प्राचीन भारतीय गुरुकुलों में शारीरिक सजा देने का श्रेष्ठ वैज्ञानिक कारण............ विदेशी भी अपना रहे हैं........... उठक बैठक की सजा ............ भारत में गुरुकुल के ज़माने से आक स्कूल, विद्यालयों में बच्चों को उठक बैठक की सजा देने की परम्परा चली आ रही है. दोनों हाथों को आपस में क्रॉस करके बाएं हाथ से दाहिने कान और दहिने हाथ से बाये कान को पकड़कर उठना बैठना होता था. जिस बच्चे को यह सजा मिलती वो तो शर्मसार हो जाता था. लेकिन हाल में हुई रिसर्च से पता चला है कि इस कसरत के लाभ अद्धभुत हैं. कान पकड़ कर उठक बैठक करना यह प्राचीन योग है, जोकि दिमाग के लिए बहुत लाभदायक है. हमारे भारतीय स्कूलों में यह सजा अक्सर पढाई में कमजोर बच्चों को दी जाती है, लेकिन प्राचीन काल में ऐसा नहीं था. उस समय गुरुकुलों में सभी को यह योग कराया जाता था. अब विदेशों में यह योग Super Brain Yoga के नाम से प्रसिद्ध हो रहा है. हम भारतीयों का तो ऐसा है कि जब कोई ये न बोले – वैज्ञानिक रिसर्च में पता चला है…विदेशी इसका पेटेंट करना चाहते हैं…फॉरेन साइंटिस्ट ने कहा, हम किसी बात का विश्वास ही नहीं करते. उठक बैठक के लाभ ............ यह योग करते समय ध्यान दें कि कान के उपरी हिस्से को नहीं बल्कि निचले हिस्से (Earlobe) को पकड़ा जाता है. कान के इस हिस्से में विशेष एक्यूप्रेशर पॉइंट होते हैं, जिसे दबाने से दिमाग की विशेष तंत्रिकाओं में सक्रियता बढती है, मस्तिष्क कार्यक्षमता बढ़ती है. इस पोस्चर में उठने बैठने से मस्तिष्क की मेमोरी सेल्स में तेजी से रक्त प्रवाह होता है. दिमाग के बाये और दायें हिस्सों की कार्यप्रणाली में सामंजस्य स्थापित होता है, जिससे कि मन शांत और केन्द्रित होता है. फलस्वरूप याददाश्त तेज होती है और दिमाग तेज होता है. यह योग करने से Autism, Asperger’s syndrome जैसी दिमागी बीमारियाँ, सीखने और व्यवहार सम्बन्धित रोग में भी लाभ मिलता है. इसी लाभ के कारण कक्षा के कमजोर और शरारती बच्चों को यह योग करवाया जाता था, लेकिन इसे कोई भी करे उसे लाभ ही मिलेगा. उठक-बैठक कैसे करें ............. सामने देखते हुए सीधे खड़े हों, ठुड्डी जमीन के समानांतर हो. दोनों पैर कंधो की चौड़ाई जितना दूरी पर हो और पंजे सीधे हों. अब सीने के सामने से दोनों हाथो को क्रॉस करते हुए बाएं हाथ से दाहिने कान का निचला हिस्सा और दाहिने हाथ से बाएं कान का निचला हिस्सा पकड़ें. कान न बहुत तेजी से दबाएँ कि एकदम लाल ही हो जाएँ न एकदम हल्के से. मध्यम प्रेशर लगाते हुए पकड़ें. कान के सिरे को अंगूठे और पहली ऊँगली के बीच पकड़ें. अंगूठे ऊपर की तरफ हो और ऊँगली पीछे जाये. हाथ सीने के ऊपर हों, जिसमें दाहिना हाथ ऊपर आये. सामने देखते हुए धीरे-धीरे बैठना शुरू करें. आराम से जितना झुक सकें झुकें, फिर धीरे-धीरे उठ खड़े हों. बैठक लगाते समय सांस छोड़ें और उठक लगाते समय सांस लें. एक बार में 1 से 3 मिनट तक यह करें. उठक बैठक के तुरंत बाद आप अनुभव करेंगे कि दिमाग शांत होता है और फ्रेश ऊर्जा महसूस होती है. इस योग को करने से तुरंत लाभ तो मिलते हैं, लेकिन करीब 3 हफ्ते तक करने से ही बड़े बदलाव महसूस होंगे. यह योग करते समय जीभ को तालू से सटाकर रखें, अधिक लाभ मिलेगा.
#वैदिक-समाधान-गुरुकुल चीन का सन् 1962 में भारत पर आक्रमण करने का वास्तविक कारण क्या था ? इसका असल कारण बहुत ही रोमांचक आध्यात्मिक और दिलचस्प कारण था । जानिए एक महत्वपूर्ण जानकारी। इस संसार में ऐसा बहुत कुछ है जो कि हम नहीं जानते, यदा कदा कुछ तथ्य सामने आते रहते हैं जो कभी-कभी सत्य को प्रकट कर ही देते हैं सन् 1962 के भारत और चीन के बीच युद्ध का एक ऐसा कारण है, जिसे तत्कालीन भारत सरकार नहीं जानती थी। हो सकता है कि परिवर्तित सरकारें भी न जानती हों। आज की NDA सरकार भी जानती हो,,,, यह भी आवश्यक नहीं। सन् 1962 के चीन के भारत पर आक्रमण का वास्तविक कारण था-- #शंगरी_ला_घाटी'। यह घाटी #तवांग_मठ के निकट वह घाटी है जहां तृतीय और चतुर्थ आयामों की संधि स्थली है। यह वह दिव्य घाटी है जहाँ कोई साधारण व्यक्ति भी अचानक पहुंच जाए तो वह अमर हो जाता है। उस शंगरी ला घाटी की दिव्यता का रहस्य चीन के शासकों को 'हिब्रू ग्रंथों' और 'भारतीय ग्रंथों' से पता चल गया था। तिब्बत पर अधिकार करना चीन की उसी मंशा का परिणाम था। जब तिब्बत पर अधिकार करने के बाद वहाँ वह घाटी नहीं मिली तो सन् 1962 में अरुणाचल प्रदेश स्थित तवांग मठ के नजदीक हमला कर वहाँ के भूभाग पर कब्जा करना उनकी उसी योजना का हिस्सा था। लेकिन उन्हें तब भी 'शंगरी ला घाटी' नहीं मिलनी थी न ही मिली। आज जो चीन भारत को आंखें दिखा रहा है, उस के पीछे भी एकमात्र कारण वही 'शंगरी ला घाटी' है। भूटान के पास का वह क्षेत्र तो मात्र बहाना है। उसे तो वही दिव्य 'शंगरी ला घाटी' चाहिए। 'शंगरी ला घाटी' वह घाटी है जहाँ भारत के 64 तंत्र, योग और भारत की प्राच्य विद्याओं को सिखाने के लिए संसार के कोने कोने से पात्र व्यक्तियों को खोज खोज कर बुलाया जाता है और शिक्षा-दीक्षा देने के बाद उस के विस्तार के लिए आचार्यों को घाटी के बाहर भेज दिया जाता है। उस घाटी की सब से बड़ी विशेषता है कि वह चतुर्थ आयाम में स्थित होने के कारण इन चर्म चक्षुओं से दृष्टिगोचर नहीं होती। वहाँ उस घाटी में सैकड़ों हज़ारों की संख्या में उच्चकोटि के योगी, साधक, सिद्ध तपस्यारत हैं। वहाँ हमारे इस तीन आयामों वाले संसार की तरह समय की गति तेज नहीं है, बल्कि वह समय मन्द है। वहाँ पहुंच जाने वाला व्यक्ति हज़ारों साल तक वैसा का वैसा ही बना रहता है युवा, स्वस्थ और अक्षुण्ण। यही कारण है कि उस विशेषता के कारण चीनियों की नीयत उस क्षेत्र के लिये हमेशा से कब्जा करने की रही है। और आज भी वह भूटान के बहाने से वही निशाना साधने पर आमादा है। वैसे एक मिथक ये भी है कि भगवान परशुराम, कृपाचार्य और रुद्रांश बजरंग बली यहीं निवास करते हैं विष्णु के कल्कि अवतार को यहाँ 'शांग्रीला घाटी' में लाने वाला व्यक्ति अश्वथामा होगा इसी घाटी में कल्कि अवतार की शिक्षा दीक्षा होगी। हम जिक्र कर रहे हैं शंगरी ला घाटी का। ये तिब्बत और अरुणाचल की सीमा पर है। तंत्र मंत्र के कई जाने माने साधकों ने अपनी किताबों में इस का जिक्र किया है। लोगों का ऐसा मानना है कि ये जगह किसी खास धर्म या संस्कृति की नहीं है, जो भी इसके लायक होता है, वह इसे ढूंढ सकता है। 1942 में एक अंग्रेज अफसर LP फरैल को इस जगह पर कुछ खास अनुभव हुए थे, जिसके बारे में उन्होंने 1959 में साप्ताहिक हिंदुस्तान में लेख प्रकाशित करवाए थे। तिब्बती बुद्धिस्ट्स का मानना है कि जब दुनिया में युद्ध होगा, शंभाला का 25वां शासक इस धरती को बचाने आएगा। प्रसिद्ध योगी परमहंस विशुद्धानंद जी ने भी इस आश्रम की शक्तियों को महसूस किया था, जिस का उन के शिष्य पद्म विभूषण और साहित्य अकादमी से नवाजे गए और गर्वनमेंट संस्कृत कॉलेज के प्राचार्य रहे डॉ. गोपीनाथ कविराज जी ने बड़े विस्तार से अपनी पुस्तक में वर्णन किया है। तिब्बती साधक भी इसके बारे में कहते रहे हैं। इस घाटी को उस बरमूडा ट्राएंगल की तरह ही दुनिया की सबसे रहस्यपूर्ण जगह माना जाता है। कहा जाता है कि भू-हीनता का प्रभाव रहता है। ये भी कहा जाता है कि इस घाटी का सीधा संबंध दूसरे लोक से है। जाने माने तंत्र साहित्य लेखक और विद्वान अरुण कुमार शर्मा ने भी अपनी किताब तिब्बत की वह रहस्यमय घाटी में इस जगह का विस्तार से जिक्र किया है। बकौल उन के दुनिया में कुछ ऐसी जगहें हैं जो भू-हीनता और वायु-शून्यता वाली हैं, ये जगहें वायुमंडल के चौथे आयाम से प्रभावित होती हैं। माना जाता है इन जगहों पर जा कर वस्तु या व्यक्ति का अस्तित्व दुनिया से गायब हो जाता है। माना जाता है ये जगहें देश और काल से परे होती हैं
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शरीर के विभिन्न अंगों में देवताओं का निवास इस प्रकार है................. १. आँख — चन्द्र, सूर्य २. कान —दशो दिशाएँ ३. नाक —अश्विनी कुमार ४. मुँह — अग्निदेव ५. जिभ्या — वरुण ६. हाथ — इन्द्र ७. पैर — उपेन्द्र ८. गुदा — गणेश ९. लिंग —ब्रह्मा १०. नाभि — विष्णु-लक्ष्मी ११. हृदय — शिव-पार्वती १२. कंठ — सरस्वती १३. आज्ञाचक्र-- शिव व्यक्ति को गणेश जी की शक्तियां प्राप्त होती हैं जिससे वह रिद्धि सिद्धि का स्वामी बन जाता है । प्रारम्भ गणेश जी से होता है इसी कारण गणेश जी सबसे पहले पूजे जाते हैं प्रथम पूजा का कारण यह नहीं है कि वह सबसे बड़े हैं । इनसे बड़े तो इंद्र है जिन का वास स्वाधिष्ठान में है । इसके ऊपर स्वाधिष्ठान चक्र है । जिस के देवता इंद्र है और देवी ब्रह्मचारिणी । इस स्थान पर तभी पहुंचा जा सकता है जब ब्रह्मचर्य का पालन किया जाए । यहां तक पहुंचने से पहले साधकों के लिए इंद्र अप्सराएं भेज दिया करता है जिससे उनका ब्रह्मचर्य टूट जाए वह पतित हो जाए । ऐसे प्रमाण बहुत से ग्रंथों में हैं । जो इस स्थान तक पहुंच जाता है उसके पास इंद्र की शक्तियां आ जाती हैं । इंद्र की पूरी परिषद और सभी देवी देवता उसके अधीन हो जाते हैं l उससे ऊपर मणिपुरक चक्र है इसके देवता ब्रह्माजी है । यहां की देवी सरस्वती है ब्रह्मा जी की उत्पत्ति नाभि कमल से हुई है । वह इस स्थान में रहकर गर्भ में रहने वाले बच्चे की रचना करते हैं । यह स्थान पूरे शरीर का केंद्र माना जाता है इस स्थान पर पहुंचने वाले साधक के पास ब्रह्मा जी की शक्ति आ जाती हैं और उस के आशीर्वाद से किसी को भी संतान की प्राप्ति हो सकती है इससे ऊपर अनहद चक्र है जिसमें जिसमें हर समय विभिन्न प्रकार के वाद्य यंत्रों की आवाज आती रहती है l इस चक्र के देवता विष्णु जी हैं जो छीर सागर में लेटे हुए हैं l जब ब्रह्मा जी किसी बच्चे की निर्माण (रचना ) कार्य पूरा कर देते हैं और उसकी उत्पत्ति (जन्म) हो जाती है तब उनका कार्य पूर्ण हो जाता है और उसके पालन-पोषण की जिम्मेदारी विष्णु जी पर आ जाती है । जिससे मां के स्तनों में दूध आ जाता है यह स्तन छीर सागर का प्रतीक है l यहां तक पहुंचने वाले साधक के पास विष्णु जी की शक्तियां आ जाती हैं ।.वह अपने शरीर को स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से स्थूल बना सकता है और किसी भी लोक में जा सकता है । विष्णु जी को ही सर्वोच्च देव और पालनहार माना जाता है इसीलिए लोग कहते हैं कि वह भगवान सबके ह्रदय में किंतु ऐसा नहीं है भगवान विष्णु और देव विष्णु में अंतर है। अनहद से ऊपर विशुद्ध चक्र है इसके देवता शंकर जी है और देवी उमा जी है यहां तक पहुंचने वाले साधक के पास शंकर जी की शक्ति आ जाती है और मृत्यु उसकी इच्छा पर निर्भर हो जाती है । इससे ऊपर आज्ञा चक्र है जहां पर तीसरा नेत्र होता है यह आत्मा का क्षेत्र है यहां पहुंचने पर कुंडली भी जो शक्ति रूपा थी वह इस आत्मा ईश्वर ब्रह्म शिव क्षेत्र में पहुंचकर शिव से मिलती है यहां पर पहुंचने वाला साधक अर्धनारीश्वर बन जाता है । शंकर जी ध्यान साधना योग आध्यात्म के द्वारा यहां तक पहुंचे ,वह शिव बन गए, उन्हें शिव कहा जाने लगा । कुंडलिनी यहीं पर रुक जाती है इस कुंडलिनी शक्ति के द्वारा मूलाधार में रहने वाला जीव इन चक्रों से होता हुआ शिवव बनता है जो पहले शिव ही था जिसे माया ने जीव बना दिया था । जो जीव इस स्थिति में पहुंच कर अपने पूर्व के स्वरूप को प्राप्त करता है इसे ही स्वरूप की प्राप्ति, आत्मज्ञान की प्राप्ति आत्मज्ञान आदि नामों से जाना जाता है । जहां पर साधक लिखा है वहां जीव पढ़ा जाए । आप शरीर नहीं है जीव हैं , प्राप्ति जीव को ही होती है शरीर सिर्फ माध्यम है । दुनिया के जितने भी गुरु जी लोग हैं उन्हें जीव की जानकारी नहीं है कि जीव क्या है ? कैसा है ? कहां रहता है ? वह सिर्फ कुंडलिनी को आज्ञा चक्र तक पहुंचने का विवरण बताते है । जब जीव शिव बन जाता है तब वह नीचे वाले संपूर्ण देवताओं और देवियों से श्रेष्ठ बन जाता है । इसीलिए कहा है बड़े भाग मानुष तन पावा सुर दुर्लभ सब ग्रंथन गावा । मानव शरीर देवताओं को भी दुर्लभ है और कितनी प्रसन्नता की बात है कि वह मानव तन आपके पास है । यहां दिव्य ज्योतिर्मय प्रकाश और चिदानंद है । जीव शिव बनते ही चिदानंद और ज्योतिर्मय हो जाता है । यहाँ पर जीव का पहुंचना ही समाधि कहलाता है क्योंकि वह शिव से अथवा शिव के समत्व प्राप्त कर लेता है या शिव के समक्ष हो जाता है ।शंकर जी अपने आप को यही स्थित रखते है । इसलिए अधिकतर वह समाधि में रहते हैं । यहां तक पहुंचने वाले गुरु स्वयं को भगवान मानने लगते हैं क्योंकि ब्रह्मा विष्णु महेश उससे नीचे होते हैं । वह इसी आत्मा ईश्वर ब्रह्म और दिव्य चेतन ज्योति को ही परमात्मा घोषित कर देते हैं । ध्यान साधना का अभीष्ट यही है । इससे आगे ना तो कुंडलिनी जा सकती है और ना ही कोई गुरु आज के संसार में जितने भी गुरु है उन्हें महात्मा कहलाने पर संशय है क्योंकि जिसका इष्ट, अभीष्ट आत्मा ही है वह आत्मा से महान अर्थात् महात्मा कैसे हो सकता है ? कोई भी गुरु इस क्षेत्र से आगे नहीं बढ़ा सकता क्योंकि गुरु भी ज्योतिर्मय शिव ही है। इसे ही कैवल्य कहते हैं । इससे ऊपर सहस्त्र सार है । महावीर स्वामी बुद्ध भी आज्ञा चक्र से आगे नहीं पहुंचे क्योंकि इससे ऊपर जाने की ना तो कोई क्रिया है और ना ही कोई कर्म यह सिर्फ़ भगवान की कृपा पर आधारित है। यह स्वयं को ही भगवान मानने लगते हैं जिससे भगवान से इनका संबंध नहीं रहता । जिसका इष्ट और अभीष्ट परमात्मा है जो आत्मा से ऊपर और परमात्मा से नीचे होता है वह महात्मा कहलाता है । वही असली गुरु है वह सहस्त्र सार में साकार रूप में अभय मुद्रा में बैठे होते हैं ,और यहीं से पूरे शरीर पर नियंत्रण करते हैं । संसारी गुरु ने इस स्थान को परमात्मा का स्थान बता दिया है जबकि सच्चाई यह है परमात्मा ना तो इस शरीर में है और ना ही ब्रह्मांड में । वह परमधाम में रहता है । वह युग युग में एक बार किसी शरीर विशेष में अवतरित होता है। यह संपूर्ण शरीर सूक्ष्म ब्रह्मांड है जो कुछ ब्रह्मांड में है वह इस शरीर में भी है जिस प्रकार एक ग्लोब संपूर्ण पृथ्वी का प्रतिरूप होता है उसमें सभी चीजें सूक्ष्म रूप में होती हैं । उसी प्रकार इस शरीर में भी सभी चीजें हैं जो इस ब्रह्मांड में है किंतु सूक्ष्म रूप में । जितने भी देवी देवता इस ब्रह्मांड में हैं वह सूक्ष्म रूप से शरीर में है यथार्थ रूप में वह अपने लोक में है । यह लोग अपने शिष्यों को भ्रमित करके कुछ क्रियाएं बता देते हैं कहते हैं करते रहो सच्चाई नहीं बताते। जबकि यम नियम का पालन किए बिना कोई भी क्रिया नहीं हो सकती जिसमें ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य है । यदि यह ब्रह्मचर्य का पालन करवाने लगेंगे तो कोई भी शिष्य इनके पास नहीं रुकेगा, जो इन्हें रुपये देना तो दूर एक गिलास पानी भी नहीं देगा । इन्हें शिष्यों के कल्याण से मतलब नहीं है उसके धन से मतलब है क्योंकि इन्हें शिष्य के पैसे से अपने बेटा बेटी पालने हैं । ये स्वयं मूलाधार में पड़े हुए हैं । जो मूलाधार में पड़ा हुआ है वह किसी को आज्ञा चक्र अथवा सहस्त्र सार में क्या पहुंचाएगा ? यह साधन किसी दुर्लभ गुरु के सानिध्य में रहकर संयमित जीवन जीकर ही की जा सकती है अन्यथा नहीं । आप सभी लोग इस कुंडलिनी के चक्कर में मत पड़े भगवान की भक्ति करें जो उपलब्धि कुंडलिनी की अंतिम उपलब्धि है भगवान के भक्तों को उससे भी आगे सहज ही प्राप्त होती है क्योंकि भक्त क्रिया पर नहीं कृपा पर आधारित है । भगवान किस को क्या दे देगा कोई भी नहीं जानता ? यह संसार के गुरु आप का भला नहीं कर सकते यह सिर्फ अपना भला करने में लगे हुए हैं भगवान भला नहीं करता परम कल्याण करता है उस पर विश्वास रखिए
*पंचभूत का शरीर पर संकेत -२?* माघ का मास चल रहा है, इधर कई लोगों के शरीर में दर्द बढ़ चुका है, सुबह - सुबह उठने की इच्छा नहीं होती, जागकर कम्बल या रजाई में पड़े रहते है खासकर तब और देरी से उठते है जब छुट्टी या रविवार हो। आजकल के बच्चे तो बिल्कुल सुबह नहीं उठाना चाहते, जब हम छोटे थे तो सुबह उठाना हमारी दिनचर्या का हिस्सा था, और आकर अलाव के पास बैठ जाते थे, हमें कोई मतलब नहीं कि आज छुट्टी का दिन है। त्योहार के दिन तो और भी जल्दी उठ जाते थे। पर हम खुद परेशान है कि आजकल के युवाओं के इस आदत से? गाँव में अपना हाथ फैलाने पर दिखायी नहीं पड़ता था, ऐसे समय में भी गन्ने पिराई (गुड़ बनाने वाले) जगह पहुँचकर बैलों को हाँकते थे। आलस था ही नही।
*शरीर के चिकित्सीय लक्षण -१* पर जब हम बाहर जाते है, या छुट्टी के दिन घर पर होते है, या ज्यादा थके हुए होते हैं तो सुबह उठते समय हमारी मनोदशा व शारीरिक स्थति भिन्न होती है। कभी तो हम बड़े उत्साह के साथ उठते है, कभी हमें सुबह थकान सा अनुभव होता है, कभी दर्दयुक्त शरीर व अनबूझे मन से उठते है। कभी हम हल्के शरीर व चैतन्य मन से उठते है, ऐसा आपने भी अनुभव किया होगा। सुबह हमारे भीतर इस भाव व ऊर्जा के संचरण का बहुत बड़ा कारण होता है हमारी सोच व पंचभूत। आपने देखा होगा जब हम एलार्म का प्रयोग नहीं करते थे, और सुबह तीन बजे, चार बजे उठकर हमें कहीं आना जाना होता था तो हम अपने बुजुर्गों को बोलते थे कि हमे इतने बजे जगा देना, तो वह जगा देते थे। या कई बार ऐसा हुआ है कि जब हमें सुबह पढ़ना होता था, या फिर किसी पर्व पर सूर्योदय के पूर्व स्नान करना होता या सुबह बस/गाड़ी से यात्रा करनी होती तो हम सीने पर हाथ रखकर बोलते हे प्रभु! मुझे इतने बजे जगा देना, कल मुझे इस कार्य के लिए जल्दी उठना है, हमारी यह संकल्प शक्ति इतनी मजबूत होती कि हम उस समय से पूर्व ही अपने आप जग जाया करते थे। यह संकल्प शक्ति इतनी प्रगाढ़ होती है कि जब भी हम सुबह उठते हैं बिना आलस्य के बिना खराब मनोदशा के हम उठ बैठते हैं। हममें एक जोश होता है, शरीर हल्का होता है। इस स्थति को मनोदशा की होती है। दूसरी बात ~ आप सब जानते हैं कि हम श्वांस द्वारा वायु रूप में जो कुछ भी ग्रहण करते है या छोड़ते है उसमें हम वायु रूप में अन्य पंचभूतों को भी ग्रहण करते है। आप कहेंगे हम तो सिर्फ वायु रूप में आक्सीजन ग्रहण करते है, पर सत्य तो यह है जब हम साँस लेते है तो नाक के भीतर हमारा मर्म किसको जाने देना है, किसको नहीं काफी हद उसे भी नियंत्रित करता है। अन्यथा वायुमंडल में अनगिनत फैले जीवाणुओं के हम शिकार हो जायेंगे। हर स्थान व हर ऋतुओं में यह पंचमहाभूत भिन्न - भिन्न होते सकते है। जैसे आप ऊँचे - ऊंचे पहाड़ों पर घूमने जाइये जैसे - जैसे शिखर की ऊंचाइयों पर जायेंगे, आपको वायु कम मिलेगी आकाश पंचभूत ज्यादा मिलेगा। साधना, ध्यान के लिये आकाश महाभूत सबसे अच्छा है, आप देखोगे योगियों में आकाश महाभूत सर्वाधिक होगा। आपने देखा होगा कि पहाड़ों पर सूर्योदय जल्दी निकलता है, पहाड़ों पर रहने वाले लोग जल्दी उठते है, या जिनके भीतर आकाश तत्व की प्रमुखता अधिक होगी उन्हें कितनी भी जल्दी उठना पड़े, शरीर भारी नहीं लगेगा, उनकी मनोदशा व शरीर हल्का होगा। आकाश का गुण है शब्द। आप शब्द से नाद और योग की उस अवस्था पर बढ़ेंगे जहाँ नाद उस योग की स्थति में उस स्पस्ट सुनाई पड़ता है उसे अनाहद नाद कहते है, वह एक अलग मार्ग है, अभी उधर नहीं चलना सिर्फ इतना समझ लें कि जब हमारे भीतर *आकाश तत्व* बढ़ जाता है तो शरीर में अजीब मदहोशी महसूस होती है, मन् के भीतर शांति महसूस होती है, अकेलेपन में रहने का मन् कहता है, जीवन आजादी चाहता है, व्यक्ति अलग - थलग रहता है। यह कुछ लक्षण आकाश तत्व के होते हैं। यदि ऋतुओं की बात करूँ तो वर्षा ऋतु के बाद पृथ्वी पर वायु तत्व की न्यूनता सर्वाधिक होती है, उस समय अपनी शारीरिक स्थति का विश्लेषण कर सकते है, पर इसमे कई और भी कारण होते है। *वायु तत्व प्रधान शरीर* वायु का गुण है शब्द और स्पर्श पर जब वायु तत्व के कारण सुबह उठेंगे तो हममें चंचलता, गतिशीलता अधिक होगी। व्यक्ति कन्फ्यूज्ड होगा, आशंकित रहेगा। कन्फ्यूजन में रहेगा। थोड़ा घबराया, डरा हुआ रहेगा, भावुकता (fluctuate of emotion) कभी अच्छे विचार कभी बुरे विचार बदलते रहेंगे। भविष्य को लेकर मन अनेक आशंकाएं घिरी रहेगी। कुछ लोग कहते हैं कि उनका बच्चा बच्चे हाइपर एक्टिव है, तो समझ लीजिए वायु तत्व बढ़ा हुआ है। इसे षटकोण (हेक्साजोनल) से प्रदर्शित करते है। आप ऋतुओं की बात करें तो शरद ऋतु के बाद यह स्थति अधिकांश लोगों में देखने को मिलेगी, या फिर जो फिर जो प्रकृति के उस भाग में रहते हैं जहाँ वायु तत्व सर्वाधिक होता हो। ऐसा व्यक्ति सुबह हर कार्य का जल्दबाजी में करने की कोशिश करेगा, वीपी भी बढ़ा हुआ हो सकता है, बार - बार नींद खुलेगी। *अग्नि तत्व प्रधान-* अग्नि तत्व के गुण है शब्द, स्पर्श, रूप जिसमें दृश्य या रूप प्रमुख है। जब शरीर में अग्नि तत्व की प्रधानता बढ़ जाती है तो व्यक्ति सुबह के समय जब उठेगा तो शरीर गर्म होगा, मुँह थोड़ा कडुआ होगा, शरीर चिपचिपा, ऊर्जावान होगा। अग्नि तत्व की अधिकता में उस व्यक्ति में प्रतिस्पर्धा अधिक होगा, दूसरों से तुलना करेगा, गुस्सा जल्द आएगा, एक विषय को बड़ी गगराई से जजमेंट्स करेगा, उसमें वायलेंस भी दिखायी देगा। हो सकता है उठते ही भोजन भी माँग ले। ऋतुओं की बात करें तो आप इसे गर्मी का मौसम भी मान कर परीक्षण कर सकते है। *जल तत्व -* जल तत्व के गुण है शब्द, स्पर्श, आकृति व स्वाद। जल तत्व अधिकता में व्यक्ति दूसरों से प्रेम अधिक करेगा वह थोड़ा धीरे उठेगा, शरीर में दर्द भी हो सकता है। थोड़ा भारीपन महसूस होगा, हो सकता है वह एक बार में ना भी उठे। मुस्कराते हुए उठेगा, वह हर वस्तु को बड़े गौर से देखेगा, उसमें उसकी आसक्ति भी निर्मित होने लगे। थोड़ा लालच भी करे। आपने देखा होगा समुद्र के किनारे जल महाभूत अधिक होता है आप उनके जीवन पर एक विश्लेषण कीजिये। *पृथ्वी तत्व-* पृथ्वी तत्व के गुण है शब्द, स्पर्श, आकृति, स्वाद, गंध। आपने देखा होगा कि वृक्ष सबसे अधिक पृथ्वी से जुड़े रहते है। उसमें गतिशीलता नहीं होती, एक जगह स्थिर होते है। यदि मनुष्य में पृथ्वी तत्व बढ़ जाये तो उसे उठते समय भारीपन महसूस होगा, हर कार्य को बहुत धीरे - धीरे, अटक - अटक कर करेगा, बार - बार याद दिलाना पड़ेगा। वह जल्द डिप्रेशन में चला जाता है। इस तरह हम सुबह उठते समय अपने शरीर व मनोदशा को आराम से देख सकते है। उसके अनुसार प्राणायम करके या कुछ विन्दुओं को उत्प्रेरित करके उन्हें ठीक भी कर सकते हैं। आपसे प्रार्थना है इसे अनुभव करके इसमें सुधार करके हमारा भी मार्ग प्रशस्त करें *शरीर के लक्षण* जब हम बीमार होते हैं, तो हमारा शरीर ही कुछ लक्षणों को इंगित करता है हमें निकट भविष्य में क्या समस्या आने वाली है। इन लक्षणों से पूर्व शरीर की सूक्ष्म इन्द्रियों को इसका आभास भी हो जाता है और मनुष्य के व्यवहार व स्वरूप मे वह परिलक्षित भी होने लगता है। जैसे - किसी को जुकाम होना होता है तो उसके पहले नाक या कान में खुजली होनी शुरू हो जाती है, वहीं सूक्ष्म इन्द्रियों द्वारा उसकी प्यास अतृप्त हो जाती है, और वह बार - बार पानी भी पीने लगता है। गर्म पानी से उसकी प्यास नहीं बुझती है, जुकाम का यह लक्षण 36 से 48 घंटे पहले ही सुक्षिन्द्रियों को दृष्टिगोचर हो जाता है। एक और उदाहरण से समझें बीमार होने से पूर्व व्यक्ति की भूख बढ़ जाती है, प्रसन्नता बढ़ जाती है। जैसे - मरने से पूर्व व्यक्ति की एक बार समस्त चेतना वापस लौट आती है और वह सभी से बात करता है, हँसेगा भी है, चलेगा भी, भोजन भी माँग लेता है। और खाते खाते राम - राम सत्य। एक और उदाहरण से समझे जब आँतो में गर्मी बढ़ जाती है तो व्यक्ति बहुत अधिक खाने को माँगता है, बार - बार भूख का आभास होने लगता है, अपानवायु ज्यादा खुलने लगती है यही गति बनी रहने पर 24 से 36 घण्टो में उसे दस्त लग जाते है। माताएं कहती है अब खाना नहीं मिलेगा तेरा पेट खराब होने वाला है। वैसे यह लक्षण सभी में उत्पन्न नहीं होते, लेकिन स्वप्न व व्यवहार में परिवर्तन को आप समझ पाए तो बहुत अच्छी बात है।
चिकित्सक शरीर के कई लक्षणों, विकारों को बीमारी मानकर चिकित्सीय लैब में टेस्ट करके ज्ञात करने का प्रयास करते है, कई बार रिपोर्ट्स सही भी नहीं होती हैं या रिपोर्ट्स नॉर्मल आती हैं, "लेकिन उस व्यक्ति को तकलीफ वैसे के वैसे बनी रहती है।" कई बार दो अलग-अलग लैब की रिपोर्ट भी अलग-अलग आ जाती हैं। पर बीमारी वहीं के वहीं बनी रहती है, क्योंकि उस टेस्ट में व्यक्ति की मनोस्थति का आँकलन का जाँच नहीं किया जाता है, उसका कोई आधुनिक यंत्र नहीं । पहले के समय में लोग एक दूसरे से खूब बातचीत करते थे, एक दूसरे से आत्मीयता गहरी होती थी, इसलिए दूसरे की मनस्थति को आसानी से पढ़ लिया करते थे, पर आज संयुक्त परिवारों में भी इसका अभाव देखने को मिलता है। बूढ़े माँ - बाप को हंसते हुए जमाने गुजर चुके होते हैं। व्यक्ति अकेलेपन के अवसाद ग्रस्त हो जाता है, जिससे शरीर में अनेकानेक विकार उत्तपन्न होने लगते है। इनको वही व्यक्ति पढ़ सकता है जिसकी औरा शक्ति उसकी औरा शक्ति को प्रभावित कर सके। आप किसी के घर पर प्रसन्नचित होकर बेटे या बेटी का शादी का कार्ड लेकर जाइये उस घर में पति - पत्नी में खूब लड़ाई- झगड़ा चल रहा हो, आप डोर बेल बजायेंगे तो वह झगड़ा बन्द करके मुस्काते हुए आपका स्वागत करने आएंगे।, लेकिन आपको 5 मिनट बाद ही आभास होने लगेगा कि यहाँ कुछ गड़बड़ है। गलती से उन्होंने चाय के लिए बोलकर बैठा दिया तो जिस पर कुछ देर पहले पति - पत्नी बैठकर झगड़ा कर रहे तो दो मिनट में ही आपकी प्रसन्नता अविछिन्न होने लगेगी, और आप में भी क्रोध का संचार शुरू हो जाएगा। यदि कोई साधु पुरुष यानि सतोगुणी होगा तो उसे दरवाजे पर कदम रखते ही यह आभास हो जायेगा कि यहाँ तो मेरी मनस्थति विकृति हो रही है। तो यह सूक्ष्मन्द्रियों के विषय होते है जिसे आपकी सतोगुणी संवेदनशीलता आसानी से पकड़ लेती है। कई बार आपसे जिसकी आत्मीयता ज्यादा होती है उसकी फोन पर आवाज से ही पता कर लेते हैं कि यह कुछ बात अवश्य छिपा रहा है। तो यह तो संक्षेप में सुक्षिन्द्रियों का रहा विषय कहा ... अब बात आती है शरीर की जिन्हें तमो व रजोगुणी संवेदनाये नहीं पकड़ पाती तो उनके विकार शरीर पर रोग के रूप प्रकट होने लगते हैं। हर आने वाले रोग या शरीर में होने वाले परिवर्तन को या तो स्वयं अपनी सूक्ष्मन्द्रियों से समझ लो अन्यथा शरीर के इन संकेतों को समझ लीजिए। पर फिर भी कहूँगा कि शरीर से अधिक जरूरी है मनस्थति को समझना। शरीर एक आईना की तरह बीमारियों को परिलक्षित कर सकता है। पर ध्यान रहे रोग की स्थति में किसी भी लक्षण के जाँच के कई प्रकार के अन्य विकल्प भी होते है। *जिह्वा पर सफेद या भूरे रंग का मैल जमना* ~ पेट की खराबी इंगित करता है। *नथुनों का तेजी से फड़कना* ~ निमोनिया, प्लूरिसी आदि रोग की तरफ इंगित करता है। *आँखों के नीचे कालापन* ~ अधिक थकावट या पुराने कब्ज को इंगित करता है। *आँखों के चारो तरफ कालापन ~ कमजोरी, खून की कमी, ल्यूकोरिया (श्वेत-प्रदर) आदि की तरफ इंगित करता है। *आँखों के नीचे सूजन ~ किडनी के कार्य में रुकावट की तरफ इंगित करता है। *होठों के कोने पर सफेद छाले* ~ बुखार आने की तरफ इंगित करता है। *गालों ओर झाइयाँ* ~ पीरियड्स कम व आयरन आने की तरफ इंगित करता है। *रक्तार्भ कपोत* ~ फेफड़ों (lungs) में इन्फेक्शन की तरफ इंगित करते हैं। *शाम को एक डिग्री ताप बढ़ना* ~ टायफाइड की तरफ इंगित। *सोते समय दाँत किटकिटाना या बिस्तर पर पेशाब करना* ~ बच्चों के पेट में कीड़े की तरफ इंगित करते हैं। *नाक व मलद्वार में खुजली* ~ पेट में कीड़े होने होने के लक्षण इंगित करते है। *जीभ का सफेद रंग* ~ तिल्ली बढ़ने की तरफ इंगित करता है। *जीभ पर छाले व घाव* ~ आंतों और पेट के रोग की तरफ इंगित करता है। *चेहरे पर हल्के सफेद रंग के धब्बे* ~ पेट में कीड़े की तरफ इंगित करते है। *आँखों के सामने अंधेरा छा जाना* ~ निम्न रक्तचाप व खून की कमी होने का इंगित करता है। *हाथ की उंगलियों के पीछे कालापन* ~महिलाओं में यूट्रस (बच्चेदानी) में रोग की तरफ इंगित करता है। *हाथ पैर चेहरे पर सूजन* ~ रज दोष की तरफ इंगित करती है। *गालो का पिचकना* ~ अधिक वीर्यनाश की तरफ इंगित करता है। *ओंठ के फटने* ~ पेट के रोग या किसी लंबी बीमारी की तरफ इंगित करता है। *गले में सूजन* ~ हाइपोथायरॉइडिज्म (थाइरॉइड ग्लैंड का हार्मोन कम निकलना) की तरफ इंगित करता है। *नाखून पर सफेद धब्बे* ~ कैल्शियम की तरफ इंगित करता है। *जाँघों पर सूजन, हाथों का सुन्नपन्न* ~ हृदय बीमारी की तरफ इंगित करता है। ऐसे अनेक लक्षण जो धातु विकारों, कमजोरी, यकृत की समस्या, साँस फूलने, पैरों में सुन्नपन्न, आदि आपको महसूस होते होंगे। आप भी अपने शरीर व मानसिक लक्षणों को इसमें जोड़िए। धन्यवाद