सुप्रीम कोर्ट के पेत्रिक संपत्ति वाले निर्णय ने कई घरो में घमासान बढ़ा दिया होगा | कोर्ट ने अधिकार की बात तो कर दी , पर जिमेदारी की नहीं की | बिना जिमेदारी के अधिकार नहीं होना चाहिए | जो सेवा करे उसे ही मेवा मिले निर्णय एसा होना चाहिए था |ये निर्णय हिन्दुओ( सिख जैन बौध भी ) पर ही लागू होता है , कई परिवारों में इस के कारन झगडे बढ़ेंगे और हिन्दू एकता पर भी बुरा असर ही पड़ेगा |
क्या यह लोकतंत्र है ? जिसमे एक वकील और एक जज बन्द कमरे में बैठ कर करोड़ों लोगों पर अपनी मनमर्जी थोपते हैं । उदहारण के लिये एक वकील कोरट में एक petition दायर करता है ।कि अगर एक हिन्दू अपनी पत्नी के साथ सहवास करता है तो उसे अपनी पत्नी को 10000 रुपये देने पड़ेंगे । जज इसके हक में फ़ैसला दे देता है । अब इस केस में यह फैसला करोड़ों लोगों को प्रभावित करेगा । उनसे बिना पूछे उनपर यह फैसला थोप दिया गया । क्या यह लोकतंत्र है? जिसका गुणगान सारी मीडिया करती रहती है कि अंगरेज हमें लोकतंत्र देकर चला गया । क्या यह अँगरेजों के स्थान पर संविधान ,अदालतों की गुलामी नहीं है । ऐसा ही संसद में होता है 270 व्यक्ति आपकी किस्मत का फैसला करते रहते है वह भी आपको पूछे बिना ।
उदहारण:- communal violence bill , sc st एक्ट ,domestic violence act ,आदि
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विकल्प:- सनातन लोकतंत्र प्रणाली , देश की सरकार के पास मुद्रा ,defense ,interstate transport , आदि को छोड़ कर बाकि सब अधिकार जैसे न्याय ,शिक्षा ,चिकित्सा आदि सब सनातन पंचायतों के पास होना चाहिये । जिसमे आप को तवरित न्याय बिना किसी डाक्यूमेंट्स के ,बिना किसी वकील के ,बिना किसी खर्चे के तुरंत मिल जाता था ।
उदहारण के लिए मान लीजिए किसी गावँ पंचायत में किसी बदचलन औरत ने किसी शरीफ आदमी पर यह आरोप लगा दिया कि यह मुझे आते जाते छेड़ता है । उसका मामला पंचायत में पहुँचा । तो इस शरीफ आदमी के हक में सारा गांव गवाही देगा । सरपंच भी अकेला फैसला नही कर सकता । 1 या 2 घण्टे में मामला निपट जाएगा ।
अब यही मामला अदालत में पहुँच जाए तो पहले आजकल व्यवस्था में एक presumptive evidence की अवधारणा चलती है जिसमे एक व्यक्ति को पहले ही दोषी मान लिया जाता है ।जैसे sc st act में नॉन sc st वर्ग को , दहेज उत्पीड़न के मामले में पति को ,ससुराल को पहले ही दोषी मान लिया जाता है । फिर उस मान लिए दोषी व्यक्ति को यह साबित करना पड़ता है कि वह दोषी नहीं । अब उस मान लिये दोषी व्यक्ति को अनन्त डाक्यूमेंट्स एकत्र करने पड़ेंगे ,जमानत, वकील का इंतजाम करना पड़ेगा । गवाहों को 2000 देकर ,बढ़िया खाने का लालच देकर पांच दस साल , 100- 200 किलोमीटर दूर किसी ac गाड़ी में बिठाकर 500 600 का टूल कटवा कर कोरट में पेश करना पड़ेगा । हो सकता है इस दौरान फ़ैसले का इंतजार करते करते उसकी मौत हो जाये ।
भारत की अंग्रेजी न्यायपालिका के कारनामे"
"1961 में मेरे पिताजी PWD में चतुर्थ श्रेणी के तकनीकी पद पर नोहर (राजस्थान) में पोस्टेड थे। उस समय तक मेरा जन्म नहीं हुआ था। एक दिन उनके अधिशासी अभियंता ने उनको कहा कि कल सालासर टूर पर चलना है, सो वो सुबह सुबह आफिस पंहुचे और वहाँ से जीप में बैठकर चालक सहित नौ व्यक्ति रवाना हो गये। सालासर पहुँच कर कोई सरकारी काम तो ना हो सका लेकिन दर्शन करने के पश्चात खाना पीना हुआ और इस दरमियान चालक की मान मनौवल में कोई कमी रह गयी और उसने वापस आकर भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो में जीप के दुरुपयोग की शिकायत कर दी। इस पर एसीडी ने भी अदालत में जीप के दुरुपयोग का तत्कालीन गंगानगर जिले की अदालत में चालक के अलावा शेष सभी आठ लोगों के विरुद्ध दावा कर दिया और कालांतर में इस केस को बीकानेर सिफ्ट कर दिया गया।
मेरे पिताजी 1995 में रिटायर हो गये, सन 2004 में पिताजी ने मुझे कहा कि आज मेरी कोर्ट में तारीख है और तबीयत खराब है सो कोर्ट मेरे साथ चलना है। मेरी उम्र 2004 में 42 वर्ष हो चुकी थी। कोर्ट जाने पर पिताजी अपनी बारी पर पेश हुए तो पता चला कि आज सरकारी वकील साहब व्यस्त है और मुकदमे की पैरवी करने के लिए हाज़िर नहीं हो सकते। जज साहब नयी तारीख देने लगे तो पिताजी ने कहा, "साहब इजाजत हो तो मैं कुछ अर्ज करता हूँ" और जज साहब के इजाजत देने के बाद पिताजी के बयान के शब्दश: उद्गार मैं नीचे लिख रहा हूँ।
"मान्यवर 42 साल पहले जिस जीप के दुरुपयोग का ये मुकदमा है मैं उस जीप में सवार नौ लोगों में से पद व आयु में सबसे छोटा कर्मचारी था, और 1995 में वो अंतिम व्यक्ति था जो रिटायर हुआ और आज के दिन उन नौ लोगों में इकलौता जीवित व्यक्ति भी हूँ। इस मुकदमे की पेशियों में हाज़िर होने के लिए विभाग आज तक मुझे ₹ 1,30,000/- का TA/DA के रूप में भुगतान कर चुका है। और चूंकि मैं सबसे छोटा कर्मचारी था अत: मुझे ही सबसे कम मिला है लेकिन यदि बराबर भी मान लिया जाए तो लगभग ₹ 1,30,000 X 9 = 11,70,000/- का भुगतान राजकोष से हो चुका है। और हर पेशी पर सरकारी वकील की फीस व हमारे वकील की फीस व न्यायालय के वक्त की बर्बादी अलग से।
"मान्यवर जैसा कि मैंने अर्ज किया कि मेरे सभी सह अभियुक्तों कि मृत्यु हो चुकी है और मै भी अब 70 वर्ष का हूँ और अब मैं भी अदालत में उपस्थित होने में असमर्थ हूँ। अतः मेरी आपसे प्रार्थना है कि चूंकि जीप दुरूपयोग का ही मामला है और आर्थिक दंड से शायद न्याय हो जाये, तो मैं अपने गुनाह को स्वीकार करता हूँ और अगर जेल भी जरूरी है तो जेल भेजो। मेरा क्या भरोसा, मैं अब पका आम हूँ, कभी भी टपक सकता हूँ। फिर आपकी अदालत किसको जेल भेजेगी? "
जज साहब ने तुरंत सरकारी वकील साहब को बुलाया और उसको कहा कि अगर अभियुक्त गुनाह कबुल कर रहा है तो आप इसमें क्या साबित करना चाहते हैं?
और जीप के दुरुपयोग का अनुमानित खर्च ₹ 36/- किया गया। यद्यपि पिताजी अपने अफसर के निर्देशों का पालन कर रहे थे लेकिन चूंकि उनके द्वारा अपने अधिकारी के गलत आदेशों का विरोध नहीं किया गया इसलिए 160/- का अर्थ दंड लगाया गया।
इस प्रकार कुल लगभग 20 लाख रुपये स्वाहा होने के बाद 196/- रूपये की वसूली से हमारी न्याय व्यवस्था ने अपने न्याय के फर्ज को पूरा किया।
हाँ पिताजी अभी भी जीवित हैं और जब भी कोई कोर्ट जाने की बात करता है तो वो मजे ले कर इस किस्से को सुनाते हैं।
गोरखनाथ दुसाने की मूल पोस्ट