बुधवार, 18 दिसंबर 2013

"भारत में जिस व्यक्ति के घर में भी मैं कभी गया, तो मैंने देखा की वहाँ सोने के सिक्कों का ढेर ऐसे लगा रहता हैं, जैसे की चने का या गेहूं का ढेर किसानों के घरों में रखा जाता है। भारतवासी इन सिक्को को कभी गिन नहीं पाते क्योंकि गिनने की फुर्सत नही होती है इसलिए वो तराजू में तौलकर रखते हैं। किसी के घर में 100 किलो, इसी के यहा 200 किलो और किसी के यहाँ 500 किलो सोना है, इस तरह भारत के घरों में सोने का भंडार भरा हुआ है।"

-- 'थॉमस बैबिंगटन मैकाले' द्वारा 2 फ़रवरी 1835 को ब्रिटिश संसद दिया भाषण

ऐसा था हमारा प्यारा भारत..."सोने की चिड़िया".....जो इन गोरे और काले अंग्रेजों ने लूट लिया।

सोचिए जरा !!
जय हिन्द !
मुद्राओं के अभ्यास से गंभीर से गंभीर रोग समाप्त होने के साथ सिद्धि भी मिलती है और शोक मिटकर जीवन में सुख शांति आती है । अपने सारे ज्ञात अज्ञात पाप, दोष, गलतियों को गुरु यंत्र के नीचे समर्पित करने के उपरांत ॐ तत्सवितुर्वरेणियम सर्व दोष पापान निवृत्तय धियो योनः प्रचोदयात ,मन्त्र से समर्पित करें साधना से पूर्व और साधना के बाद मूल मंत्र का उच्चारण करते हुए 5 साफल्य मुद्राएँ प्रदर्शित करनी चाहिए। एक एक मुद्रा को आप 10 सेकंड से लेकर 2 मिनट तक भी प्रदर्शित करें तो पर्याप्त हैं, जैसी आपकी अनुकूलता हो। ये 5 साफल्य मुद्राएँ हैं.... मत्स्य, दंड, शंख, अभय और हृदय। इनसे ऊर्जा स्रोत को जाग्रत करने के लिए मुद्रओं का अभ्यास सहायक सिद्धि होता है। इससे अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों की प्राप्ति संभव है। यह संपूर्ण योग का सार स्वरूप है। यौगिक और तांत्रिक दृष्टि योग मुद्राओं में योनि मुद्रा को खास महत्व मिला हुआ है। योग में यह मुद्रा प्राणवायु के लिए उत्तम मानी गई है और बड़ी चमत्कारी मुद्रा है पहले किसी भी सुखासन की स्थिति में बैठ जाएं। फिर दोनों हाथों की अंगुलियों का उपयोग करते हुए सबसे पहले दोनों कनिष्ठा अंगुलियों को आपस में मिलाएं और दोनों अंगूठे के प्रथम पोर को कनिष्ठा के अंतिम पोर से स्पर्श करें। फिर कनिष्ठा अंगुलियों के नीचे दोनों मध्यमा अंगुलियों को रखते हुए उनके प्रथम पोर को आपस में मिलाएं। मध्यमा अंगुलियों के नीचे अनामिका अंगुलियों को एक-दूसरे के विपरीत रखें और उनके दोनों नाखुनों को तर्जनी अंगुली के प्रथम पोर से दबाएं। इसका आध्यात्मिक लाभ : योनि मुद्रा बनाकर और पूर्व मूलबंध की स्थिति में सम्यक् भाव से स्थित होकर प्राण-अपान को मिलाने की प्रबल भावना के साथ मूलाधार स्थान पर यौगिक संयम करने से कई प्रकार की सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं भौतिक लाभ : अंगूठा शरीर के भीतर की अग्नि को कंट्रोल करता है। तर्जनी अंगुली से वायु तत्व कंट्रोल में होता है। मध्यनमा और अनामिका शरीर के पृथ्वी तत्व को कंट्रोल करती है। कनिष्ठा अंगुली से जल तत्व कंट्रोल में रहता है। इसके निरंतर अभ्यास से जहां सभी तत्वों को लाभ मिलता है वहीं इससे इंद्रियों पर नियंत्रण रखने की शक्ति बढ़ती है। इससे मन को एकाग्र करने की योग्यता का विकास भी होता है। यह शरीर की नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त कर सकारात्मक का विकास करती है। इससे हाथों की मांसपेशियों पर अच्छा खासा दबाव बनता है जिसके कारण मस्तिष्क, हृदय और फेंफड़े स्वस्थ बनते हैं

मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

जो लोग इस घातक भ्रम मेँ हैँ भारत की समस्याओँ का समाधान "सत्ता परिवर्तन" मात्र से हो जाएगा वो थोड़ा इतिहास का ठीस से अध्ययन कर लेँ क्योँकि देश का भला सत्ता परिवर्तन से नहीँ होगा, "व्यवस्था परिवर्तन" से होगा और हाँ, ये बात मैँ नहीँ कह रहा हूँ । ये दर्शनोपदेश तो अवधनरेश मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र ने विभीषण को लंका मेँ रावणवधोपरान्त दिया था । विस्तारपूर्वक जानने के लिये यूट्यूब पर राजीव दीक्षित रामकथा सुनेँ ।
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रामराज्य
http://m.youtube.com/watch?gl=US&hl=en-GB&client=mv-google&v=qUl_PRhLnA0
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संपूर्ण रामकथा ।
http://m.youtube.com/watch?gl=US&hl=en-GB&client=mv-google&v=xUAd8lmEmvg
यूरोप के सभी बड़े दार्शनिक मानते है की शरीर का आनंद ही चरम आनंद है और भारतवासी मानते है की इश्वर प्राप्ति का आनंद ही चरम आनंद है | इसीलिए यूरोप में जो भी किया जाता है वो शरीर के सुख के लिए किया जाता है और भारत में सब काम इश्वर प्राप्ति और मोक्ष प्राप्ति के लिए किया जाता है | यूरोप और अमेरिका वाले सिर्फ शरीर का सुख चाहते है और शरीर का सुख एक तरीके से लेने के बाद उसमे उब हो जाती है फिर दुसरे तरीके से लेते है फिर उसमे उब होने के बाद तीसरे तरीके से ...इसी तरह चलता है क्योंकि शरीर का सुख ही सबकुछ है और वो ही जीवन का अंतिम लक्ष है | उनका मानना है के ये शरीर एक बार ही मिला है और आगे मिलेगा की नही पता नही क्योंकि न ही वो पुनर्जनम को मानते है न ही पुर्वजनम को इसीलिए शरीर का जितना सुख लेना है ले लो जितना भोग करना है कर लो उसके लिए समलैंगिकता में जाना पड़े तो जाओ किसी और काम में जाना पड़े तो चले जाओ | ये सब कुछ प्राप्ति है शरीर के माध्यम से इसीलिए पश्चिम में समलैंगिकता एक बहुत बड़ा प्रश्न है | पश्चिम के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री को समलैंगिकता के प्रश्न पर चुनाव से पहले वादा करना पड़ता है, बाद में कानून भी बनाना पड़ता है उन लोगो के लिए |
भारत के लोग पुर्वजनम और पुनर्जनम दोनों को मानते है और शरीर के सुख को कभी अंतिम सुख नही माना है तो भारत में प्रश्न अलग है, मान्यता अलग है, उसके हिसाब से व्यवस्था भी अलग है इसलिए भारत में समलैंगिकता कोई बिषय नही है |

लेकिन पश्चिम की और पश्चिम की पैसो से पोषित मीडिया ने भारत में समलैंगिकता का विषय बनना चाहिए, इसपर बहस होनी चाहिए, समाज में बटवारा होना चाहिए उसकी पूरी ताकत लगाकर कौशिश कर रहे है | अगर भारतमे ये विषय चल पड़ा और भारत के लोगो द्वारा स्वीकृत हो गया तोह कितना बड़ा बाज़ार उनको भारत में मिल जायेगा समलैंगिक लोगो के बस्तुयों के बिक्री के लिए | उनको सिर्फ भारत का बाज़ार दिखाई देता है और भारत के मूल बिषय को बदलने के लिए इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट मीडिया के जरिये कौशिश कर रहे है |

http://www.youtube.com/watch?v=PMC-WGwDG3Q

राजीव भाई ने बताया था कि इन 63 सालों में 80 करोड गायों को मौत के घाट उतारा जा चुका है..............सरकार की अनुमति से 35,000 कतलखाने चल रहे हैं ...............एक एक गाय करोड रुप्ये का फ़ायदा देने वाली है ऒर माता कहने वाले लोग चुप बैठे उसे कटते देख रहे है

VADIK SAMADHAN GURUKUL

भारत जैसे गोपालक देश को गोनाशक बनाने की तैयारी

अमेरिकी कृषि विभाग हमारा मखौल उड़ाते हुए पूछ रहा है की

"यह जानना रुचिकर है की जो देश गाय को पवित्र मान कर पूजा करता है वो देश दुनिया का 

सबसे बड़ा गोमांस निर्यातक देश लगभग बन चुका है"

टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपी आज की एक रिपोर्ट के बहुत सी बातो पर प्रकाश डालती है ज़रूर पढ़े

और राजीव भाई को सुनकर ज़रूर बताएं की गोमाता को बचाने के लिए आपने व्यक्तिगत स्तर पर क्या किया?

http://timesofindia.indiatimes.com/business/india-business/In-the-land-of-the-holy-cow-fury-over-beef-exports/articleshow/27235745.cms
 — with Amit Yadav and 54 others.

Vishwa Bandhu Gupta exposed Fake Currency Scam of Congress Government an...

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...