बुधवार, 11 सितंबर 2019

शासन व समाज व्यवस्था के विकृतिकरण से संपूर्ण व्यवस्था का ढांचा चरमराया

   
 अब्राह्मिक  संस्कृतियों क्रिश्चियनिटी और  इस्लाम वअंग्रेजों के आक्रमण के पहले का भारत का विवेचन करें तो आपको दो सत्ताए से भारत का संचालन होता रहा है एक धर्म सत्ता  और दूसरी राज सत्ता है जिसमें धर्म सत्ता का राज्य सत्ता के ऊपर हमेशा ही प्रभुत्व रहा है और समाज को मार्गदर्शन करने वाली धर्म सत्ता से समाज और पुष्पित पल्लवित होता था और समाज की व्यवस्थाएं निर्बाध रूप से चलता  रहा पर आज यहां इस देश में दो धाराएं चल रही है
 एक तरह समाज दूसरी तरफ है शासन, समाज व्यवस्थाओं के द्वारा, मूल्यों के द्वारा संचालित किया जाता है और शासन कानून के द्वारा, भय के द्वारा संचालित होता है।
अब विचार ना आपको है कि आप व्यवस्था चाहते हो या शासन,मूल्य चाहते हो या कानून।  समाज को जीवित करना चाहते हो या शासन को लादना, क्योंकि आज मैं देख रहा हूं कि समाज धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है, मुल्य मिटते जा रहे हैं, व्यवस्थाएं तोड़ी जा रही है और शासन, कानून के द्वारा पूरे मानव समाज को कंट्रोल करने की कोशिश हो रही है।
बहुत कोशिश कर चुके पर दिन पर दिन आतंकवाद, हिंसा,तनाव, युद्ध रुके क्या? खासतौर से भारत देश में।क्योकि भारत की प्रजा आस्थाओं के साथ, धार्मिक मान्यताओं के साथ, मूल्य के साथ जीती आई है। मित्रों पहले समाज को बचाओ, मूल्यों को बचाओ और फिर अगर आवश्यकता पड़ी तो शासन और कानून का उपयोग करो नहीं तो धीरे-धीरे स्थिति यहां तक पहुंच जाएगी कि हर आदमी एक दूसरे को शंका की दृष्टि से देखेगा। चारों तरफ अविश्वास तनाव नफरत व भय होगा।, आप कानून के द्वारा कितना भी कंट्रोल कर लेना पर यह कंट्रोल नहीं होने का और पूरा मानव समाज एक विकृत अवस्था में पहुंच जाएगा।
आज समाज में मूल्य तो रहे नहीं, देखो ना ध्यान से एक तरफ किसान कारीगर छोटा-मोटा दुकानदार जो मेहनत करके किसी तरह अपने परिवार को ईमानदारी के साथ पालने का प्रयास करता था आज उसकी हालत क्या है? पांच से ₹10000 महीने की भी इस महंगाई के युग में उसको गारंटी नहीं है, विचार करो 5 से 10000 में एक परिवार का केवल और केवल भोजन का खर्च भी नहीं निकल सकता पढ़ाई का, दवाई का और अन्य खर्चे की बात तो अलग। दूसरी तरफ इसी देश में एक लाख दो लाख ₹500000 रोज के भी कमाने वाले लोग हैं। यह इतनी बड़ी विषमता की खाई कंहा ले जायेगी हमे?
हमारे यहां एक व्यक्ति हुआ जिसने आदिवासियों का, ग्रामीण वासियों का, मेहनतकश का, किसानों का धन लूट लूट कर सोने की लंका बनाई थी,पर उसे हम आज भी जलाते हैं और राक्षस की श्रेणी में रखते हैं। पर आज यह राक्षस क्या हमारी समझ में आ रहे हैं?  मैं मानता हूं की नहीं, इसीलिए नए कानून के द्वारा समाज को कंट्रोल करने की कोशिश की जा रही है पर जब समाज में मूल्य नहीं होंगे सब समाज में ठीक व्यवस्था ही नहीं होगी तो रावण की तरह मानव समाज को कंट्रोल कर पाओगे? समझ लेना बिल्कुल नहीं। उसमें ना तो आज के रावण सुखी होंगे और ना ही पूरी प्रजा, हम लेते जरूर है राम का नाम पर समझे कहां है राम को?
 राम का मतलब है जो आम आदमी के साथ जीता हो, जो अंतिम आदमी के बारे में सोचता हो, जो बनवासीयों के साथ अपनेपन के भाव से जीता हो।और उनके अंदर जीने का विश्वास भरता हो, वह है राम।और जो अंत में उपभोक्तावादी शोषण पर आधारित विकास के माड़ल को नाकारता हो।
मित्रों पहले समाज को बचाओ, मूल्यों को बचाओ, फिर अगर आवशकता पड़ी तब कानूनो का उपयोग करो, नहीं तो धीरे-धीरे स्थिति यहां तक पहुंच जाएगी कि आदमी एक दूसरे को शंका की भय की दृष्टि से देखेगा, चारों तरफ अविश्वास व नफरत ही होगी। आप कानून के द्वारा कितना भी कंट्रोल कर लेना फिर भी कंट्रोल नहीं होने का और मानव समाज अव्यवस्था में पहुंच जाएगा । आज समाज में मुल्यों की क्या दशा है, देख ध्यान से, एक तरफ किसान कारीगर छोटा-मोटा दुकानदार जो मेहनत करके किसी तरह अपने परिवार को इमानदारी के साथ पालने का प्रयास करता था आज उस की हालात क्या है? 5 से 10 हजार रुपए महीने की भी इस महंगाई के युग में उसको गारंटी नहीं, तब जियेगा कैसे? और जब जी नहीं पाएगा तो जाने अनजाने में अपराध करने के लिए मजबूर होगा और यह अपराधी धीरे धीरे मानव समाज के अंदर विकृती पैदा करेंगे, युद्धों को आतंकवाद को हिंसा को जन्म देंगे। क्या हम यही चाहते हैं मैं मानता हूं बिल्कुल नहीं।
इसलिए हमको विचार करना होगा कि हम विकास किसे कहेंगे? हमें किस तरफ आगे बढ़ना है, हमें समाज को भी जीवित करना है या नहीं?  सरकार ने अब हिंदुओं की परिवार व्यवस्था का तो भोग डाल दिया । गर्ल फ्रेंड को सुरक्षा देनें के लिये भी सरकार यह कानून लाये कि हिन्दू युवक केवल एक गर्ल फ्रेंड ही बना सकता है लेकिन हिन्दू युवती कितने मर्ज़ी बॉय फ्रेंड बना सकती है । यह असली वीमेन एम्पावरमेंट होगी ।
इस घटिया संविधान में हिन्दू परिवार व्यवस्था की सरकार ,संविधान और अदालतें कैसे जड़ें काट रहीं हैं । उसकी एक बानगी देखिये
1. आपकी पत्नी चाहे जितने मर्ज़ी जुल्म ढाए ,चाहे तलाक ना देकर जितनी मर्ज़ी गुलछर्रे उड़ाएं आप दूसरी शादी नहीं कर सकते । लेकिन आप गर्ल friend जितनी मर्ज़ी रख सकते हो ।
2. 16 वर्ष का हिन्दू युवक और युवती शादी नहीं कर सकते लेकिन sex कर सकतें हैं ।
3.यहाँ पर गर्भपात करवाना अधिकार है और हिन्दू औरत को धर्म युक्त सनातन पैदा करने के लिये कहना अपराध है ।
4.यहां हिंदुओं के विवाह को सरकार ने अपराध बना दिया है और live in relation को कानूनी मान्यता दे दी है ।
5.हिंदुओं का विवाह illegal है और वेश्यावृत्ति legal । सरकार ने कोर्ट की मार्फ़त यह कानून बनवा दिया है ।
6 .जल्द ही martial rape का कानून सरकार कोर्ट के माध्यम से पास करवाने जा रही इसके बाद शादी बलात्कार बन जाएगी जिसके बाद हर हिन्दू पति सरकार द्वारा certified बलात्कारी बना दिया जाएगा ।
अगर स्वतंत्रता के बाद ये सरकारें हिन्दुओं के हित में काम कर रही है तो हिन्दू विरोधी सरकार की परिभाषा क्या है ।
अगर हिंदुओं को अब भी लगता है कि यह आज़ादी उनकी है तो वह नितांत मूर्ख हैं । यह संविधान ,सरकार और व्यवस्था केवल हिंदुओं की जड़ें काटने पर तुली है । हिंदुओं के लिये इस आज़ादी का कोई मतलब नहीं ।संपादन अजय कर्मयोगी

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...