बुधवार, 29 दिसंबर 2021

लीलावती ग्रंथ Vadik math ke सुप्रसिद्ध ग्रंथ के निर्माण की भूमिका और भास्कराचार्य की पुत्री एवं कॉल का योगदान

 

 
   गणितज्ञ #लीलावती का नाम हममें से अधिकांश लोगों ने नहीं सुना है। उनके बारे में कहा जाता है कि वो पेड़ के पत्ते तक गिन लेती थी।
शायद ही कोई जानता हो कि आज यूरोप सहित विश्व के सैंकड़ो देश जिस गणित की पुस्तक से गणित को पढ़ा रहे हैं, उसकी रचयिता भारत की एक महान गणितज्ञ महर्षि भास्कराचार्य की पुत्री लीलावती है। आज गणितज्ञो को गणित के प्रचार और प्रसार के क्षेत्र में लीलावती #पुरूस्कार से सम्मानित किया जाता है।
आइए जानते हैं महान गणितज्ञ लीलावती के बारे में जिनके नाम से गणित को पहचाना जाता था।
दसवीं सदी की बात है, दक्षिण भारत में #भास्कराचार्य नामक गणित और ज्योतिष विद्या के एक बहुत बड़े पंडित थे। उनकी कन्या का नाम लीलावती था।
वही उनकी एकमात्र संतान थी। उन्होंने ज्यो‍तिष की गणना से जान लिया कि ‘वह विवाह के थोड़े दिनों के ही बाद विधवा हो जाएगी।’
उन्होंने बहुत कुछ सोचने के बाद ऐसा लग्न खोज निकाला, जिसमें विवाह होने पर कन्या विधवा न हो। विवाह की तिथि निश्चित हो गई। जलघड़ी से ही समय देखने का काम लिया जाता था।
एक बड़े कटोरे में छोटा-सा छेद कर पानी के घड़े में छोड़ दिया जाता था। सूराख के पानी से जब कटोरा भर जाता और पानी में डूब जाता था, तब एक घड़ी होती थी।
पर विधाता का ही सोचा होता है। लीलावती सोलह श्रृंगार किए सजकर बैठी थी, सब लोग उस शुभ लग्न की प्रतीक्षा कर रहे थे कि एक मोती लीलावती के आभूषण से टूटकर कटोरे में गिर पड़ा और सूराख बंद हो गया; शुभ लग्न बीत गया और किसी को पता तक न चला।
विवाह दूसरे लग्न पर ही करना पड़ा। लीलावती विधवा हो गई, पिता और पुत्री के धैर्य का बांध टूट गया। लीलावती अपने पिता के घर में ही रहने लगी।
पुत्री का वैधव्य-दु:ख दूर करने के लिए भास्कराचार्य ने उसे गणित पढ़ाना आरंभ किया। उसने भी गणित के अध्ययन में ही शेष जीवन की उपयोगिता समझी।
थोड़े ही दिनों में वह उक्त विषय में पूर्ण पंडिता हो गई। पाटी-गणित, बीजगणित और ज्योतिष विषय का एक ग्रंथ ‘सिद्धांतशिरोमणि’ भास्कराचार्य ने बनाया है। इसमें गणित का अधिकांश भाग लीलावती की रचना है।
पाटीगणित के अंश का नाम ही भास्कराचार्य ने अपनी कन्या को अमर कर देने के लिए ‘लीलावती’ रखा है।
भास्कराचार्य ने अपनी बेटी लीलावती को गणित सिखाने के लिए गणित के ऐसे सूत्र निकाले थे जो काव्य में होते थे। वे सूत्र कंठस्थ करना होते थे।
उसके बाद उन सूत्रों का उपयोग करके गणित के प्रश्न हल करवाए जाते थे।कंठस्थ करने के पहले भास्कराचार्य लीलावती को सरल भाषा में, धीरे-धीरे समझा देते थे।
वे बच्ची को प्यार से संबोधित करते चलते थे, “हिरन जैसे नयनों वाली प्यारी बिटिया लीलावती, ये जो सूत्र हैं…।” बेटी को पढ़ाने की इसी शैली का उपयोग करके भास्कराचार्य ने गणित का एक महान ग्रंथ लिखा, उस ग्रंथ का नाम ही उन्होंने “लीलावती” रख दिया।
आजकल गणित एक शुष्क विषय माना जाता है पर भास्कराचार्य का ग्रंथ ‘लीलावती‘ गणित को भी आनंद के साथ मनोरंजन, जिज्ञासा आदि का सम्मिश्रण करते हुए कैसे पढ़ाया जा सकता है,
इसका नमूना है। लीलावती का एक उदाहरण देखें- ‘निर्मल कमलों के एक समूह के तृतीयांश, पंचमांश तथा षष्ठमांश से क्रमश: शिव, विष्णु और सूर्य की पूजा की, चतुर्थांश से पार्वती की और शेष छ: कमलों से गुरु चरणों की पूजा की गई।
अये, बाले लीलावती, शीघ्र बता कि उस कमल समूह में कुल कितने फूल थे..?‘
उत्तर-120 कमल के फूल।
वर्ग और घन को समझाते हुए भास्कराचार्य कहते हैं ‘अये बाले,लीलावती, वर्गाकार क्षेत्र और उसका क्षेत्रफल वर्ग कहलाता है।
दो समान संख्याओं का गुणन भी वर्ग कहलाता है। इसी प्रकार तीन समान संख्याओं का गुणनफल घन है और बारह कोष्ठों और समान भुजाओं वाला ठोस भी घन है।‘
‘मूल” शब्द संस्कृत में पेड़ या पौधे की जड़ के अर्थ में या व्यापक रूप में किसी वस्तु के कारण, उद्गम अर्थ में प्रयुक्त होता है।
इसलिए प्राचीन गणित में वर्ग मूल का अर्थ था ‘वर्ग का कारण या उद्गम अर्थात् वर्ग एक भुजा‘।
इसी प्रकार घनमूल का अर्थ भी समझा जा सकता है। वर्ग तथा घनमूल निकालने की अनेक विधियां प्रचलित थीं।
लीलावती के प्रश्नों का जबाब देने के क्रम में ही “सिद्धान्त शिरोमणि” नामक एक विशाल ग्रन्थ लिखा गया, जिसके चार भाग हैं- (1) लीलावती (2) बीजगणित (3) ग्रह गणिताध्याय और (4) गोलाध्याय।
‘लीलावती’ में बड़े ही सरल और काव्यात्मक तरीके से गणित और खगोल शास्त्र के सूत्रों को समझाया गया है।
अकबर के दरबार के विद्वान फैजी ने सन् 1587 में “लीलावती” का #फारसी भाषा में अनुवाद किया।
अंग्रेजी में “लीलावती” का पहला अनुवाद जे. वेलर ने सन् 1716 में किया।
कुछ समय पहले तक भी भारत में कई शिक्षक गणित को दोहों में पढ़ाते थे। जैसे कि पन्द्रह का पहाड़ा…तिया पैंतालीस, चौके साठ, छक्के नब्बे… अट्ठ बीसा, नौ पैंतीसा…।
इसी तरह कैलेंडर याद करवाने का तरीका भी पद्यमय सूत्र में था, “सि अप जूनो तीस के, बाकी के इकतीस, अट्ठाईस की फरवरी चौथे सन् उनतीस!” इस तरह गणित अपने पिता से सीखने के बाद लीलावती भी एक महान गणितज्ञ एवं खगोल शास्त्री के रूप में जानी गयी।
मनुष्य के मरने पर उसकी कीर्ति ही रह जाती है अतः आज गणितज्ञो को लीलावती पुरूस्कार से सम्मानित किया जाता है।
हमारे पास बहुत कीमती इतिहास है जिसे छोड़कर हम आधुनिकता की दौड़ में विदेशों की नकल कर रहे हैं

शनिवार, 18 दिसंबर 2021

दत्तात्रेय जयंती जिन्हें सर्वोच्च गुरु माना जाता

दत्त जयंती – पूर्वजों को मुक्ति देने वाले श्री दत्तात्रेय जी की जयंती  प्रत्येक वर्ष मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन, दत्त जयंती उत्सव न केवल महाराष्ट्र में अपितु महाराष्ट्र के बाहर भी मनाई जाती है। आनंद के वातावरण में मनाए जाने वाले इस त्योहार में कुछ जगहों पर जन्मोत्सव मनाने की परंपरा है। इस अवसर पर कहीं-कहीं दत्त यज्ञ का आयोजन किया जाता है। दत्त जयंती के अवसर पर बड़ी संख्या में भक्त गुरुचरित्र का पाठ करते हैं। यह दत्त जयंती के महत्व को रेखांकित करता है । इस वर्ष दत्त जयंती 18 दिसंबर को है। पिछले दो वर्षों से कोरोना महामारी के कारण हिंदू त्योहारों को मनाने पर रोक लगी हुई है। अभी यह त्योहार कुछ नियमों के साथ भावपूर्ण वातावरण में मनाते हुए, आइए इस अवधि के दौरान ‘श्री गुरुदेव दत्त’ का अधिक से अधिक जप करके दत्तगुरु की कृपा का लाभ उठाएं। संतों के कहे अनुसार नाम संकीर्तन साधना आसान है, इस से जन्मों जन्मों के पाप जल जाते हैं । नाम स्मरण के महत्व को ध्यान में रखते हुए ऐसा करने का प्रयास हो, ऐसे श्री दत्त गुरु के चरणों में प्रार्थना है। वर्तमान लेख में दत्त देवता का इतिहास और दत्त जयंती मनाने की पद्धति के बारे में  जानकारी देने का प्रयास किया है। मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन शाम को मृग नक्षत्र में दत्त का जन्म हुआ था, इसलिए उस दिन सभी दत्त क्षेत्रों में दत्त जयंती मनाई जाती है। दत्त जयंती का महत्व – दत्त जयंती के दिन दत्त तत्व सामान्य से 1000 गुना अधिक पृथ्वी पर कार्यरत रहता है। इस दिन दत्त का नाम जप आदि उपासना करने से दत्त तत्व का अधिकतम लाभ मिलता है। कैसे मनाएं जन्मोत्सव – दत्त जयंती मनाने की कोई शास्त्रोक्त विशिष्ट विधि नहीं है। इस त्योहार से पहले सात दिनों तक गुरुचरित्र का पाठ करने की प्रथा है। इसे गुरुचरित्र सप्ताह कहा जाता है। भक्ति के प्रकार जैसे भजन, पूजन और विशेष रूप से कीर्तन आदि प्रचलन में हैं। महाराष्ट्र में जैसे औदुंबर, नरसोबा की वाडी, गाणगापुर आदि आदि स्थानों पर इस पर्व का विशेष महत्व है। दत्त जयंती तमिलनाडु में भी मनाई जाती है। कुछ स्थानों पर इस दिन दत्त यज्ञ किया जाता है। दत्त यज्ञ के बारे में जानकारी – दत्त यज्ञ में, पवमान पंचसूक्त संस्करण (जप) और उसके दशमांश या एक तिहाई घी और तिल से हवन करते हैं। दत्त यज्ञ के लिए किए जाने वाले जपों की संख्या निश्चित नहीं है। स्थानीय पुजारियों के आदेश के अनुसार जप और हवन किया जाता है। पुराणों के अनुसार जन्म का इतिहास – अत्रि ऋषि की पत्नी अनुसूया एक पतिव्रता स्त्री थी। पतिव्रता होने कारण उनके पास बहुत ही सामर्थ्य था जिसके कारण इन्द्रादि देव घबरा गए थे और ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास जाकर उन्होंने कहा की सती अनसूया के वरदान के कारण किसी को भी देवता का स्थान प्राप्त हो सकता है इसलिए आप कुछ उपाय करें अन्यथा हम उनकी सेवा करेंगे, यह सुनकर त्रिमूर्ति बोले कि वह कितनी बड़ी पतिव्रता और सती है वह हम देखेंगे।    एक बार अत्रि ऋषि अनुष्ठान के लिए बाहर गए, तो त्रिमूर्ति एक अतिथि के रूप में आए और अनुसूया से भीख माँगने लगे। अनुसूया ने उत्तर दिया, “ऋषि अनुष्ठान के लिए बाहर गए हैं। उनके आने तक रुको।” तब त्रिदेव ने अनुसूया से कहा, “ऋषि  को लौटने में समय लगेगा। हम बहुत भूखे हैं। हमें तुरंत भोजन दो, नहीं तो हम कहीं और चले जाएंगे। हमने सुना है कि ‘आश्रम में आने वाले अतिथियों को आप इच्छानुसार भोजन देते हैं’; इसलिए हम यहां इच्छित भोजन करने आए हैं।” और वे भोजन करने बैठ गए। जैसे ही भोजन आया, उन्होंने कहा, “आपकी सुंदरता को देखते हुए, हम चाहते हैं कि आप हमें विवस्त्र होकर भोजन कराएं ।” मेरा मन शुद्ध है, तो कामदेव की क्या बात है? ऐसा विचार कर के उसने अतिथियों से कहा, “मैं विवस्त्र हो कर आप को भोजन कराऊंगी ।” आप आनंद से खाना। ”फिर वह रसोई में गई और अपने पति का चिंतन कर के प्रार्थना कर के सोचा,” मेहमान मेरे बच्चे हैं ”और नग्न होकर भोजन परोसने आई । उन्होंने मेहमानों के स्थान पर तीन बच्चों को रोता हुआ देखा। वह उन्हें एक ओर ले गई और स्तनपान कराया तथा बच्चों ने रोना बंद कर दिया। अत्रि ऋषि आए। उसने उन्हें सारी कहानी सुनाई। उन्होंने कहा, “स्वामी देवेन दत्त।” इसका अर्थ है – “हे स्वामी, ईश्वर द्वारा दिए हुए बच्चे (बच्चे)।” इसलिए अत्री जी ने बच्चों का दत्त ऐसे नामकरण किया । बच्चे पालने में रहे और ब्रह्मा, विष्णु और महेश उनके सामने खड़े हो गए और प्रसन्न होकर वर मांगने के लिए कहा । अत्री और अनुसूया ने, “बच्चे हमारे घर में रहने चाहिए।” यह वर मांगा । बाद में ब्रह्मा से चन्द्रमा, विष्णु से दत्त और शंकर से दुर्वासा हुए । तीनों में से, चंद्र और दुर्वासा तपस्या के लिए जाने की अनुमति लेकर क्रमशः चंद्रलोक की ओर तीर्थक्षेत्र गए। तीसरे, दत्त विष्णुकार्य के लिए पृथ्वी पर ही रहे । दत्त अवतार – दत्त के परिवार का अर्थ – दत्त के पीछे गाय अर्थात पृथ्वी और चार कुत्ते चार वेद हैं। औदुंबर वृक्ष दत्त का एक श्रद्धेय रूप है; क्योंकि इसमें दत्त तत्व अधिक प्रमाण में है। दत्तगुरु ने पृथ्वी को अपना गुरु बनाया और पृथ्वी से सहिष्णु और सहनशील होना सीखा। साथ ही अग्नि को गुरु बनाकर यह शरीर क्षणभंगुर है, यह सीखा । इस प्रकार, दत्तगुरु ने चराचर में प्रत्येक वस्तु में ईश्वर के अस्तित्व को देखने के लिए चौबीस गुरु बनाए। ‘श्रीपाद श्रीवल्लभ’ दत्त के प्रथम अवतार ‘श्री नृसिंह सरस्वती’ दूसरे अवतार, माणिकप्रभु तीसरे अवतार और श्री स्वामी समर्थ महाराज चौथे अवतार थे। चार पूर्ण अवतार और कई आंशिक अवतार हैं। जैन दत्तगुरु को ‘नेमिनाथ’ और मुसलमान ‘फकीर’ के रूप में देखते हैं। दत्त भगवान प्रतिदिन बहुत भ्रमण करते थे। वे स्नान करने हेतु वाराणसी जाते थे, चंदन लगाने के लिए हेतु प्रयाग जाते थे प्रतिदिन भिक्षा कोल्हापुर, महाराष्ट्र में मांगते थे दोपहर के भोजन  पंचालेश्वर, महाराष्ट्र के  बीड जिले के गोदावरी के पात्र में लेते थे । पान ग्रहण करने के लिए महाराष्ट्र के मराठवाड़ा जिले के राक्षसभुवन जाते हैं, तथा जबकि  प्रवचन और कीर्तन बिहार के नैमिषारण्य में सुनने जाते हैं। निद्रा करने के लिए माहुरगड़ और योग गिरनार में करने जाते थे । दत्तपूजा के लिए, सगुण मूर्ति की अपेक्षा पादुका और औदुंबर वृक्ष की पूजा करते हैं। पूर्व काल में, मूर्ति अधिकतर एकमुखी होती थीं परन्तु आजकल त्रिमुखी मूर्ति अधिक प्रचलित हैं। दत्त गुरुदेव हैं। दत्तात्रेय को सर्वोच्च गुरु माना जाता है। उन्हें गुरु के रूप में पूजा जाता है । ‘श्री गुरुदेव दत्त’, ‘श्री गुरुदत्त’ इस प्रकार उनका जयघोष किया जाता है। ‘दिगंबर दिगंबर श्रीपाद वल्लभ दिगंबर’ यह नाम धुन है । दत्तात्रेय के कंधे पर एक झोली है। इसका अर्थ इस प्रकार है- झोली मधुमक्खी का प्रतीक है। जैसे मधुमक्खियां एक जगह से दूसरी जगह जाकर शहद इकट्ठा करती हैं , वैसे ही दत्त घर-घर जाकर भिक्षा मांगकर झोली में इकट्ठा करते हैं। घर-घर जाकर भिक्षा माँगने से अहंकार शीघ्र कम हो जाता है; तथा झोली भी अहंकार के विनाश का प्रतीक है। दत्त जयंती उत्सव को भावपूर्ण करने के लिए करने के प्रयास –  महिलाएं साड़ी पहन सकती हैं और पुरुष सात्विक वस्त्र जैसे धोती, कुर्ता पहन सकते हैं। सात्विक वेशभूषा से भक्तों को अधिक लाभ हो सकता है । ‘श्रीदत्तात्रेय कवच’ का पठन करने के साथ-साथ दत्त नाम का जप विद्यार्थियों के लिए लाभकारी हो सकता है। उत्सव स्थल पर ऊंची आवाज में संगीत नहीं बजना चाहिए, रज तम निर्माण करने वाली बिजली की रोशनी ना करें। दत्त जयंती के जुलूस में ताल, मृदंग जैसे सात्विक वाद्य यंत्रों का प्रयोग करना चाहिए

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...