासिक कालक्रम या घटना का वर्णन करने के लिए वार की आवश्यकता नहीं है। अतः इतिहास ग्रन्थों में इसका प्रयोग नहीं है।
सूर्य सिद्धान्त में किसी निर्दिष्ट काल से दिन समूह (अहर्गण) की गणना में वार की आवश्यकता है। सौर वर्ष में क्रमागत दिनों की गणना होती है, उसमें भी ऋतुशेष निकालने के लिए दिनों का जोड़ घटाव करना पड़ता है। चाद्र मास का समन्वय करने के लिए लम्बी गणना है। चान्द्र तिथि, मास, वर्ष का क्रमागत दिनों, सौर मास या वर्ष से स्पष्ट सम्बन्ध नहीं है तथा वह बदलता रहता है। उसकी शुद्धि के लिए देखा जाता है कि दिन संख्या के अनुसारआज जो वार आ रहा है, वह ठीक है या नहीं। अशुद्धि होने पर १-२ दिन कम या अधिक करते हैं। इसे वार शुद्धि कहते हैं।
आधुनिक ज्योतिष में भी प्राचीन गणनाके लिए एक काल्पनिक आधार लिया गया है-१-१-४७१३ ईपू, जिस दिन शुक्रवार था। सूर्य सिद्धान्त के अनुसार सृष्ट्यादि अहर्गण के लिए रविवार से वार आरम्भ करते हैं। सम्भवतः पूरे विश्व में यह स्वीकृत था अतः रविवार की छुट्टी का प्रचलन हुआ। बाइबिल के आरम्भ में सृष्टि का सप्तम दिन (मन्वन्तर) चल रहा है। कलि आरम्भ से गणना के लिए प्रथम वार बुधवार मानते हैं।
सूर्य सिद्धान्त के पूर्व ब्रह्मा द्वारा अभिजित् से या १५८०० ईपू में कार्त्तिकेय द्वारा धनिष्ठा से वर्ष आरम्भ होने पर वर्ष का प्रथम मास माघ होता था। यह भी चान्द्र मास था जिसमें पूर्णिमा के चान्द्र नक्षत्र के अनुसार मास नाम होता था। अतः उस समय की काल गणना बिना वार शुद्धि के सम्भव नहीं थी।
वार का प्रयोग मुहूर्त्त निर्णय या साप्ताहिक दिनचर्या, शिक्षा का कार्यक्रम (रुटीन) आदि के लिए है।
५. वार क्रम-सूर्य सिद्धान्त, भूगोल अध्याय (७८), आर्यभटीय के कालक्रिया पाद (१६) में वार क्रम का आधार दिया है। मन्द गति से क्रमशः तीव्र गति के ग्रह हैं-शनि, बृहस्पति, मंगल, सूर्य (पृथ्वी), शुक्र, बुध, चन्द्र। प्रतिदिन पूर्व क्षितिज पर १२ राशियों का क्रमागत उदय होता है जिसे उस स्थान का लग्न कहते हैं। प्रत्येक राशि का आधा भाग होरा (अहो-रात्र का के मध्य अक्षर) है। अतः प्रतिदिन २४ होरा का उदय होता है। होरा से अंग्रेजी में आवर (hour) हुआ है। किसी वार की प्रथम होरा उसी ग्रह की होती है। उसके बाद बढ़ती गति के क्रम से अन्य ग्रहों की होरा होगी। यथा शनि वार को प्रथम होरा शनि ग्रह की होगी। उसके बाद २१ होरा तक ७ ग्रहों का ३ चक्र पूरा हो जायेगा। दिन रूपी समिधा भी त्रि-सप्त है। उसके बाद उस दिन की ३ होरा तथा अगले दिन की प्रथम होरा आयेगी। इनकी गिनती पुनः शनि से होगी-शनि, बृहस्पति, मंगल, सूर्य। अतः अगला दिन रविवार होगा।
सूर्य सिद्धान्त का वर्तमान रूप मयासुर द्वारा संशोधित है (९२२३ ईपू) में। इसमें पृथ्वी अक्ष का झुकाव, दिन-वर्ष का अनुपात आदि उसी काल के हैं। अतः कम से कम ११,००० वर्ष से वार प्रवृत्ति चल रही है। साभार अरुण उपाध्याय

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...