आचार्य कुमारिल भट्ट ~~~
भारतीय वैदिक इतिहास में कुमारिल भट्ट तथा शंकराचार्य जी दोनों ही वेदों के परमोद्धारक हुए।
कुमारिल ने कर्मकांड पर किये जाने वाले आक्षेपों का मुंहतोड़ उत्तर तथा भगवान् शंकर ने ज्ञानकाण्ड के आक्षेपों का समाधान किया।
कुमारिल की जन्मभूमि के सम्बंध में विद्वानों में मतभेद पाया जाता है।
तिब्बती विद्वान तारानाथ जी ने इन्हें बौद्ध पण्डित धर्मकीर्ति का चाचा बताया है।
कुछलोग कहते है इनका जन्म दक्षिण भारत के "त्रिमलयक" नामक स्थान में हुआ, किन्तु इसमें संदेह है।
आनंद गिरी जी ने अपने दिग्विजय में इनका जन्म उद्ग्देश (उत्तर भारत) में बताया है ।
उद्ग्देश कश्मीर या पंजाब हो सकता है।
पूर्व मीमांसक सालिकनाथ ने इन्हें वार्तिककार भिक्षु कहा है, यह उपाधी उत्तर भारतीय ब्राह्मणों में ही पायी जाती है।
सालिकनाथ कुमारिल से ३०० वर्ष बाद पैदा हुए।
मिथिला के लोग इन्हें मैथिल ब्राह्मण कहते हैं।
कुमारिल धनाढ्यतम गृहस्थ थे। पांच सौ दास तथा दासियां थीं। चूड़ामणि देश के राजा के कुलगुरु थे।
बौद्ध दर्शन के विद्वान धर्मकीर्ति के साथ शास्त्रार्थ तथा उनके हारने की बात आती है।
धर्मकीर्ति त्रिमलय के निवासी थे, यह कुमारिल के पास वेदाध्ययन करने गये किन्तु बौद्घ समझकर इनको नहीं पढ़ाया।
तब ये दास के रूप में उनके घर में रहने लगे। वे इनकी परम् श्रद्धा से इतनी सेवा करने लगे कि पचास आदमी मिलकर भी इतनी सेवा नहीं कर सकते थे।
कुमारिल इनकी सेवा से इतने प्रभावित हुए कि इनको ब्राह्मण विद्यार्थियों के साथ दर्शन शास्त्र सुनने की आज्ञा मिली।
इन्होंने वैदिक दर्शनों के रहस्यों को अतिशीघ्र जान लिया।
तब वह अपने वास्तविक रूप में आये और ब्राह्मणों को शास्त्रार्थ के लिए ललकारा। इन्होंने अनेकों दार्शनिकों को परास्त किया।
तब कुमारिल से शास्त्रार्थ किया, कुमारिल भट्ट भी परास्त हो गये।
इससे क्षुब्ध होकर कुमारिल ने बौद्धों को परास्त करने के उद्दयेश्य से बौद्ध भिक्षु का रूप धारण किया तथा बौद्ध सिद्धांतो का खंडन करने के लिए बौद्ध बनकर उनके शास्त्रों का अध्ययन करने लगे।
श्री शंकराचार्य जी से भी कुमारिल ने कहा था ---- " मैं बौद्घ धर्म की धज्जियां उड़ाना चाहता हूं इसीलिए बौद्घ भिक्षु हुआ।"
उस समय धर्मपाल नामक बौद्घ भिक्षु की कीर्ति चारों ओर फैली हुई थी, वे बौद्घ धर्म के नालन्दा विश्वविद्यालय में अध्यक्ष थे।
क्षणिकविज्ञानवादी होने पर भी उन्होंने योगाचार्य तथा शून्यवाद के मौलिक ग्रन्थों पर पांडित्यपूर्ण टिकाएं लिखी है।
अतः कुमारिल ने धर्मपाल से ही बौद्ध दर्शनों का अध्ययन किया।
एक दिन धर्मपाल ने शिष्यों के प्रति बौद्ध सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुए वेदों की घोर निंदा की।
इस निंदा को सुनकर बौद्ध भिक्षु के रूप में बैठे हुए कट्टर वैदिक धर्मावलम्बी कुमारिल के नेत्रों से अश्रुपात होने लगा।
निकट बैठे हुए भिक्षुओं ने देखा और धर्मपाल को बताया।
धर्मपाल एक बौद्ध भिक्षु को वेदों की निंदा सुनकर आँसू बहाते देखकर आश्चर्य में पड़ गए, तथा पूछा--- "तुम क्यों रोते हो?, क्या वेदनिन्दा सुनकर रोते हो ?"
कुमारिल ने कहा---- "हाँ, यही कारण है। आप वेदों के रहस्यों को बिना जाने ही मनमानी निंदा करते हो।"
इस घटना से कुमारिल का सच्चा रूप प्रगट हुआ। धर्मपाल रुष्ट हुए, इनको हटाने के लिए कहा। परन्तु दुष्ट विद्यार्थियों ने इन्हें वैदिक ब्राह्मण समझकर नालन्दा के ऊँचे शिखर से नीचे गिरा दिया।
वेद विश्वासी कुमारिल जी ने अपने को असहाय जानकर वेदों की शरण ग्रहण की।
राजभवन से नीचे गिरते हुए वह कहने लगे-----
"पतन् पतन् सौधतलान्यरोरुहम्,
यदि प्रमाणो श्रुतयो भवन्ति ।
जीवेम यास्मिन् पतितोऽसम स्थले
मज्जीवनेतत्श्रुतिमानता गति: ।।
यदीह सन्देहपदप्रयोगाद्
व्याजेन शास्त्र श्रवणाच्च हेतो:।
ममोच्चदेशात् पतताव्यनंक्षीत्
तदेकचक्षुर्विधिकल्पना सा ।।"
(यदि श्रुतियाँ प्रमाण है तो इस विषम स्थल पर गिरने से भी मैं जीवित रहूंगा। अर्थात श्रुतियों का प्रमाण ही मेरे जीवन का एकमात्र गति है।
यदि श्रुतियां ही प्रमाण है तो मेरे जीवन की रक्षा होगी , यदि प्रमाण नहीं है तो जीवन की रक्षा नहीं होगी। इसमें संदेहसूचक "यदि" शब्द का प्रयोग करने के कारण मेरा एक नेत्र नष्ट हो गया।)
कुमारिल तथा शंकराचार्य का चार्वाक, जैन, बौद्ध आदि दर्शनों का गम्भीर अध्ययन था, इतना अन्य दार्शनिकों को नहीं था।
इन दोनों की सामर्थ्य केवल संस्कृत ग्रन्थों तक ही सीमित नहीं थी, किन्तु इन्होंने पाली के ग्रन्थों का भी अध्ययन किया था।
इन बातों की पुष्टि माधव कृत दिग्विजय के सातवें सर्ग से होती है।
भगवान शंकराचार्य के समान इन्होंने भी दिग्विजय किया था। उत्तर भारतीय पंडितों को पराजित करने के अनन्तर दक्षिण भारत गये।
कुछ लोगों के मतानुसार वहां पर सुधन्वा राजा राज्य करते थे, इनकी राजधानी उज्जैनी थी, जिसका आजकल पता नहीं चलता।
वे वैदिक धर्मानुयायी होने पर भी जैनियों के पंजे में पड़े थे। कुमारिल दिग्विजय करते हुए उनके राज-दरबार में गये।
ज्ञान के भंडार वेद कूड़े में पड़े हुए थे, वैदिक ब्राह्मणों की निंदा हो रही थी, सुधन्वा को भी वेद में अनास्था हो गई थी, परन्तु रानी की अभी भी वेदों में निष्ठा थी। खिड़की पर बैठी रानी चिंता कर रही थी----
"किं करोमि क्व गच्छामि को वेदानुद्धरिष्यति ।"
(मैं क्या करूँ ?, कहाँ जाऊं ?, वेदों का उद्धार कौन करेगा ?)
कुमारिल मार्ग से जा रहे थे। रानी की हीनता भरी पुकार सुनकर खड़े हो गए तथा उच्च स्वर में कहा-----
"मा विषीद वरारोहे भट्टचार्योऽस्मि भूतले।।"
(हे रानी ! खेद मत करो , मैं भट्टाचार्य पृथ्वी पर विद्यमान हूँ।)
और यह कार्य उन्होंने कर दिखाया।
इन्होंने "जैमिनीय पूर्वमीमांसा" पर लिखे गए "शवरस्वामी" के सुप्रसिद्ध भाष्य पर वार्तिक लिखा है। यह तीन भागों में है---
१.. श्लोक वार्तिक-----
इसमें तीन हजार निन्यानबे अनुष्टुप्छन्द के श्लोक है। यह ग्रँथ चौखम्बा सीरीज काशी से पार्थ सारथी मिश्र की न्यायरत्नाकर टीका सहित प्रकाशित हुआ है। डॉ. गंगनाथ झा ने इसका अंग्रेजी अनुवाद किया है, यह अंग्रेजी अनुवाद "एशियाटिक सोसायटी बंगाल" से प्रकाशित है।
२.. तंत्र वार्तिक-----
इसके प्रथम अध्याय के दूसरे पाद से लेकर तीसरे अध्याय के अंत तक गद्य व्याख्या है। इसमें भट्टपाद की तार्किकता प्रकट होती है। यह ग्रँथ "आनंदाश्रम पूना" से पांच भागों में प्रकाशित हुआ है।
३.. टुप टीका----
यह बहुत छोटा ग्रँथ है। इसमें चौथे अध्याय से लेकर बाहरवें अध्याय तक के शवर भाष्य पर गद्यात्मक संक्षिप्त टिप्पणियां है।
कृष्णदेव ने "तंत्र चूड़ामणि" में इनकी दो अन्य टीकाओं का भी उल्लेख किया है---
१.. वृहत् टीका
२.. मध्यम टीका
३... "मानव कल्पसूत्र" पर इनकी टीका।
"शिवमहिम्न स्तोत्र" पर भी इन्होंने टीका किया है।
इनके अनेकों विद्वान मीमांसक शिष्य थे, जिनके प्रचार-प्रसार से भारत में धार्मिक क्रांति आरम्भ हुआ। जिसमें तीन प्रधान थे----
१... प्रभाकर------ इन्होंने मीमांसा के नवीन मत को जन्म दिया, इनका मत "गुरुमत" कहा जाता है। यह कुमारिल के प्रथम शिष्य थे, गुरुजी ने प्रसन्न होकर इन्हें गुरु की उपाधि दी थी, तबसे इनका मत "गुरुमत" नाम से प्रचलित हुआ।
परन्तु आजकल के संशोधकों को इसमें संदेह है। नवीन संशोधक प्रभाकर को कुमारिल से भी प्राचीन मानते हैं। इन्होंने अपने स्वतन्त्र मत का प्रचार करने के लिए शावर भाष्य पर "वृहती" तथा "लाघ्वी" नाम की टीकाएँ की है। जो अप्रकाशित है।
२... मण्डन मिश्र----- इन्होंने भगवान् शंकराचार्य जी की शिष्यता स्वीकार किया था, इनका चरित्र इस पेज पर पोस्ट किया जा चुका है।
३... उम्बेक (भवभूति)-----
यह बात सप्रमाण सिद्ध हो चुका है कि भवभूति कुमारिल के शिष्य थे।
श्री शंकर पांडुरंग पण्डित को "मालती माधव" नाम की एक प्राचीन हस्तलिखित पुस्तक मिली, जिसके तीसरे अंक के अंत में कुमारिलशिष्य द्वारा विरचित लिखा है।
तथा छठे अंक के अंत में कुमारिल के प्रसाद से वाग्वैभव को प्राप्त करने वाले उम्बेकाचार्य की कृति कही है।
इससे सिद्ध होता है कि भवभूति का एक नाम उम्बेक भी था।
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