सोमवार, 25 दिसंबर 2017


#महाराज_हर्षवर्धन

गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद भारत मे चारो ओर अराजकता फैल गयी ! भारत की सीमाएं भी असुरक्षित हो चुकी थी, शत्रु हिन्दुओ को आँख दिखा रहे थे ।

भारत के थानेश्वर में राज-पुंज-तेज पुष्यभूति नामक पराक्रमी ओर दक्ष राजा हुए । बाण के अनुसार नागवंशीयो का अंत करके यह साम्राज्य स्थापित हुआ था । जिसने क्रम से आगे चलकर " हूण- हिरण-केशरी " ( हूण रूपी हिरणों को घातक सिंह के समान , " सिंधु - राज- ज्वरों  " ( सिंधु राजा को ज्वर के समान तड़पाने वाले ) गुर्जर प्रजारको ( गुर्जर राजाओ की नींद भग्न करने वाला )  गंधार के राजा को मदमस्त हाथी की तरह कुचल देने वाला, मालव देश की लक्ष्मी( सम्रद्धि )  का हरण करने वाला
तथा प्रतापशील राजा #राजाधिराज_प्रभाकर_वर्द्धन उतपन्न हुए ।

प्रभाकर वर्धन से पूर्व भी कई राजा हुए, लेकिन इस वंश को पहचान प्रभाकरवर्धन से ही मिली थी । प्रभाकर वर्द्धन ने अपने प्रताप ओर पराक्रम से , सिंध प्रदेश, गुर्जर प्रदेश ( पश्चिमी राजस्थान ) मालवा, पंजाब एवं कश्मीर के हूणों को परास्त किया !!

साक्ष्य ( बाँसखेड़ा तामपत्र - पंक्ति 1 से लेकर 7)

गुप्त साम्राज्य के पतन होने के बाद, उतरी भारत मे भिन्न भिन्न स्वतंत्र राज्यो के उदय के कारण , भारत की समतल भूमि में उबड़ खाबड़ आ गया ।  प्रभाकर ने अपनी सेना लेकर .. दूर तक धरती को समतल बनाया, ओर शत्रुओं का दमन किया !! इस प्रकार प्रभाकर वर्धन ने तलवार की धार से शत्रुओं का दमन कर  देश की उन्नति की  !! लेकिन  तत्कालीन राजनीति से यह स्पष्ठ हो जाता है, की उस समय भारत मे वर्चस्व की लड़ाई जोरो पर थी ।  बिहार - बंगाल का गोड़ राज्य भी स्वतंत्र हो गया था , मगध ओर मध्यदेश ( यूपी) में मौखरी बढ़ रहे थे । मालवा में उत्तर गुप्त शाशक प्रबल थे । गुजरात मे काठियावाड़ भी अपनी अलग राजनीति कर रहे थे, गुर्जर देश के प्रतिहार भी ताक में थे, सिंधु भी स्वतंत्र देश बन गया था, पंजाब और कश्मीर भी स्वतंत्र थे । चालुक्य - पल्लव- पांडव भी आपसी युद्ध मे व्यस्त थे , प्रभाकर के समय राष्ट्र की स्तिथि क्या थी ..... इसका अनुमान लगाइए ...

#हर्षवर्धन

प्रतापी राजा प्रभाकरवर्धन सहज स्वभाव से ही सूर्य भक्त थे, प्रतिदिन सूर्यपूजा करते, तथा सूर्यदेव से संतान प्राप्ति की कामना करते । अंततः भगवान सूर्य की कृपा से उनके दो तेजवान पुत्र और कन्या का जन्म हुआ । ज्येष्ठ राज्यवर्धन अत्यंत पराक्रमी ओर यशस्वी कुमार थे । उनके जन्म के कुछ समय बाद हर्ष का जन्म हुआ । हर्ष बाल्यकाल से ही तेजस्वी सुर थे, जिन्हें खेल में आज्ञा- भंग सहन नही होता था । चारो ओर पानी से घिरे समुद्र में स्नान करना, ओर समुद्र तटों पर घूमना हर्ष को बहुत पसंद था । कितना महत्वाकांशी बालक हर्ष था , वह विनीत भक्त भी था, उनके जन्म होते ही ज्योतिषों ने उनके चक्रवर्ती सम्राट बनने की भविष्यवाणी की थी ।

मौखरि वंश के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित कर अपनी शक्ति में ओर व्रद्धि कर ली ।

हूणों के साथ एक युद्ध मे प्रभाकरवर्धन बुरी तरह घायल हुए, हर्ष की माता भी बचपन मे ही स्वर्ग  सिधार गयी थी । प्रभाकरवर्धन भी इस लोक को जीतकर उस लोक को जीतने चले गए । किन्तु अपनी अंतिम यात्रा से पहले उन्होंने हर्ष को समाचार भेजा,

" अपने देश की रक्षा करो, राज्यभार ( शाशन ) को चलाओ, परिजन ओर प्रजा का पालन करो, शस्त्रो का अभ्यास करते रहना, चंचलता का अंत कर, शत्रुओं का पूर्ण नाशः करो , ऐसा आदेश देते हुए " राजसिंह प्रभाकरवर्धन ने आंखे बंद कर ली । ( हर्ष चरित्र - पेज 210- 233 )

प्रभाकरवर्धन बहुत लोकप्रिय राजा थे, उनके जाते ही प्रजा में जैसे विषाद छा गया, अग्निदेव की लपटों में चढ़कर प्रभाकरवर्धन स्वर्गलोक को जीतने चले गए ।

पित्रशोक में  हर्ष के  लिए राज्य एक रोग बन गया । वे  यह सोचने लगे, की अगर पिता की म्रत्यु का समाचार बड़े भाई राज्यवर्धन को पता चला, तो उनका क्या होगा ? राज्यवर्धन भी इस समय किसी अन्य प्रदेश पर चढ़ाई के लिए ही गए थे ।

" कहीं पिता की म्रत्यु का समाचार सुनकर बड़े भाई सन्यासी  हो गए, ओर वन- पहाड़ो में तपस्या करने चले गए तो ? हे ईश्वर !! अनाथ हो गयी यह पृथ्वी !! ऐसा सोचकर वे राज्यवर्धन के आने की राह देखने लगे ।

राज्यवर्धन हूणों पर विजय प्राप्त कर जब वापस लौटे, तो पूरे शरीर मे जगह जगह पट्टियां बंधी हुई थी । राजसभा में सबको मौन देखकर, राजा को सिंहासन पर ना पाकर राज्यवर्धन सब कुछ समझ गए, वहीं हुआ, जिसका डर था, पिता को ना पाकर राज्यवर्धन के हाथों से तलवार छूट गयी, ओर वे वैरागी हो गए ।

राज्यवर्धन के तलवार हाथ से छूटते ही, हर्ष के मन मे भय और शंका के घने बादलों ने जन्म ले लिया !  अगर ज्येष्ठ ही राज्य छोड़कर चले गए,  तो इस राज्य को चलाएगा कौन ? इस राज्य का भोग करेगा कौन ?

हर्ष ने मन ही मन मे खुद को धिक्कारा ..... लक्ष्मण का चरित्र भूल गए हो हर्ष ?? इतना क्या सोच रहे हो ? जहां भाई जाएंगे, वहीं तुम चले जाना !!

दोनो भाई एक दूसरे के आंसू पोंछ रहे थे, उसी समय एक अशुभ समाचार ओर आया, की जिस दिन उनके पिता की म्रत्यु  हुई थी उसी दिन दुस्ट मालव राज ने उनकी बहन के पति देव ग्रहवर्मा की हत्या कर, उनकी बहन के पैरों में बेड़िया डाल, जेल में डाल दिया है ।  ओर अब वह इस देश को  अनाथ समझकर इसपर भी आक्रमण करने वाला है ।

समाचार मिला ही कि राज्यवर्धन का खून खोल उठा, यह समाचार सुनते ही राज्यवर्धन मालव - विनाश के लिए उठ खड़े हुए । भीषण कृपाण को हाथ मे लेकर मालवराज कुल को मिटा देने के लिए राज्यवर्धन का पराक्रम जाग उठा " भला अंधेरा सूर्य का तिरस्कार करें, यह कभी हो सकता है ? "

हर्ष को मंगलकामना देकर राज्यवर्धन उसी घायल अवस्था मे मालव-राज को सबक सिखाने के लिए चल पड़े ।  वहां कुछ ही समय मे मालवराज ने राज्यवर्धन के आगे हथियार डाल दिये, राजवर्धन ने भी उनके इस तरह सुंता, जैसे चाबुक से घोड़ो को सुंता जाता है ।
मालव-राज पराजित तो हुए .... लेकिन इस युद्ध मे राज्यवर्धन को भी अपने प्राण गंवाने पड़े ।

राज्यवर्धन की म्रत्यु के बाद ही हर्ष को पता चला, मालवराज को परास्त करने के बाद, गोड़ों ने छल से राज्यवर्धन की हत्या कर दी ।

पहले माता , फिर -पिता, उसके बाद भाई, पूरा परिवार खोने के बाद अब हर्ष केवल एक पत्थर की मूर्ति थे ।

समय हर्ष के लोहे के शरीर, ओर ब्रज ह्रदय की परीक्षा ले रहा था । तभी तो उसपर दारुण दुःखों की बाढ़ आ रही थी । माता- पिता- बहनोई, भाई सब खो दिया, वह भी एकदम कम उम्र में ।

हर्षवर्धन पहले की तरह इसबार कमजोर नही लग रहे थे । आंखों में पानी भी था , ओर चेहरे पर क्रोध भी ।

" अधर्मी गोड़ राजा ने केवल अपयश ही कमाया है, देखता हूँ, वह दुर्बुद्धि कहाँ तक भागता है । "

तभी मंत्री सिंहनाद ने कहा " एक अधर्मी गोड़ राजा का वध करने से कोई लाभ नही होगा, ऐसा कुछ करो, की अन्य कोई राजा फिर ऐसा दुःसाहस ना कर सके । सम्पूर्ण पृथ्वी विजय की मर्यादा का पालन करो । राजलक्ष्मी को स्थिर कर पुनः पूरे विश्व मे आर्य धर्म ध्वज फहरा दो । कुत्तो ( शत्रु ) का वध करो, राज्य के कतंको को उखाड़ फेंको । अपने पिता , पितामह ओर भाई के मार्ग का अनुसरण करो । इस पृथ्वी की रक्षा के लिए अब केवल तुम बचे हो हर्ष !! अपनी अनाथ प्रजा को समझाओ, ओर राजाओ के सिर पर पांव रखो ।

स्पष्ठ है, की वृद्ध मंत्री यहां हर्ष को दिग्विजय की प्रेरणा दे रहे है ।

हर्ष ने भी शपथ ली, धनुष चिन्ह धारण कर में प्रतिज्ञा करता हूँ, की अपने राज्य में, इस पृथ्वी में , इस कलयुग में , में सतयुग की स्थापना करूँगा !

हर्ष ने तुरन्त सभी अन्य राज्यो में घोषणा करवा दी, सभी राजागण अपने हाथी, सेना तैयार रखे,  ओर जो युद्ध नही करना चाहते, वे अपना धनुष या शीश झुका दे ।

उसके बाद तो विजय का डंका ऐसा बजा की पूरे संसार ने इस युवा शक्ति का लोहा मान लिया ।

लगभग पुरे भारत मे हर्षवर्धन ने विजय प्राप्त की !! केवल चालुक्य वंश के पुलकेशिन द्वित्य के साथ युद्ध मे हर्ष को असफलता हाथ लगी ।

हर्ष का यह काल वास्तव में सतयुग की अनुभति था । आपस में सदैव लड़ने वाले राजवंश  एक ध्वज के नीचे आ गए ।

लेकिन समय हमेशा एक नही रहता, उम्र भर विजयो का स्वाद चखने वाले हर्ष को अंत मे हारना भी पड़ा ! यह बहुत बड़ी हार नही थी, बस मामूली नुकसान था, लेकिन इतना था, चालुक्य से वे पार ना सके ।

अब आधे भारत के  स्वामी थे हर्ष , ओर आधे भारत के स्वामी  ---- #वीर_राजपूत_पुलकेशिन संकलन अजय कर्मयोगी

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...