बुधवार, 13 फ़रवरी 2019

वामी कामी जिहादी ईसाई सेकुलर दोगले एजेंटों को यह जरूर देखना चाहिए कि ब्रिटिश एजुकेशन के लागू होने के पूर्व की स्थिति। लगभग 100 साल बाद विल दुरान्त ने 1930 का लेख

#सामाजिक_न्याय_की_ढोल_में_पोल: पार्ट 1
"The Beautiful Tree" में धरमपाल जी ने ब्रिटेन की संसद ( House of Common Papers) तथा इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी लंदन के हवाले से लिखा :

●भारत में कलेक्टर्स के द्वारा प्रेषित रिपोर्टस् का अध्ययन करके मद्रास प्रेसीडेंसी के गवर्नर थॉमस मुनरो ने निर्णीत किया कि स्कूलों और प्राइवेट ट्यूटर्स के यहां शिंक्षा पाने वाले 5 से 10 साल के लड़कों का प्रतिशत लगभंग एक चौथाई से एक तिहाई के बीच है अर्थात 25 से 35% के बीच।

● वर्ण क्रम ( लेखक ने कास्ट वाइज लिखा है) में स्कूल में शिंक्षा प्राप्त करने वालो में बालको की तुलना में बालिकाओं की संख्या बहुत कम है।

● ऐसा माना जाता है कि प्राचीन भारत से लेकर ब्रिटिश पीरियड के शुरुवात तक शिक्षा सिर्फ तथाकथित द्विजो को ही उपलब्ध थी। ( मद्रास प्रेसीडेंसी में उस समय 95% आबादी हिंदुओ की थी)
लेकिन टेबल 2 में 1822-25 के उपलब्ध डेटा के अनुसार स्थिति प्रायः इसके बिल्कुल विपरीत थी। यह विपरीत स्थिति तमिल भाषी क्षेत्रो में अधिक प्रगल्भता के साथ दिखाई देता है जहां शिंक्षा ग्रहण करने वाले तथाकथित द्विजो की संख्या साउथ Arcot में 13%, मद्रास में लगभंग 23%, मुसलमानों का प्रतिशत साउथ arcot में 3% और सलेम में 10% है वहीं शिंक्षा ग्रहण करने वाले शूद्रों तथा अन्य जातियों का प्रतिशत सलेम और टिनवेली में 70% और साउथ Arcot में 84℅ है।

● टेबल 3 में इसको और स्पष्ट किया गया है।

★ मलयालम भाषी मालाबार में द्विज छात्रों का प्रतिशत 20% है क्योंकि यहां मुस्लिम जनसंख्या अधिक है। मुस्लिम छात्रों का प्रतिशत 27% है। जबकि शूद्र छात्रों की संख्या 54% है।
★ कन्नड़ भाषी बेल्लारी में द्विज छात्रों की संख्या 33% और शूद्र छात्रों की संख्या 63% है।
★इसी तरह उड़िया भाषी गंजम में द्विज छात्रों की संख्या 35% और शूद्र छात्रों की संख्या 63.5% है।

ये तो थी ब्रिटिश एजुकेशन के लागू होने के पूर्व की स्थिति।

लगभग 100 साल बाद विल दुरान्त ने 1930 में अपनी पुस्तक "The Case For India" में लिखा:
● जब ब्रिटिश भारत आये तो सम्पूर्ण भारत मे सामुदायिक स्कूल थे, जो ग्रामीण समुदायों द्वारा चलाये जाते थे। ईस्ट इंडिया कंपनी ने इन ग्रामीण समुदायों को विनष्ट करके उंनको स्कूलों से विस्थापित किया। जिनमे मात्र 7% लड़को और 1.5 लड़कियां शिंक्षा पाती हैं, अर्थात् कुल मिलाकर मात्र 4℅।
● 1911 में गोखले जी ने भारत मे सबको शिक्षित करने हेतु यूनिवर्सल कंपल्सरी एजुकेशन बिल प्रस्तावित किया जिसको ब्रिटिश द्वारा निर्वाचित सदस्यों ने खारिज कर दिया। 1916 में पटेल ने भी वैसा ही बिल प्रस्तावित किया, जिसको ब्रिटिश निर्वाचित सदस्यों ने खारिज कर दिया।
( P - 44 - 46)
● 1917 में डिप्रेस्ड क्लास के लिये ब्रिटिश शिंक्षा का प्रस्ताव लाते हैं।

( आगे की कहानी अन्य पोस्टों में लिखी हुई है)
अब प्रश्न यह उठता है कि यदि मात्र 100 साल पहले ब्राम्हणो द्वारा चलाये जा रहे गुरुकुलों में शूद्र छात्रों की संख्या इतनी अधिक थी तो 100 साल में ऐसा क्या हुवा कि एक डिप्रेससेड क्लास उतपन्न हो गया?
जिसको बाबा साइमन कमीशन से मिलकर अछूत होने का सर्टिफिकेट देंगे?

इन प्रश्नों के उत्तर खोजते ही सामाजिक न्याय और सामाजिक समरसता दोनों को ही श्मशान का मुंह देखना पड़ेगा।
पड़ेगा कि नहीं?

तो भैया चलती हुई दुकान बंद करवाने को कौन तैयार है ?
#सामाजिक_न्याय वाले या #सामाजिक_समरसता वाले?

मेरे प्रश्न का उत्तर कौन देगा?

वे तीन हजार साल का हल्ला मचा रहे है कितने वर्षों से। भारत की सरकार ने 1000 साल का एफिडेविट सुप्रीम कोर्ट में दिया है।

मैं 200 से कम समय का समयकाल प्रमाण के साथ दे रहा हूँ।

लेकिन कारण तो बताओ कि क्या वही कारण है इनके अछूत पने का जो तुमको तुम्हारा ही नाश करने वालो ने बताया है ?

#सामाजिक_न्याय_और_समरसता की पोल खोल: पार्ट 2

यह पुस्तक प्रथम बार 1971 में छपी थी।
50 वर्ष हो गए इसको छपे हुए।
लेकिन यह भारत के किसी भी विद्यालय के पुस्तकालय में नही उपलब्ध होगी।
यदि इस पुस्तक को पढ़कर ही यदि इतिहास का आकलन किया जाय तो #सामाजिक_न्याय और सामाजिक समरसता का सारा खेल नष्ट हो जाय।
इसी पुस्तक के छपने के आस पास ईसाई एजेंटो ने एक फैंटेसी के आधार पर लेखन शुरू किया जिसको सबाल्टर्न लेखन कहते हैं। इन एजेंटो को पूरे विश्व मे सम्मानीति किया जाता है। क्यों ?
जिससे भारत के विरुद्ध अंदुरुनी सॉफ्ट पावर तैयार किया जा सके।
धरमपाल जी ने यह सिद्ध किया है कि 1800 के पूर्व ब्रिटेन में आम किसान मजदूर  और शिल्पी  के बच्चे को शिक्षा उपलब्ध नही थी। शिंक्षा मात्र एलीट क्लास को उपलब्ध थी।
फिर भारत की गुरुकुल प्रणाली को चुराकर उन्होंने अपने आमजन को शिक्षित करना शुरू किया जिसका नाम मोनीटोरिअल या एंड्रू बेल लंकास्टर सिस्टम का नाम दिया गया। धरमपाल जी ने बताया कि 1792 में ब्रिटेन में स्कूल जाने वालों की संख्या 40,000 थी जो 1818 में बढ़कर 6,74,883 और 1851 में 21,44,377 हो गयी।
इनमें भी स्कूल अटेंड  करने का  एवरेज समय काल 1835 मे एक घण्टा और 1851 में दो घण्टा था।

धरमपाल जी ने उस झूंठ का भी पर्दाफाश किय्या है जो ईसाइयो और वामपंथियों ने फैलाया है कि शूद्रों को 3000 साल से शिंक्षा से वंचित रखा गया था।

1820 से 1835 तक भारत मे स्कूलों और छात्रों के बारे में एकत्रित आंकड़ों के द्वारा धरमपाल जी ने यह प्रमाणित किया है कि भारत के लगभंग हर गाँव मे एक या एक से अधिक स्कूल थे। जिनमें पढ़ने वाले शूद्र छात्रों की संख्या अन्य वर्ण के छात्रों की संख्या से बहुत अधिक थी। और यह बात सम्पूर्ण भारत मे सर्वत्र एक समान रूप से लागू होती है।

ज्ञातव्य है कि मैकाले के पूर्व शिंक्षा व्यवस्था ब्राम्हणो के हाँथ में थी और वे वेतन भोगी शिक्षक नही थे। पढ़ने वाले छात्र यथाशक्ति जो भी गुरु सेवा में अर्पित करते थे वही उनके जीवन यापन का साधन था।
( पुस्तक के इंट्रोडक्शन से उद्धरित)

अब इस बात का विश्लेषण होना चाहिये कि यदि ऐसा था तो आने वाले दिनों में ऐसा क्या हुवा जिसके कारण 2 से 3 करोड़ लोग 1850 और 1900 के बीच मे मौत के मुहं में समा गये। या उनकी सोच समझ कर हत्या कर दी गयी। और बंचे हुए लोगों में से  करोड़ो लोग उस स्थिति में रहने को बाध्य हुए जिनको अछूत ठहराया गया। यहां तक कि वह आज भी संविधान में अछूत घोसित होने के कारण स्वयं को अछूत ही समझते है ?
इसका जिम्मेदार कौन था?

क्या वेद शास्त्र पुराण या दस्यु ईसाइयो की लूटनीति फूटनीति और कूटनीति ?

इस पर राजनैतिक पार्टियां क्या बहस करने को तैयार हैं?

क्या आप बहस करने को तैयार हैं?
इंटरनेट युग मे सूचनाओं का प्रसारण ही सत्य की खोज है।

इसको कॉपी पेस्ट करके हर आदमी तक यह सच पहुंचाइये।

पुस्तक की पीडीएफ लिंक।
http://bit.ly/1RxnrsC
PDF direct download linkत

#सामाजिक_न्याय_के_ढोल_में_पोल: पार्ट 3
 आधुनिक इतिहासकार और संविधान सामाजिक न्याय का आधार 3000 साल से शूद्रों पर सवर्णो द्वारा किये गए अत्याचार के झूंठ को  एक सच की तरह प्रसारित करता आया है। विशेष तौर पर उंनको शिंक्षा न देने को वह इसका सबसे बड़ा कारण मानता है। Dr. UditRaj NewDelhi जैसे लोग कहते हैं कि आरक्षण कोई गरीबी हटाओ योजना नही है वरन यह सामाजिक न्याय का मसला है जो कि हजारों वर्ष से किये गए शोषण के कारण दिया जा रहा है।
लेकिन प्रामाणिक इतिहास बताते हैं कि यह झूंठ कुसूचनाओं को आधार बना कर रचा गया है।
धरमपाल जी ने ईस्ट इंडिया कंपनी के द्वारा 1820 से 1830 के बीच एकत्रित किये डेटा के अनुसार मैकाले शिंक्षा के पूर्व जब शिंक्षा मुख्यत: ब्राम्हणो के हाँथ में थी तो शिंक्षा पाने वाले छात्रों में शूद्रों का नंबर ब्राम्हण क्षत्रिय और वैश्यों से अधिक थी।
उन्होंने अपनी पुस्तक "The Beautiful Tree" में ब्रिटिश कलेक्टर के द्वारा मालाबार के डेटा का विश्लेषण करते हुए लिखा :
" एस्ट्रोनॉमी पढ़ने वाले 808 छात्रों में ब्रामहण मात्र 78 छात्र थे। मेडिसिन पढ़ने वाले 194 छात्रों में ब्रामहण छात्र मात्र 31 थे। राजमुंदरी में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों में 5 छात्र शूद्र वर्ण के थे। मद्रास प्रेसीडेंसी के सर्वे के अनुसार मेडिसिन और सर्जरी की प्रक्टिस करने वाले लोगों में कई जातियों के लोग थे। ब्रिटिश डॉक्टरों के अनुसार उन सबमे सबसे अच्छे सर्जन नाई ( बार्बर) थे।
मालाबार में ही प्राइवेट ट्यूटर्स के द्वारा दी जा रही उच्च शिक्षा में एस्ट्रोनॉमी की शिक्षा पाने वाले कुल 496 छात्र थे, जिनमे 78 ब्राम्हण वर्ण से थे और 195 छात्र शूद्र वर्ण से थे। उसी तरह मेडिकल साइंस की शिक्षा पाने वाले कुल 100 छात्र थे जिसमें 31 छात्र ब्राम्हण वर्ण से थे और 59 छात्र शूद्र वर्ण से थे।"
( प्रमाण भी है तथ्यात्मक)

यह डॉक्यूमेंट इस बात का प्रमाण है कि भारत का समाजशास्त्र और इतिहास झूंठ का पुलिंदा मात्र है।

दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि यदि यह एक सच्चाई है तो आने वाले 100 वर्षो में क्या हुवा कि 1850 से 1900 के बीच 2 से 3 करोड़ लोग भूंख से मर जाते हैं। और करोड़ों लोग अछूत की भांति जीने को बाध्य हो गए?
जब पेट की आग न बुझ सके तो शिंक्षा को कौन खोजेगा?

इन प्रश्नों के उत्तर कौन देगा?
साभार
Tribhuwan Singh संकलन अजय कर्मयोगी

मंगलवार, 12 फ़रवरी 2019

  बर्ष 2011 में वह ASI द्वरा परिवर्तन आप समझिए शासन की व्यवस्थाओं को 2011 में लिखा गया यह लेख आज भी झूठ को प्रतिबिंबित कर रहा है
श्रीनगर में गोपाद्री पहाड़ी पर स्थित मन्दिर का इतिहास लगभग डेढ़ हजार साल पुराना है।
कश्मीर की यात्रा के समय आदि शंकराचार्य ने इस पहाड़ी पर कुछ दिनो तक तपस्या की थी।जिसके कारण यहाँ एक विशाल मंदिर बनाया गया ,जिसे शंकराचार्य मंदिर कहते हैं.हिन्दुओं के लिए इस स्थान का विशेष महत्व है.
मंदिर के कारण लोगो ने इस पहाड़ी का नाम शंकराचार्य पहाड़ी रख दिया था जो सरकारी दस्तावेजो में भी मौजुद है। लेकिन  भारत सरकार के ASI ने शंकराचार्य पहाड़ी का नाम  'तख्ते सुलेमान 'रख दिया  है।
पुरातत्व विभाग बिना भारत सरकार की सहमती से कुछ नहीं कर सकता तो इस विषय में   जो जानकारी अंतर्जाल पर उपलब्ध है उसके आधार पर ये ही समझ आता है कि यह मौलिक तथ्यों को नज़र अंदाज़ कर के किया जा रहा है ,
क्या वोटों की राजनीति इतनी गिर गयी है कि अपने इतिहास से छेड़छाड़ की जाती रहे?
 अधिक जानकारी इस लिंक पर है -हिंदी अनुवाद जल्द प्रस्तुत करूंगा



शनिवार, 9 फ़रवरी 2019

नाड़ी परीक्षण


नाड़ी परीक्षण................
किसी भी व्यक्ति का शरीर का तापमान की जानकारी लेना हो बिना किसी भी थर्मामीटर या किसी भी अन्य यंत्र के तो नीचे लिखे तरीके से जानकारी ले सकते है ।

पुरुष की नाड़ी परीक्षण हमेशा दाहिनी हाथ से किया जाता है और महिला की बायी हाथ से।

अगर किस भी व्यक्ति का शरीर का
60-65 पल्स है तो शरीर का तापमान 98 डिग्री फ़रेनहाएट
70 पल्स है तो 99 डिग्री फ़रेनहाएट तापमान
80 पल्स है तो 100 डिग्री तापमान
90 पल्स = 101 डिग्री फ़रेनहाएट
100 पल्स = 102 डिग्री फ़रेनहाएट
110 पल्स = 103 डिग्री फ़रेनहाएट
120 पल्स = 104 डिग्री फ़रेनहाएट
130 पल्स = 105 डिग्री फ़रेनहाएट
140 पल्स = 106 डिग्री फ़रेनहाएट

यानि हर 10 स्पंदन बढ़ने पर 10 डिग्री तापमान शरीर का बढ़ेगा गर्भ में बच्चा का पल्स 140 से 150 होगा

सबसे अच्छा पल्स 70 से 74 के बीच होना चाहिए ।

आयु के अनुसार रक्‍तचाप (Blood Pressure) नापने का अद्भुत तरीका।
गर्भ में बच्चा का बी पी माँ के बी पी के बराबर होगा
जन्म से 5 साल तक बी पी का हाईयर लिमिट 81 और लोअर लिमिट 45
5 साल से 10 साल तक बी पी का हाईयर लिमिट 90 और लोअर 50
10 साल से 15 साल तक हाई 100 और लोअर 62
15 साल से 20 साल तक हाई बी पी 110 और लोअर बी पी 71
20 साल से 30 साल तक हाई बी पी 120 और लोअर बी पी 80
30 साल से 35 साल तक हाई बी पी 124 और लोअर बी पी 82
35 साल से 40 साल तक हाई बी पी 126 और लोअर बी पी 83
40 साल से 50 साल तक हाई बी पी 128 और लोअर बी पी 84
50 साल से 60 साल तक हाई बी पी 132 और लोअर बी पी 86
60 साल से 65 साल तक हाई बी पी 136 और लोअर बी पी 88
65 साल से 80 साल तक हाई बी पी 140 और लोअर बी पी 90
80 साल से ऊपर तक हाई बी पी 145 और लोअर बी पी 92

किसी किसी का बी पी में + 5 या – 5 का अंतर हो सकता है तो किसी भी प्रकार की समस्या नहीं होगी । उस से ज्यादा अंतर आने पर व्यक्ति बीमार कहलाएगा
अजय कर्मयोगी

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019

तीर्थराज प्रयाग काशी व माता गंगा का तथ्यात्मक विश्लेषण स्वामी करपात्री जी व अन्य महाभाग की दृष्टि में



प्रयाग नाम वाली पांच अलग अलग जगहें पास पास ही होती हैं। इनमें सबसे पहला है विष्णु प्रयाग। बद्रीनाथ के सतोपंथ से चली अलकनंदा नदी विष्णु प्रयाग में धुली गंगा से मिलती है। यहाँ से आगे बढ़ने पर अलकनंदा थोड़ी दूर बाद नंदाकिनी से मिलती है और ये दूसरी जगह नन्द प्रयाग कहलाती है। इस से आगे बढ़ें तो अलकनंदा फिर से पिंडर गंगा से मिलती है और उसे कर्ण प्रयाग कहते हैं। थोड़ा और नीचे आने पर अलकनंदा केदारनाथ से निकली मन्दाकिनी से मिलती है, जिसे रूद्र प्रयाग कहा जाता है। इस से भी आगे जाकर गंगोत्री के गोमुख से निकली भागीरथी नदी आकर अलकनंदा से मिलती है। इस जगह को देव प्रयाग कहा

जाता है।

यहाँ से आगे अलकनंदा और भागीरथी का कोई अलग अलग अस्तित्व नहीं रहता, यहाँ से आगे ये नदी गंगा कहलाती है। तकनिकी रूप से जब हम गंगा की बात करते हैं तो ये गोमुख में गंगोत्री ग्लेशियर से १२७६९ फीट की ऊंचाई पर निकलती है। भारत के मैदानी हिस्सों में करीब २५२५ किलोमीटर का सफ़र करके बांग्लादेश में बंगाल की खाड़ी में जा मिलती है। कितना पानी इस से बहता है, उसके हिसाब से देखें तो ये दुनियां की तीसरी सबसे बड़ी नदी है। ये नदी कम से कम १४० मछलियों की प्रजातियों और ९० उभयचर जंतुओं का घर है। इसके अलावा इसमें गंगा डॉलफिन भी होती है। वर्ष २००७ के आंकड़ों के मुताबिक ये नदी दुनियां की पांचवी सबसे ज्यादा प्रदूषित नदी थी।

करीबन ८०० किलोमीटर पार करने के बाद, रामगंगा के गंगा में मिल जाने पर इलाहाबाद के पास यमुना गंगा से मिलती है। इसे त्रिवेणी संगम कहते हैं, मान्यता थी कि गंगा-यमुना-सरस्वती तीन नदियाँ यहाँ मिलती थी। कई साल तक इतिहासकारों ने इसे मिथक घोषित किया। बाद में सैटॅलाइट से लिए चित्रों और अन्य सबूतों के आधार पर ये तय हो पाया कि सरस्वती सचमुच कि नदी थी और जिसे आज घाघरा-झज्झर बेसिन कहते हैं, वहीँ बहती थी। इस संगम को प्रयाग कहा जाता है, ये वो छठा प्रयाग है जिसे आम तौर पर लोग जानते पहचानते हैं। यहाँ भी यमुना नदी, गंगा से बड़ी है। यमुना से आने वाला १०४००० क्यूबिक फीट प्रति सेकंड पानी यहाँ गंगा में मिलता है। संगम का करीब ५९% पानी यहाँ यमुना का होगा।

यहाँ से आगे जब गंगा बहती है तो वो मैदानी क्षेत्र में है। उसका वेग बहुत कम हो जाता हो ऐसा नहीं है, लेकिन फिर भी वो अपेक्षाकृत शांत होती है। गंगा का वेग बनारस पहुंचकर कम होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि नदी की दिशा वहां घूमती है। बनारस पहुंचकर पूर्व की और बह रही गंगा दक्षिण से उत्तर की तरफ मुड़कर बह रही होती है और इसी से उसकी गति घट जाती है।

इसी को आप धार्मिक मान्यताओं में देख सकते हैं। भागीरथ जब गंगा को लेकर आते हैं तो वो बालिका है, अपने पूरे वेग में उत्साह से भरी पूरी, जब शिव उसे रोकते हैं तो वो किशोरी है, बंधनों को मानने के लिए आसानी से तैयार नहीं होती, शांतनु से विवाह और भीष्म के जन्म के समय वो युवती है, उसके बाद से लगातार वो माता के स्वरुप में है।

मैदानी भागों की गंगा भी इसी माता के स्वरुप में होती है। उसमें वेग नहीं, स्नेह और पोषण छलकता है। सन १९१८ से ३६ के दौर में अंग्रेजों ने वेग देखकर ये मान लिया था कि कितना भी कूड़ा कचरा इसमें डालो ये बहा ले जायेगी, लेकिन वाराणसी के इलाकों में जब शहरों से कचरा इसमें जाना शुरू हुआ तो इसका वेग उतना होता ही नहीं कि ये सब बहा ले जाए। इसकी सफाई के लिए भी जो काम हुए वो अजीब से रहे। पहले तो केंद्र और राज्य की इसमें ७०:३० की हिस्सेदारी रही, बाद में कांग्रेस की सरकार ने (यू.पी.ए. काल में ) इसे ५०:५० भी कर डाला। नतीजा ये रहा कि दोनों केंद्र और राज्य कहते रहे कि उन्होंने अपने हिस्से की सफाई कर दी है, उधर गंगा मैली होती रही।

मोदी सरकार के कार्यकाल में बहुत ज्यादा काम हुआ हो ऐसा भी नहीं है लेकिन हाँ प्रदुषण फ़ैलाने वालों की पहचान का काम किया गया है। आश्चर्यजनक रूप से इसमें ११८ शहर ही नहीं आते, गंगा को प्रदूषित करने वालों में १६४९ ग्राम पंचायत भी हैं। गंगा की सफाई में जुटे एन.जी.ओ. में से एक बड़ी संख्या साधुओं की चलाई हुई है। उनमें से ज्यादातर आधुनिक मानकों पर पढ़े लिखे भी नहीं माने जायेंगे। लगातार के अभ्यास ने उन्हें ये सिखा दिया है कि क्या किया जाना चाहिए। लगभग सबका मानना है कि गंगा की धारा को “निर्मल” ही नहीं “अविरल” भी होना चाहिए। जबरन पानी को रोका जाना गंगा को नुकसान पहुंचाता है।

अभी की हिसाब से उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड और पश्चिम बंगाल मिलकर ७३०० मिलियन लीटर कचड़ा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रतिदिन गंगा में बहाते हैं। इन राज्यों को मिला दें तो इनका सामर्थ्य करीब ३३०० मिलियन लीटर कचड़े को परिशोधित करने का ही है, यानि ४००० मिलियन लीटर विष प्रतिदिन गंगा में जा रहा है। पंजाब के गावों में एक बाबा बलबीर सिंह सींचेवाल काम किया करते हैं। उन्होंने हाल में ही काली बेइन नदी को पूरी तरह सिर्फ गाँव वालों और अपने काम से साफ़ कर के दोबारा जीवित कर डाला है। जो नदी लगभग सूख चुकी थी, वो अब दोबारा बहती है।

[ संख्याओं के अंक जान बूझ कर देवनागरी में लिखे गए हैं, 8 को ८ लिखना भर दोबारा सीखने से मेरी भाषा एक पीढ़ी और आगे बढ़ जाती है।]

आनन्द कुमार

#प्रयाग #कुरुक्षेत्र

इस अंश को कृषि के पूरब से पश्चिम की दिशा में प्रसार से जोड़ा जा सकता है। उल्लेखनीय है कि कृषि ही आदि यज्ञ है।
इसका एक अर्थ यह भी होगा कि रोमिल हबीबी गिरोह द्वारा कथित आक्रांता आर्यों का पश्चिम से पूरब की दिशा में अग्निकाण्ड करते हुये बढ़ना बताया जाना 100 प्रतिशत गल्प है।

भगवान सिंह द्वारा जह्नु एवं जघन की मीमांसा जिन्हें स्मृत हो, वे ध्यान दें कि गङ्गा यमुना के मध्य के प्रयाग क्षेत्र को पृथ्वी का जघन स्थल बताया गया है।
#मत्स्यपुराण

----प्रयाग-----
गंगा-यमुना के संगम से सम्बन्धित
अत्यन्त प्राचीन निर्देशों में  एक मन्त्र है  ,जो बहुधा  ऋग्वेद १०.७५  के  साथ  उच्चरित किया जाता है -
सितासिते सरिते यत्र सङ्गते तत्राप्लुतासो दिवमुत्पतन्ति ।
ये वै तन्वं विसृजन्ति धीरास्ते जनासो अमृतत्वं  भजन्ते  ।।
त्रिस्थली के मत से यह आश्वलायन शाखा का पूरक श्रुति वचन है ।
तीर्थचिन्तामणि ने इसे ऋग्वेद का मन्त्र माना है ।
स्कन्दपुराण ने इसे श्रुति कहा है ।
काशीखण्ड, ७/५४  - 'श्रुतिभि: परिपठ्येते सितासिते सरिद्वरे ।
तत्राप्लुतांगा ह्यमृतं भवन्तीति विनिश्चितम्'||
जो लोग श्वेत या कृष्ण दो नदियों के मिलन पर स्नान करते हैं, वे स्वर्ग को उठते हैं; जो धीर लोग वहाँ अपना शरीर त्याग करते हैं,
वे अमृतत्व को पाते हैं ।

प्रयागतीर्थस्य सीमा-

आ प्रयागं प्रतिष्ठानादापुराद्वासुकेर्ह्रदात्।



कम्बलाश्वतरौ नागौ नागाच्च बहुमूलकात्।।



एतत्प्रजापतेः क्षेत्रं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।। मत्स्यपु. १०४.४ ।।

॥अटक॥
हमारी स्मृति में  अटक  आज भी क्यों अटका हुआ है , इसके पीछे हमारी हजारों वर्ष पुरानी परम्परायें  ही  कारण  हैं ।
तीर्थ स्थान की यात्रा व तीर्थ स्नान का विशेष महत्व है ।
भगवान् श्रीकृष्ण के बड़े भाई  बलराम जी ने भी तीर्थाटन किया था  , इनका वर्णन महाभारत में विस्तार से है ।
वर्तमान पाकिस्तान के अटक में  सिन्धु  तथा  कुभा नदियों का संगम स्थल है , दोनों ही नदियों के नाम ऋग्वेद में  मिलते हैं ।
यह स्थल भी हमारा प्राचीन तीर्थ-स्थल  है  ।
सिन्धु का जल  साफ श्वेत  तथा  कुभा का जल मटमैला कृष्ण  है ।
कुभा नदी को ही काबुल नदी कहते हैं ।

 ऋग्वेद १०.७५  के  साथ  ही एक मन्त्र उच्चरित किया जाता है -

"सितासिते सरिते यत्र सङ्गते तत्राप्लुतासो दिवमुत्पतन्ति ।
ये वै तन्वं विसृजन्ति धीरास्ते जनासो अमृतत्वं  भजन्ते  ।।"

त्रिस्थली के मत से यह आश्वलायन शाखा का पूरक श्रुति वचन है ।
तीर्थचिन्तामणि ने इसे ऋग्वेद का मन्त्र माना है ।
स्कन्दपुराण ने इसे श्रुति कहा है ।
काशीखण्ड, ७/५४  - 'श्रुतिभि: परिपठ्येते सितासिते सरिद्वरे ।
तत्राप्लुतांगा ह्यमृतं भवन्तीति विनिश्चितम्'||
जो लोग श्वेत और कृष्ण दो नदियों के मिलन पर स्नान करते हैं, वे स्वर्ग को उठते हैं; जो धीर लोग वहाँ अपना शरीर त्याग करते हैं,
वे अमृतत्व को पाते हैं ।

दृष्द्वती, आपया और सरस्वती से घिरे क्षेत्र में शुभ दिन अग्नि स्थापित हुई ( ऋ.3.23.4) ।
यह दृष्द्वती कौन है? पुष्कर का नाम सुना आप ने? ब्रह्मा का पवित्र झीलतीर्थ। दृषद्वती इसी झील से निकलती थी।
आप ने ब्रह्मा के प्रथम यज्ञ की बात पढ़ी होगी। इस ऋचा में उसी का संकेत है।
सरस्वती सूखी। झील से निकलने वाली नदी दृष्द्वती बरसाती बन कर कालांतर में नाम तक खो बैठी। जन मन में पुष्कर की महिमा ही शेष रह गयी, दृषद्वती नदी भूल गयी, लुप्तप्रवाही सरस्वती प्रयाग पहुँचा दी गयी।

कितना सरल है नाम-विस्मरण !
हरद्वार का हरिद्वार कर दिया !
किसी ने भी विरोध नहीं किया !

हिमालय को हर का बड़ा प्रतीक तथा कैलास को छोटा प्रतीक माना जाता था। अत: हरद्वार नाम सार्थक ही था।

हरिद्वार नाम से केवल बदरीनाथ से ही सम्बन्ध जुड़ पाता है पूर्ण हिमालय व कैलास से नहीं।



१२ कुम्भ-पण्डित मदन मोहन पाठक, विभागाध्यक्ष, ज्योतिष, राष्ट्रीयसंस्कृत संस्थान, लखनऊ परिसर कृत जगन्नाथ पञ्चाङ्ग २०७४ विक्रमाब्द के अन्तिम पृष्ठ पर १२ कुम्भ के समय और स्थान का वर्णन है। सूर्य-चन्द्र-गुरु जब एक राशि में आते हैं तो महा-कुम्भ योग होता है। स्वामी करपात्री जी द्वारा कुम्भपर्व निर्णय  ग्रन्थ के पृष्ठ-२२ पर देवों के १२ दिनों अर्थात् मनुष्य के १२ वर्षों में १२ कुम्भ पर्व भारत के १२ स्थानों में होते हैं-
देवश्चागत्य मज्जन्ति तत्र मासं वसन्ति च। तस्मिन् स्नानेन दानेन पुण्यमक्षय्यमाप्नुयात्॥
सिंहे युतौ च रेवायां मिथुने पुरुषोत्तमे। मीनभे ब्रह्मपुत्रे च तव क्षेत्रे वरानने॥
धनुराशिस्थिते भानौ गङ्गासागरसङ्गमे। कुम्भराशौ तु कावेर्य्यां तुलार्के शाल्मलीवने॥
वृश्चिके ब्रह्मसरसि कर्कटे कृष्णशासने। कन्यायां दक्षिणे सिन्धौ यत्राहं रामपूजितः॥
अथाप्यन्योऽपि योगोऽस्ति यत्र स्नानं सुधोपमम्। मेषे गुरौ तथा देवि मकरस्थे दिवाकरे॥
त्रिवेण्यां जायते योगः सद्योऽमृतफलं लभेत्। क्षिप्रायां मेषगे सूर्ये सिंहस्थे च बृहस्पतौ॥
मासं यावन्नरः स्थित्वाऽमृतत्वं यान्ति दुर्लभम्। (रुद्रयामल, तृतीय करण प्रयोग, १२२-१२८)
अर्थात्-१. सूर्य-चन्द्र-गुरु सिंह राशि में युत होने से नासिक (महाराष्ट्र) में,
२. मिथुन राशि में जगन्नाथपुरी (ओड़िशा) में,
३. मीन राशि में कामाख्या (असम) में,
४. धनु राशि में गङासागर (बंगाल) में,
५. कुम्भराशि में कुम्भकोणम् (तमिलनाडु) में,
६. तुला राशि में शाल्मली वन अर्थात् सिमरिया धाम (बिहार) में,
७. वृश्चिक राशि में कुरुक्षेत्र (हरियाणा) में,
८. कर्क राशि में द्वारका (गुजरात) में,
९. कन्या राशि में रामेश्वरम् (तमिलनाडु) में,
१०. मेषाऽर्क-कुम्भ राशि गत गुरु में हरिद्वार (उत्तराखण्ड) में,
११. मकराऽर्क मेषराशिगत गुरु में प्रयाग (उत्तर प्रदेश) में,
१२. मेषाऽर्क सिंहस्थ गुरु में उज्जैन (मध्य प्रदेश) में
महाकुम्भ होता है।
टिप्पणी-१. कुरुक्षेत्र में महाभारत कार्तिक अमावास्या (अमान्त मास, उसके बाद मार्गशीर्ष का आरम्भ) को आरम्भ हुआ जिस समय सूर्य वृश्चिक राशि में थे। चन्द्र का प्रायः उसी समय वृश्चिक राशि में प्रवेश होता है। दक्षिणी गणना से शुभकृत सम्वत्सर था। इसमें गुरु वृश्चिक राशि में नहीं था।
२. रामेश्वरम् में भगवान् राम ने फाल्गुन मास में शिव की पूजा की थी। उस समय गुरु कन्या राशि में थे। राम जन्म के समय गुरु कर्क राशि में थे। ३६ वर्ष बाद पुनः कर्क राशि में; ३९ वर्ष बाद राज्याभिषेक (२५ वर्ष में वनवास,

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...