प्रकृति के रहस्यों को जानने के लिए, अनादि काल से अपनी जिज्ञासा को पूर्ण करने के लिए मनुष्य दुस्साहस करता आया है और करता आया है अपने जीवन का बलिदान भी। विज्ञान के क्षेत्र में भी ऐसे बलिदानियों की कमी नहीं रही है।
'#पोटेशियम #सायनाइड' का नाम मेडिकल साइन्स में कौन नहीं जानता ? यह अत्यंत तीव्र महाविष है जिसका असर प्राणी के शरीर पर इतनी तेजी से पड़ता है कि वह एक क्षण से भी कम समय में मर जाता है। इस महाविष का सुई की नोंक पर लगा सूक्ष्मतम कण ही काफी है। उस कण को जीभ पर रखने मात्र से ही प्राणी निर्जीव हो जाता है। यही कारण है कि आज तक कोई भी व्यक्ति इस महाविष का स्वाद नहीं बता पाया। इसका स्वाद बताने के लिए समय- समय पर तीन वैज्ञानिकों ने पूरी तैयारी करके अपने प्राणों की बलि चढ़ा दी लेकिन वे एक शब्द तो क्या एक अक्षर से अधिक बतला पाने में सफल नहीं हुए।
लेकिन इस सत्य को भारत के एक महायोगी '#नरसिंह #स्वामी' ने झुटला दिया और अनेक विषों और घातक प
कौन था वह महायोगी ? क्या उसे 'अमरत्व' की दुर्लभ सिद्धि प्राप्त थी ? क्या वह कालंजयी था ?
हाँ, इसमें संदेह नहीं, उस परम साधक को निश्चय ही अमरत्व की दुर्लभ सिद्धि प्राप्त थी। उस महायोगी की खोज की थी उस समय के कलकत्ता विश्वविद्यालय के विज्ञान विभाग के रीडर डा. #नियोगी ने।
कलकत्ता के पास एक गांव था-'#मधुपुर'। अब तो वह एक बड़ा टाउन बन गया है। डा. नियोगी की वहां रिश्तेदारी थी। एक बार वह किसी काम से उसी रिश्तेदारी में गए हुए थे। उस समय मधुपुर गांव में स्वामीजी की तपस्या और सिद्धियों की धूम मची हुई थी। गांव के लोग उन्हें संत, महात्मा और योगी कहते थे और बहुत आदर करते थे उनका। सभी लोग उनकी सिद्धियों और योगबल से चमत्कृत थे।
कहते हैं नरसिंह स्वामी ने पूरे तीस वर्षों तक हिमालय की दुर्गम कंदराओं में रह कर
'#कुण्डलिनी #योग' की कठिन साधना कर सिद्धि प्राप्त की थी। फिर लोक- कल्याण की भावना के चलते उस तपोभूमि से निकल कर संसार के शोर-गुल भरे क्षेत्र में आ गए वह। मधुपुर में कालीदेवी का एक मंदिर है, उसीके पास एक कुटिया बना कर रहने लगे। कालीमंदिर के सामने कदम्ब का एक पेड़ था उसी के नीचे बैठकर स्वामीजी दीन-दुखी, असहाय-अपाहिज लोगों की सेवा करने लगे। शीघ्र ही उनकी ख्याति दूर-दूर तक फ़ैल गई। डा. नियोगी ने भी स्वामीजी के चमत्कारों की कथा सुनी। उनकी जिज्ञासा जाग उठी और एक दिन वह स्वामीजी की कुटिया पर पहुँच गए। उन्होंने अपना परिचय दिया और स्वामीजी ने उन्हें अपने पास बैठा कर उनसे आत्मीयता से बात की। लेकिन कुछ ही समय बाद वह वार्तालाप एक सिद्ध योगी और कर्मठ विज्ञान-वेत्ता के बीच शास्त्रार्थ के रूप में बदल गया। तर्क-वितर्क तेज हो गया। थोड़ी देर बाद डा. नियोगी ने आवेश में आकर उन्हें चुनौती दे डाली-- कोई व्यक्ति अंगारे नहीं खा सकता, तेजाब नहीं पी सकता, जहर नहीं चाट सकता।
यह सुनकर स्वामीजी मुस्कराये फिर सहज स्वर में बोले-- ये तीनों काम मैं ही तुम्हें करके दिखा सकता हूँ। लेकिन डा. नियोगी प्रत्यक्ष प्रमाण पाये बिना उस महान योगी की क्षमता पर विश्वास करने के लिए तैयार नहीं थे। उनको घोर आश्चर्य हुआ उस समय जब स्वामीजी तत्काल तैयार हो गए उन तीनों असंभव कार्य करने के लिए।
डा. नियोगी ने तुरंत कोयले के दहकते अंगारे, शुद्ध तेजाब और तीक्ष्ण विष की व्यवस्था की और उन्हें स्वामीजी के सामने प्रस्तुत कर दिया। सभी जानते हैं कि कोई भी प्राणी इन प्राण घातक पदार्थों का सेवन कर जीवित नहीं रह सकता। इसलिए उन्होंने कुछ उपहास के भाव के साथ कहा-- लीजिये स्वामीजी, अब आप अपनी बातों को सच साबित कर दिखाएँ, अन्यथा योगी का यह बाना उतार कर फेंक दें। डा. नियोगी की ये कड़वी बातें सुनकर भी स्वामीजी मुस्कराते रहे। इस बीच डा. नियोगी की इस चुनौति की चर्चा चारों ओर फ़ैल चुकी थी। देखते-ही-देखते मधुपुर की जनता उस अद्भुत चमत्कार को देखने काली मंदिर की ओर उमड़ पड़ी।
क्या स्वामीजी यह चमत्कार कर पाने में समर्थ हो पाये या उन्हें अपने योगी के बाना को छोड़ कर वहां से जाना पड़ा ?
नरसिंह स्वामी ने हज़ारों लोगों की आश्चर्यचकित आँखों के सामने वह तीव्र विष उठा कर पी लिया। फिर तेजाब उठा कर अपनी हथेली पर उड़ेल लिया और मुस्कराते हुए उसे इस प्रकार चाटने लगे जैसे शहद चाट रहे हों। अंत में उन्होंने दहकते अंगारों को उठा-उठा कर इस तरह खाना शुरू किया मानो स्वादिष्ट रसगुल्ले खा रहे हों।
'#हठयोग' कुण्डलिनी साधना का एक महत्वपूर्ण अंग है। हठयोग के साधक का शरीर के सभी अंगों पर अधिकार होता है जिसके फलस्वरूप शरीर पर किसी पदार्थ का प्रभाव नहीं पड़ता, भले ही #पोटेशियम #सायनाइड ही क्यों न हो। हठयोग के इस चमत्कार को देख कर डा. नियोगी भी एकबारगी स्तब्ध रह गए। वह स्वामीजी के चरणों में गिर पड़े। स्वामीजी ने उन्हें उठा कर हृदय से लगा लिया। मधुपुर से जाते समय डा. नियोगी ने स्वामीजी से प्रार्थना की एक बार वह अपनी इस महान योगविद्या का प्रदर्शन कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रख्यात वैज्ञानिकों के सामने अवश्य करें। स्वामीजी ने डा. नियोगी के इस अनुरोध को सहजभाव से स्वीकार कर लिया।
विज्ञान जगत में तहलका मचा देने वाले विश्व के अभूतपूर्व प्रदर्शन का आयोजन शुरू होने वाला था। तारीख निश्चित हुई--16 जनवरी,1932। यह चमत्कृत कर देने वाला आयोजन और प्रदर्शन #सर #सी.#वी. #रमन की अध्यक्षता में किया जा रहा था जो उस समय भारत के ही नहीं, बल्कि विश्व के महानतम वैज्ञानिकों की श्रेणी में पहुँच चुके थे। उस विलक्षण प्रदर्शन के आयोजक थे डा. नियोगी के अतिरिक्त साइन्स फैकल्टी के डीन डा.भट्टाचार्य, केमिस्ट्री डिपार्टमेंट के हैड ऑफ़ द डिपार्टमेंट डा.सरकार। उस अवसर पर देश-विदेश के अनेक वैज्ञानिकों को भी आमंत्रित किया गया था। आयोजन के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त डा.सी.वी. रमन ने अध्यक्ष की हैसियत से इसकी सच्चाई परखने के लिए एक समिति का गठन किया था जिसमें पांच सदस्य थे--
1--ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी, इंग्लैंड के साइन्स विभागाध्यक्ष, 2--पेरिस यूनिवर्सिटी, फ़्रांस के साइन्स फैकल्टी के डीन, 3-- न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी, अमेरिका के साइन्स विभाग के रीडर, 4-- मद्रास विश्वविद्यालय के एक प्रोफ़ेसर और 5--कलकत्ता विश्वविद्यालय के डा. नियोगी। कहने की आवश्यकता नहीं, उस समय उस आयोजन की समूचे विश्व में धूम मच गई थी। उस प्रदर्शन को प्रत्यक्ष देखने के लिए विश्व के तमाम देशों से वैज्ञानिकों और जिज्ञासुओं के दल-के-दल भारत आने लगे।
निश्चित समय पर आयोजन आरम्भ हुआ। नरसिंह स्वामी प्रदर्शन हॉल में आ खड़े हुए। उनके चहरे पर वही सहज मुस्कान थी। सबसे पहले समिति की ओर से डॉक्टरों ने उनका गहन परिक्षण किया। हर प्रकार से जाँच कर तलाशी ली गई। यह निश्चित हो गया कि स्वामीजी ने किसी छल-प्रपंच का सहारा नहीं लिया है, न किसी प्रकार की ऐसी दवाई का सेवन किया है कि जो उन्हें सुरक्षा प्रदान करती हो। सब कुछ सामान्य पाया गया। कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला से भयंकर से भयंकर विष मंगा कर पहले ही रख लिए गए थे। इतना ही नहीं, विदेशों से आने वाले वैज्ञानिक भी अपने साथ भयंकरतम महाविष 'पोटेशियम सायनाइड' लेकर आये थे।
आयोजन के अध्यक्ष डा.सी.वी.रमन ने स्वामीजी के सामने एक दस्तावेज रखते हुए अनुरोध किया कि प्रदर्शन से पूर्व इस पर हस्ताक्षर कर दें। क़ानूनी कार्यवाही निश्चित रूप से महत्वपूर्ण थी। उस दस्तावेज में यह घोषणा थी--" स्वामीजी स्वेच्छा से यह प्रदर्शन कर रहे हैं। इस दौरान यदि उनकी मृत्यु हो जाती है तो समिति पर इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं होगी।"। हस्ताक्षर करने के बाद ही यह प्रदर्शन संभव था। स्वामीजी ने बिना सोचे-समझे उस दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिए।




