बुधवार, 13 फ़रवरी 2019

वामी कामी जिहादी ईसाई सेकुलर दोगले एजेंटों को यह जरूर देखना चाहिए कि ब्रिटिश एजुकेशन के लागू होने के पूर्व की स्थिति। लगभग 100 साल बाद विल दुरान्त ने 1930 का लेख

#सामाजिक_न्याय_की_ढोल_में_पोल: पार्ट 1
"The Beautiful Tree" में धरमपाल जी ने ब्रिटेन की संसद ( House of Common Papers) तथा इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी लंदन के हवाले से लिखा :

●भारत में कलेक्टर्स के द्वारा प्रेषित रिपोर्टस् का अध्ययन करके मद्रास प्रेसीडेंसी के गवर्नर थॉमस मुनरो ने निर्णीत किया कि स्कूलों और प्राइवेट ट्यूटर्स के यहां शिंक्षा पाने वाले 5 से 10 साल के लड़कों का प्रतिशत लगभंग एक चौथाई से एक तिहाई के बीच है अर्थात 25 से 35% के बीच।

● वर्ण क्रम ( लेखक ने कास्ट वाइज लिखा है) में स्कूल में शिंक्षा प्राप्त करने वालो में बालको की तुलना में बालिकाओं की संख्या बहुत कम है।

● ऐसा माना जाता है कि प्राचीन भारत से लेकर ब्रिटिश पीरियड के शुरुवात तक शिक्षा सिर्फ तथाकथित द्विजो को ही उपलब्ध थी। ( मद्रास प्रेसीडेंसी में उस समय 95% आबादी हिंदुओ की थी)
लेकिन टेबल 2 में 1822-25 के उपलब्ध डेटा के अनुसार स्थिति प्रायः इसके बिल्कुल विपरीत थी। यह विपरीत स्थिति तमिल भाषी क्षेत्रो में अधिक प्रगल्भता के साथ दिखाई देता है जहां शिंक्षा ग्रहण करने वाले तथाकथित द्विजो की संख्या साउथ Arcot में 13%, मद्रास में लगभंग 23%, मुसलमानों का प्रतिशत साउथ arcot में 3% और सलेम में 10% है वहीं शिंक्षा ग्रहण करने वाले शूद्रों तथा अन्य जातियों का प्रतिशत सलेम और टिनवेली में 70% और साउथ Arcot में 84℅ है।

● टेबल 3 में इसको और स्पष्ट किया गया है।

★ मलयालम भाषी मालाबार में द्विज छात्रों का प्रतिशत 20% है क्योंकि यहां मुस्लिम जनसंख्या अधिक है। मुस्लिम छात्रों का प्रतिशत 27% है। जबकि शूद्र छात्रों की संख्या 54% है।
★ कन्नड़ भाषी बेल्लारी में द्विज छात्रों की संख्या 33% और शूद्र छात्रों की संख्या 63% है।
★इसी तरह उड़िया भाषी गंजम में द्विज छात्रों की संख्या 35% और शूद्र छात्रों की संख्या 63.5% है।

ये तो थी ब्रिटिश एजुकेशन के लागू होने के पूर्व की स्थिति।

लगभग 100 साल बाद विल दुरान्त ने 1930 में अपनी पुस्तक "The Case For India" में लिखा:
● जब ब्रिटिश भारत आये तो सम्पूर्ण भारत मे सामुदायिक स्कूल थे, जो ग्रामीण समुदायों द्वारा चलाये जाते थे। ईस्ट इंडिया कंपनी ने इन ग्रामीण समुदायों को विनष्ट करके उंनको स्कूलों से विस्थापित किया। जिनमे मात्र 7% लड़को और 1.5 लड़कियां शिंक्षा पाती हैं, अर्थात् कुल मिलाकर मात्र 4℅।
● 1911 में गोखले जी ने भारत मे सबको शिक्षित करने हेतु यूनिवर्सल कंपल्सरी एजुकेशन बिल प्रस्तावित किया जिसको ब्रिटिश द्वारा निर्वाचित सदस्यों ने खारिज कर दिया। 1916 में पटेल ने भी वैसा ही बिल प्रस्तावित किया, जिसको ब्रिटिश निर्वाचित सदस्यों ने खारिज कर दिया।
( P - 44 - 46)
● 1917 में डिप्रेस्ड क्लास के लिये ब्रिटिश शिंक्षा का प्रस्ताव लाते हैं।

( आगे की कहानी अन्य पोस्टों में लिखी हुई है)
अब प्रश्न यह उठता है कि यदि मात्र 100 साल पहले ब्राम्हणो द्वारा चलाये जा रहे गुरुकुलों में शूद्र छात्रों की संख्या इतनी अधिक थी तो 100 साल में ऐसा क्या हुवा कि एक डिप्रेससेड क्लास उतपन्न हो गया?
जिसको बाबा साइमन कमीशन से मिलकर अछूत होने का सर्टिफिकेट देंगे?

इन प्रश्नों के उत्तर खोजते ही सामाजिक न्याय और सामाजिक समरसता दोनों को ही श्मशान का मुंह देखना पड़ेगा।
पड़ेगा कि नहीं?

तो भैया चलती हुई दुकान बंद करवाने को कौन तैयार है ?
#सामाजिक_न्याय वाले या #सामाजिक_समरसता वाले?

मेरे प्रश्न का उत्तर कौन देगा?

वे तीन हजार साल का हल्ला मचा रहे है कितने वर्षों से। भारत की सरकार ने 1000 साल का एफिडेविट सुप्रीम कोर्ट में दिया है।

मैं 200 से कम समय का समयकाल प्रमाण के साथ दे रहा हूँ।

लेकिन कारण तो बताओ कि क्या वही कारण है इनके अछूत पने का जो तुमको तुम्हारा ही नाश करने वालो ने बताया है ?

#सामाजिक_न्याय_और_समरसता की पोल खोल: पार्ट 2

यह पुस्तक प्रथम बार 1971 में छपी थी।
50 वर्ष हो गए इसको छपे हुए।
लेकिन यह भारत के किसी भी विद्यालय के पुस्तकालय में नही उपलब्ध होगी।
यदि इस पुस्तक को पढ़कर ही यदि इतिहास का आकलन किया जाय तो #सामाजिक_न्याय और सामाजिक समरसता का सारा खेल नष्ट हो जाय।
इसी पुस्तक के छपने के आस पास ईसाई एजेंटो ने एक फैंटेसी के आधार पर लेखन शुरू किया जिसको सबाल्टर्न लेखन कहते हैं। इन एजेंटो को पूरे विश्व मे सम्मानीति किया जाता है। क्यों ?
जिससे भारत के विरुद्ध अंदुरुनी सॉफ्ट पावर तैयार किया जा सके।
धरमपाल जी ने यह सिद्ध किया है कि 1800 के पूर्व ब्रिटेन में आम किसान मजदूर  और शिल्पी  के बच्चे को शिक्षा उपलब्ध नही थी। शिंक्षा मात्र एलीट क्लास को उपलब्ध थी।
फिर भारत की गुरुकुल प्रणाली को चुराकर उन्होंने अपने आमजन को शिक्षित करना शुरू किया जिसका नाम मोनीटोरिअल या एंड्रू बेल लंकास्टर सिस्टम का नाम दिया गया। धरमपाल जी ने बताया कि 1792 में ब्रिटेन में स्कूल जाने वालों की संख्या 40,000 थी जो 1818 में बढ़कर 6,74,883 और 1851 में 21,44,377 हो गयी।
इनमें भी स्कूल अटेंड  करने का  एवरेज समय काल 1835 मे एक घण्टा और 1851 में दो घण्टा था।

धरमपाल जी ने उस झूंठ का भी पर्दाफाश किय्या है जो ईसाइयो और वामपंथियों ने फैलाया है कि शूद्रों को 3000 साल से शिंक्षा से वंचित रखा गया था।

1820 से 1835 तक भारत मे स्कूलों और छात्रों के बारे में एकत्रित आंकड़ों के द्वारा धरमपाल जी ने यह प्रमाणित किया है कि भारत के लगभंग हर गाँव मे एक या एक से अधिक स्कूल थे। जिनमें पढ़ने वाले शूद्र छात्रों की संख्या अन्य वर्ण के छात्रों की संख्या से बहुत अधिक थी। और यह बात सम्पूर्ण भारत मे सर्वत्र एक समान रूप से लागू होती है।

ज्ञातव्य है कि मैकाले के पूर्व शिंक्षा व्यवस्था ब्राम्हणो के हाँथ में थी और वे वेतन भोगी शिक्षक नही थे। पढ़ने वाले छात्र यथाशक्ति जो भी गुरु सेवा में अर्पित करते थे वही उनके जीवन यापन का साधन था।
( पुस्तक के इंट्रोडक्शन से उद्धरित)

अब इस बात का विश्लेषण होना चाहिये कि यदि ऐसा था तो आने वाले दिनों में ऐसा क्या हुवा जिसके कारण 2 से 3 करोड़ लोग 1850 और 1900 के बीच मे मौत के मुहं में समा गये। या उनकी सोच समझ कर हत्या कर दी गयी। और बंचे हुए लोगों में से  करोड़ो लोग उस स्थिति में रहने को बाध्य हुए जिनको अछूत ठहराया गया। यहां तक कि वह आज भी संविधान में अछूत घोसित होने के कारण स्वयं को अछूत ही समझते है ?
इसका जिम्मेदार कौन था?

क्या वेद शास्त्र पुराण या दस्यु ईसाइयो की लूटनीति फूटनीति और कूटनीति ?

इस पर राजनैतिक पार्टियां क्या बहस करने को तैयार हैं?

क्या आप बहस करने को तैयार हैं?
इंटरनेट युग मे सूचनाओं का प्रसारण ही सत्य की खोज है।

इसको कॉपी पेस्ट करके हर आदमी तक यह सच पहुंचाइये।

पुस्तक की पीडीएफ लिंक।
http://bit.ly/1RxnrsC
PDF direct download linkत

#सामाजिक_न्याय_के_ढोल_में_पोल: पार्ट 3
 आधुनिक इतिहासकार और संविधान सामाजिक न्याय का आधार 3000 साल से शूद्रों पर सवर्णो द्वारा किये गए अत्याचार के झूंठ को  एक सच की तरह प्रसारित करता आया है। विशेष तौर पर उंनको शिंक्षा न देने को वह इसका सबसे बड़ा कारण मानता है। Dr. UditRaj NewDelhi जैसे लोग कहते हैं कि आरक्षण कोई गरीबी हटाओ योजना नही है वरन यह सामाजिक न्याय का मसला है जो कि हजारों वर्ष से किये गए शोषण के कारण दिया जा रहा है।
लेकिन प्रामाणिक इतिहास बताते हैं कि यह झूंठ कुसूचनाओं को आधार बना कर रचा गया है।
धरमपाल जी ने ईस्ट इंडिया कंपनी के द्वारा 1820 से 1830 के बीच एकत्रित किये डेटा के अनुसार मैकाले शिंक्षा के पूर्व जब शिंक्षा मुख्यत: ब्राम्हणो के हाँथ में थी तो शिंक्षा पाने वाले छात्रों में शूद्रों का नंबर ब्राम्हण क्षत्रिय और वैश्यों से अधिक थी।
उन्होंने अपनी पुस्तक "The Beautiful Tree" में ब्रिटिश कलेक्टर के द्वारा मालाबार के डेटा का विश्लेषण करते हुए लिखा :
" एस्ट्रोनॉमी पढ़ने वाले 808 छात्रों में ब्रामहण मात्र 78 छात्र थे। मेडिसिन पढ़ने वाले 194 छात्रों में ब्रामहण छात्र मात्र 31 थे। राजमुंदरी में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों में 5 छात्र शूद्र वर्ण के थे। मद्रास प्रेसीडेंसी के सर्वे के अनुसार मेडिसिन और सर्जरी की प्रक्टिस करने वाले लोगों में कई जातियों के लोग थे। ब्रिटिश डॉक्टरों के अनुसार उन सबमे सबसे अच्छे सर्जन नाई ( बार्बर) थे।
मालाबार में ही प्राइवेट ट्यूटर्स के द्वारा दी जा रही उच्च शिक्षा में एस्ट्रोनॉमी की शिक्षा पाने वाले कुल 496 छात्र थे, जिनमे 78 ब्राम्हण वर्ण से थे और 195 छात्र शूद्र वर्ण से थे। उसी तरह मेडिकल साइंस की शिक्षा पाने वाले कुल 100 छात्र थे जिसमें 31 छात्र ब्राम्हण वर्ण से थे और 59 छात्र शूद्र वर्ण से थे।"
( प्रमाण भी है तथ्यात्मक)

यह डॉक्यूमेंट इस बात का प्रमाण है कि भारत का समाजशास्त्र और इतिहास झूंठ का पुलिंदा मात्र है।

दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि यदि यह एक सच्चाई है तो आने वाले 100 वर्षो में क्या हुवा कि 1850 से 1900 के बीच 2 से 3 करोड़ लोग भूंख से मर जाते हैं। और करोड़ों लोग अछूत की भांति जीने को बाध्य हो गए?
जब पेट की आग न बुझ सके तो शिंक्षा को कौन खोजेगा?

इन प्रश्नों के उत्तर कौन देगा?
साभार
Tribhuwan Singh संकलन अजय कर्मयोगी

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