गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

कर्मचारियों को बोनस में कार देता है यह बिजनेसमैन, बेटे ने की 5000 की नौकरी

कर्मचारियों को कार और फ्लैट देने वाले गुजरात के हीरा व्यवसायी के बारे में तो आपको याद ही होगा. पिछले दिनों गुजरात के हीरा व्यवसायी का नाम उस समय सुर्खियों में आया था जब उन्होंने अपने यहां काम करने वाले कर्मचारियों को दिवाली बोनस के रूप में गाड़ी और फ्लैट दिए थे.
  
   
नई दिल्ली : 
कर्मचारियों को कार और फ्लैट देने वाले गुजरात के हीरा व्यवसायी के बारे में तो आपको याद ही होगा. पिछले दिनों गुजरात के हीरा व्यवसायी का नाम उस समय सुर्खियों में आया था जब उन्होंने अपने यहां काम करने वाले कर्मचारियों को दिवाली बोनस के रूप में गाड़ी और फ्लैट दिए थे. हरे कृष्णा डायमंड एक्सपोर्ट के मालिक घनश्याम ढोलकिया ने इस बार दिवाली पर सुरक्षा का संदेश देते हुए अपने कर्मचारियों को ऐसा गिफ्ट दिया था कि उनके इस कदम से सभी हैरान थे. दरअसल इस बार उन्होंने हेलमेट गिफ्ट किया. इसके माध्यम से उन्होंने जिंदगी बचाने का संदेश दिया.
लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि करोड़ों का कारोबार करने वाले घनश्याम ढोलकिया के बेटे ने जिंदगी की शुरुआत में कितने रुपए की नौकरी की होगी. मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक ढोलकिया के बेटे ने 5000 रुपए की नौकरी की थी. दरअसल 6000 करोड़ रुपए का कारोबार करने वाले घनश्याम ढोलकिया ने अपने हितार्थ ढोलकिया को जिंदगी का मतलब समझाने और अपने पैरों पर खड़े होने के लिए घर से बाहर भेज दिया था.

बुधवार, 27 दिसंबर 2017

कर्मयोगी वह जो अपने समय और ऊर्जा को उत्पादक कार्य में लगाएं । किसी व्यक्ति की सर्वाधिक भलाई के लिए चार प्रशस्त मार्ग हैं - कर्म योग, भक्ति योग, ज्ञान योग, और राज योग, जिसे कुछ लोग ध्यान योग भी कहते हैं । इन चारों मार्गों में से हमने जानबूझकर कर्म योग का मार्ग चुना है | मानसिक नियंत्रण का नहीं, ज्ञान का नहीं, भक्ति का नहीं, अपितु क्रियाशीलता का मार्ग । इसका अर्थ यह नहीं है कि भक्ति, ज्ञान और ध्यान का हमारे जीवन में कोई स्थान नहीं है। इन चारों रास्तों का जीवन में अलग अलग महत्व है, ये कोई अभेद्य कक्ष नहीं हैं ।

हमारे पूर्व में बंगाल की खाड़ी, पश्चिम में अरब महासागर और दक्षिण में हिन्द महासागर है। हमारी समझ में आसानी के लिए हमने उन्हें अलग अलग नाम दिये है। लेकिन वस्तुतः तो वे पानी की एक ही चादर है। इसी प्रकार हमने हमारी अपनी समझ के लिए इन चार रास्तों का नाम अलग अलग रखा है, लेकिन वे सब जीवन में एक दूसरे के पूरक हैं। जहां कर्म की प्रधानता है, वह कर्म योग है और जहां ज्ञान की प्रबलता है, वह ज्ञान योग है | 

नाम उस तत्व के अनुसार दिया जाता है जो कि प्रबल होता है। उदाहरण के लिए, हर एक में तीन मूल गुण होते हैं, राज, तमस और सत्व। सभी में ये तीनों गुण विद्यमान हैं। आप को कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिलेगा, जिसमें केवल सत्व गुण हो, मिलावट रहित रजोगुण हो, या केवल तमोगुण ही हो ।

जब आप कहते हैं कि कोई तामसी प्रकृति का है तो इसका मतलब है कि उसमें यह तत्व विशेष प्रमुखता से है। जब कोई व्यक्ति आलसी, सुस्त, उनींदा हो, जिसमें किसी कार्य को करने का कोई उत्साह नहीं हो, हमेशा निष्क्रिय रहना पसंद करता हो, उस व्यक्ति में तमोगुण की प्रबलता कहा जाता है | 

एक आदमी जो कुछ न कुछ करने को सदा उत्सुक रहे, जो कर रहा है, उसके साथ और भी बहुत कुछ करना चाहे, यहां से वहां, वहां से यहाँ कूदता रहे, हमेशा ऊंचाई पर रहना पसंद करे, लेकिन बहुत अहंकारी हो, तो उस गतिविधि अवतार में हम रजोगुण की प्रमुखता कहते है। ऐसे लोगों को राजसी व्यक्ति कहा जा सकता है। और एक व्यक्ति जो चिंतनशील है, तनाव की अवस्था में भी जिसका मन शांत रहता है, जिसका कोई भी कार्य निरर्थक नहीं होता, जो अकारण कूदफांद और नृत्य नहीं करता, हमेशा सही दिशा में चलता है, ऐसे व्यक्ति को एक सात्विक व्यक्ति कहा जा सकता है। 

व्यक्ति की कोई भी गतिविधि इच्छाओं से परे नहीं है; 'मुझे यह चाहिए, मुझे वह चाहिए होता ही है | किन्तु यदि गतिविधि उच्च जीवन मूल्यों से प्रेरित है, तो यह एक सात्विक व्यक्ति का लक्षण है।

मैंने केवल आपको समझाने के लिए इन्हें अलग अलग वर्णित किया है, किन्तु कोई व्यक्ति केवल सात्विक, राजसी या तामसी नहीं पाया जाता, आदमी में इन तीनों का मिश्रण होता है। एक तत्व प्रमुख हो सकता है, किसी व्यक्ति के जीवन में कभी एक तत्व की प्रमुखता हो सकती है, किन्तु संभव है कि बाद में कभी किसी दूसरा तत्व की प्रधानता हो जाए | और जीवन के तीसरे चरण में तीसरा गुण प्रभावी हो जाए । एक ही जीवन में, संभव है कि उस व्यक्ति में ये तीनों ही गुण दिखाई दें । जीवन का एक चरण दूसरे चरणों से भिन्न हो सकता है | लेकिन जब जिस तत्व की प्रधानता हो, उसे विशेष नाम तब ही दिया जाता है । 

इसी प्रकार, जब हम कर्म योग की बात करते हैं, तो इसका मतलब है कि मुख्यतः आप जो करना चाहते हैं, उसी अनुरूप आपने विषय चुना है | अगर आप कर्म के मार्ग पर जाते हैं, तो इसका अर्थ है कि राजयोग, भक्ति योग और ज्ञान योग इस कर्मपथ के अधीन होंगे। जब हम कहते हैं कि एक व्यक्ति कर्म योगी है, तो इसका मतलब है कि शेष सभी तीनों योग उसके जीवन में जो कुछ भी घटता है, कर्म के मार्ग में अलग अलग अनुपात में योगदान करते हैं। वे सहयोगी हैं | वे इस मार्ग के सहायक हैं। वे केवल उसे अधिक सक्रिय होने में सहायता करते हैं |

एक कर्म योगी का मतलब यह नहीं है कि वह कभी प्रार्थना नहीं करता। अगर किसी को भी कर्म योगी कहा जाए, तो इसका अर्थ यह भी नहीं है कि वह ध्यान नहीं करता, या उसे योगासन की ज़रूरत नहीं है, या उसे प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं है, उसे पूजा की जरूरत नहीं है या उसे दर्शन शास्त्र की ज़रूरत नहीं है, या किसी चीज के गहन अर्थ में नहीं जाना है; या उसे केवल अपने हाथों और पैरों से काम करना चाहिए; नहीं यह ऐसा नहीं है। इसका अर्थ केवल इतना है कि कर्म योगी जब प्रार्थना करता है, तो वह काम करने के लिए अधिक शक्ति प्राप्त करने और सही मार्ग दिखाने की प्रार्थना करता है। उसके लिए प्रार्थना आवश्यक है, लेकिन जो वह करना चाहता है, उसे सही ढंग से करने की सामर्थ्य पाने के लिए | उसकी प्रार्थना, उसे प्रेरणा देती है | वह प्रार्थना करने के लिए प्रार्थना नहीं करता है, बल्कि वह उसे कर्म करने के लिए प्रेरित करती है। प्रार्थना उसे ऊर्जा देती है और उसे सही मार्ग पर भी रखती है। वह प्रार्थना करेगा, लेकिन केवल और केवल प्रार्थना नहीं करेगा, अपने कार्य की कीमत पर प्रार्थना नहीं करेगा। अपनी गतिविधि की कीमत पर, वह प्रार्थना नहीं करेगा

एक कर्मयोगी प्रार्थना करेंगा, लेकिन वह देखेगा कि उसकी प्रार्थना, उसकी पूजा, कार्य को शक्ति प्रदान करने की दिशा में योगदान करे । उसे सही दिशा में काम करने के लिए अधिक प्रकाश मिले । इसका अर्थ यह नहीं है कि कर्म योगी ध्यान नहीं करेंगे; या वह योग का अभ्यास आदि कुछ नहीं करेगा; या वह प्राणायाम से दूर रहेगा; या उसका आध्यात्म से कोई लेनादेना नहीं होगा, नहीं वह इन सब आध्यात्मिक प्रथाओं का उपयोग करेगा क्योंकि उसे काम करना है। उसे पूरी दक्षता और तीव्रता के साथ काम करना है, अपने कार्य में अधिक दक्षता प्राप्त करने के लिए, वह योगाभ्यास करेगा; वह राज योग के माध्यम से जो सीखता है, उस सब का उपयोग करता है । उसे ध्यान केंद्रित करना और अधिक शक्ति देता है, उसे इससे और अधिक स्थिरता मिलती है, जो काम के लिए बहुत ज़रूरी है | यदि आपका मन विचलित है, तो आप ठीक से अपना नेटवर्क नहीं बना सकते। अतः "चित्तवृष्टि निरोधाः" विचारों पर नियंत्रण बहुत आवश्यक है।

कर्मयोगी अपने मन को स्थिर करने के लिए सभी प्रथाओं का उपयोग करेंगे, क्योंकि स्थिर मस्तिष्क के साथ ही वह कुशलतापूर्वक काम कर सकता है। इस प्रकार राजयोग का भी कर्म योगी के जीवन में एक विशेष स्थान है। ज्ञान योग भी चीजों के मूल में जाने के लिए आवश्यक है, सही परिप्रेक्ष्य को समझने के लिए तत्वमीमांसा आवश्यक है | जब आप ज्ञान योग के मार्ग पर चलते हैं, तो आप गूढ़ और गहन होते हैं और यदि आपने अपने दिमाग को चीजों के गहन अर्थ की खोज में जाने के लिए प्रशिक्षित कर लिया किया है, तो यह कर्म योग के लिए उत्कृष्टता, पूर्णता, परिशुद्धता के लिए बहुत सहायक होता है | यदि कोई सतही ढंग से सोचता और निर्णय लेने वाला है, फैसले पारित करता है, तो वह जीवन में बुरी तरह असफल हो जायेगा। यदि उसे गहन चिंतन और उचित परिप्रेक्ष्य में चीजों को समझने की आदत है, तो वह सफल होगा । लेकिन, कोई कुछ कहे; उस पर त्वरित प्रतिक्रिया देना, बिना समझे अपनी राय बनाना, गहन आपदा में फंसाता है । किसी बात के गहन अर्थ को समझकर सही परिप्रेक्ष में निर्णय लेना, एक कर्म योगी के लिए जरूरी है | अतः कर्म योगी के लिए ज्ञान योग, भक्ति योग और राज योग बहुत आवश्यक हैं। यह अलग बात है कि वह इनका उपयोग कर्मयोग के बेहतर क्रियान्वयन के लिए करता है। वह उनका अभ्यास करता है, उनका उपयोग करता है, ताकि वह अधिक कुशलता से, सही और प्रभावी तरीके से काम करने में सक्षम हो। यही उसके प्रकरण में अन्य तीन योगों की भूमिका है।

मान लीजिए, कि ध्यान करने से एक कर्मयोगी को कर्म से विरक्ति हो जाती है, वह जितना अधिक ध्यान करता है, उतना कर्म से दूर हो जाता है, तो इसका अर्थ है कि उसके ध्यान में कुछ गड़बड़ है। उनके ध्यान करने का तरीका बहुत ग़लत है । यदि उसने कर्म का मार्ग चुना है, तो जब वह ध्यान करता है, तो उसका ध्यान उत्पादक होना चाहिए। उसके लिए क्या उत्पादक है? उसे अपने काम को करने पर अधिक जोर देना चाहिए। अगर आधे घंटे के ध्यान से, व्यक्ति ऊर्जा से परिपूर्ण हो जाता है, वह उत्साह के साथ काम करने लगता है तो यह ध्यान उसके लिए उपयोगी है | और मान लीजिये कि यदि आपको यह लगता है कि योगासन करने से आपको नींद आ रही है, तो इसका अर्थ है कि आपके योगासन में कुछ गंभीर गड़बड़ है। आपने शीर्षासन किया, या अन्य कोई आसन किए, तो आपमें उत्साह का संचार होना चाहिए । किन्तु अगर आप निद्रा महसूस करते हैं, तो आपके योगों के साथ कुछ गंभीर गलत है। यदि आप कुछ विचार कर रहे हैं, तो उसका योगदान आपकी गतिविधि के लिए होना चाहिए। इसके लिए आप ईश्वर से प्रार्थना कर सकते हैं, जब आप परमेश्वर के साथ मिलकर काम करते हैं तो वह आपको प्रकाश देता है, जिससे आपका आत्मविश्वास बढ़ता है | इसलिए यदि आप कर्म योगी हैं, तो आपकी प्रार्थना आपको काम करने और अधिक काम करने के लिए प्रेरित करेगी। आपका चिंतन, सोच, ध्यान भी आपको काम करने और अधिक काम करने के लिए प्रेरित करेगा। सब कुछ आपको अधिक काम करने में मदद करना चाहिए। यही एकमात्र परीक्षण है |

यदि आप आज आधे घंटे ध्यान करते हैं, आप कल दो घंटे और अगले दिन चार घंटे ध्यान करते हैं, तो फिर अपने आप को कर्म योगी मत कहिये । आप कर्म योगी नहीं हैं, आप भ्रमित हैं। यदि आप कर्म योगी हैं तो सिर्फ आधे घंटे का ध्यान पर्याप्त होना चाहिए, अन्यथा आपके पास अन्य चीजों के लिए समय नहीं होगा। यदि आपने कर्म योग का मार्ग चुना है, तो फिर आधे घंटे का ध्यान पर्याप्त है, किन्तु वह केंद्रित और मजबूत होना चाहिए। इससे आपको पर्याप्त ताकत मिलेगी | आपकी प्रार्थना, ध्यान और अन्य सभी योग ठीक तरह से सिलसिलेवार होना चाहिए, यदि आप अपने मार्ग के प्रति निष्ठावान हैं, तो समय विभाजन ठीक से किया जाना चाहिए ।

मैंने इस उदाहरण को कई बार दिया है | जैसे कि हम हमारे भोजन में सांबर लेते हैं। सांबर में दाल, पानी और नमक का अनुपात क्या है?इसका बड़ा हिस्सा दाल और पानी है, जबकि नमक कम है। लेकिन यह कम नमक क्या करता है? हालांकि यह बहुत कम है, किन्तु यह पूरे सांबर को स्वादिष्ट बना देता है। यह सांबार में फैलता है, इसी प्रकार ध्यान, चिंतन और प्रार्थना आदि का अनुपात कर्म योगी के जीवन में होना चाहिए। हमारा कार्य दाल और पानी के अनुपात में होना चाहिए। और भगवान का ध्यान, उस नमक की तरह होना चाहिए। यह थोड़ा कम हो सकता है, लेकिन यह पूरे जीवन, संपूर्ण दैनंदिन दिनचर्या को स्वाद देता है। जब आप हार्मोनियम बजाते है, तो उसमें एक मुख्य वस्तु है | उसकी भूमिका क्या है? यह पार्श्व में सबसे पीछे है | उसी प्रकार आपकी सभी गतिविधियों में, आपके दिमाग का भगवान के साथ तालमेल होना चाहिए। सुबह, जब आप अपना दिन शुरू करते हैं, तो ध्यान से या प्रार्थना के माध्यम से, भगवान के साथ संवाद करें, उनका आशीष लें । यह आधा घंटा शेष साढ़े तेईस घंटे आपके दिमाग में रहेगा। यही आपको सही रास्ते पर रखेगा | यह आपको कभी भी अपना आधार खोने नहीं देगा | यही भगवान के साथ ध्यान या सम्वाद का उद्देश्य है। "

यदि हम इस अनुपात खो देते हैं, तो हम न तो यहां रहेंगे और न ही वहां होंगे। एक बार दायित्व स्वीकार करने का अर्थ है, कि हमने अपना रास्ता चुन लिया है। अगर हमने इस पथ को चुना है तो पूरी योजना कार्य उन्मुख होना चाहिए। इस प्रकार, कार्य के प्रति हमारी प्रतिबद्धता स्पष्ट हो जाती है - कर्मयोगैकनिष्ठः | फिर आसन, प्रार्थना, ध्यान, स्वाध्याय के सभी अभ्यास सार्थक और उद्देश्यपूर्ण बनते हैं और हमारे जीवन में सही अनुपात में स्थापित होते हैं। हम अपने समय की सही योजना बनायें, ताकि हम घर या कार्यस्थल पर हमारी सभी जिम्मेदारियों को पूरा कर सकें | और फिर हमारे दायित्व को पूरा कर सकें। 

देसी जुगाड़ का कमाल बिना ड्राइवर ट्रैक्टर दौड़ाया

सोमवार, 25 दिसंबर 2017


#महाराज_हर्षवर्धन

गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद भारत मे चारो ओर अराजकता फैल गयी ! भारत की सीमाएं भी असुरक्षित हो चुकी थी, शत्रु हिन्दुओ को आँख दिखा रहे थे ।

भारत के थानेश्वर में राज-पुंज-तेज पुष्यभूति नामक पराक्रमी ओर दक्ष राजा हुए । बाण के अनुसार नागवंशीयो का अंत करके यह साम्राज्य स्थापित हुआ था । जिसने क्रम से आगे चलकर " हूण- हिरण-केशरी " ( हूण रूपी हिरणों को घातक सिंह के समान , " सिंधु - राज- ज्वरों  " ( सिंधु राजा को ज्वर के समान तड़पाने वाले ) गुर्जर प्रजारको ( गुर्जर राजाओ की नींद भग्न करने वाला )  गंधार के राजा को मदमस्त हाथी की तरह कुचल देने वाला, मालव देश की लक्ष्मी( सम्रद्धि )  का हरण करने वाला
तथा प्रतापशील राजा #राजाधिराज_प्रभाकर_वर्द्धन उतपन्न हुए ।

प्रभाकर वर्धन से पूर्व भी कई राजा हुए, लेकिन इस वंश को पहचान प्रभाकरवर्धन से ही मिली थी । प्रभाकर वर्द्धन ने अपने प्रताप ओर पराक्रम से , सिंध प्रदेश, गुर्जर प्रदेश ( पश्चिमी राजस्थान ) मालवा, पंजाब एवं कश्मीर के हूणों को परास्त किया !!

साक्ष्य ( बाँसखेड़ा तामपत्र - पंक्ति 1 से लेकर 7)

गुप्त साम्राज्य के पतन होने के बाद, उतरी भारत मे भिन्न भिन्न स्वतंत्र राज्यो के उदय के कारण , भारत की समतल भूमि में उबड़ खाबड़ आ गया ।  प्रभाकर ने अपनी सेना लेकर .. दूर तक धरती को समतल बनाया, ओर शत्रुओं का दमन किया !! इस प्रकार प्रभाकर वर्धन ने तलवार की धार से शत्रुओं का दमन कर  देश की उन्नति की  !! लेकिन  तत्कालीन राजनीति से यह स्पष्ठ हो जाता है, की उस समय भारत मे वर्चस्व की लड़ाई जोरो पर थी ।  बिहार - बंगाल का गोड़ राज्य भी स्वतंत्र हो गया था , मगध ओर मध्यदेश ( यूपी) में मौखरी बढ़ रहे थे । मालवा में उत्तर गुप्त शाशक प्रबल थे । गुजरात मे काठियावाड़ भी अपनी अलग राजनीति कर रहे थे, गुर्जर देश के प्रतिहार भी ताक में थे, सिंधु भी स्वतंत्र देश बन गया था, पंजाब और कश्मीर भी स्वतंत्र थे । चालुक्य - पल्लव- पांडव भी आपसी युद्ध मे व्यस्त थे , प्रभाकर के समय राष्ट्र की स्तिथि क्या थी ..... इसका अनुमान लगाइए ...

#हर्षवर्धन

प्रतापी राजा प्रभाकरवर्धन सहज स्वभाव से ही सूर्य भक्त थे, प्रतिदिन सूर्यपूजा करते, तथा सूर्यदेव से संतान प्राप्ति की कामना करते । अंततः भगवान सूर्य की कृपा से उनके दो तेजवान पुत्र और कन्या का जन्म हुआ । ज्येष्ठ राज्यवर्धन अत्यंत पराक्रमी ओर यशस्वी कुमार थे । उनके जन्म के कुछ समय बाद हर्ष का जन्म हुआ । हर्ष बाल्यकाल से ही तेजस्वी सुर थे, जिन्हें खेल में आज्ञा- भंग सहन नही होता था । चारो ओर पानी से घिरे समुद्र में स्नान करना, ओर समुद्र तटों पर घूमना हर्ष को बहुत पसंद था । कितना महत्वाकांशी बालक हर्ष था , वह विनीत भक्त भी था, उनके जन्म होते ही ज्योतिषों ने उनके चक्रवर्ती सम्राट बनने की भविष्यवाणी की थी ।

मौखरि वंश के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित कर अपनी शक्ति में ओर व्रद्धि कर ली ।

हूणों के साथ एक युद्ध मे प्रभाकरवर्धन बुरी तरह घायल हुए, हर्ष की माता भी बचपन मे ही स्वर्ग  सिधार गयी थी । प्रभाकरवर्धन भी इस लोक को जीतकर उस लोक को जीतने चले गए । किन्तु अपनी अंतिम यात्रा से पहले उन्होंने हर्ष को समाचार भेजा,

" अपने देश की रक्षा करो, राज्यभार ( शाशन ) को चलाओ, परिजन ओर प्रजा का पालन करो, शस्त्रो का अभ्यास करते रहना, चंचलता का अंत कर, शत्रुओं का पूर्ण नाशः करो , ऐसा आदेश देते हुए " राजसिंह प्रभाकरवर्धन ने आंखे बंद कर ली । ( हर्ष चरित्र - पेज 210- 233 )

प्रभाकरवर्धन बहुत लोकप्रिय राजा थे, उनके जाते ही प्रजा में जैसे विषाद छा गया, अग्निदेव की लपटों में चढ़कर प्रभाकरवर्धन स्वर्गलोक को जीतने चले गए ।

पित्रशोक में  हर्ष के  लिए राज्य एक रोग बन गया । वे  यह सोचने लगे, की अगर पिता की म्रत्यु का समाचार बड़े भाई राज्यवर्धन को पता चला, तो उनका क्या होगा ? राज्यवर्धन भी इस समय किसी अन्य प्रदेश पर चढ़ाई के लिए ही गए थे ।

" कहीं पिता की म्रत्यु का समाचार सुनकर बड़े भाई सन्यासी  हो गए, ओर वन- पहाड़ो में तपस्या करने चले गए तो ? हे ईश्वर !! अनाथ हो गयी यह पृथ्वी !! ऐसा सोचकर वे राज्यवर्धन के आने की राह देखने लगे ।

राज्यवर्धन हूणों पर विजय प्राप्त कर जब वापस लौटे, तो पूरे शरीर मे जगह जगह पट्टियां बंधी हुई थी । राजसभा में सबको मौन देखकर, राजा को सिंहासन पर ना पाकर राज्यवर्धन सब कुछ समझ गए, वहीं हुआ, जिसका डर था, पिता को ना पाकर राज्यवर्धन के हाथों से तलवार छूट गयी, ओर वे वैरागी हो गए ।

राज्यवर्धन के तलवार हाथ से छूटते ही, हर्ष के मन मे भय और शंका के घने बादलों ने जन्म ले लिया !  अगर ज्येष्ठ ही राज्य छोड़कर चले गए,  तो इस राज्य को चलाएगा कौन ? इस राज्य का भोग करेगा कौन ?

हर्ष ने मन ही मन मे खुद को धिक्कारा ..... लक्ष्मण का चरित्र भूल गए हो हर्ष ?? इतना क्या सोच रहे हो ? जहां भाई जाएंगे, वहीं तुम चले जाना !!

दोनो भाई एक दूसरे के आंसू पोंछ रहे थे, उसी समय एक अशुभ समाचार ओर आया, की जिस दिन उनके पिता की म्रत्यु  हुई थी उसी दिन दुस्ट मालव राज ने उनकी बहन के पति देव ग्रहवर्मा की हत्या कर, उनकी बहन के पैरों में बेड़िया डाल, जेल में डाल दिया है ।  ओर अब वह इस देश को  अनाथ समझकर इसपर भी आक्रमण करने वाला है ।

समाचार मिला ही कि राज्यवर्धन का खून खोल उठा, यह समाचार सुनते ही राज्यवर्धन मालव - विनाश के लिए उठ खड़े हुए । भीषण कृपाण को हाथ मे लेकर मालवराज कुल को मिटा देने के लिए राज्यवर्धन का पराक्रम जाग उठा " भला अंधेरा सूर्य का तिरस्कार करें, यह कभी हो सकता है ? "

हर्ष को मंगलकामना देकर राज्यवर्धन उसी घायल अवस्था मे मालव-राज को सबक सिखाने के लिए चल पड़े ।  वहां कुछ ही समय मे मालवराज ने राज्यवर्धन के आगे हथियार डाल दिये, राजवर्धन ने भी उनके इस तरह सुंता, जैसे चाबुक से घोड़ो को सुंता जाता है ।
मालव-राज पराजित तो हुए .... लेकिन इस युद्ध मे राज्यवर्धन को भी अपने प्राण गंवाने पड़े ।

राज्यवर्धन की म्रत्यु के बाद ही हर्ष को पता चला, मालवराज को परास्त करने के बाद, गोड़ों ने छल से राज्यवर्धन की हत्या कर दी ।

पहले माता , फिर -पिता, उसके बाद भाई, पूरा परिवार खोने के बाद अब हर्ष केवल एक पत्थर की मूर्ति थे ।

समय हर्ष के लोहे के शरीर, ओर ब्रज ह्रदय की परीक्षा ले रहा था । तभी तो उसपर दारुण दुःखों की बाढ़ आ रही थी । माता- पिता- बहनोई, भाई सब खो दिया, वह भी एकदम कम उम्र में ।

हर्षवर्धन पहले की तरह इसबार कमजोर नही लग रहे थे । आंखों में पानी भी था , ओर चेहरे पर क्रोध भी ।

" अधर्मी गोड़ राजा ने केवल अपयश ही कमाया है, देखता हूँ, वह दुर्बुद्धि कहाँ तक भागता है । "

तभी मंत्री सिंहनाद ने कहा " एक अधर्मी गोड़ राजा का वध करने से कोई लाभ नही होगा, ऐसा कुछ करो, की अन्य कोई राजा फिर ऐसा दुःसाहस ना कर सके । सम्पूर्ण पृथ्वी विजय की मर्यादा का पालन करो । राजलक्ष्मी को स्थिर कर पुनः पूरे विश्व मे आर्य धर्म ध्वज फहरा दो । कुत्तो ( शत्रु ) का वध करो, राज्य के कतंको को उखाड़ फेंको । अपने पिता , पितामह ओर भाई के मार्ग का अनुसरण करो । इस पृथ्वी की रक्षा के लिए अब केवल तुम बचे हो हर्ष !! अपनी अनाथ प्रजा को समझाओ, ओर राजाओ के सिर पर पांव रखो ।

स्पष्ठ है, की वृद्ध मंत्री यहां हर्ष को दिग्विजय की प्रेरणा दे रहे है ।

हर्ष ने भी शपथ ली, धनुष चिन्ह धारण कर में प्रतिज्ञा करता हूँ, की अपने राज्य में, इस पृथ्वी में , इस कलयुग में , में सतयुग की स्थापना करूँगा !

हर्ष ने तुरन्त सभी अन्य राज्यो में घोषणा करवा दी, सभी राजागण अपने हाथी, सेना तैयार रखे,  ओर जो युद्ध नही करना चाहते, वे अपना धनुष या शीश झुका दे ।

उसके बाद तो विजय का डंका ऐसा बजा की पूरे संसार ने इस युवा शक्ति का लोहा मान लिया ।

लगभग पुरे भारत मे हर्षवर्धन ने विजय प्राप्त की !! केवल चालुक्य वंश के पुलकेशिन द्वित्य के साथ युद्ध मे हर्ष को असफलता हाथ लगी ।

हर्ष का यह काल वास्तव में सतयुग की अनुभति था । आपस में सदैव लड़ने वाले राजवंश  एक ध्वज के नीचे आ गए ।

लेकिन समय हमेशा एक नही रहता, उम्र भर विजयो का स्वाद चखने वाले हर्ष को अंत मे हारना भी पड़ा ! यह बहुत बड़ी हार नही थी, बस मामूली नुकसान था, लेकिन इतना था, चालुक्य से वे पार ना सके ।

अब आधे भारत के  स्वामी थे हर्ष , ओर आधे भारत के स्वामी  ---- #वीर_राजपूत_पुलकेशिन संकलन अजय कर्मयोगी

रविवार, 24 दिसंबर 2017

1. मूलाधार चक्र :
यह शरीर का पहला चक्र है। गुदा और लिंग के बीच चार पंखुरियों वाला यह "आधार चक्र" है। 99.9% लोगों की चेतना इसी चक्र पर अटकी रहती है और वे इसी चक्र में रहकर मर जाते हैं। जिनके जीवन में भोग, संभोग और निद्रा की प्रधानता है, उनकी ऊर्जा इसी चक्र के आसपास एकत्रित रहती है।
मंत्र : "लं"
कैसे जाग्रत करें : मनुष्य तब तक पशुवत है, जब तक कि वह इस चक्र में जी रहा है.! इसीलिए भोग, निद्रा और संभोग पर संयम रखते हुए इस चक्र पर लगातार ध्यािन लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। इसको जाग्रत करने का दूसरा नियम है यम और नियम का पालन करते हुए साक्षी भाव में रहना।
प्रभाव : इस चक्र के जाग्रत होने पर व्यक्ति के भीतरवीरता, निर्भीकता और आनंद का भाव जाग्रत हो जाता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए वीरता, निर्भीकता और जागरूकता का होना जरूरी है।

2. स्वाधिष्ठान चक्र -
यह वह चक्र लिंग मूल से चार अंगुल ऊपर स्थित है, जिसकी छ: पंखुरियां हैं। अगर आपकी ऊर्जा इस चक्र पर ही एकत्रित है, वह आपके जीवन में आमोद-प्रमोद, मनोरंजन, घूमना-फिरना और मौज-मस्ती करने की प्रधानता रहेगी। यह सब करते हुए ही आपका जीवन कब व्यतीत हो जाएगा आपको पता भी नहीं चलेगा और हाथ फिर भी खाली रह जाएंगे।
मंत्र : "वं"
कैसे जाग्रत करें : जीवन में मनोरंजन जरूरी है, लेकिन मनोरंजन की आदत नहीं। मनोरंजन भी व्यक्ति की चेतना को बेहोशी में धकेलता है। फिल्म सच्ची नहीं होती. लेकिन उससे जुड़कर आप जो अनुभव करते हैं वह आपके बेहोश जीवन जीने का प्रमाण है। नाटक और मनोरंजन सच नहीं होते।
प्रभाव : इसके जाग्रत होने पर क्रूरता, गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास आदि दुर्गणों का नाश होता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए जरूरी है कि उक्त सारे दुर्गुण समाप्त हो, तभी सिद्धियां आपका द्वार खटखटाएंगी।

3. मणिपुरक चक्र :
नाभि के मूल में स्थित रक्त वर्ण का यह चक्र शरीर के अंतर्गत "मणिपुर" नामक तीसरा चक्र है, जो दस कमल पंखुरियों से युक्त है। जिस व्यक्ति की चेतना या ऊर्जा यहां एकत्रित है उसे काम करने की धुन-सी रहती है। ऐसे लोगों को कर्मयोगी कहते हैं। ये लोग दुनिया का हर कार्य करने के लिए तैयार रहते हैं।
मंत्र : "रं"
कैसे जाग्रत करें: आपके कार्य को सकारात्मक आयाम देने के लिए इस चक्र पर ध्यान लगाएंगे। पेट से श्वास लें।
प्रभाव : इसके सक्रिय होने से तृष्णा, ईर्ष्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह आदि कषाय-कल्मष दूर हो जाते हैं। यह चक्र मूल रूप से आत्मशक्ति प्रदान करता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए आत्मवान होना जरूरी है। आत्मवान होने के लिए यह अनुभव करना जरूरी है कि आप शरीर नहीं, आत्मा हैं। आत्मशक्ति, आत्मबल और आत्मसम्मान के साथ जीवन का कोई भी लक्ष्य दुर्लभ नहीं।

4. अनाहत चक्र
हृदय स्थल में स्थित स्वर्णिम वर्ण का द्वादश दल कमल की पंखुड़ियों से युक्त द्वादश स्वर्णाक्षरों से सुशोभित चक्र ही "अनाहत चक्र" है। अगर आपकी ऊर्जा अनाहत में सक्रिय है, तो आप एक सृजनशील व्यक्ति होंगे। हर क्षण आप कुछ न कुछ नया रचने की सोचते हैं.
मंत्र : "यं"
कैसे जाग्रत करें : हृदय पर संयम करने और ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। खासकर रात्रि को सोने से पूर्व इस चक्र पर ध्यान लगाने से यह अभ्यास से जाग्रत होने लगता है और "सुषुम्ना" इस चक्र को भेदकर ऊपर गमन करने लगती है।
प्रभाव : इसके सक्रिय होने पर लिप्सा, कपट, हिंसा, कुतर्क, चिंता, मोह, दंभ, अविवेक और अहंकार समाप्त हो जाते हैं। इस चक्र के जाग्रत होने से व्यक्ति के भीतर प्रेम और संवेदना का जागरण होता है। इसके जाग्रत होने पर व्यक्ति के समय ज्ञान स्वत: ही प्रकट होने लगता है। व्यक्ति अत्यंत आत्मविश्वस्त, सुरक्षित, चारित्रिक रूप से जिम्मेदार एवं भावनात्मक रूप से संतुलित व्यक्तित्व बन जाता हैं। ऐसा व्यक्ति अत्यंत हितैषी एवं बिना किसी स्वार्थ के मानवता प्रेमी एवं सर्वप्रिय बन जाता है।

5. विशुद्धि
चक्र
कंठ में सरस्वती का स्थान है, जहां "विशुद्ध चक्र" है और जो सोलह पंखुरियों वाला है। सामान्यतौर पर यदि आपकी ऊर्जा इस चक्र के आसपास एकत्रित है, तो आप अति शक्तिशाली होंगे।
मंत्र : "हं"
कैसे जाग्रत करें : कंठ में संयम करने और ध्यान लगाने से यह चक्र Iजाग्रत होने लगता है।
प्रभाव : इसके जाग्रत होने कर सोलह कलाओं और सोलह विभूतियों का ज्ञान हो जाता है। इसके जाग्रत होने से जहां भूख और प्यास को रोका जा सकता है वहीं मौसम के प्रभाव को भी रोका जा सकता है।

6. आज्ञाचक्र :
भ्रूमध्य (दोनों आंखों के बीच भृकुटी में) में "आज्ञा-चक्र" है। सामान्यतौर पर जिस व्यक्ति की ऊर्जा यहां ज्यादा सक्रिय है, तो ऐसा व्यक्ति बौद्धिक रूप से संपन्न, संवेदनशील और तेज दिमाग का बन जाता है लेकिन वह सब कुछ जानने के बावजूद मौन रहता है। "बौद्धिक सिद्धि" कहते हैं।
मंत्र : "ॐ"
कैसे जाग्रत करें : भृकुटी के मध्य ध्यान लगाते हुए साक्षी भाव में रहने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है।
प्रभाव : यहां अपार शक्तियां और सिद्धियां निवास करती हैं। इस "आज्ञा चक्र" का जागरण होने से ये सभी शक्तियां जाग पड़ती हैं, व्यक्ति एक सिद्धपुरुष बन जाता है।

7. सहस्रार चक्र :
"सहस्रार" की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है अर्थात जहां चोटी रखते हैं। यदि व्यक्ति यम, नियम का पालन करते हुए यहां तक पहुंच गया है तो वह आनंदमय शरीर में स्थित हो गया है। ऐसे व्यक्ति को संसार, संन्यास और सिद्धियों से कोई मतलब नहीं रहता है।
कैसे जाग्रत करें : "मूलाधार" से होते हुए ही "सहस्रार" तक पहुंचा जा सकता है। लगातार ध्यान करते रहने से यह "चक्र" जाग्रत हो जाता है और व्यक्ति परमहंस के पद को प्राप्त कर लेता है।
प्रभाव : शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण विद्युतीय और जैवीय विद्युत का संग्रह है। यही "मोक्ष" का द्वार है।अजय कर्मयोगी

बुधवार, 20 दिसंबर 2017




ब्रह्मांड में सबसे बड़ा क्या?


वेद, पुराण और गीता पढ़ने के बाद हमने जाना कि ब्रह्मांड में सबसे बड़ी कौन-सी ताकत है। बहुत से लोग यह जानना चाहते होंगे। इसके लिए हमने क्रमवार कुछ खोजा है।

उपनिषदों में प्रश्न-उत्तरों के माध्यम से ऋषियों ने इस ब्रह्मांड के रहस्य को अपने शिष्यों के सामने उजागर किया और फिर अपनी शिक्षाओं में उन्होंने सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य आदि की शिक्षा दी। उनकी तमाम शिक्षाओं में भी ब्रह्मचर्य को उन्होंने सबसे प्रधान माना। ब्रह्मचर्य को उन्होंने जीवन में सबसे महत्वपूर्ण माना।

ब्रह्मचर्य से बढ़कर कुछ नहीं। ब्रह्मचर्य से शक्ति, सेहत और समृद्धि मिलती है, लेकिन ब्रह्मचर्य से बढ़कर भी कुछ है।

अन्न ही ब्रह्म :

अन्न ही ब्रह्मचर्य से बढ़कर है। अन्न और धरती पर पाई जाने वाली सभी वनस्पतियों की हमारे ऋषि-मुनि प्रार्थना करते थे। अन्न हमें ओज और ब्रह्मचर्य प्रदान करता है। अन्न हमारे लिए अमूल्य पदार्थ है। अन्न के बगैर व्यक्ति शक्तिहीन हो जाता है। अन्न हमें तभी शक्ति प्रदान करता है जबकि हम उपवास का पालन करते हैं।

अन्न से ही हमारा शरीर बनता है और अन्न से ही यह शरीर बिगड़ भी सकता है अत: अन्न का भक्षण धार्मिक रीति अनुसार करना चाहिए।

धरती मां :

पृथ्वी अन्न से भी बड़ी है। वह हमारी माता है। हमारी दो प्रकार की माताएं होती हैं। एक तो भौतिक माता जो हमारी जननी है और दूसरी पृथ्वी माता है (जो हमें गर्भाशय से मृत्युपर्यंत पालती है)।

पुराणों अनुसार हम हमारी भौतिक माता के गर्भ से निकलकर धरती माता के गर्भाशय में प्रविष्ट हो जाते हैं। यह माता हमारा लालन-पालन करती है। यह धरती हमें विभिन्न वनस्पतियां देकर हमारा पोषण करती है। उसे वेद-पुराण में धेनु कहते हैं (कामधेनु एक ऐसी गाय है, जो ऋषि वशिष्ठ से संबंधित थी और संपूर्ण कामना पूर्ण कर देती थी)।

यह धरती हमारा ही नहीं, बल्कि समस्त जीव-जंतु, पेड़-पौधे, जलचर, थलचर, नभचर, उभयचर आदि सभी जीवों को समान रूप से पालती है और उन्हें संपूर्ण उम्र तक जिंदा बनाए रखने का प्रयास करती है, लेकिन मानव अपनी इस माता पर तरह-तरह के अत्याचार करता रहता है।

जल से धरती की उत्पत्ति हुई :

सचमुच ऐसा ही हुआ। जलता हुआ जल कहीं जमकर बर्फ बना तो कहीं भयानक अग्नि के कारण काला कार्बन होकर धरती बनता गया। कहना चाहिए कि ज्वालामुखी बनकर ठंडा होते गया। अब आप देख भी सकते हैं कि धरती आज भी भीतर से जल रही है और हजारों किलोमीटर तक बर्फ भी जमी है। धरती पर 75 प्रतिशत जल ही तो है। कोई कैसे सोच सकता है कि जल भी जलता होगा या वायु भी जलती होगी?

हिंदू धर्म में नदियों की पूजा इसीलिए की जाती है। जल नहीं होता तो जीवन भी नहीं होता। जल के देवता वरुण और इंद्र की वेदों में स्तुतियां मिल जाएंगी। जल को सबसे महत्वपूर्ण तत्व माना जाता है। जल उतना ही जाग्रत और बोध करने वाला तत्व है जितना कि मानव सोच-समझ सकता है। जीवों को उत्पन्न करने वाली धरती कैसे निर्जीव मानी जा सकती है और धरती को उत्पन्न करने वाला जल कैसे सिर्फ एक पदार्थ माना जा सकता है।

अग्नि से जल की उत्पत्ति :

ब्रह्मांड में विराट अग्नि के गोले देखे जा सकते हैं, धरती भी अग्नि का एक गोला थी। अग्नि से ही जल तत्व की उत्पत्ति हुई। अं‍तरिक्ष में आज भी ऐसे समुद्र घुम रहे हैं जिनके पास अपनी कोई धरती नहीं है लेकिन जिनके भीतर धरती बनने की प्रक्रिया चल रही है और जो कभी अग्नि के समुद्र थे।

जल से बड़ा यह अग्नि तत्व है, जो कि सारे ब्रह्माण्ड को चला रहा है जिसने सारे संसार में चेतना का प्रसार कर रखा है। अग्नि तत्व के कारण वर्षा होती है जिससे हर प्रकार का अन्न पैदा होता है। जब यह समुद्र पर कार्य करती है तो वाष्प बनती है जिससे बादल बनते हैं, जो वर्षा का कारण होते हैं। वर्षा से वनस्पति जगत उत्पन्न होता है।

प्रत्येक व्यक्ति के भीतर अग्नि तत्व होता है। अग्नि से ही बल मिलता है इसीलिए हिंदू धर्म में अग्नि की पूजा होती है, प्रार्थना होती है और यज्ञ किए जाते हैं। घर-घर दीपक इसीलिए जलाए जाते हैं कि हमें अग्नि का महत्व ज्ञात रहे। अग्निदेव साक्षात हमारे बीच रहते हैं।

अग्नि से बढ़कर है वायु :

धरती के 75 प्रतिशत भाग में जल है व 100 प्रतिशत वायु है। वायु हर जगह है। समुद्र के भीतर भी और धरती से सैकड़ों किलोमीटर ऊपर भी। वायु की सत्ता सबसे बड़ी है। वायु के बगैर व्यक्ति एक क्षण भी जिंदा नहीं रह सकता। यही हमारे प्राण हैं।

वायु में ही अग्नि और जल तत्व छुपे हुए रूप में रहते हैं। वायु ठंडी होकर जल बन जाती है व गर्म होकर अग्नि का रूप धारण कर लेती है। वायु का वायु से घर्षण होने से अग्नि की उत्पत्ति हुई। अग्नि की उत्पत्ति ब्रह्मांड की सबसे बड़ी घटना थी। वायु जब तेज गति से चलती है तो धरती जैसे ग्रहों को उड़ाने की ताकत रखती है। वायु धरती पर भी है और धरती के बाहर अंतरिक्ष में भी प्रत्येक ग्रह पर वायु है और प्रत्येक ग्रह की वायु भिन्न-भिन्न है। वेदों में 8 तरह की वायु का वर्णन मिलता है।
आप सोचिए कि सूर्य से धरती तक जो सौर्य तूफान आता है वह किसकी शक्ति से यहां तक आता है? संपूर्ण ब्रह्मांड में वायु का साम्राज्य है, लेकिन हमारी धरती की वायु और अंतरिक्ष की वायु में फर्क है।

वायु को ब्रह्मांड का प्राण और आयु कहा जाता है। शरीर और हमारे बीच वायु का सेतु है। शरीर से वायु के निकल जाने को ही प्राण निकलना कहते हैं।

आकाश तत्व :

बहुत से दार्शनिक आकाश को अनुमान ही मानते हैं। आकाश से वायु की उत्पत्ति हुई। आकाश एक अनुमान है। दिखाई देता है लेकिन पकड़ में नहीं आता। धरती के एक सूत ऊपर से, ऊपर जहां तक नजर जाती है उसे आकाश ही माना जाता है।

आकाश अर्थात वायुमंडल का घेरा-

स्काई। खाली स्थान अर्थात स्पेस। जब हम खाली स्थान की बात करते हैं तो वहां अणु का एक कण भी नहीं होना चाहिए, तभी तो उसे खाली स्थान कहेंगे। है ना? हमारे आकाश-अंतरिक्ष में तो हजारों अणु-परमाणु घूम रहे हैं।

अंतरिक्ष :

अंतरिक्ष अग्नि, वायु और आकाश से महान है। हम जो भी शब्द उच्चारण करते हैं वे इस अंतरिक्ष में विचरण करते रहते हैं। आकाश में वायु साक्षात है लेकिन अंतरिक्ष में वायु सूक्ष्म रूप है। अंतरिक्ष ही सभी का आधार है। सभी ग्रह-नक्षत्र अंतरिक्ष के बल पर ही स्थिर और चलायमान हैं।

अंतरिक्ष को खाली स्थान माना जाता है यानी स्पेस। खाली स्थान को अवकाश कहते हैं। अवकाश था तभी आकाश की उत्पत्ति हुई अर्थात अवकाश से आकाश बना। अवकाश अर्थात अनंत अंधकार। अनंत अं‍तरिक्ष। अंधकार के विपरीत प्रकाश होता है, लेकिन यहां जिस अंधकार की बात कही जा रही है उसे समझना थोड़ा कठिन जरूर है। यही अद्वैतवादी सिद्धांत है।

अंतरिक्ष को सबसे महान माना गया है। ऊपर देखो और ऊपर से ही कुछ मांगो। नीचे मूर्ति या मंदिर में प्रार्थना करने वाले क्या यह जानते हैं कि वैदिक ऋषि ऊपर वाले की ही प्रार्थना करते थे। ध्यान लगाकर वे अपने भीतर के अंतरिक्ष को खोजते थे।
अंतरिक्ष से सब कुछ प्राप्त किया जाता जाता है और अपनी बुद्धि के अनुसार इनको ग्रहण किया जाता है। मेधा बुद्धि का संबंध अंतरिक्ष से होता है। अंतरिक्ष हमारी बुद्धि को बढ़ाने वाला है। यह हमारे भीतर जीवन को प्रबल करता है। इसी से वायु को गति मिलती है। इसी में अग्नि भी विद्यमान रहती है।

अंतरिक्ष से बढ़कर है प्राण :

यह प्राण ही है जिसके अवतरण से धरती और अन्य जगत में हलचल हुई और द्रुत गति से आकार-प्रकार का युग प्रारंभ हुआ। ब्रह्मांड और प्रकृति भिन्न-भिन्न रूप धारण करती गई। प्राण को ही जीवन कहते हैं। प्राण के निकल जाने पर प्राणी मृत अर्थात जड़ माना जाता है। यह प्राणिक शक्ति ही संपूर्ण ब्रह्मांड की आयु और वायु है अर्थात प्राणवायु ही आयु है, स्वास्थ्य है।

पत्थर, पौधे, पशु और मानव, ग्रह-नक्षत्र के प्राण में जाग्रति और सक्रियता का अंतर है। देव, मनुष्य, पशु आदि सभी प्राण के कारण चेष्टावान हैं।

मन की सत्ता :

मानव का मन वायु, ध्वनि और प्रकाश की गति से भी तेज है। यह क्षणभर में ब्रह्मांड के किसी भी कोने में जा सकता है। वेद-पुराणों में मन की शक्ति को सबसे बड़ी शक्ति माना गया है। मन के भी कई प्रकार हैं। हमारा और आपका मन मिलकर समूहगत मन का निर्माण होता है। इसी तरह धरती का भी मन है और वायु का भी। किसी में मन सुप्त है तो किसी में जाग्रत।

जिस तरह हमारे शरीर का आधार है हमारे प्राण और प्राण का आधार है मन, उसी तरह सभी जीव-जंतु आदि का आधार भी है मन। मानसिक शक्ति में इतनी ताकत होती है कि वह तूफानों को रोक दे, आग को बुझा दे और जल को सूखा दे। हमारे ऋषि-मुनियों में यह शक्ति थी।

सृष्‍टि के जन्म और विकास में मन एक महत्वपूर्ण घटना थी। मन के गुण, भाव और विचारों के प्रत्यक्षों से हैं। मन 5 इंद्रियों के क्रिया-कलापों से उपजी प्रतिक्रिया मात्र नहीं है- इस तरह के मन को सिर्फ ऐंद्रिक मन ही कहा जाता है, जो प्राणों के अधीन है, लेकिन मन इससे भी बढ़कर है।
मनुष्यों, तुम मन की मनमानी के प्रति जाग्रत रहो वेदों में यही श्रेष्ठ उपाय बताया गया है।

मन से बढ़कर बुद्धि :

मन के अलावा और भी सूक्ष्म चीज होती है जिसे बुद्धि कहते हैं, जो गहराई से सब कुछ समझती और अच्छा-बुरा जानने का प्रयास करती है, इसे ही 'सत्यज्ञानमय' कहा गया है। प्रत्येक जीव-जंतु में बुद्धि होती है। बुद्धि से ही हम अपने होने की स्थिति का ज्ञान करते हैं। बुद्धि से ही धरती जान जाती है कि मैं असंतुलित हो रही हूं तो मुझे संतुलन कायम करने के लिए क्या करना चाहिए। यह बुद्धि ही सही और गलत मार्ग बताती है।

कहते हैं कि फलां-फलां की बुद्धि भ्रष्ट हो गई है या विनाश काले विपरीत बुद्धि...। जब मनुष्य को अपने अज्ञान में पड़े रहने का ज्ञान होता है, तब शुरू होता है मन पर नियंत्रण। मन को नियंत्रित कर उसे बुद्धि-संकल्प में स्थित करने वाला ही विवेकी कहलाता है। विवेकी में तर्क और विचार की सुस्पष्टता होती है। किंतु जो बुद्धि का भी अतिक्रमण कर जाता है उसे अंतर्दृष्टि संपन्न मानस कहते हैं अर्थात जिसका साक्षीत्व गहराने लगा। इसे ही ज्ञानीजन संबोधि का लक्षण कहते हैं, जो विचार से परे निर्विचार में स्‍थित है।

ब्रह्म ही सत्य है :
।।ॐ।। ।।यो भूतं च भव्‍य च सर्व यश्‍चाधि‍ति‍ष्‍ठति‍।
स्‍वर्यस्‍य च केवलं तस्‍मै ज्‍येष्‍ठाय ब्रह्मणे नम:।।-अथर्ववेद 10-8-1

भावार्थ : जो भूत, भवि‍ष्‍य और सब में व्‍यापक है, जो दि‍व्‍यलोक का भी अधि‍ष्‍ठाता है, उस ब्रह्म (परमेश्वर) को प्रणाम है।

हिंदू धर्म की लगभग सभी विचारधाराएँ (चर्वाक को छोड़कर) यही मानती हैं कि कोई एक परम शक्ति है जिसे ईश्वर कहा जाता है। वेद, उपनिषद, पुराण और गीता में उस एक ईश्वर को 'ब्रह्म' कहा गया है।
ब्रह्म शब्द बृह धातु से बना है जिसका अर्थ बढ़ना, फैलना, व्यास या विस्तृत होना। ब्रह्म परम तत्व है। वह जगत्कारण है। ब्रह्म वह तत्व है जिससे सारा विश्व उत्पन्न होता है, जिसमें वह अंत में लीन हो जाता है और जिसमें वह जीवित रहता है।
अजय कर्मयोगी

मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

चक्रासन

चक्र (chakrasana yoga or Wheel Posture) का अर्थ है पहिया। इस आसन में व्यक्ति की आकृति पहिये के समान नजर आती है इसीलिए इसे चक्रासन कहते हैं। यह आसन भी उर्ध्व धनुरासन के समान माना गया है।
अवधि/दोहराव

चक्रासन को सुविधानुसार 30 सेकंड से एक मिनट तक किया जा सकता है। इसे दो या तीन बार दोहरा सकते हैं।
चक्रासन की विधि

सर्वप्रथम शवासन में लेट जाएं। फिर घुटनों को मोड़कर, तलवों को भूमि पर अच्छे से जमाते हुए एड़ियों को नितंबों से लगाएं। कोहनियों को मोड़ते हुए हाथों की हथेलियों को कंधों के पीछे थोड़े अंतर पर रखें। इस स्थिति में कोहनियां और घुटनें ऊपर की ओर रहते हैं। श्वास अंदर भरकर तलवों और हथेलियों के बल पर कमर-पेट और छाती को आकाश की ओर उठाएं और सिर को कमर की ओर ले जाए।

फिर धीरे-धीरे हाथ और पैरों के पंजों को समीप लाने का प्रयास करें, इससे शरीर की चक्र जैसी आकृति बन जाएगी। अब धीरे-धीरे श्वास छोड़ते हुए शरीर को ढीला कर, हाथ-पैरों के पंजों को दूर करते हुए कमर और कंधों को भूमि पर टिका दें। और पुन: शवासन की स्थिति में लौट आएं।
सावधानी

चक्रासन अन्य योग मुद्राओं की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण है। यदि आप इस आसन को नहीं कर पा रहे हैं तो जबरदस्ती न करें।
चक्रासन का लाभ

मेरुदंड को लचिला बनाकर शरीर को वृद्धावस्था से दूर रखता है। शरीर में शक्ति और स्फूर्ति बनी रहती है। यह रीढ़, कंधे, कमर, पीठ, पेट सभी को स्वस्थ बनाए रखकर शक्ति प्रदान करता है। यह हृदय प्रणाली को सुचारू रूप से चलायमान रखता है।
अजय कर्मयोगी

सोमवार, 18 दिसंबर 2017



हमें पढाया गया कि भारत एक अध्यात्मिक और कृषि प्रधान देश था लेकिन ये नहीं बताया कि भारत विश्व कि 2000 से ज्यादा वर्षों तक विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति थी / angus Maddison और paul Bairoch अमिय कुमार बागची और Will Durant जैसे आर्थिक और सामाजिक इतिहास कारों ने भारत की जो तस्वीर पेश की , वो चौकाने वाली है /
Will Durant ने 1930 मे एक पुस्तक लिखी Case For India। विल दुरान्त दुनिया के आज तक सबसे ज्यादा पढे जाने वाले writer हैं और निर्विवाद हैं / इनको अभी तक किसी ism में फिट नहीं किया गया है / उन्ही की पुस्तक के कुछ अंश उद्धृत करा रहा हूँ , ये समझने समझाने के लिए कि आखिर भारत को क्यों #स्किल_डेव्लपमेंट_और_उद्योगों को बढ़ावा देना चाहिये अपने स्वर्णिम आर्थिक युग वापसी के लिये ?? और उसका खुद का मॉडेल होना चाहिये न कि अमेरिका या यूरोप की नकल करनी चाहिये /
जिस #स्किल या कौटिल्य के अनुसार #कारकुशीलव_वार्ता शूद्रस्य स्वधर्मह की बात किया गया है गौरवशाली स्वर्णिम भारत के बारे मे ; उसी स्किल और उसके फलस्वरूप , उसके गौरव शाली भौतिक उत्पादों की बात करते हुये विल दुरान्त 1930 मे लिखते हैं ---
" जो लोग आज हिंदुओं की अवर्णनीय गरीबी और असहायता आज देख रहे हैं , उन्हें ये विस्वास ही न होगा ये भारत की धन वैभव और संपत्ति ही थी जिसने इंग्लैंड और फ्रांस के समुद्री डाकुओं (Pirates) को अपनी तरफ आकर्षित किया था। इस " धन सम्पत्ति" के बारे में Sunderland लिखता है :---
" ये धन वैभव और सम्पत्ति हिंदुओं ने विभिन्न तरह की विशाल (vast) इंडस्ट्री के द्वारा बनाया था। किसी भी सभ्य समाज को जितनी भी तरह की मैन्युफैक्चरिंग और प्रोडक्ट के बारे में पता होंगे ,- मनुष्य के मस्तिष्क और हाथ से बनने वाली हर रचना (creation) , जो कहीं भी exist करती होगी , जिसकी बहुमूल्यता या तो उसकी उपयोगिता के कारण होगी या फिर सुंदरता के कारण, - उन सब का उत्पादन भारत में प्राचीन कॉल से हो रहा है । भारत यूरोप या एशिया के किसी भी देश से बड़ा इंडस्ट्रियल और मैन्युफैक्चरिंग देश रहा है।इसके टेक्सटाइल के उत्पाद --- लूम से बनने वाले महीन (fine) उत्पाद , कॉटन , ऊन लिनेन और सिल्क --- सभ्य समाज में बहुत लोकप्रिय थे।इसी के साथ exquisite जवेल्लरी और सुन्दर आकारों में तराशे गए महंगे स्टोन्स , या फिर इसकी pottery , पोर्सलेन्स , हर तरह के उत्तम रंगीन और मनमोहक आकार के ceramics ; या फिर मेटल के महीन काम - आयरन स्टील सिल्वर और गोल्ड हों।इस देश के पास महान आर्किटेक्चर था जो सुंदरता में किसी भी देश की तुलना में उत्तम था ।इसके पास इंजीनियरिंग का महान काम था। इसके पास महान व्यापारी और बिजनेसमैन थे । बड़े बड़े बैंकर और फिनांसर थे। ये सिर्फ महानतम समुद्री जहाज बनाने वाला राष्ट्र मात्र नहीं था बल्कि दुनिया में सभ्य समझे जाने वाले सारे राष्ट्रों से व्यवसाय और व्यापार करता था । ऐसा भारत देश मिला था ब्रिटिशर्स को जब उन्होंने भारत की धरती पर कदम रखा था ।"
ये वही धन संपति थी जिसको कब्जाने का ईस्ट इंडिया कंपनी का इरादा था / पहले ही 1686 में कंपनी के डाइरेक्टर्स ने अपने इरादे को जाहिर कर दिया था --" आने वाले समय में भारत में विशाल और सुदृढ़ अंग्रेजी राज्य का आधिपत्य जमाना " /
पेज- 8-9
ये था उस स्किल्ड इंडिया का गौरवशाली भारत जिसको लूटने खसोटने के बाद बहुसंख्यक स्किल्ल्ड विज्ञानविद्या के निर्वाहकों को जब बेघर और बेरोजगार किया गया ।
और उन्ही को डिप्रेस्ड क्लास SC में सचेडुले किया गया तो सोलंकी महार कोली जैसे सम्मानित राजपूतो को जो इन उत्पादों के निर्माता थे ,उनको भी उसी SC या अछूतों की लिस्ट में शामिल कर दिया जाता है ।
और उनको मनुस्मृति का झुनझुना दे दिया जाता है जिसको बाबा साहेब और उनके अनुयायी आज तक जलाते चले आ रहे हैं

The Fall & Rise of #Pride for #India #Culture
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An excellent write up by Ganga Mahto.
Follow him for more such articles with in-depth knowledge and analysis.

जब #अंग्रेज इस देश में आये थे. और यहाँ आकर उन्होंने हम भारतीयों के ऊपर अपना राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और #सांस्कृतिक प्रभुत्व जमाना शुरू किया था तब यूरोपीय लोग #हिन्दू समाज की #संस्कृति, #धर्म तथा #रीति रिवाजों की निंदा कर रहे थे और हमें निम्न कोटि का साबित कर रहे थे. वास्तव में हर विजेता जाति यह साबित करने की कोशिश करती है कि उसकी संस्कृति, #भाषा, #साहित्य, धर्म तथा सामाजिक मूल्य अधिक श्रेष्ठ हैं. हर विजेता जाति ने विजित जाति को बर्बर कहा है, असभ्य कहा है, राक्षस कहा है. बंगाल में यूरोपियों ने कई स्कूल और कालेज खोले थे, यहाँ भारतीय युवक #यूरोपीय #शिक्षा प्राप्त करते थे. इन शिक्षा संस्थानों में तथा ऐसे ही अन्य बौधिक संस्थानों में तथा ऐसे ही अन्य बौद्धिक केन्द्रों में हिन्दू युवकों के सामने हिन्दू धर्म, समाज, संस्कृति तथा रीति रिवाजों के पिछड़ेपन तथा घटियापन को साबित किया जाता था और बताया जाता था कि हिन्दू समाज एक बर्बर और असभ्य समाज है, जिसके पास कोई गर्व करने योग्य चीज नहीं है. इसका प्रभाव पड़ा था शिक्षित हिन्दू युवकों के मन में. अपने समाज के प्रति हीनता की भावना भर उठी थी. शिक्षित युवक पिछड़ा मानकर शर्माने लगे थे. बहुत तेजी से बंगाल में ईसाई धर्म फ़ैल रहा था. ये बहुत गरीब लोग नहीं थे, जो आर्थिक सुविधाओं के लोभ में ईसाईयत को अपना रहे थे. ये शिक्षित अभिजात्य और सम्पन्न घरों के लोग थे जो ईसाई धर्म को अपना रहे थे. उनके मन में अपनी जातीय पहचान के प्रति अपने समाज और संस्कृति के प्रति हीनता की भावना आ गयी थी और वे यूरोपियों के नजरों से सम्मानित बनना चाहते थे.
उन्होंने यूरोपियों द्वारा अपने समाज संस्कृति की व्याख्या के आगे सिर झुका दिया था. इस तरह से शिक्षित हिन्दू भी विदेशियों के सामने सांस्कृतिक रूप से पराजित हो रहे थे. लेकिन यूरोपीय लोग हम हिंदुओं को सांस्कृतिक रूप से पूर्णरूप से पराजित नहीं कर सके. हालांकि की यूरोपियों की आर्थिक, राजनीतिक व्यवस्था तथा सभ्यता संस्कृति का भारतवासियों पर पर्याप्त प्रभाव पड़ा और यह स्वाभाविक भी था. फिर भी यूरोपीय भारतीय संस्कृति, धर्म और मूल्यों तथा रीति रिवाजों को पराजित नहीं कर सके, क्योंकि हिंदुओं ने अपनी हो रही सांस्कृतिक पराजय के खिलाफ संघर्ष किया और उस पराजय को उलट डाला.
बंगाल में #राजाराम मोहन राय पहले व्यक्ति थे. जिन्होंने यूरोपीय धर्म, संस्कृति और मूल्यों के विरूद्ध विचारधारात्मक संघर्ष चलाया और यह साबित कर दिखाया कि यद्यपि हिन्दू समाज, संस्कृति, धर्म और रीति रिवाजों में बहुत सी त्रुटियाँ हैं, फिर भी यह घटिया नहीं है. वह यूरोपीय संस्कृति, धर्म और रीति रिवाजों से कहीं अधिक श्रेष्ठ है. राजाराम मोहनराय ने अख़बारों में तथा सभा समितियों में यूरोपीय विद्वानों से बहस किये, वाद- विवाद किए हिन्दू संस्कृति और समाज पर उनके प्रहारों का खण्डन कर दिखाया और हिन्दू लोगों में अपनी मौलिक पहचान के प्रति, अपने समाज और संस्कृति के प्रति गौरव की भावना भरी.
जब बंगाल में राजाराम मोहनराय विदेशियों की विचारधारा के खिलाफ संघर्ष कर हिन्दूओं को मन में अपने समाज संस्कृति और धर्म के प्रति श्रेष्ठता और गौरव की भावना भर रहे थे. उसी समय पंजाब, गुजरात और उत्तर प्रदेश में स्वामी #दयानंद #सरस्वती तथा महाराष्ट्र में #रानाडे भी यूरोपीय संस्कृति और मूल्यों के खिलाफ विचारधारात्मक संघर्ष चलाकर किसी तरह भारतीय संस्कृति और मूल्यों की प्रतिष्ठा कर रहे थे. पूरे भारतवर्ष में यूरोपियों द्वारा भारतीयों की संस्कृति, धर्म और मूल्यों को नीचा दिखाने के खिलाफ, सांस्कृतिक पराजय के खिलाफ एक महान सांस्कृतिक आंदोलन उठ खड़ा हुआ, जिसका उद्देश्य था भारतीयों को अपना महान संस्कृति, महान मूल्यों और परंपराओं का बोध करना. उनके मन में अपनी संस्कृति पहचान के प्रति गौरव और गर्व की भावना भरना १९वी शताब्दी के इस महान सांस्कृतिक अन्दोलन को भारतीय समाज के पुनर्जागरण का आंदोलन भी कहा जाता है.
इस सांस्कृतिक आंदोलन को हिन्दू समाज के बौद्धिक नेताओं ने दो तरीकों से किया था- एक ओर तो उन्होंने यूरोपीय लोगों द्वारा हिन्दू समाज, धर्म और संस्कृति के खिलाफ किये जा रहे प्रहारों और निंदा का जमकर मुकाबला किया और बहस करके, विचारधारात्मक संघर्ष चलाकर उनकी आलोचना का खण्डन किया तथा हिंदू समाज और संस्कृति के औचित्य तथा श्रेष्ठता को स्थापित किया, लेकिन साथ ही साथ दूसरी ओर उन्होंने हिंदू समाज में रूढ़िवाद और गलत धार्मिक, सामाजिक प्रथाओं तथा अंधविश्वासों के खिलाफ संघर्ष चलाया और हिंदू समाज में सुधार का आंदोलन भी खड़ा किया, ऐसा करना जरूरी था. क्योंकि हिन्दू समाज के इन्हीं कमजोर पक्षों को आधार बनाकर यूरोपीय लोग हिंदू समाज पर अपने हमले करते थे. इन कमजोर पक्षों को खत्म किये बिना यूरोपियों की आलोचना के आधार को खत्म करना मुश्किल था.।
हिंदू समाज के कमजोर पक्षों को खत्म करने और समाज का सुधार करने के लिये इन सुधारकों ने प्राचीन परंपराओं, शास्त्रों, धर्म तथा रीति रिवाजों का गहरा अध्ययन किया. बहुत सी पुरानी चीजों की नये युग के अनुसार नई व्याख्या की और कुछ चीजों के लिये नये विधान बनाये. बाल विवाह, बहु विवाह प्रथा तथा सती प्रथा इसी तरह खत्म किया गया तथा विधवा विवाह और स्त्री शिक्षा को उचित ठहराया गाया. वर्ण व्यवस्था, जाति प्रथा के अन्यायपूर्ण तत्वों का विरोध करके मनुष्य मात्र के लिए समानता के आदर्श को सामने रखा गया.
१९वी सदी के बिल्कुल अंत में स्वामी विवेकानन्द ने ६० वर्षों से चल रहे इस महान सांस्कृतिक आंदोलन को इसके उत्कर्ष तक पहुंचा दिया. विवेकानन्द ने न सिर्फ भारत वर्ष के अन्दर, बल्कि यूरोप और अमेरिका में भी जाकर विचारधारात्मक संघर्ष के जरिये भारतीय संस्कृति और मूल्यों की श्रेष्ठता को साबित कर दिखाया. इस तरह सांस्कृतिक आंदोलन ने एक हद तक अपने उद्देश्य को पूरा कर लिया. भारतीयों के मन से अपनी संस्कृति और अपनी जातीय पहचान के प्रति हीनता की भावना खत्म हो गयी और उसकी जगह भारतीय स्वाभिमान और गौरव की भावना ने ले लिया.
यह बदली हुई मानसिकता अंग्रेजों के खिलाफ भारत के स्वतंत्रता संग्राम का आधार बनी है. सांस्कृतिक आंदोलन जिस जातीय स्वाभिमान और सांस्कृतिक गौरव की भावना को भारतीय युवकों के हृदय में जगाया, उसी से प्रेरित होकर लाखों लाख युवक अपने देश को अंग्रेजों के गुलामी से मुक्त करने के लिये राजनीतिक संघर्ष में कुद पड़े. अगर १९वी सदी में यूरोप के सांस्कृतिक प्रमुख के खिलाफ हम भारतीयों का महान सांस्कृतिक आंदोलन न होता तो १९वी सदी में अंग्रेजों के खिलाफ भारत का स्वतंत्रता आंदोलन भी नहीं होता.
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अपनी पहचान के प्रति गौरव की भावना के बिना पहचान को प्रतिष्ठित करने का आंदोलन कभी भी सफल नहीं हो सकता.
अगर लाखों लोग अपनी पहचान पर शर्माते हैं, शिक्षित समुदाय अपनी भाषा, संस्कृति, रीति रिवाज और धर्म को हीन दृष्टि से देखतें हैं और अपने ऊपर शासन करने वाले अपने शोषकों को अपना आदर्श समझतें हैं तो वे अपनी पहचान के लिये, अपने अलग व्यक्तित्व की प्रतिष्ठा के लिये संघर्ष कैसे कर सकतें है ?
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आज ये विकट स्तिथि बनी हुई हैं. अंग्रेज यहाँ रहते हुए भी जो कार्य ठीक से नहीं कर पाये वो अब दूर से बखूबी कर रहे हैं. आज अपने ही लोगों द्वारा अपनों को गाली दिया जा रहा हैं. समस्याओं को मिटाने की बजाय उसपे राजनीति किया जा रहा हैं. पहले जो अंग्रेज हमारी कमजोर पक्षों पे वार करते थे, अब वो उनके यहाँ के मानसपुत्र कर रहे हैं. आज जो ये हमारी जिन कुरीतियों को ले के पानी पी-पी के गरिया रहे हैं, क्या उनका और हमारा कर्तव्य नहीं बनता कि उन्हें मिल के सुलझाया जाय. हर कोई एक-दूसरे पे कीचड़ें मार रहा हैं. हममें बहुत खामियां हैं तो आपमें भी कम नहीं हैं. सब अपनी गलतियों के सबसे बड़े वकील और दूसरे के गलतियों के सबसे बड़े जज बने जा रहे हैं. किसी न किसी को तो आगे आना पड़ेगा.
आइये… हम अपनी खामियों को मिटाने के लिए कदम बढ़ा चुके हैं, मेरे पीछे भी बहुत

रविवार, 17 दिसंबर 2017



महर्षि अगस्त्य एक वैदिक ॠषि थे।
इन्हें सप्तर्षियों में से एक माना जाता है। ये वशिष्ठ मुनि (राजा दशरथ के राजकुल गुरु) के बड़े भाई थे। वेदों से लेकर पुराणों में इनकी महानता की अनेक बार चर्चा की गई है। इन्होने अगस्त्य संहिता नामक ग्रन्थ की रचना की जिसमे इन्होँने हर प्रकार का ज्ञान समाहित किया। इन्हें त्रेता युग में भगवान श्री राम से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ उस समय श्री राम वनवास काल में थे। इसका विस्तृत वर्णन श्री वाल्मीकि कृत रामायण में मिलता है।  इनका आश्रम आज भी महाराष्ट्र के नासिक की एक पहाड़ी पर स्थित है।
राव साहब कृष्णाजी वझे ने १८९१ में पूना से इंजीनियरिंग की परीक्षा पास की।
भारत में विज्ञान संबंधी ग्रंथों की खोज के दौरान उन्हें उज्जैन में दामोदर त्र्यम्बक जोशी के पास अगस्त्य संहिता के कुछ पन्ने मिले।
इस संहिता के पन्नों में उल्लिखित वर्णन को पढ़कर नागपुर में संस्कृत के विभागाध्यक्ष रहे डा.एम.सी.सहस्रबुद्धे को आभास हुआ कि यह वर्णन डेनियल सेल से मिलता-जुलता है। अत: उन्होंने नागपुर में इंजीनियरिंग के प्राध्यापक श्री पी.पी. होले को वह दिया और उसे जांचने को कहा।
अगस्त्य संहिता का विद्युत्-शास्त्र
अगस्त्य का सूत्र निम्न प्रकार था-
संस्थाप्य मृण्मये पात्रे
ताम्रपत्रं सुसंस्कृतम्‌।
छादयेच्छिखिग्रीवेन
चार्दाभि: काष्ठापांसुभि:॥
दस्तालोष्टो निधात्वय: पारदाच्छादितस्तत:।
संयोगाज्जायते तेजो मित्रावरुणसंज्ञितम्‌॥
अगस्त संहिता
इसका तात्पर्य था, एक मिट्टी का पात्र (Earthen pot) लें, उसमें ताम्र पट्टिका (copper sheet) डालें तथा शिखिग्रीवा डालें, फिर बीच में गीली काष्ट पांसु (wet saw dust) लगायें, ऊपर पारा (mercury‌) तथा दस्त लोष्ट (Zinc) डालें, फिर तारों को मिलाएंगे तो, उससे मित्रावरुणशक्ति का उदय होगा।
उपर्युक्त वर्णन के आधार पर श्री होले तथा उनके मित्र ने तैयारी चालू की तो शेष सामग्री तो ध्यान में आ गई, परन्तु शिखिग्रीवा समझ में नहीं आया। संस्कृत कोष में देखने पर ध्यान में आया कि शिखिग्रीवा याने मोर की गर्दन। अत: वे और उनके मित्र बाग गए तथा वहां के प्रमुख से पूछा, क्या आप बता सकते हैं, आपके zoo में मोर कब मरेगा, तो उसने नाराज होकर कहा क्यों? तब उन्होंने कहा, एक प्रयोग के लिए उसकी गरदन की आवश्यकता है। यह सुनकर उसने कहा ठीक है। आप एक एप्लीकेशन दे जाइये। इसके कुछ दिन बाद एक आयुर्वेदाचार्य से बात हो रही थी। उनको यह सारा घटनाक्रम सुनाया तो वे हंसने लगे और उन्होंने कहा, यहां शिखिग्रीवा का अर्थ मोर की गरदन नहीं अपितु उसकी गरदन के रंग जैसा पदार्थ कॉपरसल्फेट है। यह जानकारी मिलते ही समस्या हल हो गई और फिर इस आधार पर एक सेल बनाया और डिजीटल मल्टीमीटर द्वारा उसको नापा। उसका open circuit voltage था १.३८ वोल्ट और short circuit current था २३ मिली एम्पीयर.
प्रयोग सफल होने की सूचना डा. एम.सी. सहस्रबुद्धे को दी गई। इस सेल का प्रदर्शन ७ अगस्त, १९९० को स्वदेशी विज्ञान संशोधन संस्था (नागपुर) के चौथे वार्षिक सर्वसाधारण सभा में अन्य विद्वानों के सामने हुआ। तब विचार आया कि यह वर्णन इलेक्ट्रिक सेल का है। पर इसका आगे का संदर्भ क्या है इसकी खोज हुई और आगे ध्यान में आया ऋषि अगस्त ने इसके आगे की भी बातें लिखी हैं-
अनने जलभंगोस्ति प्राणो
दानेषु वायुषु।
एवं शतानां कुंभानांसंयोगकार्यकृत्स्मृत:॥
अगस्त संहिता
अगस्त्य कहते हैं सौ कुंभों की शक्ति का पानी पर प्रयोग करेंगे, तो पानी अपने रूप को बदल कर प्राण वायु (Oxygen) तथा उदान वायु (Hydrogen) में परिवर्तित हो जाएगा। उदान वायु को वायु प्रतिबन्धक वस्त्र में रोका जाए तो यह विमान विद्या में काम आता है।
वायुबन्धकवस्त्रेण
निबद्धो यानमस्तके
उदान : स्वलघुत्वे बिभर्त्याकाशयानकम्‌। (अगस्त्य संहिता शिल्प शास्त्र सार)
राव साहब वझे, जिन्होंने भारतीय वैज्ञानिक ग्रंथ और प्रयोगों को ढूंढ़ने में अपना जीवन लगाया, उन्होंने अगस्त्य संहिता एवं अन्य ग्रंथों के आधार पर विद्युत भिन्न-भिन्न प्रकार से उत्पन्न होती हैं, इस आधार उसके भिन्न-भिन्न नाम रखे-
(१) तड़ित्‌-रेशमी वस्त्रों के घर्षण से उत्पन्न।
(२) सौदामिनी-रत्नों के घर्षण से उत्पन्न।
(३) विद्युत-बादलों के द्वारा उत्पन्न।
(४) शतकुंभी-सौ सेलों या कुंभों से उत्पन्न।
(५) हृदनि- हृद या स्टोर की हुई बिजली।
(६) अशनि-चुम्बकीय दण्ड से उत्पन।
अगस्त्य संहिता में विद्युत्‌ का उपयोग इलेक्ट्रोप्लेटिंग के लिए करने का भी विवरण मिलता है। उन्होंने बैटरी द्वारा तांबा या सोना या चांदी पर पालिश चढ़ाने की विधि निकाली। अत: अगस्त्य को कुंभोद्भव (Battery Bone) कहते हैं।
कृत्रिमस्वर्णरजतलेप: सत्कृतिरुच्यते। -शुक्र नीति
यवक्षारमयोधानौ सुशक्तजलसन्निधो॥
आच्छादयति तत्ताम्रं
स्वर्णेन रजतेन वा।
सुवर्णलिप्तं तत्ताम्रं
शातकुंभमिति स्मृतम्‌॥ ५ (अगस्त्य संहिता)
अर्थात्‌-कृत्रिम स्वर्ण अथवा रजत के लेप को सत्कृति कहा जाता है। लोहे के पात्र में सुशक्त जल अर्थात तेजाब का घोल इसका सानिध्य पाते ही यवक्षार (सोने या चांदी का नाइट्रेट) ताम्र को स्वर्ण या रजत से ढंक लेता है। स्वर्ण से लिप्त उस ताम्र को शातकुंभ अथवा स्वर्ण कहा जाता है।
अजय कर्मयोगी

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...