गुरुवार, 24 सितंबर 2020

भारत को सांस्कृतिक आर्थिक और नैतिक समृद्धि का आधार ग्राम्य व्यवस्था

 

 अंग्रेजों के आने से पहले भारतीय अर्थव्यवस्था दो हिस्सों में बांटी जा सकती है:-1.नगरीय अर्थव्यवस्था  2.ग्रामीण अर्थव्यवस्था

सिंधु घाटी सभ्यता का अद्भुत और अनोखा इतिहास बताता है कि विश्व में सबसे पहले नगरीय व्यवस्था का विकास भारत में हुआ। और ये व्यवस्था बहुत सुव्यवस्थित थी।
जिन अंग्रेजों ने भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर अध्ययन किया है व जिन अंग्रेजों ने इसका सत्यानाश किया है,उनके आधार पर इसे समझते हैं।इनमें एक अंग्रेज इतिहासकार लिखता है "भारत के गांवों में केवल एक चीज बाहर से आती है वो है नमक"।अर्थात अन्य सभी बुनियादी चीजें गाँव से नगर में निर्यात होती थी।यानि नगरीय व्यवस्था,ग्रामीण व्यवस्था पर निर्भर थी। एक इतिहासकार ने बड़ी मेहनत से सूचि बनाई की गांव में कितने तरह के उत्पादन होते हैं,तो आप हैरान होंगे सुनकर कि भारत के अधिकांश गाँवों में 2000 से भी अधिक वस्तुएं पैदा हुआ करती थी।और लगभग साढ़े सात लाख गाँव थे। कपास/रेशम से सूत,सूत से कपड़ा बनता था और बाजारों में बिकता था।दाल ,गेहूँ,चावल इत्यादि ग्रामीणों को तो पर्याप्त थे ही ,नगरवासियों की भी जरुरत पूरी होती थी।भारत के गाँवों की खदानों से लगभग 90 तरह के खनिज निकलते है। जंगल गांव की सम्पति थी  जहाँ फल-फूल व अनेकों औषधियाँ दुनियाभर के बाजारों में बिकती थी।सब वस्तुएं के विस्तार में जाएंगे तो यह सिलसिला बहुत देर तक चलेगा। इसके अतिरिक्त गांवों में कारीगरों की भरमार थी। लोहे का काम करने वाले लुहार ,सोने का काम करने वाले सुनार,कपड़े को बुनने वाले बुनकर,रुई को सूत बनाने वाले धुनकर,तैल निकालने वाले तेली,लकड़ी का काम करने वाले बढई... ऐसे 18 किस्म के कारीगर तो सब गाँवों में होते थे।वस्तु के बदले वस्तु यानि वस्तु-विनिमय होता था।कोई मोची है तो दूसरे को जूती बनाकर दे देगा और अनाज वगेरा ले लेगा,कोई सुनार है वो किसी की पत्नी को गहने दे देगा और बदले में कुछ ले लेगा। इस प्रकार कर्म चलता था और इस वस्तु-विनिमय की सबसे बड़ी खाशियत यह थी की हर व्यक्ति के पास हर चीजें होती थी।

न्याय व्यवस्था पंचायत आधारित थी। झगड़ा जितना बड़ा होता पंचायत उतने  ही ज्यादा गाँव साथ बैठकर करते।जयपुर के निकट एक गांव बस्सी का इतिहास पढ़ने से पता चला की एक हत्या के मामले की सुनवाई २० दिन चली थी। अर्थात गंभीर मामलों को पूरी गंभीरता से लिया जाता था।पंचायत लगती थी मंदिर में। जहाँ सरपंच धर्म की गद्दी पर बैठकर भगवान को साक्षी मानकर न्याय देते। गजब बात ये थी की पंचायत के लगभग 99 फीसदीफैसलों से वादी भी संतुष्ट होता और प्रतिवादी भी।क्योंकी न्याय देने वाला धर्म की कसम खाकर धर्म के आधार पर न्याय करता था।यह वो धर्म नहीं जो कर्म काण्ड वाला ,बल्कि वह धर्म जो आचरण में उतारा जा सके।वो धर्म जो महऋषि दयानन्द सरस्वती जी ने बताया था।

लगभग हर गांव में एक वैद्य होता था और हर पाँच गाँव में एक सर्जन होता था। और सर्जन ऐसा जो गंभीर से गंभीर सर्जरी करदे।हाथ कट गया हो या कोई अन्य अंग ,शरीर कहीं से जल गया हो ,खराब हो गया हो -सबका इलाज। हड्डी जोड़ने वाले हाड़-वैद्य हुआ करते थे। माताएं गर्भवती माँ को बच्चा इतनी आसानी से जन्मा देती जितना आज भी सरल नहीं। अंग्रेज लैंकेस्टर जिसने भारतीय शिक्षा व चिकित्सा व्यवस्था पर अध्ययन किया कहता है कि इतनी अच्छी और सुव्यवस्थित व्यवस्था देखकर हम अभिभूत हैं-जो पूरी तरह निःशुल्क भी है। वैद्य जी की जीविका चलाने हेतु हर कोई स्वेच्छा से मदद करता था। हमारे यहाँ भारत में कहा गया है कि चिकित्सक,गुरु व बेटी के घर जाओ तो कभी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए।

कम से कम एक गुरुकुल तो हर गाँव में होता ही था।आज से तुलना करें तो 7 लाख से ज्यादा ऐसे गुरुकुल थे जिनमें 12वीं तक की शिक्षा दी जाती थी। उच्च शिक्षा हेतु तक़रीबन 14 हजार केंद्र थे। और साक्षरता दर 97% थी पुरे भारत में। कुछ अंग्रेज इतिहासकार लिखते है कि हमारे यहाँ तो पहला स्कूल 1868 में शुरू हुआ लंदन में भारत में तो हजारों साल पहले से 732000 से ज्यादा स्कूल चल रहे हैं। और इन गुरुकुलों में वेद और शास्त्रों की अनिवार्यता के साथ ऐस्ट्रो-फिजिक्स,ऐस्ट्रोनोमी,मेटलर्जी जैसे 18 मुख्य विषय पढ़ाए जाते थे।

दूध,दही,मखन,घी और छाछ इतना होता था कि लोग पानी की जरुरत भी इन्हीं से पूरी करते थे।और ये सब बेचा नहीं जाता था,बाकी तो हमारे गांव में बिकना शुरू हो गया पर दही व छाछ अब भी अधिक होने पर पड़ोसियों में बाँट दी जाती है।उसके बाद भी बच जाए तो जानवरों को दे दिया जाता था।
भारत में श्रम/मेहनत/परिश्रम हमेशा से अनमोल रहा। श्रम का विभाजन इस तरह से था कि जो काम कोई व्यक्ति अकेले स्तर पर कर सकता है वह वो खुद करता और जिसके लिए श्रमिकों की आवश्यकता होती तो गाँव के सभी जन सहायता करने को तैयार रहते।ऐसे ही उनको जरुरत होती तो वह व्यक्ति उनकी मदद करता।यही कारण था कि भारत का प्रत्येक घर बिना श्रम-लागत के बना।

सब स्वदेशी/स्वावलम्बी तो थे ही ईज्जत और हैसियत सबकी बराबर थी। सम्मान सबका बराबर था। छोटे से छोटे कारीगर का भी वही ईज्जत-सत्कार था जो सुनार का या अन्य का था। इसका एक उदाहरण है बच्चे के जन्म पर होने वाले संस्कार। जैसे सुनार आया,बच्चे के कान में सोने की बाली डाल गया,सबने उसका सम्मान किया। शहद बनाने वाले ने एक बून्द मंगलकामनाओं से बच्चे की जीभ पर डाली,सबने उसका सम्मान किया। मोची आएगा उसके जूते दे गया ,सबने उसका सम्मान किया।यहाँ तक वर्तमान में सबसे उपेक्षित व पिछड़े माने जाने वाले हिजड़ों के सम्मान हेतु ,बच्चा जन्मते ही सबसे पहले उनकी गोद में दिया जाता था। विवाह के सबसे मुख्य संस्कार ,यानि मंगलसूत्र को हिजड़े,वेश्या या गणिकाओं के घर भेजकर ,उनके घर से  माटी लगाकर,वधु के गले में डाला जाता था।एक और तबका जिनका शोषण हुआ -डोम,डोम्ब या डोमा जो लाश को जलाते थे। तो किसी भी मर्ग पर ये मिट्टी की हाण्डी लेकर सबसे आगे चलते बाकी सब इनके पीछे अर्थी लेकर।अग्नि देने का कार्य तो पुत्र-पुत्रियाँ करती ,पर केवल डोम उनके बराबर खड़ा होकर सम्पूर्ण कार्य करवाता था। इसी प्रकार हर किसी का सहयोग व सहभागिता जन्म से मृत्यु तक हर छोटी से बड़ी घटना में होती थी।अंग्रेजों के आने से पहले भारत में जो 565 जो रियासतें रही ,उनमें से 70 से ज्यादा रियासतों के राजा डोम थे।कहीं तैली थे ,कहीं धुनकर,कहीं बुनकर।तो ये काम के आधार पर बनी जातियां के आधार जन्म पर थी इसपर भी कोई ग़लतफ़हमी में मत रहिएगा।ये तो यह सामाजिक वर्गीकरण था। अंग्रेजों के षड्यंत्र व कुछ स्वार्थी लोगों के भेदभाव व पक्षपात रवैया इस दुर्दशा का कारण है।
आज आवश्यकता है कि हम आवश्यक बदलावों के साथ अपनी उसी स्वावलम्बी व्यवस्था को वापिस लाएं। और भारत को फिरसे 'सोने का शेर' बनाएं।
और जिसने सम्पूर्ण जीवन राष्ट्रहित को समर्पित कर हमारा सोया हुआ स्वाभिमान जगाया उस अमर शहीद भाई राजीव दीक्षित जी के गुरु आदरणीय रविंद्र शर्मा गुरु जी के सपनों को यथार्थ की धरातल पर उतारता यह राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान के  सहभागी बने  9336919081 पर केवल whatsap करें।धन्यबाद

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...