हमें पढाया गया कि भारत एक अध्यात्मिक और कृषि प्रधान देश था लेकिन ये नहीं बताया कि भारत विश्व कि 2000 से ज्यादा वर्षों तक विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति थी / angus Maddison और paul Bairoch अमिय कुमार बागची और Will Durant जैसे आर्थिक और सामाजिक इतिहास कारों ने भारत की जो तस्वीर पेश की , वो चौकाने वाली है /
Will Durant ने 1930 मे एक पुस्तक लिखी Case For India। विल दुरान्त दुनिया के आज तक सबसे ज्यादा पढे जाने वाले writer हैं और निर्विवाद हैं / इनको अभी तक किसी ism में फिट नहीं किया गया है / उन्ही की पुस्तक के कुछ अंश उद्धृत करा रहा हूँ , ये समझने समझाने के लिए कि आखिर भारत को क्यों #स्किल_डेव्लपमेंट_और_उद्योगों को बढ़ावा देना चाहिये अपने स्वर्णिम आर्थिक युग वापसी के लिये ?? और उसका खुद का मॉडेल होना चाहिये न कि अमेरिका या यूरोप की नकल करनी चाहिये /
जिस #स्किल या कौटिल्य के अनुसार #कारकुशीलव_वार्ता शूद्रस्य स्वधर्मह की बात किया गया है गौरवशाली स्वर्णिम भारत के बारे मे ; उसी स्किल और उसके फलस्वरूप , उसके गौरव शाली भौतिक उत्पादों की बात करते हुये विल दुरान्त 1930 मे लिखते हैं ---
" जो लोग आज हिंदुओं की अवर्णनीय गरीबी और असहायता आज देख रहे हैं , उन्हें ये विस्वास ही न होगा ये भारत की धन वैभव और संपत्ति ही थी जिसने इंग्लैंड और फ्रांस के समुद्री डाकुओं (Pirates) को अपनी तरफ आकर्षित किया था। इस " धन सम्पत्ति" के बारे में Sunderland लिखता है :---
" ये धन वैभव और सम्पत्ति हिंदुओं ने विभिन्न तरह की विशाल (vast) इंडस्ट्री के द्वारा बनाया था। किसी भी सभ्य समाज को जितनी भी तरह की मैन्युफैक्चरिंग और प्रोडक्ट के बारे में पता होंगे ,- मनुष्य के मस्तिष्क और हाथ से बनने वाली हर रचना (creation) , जो कहीं भी exist करती होगी , जिसकी बहुमूल्यता या तो उसकी उपयोगिता के कारण होगी या फिर सुंदरता के कारण, - उन सब का उत्पादन भारत में प्राचीन कॉल से हो रहा है । भारत यूरोप या एशिया के किसी भी देश से बड़ा इंडस्ट्रियल और मैन्युफैक्चरिंग देश रहा है।इसके टेक्सटाइल के उत्पाद --- लूम से बनने वाले महीन (fine) उत्पाद , कॉटन , ऊन लिनेन और सिल्क --- सभ्य समाज में बहुत लोकप्रिय थे।इसी के साथ exquisite जवेल्लरी और सुन्दर आकारों में तराशे गए महंगे स्टोन्स , या फिर इसकी pottery , पोर्सलेन्स , हर तरह के उत्तम रंगीन और मनमोहक आकार के ceramics ; या फिर मेटल के महीन काम - आयरन स्टील सिल्वर और गोल्ड हों।इस देश के पास महान आर्किटेक्चर था जो सुंदरता में किसी भी देश की तुलना में उत्तम था ।इसके पास इंजीनियरिंग का महान काम था। इसके पास महान व्यापारी और बिजनेसमैन थे । बड़े बड़े बैंकर और फिनांसर थे। ये सिर्फ महानतम समुद्री जहाज बनाने वाला राष्ट्र मात्र नहीं था बल्कि दुनिया में सभ्य समझे जाने वाले सारे राष्ट्रों से व्यवसाय और व्यापार करता था । ऐसा भारत देश मिला था ब्रिटिशर्स को जब उन्होंने भारत की धरती पर कदम रखा था ।"
ये वही धन संपति थी जिसको कब्जाने का ईस्ट इंडिया कंपनी का इरादा था / पहले ही 1686 में कंपनी के डाइरेक्टर्स ने अपने इरादे को जाहिर कर दिया था --" आने वाले समय में भारत में विशाल और सुदृढ़ अंग्रेजी राज्य का आधिपत्य जमाना " /
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ये था उस स्किल्ड इंडिया का गौरवशाली भारत जिसको लूटने खसोटने के बाद बहुसंख्यक स्किल्ल्ड विज्ञानविद्या के निर्वाहकों को जब बेघर और बेरोजगार किया गया ।
और उन्ही को डिप्रेस्ड क्लास SC में सचेडुले किया गया तो सोलंकी महार कोली जैसे सम्मानित राजपूतो को जो इन उत्पादों के निर्माता थे ,उनको भी उसी SC या अछूतों की लिस्ट में शामिल कर दिया जाता है ।
और उनको मनुस्मृति का झुनझुना दे दिया जाता है जिसको बाबा साहेब और उनके अनुयायी आज तक जलाते चले आ रहे हैं
The Fall & Rise of #Pride for #India #Culture
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An excellent write up by Ganga Mahto.
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जब #अंग्रेज इस देश में आये थे. और यहाँ आकर उन्होंने हम भारतीयों के ऊपर अपना राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और #सांस्कृतिक प्रभुत्व जमाना शुरू किया था तब यूरोपीय लोग #हिन्दू समाज की #संस्कृति, #धर्म तथा #रीति रिवाजों की निंदा कर रहे थे और हमें निम्न कोटि का साबित कर रहे थे. वास्तव में हर विजेता जाति यह साबित करने की कोशिश करती है कि उसकी संस्कृति, #भाषा, #साहित्य, धर्म तथा सामाजिक मूल्य अधिक श्रेष्ठ हैं. हर विजेता जाति ने विजित जाति को बर्बर कहा है, असभ्य कहा है, राक्षस कहा है. बंगाल में यूरोपियों ने कई स्कूल और कालेज खोले थे, यहाँ भारतीय युवक #यूरोपीय #शिक्षा प्राप्त करते थे. इन शिक्षा संस्थानों में तथा ऐसे ही अन्य बौधिक संस्थानों में तथा ऐसे ही अन्य बौद्धिक केन्द्रों में हिन्दू युवकों के सामने हिन्दू धर्म, समाज, संस्कृति तथा रीति रिवाजों के पिछड़ेपन तथा घटियापन को साबित किया जाता था और बताया जाता था कि हिन्दू समाज एक बर्बर और असभ्य समाज है, जिसके पास कोई गर्व करने योग्य चीज नहीं है. इसका प्रभाव पड़ा था शिक्षित हिन्दू युवकों के मन में. अपने समाज के प्रति हीनता की भावना भर उठी थी. शिक्षित युवक पिछड़ा मानकर शर्माने लगे थे. बहुत तेजी से बंगाल में ईसाई धर्म फ़ैल रहा था. ये बहुत गरीब लोग नहीं थे, जो आर्थिक सुविधाओं के लोभ में ईसाईयत को अपना रहे थे. ये शिक्षित अभिजात्य और सम्पन्न घरों के लोग थे जो ईसाई धर्म को अपना रहे थे. उनके मन में अपनी जातीय पहचान के प्रति अपने समाज और संस्कृति के प्रति हीनता की भावना आ गयी थी और वे यूरोपियों के नजरों से सम्मानित बनना चाहते थे.
उन्होंने यूरोपियों द्वारा अपने समाज संस्कृति की व्याख्या के आगे सिर झुका दिया था. इस तरह से शिक्षित हिन्दू भी विदेशियों के सामने सांस्कृतिक रूप से पराजित हो रहे थे. लेकिन यूरोपीय लोग हम हिंदुओं को सांस्कृतिक रूप से पूर्णरूप से पराजित नहीं कर सके. हालांकि की यूरोपियों की आर्थिक, राजनीतिक व्यवस्था तथा सभ्यता संस्कृति का भारतवासियों पर पर्याप्त प्रभाव पड़ा और यह स्वाभाविक भी था. फिर भी यूरोपीय भारतीय संस्कृति, धर्म और मूल्यों तथा रीति रिवाजों को पराजित नहीं कर सके, क्योंकि हिंदुओं ने अपनी हो रही सांस्कृतिक पराजय के खिलाफ संघर्ष किया और उस पराजय को उलट डाला.
बंगाल में #राजाराम मोहन राय पहले व्यक्ति थे. जिन्होंने यूरोपीय धर्म, संस्कृति और मूल्यों के विरूद्ध विचारधारात्मक संघर्ष चलाया और यह साबित कर दिखाया कि यद्यपि हिन्दू समाज, संस्कृति, धर्म और रीति रिवाजों में बहुत सी त्रुटियाँ हैं, फिर भी यह घटिया नहीं है. वह यूरोपीय संस्कृति, धर्म और रीति रिवाजों से कहीं अधिक श्रेष्ठ है. राजाराम मोहनराय ने अख़बारों में तथा सभा समितियों में यूरोपीय विद्वानों से बहस किये, वाद- विवाद किए हिन्दू संस्कृति और समाज पर उनके प्रहारों का खण्डन कर दिखाया और हिन्दू लोगों में अपनी मौलिक पहचान के प्रति, अपने समाज और संस्कृति के प्रति गौरव की भावना भरी.
जब बंगाल में राजाराम मोहनराय विदेशियों की विचारधारा के खिलाफ संघर्ष कर हिन्दूओं को मन में अपने समाज संस्कृति और धर्म के प्रति श्रेष्ठता और गौरव की भावना भर रहे थे. उसी समय पंजाब, गुजरात और उत्तर प्रदेश में स्वामी #दयानंद #सरस्वती तथा महाराष्ट्र में #रानाडे भी यूरोपीय संस्कृति और मूल्यों के खिलाफ विचारधारात्मक संघर्ष चलाकर किसी तरह भारतीय संस्कृति और मूल्यों की प्रतिष्ठा कर रहे थे. पूरे भारतवर्ष में यूरोपियों द्वारा भारतीयों की संस्कृति, धर्म और मूल्यों को नीचा दिखाने के खिलाफ, सांस्कृतिक पराजय के खिलाफ एक महान सांस्कृतिक आंदोलन उठ खड़ा हुआ, जिसका उद्देश्य था भारतीयों को अपना महान संस्कृति, महान मूल्यों और परंपराओं का बोध करना. उनके मन में अपनी संस्कृति पहचान के प्रति गौरव और गर्व की भावना भरना १९वी शताब्दी के इस महान सांस्कृतिक अन्दोलन को भारतीय समाज के पुनर्जागरण का आंदोलन भी कहा जाता है.
इस सांस्कृतिक आंदोलन को हिन्दू समाज के बौद्धिक नेताओं ने दो तरीकों से किया था- एक ओर तो उन्होंने यूरोपीय लोगों द्वारा हिन्दू समाज, धर्म और संस्कृति के खिलाफ किये जा रहे प्रहारों और निंदा का जमकर मुकाबला किया और बहस करके, विचारधारात्मक संघर्ष चलाकर उनकी आलोचना का खण्डन किया तथा हिंदू समाज और संस्कृति के औचित्य तथा श्रेष्ठता को स्थापित किया, लेकिन साथ ही साथ दूसरी ओर उन्होंने हिंदू समाज में रूढ़िवाद और गलत धार्मिक, सामाजिक प्रथाओं तथा अंधविश्वासों के खिलाफ संघर्ष चलाया और हिंदू समाज में सुधार का आंदोलन भी खड़ा किया, ऐसा करना जरूरी था. क्योंकि हिन्दू समाज के इन्हीं कमजोर पक्षों को आधार बनाकर यूरोपीय लोग हिंदू समाज पर अपने हमले करते थे. इन कमजोर पक्षों को खत्म किये बिना यूरोपियों की आलोचना के आधार को खत्म करना मुश्किल था.।
हिंदू समाज के कमजोर पक्षों को खत्म करने और समाज का सुधार करने के लिये इन सुधारकों ने प्राचीन परंपराओं, शास्त्रों, धर्म तथा रीति रिवाजों का गहरा अध्ययन किया. बहुत सी पुरानी चीजों की नये युग के अनुसार नई व्याख्या की और कुछ चीजों के लिये नये विधान बनाये. बाल विवाह, बहु विवाह प्रथा तथा सती प्रथा इसी तरह खत्म किया गया तथा विधवा विवाह और स्त्री शिक्षा को उचित ठहराया गाया. वर्ण व्यवस्था, जाति प्रथा के अन्यायपूर्ण तत्वों का विरोध करके मनुष्य मात्र के लिए समानता के आदर्श को सामने रखा गया.
१९वी सदी के बिल्कुल अंत में स्वामी विवेकानन्द ने ६० वर्षों से चल रहे इस महान सांस्कृतिक आंदोलन को इसके उत्कर्ष तक पहुंचा दिया. विवेकानन्द ने न सिर्फ भारत वर्ष के अन्दर, बल्कि यूरोप और अमेरिका में भी जाकर विचारधारात्मक संघर्ष के जरिये भारतीय संस्कृति और मूल्यों की श्रेष्ठता को साबित कर दिखाया. इस तरह सांस्कृतिक आंदोलन ने एक हद तक अपने उद्देश्य को पूरा कर लिया. भारतीयों के मन से अपनी संस्कृति और अपनी जातीय पहचान के प्रति हीनता की भावना खत्म हो गयी और उसकी जगह भारतीय स्वाभिमान और गौरव की भावना ने ले लिया.
यह बदली हुई मानसिकता अंग्रेजों के खिलाफ भारत के स्वतंत्रता संग्राम का आधार बनी है. सांस्कृतिक आंदोलन जिस जातीय स्वाभिमान और सांस्कृतिक गौरव की भावना को भारतीय युवकों के हृदय में जगाया, उसी से प्रेरित होकर लाखों लाख युवक अपने देश को अंग्रेजों के गुलामी से मुक्त करने के लिये राजनीतिक संघर्ष में कुद पड़े. अगर १९वी सदी में यूरोप के सांस्कृतिक प्रमुख के खिलाफ हम भारतीयों का महान सांस्कृतिक आंदोलन न होता तो १९वी सदी में अंग्रेजों के खिलाफ भारत का स्वतंत्रता आंदोलन भी नहीं होता.
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अपनी पहचान के प्रति गौरव की भावना के बिना पहचान को प्रतिष्ठित करने का आंदोलन कभी भी सफल नहीं हो सकता.
अगर लाखों लोग अपनी पहचान पर शर्माते हैं, शिक्षित समुदाय अपनी भाषा, संस्कृति, रीति रिवाज और धर्म को हीन दृष्टि से देखतें हैं और अपने ऊपर शासन करने वाले अपने शोषकों को अपना आदर्श समझतें हैं तो वे अपनी पहचान के लिये, अपने अलग व्यक्तित्व की प्रतिष्ठा के लिये संघर्ष कैसे कर सकतें है ?
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आज ये विकट स्तिथि बनी हुई हैं. अंग्रेज यहाँ रहते हुए भी जो कार्य ठीक से नहीं कर पाये वो अब दूर से बखूबी कर रहे हैं. आज अपने ही लोगों द्वारा अपनों को गाली दिया जा रहा हैं. समस्याओं को मिटाने की बजाय उसपे राजनीति किया जा रहा हैं. पहले जो अंग्रेज हमारी कमजोर पक्षों पे वार करते थे, अब वो उनके यहाँ के मानसपुत्र कर रहे हैं. आज जो ये हमारी जिन कुरीतियों को ले के पानी पी-पी के गरिया रहे हैं, क्या उनका और हमारा कर्तव्य नहीं बनता कि उन्हें मिल के सुलझाया जाय. हर कोई एक-दूसरे पे कीचड़ें मार रहा हैं. हममें बहुत खामियां हैं तो आपमें भी कम नहीं हैं. सब अपनी गलतियों के सबसे बड़े वकील और दूसरे के गलतियों के सबसे बड़े जज बने जा रहे हैं. किसी न किसी को तो आगे आना पड़ेगा.
आइये… हम अपनी खामियों को मिटाने के लिए कदम बढ़ा चुके हैं, मेरे पीछे भी बहुत
