बुधवार, 30 सितंबर 2020

गलती कोई भी अंग करे पर कान ही क्यों पकड़ा जाता है

गलती होने पर कान क्यों पकड़ते हैं
गौतम, वसिष्ठ, आपस्तंब धर्मसूत्रों और पाराशर स्मृति सहित अन्य ग्रंथों में ज्ञान की कई बातें बताई गई हैं। इन ग्रंथों में रहन-सहन के नियम और तरीकों के बारे में बताया गया है। इन ग्रंथों के अनुसार, हमारे शरीर में पंचतत्वों के अलग-अलग प्रतिनिधि अंग माने गए हैं जैसे- नाक भूमि का, जीभ जल का, आंख अग्नि का, त्वचा वायु का और कान आकाश का प्रतिनिधि अंग। विभिन्न कारणों से शेष सभी तत्व अपवित्र हो जाते हैं, लेकिन आकाश कभी अपवित्र नहीं होता। इसलिए ग्रंथों में दाहिने कान को अधिक पवित्र माना जाता है।
1. मनु स्मृति के अनुसार, मनुष्य के नाभि के ऊपर का शरीर पवित्र है और उसके नीचे का शरीर मल-मूत्र धारण करने की वजह से अपवित्र माना गया है। यही कारण है कि शौच करते समय यज्ञोपवित (जनेऊ) को दाहिने कान पर लपेटा जाता है क्योंकि दायां कान, बाएं कान की अपेक्षा ज्यादा पवित्र माना गया है। इसलिए जब कोई व्यक्ति दीक्षा लेता है तो गुरु उसे दाहिने कान में ही गुप्त मंत्र बताते हैं, यही कारण है कि दाएं कान को बाएं की अपेक्षा ज्यादा पवित्र माना गया है।
2. गोभिल गृह्यसूत्र के अनुसार, मनुष्य के दाएं कान में वायु, चंद्रमा, इंद्र, अग्नि, मित्र तथा वरुण देवता निवास करते हैं। इसलिए इस कान को अधिक पवित्र माना गया है।
गोभिल गृह्यसूत्र का श्लोक...
मरुत: सोम इंद्राग्नि मित्रावरिणौ तथैव च।
एते सर्वे च विप्रस्य श्रोत्रे तिष्टन्ति दक्षिणै।।
3. पराशर स्मृति के बारहवें अध्याय के 19 वें श्लोक में बताया गया है कि के छींकने, थूकने, दांत के जूठे होने और मुंह से झूठी बात निकलने पर दाहिने कान का स्पर्श करना चाहिए। इससे मनुष्य की शुद्धि हो जाती है।
पराशर स्मृति का श्लोक...
क्षुते निष्ठीवने चैव दंतोच्छिष्टे तथानृते।
पतितानां च सम्भाषे दक्षिणं श्रवणं स्पृशेत्।।
एक नए दृष्टिकोण से समझें ............
कान पकड़ना का अर्थ है – बुरे काम को न करने की प्रतिज्ञा करना।
ऐसा भी कहा जाता है कि कान के मूल में जो नाड़ियाँ हैं उनका मूत्राशय और गुदा से संबंध है। दाहिने कान की नाड़ी मूत्राशय के लिए गई है और बाएँ कान की नाड़ी गुदा से संबंध है। मूत्र त्याग करते समय दाहिने कान को लपेटने से उन नाड़ियों पर दबाव पड़ता है फल स्वरूप मूत्राशय की नाड़ियाँ भी कड़ी रहती हैं। तदनुसार, बहुमूत्र, मधुमेह, प्रमेह आदि रोग नहीं होते। इसी प्रकार दाहिने कान की नाड़ियाँ दबने से काँच, भगन्दर, बवासीर आदि गुदा के रोग नहीं होते। कई सज्जन शौच जाते समय दोनों कानों पर यज्ञोपवीत चढ़ाते हैं उनका तर्क यह है कि मल त्याग के समय मूत्र विसर्जन भी होता है इसलिए दोनों कानों पर उपवीत को बढ़ाना चाहिए। मैथुन के समय कान पर भले ही चढ़ाया जाय पर अशुद्ध अंगों से ऊंचा अवश्य कर लेना चाहिये।

क्षुते निष्ठीवने चैव दन्तेच्छिप्टे तथान्नृते।
पतितानाँ चसम्भायें दक्षिणं श्रवण स्पृष्येत।
पाराशर स्मृति 7। 38

अर्थात्- छींकने पर, थूकने पर, दाँतों से किसी अंग के उच्छि


ष्ट हो जाने पर झूठ बोलने और पाठकों के साथ संभाषण करने पर अपने दाहिने कान का स्पर्श करें।

छोटी-मोटी अशुद्धताएं कान का स्पर्श करने मात्र से दूर हो जाती हैं। कान को छूने पकड़ने या दबाने से भूल सुधारने का प्रायश्चित होने का सम्बन्ध है। बालक के कान पकड़ने का अध्यापकों का यही प्रयोजन होता है कि उसे देवत्व का और मनोबल का विकास हो। कान पर यज्ञोपवीत चढ़ाने से भी सूक्ष्म रूप से वही प्रयोजन सिद्ध होता है। इसलिए भी मलमूत्र के समय उसके कान पर चढ़ाने का विधान है।
आदित्यावसवो रुद्रा वायुरग्निश्व धर्मराट्।
विप्रस्य दक्षिणे कर्णे नित्यं निष्ठन्ति देवताः॥
शंख्यायन-
अग्निरापश्च वेदाश्च सोमः सूर्योऽनिलस्तथा।
सर्वे देवास्तु विप्रस्य कर्णे तिष्ठन्ति दक्षिणें॥
आचार मयूख-
प्रभासादीनि तीर्थानि गंगाद्या सरितस्तथा।
विप्रस्य दक्षिणे कर्णे वसन्ति मुनिरब्रवीत॥
परराशरः
उपरोक्त तीन श्लोकों में दाहिने कान का पवित्रता का वर्णन है। शांख्यायन का मत है कि आदित्य, वसु, रुद्र, वायु और अग्नि देवता विप्र-के दाहिने कान में सदा रहते हैं। आचार्य मयूखकार का कथन है अग्नि, जल, वेद, सोम, सूर्य, अनिल तथा सब देवता ब्राह्मण के दाहिने कान में निवास करते हैं। पराशर का मत है कि गंगा आदि सरिताएं तीर्थ गण दाहिने कान में निवास करते हैं। इसलिए ऐसे पवित्र अंग पर मलमूत्र त्यागते समय यज्ञोपवीत को चढ़ा लेते हैं जिससे वह अपवित्र न होने पावे।

मंगलवार, 29 सितंबर 2020

रिफाइंड ऑयल को.विड से भी खतरनाक और लाखो लोगों की मौत का जिम्मेदार

 




जीवन जीने की संपूर्णआधार गांव के उस परंपरागत उद्योग धंधे जो आपस में सहजीवन के साथ सहअस्तित्व की व्यवस्था  को पुन: स्थापित किए बिना हमारा जीवन अधूरा हो जाएगा इसलिए अपनी परंपरागत श्रेष्ठ सर्वोत्तम जाति व्यवस्था को पुनः संयोजन करिए और अपने तेली घांची समाज को निवेदन कर उसके कोल्हू घानी को चलवाईए अन्यथा यह अदाढ़ी और कच्ची घाणी का तेल व कंपनी और सरकार आपका जीवन लेने लिए पर्याप्त है सबसे ज्यादा मौतें देने वाला भारत में कोई है l
तो वह है...
*रिफाईनड तेल*
केरल आयुर्वेदिक युनिवर्सिटी आंफ रिसर्च केन्द्र के अनुसार, हर वर्ष 20 लाख लोगों की मौतों का कारण बन गया है... *रिफाईनड तेल
रिफाईनड तेल से *DNA डैमेज, RNA नष्ट, , हार्ट अटैक, हार्ट ब्लॉकेज, ब्रेन डैमेज, लकवा शुगर(डाईबिटीज), bp नपुंसकता *कैंसर* *हड्डियों का कमजोर हो जाना, जोड़ों में दर्द,कमर दर्द, किडनी डैमेज, लिवर खराब, कोलेस्ट्रोल, आंखों रोशनी कम होना, प्रदर रोग, बांझपन, पाईलस, स्केन त्वचा रोग आदि!. एक हजार रोगों का प्रमुख कारण है।*
*रिफाईनड तेल बनता कैसे हैं।*
बीजों का छिलके सहित तेल निकाला जाता है, इस विधि में जो भी Impurities तेल में आती है, उन्हें साफ करने वह तेल को स्वाद गंध व कलर रहित करने के लिए रिफाइंड किया जाता है
*वाशिंग*-- वाशिंग करने के लिए पानी, नमक, कास्टिक सोडा, गंधक, पोटेशियम, तेजाब व अन्य खतरनाक एसिड इस्तेमाल किए जाते हैं, ताकि Impurities इस बाहर हो जाएं |इस प्रक्रिया मैं तारकोल की तरह गाडा वेस्टेज (Wastage} निकलता है जो कि टायर बनाने में काम आता है। यह तेल ऐसिड के कारण जहर बन गया है।
*Neutralisation*--तेल के साथ कास्टिक या साबुन को मिक्स करके 180°F पर गर्म किया जाता है। जिससे इस तेल के सभी पोस्टीक तत्व नष्ट हो जाते हैं।
*Bleaching*--इस विधी में P. O. P{प्लास्टर ऑफ पेरिस} /पी. ओ. पी. यह मकान बनाने मे काम ली जाती है/ का उपयोग करके तेल का कलर और मिलाये गये कैमिकल को 130 °F पर गर्म करके साफ किया जाता है!
*Hydrogenation*-- एक टैंक में तेल के साथ निकोल और हाइड्रोजन को मिक्स करके हिलाया जाता है। इन सारी प्रक्रियाओं में तेल को 7-8 बार गर्म व ठंडा किया जाता है, जिससे तेल में पांलीमर्स बन जाते हैं, उससे पाचन प्रणाली को खतरा होता है और भोजन न पचने से सारी बिमारियां होती हैं।
*निकेल*एक प्रकार का Catalyst metal (लोहा) होता है जो हमारे शरीर के Respiratory system, Liver, skin, Metabolism, DNA, RNA को भंयकर नुकसान पहुंचाता है।

रिफाईनड तेल के सभी तत्व नष्ट हो जाते हैं और ऐसिड (कैमिकल) मिल जाने से यह भीतरी अंगों को नुकसान पहुंचाता है।

आप गंदी नाली का पानी पी लें, उससे कुछ भी नहीं होगा क्योंकि हमारे शरीर में प्रति रोधक क्षमता उन बैक्टीरिया को लडकर नष्ट कर देता है, लेकिन रिफाईनड तेल खाने वाला व्यक्ति की अकाल मृत्यु होना निश्चित है!

*दिलथाम के अब पढे*

*हमारा शरीर करोड़ों Cells (कोशिकाओं) से मिलकर बना है, शरीर को जीवित रखने के लिए पुराने Cells नऐ Cells से Replace होते रहते हैं नये Cells (कोशिकाओं) बनाने के लिए शरीर खुन का उपयोग करता है, यदि हम रिफाईनड तेल का उपयोग करते हैं तो खुन मे Toxins की मात्रा बढ़ जाती है व शरीर को नए सेल बनाने में अवरोध आता है, तो कई प्रकार की बीमारियां जैसे* -— कैंसर *Cancer*, *Diabetes* मधुमेह, *Heart Attack* हार्ट अटैक, *Kidney Problems* किडनी खराब,
*Allergies, Stomach Ulcer, Premature Aging, Impotence, Arthritis, Depression, Blood pressure आदि हजारों बिमारियां होगी।*
रिफाईनड तेल बनाने की प्रक्रिया से तेल बहुत ही मंहगा हो जाता है, तो इसमे पांम आंयल मिक्स किया जाता है! (पांम आंयल सवमं एक धीमी मौत है)

प्रत्येक तेल कंपनियों को 40 %
खाद्य तेलों में पांम आंयल मिलाना अनिवार्य है, अन्यथा लाईसेंस रद्द कर दिया जाएगा!
इससे अमेरिका को बहुत फायदा हुआ, पांम के कारण लोग अधिक बिमार पडने लगे, हार्ट अटैक की संभावना 99 %बढ गई, तो दवाईयां भी अमेरिका की आने लगी, हार्ट मे लगने वाली स्प्रिंग(पेन की स्प्रिंग से भी छोटा सा छल्ला) , दो लाख रुपये की बिकती हैं,
यानी कि अमेरिका के दोनो हाथों में लड्डू, पांम भी उनका और दवाईयां भी उनकी!
*अब तो कई नामी कंपनियों ने पांम से भी सस्ता,, गाड़ी में से निकाला काला आंयल* *(जिसे आप गाडी सर्विस करने वाले के छोड आते हैं)*
*वह भी रिफाईनड कर के खाद्य तेल में मिलाया जाता है, अनेक बार अखबारों में पकड़े जाने की खबरे आती है।*
सोयाबीन एक दलहन हैं, तिलहन नही...
दलहन में... मुंग, मोठ, चना, सोयाबीन, व सभी प्रकार की दालें आदि होती है।
तिलहन में... तिल, सरसों, मुमफली, नारियल, बादाम,ओलीव आयल, आदि आती है।
अतः सोयाबीन तेल , पेवर पांम आंयल ही होता है। पांम आंयल को रिफाईनड बनाने के लिए सोयाबीन का उपयोग किया जाता है।
सोयाबीन की एक खासियत होती है कि यह,
प्रत्येक तरल पदार्थों को सोख लेता है,
पांम आंयल एक दम काला और गाढ़ा होता है,
उसमे साबुत सोयाबीन डाल दिया जाता है जिससे सोयाबीन बीज उस पांम आंयल की चिकनाई को सोख लेता है और फिर सोयाबीन की पिसाई होती है, जिससे चिकना पदार्थ तेल तथा आटा अलग अलग हो जाता है, आटा से सोया मंगोडी बनाई जाती है!
आप चाहें तो किसी भी तेल निकालने वाले के सोयाबीन ले जा कर, उससे तेल निकालने के लिए कहे!महनताना वह एक लाख रुपये भी देने पर तेल नही निकालेगा, क्योंकि. सोयाबीन का आटा बनता है, तेल नही!
फॉर्च्यून.. अर्थात.. आप के और आप के परिवार के फ्यूचर का अंत करने वाला.
सफोला... अर्थात.. सांप के बच्चे को सफोला कहते हैं!
*5 वर्ष खाने के बाद शरीर जहरीला
10 वर्ष के बाद.. सफोला (सांप का बच्चा अब सांप बन गया है.
*15 साल बाद.. मृत्यु... यानी कि सफोला अब अजगर बन गया है और वह अब आप को निगल जायगा.!*

*पहले के व्यक्ति 90.. 100 वर्ष की उम्र में मरते थे तो उनको मोक्ष की प्राप्ति होती थी, क्योंकि.उनकी सभी इच्छाए पूर्ण हो जाती थी।*

*और आज... अचानक हार्ट अटैक आया और कुछ ही देर में मर गया....?*
*उसने तो कल के लिए बहुत से सपने देखें है, और अचानक मृत्यु..?*
अधुरी इच्छाओं से मरने के कारण.. प्रेत योनी मे भटकता है।

*राम नही किसी को मारता.... न ही यह राम का काम!*
*अपने आप ही मर जाते हैं.... कर कर खोटे काम!!*
गलत खान पान के कारण, अकाल मृत्यु हो जाती है!

*सकल पदार्थ है जग माही..!*
*कर्म हीन नर पावत नाही..!!*
अच्छी वस्तुओं का भोग,.. कर्म हीन, व आलसी व्यक्ति संसार की श्रेष्ठ वस्तुओं का सेवन नहीं कर सकता!

*तन मन धन और आत्मा की तृप्ति के लिए सिर्फ ओलीव आयल ,राइस ब्रान , कच्ची घाणी का तेल, तिल सरसों, मुमफली, नारियल, बादाम आदि का तेल ही इस्तेमाल करना चाहिए!* पोस्टीक वर्धक और शरीर को निरोग रखने वाला सिर्फ कच्ची घाणी का निकाला हुआ तेल ही इस्तेमाल करना चाहिए!
आज कल सभी कम्पनी.. अपने प्रोडक्ट पर कच्ची घाणी का तेल ही लिखती हैं!
वह बिल्कुल झूठ है.. सरासर धोखा है!
कच्ची घाणी का मतलब है कि,, लकड़ी की बनी हुई, औखली और लकडी का ही मुसल होना चाहिए! लोहे का घर्षण नहीं होना चाहिए. इसे कहते हैं.. कच्ची घाणी.
जिसको बैल के द्वारा चलाया जाता हो!
आजकल बैल की जगह मोटर लगा दी गई है!
लेकिन मोटर भी बैल की गती जितनी ही चले!
लोहे की बड़ी बड़ी सपेलर (मशिने) उनका बेलन लाखों की गती से चलता है जिससे तेल के सभी पोस्टीक तत्व नष्ट हो जाते हैं और वे लिखते हैं.. कच्ची घाणी...
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सोमवार, 28 सितंबर 2020

USA के ह्वाइट हाउस मे अब्रह्मिक पंथों के बीच एकता स्थापित करने के Abraham Accords संधि


 

संपूर्ण जगत में मानव निर्मित व्यवस्था को सुचारु संचालन के लिए दो रास्ते एक धर्म सता एक राजसत्ता आज पूरी दुनिया के हजारों साल की उस राज सत्ता की व्यवस्था करीब-करीब अंतिम सांसे ले रही हैं और धर्म सत्ता पर भी खतरे की घंटी बज रही है हजारों सालों से मूल धर्म सनातन  (ब्राहमिक उपासक संस्कृति) को तहस नहस करने का के लिए कई बौद्धिक षड्यंत्र आज के नर पिशाचों (अब्राहमिक) यहूदी इस्लाम और इसाईयों द्वारा चलाये जा रहे हैं
 15 September,2020 को US President Donald Trump, Israeli PM Benjamin Netanyahu, Bahrain Foreign Minister Abdullatif al-Zayani और UAE Foreign Minister Abdullah bin Zayed Al-Nahyan ने White House में Abraham Accords पर हस्ताक्षर किए थे।
■ इस संधि का नाम Abraham – अब्रह्म क्यों है?
वास्तव में अब्रह्म- Abraham को यहूदी,ईसाईयत और इस्लाम इन तीनों पंथों के जन्मदाता के रूप में देखा जाता है। इन तीनों ही पंथों की जड़ें अब्रह्म से जुड़ी है। इन तीनो पंथों में बहुत सारी वैचारिक समानताएँ है। इस संधि को अब्रह्मिक पंथों के बीच एकता स्थापित करने के लिए बनाया था अतः इसे Abraham Accords नाम दिया गया है।
आईये अब हम इस संधि पर विस्तृत अध्ययन करते हैं। इस संधि को करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? संधि से किसे लाभ होगा? किसे हानि होगी? इस संधि से भारत और विश्व पर क्या प्रभाव पड़ेंगे इत्यादि मुद्दों पर विस्तार से चर्चा आरंभ करते हैं।
■ Arabs-Israel के बीच Normalization की आवश्यकता क्यों पड़ी?
ऐसे तो अरब और इज़राइल के बीच Normalization के ढेरों कारण है।
★ The Iran  Factor
● आपने वह कहावत सुनी होगी “दुश्मन का दुश्मन,दोस्त होता है” यह कहावत दो पुराने दुश्मन अरब और इज़रायल को करीब लेकर आई है। जैसा कि आप सभी जानते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में Iran की महत्वाकांक्षाएँ काफी बढ़ रही है। ईरान Saudi Arabia को हटाकर स्वंय Islamic World का Leader बनना चाहता है। इसके लिए वो Middle East में Proxy Wars करवा रहा है, कभी Arab विरोधी आतंकी गुटों को समर्थन कर रहा है।

● पिछले वर्ष Iran ने सऊदी अरब के सबसे बड़े Oil Plant Abqaiq-Khurais में Drones के जरिए हमला किया था। इस हमले ने अरब देशों की सैन्य शक्ति और Technological Matters में पिछड़ेपन को Expose कर दिया था। अरब देशों को समझ में आ गया है कि अपनी संप्रभुता बनाए रखने और ईरान से लड़ने के लिए उन्हें एक मजबूत साथी की आवश्यकता है, और उन्हें साथी के तौर पर Israel मिल गया। इज़राइल Defence, Arms and Technology के मामलो में विश्व मे शीर्ष देशो में गिना जाता है।

★ Fear of Arab Spring 2.0

● Middle East-North Africa में सन 2011 में हुए Arab Spring के आंदोलनों ने पूरे Arab World को हिलाकर रख दिया था। लोकतंत्र और मानव अधिकारों को लेकर शुरू हुए Arab Spring की वजह से Tunisia, Egypt में सत्ता परिवर्तन हुआ तो वही Syria अंतहीन गृहयुद्ध की चपेट में आ गया। उस समय सऊदी अरब, बहरीन,क़तर,UAE में मानव अधिकारो और लोकतंत्र के लिए हिंसक प्रदर्शन हुए थे लेकिन इन देशों ने इन प्रदर्शनों को अमेरिका के आशीर्वाद से बल प्रयोग करके दबा दिया था और अपनी बादशाहत को बचाने में सफल हुए थे।
● Middle East के देशों को डर है अपने देशो में राजशाही व्यवस्था को चुनौती देने के लिए कि कहीं फिर से Arab Spring जैसा कोई आंदोलन खड़ा न हो जाए। Human Rights Violations में Middle East के देश अव्वल नंबर पर आते है बावजूद इसके EU और US स्थित एक भी Human Rights Organization Middle East के देशों के खिलाफ नही बोलता क्योंकि Arab देशो को America और European Union का भारी समर्थन प्राप्त है। अतः अरब देशों को अपनी Monarchies को बचाने के लिए USA-Israel के करीब आना पड़ रहा है। ये उनकी मजबूरी भी है। ये बात जगजाहिर है कि अरब देशों की बादशाहत अमेरिका के आशीर्वाद के कारण ही बची हुई है। अगर अरब देश अमेरिका के विरूद्ध जाते हैं तो Mossad-CIA FALSE FLAG OPERATIONS के जरिए अरब देशों में आसानी से तख़्तापलट करवाकर , वहाँ अपनी Puppet Government Establish कर सकते हैं। ये सीधे तौर पर BLACKMAILING है। अब्रह्म सन्धि के पीछे यह भी एक बड़ा कारण है।
★ Diversification of Economy
● Middle East के लगभग सभी देश अपनी आय के लिए सिर्फ Petroleum Oil and Natural Gas से होंनेवाली Income पर ही आधारित है। Corona Pandemic के कारण दुनिया भर में Oil-Gas की Demand में भारी गिरावट आई है। जिससे अरब देशों की आर्थिक स्थिति खराब होती जा रही है। अरब देशों ने अपने देशों में Human Resources,Education, Science and Technology, Engineering को Develop करने में किसी भी प्रकार का निवेश नहीं किया। अरब देश टेक्नोलॉजी के लिए US-EU और Labours के लिए India-Pakistan-Bangladesh पर निर्भर रहे। अरब देशों के राजाओं ने अपनी स्थानीय जनता को तेल गेस की कमाई से आलसी, कामचोर,हवसी, अय्याश बनाया और खुद भी Luxurious Lifestyle जीते रहे। लेकिन कोरोना वायरस ने अरब देशों की हेकड़ी निकालकर रख दी है।

● Arabs को अब समझ में आ गया है कि अर्थव्यवस्था सिर्फ Oil-Gas से मिलनेवाली Revenues के भरोसे नही चल सकती। इसके लिए अर्थव्यवस्था का वैविध्यपूर्ण/ Diversify करना आवश्यक है अन्यथा अरब देश भिखारी बन जाएंगे। छोटा सा देश होने के बावजूद Israel  विश्व में Science and Technology, Agriculture Technology, Medical Treatment, Defence System, Arms and Weapons,Tourism के क्षेत्रों ने शीर्ष स्थान रखता है। अरब देशों को अपने Survival के लिए Israeli Technology, Knowledge, Assistant की अत्यंत आवश्यकता है इसीलिए अरब देश अर्थव्यवस्था को Diversify करने के लिए भी Arabs-Israel एक साथ आ गए हैं।द
■ Abraham Accords से Arabs को होनेवाले लाभ
i) अरब देशों को Oil-Gas पर अपनी निर्भरता कम करनी है। इसके लिए उन्हें Science and Technology, Agriculture,Tourism, Health Sector में एक विशेषज्ञ की आवश्यकता है। Israel उपरोक्त सभी मामलों में विशेषज्ञता रखता है। अतः Arabs-Israel के साथ आने से Arabs अपनी Economies Diversify कर पाएँगे।ग
ii) अमेरिका भी खुलकर Arabs का साथ देगा क्योंकि फ़िलहाल Arabs देशों का Boycott US को रास नही आ रहा था। इस संधि से US-Israel-Arab Nexus बनेगा जिससे Turkey और Iran जैसे देशों को स्पष्ट संदेश जाएगा।

■ Abraham Accords से Israel को होनेवाले लाभ

i) वैश्विक स्तर पर Israel की स्वीकृति बढ़ेंगी क्योंकि अब तक Israel अपने ही पड़ोस में तिरस्कृत था, उसकी कोई स्वीकृति नही थी। कई मुस्लिम देश अपने पासपोर्ट पर “This passport is valid for all countries of the world except Israel.” लिखा करते थे। जिससे इज़राइल की छवि धूमिल होती थी लेकिन इस संधि से इजराइल की छवि में सकारात्मक सुधार होगा। जिससे उसे काफी लाभ होगा।

ii) Israel की Defence, Science & Technology, Arms- Weapons Industry, Healthcare, Tourism, Agriculture Technology अरबो डॉलर्स की है। इस संधि के बाद से अरब देशों और इज़राइल के नागरिकों के बीच व्यापारिक संबंध स्थापित होंगे। जिससे इज़रायली अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। साथ ही में Israel अरब देशों को अपनी टेक्नोलॉजी बेचकर भारी भरकम मुनाफ़ा कमा सकता है। इसी के साथ वर्षो से इज़राइल के खिलाफ चला रहा BDS Movement भी समाप्त होगा।

■ Palestinians को Abraham Accords से होनेवाले नुकसान

● इस संधि से फिलिस्तीन को कोई लाभ नही होगा अपितु उसे केवल नुकसान ही होगा। इस Deal से Arabs की Israel पर निर्भरता बढ़ेगी और अरब अपनी मजबूरियों के चलते खुलकर Anti Israel Stand नही ले पाएंगे। अतः Arabs की तरफ से फिलिस्तीनियों को कोई विशेष सहायता या समर्थन अब नही मिलेगा।

● Hamas-Turkey-Iran-Hezbollah ने Abraham Accords का विरोध किया है और Arabs – Israelis को इस Deal के लिए नुकसान उठाने की भी धमकी दी है अतः अब Israel और Arab देशो में Iran backed Proxies के हमले बढ़ेंगे लेकिन इससे Iran और उसकी Proxies को ही नुकसान होगा।

● इजराइल और पैलेस्टाइन का Two State Solution फ़िलहाल का मुद्दा फिलहाल चर्चा में रहेगा लेकिन समय के साथ Israel धीरे धीरे Palestine को Annex कर ही लेगा। अरब देश भी कुछ नहीं कर पाएंगे।

■ ये कथित Peace Deal कहीं Middle East और Arab World के लिए Piece Deal तो नहीं?

● Divide and Rule, Use and Throw, Back Stabbing करने में Israel- USA काफी बदनाम रहे हैं। MENA Affairs में गहराई से देखें तो लगता है कि ये समझौता लंबे अंतराल में अरब देशों में आपसी फूट डलवाकर उनका Balkanization ही करवाएगा। Israeli कभी ये नही चाहेंगे कि Arabs सशक्त बने क्योंकि ऐसा होने पर Israel को ही नुकसान होगा। अरब देशों के लिए ये एक प्रकार से Trojan Horse वाली परिस्थिति होगी। अपने लाभ के लिए Israel-US अरबो के बीच आपसी मतभेदों को बढ़ाकर उनमे फूट डलवा सकते है, Muslim World में Shia vs Sunni करवाकर Islamic World को Control करने की कोशिश कर सकते हैं। क्योंकि Arab-Israeli स्वार्थ के कारण एकदूसरे के साथ आ रहे है जिस दिन स्वार्थ और आवश्यकता खत्म हो जाएगी उस दिन इनकी दोस्ती भी दम तोड़ देगी। ध्यान से देखने पर पता चलता है कि यह Abraham Accords Plan Yinon और Ralph Peters के Plan का अमलीकरण ही है। अनेवाले समय मे आपको Middle East में कई अलगववादी आंदोलन देखने को मिल सकते है जैसे कि Kurdistan, South Yemen,Iranian Balochistan और अन्य

■ Abraham Accords से Turkey और Iran को होंनेवाले नुकसान

● Turkey- Iran दोनों ने अब्रह्म संधि का खुलकर कड़े शब्दों में विरोध किया था। दोनो ही देश अति महत्वाकांक्षी बन रहे हैं। दोनो को ही Muslim World का नेता बनना है। लेकिन दोनों देशों का यह Aggression ही उनके लिए नुकसानदेह साबित होगा। Iran- Turkey दोनो ही Proxies के जरिए Middle East North Africa में अपना आधिपत्य स्थापित करना चाहते हैं। इसके लिए वे आतंकी संगठनों को हथियार, पैसा और Logistics उपलब्ध करवा रहे हैं।

● तुर्की के Anti US, Anti NATO, Anti Israel Stand को रोकने के लिए अमेरिका जब चाहे तब Turkey को FATF में Black List करवा सकता है, World Bank, IMF से तुर्की को मिलनेवाली सहायता रुकवा सकता है। Turkey-Iran से अलगववादी Kurdistan आंदोलन को हवा दे सकता है। Economic Sanctions, Embargo का उपयोग करके Turkey और Iran दोनो की अर्थव्यवस्थाओ को तबाह कर सकता है। बहरहाल Iran पहले से ही FATF में BLACK LISTED है और उसकी आर्थिक स्थिति कमजोर होती जा रही है। अतः Turkey-Iran के Aggression से चिंता की कोई बात नहीं है। ये देश अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं।

■ Abraham Accords से Muslim Ummah (उम्मत-ए-मुस्लिमा) में विभाजन

● इस संधि से Islam को भारी नुकसान होगा। अब्रह्म सन्धि से इस्लाम कमजोर होगा। अब्रह्म संधि से Islamic Ummah की डींगे हाँकनेवालो की पोल खुल गई है। ये बात साबित हो चुकी है कि Ummat जैसा कुछ भी नहीं होता। इस Deal की वजह से Shia- Sunni में पहले से मौजूद दरार और बढ़ेगी। Muslim World में Shia Bloc और Sunni Bloc बनेंगे। MENA Region में Sectarian Violence बढ़ेगा। वहाँ पर Sects के नाम पर अलग देशो की मांगे उठेंगी। यही Israeli-US नीति है Divide and Rule.

■ Abraham Deal से भारत को होनेवाले लाभ

● इस Peace Deal से भारत को Directly कोई लाभ नहीं होंगे। लेकिन भारतवर्ष को Indirectly बहुत लाभ होंगे। सही मायनों में Israel-US के बाद सर्वाधिक लाभ भारत को ही होगा। भारत लंबे समय से Islamic Terrorism, Islamic Extremism से जूझ रहा है। इसकी जड़ें Middle East, ईरान और तुर्की से जुड़ी है। अतः जब स्वयं मिडल ईस्ट के देश अस्थिर होंगे। इनमे फूट पड़ेगी, इनका Balkanization होगा तब उनके द्वारा भारत मे Islamic Terrorism को होंनेवाली Funding कम होने लगेगी। Islamic Extremism भी समय के साथ कम होने लगेगा। वैसे भी अरब इज़राइल की दोस्ती से Muslims के बीच Identity Crisis खुलकर सामने आ गया है। इसका Long Term में गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ेगा।

शनिवार, 26 सितंबर 2020

वर्षा का पूर्वानुमान में चिड़ियों की भूमिका भारत की परंपरा में प्रकृति के साथ संमभाव की संस्कृति वही भारत की सरकारों ने विदेशी सोच और नीति से प्रकृति के साथ टकराव


छब्बीस को परबा, 27 को दूज, 28 को तीज… अपनी अंगुलियों पर तिथि गिनते-गिनते दद्दा अपने छोटे बेटे पर अचानक ही बरस पड़े – ‘क्यों रे तीज सर पे आ गई और गांव वालों को कोई होश नहीं है। गर्मी और बरखा का इंतजाम हर बरस का काम है; इन्द्र देवता पानी दें, तो कटोरा झाड़-पोंछ के तैयार रखना पड़ेगा कि नहीं? ये कोई पहली बार है क्या… पर देखो तो जैसे सबके सब भांग खा के सो रहे हैं; न राय, न मशविरा, न तैयारी, ऐसा अंधेर कब हुआ? सत्यानाश।Ó
दद्दा ने अपनी लाठी उठाई और चल पड़े गांव जगाने। उसी शाम गांव में बैठक हुई। हर साल की तरह तय हुआ – ‘अक्षया तृतीया के दिन हर घर में बेटियों को शर्बत पिलाया जाएगा। राहगीरों की खातिर जेठ अंत तक प्याऊ लगेगी। गांव के पांचों तालाबों की सफाई और मरम्मरत की शुरुआत होगी। खेत भी एक छोटा-मोटा तलाब ही है। सो, खेतों के मेड़ दुरुस्त करने होंगे। सबका इंतज़ाम होगा, तो गोरु-बछरू और चिडिय़ों की प्यास बुझेगी? उनका भी इंतजाम करना होगा। कौन-कौन क्या-क्या करेगा, इसकी जिम्मेदारी तय कर दी गयी।
तैयारी परम्परा
अवध के एक गांव में यह जो कुछ हुआ; भारत के हर इलाके में गर्मी और बारिश आने से पूर्व तैयारी करने की कमोबेश ऐसी ही पानी परम्परा है। पहले दद्दा थे, वे जगा देते थे। समुद्र ने मेघ देवता को भेजा है, हम सभी को पानी पिलाने। पानी अधिकतम साठ दिन बरसेगा। उसी से सालभर काम चलाना है। अगले साल समुद्र ने पानी नहीं भेजा तो उसके लिए भी धरती की तिज़ोरी में Óवाटर बैलेंसÓ सुरक्षित रखना है। एक साल नहीं भेजा तो अकाल, दो साल नहीं भेजा तो दुष्काल और तीन साल नहीं भेजा तो त्रिकाल। अकाल यानी पानी की कमी, दुष्काल यानी पानी और अन्न का संकट और त्रिकाल यानी पानी, अन्न और चारे.. तीनो का संकट अर्थात गऊमार अकाल। माता पर संकट तो संतान पर भी संकट।
त्रिकाल में भी जीवन पर संकट न आये; इसका इंतजाम रहे; हर बारिश में इतना पानी संजोना है। अपने उपयोग हेतु तालाब ऐसी जगह बनाना है, जहां धरती का पेट फटा न हो। ऐसी जगह बनाये तालाब में सालभर पानी रुका रहेगा। कुछ तालाब ऐसी जगह पर बनाने हैं, जहां धरती का पेट फटा हुआ हो। ऐसे तालाब का पानी बहुत जल्दी धरती की तिजोरी में सुरक्षित हो जायेगा। शेष पानी को समुद्र को वापस लौटाना है; तभी तो समुद्र अगले बरस पानी भेजेगा। समुद्र को पानी लौटाने का काम नदियों के जिम्मे है। नदी को अपनी बाढ़ से मिट्टी और भूजल का शोधन करना है। बाढ़ में साथ लाई गाद से मैदान और डेल्टा बनाने हैं। उन्हे शोधित कर उपजाऊ बनाना है। अत: नदियों को उनका काम करने देना है। भारत के पौराणिक ग्रंथ, महात्मा विदुर से लेकर ज्ञानी चाणक्य तक का ज्ञान उठाकर उठाकर देख लीजिए नदियों से छेड़छाड़ की अनुमति कभी किसी को नहीं दी गई। बुंदेलखण्ड की अर्धचन्द्राकार घाटी में नदियां भी कम हैं और भूमि के नीचे चट्टानी परत की वजह से धरती का पेट भी बेहद छोटा है। यहां ज्यादा तालाब बनाने पड़ेंगे। चारागाहों के लिए ज्यादा जगह छोडऩी पड़ेगी। कम पानी की संभावना हो, तो कम पानी की फसल और सिंचाई का तकनीक का चुनाव करना होगा। बुंदेलखण्ड की महत्ता धर्मक्षेत्र, वनक्षेत्र और साधना क्षेत्र के रूप में है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने अपने वनवास में बुंदेलखण्ड के चित्रकूट को इसी रूप में चुना। इसे इसी रूप संरक्षित और विकसित करना पड़ेगा। योगी श्री आदित्यनाथ जी परम्परा के निर्देश को समझें। बुदेलखण्ड में बड़े उद्योग ले जाने की गलती न करें।
खैर, गौरतलब है कि भारत के हर इलाके में मौजूद ऐसा लोकज्ञान पारम्परिक है। यह कागज़ी ग्रंथ की बजाय, श्रव्यशास्त्र बनकर एक पीढी़ से दूसरी पीढ़ी तक जाता था। कुण्ड, टांके, खेत तलाई, खड़ीन, चाल, खाल, आहर-पाइन..कहां क्या बनाना ठीक है; दद्दा सब जानता है और सब बताता है। दद्दा अनपढ़ भले ही हो, पानी के मामले में अज्ञानी कभी नहीं था। भारत की पानी परम्परा ने उसे कभी अज्ञानी रहने ही नहीं दिया। दद्दा अभी भी हैं, लेकिन उनकी कोई सुनता नहीं है। पहले दद्दा और बूढ़ी अम्मा ही ग्रामगुरु थे। पहले ग्रामगुरु का कहा राजा भी मानता था। जैसलमेर का राजा भी घड़ीसर के तालाब की गाद निकासी के काम में सम्मिलित होता था। जलसंकट आये, तो जनक जैसा राजा भी हल-बैल लेकर खेत में उतर जाता था। अब सरकार है। नेता, अफसर, ठेकेदार, कर्जदाता और बाज़ार का गठजोड़ है। तब राजा जनता के और ऋषि प्रकृति के प्रतिनिधि थे। अब प्रधान, विधायक, सांसद, वैज्ञानिक… सब के सब बाज़ार के प्रतिनिधि होते जा रहे मालूम होते हें। वे कहते हैं कि कोई कुछ मत करो; सरकार सभी के पानी का इंतज़ाम करेगी; बाज़ार करेगा। दुर्योग से सुश्री उमाजी भी यही कह रही हैं। वह बुंदेलखण्ड में केन-बेतवा को जोडऩे की जिद्द कर रही हैं। वह भूल गई हैं कि भारत की पानी मंत्री होने के साथ-साथ एक साध्वी के रूप में भारतीय देशज ज्ञान, परम्परा और संस्कार की प्रतिनिधि भी हैं।

सगुन परम्परा
पानी परम्परा के इलाकाई ज्ञान की दृष्टि से भारत में 500 से ज्यादा भू-सांस्कृतिक क्षेत्रों में बांटा जा सकता है। इन्हे देशज भाषा में ‘देसÓ कहा जाता था। हर देस के अपने-अपने घाघ, भड्डरी, भोपा और भगत थे। आषाढ़ से लेकर भादों तक बारिश कैसी होगी; इसका सगुन फागुन में ही ले लिया जाता था। राजस्थान, गुजरात जैसे कम पानी के इलाकों में सगुन देखने का काम सालभर होता था। अपने समय पर खेजड़ी यानी शमी वृक्ष समय से पुष्पित, पल्लवित और फलित हो। कैर यानी टेंटी में समय से फल आये, तो इस बार जमाना होगा। जमाना यानी अच्छी बारिश। लेकिन जून शुरु में सुबह-सुबह ठण्डी पछुवा हवा चलने लगे, तो सुगुन लेने वाले मारवाड़ी देशजों का माथा ठनक जाता था। वे सभी लक्षण सामने रख पुन: सगुन लेते थे। कब चांद उगा, कैसा उगा, कब छिपा ? कौन सा नक्षत्र कब उगा, कब छिपा ? कैर की झाड़ी पुन: पुष्पित होकर यदि जुलाई माह में पुन: फलित होने लगी, तो मारवाड़ी देशज सावधान कर देते थे – भाई लोगो, अब जमाना नहीं होगा यानी अच्छी बारिश नहीं होगी।
बचपन में एक कविता पढ़ी थी – यह कदम्ब का पेड़ अगर मां होता यमुना तीरे..। महाकवि रसखान ने भी पक्षी के रूप में जगत में वापसी की स्थिति में कदम्ब के पेड़ पर वास की इच्छा जाहिर की है। गौरतलब है कदम्ब की छांव, कृष्ण के बालपन की छत्र है। स्वर्गीय श्री अरुण कुमार पानी बाबा ने अपनी पुस्तक ‘भारत का जल धमÓ में श्रीमद्भागवत पुराण में पानी परम्पराओं का उल्लेख करते हुए ब्रजक्षेत्र में कदम्ब की पारिस्थितिकी को सामने रखा है। भरतपुर के घना को कदम्ब की पारिस्थिति का प्रतीक और स्मृति चिन्ह बताया है।
उन्होने वर्षा के पुर्वानुमान की पारम्परिक तकनीक की दृष्टि से उल्लेख किया है कि कदम्ब में विशेष तौर पर कौवे वास करते हैं। कौवों का प्रजनन काल सामान्यत: चैत्र-बैसाख यानी मार्च-अप्रैल में माना जाता है। यूं तो माना जाता है कि कौवे अपना घोसला बनाते ही नहीं। किंतु इसमें उल्लेख है कि कौवे कदम्ब पर घोसला बनाते थे। घोसला यदि कदम्ब के शिखर पर बनाया हो, तो समझा जाता था कि उस वर्ष मामूली बारिश होगी। शिखर से थोड़ा नीचे घोसला बनाये तो सामान्य वर्षा होगी। यदि दो डालों के बीच में सुरक्षित कोटर ढूंढकर घोसला बनाया गया हो तो इसका मतलब है कि उस साल सामान्य से अधिक वर्षा होगी और आंधी-तूफान भी आयेंगे। ऐसे ही बताया गया कि सारस अंडे दे और बिना सेये छोड़कर अन्यत्र उड़ जाये, तो समझो कि अकाल आयेगा।
अलग-अलग इलाकों के घाघ, भगत, भोपा और भड्डरियों के पास सगुन देखने के ऐसे अलग-अलग आधार थे। अलग इलाकों के अलग पंचांग थे। अब एक मौसम विभाग है। अपनी स्थापना से लेकर 2010 तक जिसका वर्षा अनुमान कभी भरोसेमंद नहीं रहा। पिछले छह-सात वर्षों से उसकी आधुनिक तकनीकी क्षमता पर कुछ भरोसा होना शुरु हुआ था, तो इस बार इसने पिछले तीन माह में तीन बार अनुमान बदले। पहले सामान्य से कम वर्षा, फिर सामान्य वर्षा और अब सामान्य से अधिक वर्षा का अनुमान पेश किया। उसकी क्षमता अभी सगुन दृष्टाओं से पीछे ही है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग को अभी और अधिक दूरदृष्टि हासिल करनी होगी।

सदुपयोग परम्परा
वर्षा, वृक्ष, कृषि, स्थानीय व्यंजन और जीवनशैली के अंतर्संबंध जगजाहिर हैं। अंतर्संबंध की दृष्टि से इस बारे में भी भारतीय परम्पराओं की सीख स्पष्ट है। जिन खेतों में खर-पतवार ज्यादा हों, बारिश आने से पहले उन्हे जोतकर सूखने के लिए खुला छोड़ देने की परम्परा है। जिन नमक बढऩे से जो खेत ऊसर हो गये हों, उनका नमक निकालने का काम भी बारिश पहले ही करना है। जहां कम पानी बरसे, वहां मोटा अनाज बोने और ज्यादा मवेशी रखने की परम्परा है। कम पानी वाले इलाकों में साग-भाजी से ज्यादा घी, दूध और छाछ के साथ रोटी खाने की परम्परा है। जहां ज्यादा पानी बरसे, वहां ज्यादा भात खाने की परम्परा है। और देखिए, जहां भरपूर पानी होता है, वहां एक हथेली की अंजुली बनाकर पानी पीने की परम्परा है। जहां सामान्य पानी बरसे, उन इलाकों में दोनो हथेलियों की दोना बनाकर पानी पीने की परम्परा है। जहां कम पानी बरसता है, वहां लुटिया को बिना जूठा किए सीधे मुंह में पानी गटकने की परम्परा है। कम पानी वाले इलाकों में आप देखेंगे कि चार-पांच जन एक साथ बैठकर एक ही बर्तन में खाने की परम्परा है। भरपूर पानी वाले इलाकों में एक बर्तन में दूसरा खाये-पीये, तो जूठा मानते हैं। पानी संकट वाले इलाकों में सभी वर्णों की औरतें खेतों में काम करती हैं। पानी की ज्यादा उपलब्धता वाले इलाकों में सिर्फ शूद्र वर्ण की औरतों को काम के लिए खेत में भेजने की परम्परा रही है।

धराड़ी परम्परा
राजपूताना, बरखा के पानी को संचित करने में पेड़ का महत्व जानता था। राजपूताना यानी वर्तमान राजस्थान। राजपूताने ने पेड़ की रक्षा के लिए ‘धराड़ी परम्पराÓ बनाई। इसे कुलगोत्र से जोड़ा। अलग-अलग गोत्र की अलग-अलग धराड़ी। जिस गोत्र की जो धराड़ी मान ली गई, उस गोत्र का व्यक्ति अपने प्राण देकर भी धराड़ी की रक्षा करे। परम्परा का यही निर्देश था। हर मान्यता के पीछे कोई कथानक है। पूछा तो मालूम हुआ कि पोसवाल, जोठवाल, जाड़वाल, ऊंचवाल और पांचाल गोत्र की कदम्ब, कसाना गोत्र की कदम्ब, डाब और बरगद, डोई और कोली गोत्र की बरगद, दडग़स गोत्र की धराड़ी – बेलपत्र और कोली गोत्र की रोहेड़ा है। उपाध्याय गोत्र की धराड़ी – नीम, भारद्वाज, वत्स, जोजादिया और बेनीवाल गोत्र की धराड़ी – पीपल, मीणा और चैहानों की धराड़ी – अशोक, सिसोदिया राजपूतों की खेजड़ी, मेवाल मीणाओं की कदम्ब और उदासीन संप्रदाय के साधुओं की धराड़ी – चिनार है।

धन्यवाद परम्परा
अब जरा पेंसिल उठाइये और निशान लगाइये कि उक्त परम्पराओं में से कोई एक परम्परा ऐसी है, जिसका बरखा से रिश्ता न हो? दरअसल, भारत की पानी परम्परायें, कोई अनसमझी, अनजानी हरकतें नहीं थीं; वे सभी सदियों के अनुभव के जांचा-परखा ऐसा पानी प्रबंधन थीं, जो मेघ, पवन, सूर्य को भी समझती थीं और नदी, समुद्र व धरती के पेट को भी। भारतीय पानी परम्पराओं को सूक्ष्म जीव व वनस्पतियों की भूमिका का भी ज्ञान तथा ध्यान था। इसीलिए भारतीय परम्परा ने पंचतत्वों में हर तत्व को दैविक शक्ति मानकर पूजा। परम्परा जानती थी कि पंचतत्वों से निर्मित होने वाले जीवों का पंचतत्वों से संपर्क बने रहना जरूरी है। इसीलिए हमारे ऋषियों ने प्रकृति से ज्यादा से ज्यादा नजदीक रखने वाली जीवनशैली को सर्वोत्तम माना और उसे अपनाया।
ज्ञानी होना, किसी के अच्छा होने की गारंटी नहीं हो जाता। ज्ञान, कभी-कभी अहंकार को भी जन्म देता है। किंतु पानी के परम्परागत ज्ञानी अहंकारी नहीं थे। वे जानते थे कि तिब्बत का जल अमृत है। तिब्बत का पानी, वर्तमान एशिया के 11 देशों के अनेक इलाकों को समृद्ध करता है; लिहाजा, उन्होनेे तिब्बत स्थित कैलाश के नाथ का धन्यवाद करने के लिए अपने जीवन में कम से कम एक बार अवश्य जाने की विनम्र परम्परा बनाई।

निवेदन परम्परा
बहुत संभव है कि इस नये कालखण्ड में कई पुरानी पानी परम्पराओं ने अपना महत्व खो दिया हो; फिर भी मेरा निवेदन है कि वर्तमान में महत्वपूर्ण पानी-परम्पराओं को लिपिबद्ध कर समाज तक पहुंचाये और उसे अपनाने को प्रेरित करें। क्यों ? क्योंकि भारत के पानी प्रबंधन को शासन आधारित अथवा केन्द्रीकृत होने की बजाय, विकेन्द्रित और लोकपहल पर आधारित बनाने की आज काफी ज्यादा ज़रूरत महसूस हो रही है। इस दृष्टि से भी पानी परम्पराओं को ज्ञानसरोवर अथवा भारतीय धरोहर के रूप सहेजना और प्रचार में लाना ज्यादा जरूरी है। कृपया करें। यह निवेदन कर मैं भी समय पूर्व चेत जाने की भारतीय परम्परा का ही निर्वाहन कर रहा हूं; आप भी करें।
 भारतीय धरोहर व अरुण तिवारी और कई अन्य विद्वानों से संकलित

गुरुवार, 24 सितंबर 2020

भारत को सांस्कृतिक आर्थिक और नैतिक समृद्धि का आधार ग्राम्य व्यवस्था

 

 अंग्रेजों के आने से पहले भारतीय अर्थव्यवस्था दो हिस्सों में बांटी जा सकती है:-1.नगरीय अर्थव्यवस्था  2.ग्रामीण अर्थव्यवस्था

सिंधु घाटी सभ्यता का अद्भुत और अनोखा इतिहास बताता है कि विश्व में सबसे पहले नगरीय व्यवस्था का विकास भारत में हुआ। और ये व्यवस्था बहुत सुव्यवस्थित थी।
जिन अंग्रेजों ने भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर अध्ययन किया है व जिन अंग्रेजों ने इसका सत्यानाश किया है,उनके आधार पर इसे समझते हैं।इनमें एक अंग्रेज इतिहासकार लिखता है "भारत के गांवों में केवल एक चीज बाहर से आती है वो है नमक"।अर्थात अन्य सभी बुनियादी चीजें गाँव से नगर में निर्यात होती थी।यानि नगरीय व्यवस्था,ग्रामीण व्यवस्था पर निर्भर थी। एक इतिहासकार ने बड़ी मेहनत से सूचि बनाई की गांव में कितने तरह के उत्पादन होते हैं,तो आप हैरान होंगे सुनकर कि भारत के अधिकांश गाँवों में 2000 से भी अधिक वस्तुएं पैदा हुआ करती थी।और लगभग साढ़े सात लाख गाँव थे। कपास/रेशम से सूत,सूत से कपड़ा बनता था और बाजारों में बिकता था।दाल ,गेहूँ,चावल इत्यादि ग्रामीणों को तो पर्याप्त थे ही ,नगरवासियों की भी जरुरत पूरी होती थी।भारत के गाँवों की खदानों से लगभग 90 तरह के खनिज निकलते है। जंगल गांव की सम्पति थी  जहाँ फल-फूल व अनेकों औषधियाँ दुनियाभर के बाजारों में बिकती थी।सब वस्तुएं के विस्तार में जाएंगे तो यह सिलसिला बहुत देर तक चलेगा। इसके अतिरिक्त गांवों में कारीगरों की भरमार थी। लोहे का काम करने वाले लुहार ,सोने का काम करने वाले सुनार,कपड़े को बुनने वाले बुनकर,रुई को सूत बनाने वाले धुनकर,तैल निकालने वाले तेली,लकड़ी का काम करने वाले बढई... ऐसे 18 किस्म के कारीगर तो सब गाँवों में होते थे।वस्तु के बदले वस्तु यानि वस्तु-विनिमय होता था।कोई मोची है तो दूसरे को जूती बनाकर दे देगा और अनाज वगेरा ले लेगा,कोई सुनार है वो किसी की पत्नी को गहने दे देगा और बदले में कुछ ले लेगा। इस प्रकार कर्म चलता था और इस वस्तु-विनिमय की सबसे बड़ी खाशियत यह थी की हर व्यक्ति के पास हर चीजें होती थी।

न्याय व्यवस्था पंचायत आधारित थी। झगड़ा जितना बड़ा होता पंचायत उतने  ही ज्यादा गाँव साथ बैठकर करते।जयपुर के निकट एक गांव बस्सी का इतिहास पढ़ने से पता चला की एक हत्या के मामले की सुनवाई २० दिन चली थी। अर्थात गंभीर मामलों को पूरी गंभीरता से लिया जाता था।पंचायत लगती थी मंदिर में। जहाँ सरपंच धर्म की गद्दी पर बैठकर भगवान को साक्षी मानकर न्याय देते। गजब बात ये थी की पंचायत के लगभग 99 फीसदीफैसलों से वादी भी संतुष्ट होता और प्रतिवादी भी।क्योंकी न्याय देने वाला धर्म की कसम खाकर धर्म के आधार पर न्याय करता था।यह वो धर्म नहीं जो कर्म काण्ड वाला ,बल्कि वह धर्म जो आचरण में उतारा जा सके।वो धर्म जो महऋषि दयानन्द सरस्वती जी ने बताया था।

लगभग हर गांव में एक वैद्य होता था और हर पाँच गाँव में एक सर्जन होता था। और सर्जन ऐसा जो गंभीर से गंभीर सर्जरी करदे।हाथ कट गया हो या कोई अन्य अंग ,शरीर कहीं से जल गया हो ,खराब हो गया हो -सबका इलाज। हड्डी जोड़ने वाले हाड़-वैद्य हुआ करते थे। माताएं गर्भवती माँ को बच्चा इतनी आसानी से जन्मा देती जितना आज भी सरल नहीं। अंग्रेज लैंकेस्टर जिसने भारतीय शिक्षा व चिकित्सा व्यवस्था पर अध्ययन किया कहता है कि इतनी अच्छी और सुव्यवस्थित व्यवस्था देखकर हम अभिभूत हैं-जो पूरी तरह निःशुल्क भी है। वैद्य जी की जीविका चलाने हेतु हर कोई स्वेच्छा से मदद करता था। हमारे यहाँ भारत में कहा गया है कि चिकित्सक,गुरु व बेटी के घर जाओ तो कभी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए।

कम से कम एक गुरुकुल तो हर गाँव में होता ही था।आज से तुलना करें तो 7 लाख से ज्यादा ऐसे गुरुकुल थे जिनमें 12वीं तक की शिक्षा दी जाती थी। उच्च शिक्षा हेतु तक़रीबन 14 हजार केंद्र थे। और साक्षरता दर 97% थी पुरे भारत में। कुछ अंग्रेज इतिहासकार लिखते है कि हमारे यहाँ तो पहला स्कूल 1868 में शुरू हुआ लंदन में भारत में तो हजारों साल पहले से 732000 से ज्यादा स्कूल चल रहे हैं। और इन गुरुकुलों में वेद और शास्त्रों की अनिवार्यता के साथ ऐस्ट्रो-फिजिक्स,ऐस्ट्रोनोमी,मेटलर्जी जैसे 18 मुख्य विषय पढ़ाए जाते थे।

दूध,दही,मखन,घी और छाछ इतना होता था कि लोग पानी की जरुरत भी इन्हीं से पूरी करते थे।और ये सब बेचा नहीं जाता था,बाकी तो हमारे गांव में बिकना शुरू हो गया पर दही व छाछ अब भी अधिक होने पर पड़ोसियों में बाँट दी जाती है।उसके बाद भी बच जाए तो जानवरों को दे दिया जाता था।
भारत में श्रम/मेहनत/परिश्रम हमेशा से अनमोल रहा। श्रम का विभाजन इस तरह से था कि जो काम कोई व्यक्ति अकेले स्तर पर कर सकता है वह वो खुद करता और जिसके लिए श्रमिकों की आवश्यकता होती तो गाँव के सभी जन सहायता करने को तैयार रहते।ऐसे ही उनको जरुरत होती तो वह व्यक्ति उनकी मदद करता।यही कारण था कि भारत का प्रत्येक घर बिना श्रम-लागत के बना।

सब स्वदेशी/स्वावलम्बी तो थे ही ईज्जत और हैसियत सबकी बराबर थी। सम्मान सबका बराबर था। छोटे से छोटे कारीगर का भी वही ईज्जत-सत्कार था जो सुनार का या अन्य का था। इसका एक उदाहरण है बच्चे के जन्म पर होने वाले संस्कार। जैसे सुनार आया,बच्चे के कान में सोने की बाली डाल गया,सबने उसका सम्मान किया। शहद बनाने वाले ने एक बून्द मंगलकामनाओं से बच्चे की जीभ पर डाली,सबने उसका सम्मान किया। मोची आएगा उसके जूते दे गया ,सबने उसका सम्मान किया।यहाँ तक वर्तमान में सबसे उपेक्षित व पिछड़े माने जाने वाले हिजड़ों के सम्मान हेतु ,बच्चा जन्मते ही सबसे पहले उनकी गोद में दिया जाता था। विवाह के सबसे मुख्य संस्कार ,यानि मंगलसूत्र को हिजड़े,वेश्या या गणिकाओं के घर भेजकर ,उनके घर से  माटी लगाकर,वधु के गले में डाला जाता था।एक और तबका जिनका शोषण हुआ -डोम,डोम्ब या डोमा जो लाश को जलाते थे। तो किसी भी मर्ग पर ये मिट्टी की हाण्डी लेकर सबसे आगे चलते बाकी सब इनके पीछे अर्थी लेकर।अग्नि देने का कार्य तो पुत्र-पुत्रियाँ करती ,पर केवल डोम उनके बराबर खड़ा होकर सम्पूर्ण कार्य करवाता था। इसी प्रकार हर किसी का सहयोग व सहभागिता जन्म से मृत्यु तक हर छोटी से बड़ी घटना में होती थी।अंग्रेजों के आने से पहले भारत में जो 565 जो रियासतें रही ,उनमें से 70 से ज्यादा रियासतों के राजा डोम थे।कहीं तैली थे ,कहीं धुनकर,कहीं बुनकर।तो ये काम के आधार पर बनी जातियां के आधार जन्म पर थी इसपर भी कोई ग़लतफ़हमी में मत रहिएगा।ये तो यह सामाजिक वर्गीकरण था। अंग्रेजों के षड्यंत्र व कुछ स्वार्थी लोगों के भेदभाव व पक्षपात रवैया इस दुर्दशा का कारण है।
आज आवश्यकता है कि हम आवश्यक बदलावों के साथ अपनी उसी स्वावलम्बी व्यवस्था को वापिस लाएं। और भारत को फिरसे 'सोने का शेर' बनाएं।
और जिसने सम्पूर्ण जीवन राष्ट्रहित को समर्पित कर हमारा सोया हुआ स्वाभिमान जगाया उस अमर शहीद भाई राजीव दीक्षित जी के गुरु आदरणीय रविंद्र शर्मा गुरु जी के सपनों को यथार्थ की धरातल पर उतारता यह राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान के  सहभागी बने  9336919081 पर केवल whatsap करें।धन्यबाद

बुधवार, 23 सितंबर 2020

बैचलर ऑफ आर्ट एंड मास्टर ऑफ आर्ट के बाद भी विभिन्न कला केंद्र बने जिहादी केंद्र


  



 भारतीय सनातन परंपरा नसिर्फ जीवन के आर्थिक पक्ष को ही पूर्ण मानती है बल्कि जीवन की प्रत्येक क्षेत्र में एक अनुपम संगम इस सामाजिक जीवन में भी देखने मिलता था इसमें कला का एक बड़ा महत्व होता था  इसलिए शिक्षा में भी जो डिग्री BAया MA मिलती जिसे अंग्रेजों ने क्लास में बैठा कर देना शुरु कर दिया था जिसेमें कला का बड़ा  महत्व  को अंग्रेज भी नहीं नकार पाए थे पर कला के व्यवहारिक पक्षों से दूर कर दिया ।

  अंग्रेजो पुरी शिक्षा को इसाई और इस्लामिक संस्कृति की तरफ मोड़ दिया रही कसर तो आजादी के बाद इन काले अंग्रेजों ने भी वहीं राह पकड़ ली और देश का सांस्कृतिक चेतना का पतन आज चारों तरफ दिखाई दे रहा है। 

सन 1948 में भारत के चार पेंटर मिलकर एक ग्रुप बनाते हैं...प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप (PAG)।
शुजा, रजा, हैदर और फिदा। और इत्तेफाक देखिए....चारों मुसलमान। वैसे कला का कोई धर्म नहीं होता...आमफहम जुमला।

देखते-देखते पैग आधुनिक भारतीय कला का परचम बन गया। बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट, महाराष्ट्र स्कूल ऑफ आर्ट, कांगड़ा स्कूल ऑफ आर्ट, ओडिसा की पटुआ कला, राजस्थान की चित्रकला...अनगिनत भारतीय कला की धाराएं नेपथ्य में चली गईं। खत्म सी ही हो गई।
आज की युवा पीढ़ी में से ऐसे कितने हैं जो यामिनी राय, नन्दलाल बसु, डॉ आनन्द कुमार स्वामी, गणेश पाइन, विवान सुंदरम, यशवंत होलकर, विकास भट्टाचार्य जैसे बेशुमार नामों से, उनके काम से परिचित हैं ? या कभी सुना भी है ?

आज शायद ही इन भारतीय स्कूल्स की कला की खूबियों और इनके चितेरों के नाम हम भारतीयों की स्मृतियों में हों। जैसे-तैसे जीवित भले हैं, पर वैश्विक क्या राष्ट्रीय स्तर की कला में कहीं कोई जगह नहीं। कोई सम्मान या पहचान नहीं।

संभव है, कला जगत की व्यावसायिकता से अनजान नादान मित्र मधुबनी पेंटिंग का नाम लें...ऐसे मित्रों से एक छोटी सी जानकारी साझा कर लूं..पेरिस में जब मॉर्डन पेंटिंग प्रदर्शनी में पिकासो और डॉली के समानांतर एशियन पेंटर्स की कृति लगाने की बारी आई तो भारत से सिर्फ एक नाम चुना गया...मकबूल फिदा हुसैन का।

मित्रों की जानकारी के लिए यह भी बता दूं...इंदौर से निकला फिदा शुरुआत में कोलकाता में फ़िल्म के होर्डिंग पेंट किया करते थे।

पेंटिंग, सोने से भी बड़ा निवेश का क्षेत्र है। जैसे आमजन सोने से अपनी समृद्धि तौलते हैं...वैसे संसार का सबसे धनाढ्य समाज दुर्लभ पेंटिंग में निवेश करता है। सन 1990 में फिदा का यह हाल था, यदि मुंह में पान की पीक भरके कनवास पर थूक दे तो जहां तक छींटे जाए, 5000 ₹ प्रति स्कावयर इंच पेंटिंग की प्राइस लगती थी। वह भी न्यूनतम बता रहा हूँ।

खैर मूल मुद्दा है, क्या पैग के पेंटर अपनी खूबियों से वैश्विक पटल पर छा गए ? क्या भारत के तमाम "स्कूल ऑफ आर्ट्स" वैश्विक योग्यता नहीं रखते थे ? तो दोनों सवालों पर अपन कहेंगे...नहीं पता। क्योंकि यह कलाजगत की अंतहीन बहस का विषय है।

पर एक बात जरूर जानता हूँ...पैग जैसे ग्रुप को नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी सरीखे राजनेताओं और टाटा जैसे उद्योगपतियों ने खूब संरक्षण दिया। बाकी किसी को नहीं। यह दीगर है, दिवंगत ललित नारायण मिश्र ने मधुबनी को एक पहचान दिलाई। लेकिन इसे कला के विशाल सागर में एक नन्ही सी बूंद ही समझिए।

संस्कृति और सभ्यता के संघर्ष का पटल बहुत व्यापक होता है मित्रों। आप जब धर्म-धर्म की हुंकार लगाते हैं तो मेरी नजर खोखली बुनियाद पर रहती है। निष्क्रिय समाज पर रहती है।

वामपन्थ ने सिर्फ जीवन या राजसत्ता को ही नहीं, रचनाधर्मिता के हर क्षेत्र को प्रभावित किया है। आपकी तमाम बालसुलभ कल्पनाओं से भी परे जाकर...तमाम मानक ही बदल डाले। फिलहाल तो हम कहीं हैं ही नहीं।

मंगलवार, 22 सितंबर 2020

ब्रह्मणों की गोत्र शाखा और उनके देवता



 
 

ब्राह्मणों के शाखा-सूत्र एवं देवता...
सरयूपारीण ब्राहमणों के मुख्य गाँव :

गर्ग (शुक्ल- वंश)

गर्ग ऋषि के तेरह लडके बताये जाते है जिन्हें गर्ग गोत्रीय, पंच प्रवरीय, शुक्ल बंशज कहा जाता है जो तेरह गांवों में बिभक्त हों गये थे| गांवों के नाम कुछ इस प्रकार है|

(१) मामखोर (२) खखाइज खोर (३) भेंडी (४) बकरूआं (५) अकोलियाँ (६) भरवलियाँ (७) कनइल (८) मोढीफेकरा (९) मल्हीयन (१०) महसों (११) महुलियार (१२) बुद्धहट (१३) इसमे चार गाँव का नाम आता है लखनौरा, मुंजीयड, भांदी, और नौवागाँव| ये सारे गाँव लगभग गोरखपुर, देवरियां और बस्ती में आज भी पाए जाते हैं|

उपगर्ग (शुक्ल-वंश)

उपगर्ग के छ: गाँव जो गर्ग ऋषि के अनुकरणीय थे कुछ इस प्रकार से हैं|

बरवां (२) चांदां (३) पिछौरां (४) कड़जहीं (५) सेदापार (६) दिक्षापार

यही मूलत: गाँव है जहाँ से शुक्ल बंश का उदय माना जाता है यहीं से लोग अन्यत्र भी जाकर शुक्ल बंश का उत्थान कर रहें हैं यें सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं|

गौतम (मिश्र-वंश)

गौतम ऋषि के छ: पुत्र बताये जातें हैं जो इन छ: गांवों के वाशी थे|

(१) चंचाई (२) मधुबनी (३) चंपा (४) चंपारण (५) विडरा (६) भटीयारी

इन्ही छ: गांवों से गौतम गोत्रीय, त्रिप्रवरीय मिश्र वंश का उदय हुआ है, यहीं से अन्यत्र भी पलायन हुआ है ये सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं|

उप गौतम (मिश्र-वंश)

उप गौतम यानि गौतम के अनुकारक छ: गाँव इस प्रकार से हैं|

(१) कालीडीहा (२) बहुडीह (३) वालेडीहा (४) भभयां (५) पतनाड़े (६) कपीसा

इन गांवों से उप गौतम की उत्पत्ति मानी जाति है|

वत्स गोत्र ( मिश्र- वंश)

वत्स ऋषि के नौ पुत्र माने जाते हैं जो इन नौ गांवों में निवास करते थे|

(१) गाना (२) पयासी (३) हरियैया (४) नगहरा (५) अघइला (६) सेखुई (७) पीडहरा (८) राढ़ी (९) मकहडा

बताया जाता है की इनके वहा पांति का प्रचलन था अतएव इनको तीन के समकक्ष माना जाता है|

कौशिक गोत्र (मिश्र-वंश)

तीन गांवों से इनकी उत्पत्ति बताई जाती है जो निम्न है|

(१) धर्मपुरा (२) सोगावरी (३) देशी

बशिष्ट गोत्र (मिश्र-वंश)

इनका निवास भी इन तीन गांवों में बताई जाती है|

(१) बट्टूपुर मार्जनी (२) बढ़निया (३) खउसी

शांडिल्य गोत्र ( तिवारी,त्रिपाठी वंश)

शांडिल्य ऋषि के बारह पुत्र बताये जाते हैं जो इन बाह गांवों से प्रभुत्व रखते हैं|

(१) सांडी (२) सोहगौरा (३) संरयाँ (४) श्रीजन (५) धतूरा (६) भगराइच (७) बलूआ (८) हरदी (९) झूडीयाँ (१०) उनवलियाँ (११) लोनापार (१२) कटियारी, लोनापार में लोनाखार, कानापार, छपरा भी समाहित है

इन्ही बारह गांवों से आज चारों तरफ इनका विकास हुआ है, यें सरयूपारीण ब्राह्मण हैं| इनका गोत्र श्री मुख शांडिल्य त्रि प्रवर है, श्री मुख शांडिल्य में घरानों का प्रचलन है जिसमे राम घराना, कृष्ण घराना, नाथ घराना, मणी घराना है, इन चारों का उदय, सोहगौरा गोरखपुर से है जहाँ आज भी इन चारों का अस्तित्व कायम है|

उप शांडिल्य ( तिवारी- त्रिपाठी, वंश)

इनके छ: गाँव बताये जाते हैं जी निम्नवत हैं|

(१) शीशवाँ (२) चौरीहाँ (३) चनरवटा (४) जोजिया (५) ढकरा (६) क़जरवटा

भार्गव गोत्र (तिवारी या त्रिपाठी वंश)

भार्गव ऋषि के चार पुत्र बताये जाते हैं जिसमें चार गांवों का उल्लेख मिलता है जो इस प्रकार है|

(१) सिंघनजोड़ी (२) सोताचक (३) चेतियाँ (४) मदनपुर

भारद्वाज गोत्र (दुबे वंश)

भारद्वाज ऋषि के चार पुत्र बताये जाते हैं जिनकी उत्पत्ति इन चार गांवों से बताई जाती है|

(१) बड़गईयाँ (२) सरार (३) परहूँआ (४) गरयापार

कन्चनियाँ और लाठीयारी इन दो गांवों में दुबे घराना बताया जाता है जो वास्तव में गौतम मिश्र हैं लेकिन इनके पिता क्रमश: उठातमनी और शंखमनी गौतम मिश्र थे परन्तु वासी (बस्ती) के राजा बोधमल ने एक पोखरा खुदवाया जिसमे लट्ठा न चल पाया, राजा के कहने पर दोनों भाई मिल कर लट्ठे को चलाया जिसमे एक ने लट्ठे सोने वाला भाग पकड़ा तो दुसरें ने लाठी वाला भाग पकड़ा जिसमे कन्चनियाँ व लाठियारी का नाम पड़ा, दुबे की गददी होने से ये लोग दुबे कहलाने लगें|

सरार के दुबे के वहां पांति का प्रचलन रहा है अतएव इनको तीन के समकक्ष माना जाता है|

सावरण गोत्र ( पाण्डेय वंश)

सावरण ऋषि के तीन पुत्र बताये जाते हैं इनके वहां भी पांति का प्रचलन रहा है जिन्हें तीन के समकक्ष माना जाता है जिनके तीन गाँव निम्न हैं|

(१) इन्द्रपुर (२) दिलीपपुर (३) रकहट (चमरूपट्टी)

सांकेत गोत्र (मलांव के पाण्डेय वंश)

सांकेत ऋषि के तीन पुत्र इन तीन गांवों से सम्बन्धित बताये जाते हैं|

(१) मलांव (२) नचइयाँ (३) चकसनियाँ

कश्यप गोत्र (त्रिफला के पाण्डेय वंश)

इन तीन गांवों से बताये जाते हैं|

(१) त्रिफला (२) मढ़रियाँ (३) ढडमढीयाँ

ओझा वंश

इन तीन गांवों से बताये जाते हैं|

(१) करइली (२) खैरी (३) निपनियां

चौबे -चतुर्वेदी, वंश (कश्यप गोत्र)

इनके लिए तीन गांवों का उल्लेख मिलता है|

(१) वंदनडीह (२) बलूआ (३) बेलउजां

एक गाँव कुसहाँ का उल्लेख बताते है जो शायद उपाध्याय वंश का मालूम पड़ता है|

🌇ब्राह्मणों की वंशावली🌇
भविष्य पुराण के अनुसार ब्राह्मणों का इतिहास है की प्राचीन काल में महर्षि कश्यप के पुत्र कण्वय की आर्यावनी नाम की देव कन्या पत्नी हुई। ब्रम्हा की आज्ञा से
दोनों कुरुक्षेत्र वासनी
सरस्वती नदी के तट
पर गये और कण् व चतुर्वेदमय
सूक्तों में सरस्वती देवी की स्तुति करने लगे
एक वर्ष बीत जाने पर वह देवी प्रसन्न हो वहां आयीं और ब्राम्हणो की समृद्धि के लिये उन्हें
वरदान दिया ।
वर के प्रभाव कण्वय के आर्य बुद्धिवाले दस पुत्र हुए जिनका
क्रमानुसार नाम था -
उपाध्याय,
दीक्षित,
पाठक,
शुक्ला,
मिश्रा,
अग्निहोत्री,
दुबे,
तिवारी,
पाण्डेय,
और
चतुर्वेदी ।
इन लोगो का जैसा नाम था वैसा ही गुण। इन लोगो ने नत मस्तक हो सरस्वती देवी को प्रसन्न किया। बारह वर्ष की अवस्था वाले उन लोगो को भक्तवत्सला शारदा देवी ने
अपनी कन्याए प्रदान की।
वे क्रमशः
उपाध्यायी,
दीक्षिता,
पाठकी,
शुक्लिका,
मिश्राणी,
अग्निहोत्रिधी,
द्विवेदिनी,
तिवेदिनी
पाण्ड्यायनी,
और
चतुर्वेदिनी कहलायीं।
फिर उन कन्याआं के भी अपने-अपने पति से सोलह-सोलह पुत्र हुए हैं
वे सब गोत्रकार हुए जिनका नाम -
कष्यप,
भरद्वाज,
विश्वामित्र,
गौतम,
जमदग्रि,
वसिष्ठ,
वत्स,
गौतम,
पराशर,
गर्ग,
अत्रि,
भृगडत्र,
अंगिरा,
श्रंगी,
कात्याय,
और
याज्ञवल्क्य।
इन नामो से सोलह-सोलह पुत्र जाने जाते हैं।
मुख्य 10 प्रकार ब्राम्हणों ये हैं-
(1) तैलंगा,
(2) महार्राष्ट्रा,
(3) गुर्जर,
(4) द्रविड,
(5) कर्णटिका,
यह पांच "द्रविण" कहे जाते हैं, ये विन्ध्यांचल के दक्षिण में पाये जाते हैं|
तथा
विंध्यांचल के उत्तर में पाये जाने वाले या वास करने वाले ब्राम्हण
(1) सारस्वत,
(2) कान्यकुब्ज,
(3) गौड़,
(4) मैथिल,
(5) उत्कलये,
उत्तर के पंच गौड़ कहे जाते हैं।
वैसे ब्राम्हण अनेक हैं जिनका वर्णन आगे लिखा है।
ऐसी संख्या मुख्य 115 की है।
शाखा भेद अनेक हैं । इनके अलावा संकर जाति ब्राम्हण अनेक है ।
यहां मिली जुली उत्तर व दक्षिण के ब्राम्हणों की नामावली 115 की दे रहा हूं।
जो एक से दो और 2 से 5 और 5 से 10 और 10 से 84 भेद हुए हैं,
फिर उत्तर व दक्षिण के ब्राम्हण की संख्या शाखा भेद से 230 के
लगभग है |
तथा और भी शाखा भेद हुए हैं, जो लगभग 300 के करीब ब्राम्हण भेदों की संख्या का लेखा पाया गया है।
उत्तर व दक्षिणी ब्राम्हणां के भेद इस प्रकार है
81 ब्राम्हाणां की 31 शाखा कुल 115 ब्राम्हण संख्या, मुख्य है -
(1) गौड़ ब्राम्हण,
(2)गुजरगौड़ ब्राम्हण (मारवाड,मालवा)
(3) श्री गौड़ ब्राम्हण,
(4) गंगापुत्र गौडत्र ब्राम्हण,
(5) हरियाणा गौड़ ब्राम्हण,
(6) वशिष्ठ गौड़ ब्राम्हण,
(7) शोरथ गौड ब्राम्हण,
(8) दालभ्य गौड़ ब्राम्हण,
(9) सुखसेन गौड़ ब्राम्हण,
(10) भटनागर गौड़ ब्राम्हण,
(11) सूरजध्वज गौड ब्राम्हण(षोभर),
(12) मथुरा के चौबे ब्राम्हण,
(13) वाल्मीकि ब्राम्हण,
(14) रायकवाल ब्राम्हण,
(15) गोमित्र ब्राम्हण,
(16) दायमा ब्राम्हण,
(17) सारस्वत ब्राम्हण,
(18) मैथल ब्राम्हण,
(19) कान्यकुब्ज ब्राम्हण,
(20) उत्कल ब्राम्हण,
(21) सरवरिया ब्राम्हण,
(22) पराशर ब्राम्हण,
(23) सनोडिया या सनाड्य,
(24)मित्र गौड़ ब्राम्हण,
(25) कपिल ब्राम्हण,
(26) तलाजिये ब्राम्हण,
(27) खेटुवे ब्राम्हण,
(28) नारदी ब्राम्हण,
(29) चन्द्रसर ब्राम्हण,
(30)वलादरे ब्राम्हण,
(31) गयावाल ब्राम्हण,
(32) ओडये ब्राम्हण,
(33) आभीर ब्राम्हण,
(34) पल्लीवास ब्राम्हण,
(35) लेटवास ब्राम्हण,
(36) सोमपुरा ब्राम्हण,
(37) काबोद सिद्धि ब्राम्हण,
(38) नदोर्या ब्राम्हण,
(39) भारती ब्राम्हण,
(40) पुश्करर्णी ब्राम्हण,
(41) गरुड़ गलिया ब्राम्हण,
(42) भार्गव ब्राम्हण,
(43) नार्मदीय ब्राम्हण,
(44) नन्दवाण ब्राम्हण,
(45) मैत्रयणी ब्राम्हण,
(46) अभिल्ल ब्राम्हण,
(47) मध्यान्दिनीय ब्राम्हण,
(48) टोलक ब्राम्हण,
(49) श्रीमाली ब्राम्हण,
(50) पोरवाल बनिये ब्राम्हण,
(51) श्रीमाली वैष्य ब्राम्हण
(52) तांगड़ ब्राम्हण,
(53) सिंध ब्राम्हण,
(54) त्रिवेदी म्होड ब्राम्हण,
(55) इग्यर्शण ब्राम्हण,
(56) धनोजा म्होड ब्राम्हण,
(57) गौभुज ब्राम्हण,
(58) अट्टालजर ब्राम्हण,
(59) मधुकर ब्राम्हण,
(60) मंडलपुरवासी ब्राम्हण,
(61) खड़ायते ब्राम्हण,
(62) बाजरखेड़ा वाल ब्राम्हण,
(63) भीतरखेड़ा वाल ब्राम्हण,
(64) लाढवनिये ब्राम्हण,
(65) झारोला ब्राम्हण,
(66) अंतरदेवी ब्राम्हण,
(67) गालव ब्राम्हण,
(68) गिरनारे ब्राम्हण
सभी ब्राह्मण बंधुओ को मेरा नमस्कार बहुत दुर्लभ जानकारी है जरूर पढ़े। और समाज में शेयर करे हम क्या है
इस तरह ब्राह्मणों की उत्पत्ति और इतिहास के साथ इनका विस्तार अलग अलग राज्यो में हुआ और ये उस राज्य के ब्राह्मण कहलाये। ब्राह्मण अपने कर्म और धर्म का पालन करते हुए सनातन संस्कृति की रक्षा कर रहे हैं।

स्वप्न में गौ दर्शन का महात्म शास्त्रों में गौ का महिमा



गौ माता का शास्त्र पुराणों में महात्मय

• स्वप्न में गौ अथवा वृषभ के दर्शनसे कल्याण लाभ एवं व्याधि नाश होता है । इसी प्रकार स्वप्नमे गौ के थन को चूसना भी श्रेष्ठ माना पाया है । स्वप्नमे गौका घरमें ब्याना, वृषभ की सवारी करना, तालाबके बीचमें घृत मिश्रित खीरका भोजन भी उत्तम माना गया है । घी सहित खीर का भोजन तो राज्य प्राप्ति का सूचक माना गया है ।

इसी प्रकार स्वप्न में ताजे दुहे हुए फेनसहित दुग्धका पान करनेवाले को अनेक भोगो की तथा दहीके देखने से प्रसन्नता की प्राप्ति होती है । जो वृषभ से युक्त रथपर स्वप्न में अकेला सवार होता है और उसी अवस्थायें जाग जाता है, उसे शीघ्र धन मिलता है । स्वप्न में दही मिलनेसे धनकी, घी मिलनेसे यशकी और दही खानेस भीे यशकी प्राप्ति निश्चित है ।

यात्रा आरम्भ करते समय दही और दूधका दीखना शुभ शकुन माना गया है । स्वप्नमें दही भातका भोजन करनेसे कार्य सिद्धि होती है तथा बैलपर चढ़नेसे द्रव्य लाभ होता है एवं व्याधिसे छुटकारा मिलता है । इसी प्रवार स्वप्रमे वृषभ अथवा गौ का दर्शन करनेसे कुटुम्ब की वृद्धि होती है । स्वप्नमे सभी काली वस्तुओ का दर्शन निन्द्य माना गया है, केवल कृष्णा गौ का  दर्शन शुभ होता है । (स्वप्न में गोदर्शन का फल, संतो के श्री मुख से सुना हुआ)

• वृषभो को जगत् का पिता समझना चाहिये और गौएं संसार की माता हैं । उनकी पूजा करनेसे सम्पूर्ण पितरों और देवताओं की पूजा हो जाती है । जिनके गोबरसे लीपने पर सभा भवन, पौंसलेे, घर और देवमंदिर भी शुध्द हो जाते हैं, उन गौओ से बढकर और कौन प्राणी हो सकता है ?जो मनुष्य एक सालतक स्वयं भोजन करनेके पहले प्रतिदिन दूसरे की गायको मुट्ठी भर घास खिलाया करता है, उसको प्रत्येक समय गौकी सेवा करनेका फल प्राप्त होता है ।(महाभारत, आश्वमेधिकपर्व, वैष्णवधर्म )

• देवता, ब्राह्मण, गो, साधु और साध्वी स्त्रीयोंके बलपर यह सारा संसार टिका हुआ है, इसीसे वे परम पूजनीय हैं । गौए जिस स्थानपर जल पीती हैं, वह स्थान तीर्थ है । गंगा आदि पवित्र नदियाँ गोस्वरूपा ही हैं ।

 



जहा जिस मार्ग से गो माताए जलराशि को लांघती हुई नदी आदि को पार करती है,वहां गंगा, यमुना, सिंधु, सरस्वती आदि नदियाँ या तीर्थ निश्चित रूप से विद्यमान रहते है।(विष्णुधर्मोत्तर पुराण . द्वी.खं ४२। ४९-५८)

• हे ब्राह्मणो ! गायके खुरसे उत्पन्न धूलि समस्त पापो को नष्ट कर देनेवाली है । यह धूलि चाहे तीर्थकी हो चाहे मगध कीकट आदि निकृष्ट देशोंकी ही क्यो न हो । इसमें विचार अथवा संदेह करने की कोई आवश्यकता नहीं । इतना ही नहीं वह सब प्रकार की मङ्गलकारिणी, पवित्र करनेवाली और दुख दरिद्रतारूप अलक्ष्मी को नष्ट करनेवाली है ।

गायो के निवास करनेसे वहाँक्री पृथिवी भी शुद्ध हो जाती है । जहां गायें बैठती हैं वह स्थान, वह घर सर्वथा पवित्र हो जाता है । वहां कोई दोष नहीं रहता । उनके नि: श्वास की हवा देवताओंके लिये नीराज़न के समान है । गौओ को स्पर्श करना बडा पुण्यदायक है और उससे समस्त दु-स्वप्न, पाप आदि भी नष्ट हो जाते हैं । गौओ के गरदन और मस्तकके बीच साक्षात् भगवती गंगा का निवास है । गौएं सर्वदेेवमयी  और सर्वतीर्थमयी हैं । उनके रोएँ भी बड़े ही पवित्रताप्रद और पुण्यदायक हैं । (विष्णुधर्मोत्तर पुराण ,भगवान् हंस ब्राह्मणों से)

• ब्राह्मणो! गौओ के शरीरको खुजलानेसे या उनके शरीरके कीटाणुओ को दूर करनेसे मनुष्य अपने समस्त पापोंको धो डालता है । गौओ को गोग्रास दान करनेसे महान् पुण्य की प्राप्ति होती है । गौओं को चराकर उन्हें जलाशयतक घुमाकर जल पिलानेसे मनुष्य अनन्त वर्षोतक स्वर्गमे निवास करता है । गौओ के प्रचारणके लिये गोचरभूमि की व्यवस्था कर मनुष्य नि:संदेह अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है । गौओ के लिये गोशालाका निर्माणकर मनुष्य पूरे नगरका स्वामी बन जाता है और उन्हें नमक खिलाने से मनुष्य को महान सौभाग्यकी प्राप्ति होती है । (विष्णुधर्मोत्तर पुराण ,भगवान् हंस ब्राह्मणों से)

•विपत्तिमें या क्रीचड़मे फंसी हुई या चोर तथा बाघ आदिके भयसे व्याकुल गौ को क्लेशस्ने मुक्त कर मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त करता है । रुग्णावस्थामे गौओ को औषधि प्रदान करनेसे स्वयं मनुष्य सभी रोगोंसे मुक्त को जाता है । गौओ को भयसे मुक्त करनेपर मनुष्य स्वयं भी सभी भयोसे मुक्त हो जाता है ।

चांडाल के हाथसे गौ को खरीद लेने पर गोमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है तथा किसी अन्य के हाथसे गाय को खरीदकर उसका पालन करनेसे गोपालक को गोमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है । गौओंकी शीत तथा धूपसे रक्षा करनेपर स्वर्गकी प्राप्ति होती है । (विष्णुधर्मोत्तर पुराण ,भगवान् हंस ब्राह्मणों से)

•गोमूत्र, गोमय, गोदुग्ध, गोदधि, गोघृत और कुशोदक यह पञ्चगव्य स्नानीय और पेयद्रव्योंमें परम पवित्र कहा गया है । ये सब मङ्गलमय पदार्थ भूत, प्रेत, पिशाच, राक्षस आदिसे रक्षा करनेवाले परममङ्गल तथा कलिके दुख-दोषो को नाश करनेवाले हैं । गोरोचना भी इसी प्रकार राक्षस, सर्पविष तथा सभी रोगों को नष्ट करनेवाली एवं परम धन्य है ।जो प्रात:काल उठकर अपना मुख गोघृतपात्रमें रखे घीमे देखता है उसकी दुख: दरिद्रता सर्वदाके लिये समाप्त हो जाती है और फिर पाप का बोझ नहीं ठहरता ।
(विष्णुधर्मोत्तर पुराण, राजनीति एवं धर्मशास्त्रके सम्यक ज्ञाता पुष्कर जी भगवान् परशुराम से)

•गायो,गोकुल, गोमय आदिपर थूक-खखार नहीं छोड़ना चाहिये । (पुष्कर परशुराम संवाद)

•जो गौओ के चलनेके मार्गमें, चरागाहमें जलकी व्यवस्था करता है, वह वरुणलोक को प्राप्तकर वहां दस हजार वर्षोंतक विहार करता है और जहां जहां उसका आगे जन्म होता है वह वहां सभी आनन्दो से परितृप्त रहता है । गोचरभूमि को हल आदिसे जोतनेपर चौदह इन्द्रों पर्यन्त भीषण नरक की प्राप्ति होती है ।हे परशुराम जी ! जो गौओ के पानी पीते समय विघ्न डालता है, उसे यही मानना चाहिये कि उसने घोर ब्रह्महत्या की । सिंह, व्याघ्र आदिके भयसे डरी हुई गायकी जो रक्षा करता है और कीचड़में फंसी हुई गायका जो उद्धार करता है, वह कल्पपर्यन्त स्वर्गमें स्वर्गीय भोगो का भोग करता है । गायों को घास प्रदान करनेसे वह व्यक्ति अगले जन्ममे रूपवान हो जाता है और उसे लावण्य तथा महान सौभाग्यकी प्राप्ति होती है । (पुष्कर परशुराम संवाद)

•हे परशुरामजी ! गायों को बेचना भी कल्याणकारी नहीं है। गायोंका नाम लेने से भी मनुष्य पापो से शुद्ध हो जाता है । गौओका स्पर्श सभी पापोंका नाश करनेवाला तथा सभी प्रकारका सौभाग्य एवं मङ्गलका विधायक है । गौओका दान करनेसे अनेक कुलोंका उद्धार को जाता है ।

मातृकुल, पितृकुल और भार्याकुलमे जहां एक भी गो माता निवास करती है वहां रजस्वला और प्रसूतिका आदिकी अपवित्रता भी नहीं आती और पृथ्वी में अस्थि, लोहा होनेका, धरतीके आकार प्रकार की विषमताका दोष भी नष्ट हो जाता है । गौओ के श्वास प्रश्वास से घरमे महान् शान्ति होती है । सभी शास्त्रो में  गौओके श्वास प्रश्वास को महानीराजन कहा गया है । हे परशुराम ! गौओ को छु देने मात्रसे मनुष्योंके सारे पाप क्षीण हो जाते हैं ।(पुष्कर परशुराम संवाद)

• जिसको गायका दूध, दही और घी खानेका सौभाग्य नहीं प्राप्त होता, उसका शरीर मल के समान है । अन्न आदि पाँच रात्रितक, दूध सात रात्रितक, दही बीस रात्रितक और घी एक मासतक शरीरमे अपना प्रभाव रखता है । जो लगातार एक मासतक बिना गव्यका(बिना गौ के दूध से उत्पन्न पदार्थ)भोजन करता है उस मनुष्यके भोजनमें प्रेतों को भाग मिलता है, इसलिये प्रत्येक युुग में सब कार्योंके लिये एकमात्र गौ ही प्रशस्त मानी गयी है । गौ सदा और सब समय धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये चारों पुरुषार्थ प्रदान करनेवाली है ।(पद्मपुराण, ब्रह्माजी और नारद मुनि संवाद)

•गायो से  उत्पन्न दूध, दही, घी, गोबर, मूत्र और रोचना-ये छ: अङ्ग (गोषडङ्ग) अत्यन्त पवित्र हैं और प्राणियोंके सभी भापों को नष्ट कर उन्हें शुद्ध करनेवाले हैं । श्रीसम्पन्न बिल्व वृक्ष गौओके गोबरसे ही उतपन्न हुआ है । यह भगवान् शिवजी को अत्यन्त प्रिय है । चूँकि उस वृक्षमें पद्महस्ता भगवती लक्ष्मी साक्षात् निवास करती हैं, इसीलिये इसे श्रीवृक्ष भी कहा गया है । बादमें नीलकमल एवं रक्तकमलके बीज भी गोबरसे ही उत्पन्न हुए थे । गौओ के मस्तकसे उत्पन्न परम पवित्र गोरोचना है समस्त अभीष्टो की सिद्धि करनेवाली तथा परम मङ्गलदायिनी है ।

अत्यन्त सुगन्धित गुग्गुल नामका पदार्थ गौओ के मूत्रसे ही उत्पन्न हुआ है । यह देखनेसे भी कल्याण करता है । यह गुग्गुल सभी देवताओं का आहार है, विशेषरूप भगवान् शंकर का प्रिय आहार है । संसारके सभी मङ्गलप्रद बीच एवं सुन्दर से सुन्दर आहार तथा मिष्टान्न आदि सब के सब गौके दूधसे ही बनाये जाते हैं । सभी प्रक्रार की मङ्गल कामनाओ को सिद्ध करनेके लिये गायका दही लोकप्रिय है । देवताओ को तृप्त करनेवाला अमृत नामक पदार्थ गायके घीसे ही उत्पन्न हुआ है । (भविष्यपुराण, उत्तरपर्व, अ.६९, भगवान् श्रीकृष्ण युधिष्ठीर संवाद)

•गौओ को खुजलाना तथा उन्हें स्नान कराना भी गोदानके समान फल वाला होता है । जो भयसे दुखी (भयग्रस्त) एक गायकी रक्षा करता है, उसे सौं गोदानका फल प्राप्त होता है । पृथ्वी में समुद्रसे लेकर जितने भी बड़े तीर्थ-सरिता-सरोवर आदि हैं, वे सब मिलकर भी गौ के सींग के जलसे स्नान करनेके षोडशांश के तुल्य भी नहीं होते।(बृहत्पराशर स्मृति, अध्याय ५)

• राम-वनवास के समय भरत १४ वर्षतक इसी कारण स्वस्थ रहकर आध्यात्मिक उन्नति करते रहे, क्योंकि वे अन्न के साथ गोमूत्रका सेवन करते थे ।

गोमूत्रयावकं श्रुत्वा भ्रातरं वल्कलाम्बरम्।।
(श्रीमद्भागवत ९ । १० । ३४)

• गोमाताका दर्शन एवं उन्हें नमस्कार करके उनकी परिक्रमा केरे । ऐसा करने से सातों द्विपोसहित भूमण्डल की प्रदक्षिणा हो जाती है । गौएँ समस्त प्राणियो की माताएँ एवं सारे सुख देनेवाली हैं । वृद्धिकी आकांक्षा करनेवाले मनुष्य को नित्य गो माताओ की प्रदक्षिणा करनी चाहिये ।

• जिस व्यक्तिकें पास श्राद्धके लिये कुछ भी न हो वह यहि पितरो का ध्यान करके गो माता को श्रद्धापूर्वक घास खिला दे तो उसको श्राद्धका फल मिल जाता है । (निर्णयसिंधुु)

• गौ माताए समस्त प्राणियोंकी माता हैं और सारे सुखों को देनेवाली हैं, इसलिये कल्याण चाहनेवाले मनुष्य सदा गोओंकी प्रदक्षिणा करें । गौओ को लात न मारे । गौओ के बीचसे होकर न निकले। मङ्गलकी आधारभूत गो-देवियोंकी सदा पूजा को । (महा ,अनु ६९ । ७-८)

• जब गौए चर रही हों या एकांत में बैठी हों, तब उन्हें तंग न करें । प्यास से पीडित होकर जब भी क्रोध से अपने स्वामी की ओर देखती है तो उसका बंधुबांधवोसहित नाश हो जाता है । राजाओ को चाहिये कि गोपालन और गोरक्षण करे । उतनी ही संख्यामे गाय रखे, जितनीका अच्छी तरह भरण-पोषण हो सके । गाय कभी भी भूखसे पीडित न रहे, इस बातपर विशेष ध्यान रखना चाहिये ।

• जिसके घरमें गाय भूखसे व्याकुल होकर रोती है, वह निश्चय ही नरक में जाता है । जो पुरुष गायोंके घरमें सर्दी न पहुँचने का और जलके बर्तन को शुद्ध जलसे भर रखनेका प्रबन्ध कर देता है, वह ब्रह्मलोकमे आनन्द भोग करता है ।

• जो मनुष्य सिंह, बाघ अथवा और किसी भयसे डरी हुई, कीचड़ में धसी हुई या जलमें डूबती हुई गायको बचाता है वह एक कल्पतक स्वर्ग-सुख का भोग करता है । गायकी रक्षा, पूजा और पालन अपनी सगी माताके समान करना चाहिये । जो मनुष्य गायों को ताड़ना देता है, उसे रौरव नरक की प्राप्ति होती है । (हेभाद्रि)

• गोबर और गोमूत्र से अलक्ष्मी का नाश होता है,  इसलिये उनसे कभी घृणा न करे। जिसके घरमें प्यासी गाय बंधी रहती है, रजस्वला कन्या अविवाहिता रहती है और देवता बिना पूज़नके रहते हैं, उसके पूर्वकृत सारे पुण्य नष्ट हो जाते हैं । गायें जब इच्छानुसार चरती होती हैं, उस समय जो मनुष्य उन्हें रोकता है, उसके पूर्व पितृगण पतनोन्मुख होकर काँप उठते हैं । जो मनुष्य मूर्खतावश गायों को लाठी से मारते हैं उनको बिना हाथके होकर यमपुरीमें जाना पड़ता है ।(पद्मपुराण, पाताल .अ १८)

• गायको यथायोग्य नमक खिलाने से पवित्र लोककी प्राप्ति होती है और जो अपने भोजनसे पहले गाय को घास चारा खिलाकर तृप्त करता है, उसे सहस्त्र गोदानका फल मिलता है । (आदित्यपुराण)

• अपने माता पिताकी भांती श्रद्धापूर्वक गायोंका पालन करना चाहिये । हलचल, दुर्दिन और विप्लवके अवसर पर  गायों को घास और शीतल जल मिलता रहे, इस बातका प्रबन्ध करते रहना चाहिये । (ब्रह्मपुराण)

• गोमाताका दर्शन एवं उन्हें नमस्कार करके उनकी परिक्रमा केरे । ऐसा करने से सातों द्विपोसहित भूमण्डल की प्रदक्षिणा हो जाती है । गौएँ समस्त प्राणियो की माताएँ एवं सारे सुख देनेवाली हैं । वृद्धिकी आकांक्षा करनेवाले मनुष्य को नित्य गो माताओ की प्रदक्षिणा करनी चाहिये ।

•जिस व्यक्तिकें पास श्राद्धके लिये कुछ भी न हो वह यहि पितरो का ध्यान करके गो माता को श्रद्धापूर्वक घास खिला दे तो उसको श्राद्धका फल मिल जाता है । (निर्णयसिंधुु)

•महर्षि वसिष्ठ जी ने अनेक प्रकार से गो माता की महिमा तथा उनके दान आदिकी महिमा बताते हुए मनुष्यो के लिये एक महत्त्वपूर्ण उपदेश तथा एक मर्यादा स्थापित करते हुए कहा –

नाकीर्तयित्वा गा: सुप्यात् तासां संस्मृत्य चोत्पतेत्। सायंप्रातर्नमस्येच्च गास्तत: पुष्टिमाप्नुयात्।।
गाश्च संकीर्तयेन्नित्यं नावमन्येेत तास्तथा ।
अनिष्ट स्वप्नमालक्ष्य गां नर: सम्प्रकीर्तयेत्।।
(महाभा, अनु ७८। १६, १८)

अर्थात् ‘ गौओ का नामकीर्तन किये बिना न सोये । उनका स्मरण करके ही उठे और सबेरे-शाम उन्हें नमस्कार करे। इससे मनुष्य को बल और पुष्टि प्राप्त होती है । प्रतिदिन गायो का जाम ले, उनका कभी अपमान न को । यदि बुरे स्वप्न दिखायी दें तो मनुष्य गो माता का नाम ले ।

इसी प्रकार वे आगे कहते हैं की जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक रात-दिन निम्न मन्त्रका बराबर कीर्तन करता है वह सम अथवा विषम किसी भी स्थितिमें भयसे सर्वथा मुक्त हो जाता है और सर्वदेवमयी गोमाताका कृपा पात्र बन जाता है ।

मन्त्र इस प्रकार है –
गा वै पश्याम्यहं नित्यं जाब: पश्यन्तु मां सदा ।
गावोsस्माकं वयं तासां यतो गावस्ततो वयम्।।
(महाभा, अनु ७८ । २४)

अर्थात् मैं सदा गौओका दर्शन करू और गौए मुझपर कृपा दृष्टि करें । गौए हमारी हैं और हम गौओकै हैं । जहां गौए रहें, वहीं हम रहें, चूँकी गौए हैं इसीसे हमलोग भी हैं।w


सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...