शुक्रवार, 31 मई 2019


पीएम मोदी ने नोटबंदी करके इस घोटाले को रोक तो दिया, मगर उसके बाद ये बात निकल कर सामने आयी कि देश में बिलकुल असली जैसे दिखने वाले एक ही नंबर के कई नोट चल रहे थे. ये ऐसे नोट थे, जिन्हे पहचानना लगभग नामुमकिन था क्योकि ये उसी कागज़ पर छपे थे जिसपर भारत सरकार नोट छपवाती है.

#खबर के मुताबिक़ डे ला रू जोकि एक ब्रिटिश कंपनी है, इसके साथ मिलकर तत्कालीन वित्तमंत्री पी चिदंबरम एक बड़ा खेल खेल रहे थे, जिसमे उनके एडिशनल सचिव अशोक चावला और वित्त सचिव अरविंद मायाराम भी शामिल थे.

*कैसा खेला गया घोटाले का खेल?

*"कहा जा रहा है कि घपले की शुरुआत 2005 में तब हुई जब वित्त मंत्रालय में अरविन्द मायाराम वित्त सचिव के पद पर थे और अशोक चावला एडिशनल सचिव के पद पर थे. कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद 2006 में सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मींटिंग कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड एक कंपनी बनाई गयी, जिसके मैनेजिंग डायरेक्टर अरविंद मायाराम थे और चेयरमैन अशोक चावला थे, यानी दो सरकारी अधिकारी पद पर रहते हुए इस कंपनी को चला रहे थे.

बिना एसीसी के अनुमोदन के एमडी और चेयरमैन की नियुक्ति

**इस प्रकार नियुक्तियों के लिए अपॉइंटमेंट्स कमिटी ऑफ़ कैबिनेट (ACC) के सामने मामले को रखकर उसके अनुमोदन की जरुरत होती है, मगर चिदंबरम ने भला कब नियम-कायदों की परवाह की, जो अब करते, लिहाजा ACC के सामने इन नियुक्तियों का मामला लाया ही नहीं गया और ऐसे ही इनकी नियुक्ति कर दी गयी.

#इसके बाद असली खेल शुरू हुआ. इस घपले में चिदंबरम के दाएं व् बाएं हाथ बताये जाने वाले अशोक चावला व् अरविंद मायाराम ने भारतीय रिज़र्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL), जोकि नोटों की छपाई का काम देखती है, उससे कहा कि उनकी कंपनी के साथ मिलकर सिक्योरिटी पेपर प्रिंटिंग के सप्लायर को ढूंढो. जिसके बाद पहले से ब्लैकलिस्टेड की जा चुकी डे ला रू कंपनी से नोटों की छपाई में इस्तमाल होने वाले सिक्योरिटी पेपर को लेना जारी रखा गया.

क्या इसके लिए चिदंबरम को घूस दी गयी थी इस ब्रिटिश कंपनी द्वारा या पाकिस्तान के आईएसआई द्वारा चिदंबरम को पैसा दिया जा रहा था? ये जांच का विषय है. बहरहाल पहले जानते हैं कि डे ला रू को क्यों बैन किया गया था और पाक आईएसआई का इस घपले में क्या रोल है?

डे ला रू कंपनी का खेल

दरअसल वित्त वर्ष 2009-10 के दौरान नकली मुद्रा रैकेट का पता लगाने के लिए सीबीआई ने भारत नेपाल सीमा पर विभिन्न बैंकों के करीब 70 शाखाओ पर छापेमारी की, तो बैंकों से ही नकली करेंसी पकड़ी गयी. #जब पूछताछ के गयी तो उन बैंक शाखाओं के अधिकारियों ने सीबीआई से कहा कि जो नोट सीबीआई ने छापें में बरामद किये हैं वो तो खुद रिजर्व बैंक से ही उन्हें मिले हैं.

ये एक बेहद गंभीर खुलासा था क्योकि इसके मुताबिक़ आरबीआई भी नकली नोटों के खेल में शामिल लग रहा था! हांलाकि इतनी अहम् खबर को इस देश की मीडिया ने दिखाना जरूरी नहीं समझा क्योकि उस वक़्त कांग्रेस सत्ता में थी.

#इस खुलासे के बाद सीबीआई ने भारतीय रिजर्व बैंक के तहखानो में भी छापेमारी की और आश्चर्यजनक तरीके से भारी मात्रा में 500 और 1000 रुपये के जाली नोट पकडे गए. हैरानी की बात ये थी कि लगभग वैसे ही समान जाली मुद्रा पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई द्वारा भारत में तस्करी से पहुँचाया जाता था.

अब सवाल उठा कि यह जाली नोट आखिर भारतीय रिजर्व बैंक के तहखानो में कैसे पहुंच गए? आखिर ये सब देश में चल क्या रहा था?

*#जांच के लिए शैलभद्र कमिटी का गठन हुआ और 2010 में कमिटी उस वक़्त चौंक गयी जब उसे पता चला कि भारत सरकार द्वारा ही पूरे देश की आर्थिक संप्रभुता को दांव पर रख कर कैसे अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी को 1 लाख करोड़ की छपाई का ठेका दिया गया था!

**जाँच हुई तो पता चला कि डे ला रू कंपनी में ही घपला चल रहा था. एक साजिश के तहत भारतीय करेंसी छापने में इस्तमाल होने वाले सिक्योरिटी पेपर की सिक्योरिटी को घटाया जा रहा था ताकि पाकिस्तान आसानी से नकली भारतीय करेंसी छाप सके और इसका इस्तमाल भारत में आतंकवाद फैलाने में किया जा सके!

*"इस खबर के सामने आते ही भारत सरकार द्वारा डे ला रू कंपनी पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया. मगर अरविन्द मायाराम ने इस ब्लैकलिस्टेड कंपनी से सिक्योरिटी पेपर लेना जारी रखा. इसकी इजाजत लेने के लिए उसने गृह मंत्रालय से इजाजत ली. कहा गया कि ये फाइल चिदंबरम को दिखाई ही नहीं गयी, जबकि ये बात मानने लायक ही नहीं क्योकि वित्त मंत्रालय से यदि गृहमंत्रालय को कोई भी पत्र भेजा जाता है तो पहले अप्रूवल के लिए वित्तमंत्री के सामने पेश किया जाता है.

क्या है पाक आईएसआई की भूमिका?

#खबर के मुताबिक़ डे ला रू कंपनी से भारत को दिए जाने वाले सिक्योरिटी पेपर के सिक्योरिटी फीचर को कम किया जा रहा था, ये कंपनी पाकिस्तान के लिए भी सिक्योरिटी पेपर छापने का काम करती है. जिसके बाद ये आरोप लगे कि इस कंपनी द्वारा भारत का सिक्योरिटी पेपर पाकिस्तान को गुपचुप तरीके से दिया जा रहा था ताकि भारत के नकली नोट छापने में पाक को आसानी हो.

यहाँ पाक आईएसआई का नाम सामने आया कि आईएसआई की ओर से कंपनी के कर्मचारियों को घूस दी जाती थी. मगर इस खेल में अरविंद मायाराम क्यों शामिल थे? क्यों वो ब्लैकलिस्टेड कंपनी से पेपर लेते रहे?

मोदी सरकार ने लिया एक्शन

जब 2014 में मोदी सरकार सत्ता में आयी, तब गृहमंत्री राजनाथ सिंह को ये बात पता चली की इतना बड़ा गोलमाल चल रहा था. इसके बाद उन्होंने सिक्योरिटी पेपर डे ला रू कंपनी से लेना बंद करवाया. ये भी सामने आया कि इस कंपनी से सिक्योरिटी पेपर काफी महंगे दाम पर खरीदा जा रहा था, यानी ये कंपनी देश को लूट रही थी और देश का वित्तमंत्रालय इस काम में विदेशी कंपनी की मदद कर रहा था!

मायाराम के इस कालेकारनामे की खबर पीएमओ को हुई तो पीएमओ ने गंभीरता पूर्वक इस मामले को उठाया और मुख्य सतर्कता आयुक्त द्वारा इसकी जांच करवाई. मुख्य सतर्कता आयुक्त द्वारा वित्तमंत्रालय से इससे जुडी फाइल मांगी गयी. इस वक़्त वित्तमंत्री अरुण जेटली बन चुके थे, मगर इसके बावजूद वित्तमंत्रालय द्वारा फाइल देने में देर की गयी.

इसके बाद ये मामला पीएमओ से होता हुआ सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संज्ञान में आया और फिर मोदी ने खुद एक्शन लिया तब जाकर मुख्य सतर्कता आयुक्त के पास फाइल पहुंची. क्या जेटली ने फाइलें देने में देर करवाई या फिर कोंग्रेसी चाटुकारों ने जो वित्तमंत्रालय तक में बैठे हैं? ये बात साफ़ नहीं हो पायी.

नोटबंदी ना करते मोदी तो नकली करेंसी का ये खेल चलता ही रहता. डे ला रू से सिक्योरिटी पेपर लेना बंद किया गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने और पीएम मोदी ने की नोटबंदी, जिसके कारण पाकिस्तान द्वारा नकली करेंसी की छपाई बेहद कम हुई और यही कारण है कि कांग्रेस के दस वर्षों में आतंकवादी घटनाएं जो आम हो गयी थी, वो मोदी सरकार के काल में ना के बराबर हुई.

कश्मीर के अलावा देश के किसी भी राज्य में बम ब्लास्ट नहीं हो पाए. आतंकियों तक पैसा पहुंचना जो बंद हो गया था. पीएम मोदी ने जांच करवाई और मायाराम के खिलाफ मुख्य सतर्कता आयुक्त और सीबीआई द्वारा आरोप तय किये गए.

आपको यहाँ ये भी बता दें कि जिस मायाराम के खिलाफ चार्ज फ्रेम किये गए हैं, उसी को राजस्थान में कांग्रेस सरकार बनते ही मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने आर्थिक सलाहकार के पद पर नियुक्त कर लिया. यानी एक घपलेबाज को अपना आर्थिक सलाहकार बना लिया.

वहीँ अशोक चावला का नाम चिदंबरम के एयरसेल-मैक्सिस घोटाले में भी सामने आया. जिसके बाद ने नेशनल स्‍टॉक एक्‍सचेंज ऑफ इंडिया लिमिटेड के बोर्ड ऑफ डायरेक्‍टर्स के चेयरमैन व पब्लिक इंटरेस्‍ट डायरेक्‍टर पद से अशोक चावला को इस्तीफा देना पड़ा.

जुलाई 2018 में सीबीआई ने चिदंबरम को एयरसेल-मैक्सिस मामले में आरोपी बनाया था। सीबीआई ने चिदंबरम, उनके बेटे कार्ति और 16 अन्‍य के खिलाफ चार्जशीट दायर की थी, जिसमें आर्थिक मामलों के पूर्व केंद्रीय सचिव अशोक कुमार झा, तत्‍कालीन अतिरिक्‍त सचिव अशोक चावला, संयुक्‍त सचिव कुमार संजय कृष्‍णा और डायरेक्‍टर दीपक कुमार सिंह, अंडर सेक्रेटरी राम शरण शामिल हैं।

इस पूरे मामले से ये बात तो साफ़ हो जाती है कि चिदंबरम ने देश में केवल एक या दो नहीं बल्कि जहाँ-जहाँ से हो सका, वहां-वहां से देश को लूटा. चदम्बरम व् उसके बेटे कार्ति चिदंबरम ने मिलकर खूब लूटा और इस खेल में ना केवल नौकरशाह शामिल रहे बल्कि न्यायपालिका में भी कई चिदंबरम भक्त बैठे हैं, जो आज भी उसे जेल जाने से बचाते आ रहे हैं.

कहा जा रहा है कि सभी में लूट का माल मिलकर बंटता था और यदि चिदंबरम जेल गए तो सीबीआई व् ईडी की कम्बल कुटाई उनसे एक दिन भी नहीं झेली जायेगी और वो सब उगल देंगे. यदि ऐसा हुआ तो सभी जेल जाएंगे. यही कारण है कि चिदंबरम को हर बार अग्रिम जमानत दे दी जाती है.

मगर ये भी तय माना जा रहा है कि यदि मोदी इस बार भी चुनाव जीतकर पीएम बन गए तो चिदंबरम का जेल जाना तय है और फिर कई अन्य गड़े मुर्दे भी बाहर आएंगे. देश को कैसे-कैसे और किस-किस ने लूटा, सबको एक-एक करके सजा होगी. कोंग्रेसी चाटुकार नौकरशाहों समेत माँ-बेटे व् कई कोंग्रेसी नेता सलाखों के पीछे पहुंचेंगे.

भारत की संस्कृति कैसे विश्व को बिनास से बचा सकती है?

आचार्य कुमारिल भट्ट  ~~~

भारतीय वैदिक इतिहास में कुमारिल भट्ट तथा शंकराचार्य जी दोनों ही वेदों के परमोद्धारक हुए।

कुमारिल ने कर्मकांड पर किये जाने वाले आक्षेपों का मुंहतोड़ उत्तर तथा भगवान् शंकर ने ज्ञानकाण्ड के आक्षेपों का समाधान किया।

कुमारिल की जन्मभूमि के सम्बंध में विद्वानों में मतभेद पाया जाता है।
तिब्बती विद्वान तारानाथ जी ने इन्हें बौद्ध पण्डित धर्मकीर्ति का चाचा बताया है।

कुछलोग कहते है इनका जन्म दक्षिण भारत के "त्रिमलयक" नामक स्थान में हुआ, किन्तु इसमें संदेह है।

आनंद गिरी जी ने अपने दिग्विजय में इनका जन्म उद्ग्देश (उत्तर भारत) में बताया है ।
उद्ग्देश कश्मीर या पंजाब हो सकता है।

पूर्व मीमांसक सालिकनाथ ने इन्हें वार्तिककार भिक्षु कहा है, यह उपाधी उत्तर भारतीय ब्राह्मणों में ही पायी जाती है।
सालिकनाथ कुमारिल से ३०० वर्ष बाद पैदा हुए।

मिथिला के लोग इन्हें मैथिल ब्राह्मण कहते हैं।

कुमारिल धनाढ्यतम गृहस्थ थे। पांच सौ दास तथा दासियां थीं। चूड़ामणि देश के राजा के कुलगुरु थे।

बौद्ध दर्शन के विद्वान धर्मकीर्ति के साथ शास्त्रार्थ तथा उनके हारने की बात आती है।
धर्मकीर्ति त्रिमलय के निवासी थे, यह कुमारिल के पास वेदाध्ययन करने गये किन्तु बौद्घ समझकर इनको नहीं पढ़ाया।

तब ये दास के रूप में उनके घर में रहने लगे। वे इनकी परम् श्रद्धा से इतनी सेवा करने लगे कि पचास आदमी मिलकर भी इतनी सेवा नहीं कर सकते थे।

कुमारिल इनकी सेवा से इतने प्रभावित हुए कि इनको ब्राह्मण विद्यार्थियों के साथ दर्शन शास्त्र सुनने की आज्ञा मिली।

इन्होंने वैदिक दर्शनों के रहस्यों को अतिशीघ्र जान लिया।
तब वह अपने वास्तविक रूप में आये और ब्राह्मणों को शास्त्रार्थ के लिए ललकारा। इन्होंने अनेकों दार्शनिकों को परास्त किया।

तब कुमारिल से शास्त्रार्थ किया, कुमारिल भट्ट भी परास्त हो गये।

इससे क्षुब्ध होकर कुमारिल ने बौद्धों को परास्त करने के उद्दयेश्य से बौद्ध भिक्षु का रूप धारण किया तथा बौद्ध सिद्धांतो का खंडन करने के लिए बौद्ध बनकर उनके शास्त्रों का अध्ययन करने लगे।

श्री शंकराचार्य जी से भी कुमारिल ने कहा था ---- " मैं बौद्घ धर्म की धज्जियां उड़ाना चाहता हूं इसीलिए बौद्घ भिक्षु हुआ।"

उस समय धर्मपाल नामक बौद्घ भिक्षु की कीर्ति चारों ओर फैली हुई थी, वे बौद्घ धर्म के नालन्दा विश्वविद्यालय में अध्यक्ष थे।

क्षणिकविज्ञानवादी होने पर भी उन्होंने योगाचार्य तथा शून्यवाद के मौलिक ग्रन्थों पर पांडित्यपूर्ण टिकाएं लिखी है।
अतः कुमारिल ने धर्मपाल से ही बौद्ध दर्शनों का अध्ययन किया।

एक दिन धर्मपाल ने शिष्यों के प्रति बौद्ध सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुए वेदों की घोर निंदा की।

इस निंदा को सुनकर बौद्ध भिक्षु के रूप में बैठे हुए कट्टर वैदिक धर्मावलम्बी कुमारिल के नेत्रों से अश्रुपात होने लगा।

निकट बैठे हुए भिक्षुओं ने देखा और धर्मपाल को बताया।

धर्मपाल एक बौद्ध भिक्षु को वेदों की निंदा सुनकर आँसू बहाते देखकर आश्चर्य में पड़ गए, तथा पूछा--- "तुम क्यों रोते हो?, क्या वेदनिन्दा सुनकर रोते हो ?"

कुमारिल ने कहा---- "हाँ, यही कारण है। आप वेदों के रहस्यों को बिना जाने ही मनमानी निंदा करते हो।"

इस घटना से कुमारिल का सच्चा रूप प्रगट हुआ। धर्मपाल रुष्ट हुए, इनको हटाने के लिए कहा। परन्तु दुष्ट विद्यार्थियों ने इन्हें वैदिक ब्राह्मण समझकर नालन्दा के ऊँचे शिखर से नीचे गिरा दिया।

वेद विश्वासी कुमारिल जी ने अपने को असहाय जानकर वेदों की शरण ग्रहण की।
राजभवन से नीचे गिरते हुए वह कहने लगे-----

"पतन् पतन् सौधतलान्यरोरुहम्,
यदि  प्रमाणो  श्रुतयो  भवन्ति   ।
जीवेम यास्मिन् पतितोऽसम स्थले
मज्जीवनेतत्श्रुतिमानता गति: ।।

यदीह    सन्देहपदप्रयोगाद्
व्याजेन शास्त्र श्रवणाच्च हेतो:।
ममोच्चदेशात् पतताव्यनंक्षीत्
तदेकचक्षुर्विधिकल्पना  सा ।।"

(यदि श्रुतियाँ प्रमाण है तो इस विषम स्थल पर गिरने से भी मैं जीवित रहूंगा। अर्थात श्रुतियों का प्रमाण ही मेरे जीवन का एकमात्र गति है।
यदि श्रुतियां ही प्रमाण है तो मेरे जीवन की रक्षा होगी , यदि प्रमाण नहीं है तो जीवन की रक्षा नहीं होगी। इसमें संदेहसूचक "यदि" शब्द का प्रयोग करने के कारण मेरा एक नेत्र नष्ट हो गया।)

कुमारिल तथा शंकराचार्य का चार्वाक, जैन, बौद्ध आदि दर्शनों का गम्भीर अध्ययन था, इतना अन्य दार्शनिकों को नहीं था।

इन दोनों की सामर्थ्य केवल संस्कृत ग्रन्थों तक ही सीमित नहीं थी, किन्तु इन्होंने पाली के ग्रन्थों का भी अध्ययन किया था।
इन बातों की पुष्टि माधव कृत दिग्विजय के सातवें सर्ग से होती है।

भगवान शंकराचार्य के समान इन्होंने भी दिग्विजय किया था। उत्तर भारतीय पंडितों को पराजित करने के अनन्तर दक्षिण भारत गये।

कुछ लोगों के मतानुसार वहां पर सुधन्वा राजा राज्य करते थे, इनकी राजधानी उज्जैनी थी, जिसका आजकल पता नहीं चलता।

वे वैदिक धर्मानुयायी होने पर भी जैनियों के पंजे में पड़े थे। कुमारिल दिग्विजय करते हुए उनके राज-दरबार में गये।

ज्ञान के भंडार वेद कूड़े में पड़े हुए थे, वैदिक ब्राह्मणों की निंदा हो रही थी, सुधन्वा को भी वेद में अनास्था हो गई थी, परन्तु रानी की अभी भी वेदों में निष्ठा थी। खिड़की पर बैठी रानी चिंता कर रही थी----

"किं करोमि क्व गच्छामि को वेदानुद्धरिष्यति ।"
(मैं क्या करूँ ?, कहाँ जाऊं ?, वेदों का उद्धार कौन करेगा ?)

कुमारिल मार्ग से जा रहे थे। रानी की हीनता भरी पुकार सुनकर खड़े हो गए तथा उच्च स्वर में कहा-----

"मा विषीद वरारोहे भट्टचार्योऽस्मि भूतले।।"
(हे रानी ! खेद मत करो , मैं भट्टाचार्य पृथ्वी पर विद्यमान हूँ।)

और यह कार्य उन्होंने कर दिखाया।

इन्होंने "जैमिनीय पूर्वमीमांसा" पर लिखे गए "शवरस्वामी"  के सुप्रसिद्ध भाष्य पर वार्तिक लिखा है। यह तीन भागों में है---

१.. श्लोक वार्तिक-----     

इसमें तीन हजार निन्यानबे अनुष्टुप्छन्द के श्लोक है। यह ग्रँथ चौखम्बा सीरीज काशी से पार्थ सारथी मिश्र की न्यायरत्नाकर टीका सहित प्रकाशित हुआ है। डॉ. गंगनाथ झा ने इसका अंग्रेजी अनुवाद किया है, यह अंग्रेजी अनुवाद "एशियाटिक सोसायटी बंगाल" से प्रकाशित है।

२.. तंत्र वार्तिक----- 

इसके प्रथम अध्याय के दूसरे पाद से लेकर तीसरे अध्याय के अंत तक गद्य व्याख्या है। इसमें भट्टपाद की तार्किकता प्रकट होती है। यह ग्रँथ "आनंदाश्रम पूना" से पांच भागों में प्रकाशित हुआ है।

३.. टुप टीका----

यह बहुत छोटा ग्रँथ है। इसमें चौथे अध्याय से लेकर बाहरवें अध्याय तक के शवर भाष्य पर गद्यात्मक संक्षिप्त टिप्पणियां है।

कृष्णदेव ने "तंत्र चूड़ामणि" में इनकी दो अन्य टीकाओं का भी उल्लेख किया है---

१.. वृहत् टीका  
 २.. मध्यम टीका
 ३... "मानव कल्पसूत्र" पर इनकी टीका।
"शिवमहिम्न स्तोत्र" पर भी इन्होंने टीका किया है।

इनके अनेकों विद्वान मीमांसक शिष्य थे, जिनके प्रचार-प्रसार से भारत में धार्मिक क्रांति आरम्भ हुआ। जिसमें तीन प्रधान थे----

१... प्रभाकर------ इन्होंने मीमांसा के नवीन मत को जन्म दिया, इनका मत "गुरुमत" कहा जाता है। यह कुमारिल के प्रथम शिष्य थे, गुरुजी ने प्रसन्न होकर इन्हें गुरु की उपाधि दी थी, तबसे इनका मत "गुरुमत" नाम से प्रचलित हुआ।

परन्तु आजकल के संशोधकों को इसमें संदेह है। नवीन संशोधक प्रभाकर को कुमारिल से भी प्राचीन मानते हैं। इन्होंने अपने स्वतन्त्र मत का प्रचार करने के लिए शावर भाष्य पर "वृहती" तथा "लाघ्वी" नाम की टीकाएँ की है। जो अप्रकाशित है।

२... मण्डन मिश्र-----  इन्होंने भगवान् शंकराचार्य जी की शिष्यता स्वीकार किया था, इनका चरित्र इस पेज पर पोस्ट किया जा चुका है।

३...  उम्बेक (भवभूति)----- 

यह बात सप्रमाण सिद्ध हो चुका है कि भवभूति कुमारिल के शिष्य थे। 

श्री शंकर पांडुरंग पण्डित को "मालती माधव" नाम की एक प्राचीन हस्तलिखित पुस्तक मिली, जिसके तीसरे अंक के अंत में कुमारिलशिष्य द्वारा विरचित लिखा है।
 
तथा छठे अंक के अंत में कुमारिल के प्रसाद से वाग्वैभव को प्राप्त करने वाले उम्बेकाचार्य की कृति कही है।
इससे सिद्ध होता है कि भवभूति का एक नाम उम्बेक भी था।

रविवार, 12 मई 2019

भारत का यह ग्रंथ जिसके आगे घुटने टेकता है आज का आधुनिक टेक्नोलॉजी भी


  यंत्र सर्वस्व नामक यह ग्रंथ जो आज चोरी हो गया है और यह अमेरिका के सबसे बड़ी स्पेस एजेंसी के पास पहुंच गया है बहुत खोजबीन के बाद इसका एक पाठ अभी इस देश की संस्था इसरो के पास केवल उपलब्ध है ऐसे सैकड़ों ग्रंथ का अनुभव कराता यह लेख आपको अपने पूर्वजों पर गर्व करने के लिए पर्याप्त है जो भाई इस संबंध में यदि आप गुप्त सहयोग करना चाहते हैं वह संपर्क करें 9336919081 अजय कर्मयोगी
भारतीय #शिक्षा_व्यवस्था के सन्दर्भ में कुछ प्रश्न मेरे मन को विगत कुछ दिनों से लगातार झकझोर रहे हैं। यह एक निर्विवाद तथ्य है कि पूरे देश में शिक्षा-प्रणाली को लेकर बहस हो रही है और विभिन्न #शिक्षाविदों ने स्कूली #शिक्षा में वैकल्पिक प्रयोग किए जाने को लेकर अपने सुझाव दिए हैं। कुछ शिक्षाविदों ने इस सन्दर्भ में निजी स्तर पर #पाठशाला, #गुरुकुल और #स्कूल खोलने के प्रयास भी किए हैं। लेकिन कुल मिलाकर ‘स्कूल’ शब्द कहते ही हमारे दिमाग में कौन-सा चित्र उभरता है? वही बेंच-डेस्कवाला कमरा न!

आधुनिक शिक्षा-प्रणाली में हम देखते हैं कि पब्लिक स्कूलों में बहुत छोटी उम्र से ही, खेलने-कूदने की उम्र में, मासूम बच्चे पर बस्ते का बोझ लाद दिया जाता है, घर में माता-पिता अपनी महत्त्वाकांक्षा में बच्चे का बचपन निर्ममतापूर्वक कुचल रहे होते हैं। बच्चे को कभी भी उनकी #नैसर्गिक रुचि के अनुसार कुछ करने या किसी ख़ास विषय का चयन करने नहीं दिया जाता, क्योंकि वैसा पाठ्यक्रम ही तैयार नहीं हुआ है। बच्चे का स्कूल में यंत्रवत् पढ़ाई-लिखाई करना, घर आते ही होमवर्क में जुट जाना, तोते की तरह रटना और #एग्ज़ाम! बच्चे के माता-पिता उससे पूछते हैं— तुम बड़े होकर क्या बनोगे? बच्चा कुछ कहे, इससे पहले माता-पिता कहते हैं- ‘बोलो मैं बड़ा होकर डॉक्टर बनूँगा’ या ‘मैं बड़ा होकर इंजीनियर बनूँगा’। शायद ही कोई माँ-बाप अपने बच्चे से कहते होंगे कि ‘तुम बड़े होकर लता मंगेशकर की तरह एक महान् गायिक/गायिका बनना’ या ‘तुम बड़े होकर राजा रवि वर्मा की तरह चित्रकार बनना’। कहने का तात्पर्य यह कि बच्चे के मन में माता-पिता अपने सपने को ठूँस देते हैं। इस तरह अपने सपने को साकार करने करने के लिए माता-पिता बच्चे, विद्यालय और #ट्यूशन के बीच अपना अत्यधिक समय, शक्ति और धन बर्बाद करते हैं। इसके साथ अपने बच्चे का हँसता-मुस्कुराता बचपन भी नष्ट कर डालते हैं।

देशभर के बच्चों पर थोपी गई शिक्षा-प्रणाली ने देश में क्या बदलाव लाया है? आज देश अलगाववाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद और जातिवाद की ऐसे भयानक दलदल में फँस गया है, जहाँ से उसे निकालने का मार्ग नहीं मिल रहा है। आधुनिक शिक्षा-प्रणाली, जो स्पष्ट तौर पर #यूरोपीय शिक्षा-प्रणाली है, ने देश का कौन-सा कल्याण किया है? विगत तीन शताब्दियों का इतिहास उलटकर देख लीजिये— इस प्रणाली से हमने कितने #पाणिनि, #पतञ्जलि, #चाणक्य, #कालिदास, #रामानुजाचार्य, #आर्यभट्ट, #वराहमिहिर, #तुलसीदास, आदि पैदा किए हैं?

उल्लेखनीय है कि भारत के विश्वविद्यालयों में #संस्कृत, #दर्शन, #ज्योतिष, #वेद, आदि विभागों के अंतर्गत वेदव्यास, वाल्मीकि, वसिष्ठ, #भर्तृहरि, #कणाद, पाणिनि, पतञ्जलि, #कात्यायन, #भारवि, #मम्मट, #नारद, #अमर सिंह, #शबरस्वामी, #स्कन्दस्वामी, #शंकराचार्य, #अभिनवगुप्त, #भवभूति, #भृगु, #भोज, #बोधायन, #ब्रह्मगुप्त, #हेमचन्द्राचार्य, चाणक्य, #भास, #वाणभट्ट, #क्षेमेन्द्र, #कपिल, #उदयनाचार्य, #भास्कराचार्य, #नागार्जुन, #दण्डी, रामानुजाचार्य, #गौड़पाद, #नागसेन, कालिदास, #कबीर, #सूरदास, तुलसीदास, आदि के द्वारा रचित ग्रंथों पर हज़ारों शोध-कार्य पिछली शताब्दी में हो चुके हैं और आज भी हो रहे हैं। संस्कृत, #प्राकृत और #हिंदी के ये सभी विद्वान् आज से 500 वर्ष पहले से लेकर 5,000 वर्ष पूर्व या उससे भी अधिक समय पहले हुए हैं। इनके जोड़ का एक भी विद्वान् विगत पाँच शताब्दियों में यदि हुआ हो, तो उसका नाम बताया जाये। इन विद्वानों ने किन शिक्षण-संस्थानों से एम.ए., एमबीए, बी.एड., एम.एड., नेट, जेआरएफ, एस.आर.एफ., डिप्लोमा, पीएच.डी. और डी.लिट्. की उपाधि प्राप्त की थी?

संस्कृत-व्याकरण का अध्ययन करनेवाले विद्यार्थी को पाणिनि की #अष्टाध्यायी के सूत्रों से जूझना होगा, पतञ्जलि के #महाभाष्य से सिर खपाना होगा, #भर्तृहरि के #वाक्यपदीयम् को मथना होगा, हेमचन्द्राचार्य के #शब्दानुशासन में गोता लगाना होगा, भट्टोजी दीक्षित के #सिद्धान्तकौमुदी का पारायण करना होगा, वरदराज के #लघुसिद्धान्तकौमुदी में अवगाहन करना होगा। इनके अध्ययन के बिना क्या व्याकरण का ज्ञान हो सकता है? और इनमें से कौन-सा वैयाकरण विगत 3 शताब्दियों में पैदा हुआ है?

आज भी वास्तुकला, मूर्तिकला तथा चित्रकला का अध्ययन करनेवाले विद्यार्थी को शिल्पविज्ञान के ‘अपराजितपृच्छा’, ‘कामिकागम’, ‘मनुष्यालयचन्द्रिका’, ‘समरांगणसूत्रधार’, ‘राजवल्लभ’, ‘वास्तुसौख्यम्’, ‘विश्वकर्मावास्तुशास्त्र’, ‘विष्णुधर्मोत्तरपुराण’, ‘बृहत्संहिता’, ‘मयमतम्’, आदि संस्कृत के 350 से अधिक ग्रंथों का अध्ययन करना पड़ता है। इन सभी ग्रंथों के ग्रंथकार आज से 500 वर्ष पहले से लेकर 5,000 वर्ष पूर्व के मध्य हुए हैं। विगत डेढ़ सौ वर्षों के कालखण्ड में क्या इनके जैसा एक भी ग्रंथ लिखा गया है?

ज्योतिष का प्रथम श्रेणी का ज्ञान प्राप्त करनेवाले व्यक्ति को ‘बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्’, ‘जातकपारिजात’, ‘आर्यभट्टीयम्’, ‘लघुजातकम्’, ‘मध्यपाराशरी’, ‘सारावली’, ‘वृद्धयवनजातक’, ‘करणप्रकाश’, ‘समरसार’, ‘गर्गहोरा’, ‘भृगुसंहिता’, ‘रावणसंहिता’, ‘दैवज्ञवल्लभ’, ‘बृहज्जातक’, ‘चमत्कारचिन्तामणि’, ‘जातकालंकार’, ‘सूर्यसिद्धान्त’-जैसे संस्कृत के सहस्राधिक मूल ग्रंथों का कठिन अभ्यास करना होगा। इन सभी ग्रंथों के ग्रंथकार आज से 500 वर्ष पहले से लेकर 5,000 वर्ष पूर्व के मध्य हुए हैं। आधुनिक ज्योतिषी इन्हीं विद्वानों के ग्रंथों के सहारे अपनी दुकानें चला रहे हैं।

संस्कृत के सभी प्रसिद्ध नाटकों की सूची पर नज़र डालिये— ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’, ‘मालविकाग्निमित्रम्’, ‘विक्रमोर्वशीयम्’ (कालिदास, प्रथम शताब्दी ई.पू.); ‘स्वप्नवासवदत्ता’, ‘यज्ञफल’, ‘प्रतिमानाटकम्’, ‘दूतवाक्य’, ‘उरुभंग’ (भास, प्रथम शताब्दी); ‘रत्नावली’, ‘प्रियदर्शिका’, ‘नागानन्द’ (हर्षवर्धन, 7वीं शताब्दी); ‘उत्तररामचरितम्’, ‘मालतीमाधवम्’, ‘महावीरचरितम्’ (भवभूति, 7वीं शताब्दी); ‘मृच्छकटिकम्’ (शूद्रक, तृतीय-छठी शताब्दी); ‘कर्पूरमंजरी’, ‘विद्धशालभंजिका’, ‘बालरामायण’, ‘बालभारत’ (राजशेखर, 10वीं शताब्दी); ‘मुद्राराक्षस’ (विशाखदत्त, 400 ई.); ‘वासवदत्ता’ (सुबन्धु); ‘सारिपुत्रप्रककरण’ (अश्वघोष); ‘वेणीसंहार’ (भट्टनारायण, 7वीं शताब्दी), ‘अनर्घराघव’ (मुरारि), ‘आश्चर्यचूड़ामणि’ (शकितभद्र, 9वीं शताब्दी), ‘हनुमन्नाटकम्’ (दामोदर मिश्र, 9वीं शताब्दी), ‘कुन्दमाला’ (दिङ्नाग, 1000 ई.), ‘प्रबोधचन्द्रोदय’ (कृष्ण मिश्र, 1100 ई.), ‘किरातार्जुनीयव्यायोग’, ‘कर्पूरचरित’, ‘हास्यचूडामणि’, ‘रक्मिणीहरण’, ‘त्रिपुरदाह’, ‘समुद्रमन्थन’ (वत्सराज, 12वीं शताब्दी), ‘प्रसन्नराघव’ (जयदेव, 12वीं शताब्दी), आदि। विगत तीन शताब्दियों में हुए एक भी बड़े नाटककार का नाम किसी को याद है ?

आज दुनियाभर में काम या सेक्स पर चर्चा हो रही है। भारत के ऋषि-मुनियों ने इस विषय पर भी शताधिक ग्रंथों की रचना की थी— #कामसूत्र (वात्स्यायन), ‘कामप्रबोध’ (व्यास जर्नादन), ‘कामरत्न’ (नित्यनाथ), ‘कामसमूह’ (अनन्त), ‘कन्दर्पचूडामणि’ (वीरभद्रदेव), ‘रतिरहस्यदीपिका’ (कांचीनाथ), ‘रतिरत्नदीपिका’ (इम्मादि प्रौढ़देवराय), ‘स्त्रीविलास’ (देश्वेश्वर), ‘अनंगरंग’ (कल्याणमल्लदेव, 16वीं शताब्दी), ‘कामप्रदीप’ (गुणाकर), ‘कुट्टिनीमतम्’ (दामोदरगुप्त), ‘रतिरहस्य’ (कोक्कोक), ‘रतिशास्त्रम्’ (नागार्जुन), ‘पंचसायक’ (कविशेखर ज्योतिरीश्वर), ‘शृंगारदीपिका’ (हरिहर), आदि। कामकला पर इतना मंथन दुनिया में कहीं हुआ है?

1 लाख 10 हज़ार श्लोकोंवाला दुनिया का सबसे बड़ा महाकाव्य #महाभारत भारत में ही लिखा गया, और वह भी आज से 200 या 300 साल पहले नहीं, अपितु 5,100 वर्ष पहले। 24,000 श्लोकोंवाले #वाल्मीकीयरामायण को ‘आदिकाव्य’ कहा जाता है। इन दोनों के अतिरिक्त संस्कृत के कुछ अन्य महाकाव्यों पर नज़र डालिए-
• ‘बुद्धचरितम्’ (अश्वघोष)
• ‘कुमारसम्भवम्’ (कालिदास, प्रथम शताब्दी ई.पू.)
• ‘रघुवंश’ (कालिदास)
• ‘किरातार्जुनीयम्’ (भारवि, छठी शताब्दी)
• ‘शिशुपालवध’ (माघ, 7वीं शताब्दी)
• ‘पृथ्वीराजरासो’ (चन्दबरदाई, 12वीं शताब्दी)
• ‘नैषधीयचरित्र’ (श्रीहर्ष, 12वीं शताब्दी)
• ‘श्रीरामचरितमानस’ (तुलसीदास, 16वीं शताब्दी)
उपर्युक्त महाकाव्यों के अतिरिक्त बीसवीं-इक्कीसवीं शती में रचित एक भी उल्लेखनीय महाकाव्य का नाम बताइये।

काव्यशास्त्र का अध्ययन करनेवाले व्यक्ति को मम्मट की ‘काव्यप्रकाश’, राजशेखर की ‘काव्यमीमांसा’, रुय्यक का ‘अलंकारसर्वस्व’, गोविन्द ठक्कुर का ‘काव्यप्रदीप’, विश्वनाथ कविराज का ‘काव्यप्रकाशदर्पण’, विश्वनाथ का ‘साहित्यदर्पण’, दण्डी का ‘काव्यादर्श’, आनन्दवर्धन का ‘ध्वन्यालोक’, माणिक्यचन्द्र का ‘काव्यप्रकाशसंकेत’, केशव मिश्र का ‘अलंकारशेखर’, ‘अग्निपुराण’ आदि प्रसिद्ध ग्रंथों को पढ़ना पड़ेगा, जो आज से 600-700 वर्ष से लेकर कम-से-कम 2,000 वर्ष पूर्व तक विद्यमान रहे थे।

इसी प्रकार भारत ने दुनिया को युद्ध-नीति, अर्थशास्त्र, आयुर्वेद, शल्य, रसायन, भौतिकी, पराभौतिकी (खगोलविज्ञान), ब्रह्मविद्या, अणुविज्ञान, जीवविज्ञान, आदि अनेक विषयों पर सर्वप्रथम मौलिक ग्रंथ प्रदान किए थे। दुनियाभर के वैज्ञानिक वैदिक मंत्रों की महाशक्ति पर शोध-कार्य कर रहे हैं और हमलोग उन्हें पौरोहित्य वर्ग से जोड़ने में ही गौरव अनुभव कर रहे हैं।

विगत कुछ समय से अपने देश में एक शब्द का बहुत प्रचार हुआ है— ‘जगद्गुरु’ या ‘विश्वगुरु’। ‘भारत एक समय विश्वगुरु था और हम उसे पुनः विश्वगुरु बनायेंगे’— यह विचार बड़े-बड़े लोग व्यक्त करते हैं। परन्तु भारत को ‘विश्वगुरुत्व’ या ‘जगद्गुरुत्व’ कैसे प्राप्त हुआ था, इसका कोई चित्र वे विद्वान् हमारे सामने नहीं रखते। भारत को ‘विश्वगुरु’ या ‘जगद्गुरु’ की पदवी उसकी शिक्षा-व्यवस्था के कारण प्राप्त हुई थी। भारतवर्ष ने दुनिया को विभिन्न विषयों के महान् विद्वान् और महान् ग्रन्थ सौंपे, वे विद्वान् किसी कॉन्वेंट स्कूल की उपज नहीं थे, वे विद्वान् गुरुकुल-प्रणाली से पले-बढ़े थे। हमारे यहाँ कहा जाता था— एतद्देश प्रसूतस्य सकासादग्रजन्मना। स्वं स्वयं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः। (#मनुस्मृति, 2.20) अर्थात्, ‘इस देश में जन्मे लोगों से दुनिया के लोग चरित्र-निर्माण की शिक्षा लें।’ क्या इस श्लोक को आज का भारत गर्व से दुहरा सकता है?

#गान्धार, #तक्षशिला, #राजगृह के समीप #नालन्दा, भागलपुर-स्थित #विक्रमशिला एवं काठियावाड़ के #वल्लभी विश्वविद्यालयों ने, चाहे #बौद्ध शिक्षा में ही सही, अपने समय में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। #चाणक्य की दुर्धर्ष प्रखरता तक्षशिला से उपजी थी। यहीं के स्नातक उनके प्रथम सहयोगी थे, जिनके सम्मिलित प्रयासों से मौर्य-साम्राज्य की नींव डल सकी। चाणक्य का लोहा पूरी दुनिया मानती है। #कुमारिल भट्ट उस नालन्दा में गढ़े गए, जहाँ समूचे एशिया से छात्र ज्ञानार्जन करने आते थे। भगवत्पाद #शंकराचार्य के योगदान को कौन भुला सकता है, जिन्होंने न केवल चार मठों की स्थापना की, अपितु द्वादश ज्योतिर्लिंगों का व्यवस्थापन किया, #प्रस्थानत्रयी पर भाष्य लिखा, कुम्भ-मेलों को पुनः प्रारम्भ करवाया, अवैदिक मत-मतांतरों से सफलतापूर्वक टक्कर ली। चोल-सम्राट् #देवपाल के समय #विक्रमशिला में गढ़े गए #परिव्राजकों ने भारत ही नहीं, अपितु सुदूर #ब्रह्मदेश, मलाया आदि जगहों पर पहुँचकर ज्ञान का प्रसार किया। पाँचवीं से आठवीं शती तक वल्लभी के स्नातकों ने अकेले काठियावाड़ ही नहीं, समूचे भारत की जनचेतना को जीवन्त और सचेत रखा। यहाँ के आचार्यगण व्यक्तित्वों को ढालने में इतने माहिर थे कि अन्य देशों के लोग भी यहाँ विद्या-अर्जन के लिए तरसते थे। #काशी, #उज्जयिनी, #काञ्चीपुरम, #अमरावती, #औदंतपुरी आदि जगह भी #विद्या के ऐसे ही केन्द्र थे, जहाँ से साधारण व्यक्ति असाधारण प्रखर बनकर निकलते थे। आज के #विश्वविद्यालयों की स्थिति देख लीजिये।

वर्तमान भारत के किसी भी विश्वविद्यालय में विदेशों से पढ़ने आनेवाले छात्रों की संख्या पता कीजिए। आपको संख्या नगण्य मिलेगी। यदि भारत में कोई विदेशी छात्र/शोधार्थी आता भी है, तो वह भारतीय संस्कृति के किसी आयाम पर खोज करने या किसी संस्कृत ग्रंथ/पाण्डुलिपि की तलाश में आता है। कोई भी विदेशी विद्यार्थी एम.बी.ए., एम.बी.बी.एस या पीएच.डी. करने भारत नहीं आता। उलटे भारतीय छात्र इन डिग्रियों के लिए विदेशों की दौड़ खूब लगाते हैं।

क्या हमने कभी इस विषय पर गम्भीरता से चिन्तन किया है कि एक समय दुनिया के कोने-कोने से यहाँ आनेवाले वि़द्यार्थी अब क्यों नहीं आते? भारत में दी जानेवाली आधुनिक शिक्षा-प्रणाली क्या तैयार कर रही है? क्या चाणक्य? क्या शंकराचार्य? क्या विवेकानन्द? क्या कालिदास? क्या भवभूति? क्या वेदव्यास? क्या पाणिनि? क्या पतञ्जलि? क्या तुलसीदास? क्या अश्वघोष? क्या राजशेखर? नहीं। क्या क्लर्क? हाँ। यहाँ की शिक्षा-प्रणाली दिनोंदिन अपनी मौलिकता और रचनात्मकता खोकर नौकरी के इर्द-गिर्द घूम रही है, बच्चे मेधावी कैसे बनेंगे?

एप्पल के सह-संस्थापक स्टीव वॉजनैक ने अभी हाल ही में एक साक्षात्कार में एक कटु किन्तु सत्य बयान दिया कि भारत में जॉब मिलने को सफलता कहा जाता है, किन्तु इसमें रचनात्मकता कहाँ है? स्टीव वॉजनैक ने वर्तमान शिक्षा-प्रणाली की ओर इशारा करके कहा कि वर्तमान भारतीय शिक्षा-व्यवस्था पढ़ाई पर टिकी है, लेकिन रचनात्मकता को बढ़ावा नहीं देती है। उन्होंने कहा कि आप कितने टैलेंटेड हैं? अगर आप इंजीनियर हैं या एम.बी.ए. हैं, तो अपनी डिग्री पर इठलाइये, लेकिन खुद से पूछिये कि आपमें कितनी रचनात्मकता है। स्टीव ने कहा कि उन्हें इस बात की उम्मीद नहीं है कि भारत में गूगल, फेसबुक और एप्पल-जैसी दुनिया की बड़ी कम्पनियाँ तैयार हो सकती हैं; क्योंकि भारतीयों के पास रचनात्मकता की कमी है और उन्हें इस तरह के कॅरियर के लिए बढ़ावा भी नहीं दिया जाता है। उन्होंने कहा कि ‘भारत में सफलता का मतलब ऐकडमिक ऐक्सेलेंस, पढ़ाई, सीखना, अच्छी जॉब और भौतिक सुख-सुविधाओं का उपभोग करते हुए एक बेहतर जीवन जीना है। न्यूजीलैंड जैसे छोटे देश को देखिए जहाँ लेखक, सिंगर, खिलाड़ी हैं और यह एक अलग दुनिया है।

स्टीव वॉजनैक ने बिलकुल ठीक इंगित किया है कि आज के भारतीय युवा का उद्देश्य बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में नौकरी और उसके द्वारा आजीविका प्राप्त करना या कहिए भौतिक संसाधनों को जुटाना मुख्य है और वह उसी को समस्त सुख-शान्ति का मूलाधार समझ रहा है। क्या हमने आधुनिक शिक्षा-पद्धति की पूरी पड़ताल की है जिसका उद्देश्य ज़्यादा-से-ज़्यादा धन कमाना है, और उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए इसमें किसी प्रकार के साधन अपनाने की खुली छूट दी गई है। महाविद्यालय/विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर की नौकरी पानेवाला उस योग्य है भी अथवा नहीं, यह न देखकर उसके द्वारा लाया गया सिफ़ारशी पत्र देखा जाता है। एक छात्र प्रशासक, डॉक्टर, प्रोफेसर या इंजीनियर आदि आदि कुछ भी किन्हीं भी तरीकों से बने, परन्तु बने अवश्य— यह आज के शिक्षाविद् और राजनेता चाहते हैं; उसमें नैतिकता-जैसे श्रेष्ठ मानवोचित गुणों का समावेश हुआ या नहीं— यह उनकी कल्पना से बहुत दूर की बात है। आज शिक्षा का उद्देश्य केवल मानव को साक्षर करना और उसके द्वारा नौकरी लेकर भोजन, वस्त्र तथा आवास जैसी सुविधाएँ प्राप्त हो जायें— यह चिन्तन हर आधुनिक शिक्षाशास्त्री को उद्वेलित करता है। इसी मानसिकता के अनुरूप प्रत्येक गाँव तक में सरकारी व निजी स्तर पर विद्यालय खोले गए हैं अथवा खोले जा रहे हैं। निजी विद्यालयों, महाविद्यालयों और बहुत से विश्वविद्यालयों ने इसे एक व्यवसाय के रूप में स्वीकार किया है और भारी-भरकम फ़ीस के द्वारा खूब कमाई भी कर रहे हैं। ऐसे में चाणक्य, पाणिनि, पतंजलि, तुलसीदास, आदि कहाँ से पैदा होंगे?
गुँजन अग्रवाल संकलन अजय कर्मयोगी

स्वास्थ्य का शतक


योग की कुछ 100 जानकारी जिसका ज्ञान सबको होना चाहिए*
1.योग,भोग और रोग ये तीन अवस्थाएं है।
2. *लकवा* - सोडियम की कमी के कारण होता है ।
3. *हाई वी पी में* - स्नान व सोने से पूर्व एक गिलास जल का सेवन करें तथा स्नान करते समय थोड़ा सा नमक पानी मे डालकर स्नान करे ।
4. *लो बी पी* - सेंधा नमक डालकर पानी पीयें ।
5. *कूबड़ निकलना*- फास्फोरस की कमी ।
6. *कफ* - फास्फोरस की कमी से कफ बिगड़ता है , फास्फोरस की पूर्ति हेतु आर्सेनिक की उपस्थिति जरुरी है । गुड व शहद खाएं
7. *दमा, अस्थमा* - सल्फर की कमी ।
8. *सिजेरियन आपरेशन* - आयरन , कैल्शियम की कमी ।
9. *सभी क्षारीय वस्तुएं दिन डूबने के बाद खायें* ।
10. *अम्लीय वस्तुएं व फल दिन डूबने से पहले खायें* ।
11. *जम्भाई*- शरीर में आक्सीजन की कमी ।
12. *जुकाम* - जो प्रातः काल जूस पीते हैं वो उस में काला नमक व अदरक डालकर पियें ।
13. *ताम्बे का पानी* - प्रातः खड़े होकर नंगे पाँव पानी ना पियें ।
14. *किडनी* - भूलकर भी खड़े होकर गिलास का पानी ना पिये ।
15. *गिलास* एक रेखीय होता है तथा इसका सर्फेसटेन्स अधिक होता है । गिलास अंग्रेजो ( पुर्तगाल) की सभ्यता से आयी है अतः लोटे का पानी पियें, लोटे का कम सर्फेसटेन्स होता है ।
16. *अस्थमा , मधुमेह , कैंसर* से गहरे रंग की वनस्पतियाँ बचाती हैं ।
17. *वास्तु* के अनुसार जिस घर में जितना खुला स्थान होगा उस घर के लोगों का दिमाग व हृदय भी उतना ही खुला होगा ।
18. *परम्परायें* वहीँ विकसित होगीं जहाँ जलवायु के अनुसार व्यवस्थायें विकसित होगीं ।
19. *पथरी* - अर्जुन की छाल से पथरी की समस्यायें ना के बराबर है ।
20. *RO* का पानी कभी ना पियें यह गुणवत्ता को स्थिर नहीं रखता । कुएँ का पानी पियें । बारिस का पानी सबसे अच्छा , पानी की सफाई के लिए *सहिजन* की फली सबसे बेहतर है ।
21. *सोकर उठते समय* हमेशा दायीं करवट से उठें या जिधर का *स्वर* चल रहा हो उधर करवट लेकर उठें ।
22. *पेट के बल सोने से* हर्निया, प्रोस्टेट, एपेंडिक्स की समस्या आती है ।
23. *भोजन* के लिए पूर्व दिशा , *पढाई* के लिए उत्तर दिशा बेहतर है ।
24. *HDL* बढ़ने से मोटापा कम होगा LDL व VLDL कम होगा ।
25. *गैस की समस्या* होने पर भोजन में अजवाइन मिलाना शुरू कर दें ।
26. *चीनी* के अन्दर सल्फर होता जो कि पटाखों में प्रयोग होता है , यह शरीर में जाने के बाद बाहर नहीं निकलता है। चीनी खाने से *पित्त* बढ़ता है ।
27. *शुक्रोज* हजम नहीं होता है *फ्रेक्टोज* हजम होता है और भगवान् की हर मीठी चीज में फ्रेक्टोज है ।
28. *वात* के असर में नींद कम आती है ।
29. *कफ* के प्रभाव में व्यक्ति प्रेम अधिक करता है ।
30. *कफ* के असर में पढाई कम होती है ।
31. *पित्त* के असर में पढाई अधिक होती है ।
33. *आँखों के रोग* - कैट्रेक्टस, मोतियाविन्द, ग्लूकोमा , आँखों का लाल होना आदि ज्यादातर रोग कफ के कारण होता है ।
34. *शाम को वात*-नाशक चीजें खानी चाहिए ।
35. *प्रातः 4 बजे जाग जाना चाहिए* ।
36. *सोते समय* रक्त दवाव सामान्य या सामान्य से कम होता है ।
37. *व्यायाम* - *वात रोगियों* के लिए मालिश के बाद व्यायाम , *पित्त वालों* को व्यायाम के बाद मालिश करनी चाहिए । *कफ के लोगों* को स्नान के बाद मालिश करनी चाहिए ।
38. *भारत की जलवायु* वात प्रकृति की है , दौड़ की बजाय सूर्य नमस्कार करना चाहिए ।
39. *जो माताएं* घरेलू कार्य करती हैं उनके लिए व्यायाम जरुरी नहीं ।
40. *निद्रा* से *पित्त* शांत होता है , मालिश से *वायु* शांति होती है , उल्टी से *कफ* शांत होता है तथा *उपवास* ( लंघन ) से बुखार शांत होता है ।
41. *भारी वस्तुयें* शरीर का रक्तदाब बढाती है , क्योंकि उनका गुरुत्व अधिक होता है ।
42. *दुनियां के महान* वैज्ञानिक का स्कूली शिक्षा का सफ़र अच्छा नहीं रहा, चाहे वह 8 वीं फेल न्यूटन हों या 9 वीं फेल आइस्टीन हों ,
43. *माँस खाने वालों* के शरीर से अम्ल-स्राव करने वाली ग्रंथियाँ प्रभावित होती हैं ।
44. *तेल हमेशा* गाढ़ा खाना चाहिएं सिर्फ लकडी वाली घाणी का , दूध हमेशा पतला पीना चाहिए ।
45. *छिलके वाली दाल-सब्जियों से कोलेस्ट्रोल हमेशा घटता है ।*
46. *कोलेस्ट्रोल की बढ़ी* हुई स्थिति में इन्सुलिन खून में नहीं जा पाता है । ब्लड शुगर का सम्बन्ध ग्लूकोस के साथ नहीं अपितु कोलेस्ट्रोल के साथ है ।
47. *मिर्गी दौरे* में अमोनिया या चूने की गंध सूँघानी चाहिए ।
48. *सिरदर्द* में एक चुटकी नौसादर व अदरक का रस रोगी को सुंघायें ।
49. *भोजन के पहले* मीठा खाने से बाद में खट्टा खाने से शुगर नहीं होता है ।
50. *भोजन* के आधे घंटे पहले सलाद खाएं उसके बाद भोजन करें ।
51. *अवसाद* में आयरन , कैल्शियम , फास्फोरस की कमी हो जाती है । फास्फोरस गुड और अमरुद में अधिक है
52. *पीले केले* में आयरन कम और कैल्शियम अधिक होता है । हरे केले में कैल्शियम थोडा कम लेकिन फास्फोरस ज्यादा होता है तथा लाल केले में कैल्शियम कम आयरन ज्यादा होता है । हर हरी चीज में भरपूर फास्फोरस होती है, वही हरी चीज पकने के बाद पीली हो जाती है जिसमे कैल्शियम अधिक होता है ।
53. *छोटे केले* में बड़े केले से ज्यादा कैल्शियम होता है ।
54. *रसौली* की गलाने वाली सारी दवाएँ चूने से बनती हैं ।
55. हेपेटाइट्स A से E तक के लिए चूना बेहतर है ।
56. *एंटी टिटनेस* के लिए हाईपेरियम 200 की दो-दो बूंद 10-10 मिनट पर तीन बार दे ।
57. *ऐसी चोट* जिसमे खून जम गया हो उसके लिए नैट्रमसल्फ दो-दो बूंद 10-10 मिनट पर तीन बार दें । बच्चो को एक बूंद पानी में डालकर दें ।
58. *मोटे लोगों में कैल्शियम* की कमी होती है अतः त्रिफला दें । त्रिकूट ( सोंठ+कालीमिर्च+ मघा पीपली ) भी दे सकते हैं ।
59. *अस्थमा में नारियल दें ।* नारियल फल होते हुए भी क्षारीय है ।दालचीनी + गुड + नारियल दें ।
60. *चूना* बालों को मजबूत करता है तथा आँखों की रोशनी बढाता है ।
61. *दूध* का सर्फेसटेंसेज कम होने से त्वचा का कचरा बाहर निकाल देता है ।
62. *गाय की घी सबसे अधिक पित्तनाशक फिर कफ व वायुनाशक है ।*
63. *जिस भोजन* में सूर्य का प्रकाश व हवा का स्पर्श ना हो उसे नहीं खाना चाहिए
64. *गौ-मूत्र अर्क आँखों में ना डालें ।*
65. *गाय के दूध* में घी मिलाकर देने से कफ की संभावना कम होती है लेकिन चीनी मिलाकर देने से कफ बढ़ता है ।
66. *मासिक के दौरान* वायु बढ़ जाता है , 3-4 दिन स्त्रियों को उल्टा सोना चाहिए इससे गर्भाशय फैलने का खतरा नहीं रहता है । दर्द की स्थति में गर्म पानी में देशी घी दो चम्मच डालकर पियें ।
67. *रात* में आलू खाने से वजन बढ़ता है ।
68. *भोजन के* बाद बज्रासन में बैठने से *वात* नियंत्रित होता है ।
69. *भोजन* के बाद कंघी करें कंघी करते समय आपके बालों में कंघी के दांत चुभने चाहिए । बाल जल्द सफ़ेद नहीं होगा ।
70. *अजवाईन* अपान वायु को बढ़ा देता है जिससे पेट की समस्यायें कम होती है
71. *अगर पेट* में मल बंध गया है तो अदरक का रस या सोंठ का प्रयोग करें
72. *कब्ज* होने की अवस्था में सुबह पानी पीकर कुछ देर एडियों के बल चलना चाहिए ।
73. *रास्ता चलने*, श्रम कार्य के बाद थकने पर या धातु गर्म होने पर दायीं करवट लेटना चाहिए ।
74. *जो दिन मे दायीं करवट लेता है तथा रात्रि में बायीं करवट लेता है उसे थकान व शारीरिक पीड़ा कम होती है ।*
75. *बिना कैल्शियम* की उपस्थिति के कोई भी विटामिन व पोषक तत्व पूर्ण कार्य नहीं करते है ।
76. *स्वस्थ्य व्यक्ति* सिर्फ 5 मिनट शौच में लगाता है ।
77. *भोजन* करते समय डकार आपके भोजन को पूर्ण और हाजमे को संतुष्टि का संकेत है ।
78. *सुबह के नाश्ते* में फल , *दोपहर को दही* व *रात्रि को दूध* का सेवन करना चाहिए ।
79. *रात्रि* को कभी भी अधिक प्रोटीन वाली वस्तुयें नहीं खानी चाहिए । जैसे - दाल , पनीर , राजमा , लोबिया आदि ।
80. *शौच * के समय मुंह बंद रखें , भोजन के समय टी वी ना देखें ।
81. *मासिक चक्र* के दौरान स्त्री को ठंडे पानी से स्नान , व आग से दूर रहना चाहिए ।
82. *जो बीमारी जितनी देर से आती है , वह उतनी देर से जाती भी है ।*
83. *जो बीमारी अंदर से आती है , उसका समाधान भी अंदर से ही होना चाहिए ।*
84. *एलोपैथी* ने एक ही चीज दी है , दर्द से राहत । आज एलोपैथी की दवाओं के कारण ही लोगों की किडनी , लीवर , आतें , हृदय ख़राब हो रहे हैं । एलोपैथी एक बिमारी खत्म करती है तो दस बिमारी देकर भी जाती है ।
85. *खाने* की वस्तु में कभी भी ऊपर से नमक नहीं डालना चाहिए , ब्लड-प्रेशर बढ़ता है ।
86 . *रंगों द्वारा* चिकित्सा करने के लिए इंद्रधनुष को समझ लें , पहले जामुनी , फिर नीला ..... अंत में लाल रंग ।
87 . *छोटे* बच्चों को सबसे अधिक सोना चाहिए , क्योंकि उनमें वह कफ प्रवृति होती है , स्त्री को भी पुरुष से अधिक विश्राम करना चाहिए
88. *जो सूर्य निकलने* के बाद उठते हैं , उन्हें पेट की भयंकर बीमारियां होती है , क्योंकि बड़ी आँत मल को चूसने लगती है ।
89. *बिना शरीर की गंदगी* निकाले स्वास्थ्य शरीर की कल्पना निरर्थक है , मल-मूत्र से 5% , कार्बन डाई ऑक्साइड छोड़ने से 22 %, तथा पसीना निकलने लगभग 70 % शरीर से विजातीय तत्व निकलते हैं ।
90. *चिंता , क्रोध , ईर्ष्या करने से गलत हार्मोन्स का निर्माण होता है जिससे कब्ज , बबासीर , अजीर्ण , अपच , रक्तचाप , थायरायड की समस्या उतपन्न होती है ।*
91. *गर्मियों में बेल , गुलकंद , तरबूजा , खरबूजा व सर्दियों में सफ़ेद मूसली , सोंठ का प्रयोग करें ।*
92. *प्रसव* के बाद माँ का पीला दूध बच्चे की प्रतिरोधक क्षमता को 10 गुना बढ़ा देता है । बच्चो को टीके लगाने की आवश्यकता नहीं होती है ।
93. *रात को सोते समय* सर्दियों में देशी मधु लगाकर सोयें त्वचा में निखार आएगा
94. *दुनिया में कोई चीज व्यर्थ नहीं , हमें उपयोग करना आना चाहिए*।
95. *जो अपने दुखों* को दूर करके दूसरों के भी दुःखों को दूर करता है , वही मोक्ष का अधिकारी है ।
96. *सोने से* आधे घंटे पूर्व जल का सेवन करने से वायु नियंत्रित होती है , लकवा , हार्ट-अटैक का खतरा कम होता है ।
97. *स्नान से पूर्व और भोजन के बाद पेशाब जाने से रक्तचाप नियंत्रित होता है*।
98 . *तेज धूप* में चलने के बाद , शारीरिक श्रम करने के बाद , शौच से आने के तुरंत बाद जल का सेवन निषिद्ध है
99. *त्रिफला अमृत है* जिससे *वात, पित्त , कफ* तीनो शांत होते हैं । इसके अतिरिक्त भोजन के बाद पान व चूना । देशी गाय का घी , गौ-मूत्र भी त्रिदोष नाशक है ।
100. इस विश्व की सबसे मँहगी *दवा। लार* है , जो प्रकृति ने तुम्हें अनमोल दी है ,इसे ना थूके ।
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गुरुवार, 9 मई 2019

जगतगुरु आदि शंकराचार्य जयंती


   


वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम्
यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते ...
आद्यशंकराचार्य जयंती पर सभी को  बधाई
कृते विश्व गुरु ब्रह्मा त्रेतायामृषि सत्तमा:।
द्वापरे व्यास एव स्यात् कलावत्र भवाम्यहम्।।
सतयुग में जगद्गुरु ब्रह्मा
त्रेता में ऋषिश्रेष्ठ दत्तात्रेय
द्वापर में व्यास जी
तथा कलियुग में मैं शंकराचार्य गुरु हूँ।
  2500 वर्ष पूर्व केरल राज्य के कालड़ी नामक ग्राम मे पूर्णा नदी के तट पर पिता शिवगुरु तथा माता आर्याम्बा के यहा भगवान शिव के  ज्ञानावतार के रूप में श्रीमद् जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य भगवान का प्रादुर्भाव वैशाख शुक्ल पंचमी तिथि को हुआ था,जिसे शंकराचार्य जयंती के रूप में सनातन धर्मी मनाते है। शंड्.कर अवतार श्रीमज्जगदगुरू आद्य शंड्कराचार्य जी महाराज ने वैदिक सनातन धर्म का पुनरोद्धार कर चार शंड्कराचार्य पीठों की स्थापना की थी।
श्रुति स्मृति पुराणानाम् आलयम् करूणालयम् ।
नमामि भगवत्पादम् शंड्करं लोकशंड्करम् ।।
सदाशिव समारंभा शंकराचार्य मध्यमाम् !!
अस्मदाचार्य पर्यंतां वंदे गुरु परंपराम्|| #सर्वांना_आद्य_श्रीशंकराचार्य_जयंत
  #हार्दिक_शुभेच्छा#
बारह सौ नहीं लगभग ढाई हजार साल पहले #कालड़ी में हुआ था #आद्य_शंकराचार्य का जन्म
 #यूरोपीय और #वामपंथी इतिहासकारों ने #काञ्ची_कामकोटि_मठ के 38वें शंकराचार्य #अभिनव_शंकर (788-840 ई.) को आद्य शंकराचार्य के रूप में प्रचारित किया।
अभिनव शंकर 788 ई. में कांची कामकोटि पीठ पर शंकराचार्य के रूप में विराजमान हुए थे। उनके और आद्य शंकराचार्य का जीवनचरित इतना मेल खाता है कि अभिनव शंकर को ही आद्य शंकराचार्य कहकर प्रचारित किया गया। अभिनव शंकर का जन्म #चिदम्बरम् में हुआ था। आद्य शंकर का जन्म कालड़ी में हुआ था, लेकिन एक परम्परा उनका जन्मस्थान चिदम्बरम् मानती है। अभिनव शंकर और आद्य शंकर ने भारत की अत्यधिक यात्राएँ कीं, दोनों #हिमालय गए, #दत्तात्रेय-गुफा में प्रविष्ट हुए, फिर उनका कुछ पता न चला। इसी आधार पर 8वीं शती में हुए अभिनव शंकर को आद्य शंकराचार्य कहकर प्रचारित किया गया। इस दृष्टि से प्रचलित इतिहास में लगभग 1,300 वर्ष की त्रुटि दृष्टिगत होती है। इस भूल से भारतीय ऐतिहासिक #कालानुक्रम #Chronology में एक बहुत बड़ी गलती हुई। आचार्य शंकर के #काल को 1,300 वर्ष पीछे ले जाने से यह सिद्ध होता है कि #भगवान्_बुद्ध, #अश्वघोष, #नागार्जुन आदि की प्रचलित— पाश्चात्य लेखकों द्वारा सुझाई तथाकथित तिथियाँ— भी अशुद्ध हैं।
#आद्य_शंकर की तिथि का निर्धारण किए बिना भारतीय इतिहास त्रुटिपूर्ण कालक्रम से मुक्त नहीं हो सकता है। वस्तुतः भारतीय ऐतिहासिक कालानुक्रम में #महर्षि_वेदव्यास, #बुद्ध, #चाणक्य और #शंकर की तिथियाँ वे महत्त्वपूर्ण पड़ाव हैं, जहाँ से हम इतिहास की अन्य बहुत-सी तिथियाँ सुनिश्चित कर सकते हैं और #महाभारत, उससे पूर्व #वाल्मीकीय #रामायण तथा उससे भी पूर्व #वेद का सही-सही काल-निर्धारण कर सकते हैं। विगत दशकों में #भारतीय_इतिहास में कालानुक्रम-विषयक अनेक नयी खोजें हुई हैं। ये खोजें आचार्य शंकर की तिथि को संशोधित किए जाने की मांग कर रही हैं।
श्रीमज्जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य और शंकराचार्य-परम्परा
भारत में वैदिकधर्म के पुनर्जागरण के इतिहास में भगवत्पाद जगद्गुरु आद्यशंकराचार्य का नाम सर्वोपरि है। आद्य शंकराचार्य के महान् व्यक्तित्व में धर्म-सुधारक, समाज-सुधारक, दार्शनिक, कवि, साहित्यकार, योगी, भक्त, गुरु, कर्मनिष्ठ, विभिन्न सम्प्रदायों एवं मतों के समन्वयकर्त्ता-जैसे रूप समाहित थे। उनका महान् व्यक्तित्व सत्य के लिए सर्वस्व का त्याग करनेवाला था। उन्होंने शास्त्रीय ज्ञान की प्राप्ति के साथ ब्रह्मत्व का भी अनुभव किया था। उनके व्यक्तित्व में अद्वैतवाद, शुद्धाद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद और निर्गुण ब्रह्म के साथ सगुण-साकार की भक्ति की धाराएँ समाहित थीं। ‘जीव ही ब्रह्म है, अन्य नहीं’ पर जोर देनेवाले आदि शंकराचार्य ने ‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या’ का उद्धोष किया और बताया कि अद्वैत ज्ञान ही सभी साधनाओं की परम उपलब्धि है। उन्होंने अपने अकाट्य तर्क से शैव, शाक्त और वैष्णवों का द्वंद्व समाप्त कर पञ्चदेवोपासना का मार्ग दिखाया। कुछ विद्वान् शंकराचार्य पर बौद्ध शून्यवाद का प्रभाव देखते हैं। आचार्य शंकर में मायावाद पर महायान बौद्ध चिन्तन का प्रभाव मानकर उनको ‘प्रच्छन्न बुद्ध’ कहा गया। आचार्य शंकर के उपदेश आत्मा और पमात्मा की एकरूपता पर आधारित हैं।
आचार्य शंकर ने मात्र 32 वर्ष की अल्पायु में देश को एकसूत्र में पिरोने और वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए जितना कार्य किया, वह अनुपम है। उनके समस्त कार्यों का मूल्यांकन करना लेखनी के वश की बात नहीं है। देश के चार स्थानों पर मठों की स्थापना करके वहाँ ‘शंकराचार्य’ की नियुक्ति; दशनामी संन्यासियों का संगठन बनाकर उनके लिए अखाड़ों और महामण्डलेश्वर की व्यवस्था; कुम्भ-मेलों और द्वादश ज्योतिर्लिंगों का व्यवस्थापन; प्रस्थानत्रयी (उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र और भगवद्गीता) पर भाष्य तथा अद्वैतवेदान्त के अनेक मौलिक ग्रंथों एवं स्तोत्रों की रचना तथा अवैदिक मत-मतांतरवाले अनेक विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित करके सनातन-धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा-जैसे अनेक कार्य शंकराचार्य को एक लौकिक मानव से ऊपर अलौकिक की श्रेणी में प्रतिष्ठित करते हैं।
शांकर मठ परम्परा :
जगदगुरु आद्य शंकराचार्य ने सनातन-धर्म के प्रचार-प्रसार, गुरु-शिष्य परम्परा के निर्वहन, शिक्षा, उपदेश और संन्यासियों के प्रशिक्षण और दीक्षा, आदि के लिए देश के भिन्न-भिन्न स्थानों पर 4 मठों या पीठों की स्थापना की और वहाँ के मठाध्यक्ष (मठाधीश, महंत, पीठाधीश, पीठाध्यक्ष) को ‘शंकराचार्य’ की उपाधि दी। इस प्रकार ये मठाधीश, आद्य शंकराचार्य के प्रतिनिधि माने जाते हैं और ये प्रतीक-चिह्न, दण्ड, छत्र, चँवर और सिंहासन धारण करते हैं। ये अपने जीवनकाल में ही अपने सबसे योग्य शिष्य को उत्तराधिकारी घोषित कर देते हैं। यह उल्लेखनीय है कि आद्य शंकराचार्य से पूर्व ऐसी मठ-परम्परा का संकेत नहीं मिलता। आद्य शंकराचार्य ने ही यह महान् परम्परा की नींव रखी थी। इसलिए ‘शंकराचार्य’ हिंदू-धर्म में सर्वोच्च धर्मगुरु का पद है जो कि बौद्ध-सम्प्रदाय में ‘दलाईलामा’ एवं ईसाइयत में ‘पोप’ से भी श्रेष्ठ देवतुल्य माने जाते है।
आद्य शंकराचार्य द्वारा स्थापित मठों को शांकर_मठ भी कहा जाता है। इन मठों में संन्यास लेने के बाद दीक्षा लेनेवाले संन्यासी के नाम के बाद एक विशेषण लगा दिया जाता है जिससे यह संकेत मिलता है कि यह संन्यासी किस मठ से है और वेद की किस परम्परा का वाहक है। सभी मठ अलग-अलग वेद के प्रचारक होते हैं और इनका एक विशेष महावाक्य होता है। इनका विवरण इस प्रकार है :
• ज्योतिर्मठ— यह मठ उत्तराखण्ड के बद्रीकाश्रम में है। इस मठ की स्थापना सर्वप्रथम, 492 ई.पू. में हुई। यहाँ दीक्षा लेने वाले संन्यासियों के नाम के बाद ‘गिरि’, ‘पर्वत’ और ‘सागर’ विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उस संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है। इस पीठ का महावाक्य ‘अयमात्म ब्रह्म’ है। यहाँ अथर्ववेद-परम्परा का पालन किया जाता है। आद्य शंकराचार्य ने तोटकाचार्य इस पीठ का प्रथम शंकराचार्य नियुक्त किया था। ब्रह्मलीन पुज्य स्वामी कृष्णबोधाश्रम महाराज जी के पश्चात वर्तमान समय तक मठ का आचार्य-पद विवादित है, जो बहुत ही चिंताजनक है।
• शृंगेरी शारदा मठ— यह मठ कर्नाटक के शृंगेरी में अवस्थित है। इस मठ की स्थापना 490 ई.पू. में हुई। यहाँ दीक्षा लेने वाले संन्यासियों के नाम के बाद ‘सरस्वती’, ‘भारती’, ‘पुरी’ नामक विशेषण लगाया जाता है। इस मठ का महावाक्य ‘अहं ब्रह्मास्मि’ है। यहाँ यजुर्वेद-परम्परा का पालन किया जाता है। सुरेश्वराचार्य (मण्डन मिश्र) यहाँ के प्रथम शंकराचार्य नियुक्त किए गए थे। सम्प्रति स्वामी भारती तीर्थ महास्वामी इस पीठ के शंकराचार्य हैं।
• द्वारका_शारदा मठ— यह मठ गुजरात के द्वारका में अवस्थित है। इस मठ की स्थापना 489 ई.पू. में हुई। इस मठ में दीक्षा लेने वाले संन्यासियों के नाम के बाद ‘तीर्थ’ और ‘आश्रम’ विशेषण लगाया जाता है। यहाँ का वेद सामवेद और महावाक्य ‘तत्त्वमसि’ है। इस मठ के प्रथम शंकराचार्य हस्तामालकाचार्य थे। हस्तामलक आदि शंकराचार्य के प्रमुख चार शिष्यों में से एक थे। वर्तमान में स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती इसके 79वें मठाधीश हैं।
• गोवर्धन_मठ— यह ओड़ीशा के जगन्नाथपुरी में है। इस मठ की स्थापना 486 ई.पू. में हुई। इस मठ में दीक्षा लेनेवाले संन्यासियों के नाम के बाद ‘आरण्य’ विशेषण लगाया जाता है। यहाँ का वेद ऋग्वेद है। इस मठ का महावाक्य ‘प्रज्ञानम् ब्रह्म’ है। आद्य शंकराचार्य ने अपने प्रथम शिष्य पद्मपादाचार्य को इस मठ का प्रथम शंकराचार्य नियुक्त किया था। सम्प्रति स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती यहाँ के 145वें शंकराचार्य हैं।
• काञ्ची कामकोटि मठ— यह मठ तमिलनाडु के काञ्चीपुरम् में अवस्थित है। आद्य शंकराचार्य देश के चार कोनों में मठों की स्थापना करके अपने जीवन का शेष समय व्यतीत करने के लिए 482 ई.पू. में काञ्चीपुरम् में रहने लगे थे। तभी से उनका निवास-स्थान मठ में परिवर्तित हो गया और कालांतर में ‘काञ्ची कामकोटि मठ’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। आद्य शंकराचार्य जब तक उस मठ में रहे, तब तक उस मठ के अध्यक्ष स्वयं रहे। 477 ई.पू. में हिमालय जाने से पूर्व उन्होंने शृंगेरी शारदा मठ के अध्यक्ष सुरेश्वराचार्य को काञ्ची का भी अतिरिक्त कार्यभार सौंपा। सम्प्रति स्वामी शंकर विजयेन्द्र सरस्वती यहाँ के 70वें शंकराचार्य हैं।
• उपर्युक्त पाँचों मठों के अतिरिक्त भी भारत में कई अन्य जगह ‘शंकराचार्य’ की उपाधि लगानेवाले मठ मिलते हैं। यह इस प्रकार हुआ कि कुछ शंकराचार्यों के शिष्यों ने अपने मठ स्थापित कर लिये एवं अपने नाम के आगे भी ‘शंकराचार्य’ उपाधि लगाने लगे। परन्तु असली शंकराचार्य उपरोक्त पाँचों मठों पर आसीन को ही माना जाता है।
आद्य शंकराचार्य का काल :
भारतीय इतिहास और संस्कृति की अति प्राचीन और अविच्छिन्न परम्परा से अपरिचित पश्चिमी विद्वानों की यह साग्रह धारणा रही कि भारतीय सभ्यता बहुत अधिक प्राचीन नहीं है। अतः उन्होंने अपनी इस पूर्वकल्पित धारणा के सामंजस्य में भारतीय तिथिक्रम को तोड़ा-मरोड़ा। उन्होंने जीसस के बाद ही किसी महान् घटना को सिद्ध करने के लिए शंकर की तिथि को जान-बूझकर 788-820 ई. में रखा, ताकि उनकी (यूरोप) श्रेष्ठता स्थापित हो सके। जबकि वास्तविकता तो यह है कि शृंगेरी के शंकराचार्य नृसिंह भारती से पूर्व ये इतिहासकार आचार्य शंकर के जन्मस्थान तक का पता नहीं लगा सके थे, जबकि शंकर के जन्मकाल से अधिक विवादग्रस्त विषय भारतीय इतिहास में शायद ही कुछ हो। विदेशी और भारतीय इतिहासकारों ने भारत के परंपरागत इतिहास को अप्रामाणिक मानकर जिन प्रमाणों के आधार पर शंकराचार्य को 8वीं शती का माना है, वे प्रमाण तर्क और तथ्य की कसौटी पर थोथे सिद्ध हुए।
आद्य शंकराचार्य के काल-निर्धारण में आज भी वैज्ञानिक दृष्टि से काम लेने की आवश्यकता है। देश के प्रतीकपुरुष शंकराचार्य के जन्मकाल के सम्बन्ध में पाश्चात्य मत से प्रभावित अधिकांश इतिहासकारों द्वारा प्रतिपादित 788-820 ई. को प्रामाणिक मानकर कई शोधकर्ताओं ने डॉक्टरेट की उपाधियाँ भी प्राप्त कर ली हैं। जबकि शांकर-मठाम्नाय एवं अन्य प्राचीन परम्परा आचार्य शंकर का स्थिति-काल 509-477 ई.पू. निश्चित करती है। गोवर्धन मठ, द्वारका शारदा मठ और काञ्ची कामकोटि मठ में क्रमशः 145, 79 और 70 उत्तराधिकारियों (शंकराचार्यों) की अविच्छिन्न परम्परा चली आ रही है और इन तीनों मठों में अपने पूर्ववर्ती शंकराचार्यों की विस्तृत सूची सुरक्षित है जिसमें प्रत्येक शंकराचार्य का वास्तविक नाम, उनका पीठासीन वर्ष, उनका कार्यकाल, उनकी निर्वाण-तिथि, मास, वर्ष तथा स्थान का प्रामाणिकता से उल्लेख है। ये तीनों सूचियाँ सनातन धर्म के विरुद्ध बौद्धिक षड्यंत्र को अब्राह्मिक संस्कृतियों व विश्व की सारे षड्यंत्र कार्यों का पर्दाफाश कर देती हैं 

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...