माँ_शेरावालिये_या_बाघावालिये। देश आज़ाद हुआ, राष्ट्रीय पशु के लिए किसी को सोचना नहीं पड़ा, सीधे शेर को चुन लिया। फिर राष्ट्रीय चिन्ह भी अशोक चक्र जिस में चार शेर हैं। बाकि विष्णु जी के अवतार नरसिंह भी शेर ही हैं। 1972 में राष्ट्रीय पशु शेर के स्थान पर बाघ को अपना लिया गया। वैसे बाघ भी अच्छा जानवर है मगर शेर के मुक़ाबले कहीं नहीं टिकता। तो बात ये है की राष्ट्रीय पशु शेर से बाघ हो गया, टीपू सुल्तान ने बाघ को अपने राज्य का प्रतीक बनाया, अपने झंडे में बाघ का चित्र लगाया। इस के अलावा शायद ही किसी राजा ने बाघ को राजप्रतीक बनाया हो। इस टीपू सुल्तान को सम्मान देने के लिए उस के वंशजों ने बाघ को राष्ट्र पशु घोषित कर दिया। 46 साल हो गए, मगर देश के किसी सरकारी ग़ैर सरकारी प्रतीकों में बाघ नहीं है। केवल RBI को छोड़ कर। RBI आज़ादी से पहले अंगरेजो ने बनाया था। पिछले साल 5 Oct को गिर में 23 शेरों को मौत हो गयी थी। अभी लास्ट जहाँ तक मेरे को याद है इस समय 2200 बाघ हैं और केवल 411 शेर, जिस में से 23 ये निपट गए थे। टाइगर रिज़र्व प्रोजेक्ट चलता है भारत में UN और वर्ल्ड बैंक की मदद से। इस को बोलते है ग़ुलामी नस नस में भर देना। जिस वस्तु से हिंदू धर्म जूड़े गा उस को मिटा दिया जाएगा। अब भारत के किसी प्रतीक में बाघ नहीं लगा पाए मगर........ पहला नवरात्रा है। ओ माँ शेरावाली, ओ माँ मेहरावली मेरी बिगड़ी तू बनादे, ओ माँ शेरावाली शेरावाली करती बेड़ा पार है, सबसे बड़ी मेरी मैया की सरकार है, अब इस में से शेर हटा दो बाघ लगा दो, टीपू सुल्तान का बाघ। ओ माँ बाघावाली, ओ माँ मेहरावली मेरी बिगड़ी तू बनादे, ओ माँ बाघावाली बाघावाली करती बेड़ा पार है, सबसे बड़ी मेरी मैया की सरकार है, 1972 से ये खेल चालू है आज माँ की फ़ोटो से शेर ग़ायब हो गया वहाँ बाघ आ गया। दुर्गा माँ का वाहन शेर है बाघ नहीं। 1972 के आस पास ही संतोषी माता प्रकट हुयी थी अमिताभ बच्चन की फ़िल्मों में, उस ही समय साई प्रकट हुए ऋषि कपूर की क़व्वाली में इस ही समय राष्ट्रीय पशु शेर से बाघ हुआ। टीपू सुल्तान का बाघ। आज दुर्गा माँ को भी बाघ में बैठा दिया। दुर्गा माँ संतोषी माँ नहीं है। जय माँ दुर्गा, जय माँ शेरावाली
सोमवार, 30 सितंबर 2019
भारत के गौरवशाली अतीत के सारे प्रतीकों को कैसे कैसे नष्ट किया जा रहा है धीरे धीरे महाभारत में विकृति चाणक्य सीरियल में भी विकृति मां शेरावाली को जगह बाघा वाली बनाया जा रहा है
माँ_शेरावालिये_या_बाघावालिये। देश आज़ाद हुआ, राष्ट्रीय पशु के लिए किसी को सोचना नहीं पड़ा, सीधे शेर को चुन लिया। फिर राष्ट्रीय चिन्ह भी अशोक चक्र जिस में चार शेर हैं। बाकि विष्णु जी के अवतार नरसिंह भी शेर ही हैं। 1972 में राष्ट्रीय पशु शेर के स्थान पर बाघ को अपना लिया गया। वैसे बाघ भी अच्छा जानवर है मगर शेर के मुक़ाबले कहीं नहीं टिकता। तो बात ये है की राष्ट्रीय पशु शेर से बाघ हो गया, टीपू सुल्तान ने बाघ को अपने राज्य का प्रतीक बनाया, अपने झंडे में बाघ का चित्र लगाया। इस के अलावा शायद ही किसी राजा ने बाघ को राजप्रतीक बनाया हो। इस टीपू सुल्तान को सम्मान देने के लिए उस के वंशजों ने बाघ को राष्ट्र पशु घोषित कर दिया। 46 साल हो गए, मगर देश के किसी सरकारी ग़ैर सरकारी प्रतीकों में बाघ नहीं है। केवल RBI को छोड़ कर। RBI आज़ादी से पहले अंगरेजो ने बनाया था। पिछले साल 5 Oct को गिर में 23 शेरों को मौत हो गयी थी। अभी लास्ट जहाँ तक मेरे को याद है इस समय 2200 बाघ हैं और केवल 411 शेर, जिस में से 23 ये निपट गए थे। टाइगर रिज़र्व प्रोजेक्ट चलता है भारत में UN और वर्ल्ड बैंक की मदद से। इस को बोलते है ग़ुलामी नस नस में भर देना। जिस वस्तु से हिंदू धर्म जूड़े गा उस को मिटा दिया जाएगा। अब भारत के किसी प्रतीक में बाघ नहीं लगा पाए मगर........ पहला नवरात्रा है। ओ माँ शेरावाली, ओ माँ मेहरावली मेरी बिगड़ी तू बनादे, ओ माँ शेरावाली शेरावाली करती बेड़ा पार है, सबसे बड़ी मेरी मैया की सरकार है, अब इस में से शेर हटा दो बाघ लगा दो, टीपू सुल्तान का बाघ। ओ माँ बाघावाली, ओ माँ मेहरावली मेरी बिगड़ी तू बनादे, ओ माँ बाघावाली बाघावाली करती बेड़ा पार है, सबसे बड़ी मेरी मैया की सरकार है, 1972 से ये खेल चालू है आज माँ की फ़ोटो से शेर ग़ायब हो गया वहाँ बाघ आ गया। दुर्गा माँ का वाहन शेर है बाघ नहीं। 1972 के आस पास ही संतोषी माता प्रकट हुयी थी अमिताभ बच्चन की फ़िल्मों में, उस ही समय साई प्रकट हुए ऋषि कपूर की क़व्वाली में इस ही समय राष्ट्रीय पशु शेर से बाघ हुआ। टीपू सुल्तान का बाघ। आज दुर्गा माँ को भी बाघ में बैठा दिया। दुर्गा माँ संतोषी माँ नहीं है। जय माँ दुर्गा, जय माँ शेरावाली
बुधवार, 11 सितंबर 2019
शासन व समाज व्यवस्था के विकृतिकरण से संपूर्ण व्यवस्था का ढांचा चरमराया
अब्राह्मिक संस्कृतियों क्रिश्चियनिटी और इस्लाम वअंग्रेजों के आक्रमण के पहले का भारत का विवेचन करें तो आपको दो सत्ताए से भारत का संचालन होता रहा है एक धर्म सत्ता और दूसरी राज सत्ता है जिसमें धर्म सत्ता का राज्य सत्ता के ऊपर हमेशा ही प्रभुत्व रहा है और समाज को मार्गदर्शन करने वाली धर्म सत्ता से समाज और पुष्पित पल्लवित होता था और समाज की व्यवस्थाएं निर्बाध रूप से चलता रहा पर आज यहां इस देश में दो धाराएं चल रही है
एक तरह समाज दूसरी तरफ है शासन, समाज व्यवस्थाओं के द्वारा, मूल्यों के द्वारा संचालित किया जाता है और शासन कानून के द्वारा, भय के द्वारा संचालित होता है।
अब विचार ना आपको है कि आप व्यवस्था चाहते हो या शासन,मूल्य चाहते हो या कानून। समाज को जीवित करना चाहते हो या शासन को लादना, क्योंकि आज मैं देख रहा हूं कि समाज धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है, मुल्य मिटते जा रहे हैं, व्यवस्थाएं तोड़ी जा रही है और शासन, कानून के द्वारा पूरे मानव समाज को कंट्रोल करने की कोशिश हो रही है।
बहुत कोशिश कर चुके पर दिन पर दिन आतंकवाद, हिंसा,तनाव, युद्ध रुके क्या? खासतौर से भारत देश में।क्योकि भारत की प्रजा आस्थाओं के साथ, धार्मिक मान्यताओं के साथ, मूल्य के साथ जीती आई है। मित्रों पहले समाज को बचाओ, मूल्यों को बचाओ और फिर अगर आवश्यकता पड़ी तो शासन और कानून का उपयोग करो नहीं तो धीरे-धीरे स्थिति यहां तक पहुंच जाएगी कि हर आदमी एक दूसरे को शंका की दृष्टि से देखेगा। चारों तरफ अविश्वास तनाव नफरत व भय होगा।, आप कानून के द्वारा कितना भी कंट्रोल कर लेना पर यह कंट्रोल नहीं होने का और पूरा मानव समाज एक विकृत अवस्था में पहुंच जाएगा।
आज समाज में मूल्य तो रहे नहीं, देखो ना ध्यान से एक तरफ किसान कारीगर छोटा-मोटा दुकानदार जो मेहनत करके किसी तरह अपने परिवार को ईमानदारी के साथ पालने का प्रयास करता था आज उसकी हालत क्या है? पांच से ₹10000 महीने की भी इस महंगाई के युग में उसको गारंटी नहीं है, विचार करो 5 से 10000 में एक परिवार का केवल और केवल भोजन का खर्च भी नहीं निकल सकता पढ़ाई का, दवाई का और अन्य खर्चे की बात तो अलग। दूसरी तरफ इसी देश में एक लाख दो लाख ₹500000 रोज के भी कमाने वाले लोग हैं। यह इतनी बड़ी विषमता की खाई कंहा ले जायेगी हमे?
हमारे यहां एक व्यक्ति हुआ जिसने आदिवासियों का, ग्रामीण वासियों का, मेहनतकश का, किसानों का धन लूट लूट कर सोने की लंका बनाई थी,पर उसे हम आज भी जलाते हैं और राक्षस की श्रेणी में रखते हैं। पर आज यह राक्षस क्या हमारी समझ में आ रहे हैं? मैं मानता हूं की नहीं, इसीलिए नए कानून के द्वारा समाज को कंट्रोल करने की कोशिश की जा रही है पर जब समाज में मूल्य नहीं होंगे सब समाज में ठीक व्यवस्था ही नहीं होगी तो रावण की तरह मानव समाज को कंट्रोल कर पाओगे? समझ लेना बिल्कुल नहीं। उसमें ना तो आज के रावण सुखी होंगे और ना ही पूरी प्रजा, हम लेते जरूर है राम का नाम पर समझे कहां है राम को?
राम का मतलब है जो आम आदमी के साथ जीता हो, जो अंतिम आदमी के बारे में सोचता हो, जो बनवासीयों के साथ अपनेपन के भाव से जीता हो।और उनके अंदर जीने का विश्वास भरता हो, वह है राम।और जो अंत में उपभोक्तावादी शोषण पर आधारित विकास के माड़ल को नाकारता हो।
मित्रों पहले समाज को बचाओ, मूल्यों को बचाओ, फिर अगर आवशकता पड़ी तब कानूनो का उपयोग करो, नहीं तो धीरे-धीरे स्थिति यहां तक पहुंच जाएगी कि आदमी एक दूसरे को शंका की भय की दृष्टि से देखेगा, चारों तरफ अविश्वास व नफरत ही होगी। आप कानून के द्वारा कितना भी कंट्रोल कर लेना फिर भी कंट्रोल नहीं होने का और मानव समाज अव्यवस्था में पहुंच जाएगा । आज समाज में मुल्यों की क्या दशा है, देख ध्यान से, एक तरफ किसान कारीगर छोटा-मोटा दुकानदार जो मेहनत करके किसी तरह अपने परिवार को इमानदारी के साथ पालने का प्रयास करता था आज उस की हालात क्या है? 5 से 10 हजार रुपए महीने की भी इस महंगाई के युग में उसको गारंटी नहीं, तब जियेगा कैसे? और जब जी नहीं पाएगा तो जाने अनजाने में अपराध करने के लिए मजबूर होगा और यह अपराधी धीरे धीरे मानव समाज के अंदर विकृती पैदा करेंगे, युद्धों को आतंकवाद को हिंसा को जन्म देंगे। क्या हम यही चाहते हैं मैं मानता हूं बिल्कुल नहीं।
इसलिए हमको विचार करना होगा कि हम विकास किसे कहेंगे? हमें किस तरफ आगे बढ़ना है, हमें समाज को भी जीवित करना है या नहीं? सरकार ने अब हिंदुओं की परिवार व्यवस्था का तो भोग डाल दिया । गर्ल फ्रेंड को सुरक्षा देनें के लिये भी सरकार यह कानून लाये कि हिन्दू युवक केवल एक गर्ल फ्रेंड ही बना सकता है लेकिन हिन्दू युवती कितने मर्ज़ी बॉय फ्रेंड बना सकती है । यह असली वीमेन एम्पावरमेंट होगी ।
इस घटिया संविधान में हिन्दू परिवार व्यवस्था की सरकार ,संविधान और अदालतें कैसे जड़ें काट रहीं हैं । उसकी एक बानगी देखिये
1. आपकी पत्नी चाहे जितने मर्ज़ी जुल्म ढाए ,चाहे तलाक ना देकर जितनी मर्ज़ी गुलछर्रे उड़ाएं आप दूसरी शादी नहीं कर सकते । लेकिन आप गर्ल friend जितनी मर्ज़ी रख सकते हो ।
2. 16 वर्ष का हिन्दू युवक और युवती शादी नहीं कर सकते लेकिन sex कर सकतें हैं ।
3.यहाँ पर गर्भपात करवाना अधिकार है और हिन्दू औरत को धर्म युक्त सनातन पैदा करने के लिये कहना अपराध है ।
4.यहां हिंदुओं के विवाह को सरकार ने अपराध बना दिया है और live in relation को कानूनी मान्यता दे दी है ।
5.हिंदुओं का विवाह illegal है और वेश्यावृत्ति legal । सरकार ने कोर्ट की मार्फ़त यह कानून बनवा दिया है ।
6 .जल्द ही martial rape का कानून सरकार कोर्ट के माध्यम से पास करवाने जा रही इसके बाद शादी बलात्कार बन जाएगी जिसके बाद हर हिन्दू पति सरकार द्वारा certified बलात्कारी बना दिया जाएगा ।
अगर स्वतंत्रता के बाद ये सरकारें हिन्दुओं के हित में काम कर रही है तो हिन्दू विरोधी सरकार की परिभाषा क्या है ।
अगर हिंदुओं को अब भी लगता है कि यह आज़ादी उनकी है तो वह नितांत मूर्ख हैं । यह संविधान ,सरकार और व्यवस्था केवल हिंदुओं की जड़ें काटने पर तुली है । हिंदुओं के लिये इस आज़ादी का कोई मतलब नहीं ।संपादन अजय कर्मयोगी
बुधवार, 4 सितंबर 2019
पुरी के जगन्नाथ मंदिर के क्षेत्र में 600 साल पुराना बड़ा अखाड़ा मठ को ध्वस्त किया गया जनता में रोष और विरोध
ढहाया जा रहा है ६०० साल पुराना ‘बडा अखाडा’ मठ, राजनीतिक दल विरोध पर उतरे
भुवनेश्वर : पुरी के जगन्नाथ मंदिर के ७५ मीटर के दायरे में आने वाले मठों व अन्य ढांचों को गिराने का मुद्दा राजनीतिक बनता जा रहा है। एमार मठ के बाद अब साधुओं के ‘बडे अखाडे’ का नंबर है। मठों के ध्वस्तीकरण का राजनीतिक लोगों के साथ ही अन्य वर्ग भी विरोध करने लगे हैं।
१२वीं शताब्दी के श्रीजगन्नाथ मंदिर की सुरक्षा के मद्देनजर ७५ मीटर के दायरे में आने वाले वाले निर्माण को अवैध बताकर ढहाया जा रहा है। मठों को ढहाने की कार्रवाई के विरोध में पुरी के शंकराचार्य समेत भाजपा और कांग्रेस ( Odisha Congress ) विरोध कर रही है जबकि बीजेडी ( BJD ) पक्ष में माहौल बनाने में जुटी है। बीते दिनों इस दायरे में आने वाले एमार मठ को ध्वस्त किया गया। एमार मठ लगभग ९०० साल पुराना है। इसका थोडा हिस्सा बाकी है जहां पर मठ के महंत ध्यान मुद्रा में बैठे बताए जाते हैं। मठ ढहाने का विरोध करने का उनका अपना तरीका है। हालांकि गणेश चतुर्थी की छुट्टी के कारण ध्वस्तीकरण बंद है पर राजनीति में हलके में मुद्दा गरम है। श्रीमंदिर की मेघनाद दीवार से लगे लांगुली मठ और एमार मठ गिराने के बाद ओडिशा की धार्मिक राजधानी पुरी में मठ संस्कृति प्रभावित हुई है।
मठ ढहाना बडा दु:खद
एमार मठ के बाद बडा अखाडा मठ गिराया जाएगा। बडा अखाडा मठ के महंत हरिनारायण दास का कहना है कि मठों के ढहाए जाने का दृश्य देखकर दुख होता है। जनता मौन होकर तमाशा देख रही है और मठ तोडे जा रहे हैं। मठों की प्राचीन संस्कृति और परंपरा के संरक्षण को खत्म किया जा रहा है और लोग चुप हैं। इस मठ के लोग शिफ्टिंग की तैयारी में जुटे हैं।
कांग्रेस ने बताया निंदनीय
सत्ताधारी दल बीजू जनता दल को छोडकर बाकी दल पुरी में चलाए जा रहे ध्वस्तीकरण अभियान को लेकर राज्य में नवीन पटनायक सरकार को घेरने में जुट गए हैं। कांग्रेस के विधायक सुरेश राउत कहते हैं कि हिंदू धर्म की प्राचीन परंपरा खंडित की जा रही है, यह निंदनीय है।
रोजगार पर संकट
मठों से हजारों लोगों की रोजी रोटी जुड़ी है जिसे समाप्त किया जा रहा है। सरकार अपने निर्णय पर पुनर्विचार करे। पुरी से भाजपा विधायक जयंत षाडंगी ने मठ ध्वस्तीकरण कार्रवाई की निंदा की। उन्होंने इसे सरकार का अनुचित कार्य बताया। विधायक जयंत का कहना है कि नवीन सरकार को मठों को गिराने से पहले लोगों से राय मशविरा करना चाहिए था। राज्य सरकार के विधि मंत्री प्रताप जेना ने कहा कि लोगों को श्रीमंदिर की सुरक्षा और सौंदर्यीकरण के लिए की जा रही ध्वस्तीकरण की कार्रवाई का स्वागत करना चाहिए। उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं लगता है कि श्रीमंदिर पर किसी तरह की राजनीति करना उचित है।
नागा साधुओं ने स्थापित किया था बडा अखाडा
इतिहासकारों का कहना है कि ‘बडा अखाडा’ मठ १४०२ में नागा साधुओं द्वारा स्थापित किया गया था। इस मठ का उद्देश्य बाहरी आक्रांताओं से श्रीजगन्नाथ मंदिर को बचाना था। यह पुरी तीर्थस्थल आने वाले साधुओं के लिए प्रमुख पवित्र स्थल माना जाता है। बताते हैं कि १४ शताब्दी में श्रीरामानंद का पुरी आना हुआ। उन्होंने मंदिरों की रक्षा के लिए कुछ केंद्र स्थापित किए जिन्हें अखाडा कहा जाता है। यहां पर स्थापना के बाद से ही रीतिनीति और नाम संकीर्तन नियमित होता रहता है। जगन्नाथ संस्कृति और रीतिनीति का यह भी हिस्सा बन चुका है।
सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...
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यह करवा रहे हैं वैज्ञानिक जो कभी इन जानवरों ने भी करना नहीं चाहा, #भगवान बनना चाहता है #इंसान।। यह सिंह (टाइगर) और बब्बर शेर का वर्ण स...
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गलती होने पर कान क्यों पकड़ते हैं गौतम, वसिष्ठ, आपस्तंब धर्मसूत्रों और पाराशर स्मृति सहित अन्य ग्रंथों में ज्ञान की कई बातें बताई गई हैं। इन ...
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शिष्य गुरु का चयन नहीं करता अपितु गुरु शिष्य का चयन स्वयं करता हैं। शिष्य अपने अंदर स्वार्थ लेकर गुरु ढूंढेगा तो उसे केवल कालनेमि गुरु म...



