*पंचभूत का शरीर पर संकेत -२?*
माघ का मास चल रहा है, इधर कई लोगों के शरीर में दर्द बढ़ चुका है, सुबह - सुबह उठने की इच्छा नहीं होती, जागकर कम्बल या रजाई में पड़े रहते है खासकर तब और देरी से उठते है जब छुट्टी या रविवार हो।
आजकल के बच्चे तो बिल्कुल सुबह नहीं उठाना चाहते, जब हम छोटे थे तो सुबह उठाना हमारी दिनचर्या का हिस्सा था, और आकर अलाव के पास बैठ जाते थे, हमें कोई मतलब नहीं कि आज छुट्टी का दिन है। त्योहार के दिन तो और भी जल्दी उठ जाते थे। पर हम खुद परेशान है कि आजकल के युवाओं के इस आदत से? गाँव में अपना हाथ फैलाने पर दिखायी नहीं पड़ता था, ऐसे समय में भी गन्ने पिराई (गुड़ बनाने वाले) जगह पहुँचकर बैलों को हाँकते थे। आलस था ही नही।
*शरीर के चिकित्सीय लक्षण -१*
पर जब हम बाहर जाते है, या छुट्टी के दिन घर पर होते है, या ज्यादा थके हुए होते हैं तो सुबह उठते समय हमारी मनोदशा व शारीरिक स्थति भिन्न होती है। कभी तो हम बड़े उत्साह के साथ उठते है, कभी हमें सुबह थकान सा अनुभव होता है, कभी दर्दयुक्त शरीर व अनबूझे मन से उठते है। कभी हम हल्के शरीर व चैतन्य मन से उठते है, ऐसा आपने भी अनुभव किया होगा। सुबह हमारे भीतर इस भाव व ऊर्जा के संचरण का बहुत बड़ा कारण होता है हमारी सोच व पंचभूत।
आपने देखा होगा जब हम एलार्म का प्रयोग नहीं करते थे, और सुबह तीन बजे, चार बजे उठकर हमें कहीं आना जाना होता था तो हम अपने बुजुर्गों को बोलते थे कि हमे इतने बजे जगा देना, तो वह जगा देते थे। या कई बार ऐसा हुआ है कि जब हमें सुबह पढ़ना होता था, या फिर किसी पर्व पर सूर्योदय के पूर्व स्नान करना होता या सुबह बस/गाड़ी से यात्रा करनी होती तो हम सीने पर हाथ रखकर बोलते हे प्रभु! मुझे इतने बजे जगा देना, कल मुझे इस कार्य के लिए जल्दी उठना है, हमारी यह संकल्प शक्ति इतनी मजबूत होती कि हम उस समय से पूर्व ही अपने आप जग जाया करते थे। यह संकल्प शक्ति इतनी प्रगाढ़ होती है कि जब भी हम सुबह उठते हैं बिना आलस्य के बिना खराब मनोदशा के हम उठ बैठते हैं। हममें एक जोश होता है, शरीर हल्का होता है। इस स्थति को मनोदशा की होती है।
दूसरी बात ~ आप सब जानते हैं कि हम श्वांस द्वारा वायु रूप में जो कुछ भी ग्रहण करते है या छोड़ते है उसमें हम वायु रूप में अन्य पंचभूतों को भी ग्रहण करते है। आप कहेंगे हम तो सिर्फ वायु रूप में आक्सीजन ग्रहण करते है, पर सत्य तो यह है जब हम साँस लेते है तो नाक के भीतर हमारा मर्म किसको जाने देना है, किसको नहीं काफी हद उसे भी नियंत्रित करता है। अन्यथा वायुमंडल में अनगिनत फैले जीवाणुओं के हम शिकार हो जायेंगे।
हर स्थान व हर ऋतुओं में यह पंचमहाभूत भिन्न - भिन्न होते सकते है। जैसे आप ऊँचे - ऊंचे पहाड़ों पर घूमने जाइये जैसे - जैसे शिखर की ऊंचाइयों पर जायेंगे, आपको वायु कम मिलेगी आकाश पंचभूत ज्यादा मिलेगा। साधना, ध्यान के लिये आकाश महाभूत सबसे अच्छा है, आप देखोगे योगियों में आकाश महाभूत सर्वाधिक होगा। आपने देखा होगा कि पहाड़ों पर सूर्योदय जल्दी निकलता है, पहाड़ों पर रहने वाले लोग जल्दी उठते है, या जिनके भीतर आकाश तत्व की प्रमुखता अधिक होगी उन्हें कितनी भी जल्दी उठना पड़े, शरीर भारी नहीं लगेगा, उनकी मनोदशा व शरीर हल्का होगा।
आकाश का गुण है शब्द। आप शब्द से नाद और योग की उस अवस्था पर बढ़ेंगे जहाँ नाद उस योग की स्थति में उस स्पस्ट सुनाई पड़ता है उसे अनाहद नाद कहते है, वह एक अलग मार्ग है, अभी उधर नहीं चलना सिर्फ इतना समझ लें कि जब हमारे भीतर *आकाश तत्व* बढ़ जाता है तो शरीर में अजीब मदहोशी महसूस होती है, मन् के भीतर शांति महसूस होती है, अकेलेपन में रहने का मन् कहता है, जीवन आजादी चाहता है, व्यक्ति अलग - थलग रहता है। यह कुछ लक्षण आकाश तत्व के होते हैं।
यदि ऋतुओं की बात करूँ तो वर्षा ऋतु के बाद पृथ्वी पर वायु तत्व की न्यूनता सर्वाधिक होती है, उस समय अपनी शारीरिक स्थति का विश्लेषण कर सकते है, पर इसमे कई और भी कारण होते है।
*वायु तत्व प्रधान शरीर* वायु का गुण है शब्द और स्पर्श पर जब वायु तत्व के कारण सुबह उठेंगे तो हममें चंचलता, गतिशीलता अधिक होगी। व्यक्ति कन्फ्यूज्ड होगा, आशंकित रहेगा। कन्फ्यूजन में रहेगा। थोड़ा घबराया, डरा हुआ रहेगा, भावुकता (fluctuate of emotion) कभी अच्छे विचार कभी बुरे विचार बदलते रहेंगे। भविष्य को लेकर मन अनेक आशंकाएं घिरी रहेगी। कुछ लोग कहते हैं कि उनका बच्चा बच्चे हाइपर एक्टिव है, तो समझ लीजिए वायु तत्व बढ़ा हुआ है। इसे षटकोण (हेक्साजोनल) से प्रदर्शित करते है। आप ऋतुओं की बात करें तो शरद ऋतु के बाद यह स्थति अधिकांश लोगों में देखने को मिलेगी, या फिर जो फिर जो प्रकृति के उस भाग में रहते हैं जहाँ वायु तत्व सर्वाधिक होता हो। ऐसा व्यक्ति सुबह हर कार्य का जल्दबाजी में करने की कोशिश करेगा, वीपी भी बढ़ा हुआ हो सकता है, बार - बार नींद खुलेगी।
*अग्नि तत्व प्रधान-* अग्नि तत्व के गुण है शब्द, स्पर्श, रूप जिसमें दृश्य या रूप प्रमुख है। जब शरीर में अग्नि तत्व की प्रधानता बढ़ जाती है तो व्यक्ति सुबह के समय जब उठेगा तो शरीर गर्म होगा, मुँह थोड़ा कडुआ होगा, शरीर चिपचिपा, ऊर्जावान होगा। अग्नि तत्व की अधिकता में उस व्यक्ति में प्रतिस्पर्धा अधिक होगा, दूसरों से तुलना करेगा, गुस्सा जल्द आएगा, एक विषय को बड़ी गगराई से जजमेंट्स करेगा, उसमें वायलेंस भी दिखायी देगा। हो सकता है उठते ही भोजन भी माँग ले। ऋतुओं की बात करें तो आप इसे गर्मी का मौसम भी मान कर परीक्षण कर सकते है।
*जल तत्व -* जल तत्व के गुण है शब्द, स्पर्श, आकृति व स्वाद। जल तत्व अधिकता में व्यक्ति दूसरों से प्रेम अधिक करेगा वह थोड़ा धीरे उठेगा, शरीर में दर्द भी हो सकता है।
थोड़ा भारीपन महसूस होगा, हो सकता है वह एक बार में ना भी उठे। मुस्कराते हुए उठेगा, वह हर वस्तु को बड़े गौर से देखेगा, उसमें उसकी आसक्ति भी निर्मित होने लगे। थोड़ा लालच भी करे।
आपने देखा होगा समुद्र के किनारे जल महाभूत अधिक होता है आप उनके जीवन पर एक विश्लेषण कीजिये।
*पृथ्वी तत्व-* पृथ्वी तत्व के गुण है शब्द, स्पर्श, आकृति, स्वाद, गंध।
आपने देखा होगा कि वृक्ष सबसे अधिक पृथ्वी से जुड़े रहते है। उसमें गतिशीलता नहीं होती, एक जगह स्थिर होते है। यदि मनुष्य में पृथ्वी तत्व बढ़ जाये तो उसे उठते समय भारीपन महसूस होगा, हर कार्य को बहुत धीरे - धीरे, अटक - अटक कर करेगा, बार - बार याद दिलाना पड़ेगा। वह जल्द डिप्रेशन में चला जाता है।
इस तरह हम सुबह उठते समय अपने शरीर व मनोदशा को आराम से देख सकते है। उसके अनुसार प्राणायम करके या कुछ विन्दुओं को उत्प्रेरित करके उन्हें ठीक भी कर सकते हैं।
आपसे प्रार्थना है इसे अनुभव करके इसमें सुधार करके हमारा भी मार्ग प्रशस्त करें
*शरीर के लक्षण*
जब हम बीमार होते हैं, तो हमारा शरीर ही कुछ लक्षणों को इंगित करता है हमें निकट भविष्य में क्या समस्या आने वाली है। इन लक्षणों से पूर्व शरीर की सूक्ष्म इन्द्रियों को इसका आभास भी हो जाता है और मनुष्य के व्यवहार व स्वरूप मे वह परिलक्षित भी होने लगता है।
जैसे - किसी को जुकाम होना होता है तो उसके पहले नाक या कान में खुजली होनी शुरू हो जाती है, वहीं सूक्ष्म इन्द्रियों द्वारा उसकी प्यास अतृप्त हो जाती है, और वह बार - बार पानी भी पीने लगता है। गर्म पानी से उसकी प्यास नहीं बुझती है, जुकाम का यह लक्षण 36 से 48 घंटे पहले ही सुक्षिन्द्रियों को दृष्टिगोचर हो जाता है। एक और उदाहरण से समझें बीमार होने से पूर्व व्यक्ति की भूख बढ़ जाती है, प्रसन्नता बढ़ जाती है। जैसे - मरने से पूर्व व्यक्ति की एक बार समस्त चेतना वापस लौट आती है और वह सभी से बात करता है, हँसेगा भी है, चलेगा भी, भोजन भी माँग लेता है। और खाते खाते राम - राम सत्य। एक और उदाहरण से समझे जब आँतो में गर्मी बढ़ जाती है तो व्यक्ति बहुत अधिक खाने को माँगता है, बार - बार भूख का आभास होने लगता है, अपानवायु ज्यादा खुलने लगती है यही गति बनी रहने पर 24 से 36 घण्टो में उसे दस्त लग जाते है। माताएं कहती है अब खाना नहीं मिलेगा तेरा पेट खराब होने वाला है। वैसे यह लक्षण सभी में उत्पन्न नहीं होते, लेकिन स्वप्न व व्यवहार में परिवर्तन को आप समझ पाए तो बहुत अच्छी बात है।
चिकित्सक शरीर के कई लक्षणों, विकारों को बीमारी मानकर चिकित्सीय लैब में टेस्ट करके ज्ञात करने का प्रयास करते है, कई बार रिपोर्ट्स सही भी नहीं होती हैं या रिपोर्ट्स नॉर्मल आती हैं, "लेकिन उस व्यक्ति को तकलीफ वैसे के वैसे बनी रहती है।" कई बार दो अलग-अलग लैब की रिपोर्ट भी अलग-अलग आ जाती हैं। पर बीमारी वहीं के वहीं बनी रहती है, क्योंकि उस टेस्ट में व्यक्ति की मनोस्थति का आँकलन का जाँच नहीं किया जाता है, उसका कोई आधुनिक यंत्र नहीं ।
पहले के समय में लोग एक दूसरे से खूब बातचीत करते थे, एक दूसरे से आत्मीयता गहरी होती थी, इसलिए दूसरे की मनस्थति को आसानी से पढ़ लिया करते थे, पर आज संयुक्त परिवारों में भी इसका अभाव देखने को मिलता है। बूढ़े माँ - बाप को हंसते हुए जमाने गुजर चुके होते हैं। व्यक्ति अकेलेपन के अवसाद ग्रस्त हो जाता है, जिससे शरीर में अनेकानेक विकार उत्तपन्न होने लगते है। इनको वही व्यक्ति पढ़ सकता है जिसकी औरा शक्ति उसकी औरा शक्ति को प्रभावित कर सके।
आप किसी के घर पर प्रसन्नचित होकर बेटे या बेटी का शादी का कार्ड लेकर जाइये उस घर में पति - पत्नी में खूब लड़ाई- झगड़ा चल रहा हो, आप डोर बेल बजायेंगे तो वह झगड़ा बन्द करके मुस्काते हुए आपका स्वागत करने आएंगे।, लेकिन आपको 5 मिनट बाद ही आभास होने लगेगा कि यहाँ कुछ गड़बड़ है। गलती से उन्होंने चाय के लिए बोलकर बैठा दिया तो जिस पर कुछ देर पहले पति - पत्नी बैठकर झगड़ा कर रहे तो दो मिनट में ही आपकी प्रसन्नता अविछिन्न होने लगेगी, और आप में भी क्रोध का संचार शुरू हो जाएगा। यदि कोई साधु पुरुष यानि सतोगुणी होगा तो उसे दरवाजे पर कदम रखते ही यह आभास हो जायेगा कि यहाँ तो मेरी मनस्थति विकृति हो रही है।
तो यह सूक्ष्मन्द्रियों के विषय होते है जिसे आपकी सतोगुणी संवेदनशीलता आसानी से पकड़ लेती है। कई बार आपसे जिसकी आत्मीयता ज्यादा होती है उसकी फोन पर आवाज से ही पता कर लेते हैं कि यह कुछ बात अवश्य छिपा रहा है। तो यह तो संक्षेप में सुक्षिन्द्रियों का रहा विषय कहा ...
अब बात आती है शरीर की जिन्हें तमो व रजोगुणी संवेदनाये नहीं पकड़ पाती तो उनके विकार शरीर पर रोग के रूप प्रकट होने लगते हैं।
हर आने वाले रोग या शरीर में होने वाले परिवर्तन को या तो स्वयं अपनी सूक्ष्मन्द्रियों से समझ लो अन्यथा शरीर के इन संकेतों को समझ लीजिए।
पर फिर भी कहूँगा कि शरीर से अधिक जरूरी है मनस्थति को समझना। शरीर एक आईना की तरह बीमारियों को परिलक्षित कर सकता है। पर ध्यान रहे रोग की स्थति में किसी भी लक्षण के जाँच के कई प्रकार के अन्य विकल्प भी होते है।
*जिह्वा पर सफेद या भूरे रंग का मैल जमना* ~ पेट की खराबी इंगित करता है।
*नथुनों का तेजी से फड़कना* ~ निमोनिया, प्लूरिसी आदि रोग की तरफ इंगित करता है।
*आँखों के नीचे कालापन* ~ अधिक थकावट या पुराने कब्ज को इंगित करता है।
*आँखों के चारो तरफ कालापन ~ कमजोरी, खून की कमी, ल्यूकोरिया (श्वेत-प्रदर) आदि की तरफ इंगित करता है।
*आँखों के नीचे सूजन ~ किडनी के कार्य में रुकावट की तरफ इंगित करता है।
*होठों के कोने पर सफेद छाले* ~ बुखार आने की तरफ इंगित करता है।
*गालों ओर झाइयाँ* ~ पीरियड्स कम व आयरन आने की तरफ इंगित करता है।
*रक्तार्भ कपोत* ~ फेफड़ों (lungs) में इन्फेक्शन की तरफ इंगित करते हैं।
*शाम को एक डिग्री ताप बढ़ना* ~ टायफाइड की तरफ इंगित।
*सोते समय दाँत किटकिटाना या बिस्तर पर पेशाब करना* ~ बच्चों के पेट में कीड़े की तरफ इंगित करते हैं।
*नाक व मलद्वार में खुजली* ~ पेट में कीड़े होने होने के लक्षण इंगित करते है।
*जीभ का सफेद रंग* ~ तिल्ली बढ़ने की तरफ इंगित करता है।
*जीभ पर छाले व घाव* ~ आंतों और पेट के रोग की तरफ इंगित करता है।
*चेहरे पर हल्के सफेद रंग के धब्बे* ~ पेट में कीड़े की तरफ इंगित करते है।
*आँखों के सामने अंधेरा छा जाना* ~ निम्न रक्तचाप व खून की कमी होने का इंगित करता है।
*हाथ की उंगलियों के पीछे कालापन* ~महिलाओं में यूट्रस (बच्चेदानी) में रोग की तरफ इंगित करता है।
*हाथ पैर चेहरे पर सूजन* ~ रज दोष की तरफ इंगित करती है।
*गालो का पिचकना* ~ अधिक वीर्यनाश की तरफ इंगित करता है।
*ओंठ के फटने* ~ पेट के रोग या किसी लंबी बीमारी की तरफ इंगित करता है।
*गले में सूजन* ~ हाइपोथायरॉइडिज्म (थाइरॉइड ग्लैंड का हार्मोन कम निकलना) की तरफ इंगित करता है।
*नाखून पर सफेद धब्बे* ~ कैल्शियम की तरफ इंगित करता है।
*जाँघों पर सूजन, हाथों का सुन्नपन्न* ~ हृदय बीमारी की तरफ इंगित करता है।
ऐसे अनेक लक्षण जो धातु विकारों, कमजोरी, यकृत की समस्या, साँस फूलने, पैरों में सुन्नपन्न, आदि आपको महसूस होते होंगे। आप भी अपने शरीर व मानसिक लक्षणों को इसमें जोड़िए।
धन्यवाद
