गुरुवार, 19 मार्च 2020

योगी ने साइनाइड जहर यानी मौत को चुनौती से वैज्ञानिक सीवी रमन भी हतप्रभ

  
 
प्रकृति के रहस्यों को जानने के लिए, अनादि काल से अपनी जिज्ञासा को पूर्ण करने के लिए मनुष्य दुस्साहस करता आया है और करता आया है अपने जीवन का बलिदान भी। विज्ञान के क्षेत्र में भी ऐसे बलिदानियों की कमी नहीं रही है।
'#पोटेशियम #सायनाइड' का नाम मेडिकल साइन्स में कौन नहीं जानता ? यह अत्यंत तीव्र महाविष है जिसका असर प्राणी के शरीर पर इतनी तेजी से पड़ता है कि वह एक क्षण से भी कम समय में मर जाता है। इस महाविष का सुई की नोंक पर लगा सूक्ष्मतम कण ही काफी है। उस कण को जीभ पर रखने मात्र से ही प्राणी निर्जीव हो जाता है। यही कारण है कि आज तक कोई भी व्यक्ति इस महाविष का स्वाद नहीं बता पाया। इसका स्वाद बताने के लिए समय- समय पर तीन वैज्ञानिकों ने पूरी तैयारी करके अपने प्राणों की बलि चढ़ा दी लेकिन वे एक शब्द तो क्या एक अक्षर से अधिक बतला पाने में सफल नहीं हुए।
लेकिन इस सत्य को भारत के एक महायोगी '#नरसिंह #स्वामी' ने झुटला दिया और अनेक विषों और घातक प
कौन था वह महायोगी ? क्या उसे 'अमरत्व' की दुर्लभ सिद्धि प्राप्त थी ? क्या वह कालंजयी था ?

हाँ, इसमें संदेह नहीं, उस परम साधक को निश्चय ही अमरत्व की दुर्लभ सिद्धि प्राप्त थी। उस महायोगी की खोज की थी उस समय के कलकत्ता विश्वविद्यालय के विज्ञान विभाग के रीडर डा. #नियोगी ने।
कलकत्ता के पास एक गांव था-'#मधुपुर'। अब तो वह एक बड़ा टाउन बन गया है। डा. नियोगी की वहां रिश्तेदारी थी। एक बार वह किसी काम से उसी रिश्तेदारी में गए हुए थे। उस समय मधुपुर गांव में स्वामीजी की तपस्या और सिद्धियों की धूम मची हुई थी। गांव के लोग उन्हें संत, महात्मा और योगी कहते थे और बहुत आदर करते थे उनका। सभी लोग उनकी सिद्धियों और योगबल से चमत्कृत थे।
कहते हैं नरसिंह स्वामी ने पूरे तीस वर्षों तक हिमालय की दुर्गम कंदराओं में रह कर
'#कुण्डलिनी #योग' की कठिन साधना कर सिद्धि प्राप्त की थी। फिर लोक- कल्याण की भावना के चलते उस तपोभूमि से निकल कर संसार के शोर-गुल भरे क्षेत्र में आ गए वह। मधुपुर में कालीदेवी का एक मंदिर है, उसीके पास एक कुटिया बना कर रहने लगे। कालीमंदिर के सामने कदम्ब का एक पेड़ था उसी के नीचे बैठकर स्वामीजी दीन-दुखी, असहाय-अपाहिज लोगों की सेवा करने लगे। शीघ्र ही उनकी ख्याति दूर-दूर तक फ़ैल गई। डा. नियोगी ने भी स्वामीजी के चमत्कारों की कथा सुनी। उनकी जिज्ञासा जाग उठी और एक दिन वह स्वामीजी की कुटिया पर पहुँच गए। उन्होंने अपना परिचय दिया और स्वामीजी ने उन्हें अपने पास बैठा कर उनसे आत्मीयता से बात की। लेकिन कुछ ही समय बाद वह वार्तालाप एक सिद्ध योगी और कर्मठ विज्ञान-वेत्ता के बीच शास्त्रार्थ के रूप में बदल गया। तर्क-वितर्क तेज हो गया। थोड़ी देर बाद डा. नियोगी ने आवेश में आकर उन्हें चुनौती दे डाली-- कोई व्यक्ति अंगारे नहीं खा सकता, तेजाब नहीं पी सकता, जहर नहीं चाट सकता।
यह सुनकर स्वामीजी मुस्कराये फिर सहज स्वर में बोले-- ये तीनों काम मैं ही तुम्हें करके दिखा सकता हूँ। लेकिन डा. नियोगी प्रत्यक्ष प्रमाण पाये बिना उस महान योगी की क्षमता पर विश्वास करने के लिए तैयार नहीं थे। उनको घोर आश्चर्य हुआ उस समय जब स्वामीजी तत्काल तैयार हो गए उन तीनों असंभव कार्य करने के लिए।
डा. नियोगी ने तुरंत कोयले के दहकते अंगारे, शुद्ध तेजाब और तीक्ष्ण विष की व्यवस्था की और उन्हें स्वामीजी के सामने प्रस्तुत कर दिया। सभी जानते हैं कि कोई भी प्राणी इन प्राण घातक पदार्थों का सेवन कर जीवित नहीं रह सकता। इसलिए उन्होंने कुछ उपहास के भाव के साथ कहा-- लीजिये स्वामीजी, अब आप अपनी बातों को सच साबित कर दिखाएँ, अन्यथा योगी का यह बाना उतार कर फेंक दें। डा. नियोगी की ये कड़वी बातें सुनकर भी स्वामीजी मुस्कराते रहे। इस बीच डा. नियोगी की इस चुनौति की चर्चा चारों ओर फ़ैल चुकी थी। देखते-ही-देखते मधुपुर की जनता उस अद्भुत चमत्कार को देखने काली मंदिर की ओर उमड़ पड़ी।
क्या स्वामीजी यह चमत्कार कर पाने में समर्थ हो पाये या उन्हें अपने योगी के बाना को छोड़ कर वहां से जाना पड़ा ?
नरसिंह स्वामी ने हज़ारों लोगों की आश्चर्यचकित आँखों के सामने वह तीव्र विष उठा कर पी लिया। फिर तेजाब उठा कर अपनी हथेली पर उड़ेल लिया और मुस्कराते हुए उसे इस प्रकार चाटने लगे जैसे शहद चाट रहे हों। अंत में उन्होंने दहकते अंगारों को उठा-उठा कर इस तरह खाना शुरू किया मानो स्वादिष्ट रसगुल्ले खा रहे हों।
'#हठयोग' कुण्डलिनी साधना का एक महत्वपूर्ण अंग है। हठयोग के साधक का शरीर के सभी अंगों पर अधिकार होता है जिसके फलस्वरूप शरीर पर किसी पदार्थ का प्रभाव नहीं पड़ता, भले ही #पोटेशियम #सायनाइड ही क्यों न हो। हठयोग के इस चमत्कार को देख कर डा. नियोगी भी एकबारगी स्तब्ध रह गए। वह स्वामीजी के चरणों में गिर पड़े। स्वामीजी ने उन्हें उठा कर हृदय से लगा लिया। मधुपुर से जाते समय डा. नियोगी ने स्वामीजी से प्रार्थना की एक बार वह अपनी इस महान योगविद्या का प्रदर्शन कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रख्यात वैज्ञानिकों के सामने अवश्य करें। स्वामीजी ने डा. नियोगी के इस अनुरोध को सहजभाव से स्वीकार कर लिया।
विज्ञान जगत में तहलका मचा देने वाले विश्व के अभूतपूर्व प्रदर्शन का आयोजन शुरू होने वाला था। तारीख निश्चित हुई--16 जनवरी,1932। यह चमत्कृत कर देने वाला आयोजन और प्रदर्शन #सर #सी.#वी. #रमन की अध्यक्षता में किया जा रहा था जो उस समय भारत के ही नहीं, बल्कि विश्व के महानतम वैज्ञानिकों की श्रेणी में पहुँच चुके थे। उस विलक्षण प्रदर्शन के आयोजक थे डा. नियोगी के अतिरिक्त साइन्स फैकल्टी के डीन डा.भट्टाचार्य, केमिस्ट्री डिपार्टमेंट के हैड ऑफ़ द डिपार्टमेंट डा.सरकार।  उस अवसर पर देश-विदेश के अनेक वैज्ञानिकों को भी आमंत्रित किया गया था। आयोजन के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त डा.सी.वी. रमन ने अध्यक्ष की हैसियत से इसकी सच्चाई परखने के लिए एक समिति का गठन किया था जिसमें पांच सदस्य थे--
1--ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी, इंग्लैंड के साइन्स विभागाध्यक्ष, 2--पेरिस यूनिवर्सिटी, फ़्रांस के साइन्स फैकल्टी के डीन, 3-- न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी, अमेरिका के साइन्स विभाग के रीडर, 4-- मद्रास विश्वविद्यालय के एक प्रोफ़ेसर और 5--कलकत्ता विश्वविद्यालय के डा. नियोगी। कहने की आवश्यकता नहीं, उस समय उस आयोजन की समूचे विश्व में धूम मच गई थी। उस प्रदर्शन को प्रत्यक्ष देखने के लिए विश्व के तमाम देशों से वैज्ञानिकों और जिज्ञासुओं के दल-के-दल भारत आने लगे।
निश्चित समय पर आयोजन आरम्भ हुआ। नरसिंह स्वामी प्रदर्शन हॉल में आ खड़े हुए। उनके चहरे पर वही सहज मुस्कान थी। सबसे पहले समिति की ओर से डॉक्टरों ने उनका गहन परिक्षण किया। हर प्रकार से जाँच कर तलाशी ली गई। यह निश्चित हो गया कि स्वामीजी ने किसी छल-प्रपंच का सहारा नहीं लिया है, न किसी प्रकार की ऐसी दवाई का सेवन किया है कि जो उन्हें सुरक्षा प्रदान करती हो। सब कुछ सामान्य पाया गया। कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला से भयंकर से भयंकर विष मंगा कर पहले ही रख लिए गए थे। इतना ही नहीं, विदेशों से आने वाले वैज्ञानिक भी अपने साथ भयंकरतम महाविष 'पोटेशियम सायनाइड' लेकर आये थे।
आयोजन के अध्यक्ष डा.सी.वी.रमन ने स्वामीजी के सामने एक दस्तावेज रखते हुए अनुरोध किया कि प्रदर्शन से पूर्व इस पर हस्ताक्षर कर दें। क़ानूनी कार्यवाही निश्चित रूप से महत्वपूर्ण थी। उस दस्तावेज में यह घोषणा थी--" स्वामीजी स्वेच्छा से यह प्रदर्शन कर रहे हैं। इस दौरान यदि उनकी मृत्यु हो जाती है तो समिति पर इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं होगी।"।       हस्ताक्षर करने के बाद ही यह प्रदर्शन संभव था। स्वामीजी ने बिना सोचे-समझे उस दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिए।
दार्थो के आलावा संसार का सबसे तीक्ष्ण विष 'पोटेशियम सायनाइड' को भी खाकर जीवित बने रहने का अद्भुत कारनामा करके सम्पूर्ण विश्व के वैज्ञानिकों में तहलका मचा दिया था।

मंगलवार, 10 मार्च 2020

बंद करो करोना का रोनाधोना,ऐसे मनाएं होली कुछ नहीं होना

    



* इस तरीके से बनाये अपने घर में होली का रंग और कोरोना से बचें.
*होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण त्यौहार है। होली भारत का अत्यंत प्राचीन पर्व है जो होली, होलिका या होलाका नाम से मनाया जाता है । वसंत की ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने के कारण इसे वसंतोत्सव भी कहा गया है।*
*यह वैदिक उत्सव है । लाखों वर्ष पहले भगवान रामजी हो गये । उनसे पहले उनके पिता, पितामह, पितामह के पितामह दिलीप राजा और उनके बाद रघु राजा... रघु राजा के राज्य में भी यह महोत्सव मनाया जाता था ।
*होली रंगों का त्यौहार है, हँसी-खुशी का त्यौहार है, लेकिन होली के भी अनेक रूप देखने को मिलते हैं। प्राकृतिक रंगों के स्थान पर रासायनिक रंगों का प्रचलन, ठंडाई की जगह नशेबाजी और लोक संगीत की जगह फ़िल्मी गानों का प्रचलन.... इस आधुनिक रूप से होली मनाने से बहुत नुकसान होता है ।*
*आपको हम रासायनिक रंगों से होने वाली हानियां और अपने घर में ही सस्ते में प्राकृतिक रंग किस प्रकार बना सकते हैं, उसके बारे में बताते है।*
*रासायनिक रंगों से होने वाली हानि...*
*1 - काले रंग में लेड ऑक्साइडत पड़ता है जो गुर्दे की बीमारी, दिमाग की कमजोरी करता है ।*
*2 - हरे रंग में कॉपर सल्फेट होता है जो आँखों में जलन, सूजन, अस्थायी अंधत्व लाता है ।*
*3 - सिल्वर रंग में एल्युमीनियम ब्रोमाइड होता है जो कैंसर का कारक होता है ।*
*4- नीले रंग में प्रूशियन ब्लू (कॉन्टैक्ट डर्मेटाइटिस) होता है जिससे भयंकर त्वचारोग होता है ।
*5 - लाल रंग में मरक्युरी सल्फाइड होता है जिससे त्वचा का कैंसर होता है ।*
*6- बैंगनी रंग में क्रोमियम आयोडाइड होता है जिससे दमा, एलर्जी होती है ।*
*अब आपको घर में ही प्राकृतिक रंग बनाने की सरल विधियाँ बता रहे हैं जो आसानी से बनाकर उपयोग कर सकते हैं और मना सकते हैं एक स्वस्थ होली ।*
*केसरिया रंग - पलाश के फूलों से यह रंग सरलता से तैयार किया जा सकता है। पलाश के फूलों को रात को पानी में भिगो दें । सुबह इस केसरिया रंग को ऐसे ही प्रयोग में लाएं अथवा उबालकर होली का आनंद उठायें ।
*यह रंग होली खेलने के लिए सबसे बढ़िया है। शास्त्रों में भी पलाश के फूलों से होली खेलने का वर्णन आता है । इसमें औषधीय गुण होते हैं। आयुर्वेद के अनुसार यह कफ, पित्त, कुष्ठ, दाह, मूत्रकृच्छ, वायु तथा रक्तदोष का नाश करता है । रक्तसंचार को नियमित व मांसपेशियों को स्वस्थ रखने के साथ ही यह मानसिक शक्ति तथा इच्छाशक्ति में भी वृद्धि करता है ।
*सूखा हरा रंग - मेंहदी का पाउडर तथा गेहूँ या अन्य अनाज के आटे को समान मात्रा में मिलाकर सूखा हरा रंग बनायें । आँवला चूर्ण व मेंहदी को मिलाने से भूरा रंग बनता है, जो त्वचा व बालों के लिए लाभदायी है ।*
*सूखा पीला रंग - हल्दी व बेसन मिला के अथवा अमलतास व गेंदे के फूलों को छांव में सुखाकर पीस के पीला रंग प्राप्त कर सकते हैं।*
*गीला पीला रंग - एक चम्मच हल्दी दो लीटर पानी में उबालें या मिठाइयों में पड़ने वाले रंग जो खाने के काम आते हैं, उनका भी उपयोग कर सकते हैं । अमलतास या गेंदे के फूलों को रात को पानी में भिगोकर रखें, सुबह उबालें ।*
*लाल रंगः लाल चंदन (रक्त चंदन) पाउडर को सूखे लाल रंग के रूप में प्रयोग कर सकते हैं । यह त्वचा के लिए लाभदायक व सौंदर्यवर्धक है । दो चम्मच लाल चंदन एक लीटर पानी में डालकर उबालने से लाल रंग प्राप्त होता है, जिसमें आवश्यकतानुसार पानी मिलायें ।*
*पीला गुलाल : (१) ४ चम्मच बेसन में २ चम्मच हल्दी चूर्ण मिलायें | (२) अमलतास या गेंदा के फूलों के चूर्ण के साथ कोई भी आटा या मुलतानी मिट्टी मिला लें ।*
*पीला रंग : (1) 2 चम्मच हल्दी चूर्ण 2 लीटर पानी में उबालें | (2) अमलतास, गेंदा के फूलों को रातभर भिगोकर उबाल लें ।*
*जामुनी रंग : चुकंदर उबालकर पीस के पानी में मिला लें।*
*काला रंग : आँवले के चूर्ण को लोहे के बर्तन में रातभर भिगोयें ।*
*लाल रंग : (1) आधे कप पानी में दो चम्मच हल्दी चूर्ण व चुटकीभर चूना मिलाकर 10 लीटर पानी में डाल दें | (2) 2 चम्मच लाल चंदन चूर्ण 1 लीटर पानी में उबालें ।*
*लाल गुलाल : सूखे लाल गुड़हल के फूलों का चूर्ण उपयोग करें ।*
*हरा रंग : (1) पालक, धनिया या पुदीने की पत्तियों के पेस्ट को पानी में भिगोकर उपयोग करें | (2) गेहूँ की हरी बालियों को पीस लें ।*
*हरा गुलाल : गुलमोहर अथवा रातरानी की पत्तियों को सुखाकर पीस लें  ।
*भूरा हरा गुलाल : मेहँदी चूर्ण के साथ आँवला चूर्ण मिला लें
*सभी देशवासियों से अनुरोध है कि आप केमिकल रंगों से होली न खेलें और न ही जानवरों जैसे कुत्ता, बिल्ली, गाय, भैस आदि पर कोई रंग डाले क्योंकि रंग में केमिकल
होता है। वो अपने आप को साफ़ करने के लिए अपने को जीभ से चाटते हैं और वो केमिकल उनके पेट में जाता है और बीमार पड़ जाते हैं या मर जाते हैं ।*
*होली पर गाए-बजाए जाने वाले ढोल, मंजीरों, फाग, धमार, चैती और ठुमरी, वैदिक गानों से ही करनी चाहिए । फिल्मो के गानों से करने से हानि होती है । उससे भी बचें ।*
*पूरे साल स्वस्थ्य रहने के लिए क्या करें होली पर..??*

*1- होली के बाद 15-20 दिन तक बिना नमक का अथवा कम नमकवाला भोजन करना स्वास्थ्य के लिए हितकारी है ।
*2- इन दिनों में भुने हुए चने - ‘होला का सेवन शरीर से वात, कफ आदि दोषों का शमन करता है ।*

*3- एक महीना इन दिनों सुबह नीम के 20-25 कोमल पत्ते और एक काली मिर्च चबा के खाने से व्यक्ति वर्षभर निरोग रहता है ।*

*4- होली के दिन चैतन्य महाप्रभु का प्राकट्य हुआ था । इन दिनों में हरिनाम कीर्तन करना-कराना चाहिए । नाचना, कूदना-फाँदना चाहिए जिससे जमे हुए कफ की छोटी-मोटी गाँठें भी पिघल जायें और वे ट्यूमर कैंसर का रूप न ले पाएं और कोई दिमाग या कमर का ट्यूमर भी न हो । होली पर नाचने, कूदने-फाँदने से मनुष्य स्वस्थ रहता है।

गुरुवार, 5 मार्च 2020

करोना वायरस के प्रभाव से होलिका दहन सहित संपूर्ण त्यौहार व्रत और संस्कृति आज प्रासंगिक बना


  


 भारतीय सनातन संस्कृति और उसके विभिन्न आयामों का आप सूक्ष्मता से विवेचन करेंगे यह संपूर्ण जीवन पद्धति है इसमें कोई वायरस या त्रिविध तापों का संपूर्ण समाधान है और उसी  भारत अपनी सनातन संस्कृति की छोड़कर पागल बनने की तरफ अग्रसर हो रहा है .....
बन्द करो #करोना  का रोना
बनो सनातन कुछ ना होना
तन- मन- जीवन हिन्दू हो तो
सदा स्वस्थ कोई रोग ना होना
करना है तो करो नमस्ते
शेक हैंड मत "#करोना"
खाना में शाकाहार करो ,
मांसाहार मत " #करोना"
रोज करो तुलसी का सेवन ,
धूम्रपान मत " #करोना"
नीम गिलोय का घूंट भरो
मदिरा पान मत " #करोना*
देशी भोजन रोज करो
फ़ास्ट फ़ूड मत " #करोना"
हाथ साफ दस बार करो
कहीं गंदगी मत " #करोना*
अग्नि संस्कार करो शव का
लाश दफन मत " #करोना*
#CoronaVirus #WuhanCoronaVirus
भारत की जलवायु और प्रकृति ही करेगी कोरौना का सफाया। 4℃ से 6℃ तक ही कोरौना सक्रिय और पनप पाता है और इससे अधिक तापमान में अपनी ताकत खोता है और असक्रिय होकर दम तोड़ देता है। यही कारण है कि इबोला, सार्स, स्वाइन फ्लू आदि भारत मे पूरी दुनिया की तादाद में कमजोर रहे।
मीडिया फ्लू से डरने से अधिक शाकाहारी जीवन और आयुर्वेद को अपनायें। गिलोय, नीम, तुलसी, हल्दी और गौमूत्र का सेवन तो कोरौना क्या इसकी सात पुश्तों से लड़ सकने लायक रोग प्रतिरोधक क्षमता को बनाता है।
#SAAR #Ebola #SwineFlu #BirdFlu #ZikaVirus #NipahVirus
यज्ञ में जावित्री की आहुति कोरोना वायरस का काल है
कोरोना वायरस दुनिया में कहर ढा रहा है अब यह चीन की महामारी ना होकर विश्वमहारी की ओर बढ़ रहा है| 50 देशों में फैल गया है 2800 से अधिक मौतें 75000 से अधिक केस सामने आ आ चुके हैं| कोरोना इबोला हेपेटाइटिस स्वाइन फ्लू या अन्य महामारी संक्रमण के लिए जिम्मेदार वायरस कोई आजकल के तो है नहीं यह भी उतने ही प्राचीन है कि जितना प्राचीन पृथ्वी पर जीवन है|
14 शताब्दी में मध्य एशिया यूरोप में प्लेग के वायरस ने 20 करोड लोगों का सफाया कर दिया था यह virus भारत का कुछ नहीं बिगाड़ पाया | भारत की संस्कृति यज्ञ संस्कृति रही है यज्ञ ने इस देश को महामारी संक्रामक रोग से बचाया है यहां जो भी महामारी आई पराधीनता के काल में आई या जब से हमने यज्ञ करना कराना छोड़ दिया|
भारत से 9000 किलोमीटर दूर दक्षिण एशियाई देश है इंडोनेशिया यह 2,000 से अधिक छोटे बड़े टापू से मिलकर बना देश है.... यह आर्यव्रत का हिस्सा था सनातन  संस्कृति से ही संरक्षित होता था| इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता है जो उसके प्राचीन नाम जयकृत का अपभ्रंश है| राजे महाराजे भारत के इस देश से जावित्री और जायफल मसाले को मंगाते थे यह मसाला अपने देश में नहीं होता... इंडोनेशिया के बाली सुमात्रा जावा द्वीप में यह होता है.... जावित्री , जायफल एक ही पेड़ के उत्पाद है जायफल पेड़ का बीज है तथा जावित्री बीज को घेरा हुए लाल आवरण है|
जावित्री केवल मसाला ही नहीं यह दुनिया की बेस्ट एंटी वायरल मेडिसिन है.... हमारे पूर्वज हवन सामग्री में मिलाकर यज्ञ में इसे डालते थे.... जावित्री इन रोगों का खात्मा करती है जो स्वसन तंत्र को प्रभावित करते हैं कोरोनावायरस से जुकाम फेफड़ों का तीव्र संक्रमण एक्यूट रेस्पिरेट्री सिंड्रोम कहते हैं उसका खात्मा कर देती है| कोरोनावायरस बड़ा ही अजीबोगरीब है| यह वायरसों के एक परिवार का सदस्य है जिसने सभी का कॉमन नाम कोरोना ही है... हाल फिलहाल जिस से चीन में आतंक फैला हुआ है वैज्ञानिकों ने उसका नाम कोविड 2019 रखा है.... यह वायरस गोलाकार होता है इसके चारों तरफ सुनहरे कांटे होते हैं इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप से जब देखते हैं एक क्राउन( ताज) की भांति यह आवरण से ढका हुआ होता है| कोरोना परिवार के वायरस साधारण जुकाम से लेकर खतरनाक निमोनिया के लिए जिम्मेदार है|
United State Disease Control , विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इस कोरोना 2019 वायरस के सामने लाचार है ऐसे में विश्व स्वास्थ्य संगठन केवल एडवाइजरी इस वायरस से बचाव के तरीके ही जारी कर रहा है |
अभी तक तो दुनिया की किसी लेबर्ट्री में इस वायरस के खिलाफ कोई एंटीवायरल ड्रग नहीं बनी है Remedesvir नामक ड्रग को इसका समाधान खोजा जा रहा है लेकिन वह अभी क्लिनिकल ट्रायल से कोसों दूर है|
यह तो रहा संक्षिप्त में इस वायरस का वैज्ञानिक वर्णन अब मुद्दे पर लौटते हैं कोरोना क्या जितने भी ज्ञात अज्ञात वायरस हैं जो खोजे गए हैं या खोजे जाएंगे उनकी संख्या 10 करोड़ से अधिक बताई जाती है सभी का काल है यज्ञ...|
अपने देश में होली, दीपावली जैसे प्राचीन त्योहारों पर ऋतु अनुकूल सामग्री से बड़े-बड़े यज्ञ करने की स्वस्थ परंपरा रही है| फागुन , चैत्र के महीने में जब जावित्री को यज्ञ सामग्री में मिलाकर व खेतों में उगे हुए गेहूं जौ की बालियों को मिलाकर यज्ञ किया जाए तो यह खतरनाक वायरस मानव शरीर तो क्या गांव की सीमाओं में भी नहीं घुस सकते...  हमारे ऋषियों ने सावित्री की गणना सुगंधी कारक जड़ी बूटी में की है जावित्री केवल सुगंधीकारक ही नहीं रोग नाशक भी है|

जावित्री कोई बहुत महंगा मसाला नहीं है ₹20 में 10 ग्राम मिलती है अर्थात ₹2000 किलो है 1 किलो जावित्री से एक गांव को वायरस से मुक्त किया जा सकता है यदि विधिवत यज्ञ किया जाए... साथ ही ऋतु अनुकूल सामग्री इस्तेमाल में लाई जाए|
साथियों अपने देश को कोरोनावायरस से सर्वाधिक खतरा है क्योंकि भारत विशाल आबादी का देश है चीन से हमारी सीमाएं मिली हुई है यह तो ईश्वर का कोई कर्म है यह virus भारत में अभी नहीं फैला है... कोरोना वायरस से पीड़ित व्यक्ति की छींक की एक बूंद में करोड़ों वर्ष होते हैं एक व्यक्ति छींक के द्वारा एक समय पर दर्जनों लोगों को संक्रमित कर सकता है|
सरकार के भरोसे मत बैठिए सरकारे इस वायरस से आपको नहीं बचा पाएंगी बताना चाहूंगा ईरान सहित कुछ मध्य एशियाई देशों के तो उपराष्ट्रपति भी इस वायरस से संक्रमित हैं...|
वायरस से आपको केवल और केवल यज्ञ ही बचा सकता है यदि सभी रोगों की एंटीवायरल एंटीबायोटिक थेरेपी है|
इस होली पर 9 मार्च को अपने गांव चौपालों पर सामूहिक जावित्री मसाले से युक्त सामग्री से यज्ञ कीजिए विशेष दो-तीन घंटे आप अपने गांव राष्ट्र को बचा सकते हैं| 

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...