रविवार, 23 अगस्त 2020

चमत्कारी वनस्पति ब्रह्मांड की खगोलीय ऊर्जा के साथ इस वनस्पति जगत भी कई रहस्यमयी ऊर्जा छिपाये हुए हैं हमारे पूर्वज इन रहस्य को जानकर उसका सदुपयोग अपने स्वास्थ्य के लिए करते थे

  


किसी भी व्यक्ति का शरीर का तापमान की जानकारी लेना हो बिना किसी भी थर्मामीटर या किसी भी अन्य यंत्र के तो नीचे लिखे तरीके से जानकारी ले सकते है ।

पुरुष की नाड़ी परीक्षण हमेशा दाहिनी हाथ से किया जाता है और महिला की बायी हाथ से।

अगर किस भी व्यक्ति का शरीर का
60-65 पल्स है तो शरीर का तापमान 98 डिग्री फ़रेनहाएट
70 पल्स है तो 99 डिग्री फ़रेनहाएट तापमान
80 पल्स है तो 100 डिग्री तापमान
90 पल्स = 101 डिग्री फ़रेनहाएट
100 पल्स = 102 डिग्री फ़रेनहाएट
110 पल्स = 103 डिग्री फ़रेनहाएट
120 पल्स = 104 डिग्री फ़रेनहाएट
130 पल्स = 105 डिग्री फ़रेनहाएट
140 पल्स = 106 डिग्री फ़रेनहाएट

यानि हर 10 स्पंदन बढ़ने पर 10 डिग्री तापमान शरीर का बढ़ेगा गर्भ में बच्चा का पल्स 140 से 150 होगा

सबसे अच्छा पल्स 70 से 74 के बीच होना चाहिए ।

आयु के अनुसार रक्‍तचाप (Blood Pressure) नापने का अद्भुत तरीका।
गर्भ में बच्चा का बी पी माँ के बी पी के बराबर होगा
जन्म से 5 साल तक बी पी का हाईयर लिमिट 81 और लोअर लिमिट 45
5 साल से 10 साल तक बी पी का हाईयर लिमिट 90 और लोअर 50
10 साल से 15 साल तक हाई 100 और लोअर 62
15 साल से 20 साल तक हाई बी पी 110 और लोअर बी पी 71
20 साल से 30 साल तक हाई बी पी 120 और लोअर बी पी 80
30 साल से 35 साल तक हाई बी पी 124 और लोअर बी पी 82
35 साल से 40 साल तक हाई बी पी 126 और लोअर बी पी 83
40 साल से 50 साल तक हाई बी पी 128 और लोअर बी पी 84
50 साल से 60 साल तक हाई बी पी 132 और लोअर बी पी 86
60 साल से 65 साल तक हाई बी पी 136 और लोअर बी पी 88
65 साल से 80 साल तक हाई बी पी 140 और लोअर बी पी 90
80 साल से ऊपर तक हाई बी पी 145 और लोअर बी पी 92

किसी किसी का बी पी में + 5 या – 5 का अंतर हो सकता है तो किसी भी प्रकार की समस्या नहीं होगी । उस से ज्यादा अंतर आने पर व्यक्ति बीमार कहलाएगा

  भारत भूमि का प्रकृति के साथ जीवन जीने की पद्धति एक सनातन पद्धति रही है प्रकृति ने जीव और वनस्पति दोनों  के हम अपने जीवन में सदुपयोग करें उनके साथ कैसे सहजीवन जीयें यह एक बहुत चमत्कारिक विज्ञान रहा है जो अब विलुप्त सा हो रहा है यह पोस्ट बहुत  पढ़े-लिखे मूर्खलोगों के लिए तो नहीं है पर कुछ लोग और हमारे आदिवासी बनवासी भाई अभी भी इन चमत्कारों का उपयोग अपने जीवन में करते हैं और अभी कुछ ग्रामीण भाई भी  इसका उपयोग करते हैं  यह पोस्ट उन्हीं लोगों के लिए है ।  इस नई आधुनिक शिक्षा व्यवस्था अंग्रेजों द्वारा डालने के बादऔर नए और आज के आधुनिक समाज के लोग बड़े-बड़े हॉस्पिटलों की शोभा बढ़ाते हैं जब तक उनका शोषण किया हुआ पूरा धन लूट नहीं जाता है तब तक वो  किसी सामान्य  और बिना पैसे की चिकित्सा का  वह सहारा नहीं लेते इसी संदर्भ में आपको आज कुछ चमत्कारिक वनस्पतियों का और ब्रह्मांड की ऊर्जा के साथ हमारे पर क्या प्रभाव पड़ता है एक लेख आपको भेज रहा हूं कहीं कहीं आपको उलझन भी होगी पर आप अपनी बुद्धि और विवेक का इस्तेमाल जरूर करेंगे कि 100 प्रतिशत कोई प्रामाणिक नहीं कहा जा सकता पर बहुत सारा रहस्य भी इसमें छिपा हुआ है आप अपनी क्षमता का उपयोग करें
१. श्वेत पुनर्नवा की जड़ को दूध के साथ घिसकर पिलाने से स्त्री को गर्भ ठहरता है।
२. श्वेत रांगणी मूल पुष्य नक्षत्र में लेकर एक वर्ण की गाय के दूध में पिए तो बंध्या भी पुत्रवती होती है।
३. श्रवण नक्षत्र में आँवली की जड़ नागर बेल के रस में पिए तो स्त्री नवयौवन होती है।
४. अनुराधा नक्षत्र में चमेली की जड़ को लाकर सर पर रखे तो शत्रु भी मित्र हो जाते हैं।
५. हस्त नक्षत्र में चम्पा की जड़ लाकर गले में पहनने से भूत-प्रेत नहीं .......
https://ajaykarmyogi1.blogspot.comमाधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान 93369 19081 पर केवल व्हाट्सएप संपर्क करें

अनुराधा नक्षत्र में चमेलीमें चम्पा की जड़ लाकर गले में पहनने से भूत-प्रेत नहीं लगता।
६. पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में आम की जड़ को लाकर दूध में घिसकर पिलाने से बाँझ स्त्री को संतान की प्राप्ति होती है।

७. पुनर्वसु नक्षत्र में मेहँदी की जड़ लाकर पास में रखने पर शरीर से अच्छी सुगंध आती है।
८. अश्विनी नक्षत्र में अर्धरात्रि में नग्न होकर अपामार्ग की जड़ को लाए।
फिर उसे गले में ताबीज के अंदर धारण करने पर राज्य अधिकारी तथा उच्चाधिकारी अनुकूल होते है।
९. श्वेतसरपंखा की जड़ को नाभि पर लेप वीर्य का स्तम्भन होता है।
१०. मयूरशिखा की जड़ को तीन दिन दूध के साथ पीने से स्त्री पुत्रवती होती है।
११. मातुलिंग (बिजौरा) के बीज के दूध के साथ खीर बनाकर घी के साथ पीने पर स्त्री को निश्चय ही गर्भधारण होता है।
१२. लक्ष्मणा तीन भाग, उभयलिंगी चार भाग, बिहाली छः भाग सब मिलाकर गाय के दूध में पीसकर ऋतुकाल में स्त्री को पिलाने से पुत्र उत्पन्न होता है।
१३. ज्येष्ठ नक्षत्र में जामुन की जड़ लाकर पास रखने पर राज्य सम्मान मिलता है।
१४. स्वाति नक्षत्र में मोगरा की जड़ लेकर भैंस के दूध में घिसकर पीने से रंग में निखार आता है व गोरापन बढ़ता है।
१५. मघा नक्षत्र को पीपल की जड़ लेकर अपने पास रखने पर रात में दुःस्वप्न नहीं आते है।
१६. भरणी नक्षत्र में संखाहोली की जड़ लाकर चांदी अथवा सोने के ताबीज में लगवाकर पहनने से परस्त्री वशीभूत होती है...
  *मघा नक्षत्र के फायदे...*
*जिस दिन मघा नक्षत्र में होने वाली बारिश के पानी को एकत्र करके जब भी आंख लाल हो या आपको किसी भी कारणवश आपके आंखों कों थकान हुई हो अथवा आंख संबंधित किसी भी रोग में इस पानी के बूंदो को आंखों में डालने से आंखों के रोग मिटते हैं।*

*जब एलोपैथी उपचार पद्धति का अस्तित्व नहीं था तब मघा नक्षत्र के इसी जल का प्रयोग आंखों के इलाज के लिए हुआ करता था।*

*सोशल मीडिया की सेवा करने वाले ततपर भाई बहन इसका फायदा ज़रूर लेवें  कांच की शीशी में गंगाजल मिला कर रख लेवें ताकि इसका लम्बे समय तक उपयोग कर पाएं ।

आज ऋषिपंचमी पर्व हैं.....आज महिलाये व बालिकायें उपवास कर अपामार्ग की 108 ठंठल की गठरी बनाकर सिर पर रखती है और 108 लौटे या मग पानी सिर पर डालकर स्नान करती है ... कहीं कहीं इसकी दातुन भी की जाती है .....इसकी दातून करने से दांत काफी मजबूत होते है और कई वर्षों तक उनमें किसी प्रकार का कीड़ा नही लगता....वहीं इसके डंठल से स्नान करने पर मस्तिष्क में जमा हुआ कफ निकल जाता है साथ ही बालों में छिपे कीड़े भी निकल जाते है...।।

अपामार्ग को #चिरचिटा, #लटजीरा, #चिरचिरा, #चिचड़ा आदि नामों से जाना जाता हैं...।

इस समय सड़क हो या नदी-तालाब किनारे या बंजर भूमि हर कहीं आपको अपामार्ग का पौधा आसानी से दिख जावेगा....हमारे मालवांचल में तो हर गांव कस्बे में यह बड़ी मात्रा में पैदा होता हैं.... पर इसको अपामार्ग के नाम से कोई नही जानता,,हर कोई #आंधीझाड़ा कहता हैं,जो कहीं न कहीं इसका अपमान ही है क्योंकि आंधीझाड़ा का मतलब हमारे इधर बेकार की झाड़ी से लगाया जाता हैं....।

गुणों की खान "अपामार्ग"

अपामार्ग एक बहुओषधिय पौधा हैं, जिसका तना,जड़,पत्ते,बीज सभी का औषधीय मूल्य है....
अपामार्ग को अघाडा ,लटजीरा या चिरचिटा आदि नामों से जाना जाता हैं....।
आंधीझाड़ा के पत्ते ऋषिपंचमी ,गणेश पूजा , हरतालिका पूजा,मंगला गौरी पूजा आदि समय काम आते है .शायद पूजा में इस्तेमाल ही इसलिए होता होगा ताकि हम इनके आयुर्वेदिक रूप को पहचान सके और ज़रुरत के समय इनका सदुपयोग करना ना भूले....।

इसके पत्तों को पीसकर लगाने से फोड़े फुंसी और गांठ तक ठीक हो जाती है ...अपामार्ग की जड़ को कमर में धागे से बाँध देने से प्रसव सुख पूर्वक हो जाता है, प्रसव के बाद तुरन्त इसे हटा देना चाहिए....।
ज़हरीले कीड़े काटने पर इसके पत्तों को पीसकर लगा देने से आराम मिलता है ...वहीं इसकी ५-१० ग्राम जड़ को पानी के साथ घोलकर लेने से पथरी निकल जाती है ....इसके बीज चावल की तरह दीखते है ,जिन्हें #तंडुल कहते है .....यदि स्वस्थ व्यक्ति इस तंडुल की खीर खा ले तो उसकी भूख-प्यास आदि समाप्त हो जाती है ,पर इसकी खीर उनके लिए वरदान है जो भयंकर मोटापे के बाद भी भूख को नियंत्रित नहीं कर पाते,कालांतर में ऋषि-मुनि इस प्रकार की खीर का उपयोग कर लंबी साधना को पूर्ण करते रहे है......।

अपामार्ग से जुड़ी कोई जानकारी हो तो अवश्य साझा करें....।।

 ◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆  अभी मघा नक्षत्र चल रहा है
  एक ही समाधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान 9336919081 पर केवल व्हाट्सएप संपर्क करें


शुक्रवार, 21 अगस्त 2020

हरितालिका व्रत और त्योहार ही ईस सनातन संस्कृति को बचा रहे हैं दांपत्य जीवन को सुखमय बनाने हेतु हरतालिका तीज व्रत का बड़ा महत्व है


 भारतीय सनातन संस्कृति को नष्ट करने के लिए बहुत सारे अब्राहमिक संस्कृतियों के  दानव राक्षस और यहां के अल्प शिक्षित पढ़े-लिखे मूर्ख अपने ही जड़ों को खोद रहे हैं जिसके परिणाम स्वरुप पूरा सनातन परंपराएं नष्ट हो कर पूरा समाज और घर बिखर रहे हैं ।स्त्री पुरुष की एकता व सात जन्मों तक का साथ निभाने वाला दांम्पत्य जीवन को सुखमय बनाने वाली भारतीय सांस्कृतिक के छरण से एक हजार प्रतिशत से ज्यादा तलाक के केस बढ़ गये हैं और घर और समाज विखंडित हो रहा है 
वहीं कामी वामी और इस देश के दुश्मन स्त्री और पुरुष को अलग करने में और ऐसे त्यौहारों को हेय दृष्टि या निम्न स्तर का दकियानूसी विचार कहकर  ऐसे व्रत त्यौहारों की निंदा करते हैं फिर भी इस समाज ने धर्म की  जड़े बड़ी गहरी है आप सबको हरि तालिका तीज पर महादेव जी की कृपा बनी रहे और परिवार आपका सुगठित संगठित बना रहे शिव परिवार की तरह

हरतालिका तीज व्रत इस साल 21 अगस्त, शुक्रवार को रखा जाएगा। सभी सुहागन स्त्रियां इस दिन अपने पति की लंबी उम्र और #स्वास्थ्य_की_कामना से व्रत रखती हैं। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस दिन जो कोई भी स्त्री अपने पति का हित सोचकर व्रत रखती है, उसका #पति_दीर्घायु होता है। मान्यता है कि भगवान शिव और देवी पार्वती व्रतियों को सुख-संपत्ति, धन-धान्य, पुत्र-पौत्र और स्वस्थ जीवन का वरदान देते हैं।

👉 हरतालिका तीज व्रत का महत्व
इस व्रत को फलदायी माना जाता है। उत्तर भारत में इस व्रत की बहुत अधिक मान्यता है। कहते हैं अगर कोई कुंवारी कन्या अपने #विवाह की कामना के साथ इस व्रत को करती है तो भगवान शिव के आशीर्वाद से उसका विवाद जल्द हो जाता है। साथ ही यह भी कहा जाता है कि अगर कोई कुंवारी कन्या मनचाहे पति की इच्छा से हरतालिका तीज व्रत रखती है तो भगवान शिव के वरदान से उसकी इच्छा पूर्ण होती है।

👉 मान्यता है जो स्त्रियां इस व्रत को
सच्चे मन से करती हैं उसे #अखंड_सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद प्राप्त होता है।यह त्योहार मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान में मनाया जाता है। वहीं, कुछ दक्षिणी राज्यों में इस व्रत को गौरी हब्बा कहा जाता है
👉 हरतालिका तीज व्रत का इतिहास
माना जाता है कि देवी पार्वती के पिता हिमालय ने उनका विवाह श्रीहरि विष्णु के साथ तय कर दिया था। लेकिन उन्होंने तो मन ही मन शिव जी को #अपना_पति मान लिया था। महादेव को पति के रूप में पाने के लिए माता पार्वती जंगल में तपस्या करना चाहती थीं। तब माता पार्वती की एक सखी उन्हें हर कर घन घोर जंगलों में ले आई। तब से हरतालिका तीज मनाई जाती है।

👉 इस विधि से करें पूजा
इस व्रत में पूजन रात भर किया जाता है. इसके बाद बालू के भगवान शंकर व माता पार्वती का मूर्ति बनाकर पूजा करें. एक चौकी पर शुद्ध मिट्टी में #गंगाजल मिलाकर शिवलिंग, रिद्धि-सिद्धि सहित गणेश, पार्वती एवं उनकी सहेली की प्रतिमा बनाई जाती है. ध्यान रहें कि प्रतिमा बनाते समय भगवान का स्मरण करते रहें और पूजा करते रहें. इस दिन पूजन-पाठ करने के बाद महिलाएं रात भर भजन-कीर्तन करती हैं. हर प्रहर को पूजा करते हुए बेल पत्र, आम के पत्ते आदि अर्पण करें. फिर शिव-गौरी की आरती करें।

👉 भगवान शिव की आराधना इन मंत्रों से करें
ऊं हराय नम:
ऊं महेश्वराय नम:
ऊं शंभवे नम:
ऊं शूलपाणये नम:
ऊं पिनाकवृषे नम:
ऊं शिवाय नम:
ऊं पशुपतये नम:
ऊं महादेवाय नम:

👉 माता पार्वती की पूजा करते वक्त पढ़ें ये मंत्र
ऊं उमायै नम:
ऊं पार्वत्यै नम:
ऊं जगद्धात्र्यै नम:
ऊं जगत्प्रतिष्ठयै नम:
ऊं शांतिरूपिण्यै नम:
ऊं शिवायै नम:
👉 पूजन विधि
हरितालिका तीज पर #मिट्टी या रेत से शिव-पार्वती की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। इसके बाद इन्हें लकड़ी की चाैकी पर लाल कपड़ा बिछाकर आसन दिया जाता है। चाैकी को फूलों व केले के पत्तों से सजाया जाता है। चाैकी के सामने एक कलश भी रखा जाता है। इस दाैरान शिव-पार्वती पर जल छिड़ककर उन पर फूल व फल चढ़ाए जाते है। धूप, दीप, मेवा, पंचामृत, पान, मिठाई आदि अर्पण किया जाता है। माता पार्वती पर मेंहदी, चूड़ी, सिंदूर, महवर, बिंदी समेत सुहाग का सारा सामान चढ़ाया जाता है। इसके बाद हरतालिक तीज की कथा पढ़ी व सुनी जाती है।

👉 हरतालिका तीज की परंपरा-
हरतालिका तीज व्रत का प्रचलन अति प्राचीन काल से है. कब और कहां से इसका प्रारंभ हुआ, इस बारे में विशेष विवरण नहीं मिलता. लेकिन व्रत का संबंध शिव औऱ पार्वती से है, ऐसा सब मानते हैं. मान्यता है कि भगवान शिव को पति रुप में पाने के लिए सबसे पहले माता पार्वती ने #हरतालिका तीज व्रत का अनुष्ठान किया था. कुछ लोग इसे शिव-पार्वती के पुनर्मिलन और कुछ लोग इसे शिव को अमरता प्रदान कराने वाले व्रत के तौर पर भी मानते हैं.

👉 ऐसे किया जाता है व्रत
व्रत वाले दिन महिलएं #सुहाग की सारी वस्‍तुएं माता पार्वती को अर्पित करती हैं। सुबह पूजा के बाद महिलाएं दिन भर निर्जला व्रत करती हैं। पूजन के लिए गौरी-शंकर की मिट्टी की प्रतिमा बनाई जाती है। रात में भजन-कीर्तन करते हुए जागरण कर तीन बार आरती की जाती है।

👉 हरतालिका तीज की कथा
हरतालिका तीज के व्रत की कथा भी माता पार्वती और शिवजी से जुड़ी हुई है। पौराणिक कथाओं में बताया गया है कि पिता द्वारा कराए गए यज्ञ में जब माता पार्वती से शिवजी का अपमान बर्दाश्‍त नहीं हुआ तो उन्‍होंने उसी #यज्ञ_की_अग्नि में कूदकर आत्‍मदाह कर लिया। फिर अगले जन्‍म में वह राजा हिमाचल की पुत्री उमा के रूप में जन्‍मी और इस जन्‍म में भी उन्होंने भगवान शिव को मन ही मन अपना पति मान लिया।

👉 गौरी-शंकर की होती है पूजा
इस व्रत में मुख्‍य रूप से भगवान शंकर और माता पार्वती की संयुक्‍त रूप से पूजा होती है। व्रत करने वाली महिलाएं इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्‍नान करने के बाद 16 श्रृंगार करती हैं। मान्‍यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए भी कठोर तपस्‍या की थी, तब जाकर भगवान शिव उन्‍हें पति के रूप में प्राप्‍त हुए थे। सबसे पहले माता पार्वती ने यह व्रत किया था और इसके प्रभाव से शिवजी उन्‍हें पति के रूप में प्राप्‍त हुए थे।
👉 महिलाएं रखती हैं निर्जला व्रत
सौभाग्‍य की कामना और पति की दीर्घायु के लिए रखा जाने वाला व्रत हरतालिका तीज #भाद्र_मास_के_शुक_पक्ष की तृतीया को रखा जाता है। इस साल यह व्रत 21 अगस्‍त को है। इस दिन महिलाएं पूरे दिन निर्जला व्रत रखकर शाम को भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने के बाद पति के हाथ से जल पीकर व्रत तोड़ती हैं और पति का आशीर्वाद लेकर इस व्रत को पूर्ण करती हैं। कुछ स्‍थानों पर कुंवारी कन्‍याएं भी सुयोग्‍य वर पाने के लिए यह व्रत करती हैं।

👉 हरतालिका तीज पूजा मुहूर्त
पंचांग के अनुसार तृतीया तिथि 21 अगस्त को पड़ रही है. इस दिन #उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र रहेगा. इस दिन सिद्ध योग का निर्माण हो रहा है. इस दिन सूर्य सिंह राशि और चंद्रमा कन्या राशि में रहेगा. 21 अगस्त को प्रात: काल मुहूर्त 05 बजकर 53 मिनट 39 सेकेंड से 08 बजकर 29 मिनट 44 सेकेंड तक. प्रदोष काल मुहूर्त 18 बजकर 54 मिनट 04 सेकेंड से 21 बजकर 06 मिनट 06 सेकेंड तक रहेगा. हरतालिका तीज पूजा मुहूर्त शाम 6 बजकर 54 मिनट से रात 9 बजकर 6 मिनट तक रहेगा

👉 हरतालिका तीज: निर्जला एवं फलहारी
हर​तालिका तीज व्रत को सभी व्रतों में श्रेष्ठ माना जाता है। यह बेहद ही #कठिन_व्रत होता है। इसे दो प्रकार से किया जाता है। एक निर्जला और दूसरा फलहारी। निर्जला व्रत में पानी नहीं ​पीते हैं और न ही अन्न या फल ग्रहण करते हैं, वहीं फलाहारी व्रत रखने वाले लोग व्रत के दौरान जल पी सकते हैं और फल का सेवन करते हैं। जो कन्याएं निर्जला व्रत नहीं कर सकती हैं तो उनको फलाहारी व्रत करना चाहिए।

गुरुवार, 20 अगस्त 2020

दुनिया का एकमात्र शाकाहारी मगरमच्छ जो आज भी सेवा और पहरेदारी करता है श्रीकृष्ण गुफा की

भारत ऐसे अनेकों चमत्कार और रहस्य से भरा हुआ है इसके कण कण में भगवान का बास माना जाता है पदम्नाभ स्वामी मंदिर का यह रहस्य आपको चौका देगा  या मंदिर के प्रांगण में ही स्थित श्री कृष्ण गुफा की  पहरेदारी

करता हुआ यह शाकाहारी चमत्कारी मगरमच्छ   

श्रीकृष्ण का पहरेदार,
दुनिया का इकलौता शुद्ध शाकाहारी मगरमच्छ
मगरमच्छ पानी में रहने वाला एक खतरनाक जानवर जो एक इंसानी शरीर को बिना चबाए आराम से निगल सकता है और जिसके शरीर के ऊपर की त्वचा इतनी सख्त होती है कि इस पर बंदूक की गोली का भी कोई असर नहीं होता है
लेकिन आज हम जिस मगरमच्छ के बारे में बात करने वाले हैं वह दुनिया का इकलौता शुद्ध शाकाहारी मगरमच्छ है यह जानकर आपको हैरानी जरूर होगी दोस्तों लेकिन यह एक सच है
केरल के कासरगोड जिले में स्थित है भगवान विष्णु के अवतार श्री अनंत पदमनाभ स्वामी का मंदिर है इसी मंदिर के किनारे बनी झील में रहता है यह शाकाहारी मगरमच्छ जिसका नाम है “बबिया”.
बबिया मगरमच्छ खाने में केवल मंदिर का बना प्रसाद ही खाता है इसके अलावा कुछ नहीं खाता इस झील में उसके साथ रहने वाली मछलियाँ उससे बिल्कुल भी भयभीत नहीं होती है बल्कि आराम से उसके पास तैरती है बिना किसी डर के
अनंत पदमनाभ स्वामी मंदिर
तिरुवंतपुरम में श्री अनंत पदमनाभ स्वामी का एक बहुत विशाल एवं भव्य मंदिर है लेकिन स्थानीय लोगों के हिसाब से अनंतपुर में स्थित मंदिर ही श्री अनंत पदमनाभ स्वामी का मूल स्थान है
अनंतपुर में यह मंदिर करीब 2 एकड़ जितनी जगह में फैला हुआ है इस मंदिर के पास में एक झील भी है
पौराणिक कथाओं के अनुसार प्रभु अनंत पद्मनाभस्वामी इसी झील के अंदर स्थित एक गुफा से होकर तिरुवंतपुरम गए थे इसी वजह से दोनों जगहों का नाम एक जैसा ही है
मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा
मंदिर में पूजा करने वाले स्थानीय पुजारियों के अनुसार लगभग 3000 साल पहले दिवाकर मुनि विल्व मंगलम स्वामी अनंतपुर के इसी मंदिर मे रहा करते थे एवं विष्णु भगवान की पूजा किया करते थे
उनकी पूजा से प्रसन्न होकर एक दिन विष्णु भगवान स्वयं एक छोटे बालक के रूप में उनके सामने प्रकट हुए एवं उनके साथ इसी आश्रम में रहने लगे
धीरे धीरे यह बालक विल्व मंगलम स्वामी के साथ घुल मिल गया एवं वह आश्रम की कार्यों में भी मुनि का हाथ बटाने लगा
समय बीतता गया और एक दिन जब विल्व मंगलम स्वामी अपने दैनिक पूजा का कार्य कर रहे थे उस समय वह बालक उनके कार्य में विघ्न उत्पन्न कर रहा था
इस बात से परेशान होकर उन्होंने उस बालक को डाँटा और उसे पीछे की ओर धकेल दिया
मुनि के इस व्यवहार से आहत होकर वह बालक यह कहते हुए पास स्थित झील मे अदृश्य हो गया कि जब भी विल्व मंगलम स्वामी उनसे मिलना चाहे वे अनंतकट के जंगलों में उसे पाएंगे
जब तक मुनि को अपनी भूल का एहसास हुआ कि जिस नन्हे बालक को उन्होंने डांटा है वह स्वयं भगवान विष्णु का रूप है तब तक बहुत देर हो चुकी थी और वह बालक झील मे बनी गुफा मे अद्रश्य चुका था
झील मे बनी गुफा
विल्व मंगलम स्वामी स्वयं से हुई भूल का पश्चाताप करने के लिए एवं बालक से माफी मांगने के लिए उसी गुफा में प्रवेश करते हैं और वे गुफा के दूसरी और समुद्र के पास में निकलते हैं वहां पर वह देखते हैं कि समुद्र में स्वयं भगवान विष्णु विराजमान है उनके चारों और विशाल नाग लिपटे हुए हैं
बबिया मगरमच्छ के अस्तित्व का इतिहास
स्थानीय पुजारियों के अनुसार बबिया मगरमच्छ उसी गुफा में रहता है जहां पर भगवान श्री विष्णु के बाल अवतार श्री कृष्ण अदृश्य हुए थे
उनके अनुसार बबिया मगरमच्छ श्री कृष्ण के द्वार की पहरेदारी करता है
बबिया के बारे में सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह शुद्ध शाकाहारी मगरमच्छ है मंदिर के पुजारियों द्वारा इसे दिन में दो बार चावल का प्रसाद भोजन के रूप में दिया जाता है
मंदिर में पूजा करने वाले चंद्र प्रकाश जी के अनुसार वे पिछले 10 सालों से बबिया को भोजन करा रहे हैं वे कहते हैं कि वे प्रतिदिन 1 किलो चावल स्वयं अपने हाथों से बबिया को खिलाते हैं
और वह बिना उन पर आक्रमण किए या किसी अन्य मछलियों पर आक्रमण किए प्रसाद का भोजन करता है एवं अपनी गुफा में चला जाता है
बबिया पिछले 75 सालों से इसी झील में रह रहा है
बबिया का इतिहास
स्थानीय लोगों के अनुसार लगभग 75 साल पहले एक ब्रिटिश सैनिक ने बबिया से पहले इस गुफा की सुरक्षा कर रहे मगरमच्छ को मार दिया था
इस घटना के कुछ दिनों बाद ही उसे सैनिक की रहस्यमयी तरीके से सांप के काटने के कारण मृत्यु हो गई. स्थानीय लोगों का मानना है कि सर्प देवता ने उसे उसके अपराध की सजा दी है
पहले वाले मगरमच्छ की मृत्यु हो जाने के बाद बबिया मगरमच्छ उसकी जगह पर उस गुफा की पहरेदारी करने के लिए उपस्थित हो गया.
ऐसा हर बार होता है जब भी गुफा की सुरक्षा में लगा हुआ मगरमच्छ मृत्यु को प्राप्त होता है उसकी जगह पर दूसरा मगरमच्छ अपने आप ही उसका स्थान ले लेता है यह कहां से आते हैं कोई नहीं जानता
यहां पर ऐसी मान्यता है कि अगर आप इस झील में बबिया मगरमच्छ को तैरता हुआ देख लेते हैं तो आपकी किस्मत बदल सकती है बबिया अच्छे भाग्य का प्रतीक माना जाता है
ये हमारा यह श्री कृष्ण का पहरेदार दुनिया का इकलौता शुद्ध शाकाहारी मगरमच्छ
जय श्री कृष्ण।

बुधवार, 19 अगस्त 2020

आदृश्य गुलामी की प्रमुख हथियार न्याय प्रणाली और मीडिया

    



सुप्रीम कोर्ट के पेत्रिक संपत्ति वाले निर्णय ने कई घरो में घमासान बढ़ा दिया होगा | कोर्ट ने अधिकार की बात तो कर दी , पर जिमेदारी की नहीं की | बिना जिमेदारी के अधिकार नहीं होना चाहिए | जो सेवा करे उसे ही मेवा मिले निर्णय एसा होना चाहिए था |

ये निर्णय हिन्दुओ( सिख जैन बौध भी ) पर ही लागू होता है , कई परिवारों में इस के कारन झगडे बढ़ेंगे और हिन्दू एकता पर भी बुरा असर ही पड़ेगा |   

क्या यह लोकतंत्र है ? जिसमे एक वकील और एक जज बन्द कमरे में बैठ कर करोड़ों लोगों पर अपनी मनमर्जी थोपते हैं । उदहारण के लिये एक वकील कोरट में एक petition दायर करता है ।कि अगर एक हिन्दू अपनी पत्नी के साथ सहवास करता है तो उसे अपनी पत्नी को 10000 रुपये देने पड़ेंगे । जज इसके हक में फ़ैसला दे देता है । अब इस केस में यह फैसला करोड़ों लोगों को प्रभावित करेगा । उनसे बिना पूछे उनपर यह फैसला थोप दिया गया । क्या यह लोकतंत्र है? जिसका गुणगान सारी मीडिया करती रहती है कि अंगरेज हमें लोकतंत्र देकर चला गया । क्या यह अँगरेजों के स्थान पर संविधान ,अदालतों की गुलामी नहीं है । ऐसा ही संसद में होता है 270 व्यक्ति आपकी किस्मत का फैसला करते रहते है वह भी आपको पूछे बिना ।

उदहारण:- communal violence bill , sc st एक्ट ,domestic violence act ,आदि
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विकल्प:- सनातन लोकतंत्र प्रणाली , देश की सरकार के पास मुद्रा ,defense ,interstate transport , आदि को छोड़ कर बाकि सब अधिकार जैसे न्याय ,शिक्षा ,चिकित्सा आदि सब सनातन पंचायतों के पास होना चाहिये । जिसमे आप को तवरित न्याय बिना किसी डाक्यूमेंट्स के ,बिना किसी वकील के ,बिना किसी खर्चे के तुरंत मिल जाता था ।
उदहारण के लिए मान लीजिए किसी गावँ पंचायत में किसी बदचलन औरत ने किसी शरीफ आदमी पर यह आरोप लगा दिया कि यह मुझे आते जाते छेड़ता है । उसका मामला पंचायत में पहुँचा । तो इस शरीफ आदमी के हक में सारा गांव गवाही देगा । सरपंच भी अकेला फैसला नही कर सकता । 1 या 2 घण्टे में मामला निपट जाएगा ।
अब यही मामला अदालत में पहुँच जाए तो पहले आजकल व्यवस्था में एक presumptive evidence की अवधारणा चलती है जिसमे एक व्यक्ति को पहले ही दोषी मान लिया जाता है ।जैसे sc st act में नॉन sc st वर्ग को , दहेज उत्पीड़न के मामले में पति को ,ससुराल को पहले ही दोषी मान लिया जाता है । फिर उस मान लिए दोषी व्यक्ति को यह साबित करना पड़ता है कि वह दोषी नहीं । अब उस मान लिये दोषी व्यक्ति को अनन्त डाक्यूमेंट्स एकत्र करने पड़ेंगे ,जमानत, वकील का इंतजाम करना पड़ेगा । गवाहों को 2000 देकर ,बढ़िया खाने का लालच देकर पांच दस साल , 100- 200 किलोमीटर दूर किसी ac गाड़ी में बिठाकर 500 600 का टूल कटवा कर कोरट में पेश करना पड़ेगा । हो सकता है इस दौरान फ़ैसले का इंतजार करते करते उसकी मौत हो जाये ।
भारत की अंग्रेजी न्यायपालिका के कारनामे"

"1961 में मेरे पिताजी PWD में चतुर्थ श्रेणी के तकनीकी पद पर नोहर (राजस्थान) में पोस्टेड थे। उस समय तक मेरा जन्म नहीं हुआ था। एक दिन उनके अधिशासी अभियंता ने उनको कहा कि कल सालासर टूर पर चलना है, सो वो सुबह सुबह आफिस पंहुचे और वहाँ से जीप में बैठकर चालक सहित नौ व्यक्ति रवाना हो गये। सालासर पहुँच कर कोई सरकारी काम तो ना हो सका लेकिन दर्शन करने के पश्चात खाना पीना हुआ और इस दरमियान चालक की मान मनौवल में कोई कमी रह गयी और उसने वापस आकर भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो में जीप के दुरुपयोग की शिकायत कर दी। इस पर एसीडी ने भी अदालत में जीप के दुरुपयोग का तत्कालीन गंगानगर जिले की अदालत में चालक के अलावा शेष सभी आठ लोगों के विरुद्ध दावा कर दिया और कालांतर में इस केस को बीकानेर सिफ्ट कर दिया गया।

मेरे पिताजी 1995 में रिटायर हो गये, सन 2004 में पिताजी ने मुझे कहा कि आज मेरी कोर्ट में तारीख है और तबीयत खराब है सो कोर्ट मेरे साथ चलना है। मेरी उम्र 2004 में 42 वर्ष हो चुकी थी। कोर्ट जाने पर पिताजी अपनी बारी पर पेश हुए तो पता चला कि आज सरकारी वकील साहब व्यस्त है और मुकदमे की पैरवी करने के लिए हाज़िर नहीं हो सकते। जज साहब नयी तारीख देने लगे तो पिताजी ने कहा, "साहब इजाजत हो तो मैं कुछ अर्ज करता हूँ" और जज साहब के इजाजत देने के बाद पिताजी के बयान के शब्दश: उद्गार मैं नीचे लिख रहा हूँ।

"मान्यवर 42 साल पहले जिस जीप के दुरुपयोग का ये मुकदमा है मैं उस जीप में सवार नौ लोगों में से पद व आयु में सबसे छोटा कर्मचारी था, और 1995 में वो अंतिम व्यक्ति था जो रिटायर हुआ और आज के दिन उन नौ लोगों में इकलौता जीवित व्यक्ति भी हूँ। इस मुकदमे की पेशियों में हाज़िर होने के लिए विभाग आज तक मुझे ₹ 1,30,000/- का TA/DA के रूप में भुगतान कर चुका है। और चूंकि मैं सबसे छोटा कर्मचारी था अत: मुझे ही सबसे कम मिला है लेकिन यदि बराबर भी मान लिया जाए तो लगभग ₹ 1,30,000 X 9 = 11,70,000/- का भुगतान राजकोष से हो चुका है। और हर पेशी पर सरकारी वकील की फीस व हमारे वकील की फीस व न्यायालय के वक्त की बर्बादी अलग से।

"मान्यवर जैसा कि मैंने अर्ज किया कि मेरे सभी सह अभियुक्तों कि मृत्यु हो चुकी है और मै भी अब 70 वर्ष का हूँ और अब मैं भी अदालत में उपस्थित होने में असमर्थ हूँ। अतः मेरी आपसे प्रार्थना है कि चूंकि जीप दुरूपयोग का ही मामला है और आर्थिक दंड से शायद न्याय हो जाये, तो मैं अपने गुनाह को स्वीकार करता हूँ और अगर जेल भी जरूरी है तो जेल भेजो। मेरा क्या भरोसा, मैं अब पका आम हूँ, कभी भी टपक सकता हूँ। फिर आपकी अदालत किसको जेल भेजेगी? "

जज साहब ने तुरंत सरकारी वकील साहब को बुलाया और उसको कहा कि अगर अभियुक्त गुनाह कबुल कर रहा है तो आप इसमें क्या साबित करना चाहते हैं?

और जीप के दुरुपयोग का अनुमानित खर्च ₹ 36/- किया गया। यद्यपि पिताजी अपने अफसर के निर्देशों का पालन कर रहे थे लेकिन चूंकि उनके द्वारा अपने अधिकारी के गलत आदेशों का विरोध नहीं किया गया इसलिए 160/- का अर्थ दंड लगाया गया।

इस प्रकार कुल लगभग 20 लाख रुपये स्वाहा होने के बाद 196/- रूपये की वसूली से हमारी न्याय व्यवस्था ने अपने न्याय के फर्ज को पूरा किया।

हाँ पिताजी अभी भी जीवित हैं और जब भी कोई कोर्ट जाने की बात करता है तो वो मजे ले कर इस किस्से को सुनाते हैं।

गोरखनाथ दुसाने की मूल पोस्ट

बुधवार, 12 अगस्त 2020

गवाँम् मध्ये वसाम्यहम् के श्रेष्ठभाव से अनुप्राणित संपूर्ण कला से युक्त योगेश्वर कृष्ण की जन्मदिन की शुभकामना कैसे दूं जब जन्माष्टमी के दिन गौ माता की लाशें निकल रही है

 

 

 

श्रीकृष्णजन्माष्टम्यां हार्दाः शुभाशयाः।
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परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥
सत्पुरुषों की रक्षा करने के लिए, दुष्कर्म करने वालों दुष्टों के विनाश के लिए और धर्म की पुनः स्थापना करने के लिए मैं (श्रीकृष्ण) प्रत्येक युग में जन्म लेता हूँ।, for the destruction of the evil-doers, for the enthroning of the Right, I am born from age to age.
🙏🙏🙏🙏🙏
किसी वस्तु में ईश्वर नहीं होता , ईश्वर होता है आपकी बुद्धि में ।
और जब बुद्धि में ईश्वर आरूढ़ होता है तब वह शालिग्राम और नर्मदा शंकर में पत्थर नहीं देखता ।
जब बुद्धि में ईश्वर आरूढ़ होता है तो गंगा नर्मदा यमुना में नदी नहीं देखता , ईश्वर (देवी) देखता है ।
वह ईश्वर को पीपल और बरगद में देखता है , वह स्त्री में माँ को देखता है वह पुरूष में पिता को देखता है, वह गुरू में ईश्वर देखता है ।
वह गाय में पशु नहीं देवी देखता है ।
और जब बुद्धि ईश्वराकार होने लगेगी तब सर्वत्र श्रीकृष्ण दिखने लगेंगे ।
निमित्त कारण और उपादान कारण दोनों के सर्वांग रूप साक्षात् श्री हरि , भगवान श्री कृष्ण की जन्माष्टमी आपके इसी जीवन को कल्याणकारी बनाए , ऐसी मनोभावना करता हूँ ।
मथुरा सहित संपूर्ण विश्व राक्षसों से मुक्त हो , शुद्ध हो !
जय श्री कृष्णा



कृष्ण का  वह स्वरूप एक कुशल रणनीतिकार और युद्ध संचालक के साथ एक श्रेष्ठ राज्य संचालक गीता के ज्ञान से पुरुषार्थ को जगा कर धर्म की स्थापना का कार्य पूर्ण किया हमारे मानस पटल पर आज भी अंकित है जहां चारों तरफ अन्याय अधर्म के ताने-बाने में पूरा समाज बर्बाद हो चुका था वही योगेश्वर कृष्ण ने अधर्म को नाश करके धर्म की स्थापना  का कार्य हमें प्रेरणा जगाता है कि आज गौ हत्या दंगा बलवा के बीच से ही श्रेष्ठ भारत का अंकुरण का दायित्व हम सभी कृष्ण के चाहने वालों की एक प्रमुख आवश्यकता है कर्मयोगी श्रीकृष्ण* वह कृष्ण नीति आज भी प्रासंगिक जान पड़ती है

प्रत्येक राष्ट्र का अपना एक जीवन दर्शन या तत्व ज्ञान होता है। उसी को आधार बना कर राष्ट्र धर्म की स्थापना होती है। इसी राष्ट्र धर्म के अनुसार लौकिक-पारलौकिक-नीति, शत्रु-मित्र-व्यवहार, कर्तव्याकर्तव्य का निर्णय व्यक्ति और समाज तथा देश-देशांतर व्यवहार का निर्धारण किया जाता है। इसकी क्रियात्मकता और आचरण में त्रुटि होने पर ,प्रमाद होने पर राष्ट्र पतित हो कर नष्ट हो जाते हैं। महापुरुष उसी तत्वज्ञान को अपने पराक्रम, पुरुषार्थ, बुद्धिमत्ता, कुशलता और व्यावहारिकता के द्वारा पतन के गर्त में जाते हुए राष्ट्र में पुनः प्रतिष्ठित कर नवीन स्फूर्ति प्रदान करते हैं। वे राष्ट्र धर्म की पुनः स्थापना करते हैं। पश्चात लोग उनका अनुकरण करते हुए अपने जीवन पथ का निर्माण करते हैं और आगे बढ़ते हैं। श्री कृष्ण जी ऐसे ही महापुरुषों की श्रेणी में आते हैं।
श्रीकृष्ण नाम सुनते ही हमारी आंखों के सामने दो तरह के चरित्र उपस्थित हो जाते हैं। एक है " चोर जार शिखामणि " अर्थात चोरों और व्यभिचारियों का शिरोमणि, बांसुरी बजाने वाला, रासलीला करने वाला, परनारियों का अभिमर्षक, धूर्त और लम्पट चरित्र जिसे किसी भी प्रकार से आदर्श नहीं बनाया जा सकता, भले ही वह परमात्मा का अवतार ही क्यों न हो। उसे महापुरुष तो क्या एक साधारण अच्छा नागरिक भी स्वीकार नहीं किया जा सकता।
दूसरा चरित्र है - एक हाथ मे पाञ्चजन्य शंख और दूसरे हाथ में सुदर्शन चक्र उठाए योगेश्वर का। यह है तत्कालीन भारत का भाग्य विधाता, वैदिक संस्कृति का उद्गाता और त्राता, महाराज युधिष्ठिर का मंत्री, पांडव साम्राज्य का निर्माता और महाभारत का श्रेष्ठपुरुष श्रीकृष्ण।
पहले चरित्र का चित्रण पुराणों ने किया है और दूसरे का चित्रण महाकवि कृष्ण द्वैपायन व्यास के महाभारत ने। विचारणीय यह है कि हमारे लिए कौन सा स्वरूप आदर्श और अनुकरणीय हो सकता है ? दोनों स्वरूपों में से श्रीकृष्ण का वास्तविक स्वरूप इन प्रश्नों का समाधान करते हैं।  " श्रीकृष्ण जी का इतिहास महाभारत में अत्युत्तम है। उनका गुण , कर्म , स्वभाव और चरित्र आप्त पुरुषों के सदृश है, जिसमें अधर्म का आचरण अर्थात श्रीकृष्ण जी ने जन्म से मरण पर्यंत बुरा काम कुछ भी किया हो, ऐसा नहीं लिखा। परन्तु इस भागवत वाले ने अनुचित मनमाने दोष लगाए हैं। इस को पढ़ - पढ़ा और सुन-सुना कर अन्य मत वाले लोग श्रीकृष्ण जी की बहुत सी निंदा करते हैं। जो यह भागवत न होता तो श्रीकृष्ण जी के सदृश महात्माओ की झूठी निंदा क्यों कर होती ? " अतः सिद्ध है कि पुराणों में वर्णित श्रीकृष्ण चरित्र सर्वथा झूठा है और राष्ट्र के लिए अनुकरणीय नहीं है अतः त्याज्य है।
*श्रीकृष्ण का जन्मस्थान और वंश*
भारत मे सूर्य और चंद्र वंश के नाम से दो क्षत्रियकुल विख्यात हैं। चंद्र वंश में ययाति नाम के बड़े प्रतापी राजा हुए हैं। ययाति के बड़े पुत्र यदु राजा हुए। उन्हीं के वंश में उत्पन्न होने के कारण श्रीकृष्ण यदुवंशी क्षत्रिय कहे जाते हैं। कालांतर में इसी वंश में मधु नामक राजा हुए, इनके वंशज होने से यादव माधव कहलाए। आगे चलकर इसी वंश में सत्वत नाम के बड़े प्रसिद्ध राजा हुए। सत्वत के पुत्रों से दो उपवंश चले एक अंधक और दूसरा वृष्णि। श्रीकृष्ण वृष्णि वंशी थे इसलिए उनका नाम वार्ष्णेय भी है।
राजा अंधक जिन्हें भोज या महाभोज भी कहते थे, उनके दो पुत्र हुए कुकुर और भजमान। श्रीकृष्ण की माता देवकी कुकुर वंश की थी और पिता वासुदेव वृष्णि वंश के थे। श्रीकृष्ण के पितामह का नाम शुर, पिता का नाम वासुदेव तथा माता का नाम देवकी था। इनका जन्म वर्तमान उत्तर प्रदेश में यमुना के किनारे पर बसे मथुरा नामक नगर में हुआ था। मथुरा और उसके आस पास यादवों के कुल सत्रह उपवंश बसे हुए थे और इनके पुरुषों की संख्या अठारह हजार थी, ऐसा महाभारत के सभा पर्व में लिखा है।
श्रीकृष्ण के समान बुद्धिमान, कर्मकुशल, अद्भुत सूझबूझ वाला, उपयज्ञ, व्यवहार कुशल, निश्चिंत और पराक्रमी पुरुष आज तक इस संसार में पैदा नहीं हुआ। धर्मशास्त्र एवं वैदिक राजनीति का इतना बड़ा पंडित अन्यत्र दिखाई नहीं पड़ता। यह एक ऐसा विलक्षण व्यक्तित्व है जिसने अपने स्वप्न को जीते जी साकार होते हुए देखा, जिसने अपना लक्ष्य प्राप्त किया और जीवन को सफल व धन्य किया। एक ऐसा व्यक्तित्व जो सदा मुस्कराता है, भारी से भारी संकटों का सामना करते हुए भी जो न कभी टूटता है, न झुकता है और न ही मोहग्रस्त होता है। वह कभी जय-पराजय की चिंता नहीं करता , सांसारिक पदार्थो की आसक्ति छू तक नहीं गई, निजी पीड़ा का कभी ध्यान ही नहीं करता। इसे अपनी योजना और अपने बुद्धि कौशल पर पूरा भरोसा है, निराशा और पलायन की प्रव्रत्ति को कभी भी अपने पास फटकने नहीं देता। सचमुच अद्वितीय आदर्श पुरुष है यह, इसमें किंचित भी अतिशयोक्ति नहीं है।
*रुक्मिणी से विवाह*-- जरासंध का एक साथी बड़ा राजा था विदर्भराज भीष्मक। उसकी पुत्री रुक्मिणी श्रीकृष्ण के शील गुणों पर आसक्त थी परन्तु उसका पिता व भाई श्रीकृष्ण के साथ उसका विवाह नहीं करना चाहते थे। श्रीकृष्ण भी रुक्मिणी पर मुग्ध थे। जरासंध ने रुक्मिणी का विवाह अपने सेनापति चेदिराज शिशुपाल से करवाने का निश्चय किया। सम्बन्ध तय हो गया, बारात आ पहुँची। परन्तु इससे पूर्व ही श्रीकृष्ण रुक्मिणी को उसके पिता के घर से किसी प्रकार निकाल लाए। जब बाराती राजाओं को पता लगा तो उन्होंने श्रीकृष्ण का रास्ता रोकना चाहा परन्तु श्रीकृष्ण ने सबको अपने युद्ध कौशल से परास्त कर दिया। रुक्मिणी के भाई रुक्मी पर तो इतना प्रभाव पड़ा कि वह सदा के लिए श्रीकृष्ण का होकर रह गया। इस प्रकार एक और बड़ा राज्य यादव संघ के साथ मिल गया और श्रीकृष्ण की शक्ति सुदृढ़ हुई। श्रीकृष्ण ने घर आकर रुक्मिणी से विधिवत विवाह किया।
जरासन्ध ने छियासी राजाओं को कैद में डाल रखा था। श्रीकृष्ण ने जरासन्ध की मृत्यु के तत्काल बाद उन सभी राजाओं को मुक्त करा दिया। वे बड़े प्रसन्न हुए और श्रीकृष्ण जी से अपने योग्य सेवा कार्य बताने का निवेदन किया। श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में उपस्थित होने का आदेश देकर उन्हें विदा दी। इस प्रकार छियासी राजा तो श्रीकृष्ण के साथ आ ही गए और भी बहुत से राजे जो जरासन्ध की अधीनता भयवश स्वीकार कर चुके थे, वे भी युधिष्ठिर के पक्ष में आ मिले। धर्म का पक्ष और अधिक सुदृढ़ हुआ और खंड-खंड भारत अखंडता की ओर अग्रसर हुआ।
प्राग्ज्योतिष ( वर्तमान असम ) का राजा नरक जो जरासन्ध का मित्र था, उसने सोलह हजार से अधिक सुंदर स्त्रियों का अपहरण करके बन्दी बना रखा था और उनके साथ बलात्कार करता, करवाता था। श्रीकृष्ण ने उसे मारकर सभी युवतियों को मुक्त करा दिया। इस कार्य से संसार भर की नारी जाति के दिल में अपना आदर पूर्ण स्थान बना लिया और भारत को अखंड बनाने में योगदान प्राप्त किया।
श्रीकृष्ण का जीवन जैसा महाभारत में मिलता है उससे उनके चरित्र और शील का पता चलता है। उनकी दिनचर्या वैदिक धर्म के अनुसार थी। वे प्रतिदिन संध्या और हवन दोनों समय करते थे। दूत बन कर हस्तिनापुर गए तब मार्ग में सायंकाल सन्ध्या, हवन का वर्णन है। इसी प्रकार दूसरे दिन कौरव सभा में जाने से पूर्व संध्या हवन करते हैं। जिस दिन अभिमन्यु मारा गया उस दिन भी सायंकाल सन्ध्या वन्दन करके शोक संतप्त पांडवों से जाकर मिलने का वर्णन है। इससे विदित होता है कि श्रीकृष्ण पूर्ण आस्तिक ईश्वर भक्त थे तथा वैदिक कर्मकांड में पूर्णतया निष्ठा रखते थे।
शिष्टाचार और वृद्धजनों को सम्मान देने में भी वे अत्यंत विनीत और शिष्ट थे। व्यास, धृतराष्ट्र, कुंती तथा युधिष्ठिर आदि से जब मिले तब चरण छूकर नमस्ते बोल कर अभिवादन करने का वर्णन मिलता है। माता - पिता के प्रति भी बहुत प्रेम और आदरभाव रखते थे। जब भी घर जाते हैं, पहले माता-पिता के दर्शन करते हैं, चरण छूकर अभिवादन करके पश्चात पत्नी से मिलते है। बड़ो को झुककर अभिवादन और छोटो को गले लगाकर मिलते है। युधिष्ठिर के राजसूय में प्रथम पूज्य होकर भी जब कार्य बांटा गया तो श्रीकृष्ण ने ब्राह्मणों, विद्वानों के चरण धोने का कार्य अपने लिए आग्रह करके ग्रहण किया। विद्या में वे सांगोपांग वेद तथा विज्ञान के ज्ञाता थे। स्वंय भीष्म पितामह ने उन्हें उस समय के सब पुरुषों में श्रेष्ठ स्वीकार किया है। भीष्म श्रीकृष्ण का बहुत ही आदर करते थे।
रुक्मिणी श्रीकृष्ण की धर्मपत्नी थी उसके साथ विवाह के पश्चात श्रीकृष्ण उसे लेकर बद्रिकाश्रम चले गए और वहाँ बारह वर्ष तक दोनों ने घोर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया। इसके पश्चात शास्त्रविधि से गर्भाधान करके सनत कुमार जैसा तेजस्वी पुत्र प्राप्त किया, जिसका नाम प्रद्युम्न था। भला ऐसा तपस्वी और संयमी पुरुष व्यभिचारी और परस्त्रीगामी कैसे हो सकता है
*श्रीकृष्ण ने गीता में स्वयं ने कहा है*--
*यद यद आचरति श्रेष्ठस्तत तदेवेतरे जनः। स यत प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ।।*
अर्थात श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य लोग भी वैसा ही करते है। वह प्रमाण मान लेता है, संसार भी उसी का अनुवर्तन करने लगता ष्ण का  वह स्वरूप एक कुशल रणनीतिकार और युद्ध संचालक के साथ एक श्रेष्ठ राज्य संचालक गीता के ज्ञान से पुरुषार्थ को जगा कर धर्म की स्थापना का कार्य पूर्ण किया हमारे मानस पटल पर आज भी अंकित है जहां चारों तरफ अन्याय अधर्म के ताने-बाने में पूरा समाज बर्बाद हो चुका था वही योगेश्वर कृष्ण ने अधर्म को नाश करके धर्म की स्थापना  का कार्य हमें प्रेरणा जगाता है कि आज गौ हत्या दंगा बलवा के बीच से ही श्रेष्ठ भारत निर्माण का दायित्व हम सभी कृष्ण के चाहने वालों की एक प्रमुख आवश्यकता है योगेश्वर श्रीकृष्ण*
प्रत्येक राष्ट्र का अपना एक जीवन दर्शन या तत्व ज्ञान होता है। उसी को आधार बना कर राष्ट्र धर्म की....
आप शायद सो गए होंगे पर मुझे आज उसी कृष्ण की जन्म का इंतजार है  जिनके  जन्म से ही  सारेबंधन टूट जाते हैं अभी भी है क्योंकि दीन दुखी भारत नर नारी दुष्टन करत उपद्रव भारी अब जात है हिंद की लाज यही अवसर आओ भारत में जन्म के कुछ क्षण पूर्व यह लेख आपको भेजा है राष्ट्रीय स्वतंत्रत गुरुकुल अभियान 9336919081 पर केवल व्हाट्सएप संपर्क 7984113987
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर आप सभी को ह हार्दिक शुभकामनाएं

 

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...