रविवार, 24 जुलाई 2022

अब बैंक कर्ज़ देकर मुद्रा छाप लेता है । किसी प्रिटिंग press की जरूरत नहीं ।केवल एक entry काफी है

   

   

पहले currency का आधार gold standard हुआ करता था । यानि केंद्रीय बैंक उतनी मुद्रा ही छापता था जितना उसके पास gold reserve है । इससे महंगाई ,उपभोग नियंत्रण में रहता था । पूरा विश्व खुशहाल था । अमीरी गरीब में इतना अंतर नहीं था ।

फिर आया fiat currency का ज़माना , gold standard को त्याग दिया गया । उपभोग को बढ़ाने के लिये fiat currency प्रचलन में आई । इससे महंगाई बढ़ने लगी और सरकारों के पास अथाह शक्ति आ गई खर्च करने की । आजकल के currency notes इस बात का उदहारण है ।

फिर आई बारी reserve financing द्वारा मुद्रा छापने की । जिससे मुद्रा छापने की शक्ति बैंकिंग के पास भी चली गई ।
इससे महंगाई ,गरीबी , धन की लूट ,भ्रष्टाचार बढ़ने लगा । पैसा विदेशों में ट्रांसफर कर विदेशों में भाग जाने का दौर शुरु हुआ ।
अब बैंक कर्ज़ देकर मुद्रा छाप लेता है । किसी प्रिटिंग press की जरूरत नहीं ।केवल एक entry काफी है और एक voucher जिस पर आपके sign होतें है । मान लो आप 10 लाख कर्ज़ लेनें जातें है तो बैंक आपको नकद नहीं देता । 10 लाख की एक entry आपके loan account में debit कर दी जाती है । औऱ 10 लाख की एक एंट्री आपके सेविंग account में क्रेडिट कर दी जाती है ।
बस हो गया 10 लाख की करेंसी का निर्माण । अगर बैंक को किसी को 100 करोड़ भी देना हो तो बैंक के पास 100 करोड़ नकद नहीं चाहिये । उनके पास अधिक से अधिक 10%यानी की राशि नकद चाहिए

कै रोना काल में इसी reserve financing के माध्यम से 27 लाख करोड़ का पैकेज अरबपतियों को दिया गया जो एक प्रकार का कर्ज था ।
यह कर्ज़ जो reserve financing की मदद से बड़े लोगों को दिया जाता है वह धीरे धीरे आम लोगों पर चढ़ जाता है । जिससे उनकी सेविंग समाप्त हो जाती है और वह कर्जदार हो जातें हैं ।आम इंसान की सारी सेविंग धीरे धीरे बड़े लोगों के पास चली जाती है ।
उदहारण के लिये 1960-70 तक अमेरिका में 80% सेविंग आम लोगों के पास थी । फिर reserve financing से आम आदमी की सारी सेविंग कॉर्पोरेट के पास पहुँचा दी गई । आज अमेरिका में आम आदमी के सिर पड़ कर्ज़ है और उनकी सारी सेविंग कॉरपोरेट के पास है ।
भारत में यह प्रक्रिया 1992 में शुरू हुई जिसको आर्थिक सुधारों का नाम दिया गया । और आजतक जारी है । तभी आपने देखा होगा कि पहले भारत के हरेक व्यक्ति के पास सेविंग होती थी आज भारत के अधिकतर व्यक्तियों के ऊपर कर्ज़ है ।
सरकार के लिये सुझाव ।
सरकार पहले reserve financing से fiat करेंसी पर आए फिर fiat currency से गोल्ड standard पर वापिस आये ।

आम लोग अगर कर्ज़ ना लेने का प्रण कर लें तो इस व्यवस्था के मक्कड़जाल से बच सकतें है अगर अधिकतर लोग यह निर्णय कर लें तो यह व्यवस्था ध्वस्त हो सकती है । उपभोग कम करें , कर्ज़ ना लें ।


बुधवार, 20 जुलाई 2022

सबसे अमीर राजा मनस मूसा के माध्यम से अरब में मोहम्मद के जन्म के पूर्व ही संस्कृत और मलयालम में रचित विज्ञान,गणित, ज्योतिष शास्त्र और आयुर्वेद का अरबी में अनुवाद होता रहा था धूर्त इतिहासकार कहते वास्को डी गा मा ने भारत खोजा

    मनस मूसा के कारवां में 60 हज़ार लोग शामिल थे और इनमें 12 हज़ार तो केवल सुल्तान के निजी अनुचर थे. मनसा मूसा जिस घोड़े पर सवार थे, उससे आगे 500 लोगों का दस्ता चला करता था जिनके हाथ में सोने की छड़ी होती थी. मनसा मूसा के ये 500 संदेशवाहक बेहतरीन रेशम का लिबास पहना करते थे.
इनके अलावा इस कारवां में 80 ऊंटों का जत्था भी रहता था, जिस पर 136 किलो सोना लदा होता था. कहा जाता है कि मनसा मूसा इतने उदार थे कि वे जब मिस्र की राजधानी काहिरा से गुजरे तो वहां उन्होंने ग़रीबों को इतना दान दे दिया कि उस इलाके में बड़े पैमाने पर महंगाई बढ़ गई.


 मनसा मूसा की इस यात्रा की वजह से उनके दौलत के क़िस्से यूरोपीय लोगों की कान तक पहुंचे. यूरोप से लोग सिर्फ़ ये देखने के लिए उनके पास आने लगे कि उनकी दौलत के बारे में जो कहा जा रहा है वो किस हद तक सच है.
मनसा मूसा की दौलत की जब पुष्टि हो गई तो उस वक्त के महत्वपूर्ण नक़्शे कैटलन एटलस में माली सल्तनत और उसके बादशाह का नाम शामिल किया गया.14वीं सदी के कैटलन एटलस में उस वक्त की उन तमाम जगहों का वर्णन है जो यूरोपीय लोगों को मालूम थी.
मनसा मूसा जो था वो बड़ा विजनरी राजा था। वो केवल धन दौलत ही नहीं बल्कि ज्ञान का भी भूखा इंसान था। वो मक्का शहर में जमकर सोने को व्यय किया। और वो व्यर्थ में ही सोना व्यय नहीं किया बल्कि उसके बदले उन्होंने ढेर सारे किताब खरीदे जो ज्योतिष शास्त्र, आयुर्वेद, गणित और विज्ञान से संबंधित थे।
अपने साथ वो इन क्षेत्रों के विद्वानों के साथ- साथ अनुवादक भी अपने साथ माली ले आया। वो जानता था कि जितना धन हम सोने से कमा पा रहे हैं उससे ज्यादा हम नॉलेज से कमायेंगे। इन विद्वानों और किताबों की मदद से माली अफ्रीका ही नहीं बल्कि विश्व के लिए ज्ञान का केंद्र बन के उभरा। बड़े बड़े लाइब्रेरी स्थापित हुए.. यूनिवर्सिटी बनी। इनके समय में माली विश्व के सबसे धनी देशों में से आता था। और किताबों की मदद से ही माली ने सोने से भी ज्यादा का व्यापार किया बल्कि करता ही रहा जब तक कि घाघ यूरोपीयन्स न आ गए। इन लोगों ने एक जीती जागती और फलरिश करते देश को लूट के गरीब बना दिया... जैसे भारत की विश्व की 35% की जीडीपी जाते जाते केवल 2% तक रह गई। माली के लोगों किताबों की रेगिस्तान के बालू में गाड़-गाड़ के संरक्षित करने का प्रयास किया,जबकि कई बड़े पुस्तकलाय जला दिए गए।
अब जरा सब को मिलाते हैं...
अरब में मोहम्मद के जन्म के पूर्व ही संस्कृत और मलयालम में रचित विज्ञान,गणित, ज्योतिष शास्त्र और आयुर्वेद का अरबी में अनुवाद होता रहा था .. ये अरबी अनुवाद रोमन साम्राज्य तक भी पहुँचा फिर वहाँ भी इसका अनुवाद हुआ। अब्बासी वंश के दूसरे खलीफा अल-मंसूर (770 ई) के दरबार में भारतीय ज्योतिषाचार्य के माध्यम से मोहम्मद इब्न इब्राहिम अल-फजरी ने भारतीय ज्योतिष को अरबी में अनुवाद किया। 600 ई में ही भारतीय गणितज्ञ विराहांक ने अरबी में भारतीय वैदिक गणित का अनुवाद कर रहे थे जिसे Liber-Abbaci में संकलित किया जा रहा था। इसी तरह अन्य ज्ञान भी अरबी में अनुवादित हो रहे थे। और ये अनुवादक कालीकट राजा के अधीन होते थे.. इन अनुवादों के बदले राजा को अनगिनत रॉयलिटी मिलती थी जो सोने में आदान प्रदान होता था। और इन सभी किताबों को मनसा मूसा ने भारी कीमत दे कर खरीदा था फिर अपने साथ माली ले गया था।(यूट्यूब में आप ढेरों डॉक्युमेंट्री देख सकते हैं इसके ऊपर). और जब मनसा मूसा कुछ अनुवादित किताबों के बदले सोने से भी ज्यादा व्यापार कर सकता था तो केरल राजा कितना कर सकता था अनुमान लगा लीजिये।
माली राजा सोने के बदले नमक खरीदता था.. और यूरोपीयन और मिडिल ईस्ट के व्यापारी सोने के बदले भारत से मसाले, चन्दन,नील आदि खरीदते थे।
मूसा के 9 वर्ष बाद जब इब्न बतूता हज के लिए मक्का पहुँचा तो उसने भारत के बारे में बड़ा सुना.. फिर वो वहाँ से जमीनी मार्ग से होते हुए दिल्ली पहुँचा... कुछ समय पश्चात वो करीब 1342 के आस पास कालीकट भी पहुँचा। और उसने हर गतिविधि और वैभवता को अपनी किताब में उकेरते भी गया।
1498 में कालीकट के तट पे पुर्तगाली नाविक वास्कोडिगामा आता है और बोलता है कि हमने भारत को खोज लिया!! बुड़बक कहीं के। साले चोरकट लूटेरे।
ये तो हो गया हलेलुइया!!
इससे पहले .. जोल्हेलुइया का भी देख ले।
चेरामन पेरुमल का नाम तो सुने होंगे ? नहीं सुने तो बता देते हैं.. ये कालीकट के राजा हुए.. मोहम्मद के समय। इनके जैसा तब कोई शायद ही अमीर होगा। मोहम्मद के जिंदा रहते ही मने कि सन 629 ई में चेरामन जुमा मस्जिद,कोडुंगलुर में बन जाता है जो मक्का के बाद दूसरा होता है। मोहममद की मृत्यु 632 ई में होती है


रविवार, 17 जुलाई 2022

बैजू बावरा का शास्त्रीय संगीत जिससे पत्थर भी पिघल जाते थे

   

 ध्रुपद गायक बैजू बावरा का काल पंद्रहवीं शताब्दी का माना जाता है। तानसेन से अपने मुकाबले में बैजू ने राग मालकौंस गाया। इसके प्रभाव से पत्थर पिघल गया। पिघले हुए पत्थर में बैजू ने अपना तानपुरा फेंका। पत्थर ठंडा होने पर तानपुरा पत्थर में गड़ा रह गया।
तानसेन पत्थर पिघलाकर तानपुरा निकाल नहीं सके। पंद्रहवीं शताब्दी तक पत्थर को राग शक्ति से पिघलाया जा सकता था।
आज ये कथा स्वामी सूर्यदेव जी की पोस्ट से एक क्लू मिलने के बाद लिखी जा रही। गुरुदेव ने लिखा कि प्राचीन काल में शिल्पकार राग मालकौंस गाते हुए ग्रेनाइट के पत्थरों को काटते थे। जब तक कोई विधि न हो ग्रेनाइट को कलात्मक ढंग से काट नहीं सकते। गुरुदेव ने बहुत अच्छे से अल्केमी को एक्सप्लेन किया।
पत्थरों को किसी तरह मुलायम बनाकर फिर सूक्ष्म कारीगरी करने की थ्योरी नई नहीं है। इस पर कई वर्ष से शोध किया जा रहा है। कंबोडिया से भी एक मिथक निकल कर आया है।
कंबोडिया में एक विशेष पत्थर होता था। इसे म्यूजिकल स्टोन कहते थे। संगीत वाले पत्थर विश्व के अनेक भागों में पाए जाते हैं, जो एक विशेष राग उत्सर्जित करते हैं। संभव है कंबोडिया के वे जादुई पत्थर विशेष क्रिया के बाद राग मालकौंस की ध्वनि निकालने लगते होंगे। कंबोडिया मिथक कहता है कि इस विशेष पत्थर से बाकी बड़ी चट्टानों को पिघलाया / मुलायम किया जाता था।।
ऋग्वेद में एक पौधे का उल्लेख है। पक्का नाम नहीं पता। American cliff swallow नामक अमेरिकी चिड़िया प्राचीन काल में पथरीली चोटियों में छेद कर घोंसला बना लेती थी। वह पर्टिकुलर स्थान पर इस पौधे की पत्तियों का रस प्रयोग करती थी। स्पष्ट है कि चोंच पत्थर को नहीं छेद सकती। प्राचीन पेरू निवासियों ने इस पक्षी की सहायता से उस पौधे का पता लगाया और उसका प्रयोग अपने अचंभित करने वाले निर्माणों में किया। कुछ कहते हैं वह पौधा विलुप्त हो गया और कुछ कहते हैं कि वह अब भी सर्वाइव कर रहा है।
कर्नाटक के होयसलेश्वर मंदिर में पत्थर को मुलायम बनाकर अविश्वसनीय शिल्प बनाने का जीवंत प्रमाण देखा जा सकता है। कहना मुश्किल है कि वे कौनसी विधि प्रयोग में ला रहे थे। अधिक विश्वास इस बात का है कि वे राग मालकौंस की शक्ति से ऐसा कर रहे थे। विश्व के अन्य भागों में भी ये कार्य हो रहा था। कुछ को चिड़िया ने बताया था।
नीचे फ़ोटो में अचरज से होयसलेश्वर मंदिर का शिल्प देख रहे वृद्ध पर्यटक के मन की गुत्थी सुलझाने का एक प्रयास भर किया है।

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...