गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019

तीर्थराज प्रयाग काशी व माता गंगा का तथ्यात्मक विश्लेषण स्वामी करपात्री जी व अन्य महाभाग की दृष्टि में



प्रयाग नाम वाली पांच अलग अलग जगहें पास पास ही होती हैं। इनमें सबसे पहला है विष्णु प्रयाग। बद्रीनाथ के सतोपंथ से चली अलकनंदा नदी विष्णु प्रयाग में धुली गंगा से मिलती है। यहाँ से आगे बढ़ने पर अलकनंदा थोड़ी दूर बाद नंदाकिनी से मिलती है और ये दूसरी जगह नन्द प्रयाग कहलाती है। इस से आगे बढ़ें तो अलकनंदा फिर से पिंडर गंगा से मिलती है और उसे कर्ण प्रयाग कहते हैं। थोड़ा और नीचे आने पर अलकनंदा केदारनाथ से निकली मन्दाकिनी से मिलती है, जिसे रूद्र प्रयाग कहा जाता है। इस से भी आगे जाकर गंगोत्री के गोमुख से निकली भागीरथी नदी आकर अलकनंदा से मिलती है। इस जगह को देव प्रयाग कहा

जाता है।

यहाँ से आगे अलकनंदा और भागीरथी का कोई अलग अलग अस्तित्व नहीं रहता, यहाँ से आगे ये नदी गंगा कहलाती है। तकनिकी रूप से जब हम गंगा की बात करते हैं तो ये गोमुख में गंगोत्री ग्लेशियर से १२७६९ फीट की ऊंचाई पर निकलती है। भारत के मैदानी हिस्सों में करीब २५२५ किलोमीटर का सफ़र करके बांग्लादेश में बंगाल की खाड़ी में जा मिलती है। कितना पानी इस से बहता है, उसके हिसाब से देखें तो ये दुनियां की तीसरी सबसे बड़ी नदी है। ये नदी कम से कम १४० मछलियों की प्रजातियों और ९० उभयचर जंतुओं का घर है। इसके अलावा इसमें गंगा डॉलफिन भी होती है। वर्ष २००७ के आंकड़ों के मुताबिक ये नदी दुनियां की पांचवी सबसे ज्यादा प्रदूषित नदी थी।

करीबन ८०० किलोमीटर पार करने के बाद, रामगंगा के गंगा में मिल जाने पर इलाहाबाद के पास यमुना गंगा से मिलती है। इसे त्रिवेणी संगम कहते हैं, मान्यता थी कि गंगा-यमुना-सरस्वती तीन नदियाँ यहाँ मिलती थी। कई साल तक इतिहासकारों ने इसे मिथक घोषित किया। बाद में सैटॅलाइट से लिए चित्रों और अन्य सबूतों के आधार पर ये तय हो पाया कि सरस्वती सचमुच कि नदी थी और जिसे आज घाघरा-झज्झर बेसिन कहते हैं, वहीँ बहती थी। इस संगम को प्रयाग कहा जाता है, ये वो छठा प्रयाग है जिसे आम तौर पर लोग जानते पहचानते हैं। यहाँ भी यमुना नदी, गंगा से बड़ी है। यमुना से आने वाला १०४००० क्यूबिक फीट प्रति सेकंड पानी यहाँ गंगा में मिलता है। संगम का करीब ५९% पानी यहाँ यमुना का होगा।

यहाँ से आगे जब गंगा बहती है तो वो मैदानी क्षेत्र में है। उसका वेग बहुत कम हो जाता हो ऐसा नहीं है, लेकिन फिर भी वो अपेक्षाकृत शांत होती है। गंगा का वेग बनारस पहुंचकर कम होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि नदी की दिशा वहां घूमती है। बनारस पहुंचकर पूर्व की और बह रही गंगा दक्षिण से उत्तर की तरफ मुड़कर बह रही होती है और इसी से उसकी गति घट जाती है।

इसी को आप धार्मिक मान्यताओं में देख सकते हैं। भागीरथ जब गंगा को लेकर आते हैं तो वो बालिका है, अपने पूरे वेग में उत्साह से भरी पूरी, जब शिव उसे रोकते हैं तो वो किशोरी है, बंधनों को मानने के लिए आसानी से तैयार नहीं होती, शांतनु से विवाह और भीष्म के जन्म के समय वो युवती है, उसके बाद से लगातार वो माता के स्वरुप में है।

मैदानी भागों की गंगा भी इसी माता के स्वरुप में होती है। उसमें वेग नहीं, स्नेह और पोषण छलकता है। सन १९१८ से ३६ के दौर में अंग्रेजों ने वेग देखकर ये मान लिया था कि कितना भी कूड़ा कचरा इसमें डालो ये बहा ले जायेगी, लेकिन वाराणसी के इलाकों में जब शहरों से कचरा इसमें जाना शुरू हुआ तो इसका वेग उतना होता ही नहीं कि ये सब बहा ले जाए। इसकी सफाई के लिए भी जो काम हुए वो अजीब से रहे। पहले तो केंद्र और राज्य की इसमें ७०:३० की हिस्सेदारी रही, बाद में कांग्रेस की सरकार ने (यू.पी.ए. काल में ) इसे ५०:५० भी कर डाला। नतीजा ये रहा कि दोनों केंद्र और राज्य कहते रहे कि उन्होंने अपने हिस्से की सफाई कर दी है, उधर गंगा मैली होती रही।

मोदी सरकार के कार्यकाल में बहुत ज्यादा काम हुआ हो ऐसा भी नहीं है लेकिन हाँ प्रदुषण फ़ैलाने वालों की पहचान का काम किया गया है। आश्चर्यजनक रूप से इसमें ११८ शहर ही नहीं आते, गंगा को प्रदूषित करने वालों में १६४९ ग्राम पंचायत भी हैं। गंगा की सफाई में जुटे एन.जी.ओ. में से एक बड़ी संख्या साधुओं की चलाई हुई है। उनमें से ज्यादातर आधुनिक मानकों पर पढ़े लिखे भी नहीं माने जायेंगे। लगातार के अभ्यास ने उन्हें ये सिखा दिया है कि क्या किया जाना चाहिए। लगभग सबका मानना है कि गंगा की धारा को “निर्मल” ही नहीं “अविरल” भी होना चाहिए। जबरन पानी को रोका जाना गंगा को नुकसान पहुंचाता है।

अभी की हिसाब से उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड और पश्चिम बंगाल मिलकर ७३०० मिलियन लीटर कचड़ा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रतिदिन गंगा में बहाते हैं। इन राज्यों को मिला दें तो इनका सामर्थ्य करीब ३३०० मिलियन लीटर कचड़े को परिशोधित करने का ही है, यानि ४००० मिलियन लीटर विष प्रतिदिन गंगा में जा रहा है। पंजाब के गावों में एक बाबा बलबीर सिंह सींचेवाल काम किया करते हैं। उन्होंने हाल में ही काली बेइन नदी को पूरी तरह सिर्फ गाँव वालों और अपने काम से साफ़ कर के दोबारा जीवित कर डाला है। जो नदी लगभग सूख चुकी थी, वो अब दोबारा बहती है।

[ संख्याओं के अंक जान बूझ कर देवनागरी में लिखे गए हैं, 8 को ८ लिखना भर दोबारा सीखने से मेरी भाषा एक पीढ़ी और आगे बढ़ जाती है।]

आनन्द कुमार

#प्रयाग #कुरुक्षेत्र

इस अंश को कृषि के पूरब से पश्चिम की दिशा में प्रसार से जोड़ा जा सकता है। उल्लेखनीय है कि कृषि ही आदि यज्ञ है।
इसका एक अर्थ यह भी होगा कि रोमिल हबीबी गिरोह द्वारा कथित आक्रांता आर्यों का पश्चिम से पूरब की दिशा में अग्निकाण्ड करते हुये बढ़ना बताया जाना 100 प्रतिशत गल्प है।

भगवान सिंह द्वारा जह्नु एवं जघन की मीमांसा जिन्हें स्मृत हो, वे ध्यान दें कि गङ्गा यमुना के मध्य के प्रयाग क्षेत्र को पृथ्वी का जघन स्थल बताया गया है।
#मत्स्यपुराण

----प्रयाग-----
गंगा-यमुना के संगम से सम्बन्धित
अत्यन्त प्राचीन निर्देशों में  एक मन्त्र है  ,जो बहुधा  ऋग्वेद १०.७५  के  साथ  उच्चरित किया जाता है -
सितासिते सरिते यत्र सङ्गते तत्राप्लुतासो दिवमुत्पतन्ति ।
ये वै तन्वं विसृजन्ति धीरास्ते जनासो अमृतत्वं  भजन्ते  ।।
त्रिस्थली के मत से यह आश्वलायन शाखा का पूरक श्रुति वचन है ।
तीर्थचिन्तामणि ने इसे ऋग्वेद का मन्त्र माना है ।
स्कन्दपुराण ने इसे श्रुति कहा है ।
काशीखण्ड, ७/५४  - 'श्रुतिभि: परिपठ्येते सितासिते सरिद्वरे ।
तत्राप्लुतांगा ह्यमृतं भवन्तीति विनिश्चितम्'||
जो लोग श्वेत या कृष्ण दो नदियों के मिलन पर स्नान करते हैं, वे स्वर्ग को उठते हैं; जो धीर लोग वहाँ अपना शरीर त्याग करते हैं,
वे अमृतत्व को पाते हैं ।

प्रयागतीर्थस्य सीमा-

आ प्रयागं प्रतिष्ठानादापुराद्वासुकेर्ह्रदात्।



कम्बलाश्वतरौ नागौ नागाच्च बहुमूलकात्।।



एतत्प्रजापतेः क्षेत्रं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।। मत्स्यपु. १०४.४ ।।

॥अटक॥
हमारी स्मृति में  अटक  आज भी क्यों अटका हुआ है , इसके पीछे हमारी हजारों वर्ष पुरानी परम्परायें  ही  कारण  हैं ।
तीर्थ स्थान की यात्रा व तीर्थ स्नान का विशेष महत्व है ।
भगवान् श्रीकृष्ण के बड़े भाई  बलराम जी ने भी तीर्थाटन किया था  , इनका वर्णन महाभारत में विस्तार से है ।
वर्तमान पाकिस्तान के अटक में  सिन्धु  तथा  कुभा नदियों का संगम स्थल है , दोनों ही नदियों के नाम ऋग्वेद में  मिलते हैं ।
यह स्थल भी हमारा प्राचीन तीर्थ-स्थल  है  ।
सिन्धु का जल  साफ श्वेत  तथा  कुभा का जल मटमैला कृष्ण  है ।
कुभा नदी को ही काबुल नदी कहते हैं ।

 ऋग्वेद १०.७५  के  साथ  ही एक मन्त्र उच्चरित किया जाता है -

"सितासिते सरिते यत्र सङ्गते तत्राप्लुतासो दिवमुत्पतन्ति ।
ये वै तन्वं विसृजन्ति धीरास्ते जनासो अमृतत्वं  भजन्ते  ।।"

त्रिस्थली के मत से यह आश्वलायन शाखा का पूरक श्रुति वचन है ।
तीर्थचिन्तामणि ने इसे ऋग्वेद का मन्त्र माना है ।
स्कन्दपुराण ने इसे श्रुति कहा है ।
काशीखण्ड, ७/५४  - 'श्रुतिभि: परिपठ्येते सितासिते सरिद्वरे ।
तत्राप्लुतांगा ह्यमृतं भवन्तीति विनिश्चितम्'||
जो लोग श्वेत और कृष्ण दो नदियों के मिलन पर स्नान करते हैं, वे स्वर्ग को उठते हैं; जो धीर लोग वहाँ अपना शरीर त्याग करते हैं,
वे अमृतत्व को पाते हैं ।

दृष्द्वती, आपया और सरस्वती से घिरे क्षेत्र में शुभ दिन अग्नि स्थापित हुई ( ऋ.3.23.4) ।
यह दृष्द्वती कौन है? पुष्कर का नाम सुना आप ने? ब्रह्मा का पवित्र झीलतीर्थ। दृषद्वती इसी झील से निकलती थी।
आप ने ब्रह्मा के प्रथम यज्ञ की बात पढ़ी होगी। इस ऋचा में उसी का संकेत है।
सरस्वती सूखी। झील से निकलने वाली नदी दृष्द्वती बरसाती बन कर कालांतर में नाम तक खो बैठी। जन मन में पुष्कर की महिमा ही शेष रह गयी, दृषद्वती नदी भूल गयी, लुप्तप्रवाही सरस्वती प्रयाग पहुँचा दी गयी।

कितना सरल है नाम-विस्मरण !
हरद्वार का हरिद्वार कर दिया !
किसी ने भी विरोध नहीं किया !

हिमालय को हर का बड़ा प्रतीक तथा कैलास को छोटा प्रतीक माना जाता था। अत: हरद्वार नाम सार्थक ही था।

हरिद्वार नाम से केवल बदरीनाथ से ही सम्बन्ध जुड़ पाता है पूर्ण हिमालय व कैलास से नहीं।



१२ कुम्भ-पण्डित मदन मोहन पाठक, विभागाध्यक्ष, ज्योतिष, राष्ट्रीयसंस्कृत संस्थान, लखनऊ परिसर कृत जगन्नाथ पञ्चाङ्ग २०७४ विक्रमाब्द के अन्तिम पृष्ठ पर १२ कुम्भ के समय और स्थान का वर्णन है। सूर्य-चन्द्र-गुरु जब एक राशि में आते हैं तो महा-कुम्भ योग होता है। स्वामी करपात्री जी द्वारा कुम्भपर्व निर्णय  ग्रन्थ के पृष्ठ-२२ पर देवों के १२ दिनों अर्थात् मनुष्य के १२ वर्षों में १२ कुम्भ पर्व भारत के १२ स्थानों में होते हैं-
देवश्चागत्य मज्जन्ति तत्र मासं वसन्ति च। तस्मिन् स्नानेन दानेन पुण्यमक्षय्यमाप्नुयात्॥
सिंहे युतौ च रेवायां मिथुने पुरुषोत्तमे। मीनभे ब्रह्मपुत्रे च तव क्षेत्रे वरानने॥
धनुराशिस्थिते भानौ गङ्गासागरसङ्गमे। कुम्भराशौ तु कावेर्य्यां तुलार्के शाल्मलीवने॥
वृश्चिके ब्रह्मसरसि कर्कटे कृष्णशासने। कन्यायां दक्षिणे सिन्धौ यत्राहं रामपूजितः॥
अथाप्यन्योऽपि योगोऽस्ति यत्र स्नानं सुधोपमम्। मेषे गुरौ तथा देवि मकरस्थे दिवाकरे॥
त्रिवेण्यां जायते योगः सद्योऽमृतफलं लभेत्। क्षिप्रायां मेषगे सूर्ये सिंहस्थे च बृहस्पतौ॥
मासं यावन्नरः स्थित्वाऽमृतत्वं यान्ति दुर्लभम्। (रुद्रयामल, तृतीय करण प्रयोग, १२२-१२८)
अर्थात्-१. सूर्य-चन्द्र-गुरु सिंह राशि में युत होने से नासिक (महाराष्ट्र) में,
२. मिथुन राशि में जगन्नाथपुरी (ओड़िशा) में,
३. मीन राशि में कामाख्या (असम) में,
४. धनु राशि में गङासागर (बंगाल) में,
५. कुम्भराशि में कुम्भकोणम् (तमिलनाडु) में,
६. तुला राशि में शाल्मली वन अर्थात् सिमरिया धाम (बिहार) में,
७. वृश्चिक राशि में कुरुक्षेत्र (हरियाणा) में,
८. कर्क राशि में द्वारका (गुजरात) में,
९. कन्या राशि में रामेश्वरम् (तमिलनाडु) में,
१०. मेषाऽर्क-कुम्भ राशि गत गुरु में हरिद्वार (उत्तराखण्ड) में,
११. मकराऽर्क मेषराशिगत गुरु में प्रयाग (उत्तर प्रदेश) में,
१२. मेषाऽर्क सिंहस्थ गुरु में उज्जैन (मध्य प्रदेश) में
महाकुम्भ होता है।
टिप्पणी-१. कुरुक्षेत्र में महाभारत कार्तिक अमावास्या (अमान्त मास, उसके बाद मार्गशीर्ष का आरम्भ) को आरम्भ हुआ जिस समय सूर्य वृश्चिक राशि में थे। चन्द्र का प्रायः उसी समय वृश्चिक राशि में प्रवेश होता है। दक्षिणी गणना से शुभकृत सम्वत्सर था। इसमें गुरु वृश्चिक राशि में नहीं था।
२. रामेश्वरम् में भगवान् राम ने फाल्गुन मास में शिव की पूजा की थी। उस समय गुरु कन्या राशि में थे। राम जन्म के समय गुरु कर्क राशि में थे। ३६ वर्ष बाद पुनः कर्क राशि में; ३९ वर्ष बाद राज्याभिषेक (२५ वर्ष में वनवास,

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...