रविवार, 14 जनवरी 2018

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vatt  prakrti
1. शारीरिक गठन - वात प्रकृति का शरीर प्राय: रूखा, फटा-कटा सा दुबला-पतला होता है, इन्हें सर्दी सहन नहीं होती।

2. वर्ण - अधिकतर काला रंग वाला होता है ।

3. त्वचा - त्वचा रूखी एवं ठण्डी होती है फटती बहुत है पैरों की बिवाइयां फटती हैं हथेलियाँ और होठ फटते हैं, उनमें चीरे आते हैं अंग सख्त व शरीर पर उभरी हुर्इ बहुत सी नसें होती हैं ।

4. केश - बाल रूखे, कड़े, छोटे और कम होना तथा दाढ़ी-मूंछ का रूखा और खुरदरा होना ।

5. नाखून - अंगुलियों के नाखूनों का रूखा और खुरदरा होना ।

6. आंखें - नेत्रों का रंग मैला ।

7. जीभ - मैली

8. आवाज - कर्कश व भारी, गंभीरता रहित स्वर, अधिक बोलता है ।

9. मुंह - मुंह सूखता है ।

10. स्वाद - मुंह का स्वाद फीका या खराब मालूम होना ।

11. भूख - भूख कभी ज्यादा कभी कम, पाचन क्रिया कभी ठीक रहती है तो कभी कब्ज हो जाती है, विषम अग्नि, वायु बहुत बनती है ।

12. प्यास - कभी कम, कभी ज्यादा ।

13. मल - रूखा, झाग मिला, टूटा हुआ, कम व सख्त, कब्ज की प्रवृत्ति ।

14. मूत्र - मूत्र का पतला जल के समान होना या गंदला होना, मूत्र में रूकावट की शिकायत होना ।

15. पसीना - कम व बिना गन्ध वाला पसीना ।

16. नींद - नींद कम आना, ज्यादा जम्हाइयां आना, सोते समय दांत किटकिटाने वाला ।

17. स्वप्न - आकाश में उड़ने के सपने देखना ।

18. चाल - तेज चलने वाला होता है ।

19. पसन्द - नापसन्द - सर्दी बुरी लगती है, शीतल वस्तुयें अप्रिय लगती हैं, गर्म वस्तुओं की इच्छा अधिक होती है मीठे, खटटे, नमकीन पदार्थ विशेष प्रिय लगते हैं ।

20. नाड़ी की गति - टेढ़ी-मेढ़ी (सांप की चाल के समान) चाल वाली प्रतीत होती है, तेज और अनियमित नाड़ी । 

शनिवार, 6 जनवरी 2018


बहुत ही गहरी जड़ें है हिन्दू धर्म की....

विज्ञान कहता है कि धरती पर जीवन की उत्पत्ति 60 करोड़ वर्ष पूर्व हुई एवं महाद्वीपों का सरकना 20 करोड़ वर्ष पूर्व प्रारंभ हुआ, जिससे पांच महाद्वीपों की उत्पत्ति हुई। स्तनधारी जीवों का विकास 14 करोड़ वर्ष पूर्व हुआ। मानव का प्रकार (होमिनिड) 2.6 करोड़ वर्ष पूर्व आया, लेकिन आधुनिक मानव 2 लाख वर्ष पूर्व अस्तित्व में आया। पिछले पचास हजार (50,000) वर्षों में मानव समस्त विश्व में जाकर बस गया। विज्ञान कहता है कि मानव ने जो भी यह अभूतपूर्व प्रगति की है वह 200 से 400 पीढ़ियों के दौरान हुई है। उससे पूर्व मानव पशुओं के समान ही जीवन व्यतीत करता था।

हिन्दू धर्म में धरती के इतिहास की गाथा पांच कल्पों में बताई गई है। ये पांच कल्प है महत्, हिरण्य, ब्रह्म, पद्म और वराह। वर्तमान में चार कल्प बितने के बाद यह वराह कल्प चल रहा है। यदि हम युगों की बात करेंगे तो 6 मन्वंतर अपनी संध्याओं समेत निकल चुके, अब 7वां मन्वंतर काल चल रहा है जिसे वैवस्वत: मनु की संतानों का काल माना जाता है। 27वां चतुर्युगी (अर्थात चार युगों के 27 चक्र) बीत चुका है। और, वर्तमान में यह वराह काल 28वें चतुर्युगी का कृतयुग भी बीत चुका है और यह कलियुग चल रहा है।
यह कलियुग ब्रह्मा के द्वितीय परार्ध में वराह कल्प के श्‍वेतवराह नाम के कल्प में और वैवस्वत मनु के मन्वंतर में चल रहा है। इसके चार चरण में से प्रथम चरण ही चल रहा है। इसलिए इत‍ने युगों का इतिहास बताना हमारे बस की बात नहीं। लेकिन हम स्वायंभुव और वैवस्वत: मनु के मन्वंतर से ही हम हिन्दू धर्म की पुन: शुरुआत मानकर इसके इतिहास की गणना करते हैं। इतिहास में शिव, स्वायंभुव मनु, ययाति, वैवस्वत मनु, ऋषि कश्यप, राम और श्रीकृष्ण के जीवन और उनके कुल खानदान के बारे में विस्तार से जानना चाहिए। चार धाम सहित सप्तपुरी का इतिहास भी पढ़ें।
हिन्दू धर्म के इतिहास को शोधकर्ता लगभग 90 हजार वर्षों से कहीं ज्यादा का बताते हैं। 10 हजार वर्ष पहले भाषा का अविष्कार हुआ था। दुनिया की सबसे प्राचीन भाषा संस्कृत को माना जाता है। प्राचीन काल में संस्कृत ब्राह्मी और देवनागरी लिपि में लिखी जाती थी। यहां प्रस्तुत है वराह कल्प के हिन्दू धर्म के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पड़ाव।

1. ब्रह्म काल (सृष्टि के प्रारंभ से मनुष्य रचना तक)
* पंच कोषों वाली इस सृष्टि का न आदि है और न अंत।
* ब्रह्म से आदिपुरुष और आदिशक्ति का जन्म हुआ। वे ही त्रिदेवों को जन्म देने वाले हैं।
* आदिपुरुष को सदाशिव और आदिशक्ति को दुर्गा कहा गया।
2. ब्रह्मा काल (प्रजापति ब्रह्मा, विष्णु और शिव का काल)
* पंच कल्प महत, हिरण्यगर्भ, ब्रह्म, पद्म और वराह कल्प की कहानी।
* वराह कल्प में हुई नए सिरे से जीव सृष्टि और त्रिदेवों की उत्पत्ति।
* इसी काल में ब्रह्मा के 10 पुत्रों के कुल का विस्तार हुआ।
* इसी काल में नर-नारायण, दत्तात्रेय, कपिल आदि वराह, श्वेत वराह, नृसिंह, हररुद्र अन्धक और वामन अवतार हुआ।
* इसी काल में प्रसिद्ध देवासुर संग्राम हुआ।
* इसी काल में वेदों का ज्ञान अवतरित हुआ।
* इसी काल में त्रिपुरासुर, ताड़कासुर और महिषासुर का वध हुआ।
3. स्वायम्भुव मनु काल : (अनुमानित 9057 ईसा पूर्व से प्रारंभ)
* स्वायम्भुव मनु-सतरूपा के दो पुत्र प्रियव्रत और उत्तानपाद थे।
* इन पुत्रों के कुल से ही धरती पर मानवों का विस्तार हुआ।
* उत्तानपाद के सुनीति से ध्रुव तथा सुरुचि से उत्तम नामक पुत्र उत्पन्न हुए।
* प्रियव्रत के बहिर्ष्मती से आग्नीध्र, यज्ञबाहु, मेधातिथि आदि 10 पुत्र हुए। आग्नीध्र संपूर्ण धरती के राजा थे।
* प्रियव्रत की दूसरी पत्नी से उत्तम, तामस और रैवत ये 3 पुत्र उत्पन्न हुए, जो अपने नाम वाले मन्वंतरों के अधिपति हुए। इन्हीं के काल में यज्ञावतार हुआ।
* प्रियव्रत के कुल में ही प्रथम जैन तीर्थंकर ऋषभनाथ का जन्म हुआ।
* ऋषभनाथ के पुत्र भरत और बाहुबली थे। भरत के नाम पर ही भारतवर्ष का नामकरण हुआ।
4. वैवस्वत मनु काल : (6673 ईसा पूर्व से)
* इसी काल में कच्छप, मत्स्य और परशुराम अवतार हुए।
* वैवस्वत मनु के 10 पुत्र हुए। इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यन्त, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध।
* इक्ष्वाकु कुल में कई महान प्रतापी राजा, ऋषि, अरिहंत और भगवान राम हुए हैं।
* इसी काल में वशिष्ठ-विश्वामित्र की लड़ाई और राजा सुदास का दाशराज युद्ध हुआ।
* यही काल मेहरगढ़ (बलूचिस्तान) सभ्यता का काल भी है।
5. राम का काल : (5 114 ईस्वी पूर्व से 3000 ईस्वी पूर्व के बीच)
* भगवान श्रीराम का जन्म वैवस्वत मनु की 40वीं पीढ़ी में हुआ।
* प्रभु श्रीराम का युद्ध रावण, बाली और अन्य कई योद्धाओं से हुआ।
* हनुमान, सुग्रीव, विभीषण, जामवंत, नल, नील आदि सभी श्रीराम के साथ थे।
* इस काल में महर्षि वाल्मीकि, मातंग ऋषि, अत्रि, भारद्वाज आदि ऋषि हुए।
* रामायण में उस काल का इतिहास दर्ज है।
* इसी काल में पुरुवा ऋषि ने वेदों को पुनर्स्थापित कर 3 भागों में विभाजित किया।
6. कृष्ण का काल : (3112 ईस्वी पूर्व से 2000 ईस्वी पूर्व के बीच)
* श्रीकृष्ण के काल को महाभारत का काल कहा जाता है।
* इस काल में भारत 16 महाजनपदों में बंटा हुआ था।
* 16 जनपदों में छोटे बड़े-मिलाकर 200 उप-जनपद थे।
* लगभग 30 जनपदों ने महाभारत युद्ध में भाग लिया था।
* महाभारत में इस काल का इतिहास दर्ज है।
* इसी काल में ऋषि वेदव्यास ने वेदों को 4 भागों में विभाजित किया।
* यही काल सिंधु, सरस्वती, गंगा, ब्रह्मपुत्र और नर्मदा घाटी सभ्यता का काल भी है।
* सिंधु-सरस्वती सभ्यता के लगभग 1,000 नगरों का पता चला है।
* इसमें प्रमुख हैं- हड़प्पा, मोहन-जो-दड़ो, चन्हूदड़ों, लोथल, कालीबंगा, हिसार, बणावली आदि।
7. आर्य सभ्यता का काल : (1500-500 ईस्वी पूर्व के बीच)
* सिन्धु-सरस्वती घाटी की सभ्यता के पतन के बाद जो सभ्यता अस्तित्व में आई, उसे वैदिक युग कहा गया।
* वैदिक लोगों ने ही सनातन धर्म को फिर से संपूर्ण धरती पर कायम किया।
* इस काल का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है।
* वेदों को लिखित रूप में इसी काल में स्थापित किया गया था।
8. तीर्थंकर महावीर और बुद्ध का काल : (563 ईसा पूर्व से 600 ईस्वी तक)
* इस काल में वत्स राज्य पर उदयन और अवंति पर प्रद्योत का राज था।
* इसी काल में मगध पर सम्राट बिम्बिसार राजगद्दी पर आसीन थे।
* बाद में उज्जयिनी के राजा विक्रमादित्य ने अखंड भारत पर राज किया।
* इसी काल में शक, हूण, कुषाण और यवनों का आक्रमण हुआ।
* इसी काल में सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक ने संपूर्ण भारत पर राज किया।
* इसी काल में मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद गुप्त साम्राज्य का उदय हुआ।
* इस काल के अंतिम राजा सम्राट हर्षवर्धन और राजा भोज थे।
* इसके बाद भारत में इस्लामिक खलीफाओं की सेना ने घुसपैठ कर भारत का विध्वंस शुरू किया, जो अब तक जारी है...। मध्यकाल में मराठा, सिख, राजपूत, जाट, गुर्जर, पटेल और ‍दक्षिण के वर्मन आदि राजाओं ने इस्लामिक आक्रंताओं को रोकने का प्रयास किया। बाद में अंग्रेजों ने अखंड भारत के क्षेत्रों पर कब्जा कर इस अपना उपनिवेश बना लिया।...

ॐ तत्सत्..

गुरुवार, 4 जनवरी 2018

ब्रह्म जानाति ब्राह्मण

bharat ka gyan gurukukul system



रेतीले धोरों वाला मरुभूमि राजस्थान एक वैभवशाली अनूठा प्रदेश हैं ! यहां की रंग-रंगीली वेशभूषा, रेतीले टीलों के पीछे धीमे स्वर में उठने वाला सुरीला संगीत, कलात्मक लोक नृत्य, स्वादिष्ठ खानपान, कलात्मक चित्रकारी व स्थापत्य कला की तो पूरे विश्व में धूम है ही, इसके अलावा इस वीर भूमि के इतिहास में कुछ ऐसी अनूठी परम्परायें हैं जो दुनियां के किसी भी देश के इतिहास में देखने को नही मिलती हैं ! युवराज को बचाने के लिये अपने पुत्र को बलिदान कर देने वाली पन्ना धाय जैसी मां के अलावा भी यहां एक वृक्ष बचाने के लिए आज से ढ़ाई सौ वर्ष पूर्व तीन सौ तिरेसठ स्त्री-पुरुषों का बलिदान रेत पर लिखी एक ऐसी महान गाथा हैं जिसे सुनकर हर व्यक्ति रोमांचित हुए बिना नही रह सकता हैं ! जिस एक पेड़ को बचाने के लिये विश्व कि सबसे बड़ी कुर्बानी दी गई वह वृक्ष है राजस्थान का सर्वाधिक महत्तवपूर्ण ‘‘खेजड़ी ‘‘ का वृक्ष ! इस वृक्ष को राजस्थान में कल्पवृक्ष के समान माना गया है ! खेजड़ी वृक्ष की बहुउपयोगिता को देखते हुये ही राजस्थान सरकार द्वारा इस वृक्ष को राज्य वृक्ष घोषित कर संरक्षित वृक्षो की सूची में शामिल किया है ! जोधपुर से महज पच्चीस किलोमीटर दूर आज से 285 वर्ष पूर्व सन् 1730 में खेजड़ी के वृक्ष को बचाने के लिए विश्नोई समाज के लोग एक के बाद एक कर पेड़ों से लिपटते रहे और राजा के कारिंदे उनको कुल्हाड़ियों से काटते रहे ! उनका एक ही लक्ष्य था कि “सिर सांचे रूंख रहे तो भी सस्ता जाण” यानि सिर कटने से पेड़ बचता है तो भी सस्ता मान ! पेड़ बचाने के लिए कुल 363 नर-नारियों ने अपना बलिदान दिया ! खून की नदी बह उठी, लेकिन राजा के कारिंदे नहीं थमे। ! आखिरकार राजा के आदेश पर भादवा सुदी दशम को यह क्रम थमा ! पूरी दुनिया में कहीं ऐसा उदाहरण नहीं है कि पेड़ों के बचाने के लिए एक साथ इतनी बड़ी संख्या में अपना बलिदान दिया हो ! सन् 1730 की भाद्रपद सुदी दशमी के दिन ‘‘खेजड़ी ‘‘ग्राम में ‘‘खेजड़ी‘‘ वृक्ष को बचाने के लिए तीन सौ तिरेसठ लोगों द्वारा किया गया बलिदान मनुष्य के प्रकृति प्रेम की अनोखी मिसाल हैं ! जोधपुर के राज अभयसिंह को अपने नए महल निर्माण के लिए चूने को पकाने के लिए लकड़ियों की आवश्यकता थी ! राजा का दीवान गिरधर दास भंडारी आज्ञा की पालना में कारिंदों को लेकर शहर से पच्चीस किलोमीटर दूर खेजड़ला स्थान पर पहुंच गया ! खेजड़ी के वृक्ष काटने को सूचना पर वे वहां एकत्र हो गए ! उन्होंने इसका विरोध किया, लेकिन दीवान नहीं माना ! उसने पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलाने का आदेश दिया ! इस पर अमृता देवी नाम की महिला ने पहल करते हुए खेजड़ी के वृक्ष पर बाहे डाल खड़ी हो गई ! राजा के कारिंदे इस पर नहीं रुके और उन्होंने अमृता देवी को कुल्हाड़ी से काट डाला ! इसके बाद एक-एक कर लोग आगे आते रहे और कटते रहे, लेकिन राजा के कारिंदे नहीं थमे ! एक-एक कर 84 गांवों के 217 परिवारों के 363 नर-नारियों ने इस अद्वितीय यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति दे दी ! इसकी सूचना राजा को मिली तो उसने इस पर रोक लगाई ! बाद में राजा ने आदेश जारी कर दिया कि मारवाड़ में कभी खेजड़ी का वृक्ष नहीं काटा जाएगा ! आज भी मारवाड़ में खेजड़ी के पेड़ को कहीं भी काटा नहीं जाता है ! खेजड़ला में हर साल भादवा सुदी दशम(इस बार 23 सितम्बर) को पेड़ बचाने को शहीद हुए इन 363 लोगों की याद में मेला भरता है ! विश्नोई समाज ने यहां पर शहीद स्मारक भी बनवा रखा है ! इस मेले में दूर-दूर से पर्यावरण विद् सहित बड़ी संख्या में लोग पहुंचते है ! इस दिन यहां होने वाले यज्ञ में करीब डेढ़ हजार किलोग्राम घी होम किया जाता है !  हमें कर्जदार होना चाहिए इन बलिदानियों का ! सरकार को भी चाहिए कि ऐसी बलिदान कथाओं को अपने पाठ्यक्रम में स्थान दे ! पाठक गणों से भी अनुरोध है कि इस शोर्य गाथा को अपने बच्चों को सुनाएं ! मित्रों को बताएं

गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

कर्मचारियों को बोनस में कार देता है यह बिजनेसमैन, बेटे ने की 5000 की नौकरी

कर्मचारियों को कार और फ्लैट देने वाले गुजरात के हीरा व्यवसायी के बारे में तो आपको याद ही होगा. पिछले दिनों गुजरात के हीरा व्यवसायी का नाम उस समय सुर्खियों में आया था जब उन्होंने अपने यहां काम करने वाले कर्मचारियों को दिवाली बोनस के रूप में गाड़ी और फ्लैट दिए थे.
  
   
नई दिल्ली : 
कर्मचारियों को कार और फ्लैट देने वाले गुजरात के हीरा व्यवसायी के बारे में तो आपको याद ही होगा. पिछले दिनों गुजरात के हीरा व्यवसायी का नाम उस समय सुर्खियों में आया था जब उन्होंने अपने यहां काम करने वाले कर्मचारियों को दिवाली बोनस के रूप में गाड़ी और फ्लैट दिए थे. हरे कृष्णा डायमंड एक्सपोर्ट के मालिक घनश्याम ढोलकिया ने इस बार दिवाली पर सुरक्षा का संदेश देते हुए अपने कर्मचारियों को ऐसा गिफ्ट दिया था कि उनके इस कदम से सभी हैरान थे. दरअसल इस बार उन्होंने हेलमेट गिफ्ट किया. इसके माध्यम से उन्होंने जिंदगी बचाने का संदेश दिया.
लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि करोड़ों का कारोबार करने वाले घनश्याम ढोलकिया के बेटे ने जिंदगी की शुरुआत में कितने रुपए की नौकरी की होगी. मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक ढोलकिया के बेटे ने 5000 रुपए की नौकरी की थी. दरअसल 6000 करोड़ रुपए का कारोबार करने वाले घनश्याम ढोलकिया ने अपने हितार्थ ढोलकिया को जिंदगी का मतलब समझाने और अपने पैरों पर खड़े होने के लिए घर से बाहर भेज दिया था.

बुधवार, 27 दिसंबर 2017

कर्मयोगी वह जो अपने समय और ऊर्जा को उत्पादक कार्य में लगाएं । किसी व्यक्ति की सर्वाधिक भलाई के लिए चार प्रशस्त मार्ग हैं - कर्म योग, भक्ति योग, ज्ञान योग, और राज योग, जिसे कुछ लोग ध्यान योग भी कहते हैं । इन चारों मार्गों में से हमने जानबूझकर कर्म योग का मार्ग चुना है | मानसिक नियंत्रण का नहीं, ज्ञान का नहीं, भक्ति का नहीं, अपितु क्रियाशीलता का मार्ग । इसका अर्थ यह नहीं है कि भक्ति, ज्ञान और ध्यान का हमारे जीवन में कोई स्थान नहीं है। इन चारों रास्तों का जीवन में अलग अलग महत्व है, ये कोई अभेद्य कक्ष नहीं हैं ।

हमारे पूर्व में बंगाल की खाड़ी, पश्चिम में अरब महासागर और दक्षिण में हिन्द महासागर है। हमारी समझ में आसानी के लिए हमने उन्हें अलग अलग नाम दिये है। लेकिन वस्तुतः तो वे पानी की एक ही चादर है। इसी प्रकार हमने हमारी अपनी समझ के लिए इन चार रास्तों का नाम अलग अलग रखा है, लेकिन वे सब जीवन में एक दूसरे के पूरक हैं। जहां कर्म की प्रधानता है, वह कर्म योग है और जहां ज्ञान की प्रबलता है, वह ज्ञान योग है | 

नाम उस तत्व के अनुसार दिया जाता है जो कि प्रबल होता है। उदाहरण के लिए, हर एक में तीन मूल गुण होते हैं, राज, तमस और सत्व। सभी में ये तीनों गुण विद्यमान हैं। आप को कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिलेगा, जिसमें केवल सत्व गुण हो, मिलावट रहित रजोगुण हो, या केवल तमोगुण ही हो ।

जब आप कहते हैं कि कोई तामसी प्रकृति का है तो इसका मतलब है कि उसमें यह तत्व विशेष प्रमुखता से है। जब कोई व्यक्ति आलसी, सुस्त, उनींदा हो, जिसमें किसी कार्य को करने का कोई उत्साह नहीं हो, हमेशा निष्क्रिय रहना पसंद करता हो, उस व्यक्ति में तमोगुण की प्रबलता कहा जाता है | 

एक आदमी जो कुछ न कुछ करने को सदा उत्सुक रहे, जो कर रहा है, उसके साथ और भी बहुत कुछ करना चाहे, यहां से वहां, वहां से यहाँ कूदता रहे, हमेशा ऊंचाई पर रहना पसंद करे, लेकिन बहुत अहंकारी हो, तो उस गतिविधि अवतार में हम रजोगुण की प्रमुखता कहते है। ऐसे लोगों को राजसी व्यक्ति कहा जा सकता है। और एक व्यक्ति जो चिंतनशील है, तनाव की अवस्था में भी जिसका मन शांत रहता है, जिसका कोई भी कार्य निरर्थक नहीं होता, जो अकारण कूदफांद और नृत्य नहीं करता, हमेशा सही दिशा में चलता है, ऐसे व्यक्ति को एक सात्विक व्यक्ति कहा जा सकता है। 

व्यक्ति की कोई भी गतिविधि इच्छाओं से परे नहीं है; 'मुझे यह चाहिए, मुझे वह चाहिए होता ही है | किन्तु यदि गतिविधि उच्च जीवन मूल्यों से प्रेरित है, तो यह एक सात्विक व्यक्ति का लक्षण है।

मैंने केवल आपको समझाने के लिए इन्हें अलग अलग वर्णित किया है, किन्तु कोई व्यक्ति केवल सात्विक, राजसी या तामसी नहीं पाया जाता, आदमी में इन तीनों का मिश्रण होता है। एक तत्व प्रमुख हो सकता है, किसी व्यक्ति के जीवन में कभी एक तत्व की प्रमुखता हो सकती है, किन्तु संभव है कि बाद में कभी किसी दूसरा तत्व की प्रधानता हो जाए | और जीवन के तीसरे चरण में तीसरा गुण प्रभावी हो जाए । एक ही जीवन में, संभव है कि उस व्यक्ति में ये तीनों ही गुण दिखाई दें । जीवन का एक चरण दूसरे चरणों से भिन्न हो सकता है | लेकिन जब जिस तत्व की प्रधानता हो, उसे विशेष नाम तब ही दिया जाता है । 

इसी प्रकार, जब हम कर्म योग की बात करते हैं, तो इसका मतलब है कि मुख्यतः आप जो करना चाहते हैं, उसी अनुरूप आपने विषय चुना है | अगर आप कर्म के मार्ग पर जाते हैं, तो इसका अर्थ है कि राजयोग, भक्ति योग और ज्ञान योग इस कर्मपथ के अधीन होंगे। जब हम कहते हैं कि एक व्यक्ति कर्म योगी है, तो इसका मतलब है कि शेष सभी तीनों योग उसके जीवन में जो कुछ भी घटता है, कर्म के मार्ग में अलग अलग अनुपात में योगदान करते हैं। वे सहयोगी हैं | वे इस मार्ग के सहायक हैं। वे केवल उसे अधिक सक्रिय होने में सहायता करते हैं |

एक कर्म योगी का मतलब यह नहीं है कि वह कभी प्रार्थना नहीं करता। अगर किसी को भी कर्म योगी कहा जाए, तो इसका अर्थ यह भी नहीं है कि वह ध्यान नहीं करता, या उसे योगासन की ज़रूरत नहीं है, या उसे प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं है, उसे पूजा की जरूरत नहीं है या उसे दर्शन शास्त्र की ज़रूरत नहीं है, या किसी चीज के गहन अर्थ में नहीं जाना है; या उसे केवल अपने हाथों और पैरों से काम करना चाहिए; नहीं यह ऐसा नहीं है। इसका अर्थ केवल इतना है कि कर्म योगी जब प्रार्थना करता है, तो वह काम करने के लिए अधिक शक्ति प्राप्त करने और सही मार्ग दिखाने की प्रार्थना करता है। उसके लिए प्रार्थना आवश्यक है, लेकिन जो वह करना चाहता है, उसे सही ढंग से करने की सामर्थ्य पाने के लिए | उसकी प्रार्थना, उसे प्रेरणा देती है | वह प्रार्थना करने के लिए प्रार्थना नहीं करता है, बल्कि वह उसे कर्म करने के लिए प्रेरित करती है। प्रार्थना उसे ऊर्जा देती है और उसे सही मार्ग पर भी रखती है। वह प्रार्थना करेगा, लेकिन केवल और केवल प्रार्थना नहीं करेगा, अपने कार्य की कीमत पर प्रार्थना नहीं करेगा। अपनी गतिविधि की कीमत पर, वह प्रार्थना नहीं करेगा

एक कर्मयोगी प्रार्थना करेंगा, लेकिन वह देखेगा कि उसकी प्रार्थना, उसकी पूजा, कार्य को शक्ति प्रदान करने की दिशा में योगदान करे । उसे सही दिशा में काम करने के लिए अधिक प्रकाश मिले । इसका अर्थ यह नहीं है कि कर्म योगी ध्यान नहीं करेंगे; या वह योग का अभ्यास आदि कुछ नहीं करेगा; या वह प्राणायाम से दूर रहेगा; या उसका आध्यात्म से कोई लेनादेना नहीं होगा, नहीं वह इन सब आध्यात्मिक प्रथाओं का उपयोग करेगा क्योंकि उसे काम करना है। उसे पूरी दक्षता और तीव्रता के साथ काम करना है, अपने कार्य में अधिक दक्षता प्राप्त करने के लिए, वह योगाभ्यास करेगा; वह राज योग के माध्यम से जो सीखता है, उस सब का उपयोग करता है । उसे ध्यान केंद्रित करना और अधिक शक्ति देता है, उसे इससे और अधिक स्थिरता मिलती है, जो काम के लिए बहुत ज़रूरी है | यदि आपका मन विचलित है, तो आप ठीक से अपना नेटवर्क नहीं बना सकते। अतः "चित्तवृष्टि निरोधाः" विचारों पर नियंत्रण बहुत आवश्यक है।

कर्मयोगी अपने मन को स्थिर करने के लिए सभी प्रथाओं का उपयोग करेंगे, क्योंकि स्थिर मस्तिष्क के साथ ही वह कुशलतापूर्वक काम कर सकता है। इस प्रकार राजयोग का भी कर्म योगी के जीवन में एक विशेष स्थान है। ज्ञान योग भी चीजों के मूल में जाने के लिए आवश्यक है, सही परिप्रेक्ष्य को समझने के लिए तत्वमीमांसा आवश्यक है | जब आप ज्ञान योग के मार्ग पर चलते हैं, तो आप गूढ़ और गहन होते हैं और यदि आपने अपने दिमाग को चीजों के गहन अर्थ की खोज में जाने के लिए प्रशिक्षित कर लिया किया है, तो यह कर्म योग के लिए उत्कृष्टता, पूर्णता, परिशुद्धता के लिए बहुत सहायक होता है | यदि कोई सतही ढंग से सोचता और निर्णय लेने वाला है, फैसले पारित करता है, तो वह जीवन में बुरी तरह असफल हो जायेगा। यदि उसे गहन चिंतन और उचित परिप्रेक्ष्य में चीजों को समझने की आदत है, तो वह सफल होगा । लेकिन, कोई कुछ कहे; उस पर त्वरित प्रतिक्रिया देना, बिना समझे अपनी राय बनाना, गहन आपदा में फंसाता है । किसी बात के गहन अर्थ को समझकर सही परिप्रेक्ष में निर्णय लेना, एक कर्म योगी के लिए जरूरी है | अतः कर्म योगी के लिए ज्ञान योग, भक्ति योग और राज योग बहुत आवश्यक हैं। यह अलग बात है कि वह इनका उपयोग कर्मयोग के बेहतर क्रियान्वयन के लिए करता है। वह उनका अभ्यास करता है, उनका उपयोग करता है, ताकि वह अधिक कुशलता से, सही और प्रभावी तरीके से काम करने में सक्षम हो। यही उसके प्रकरण में अन्य तीन योगों की भूमिका है।

मान लीजिए, कि ध्यान करने से एक कर्मयोगी को कर्म से विरक्ति हो जाती है, वह जितना अधिक ध्यान करता है, उतना कर्म से दूर हो जाता है, तो इसका अर्थ है कि उसके ध्यान में कुछ गड़बड़ है। उनके ध्यान करने का तरीका बहुत ग़लत है । यदि उसने कर्म का मार्ग चुना है, तो जब वह ध्यान करता है, तो उसका ध्यान उत्पादक होना चाहिए। उसके लिए क्या उत्पादक है? उसे अपने काम को करने पर अधिक जोर देना चाहिए। अगर आधे घंटे के ध्यान से, व्यक्ति ऊर्जा से परिपूर्ण हो जाता है, वह उत्साह के साथ काम करने लगता है तो यह ध्यान उसके लिए उपयोगी है | और मान लीजिये कि यदि आपको यह लगता है कि योगासन करने से आपको नींद आ रही है, तो इसका अर्थ है कि आपके योगासन में कुछ गंभीर गड़बड़ है। आपने शीर्षासन किया, या अन्य कोई आसन किए, तो आपमें उत्साह का संचार होना चाहिए । किन्तु अगर आप निद्रा महसूस करते हैं, तो आपके योगों के साथ कुछ गंभीर गलत है। यदि आप कुछ विचार कर रहे हैं, तो उसका योगदान आपकी गतिविधि के लिए होना चाहिए। इसके लिए आप ईश्वर से प्रार्थना कर सकते हैं, जब आप परमेश्वर के साथ मिलकर काम करते हैं तो वह आपको प्रकाश देता है, जिससे आपका आत्मविश्वास बढ़ता है | इसलिए यदि आप कर्म योगी हैं, तो आपकी प्रार्थना आपको काम करने और अधिक काम करने के लिए प्रेरित करेगी। आपका चिंतन, सोच, ध्यान भी आपको काम करने और अधिक काम करने के लिए प्रेरित करेगा। सब कुछ आपको अधिक काम करने में मदद करना चाहिए। यही एकमात्र परीक्षण है |

यदि आप आज आधे घंटे ध्यान करते हैं, आप कल दो घंटे और अगले दिन चार घंटे ध्यान करते हैं, तो फिर अपने आप को कर्म योगी मत कहिये । आप कर्म योगी नहीं हैं, आप भ्रमित हैं। यदि आप कर्म योगी हैं तो सिर्फ आधे घंटे का ध्यान पर्याप्त होना चाहिए, अन्यथा आपके पास अन्य चीजों के लिए समय नहीं होगा। यदि आपने कर्म योग का मार्ग चुना है, तो फिर आधे घंटे का ध्यान पर्याप्त है, किन्तु वह केंद्रित और मजबूत होना चाहिए। इससे आपको पर्याप्त ताकत मिलेगी | आपकी प्रार्थना, ध्यान और अन्य सभी योग ठीक तरह से सिलसिलेवार होना चाहिए, यदि आप अपने मार्ग के प्रति निष्ठावान हैं, तो समय विभाजन ठीक से किया जाना चाहिए ।

मैंने इस उदाहरण को कई बार दिया है | जैसे कि हम हमारे भोजन में सांबर लेते हैं। सांबर में दाल, पानी और नमक का अनुपात क्या है?इसका बड़ा हिस्सा दाल और पानी है, जबकि नमक कम है। लेकिन यह कम नमक क्या करता है? हालांकि यह बहुत कम है, किन्तु यह पूरे सांबर को स्वादिष्ट बना देता है। यह सांबार में फैलता है, इसी प्रकार ध्यान, चिंतन और प्रार्थना आदि का अनुपात कर्म योगी के जीवन में होना चाहिए। हमारा कार्य दाल और पानी के अनुपात में होना चाहिए। और भगवान का ध्यान, उस नमक की तरह होना चाहिए। यह थोड़ा कम हो सकता है, लेकिन यह पूरे जीवन, संपूर्ण दैनंदिन दिनचर्या को स्वाद देता है। जब आप हार्मोनियम बजाते है, तो उसमें एक मुख्य वस्तु है | उसकी भूमिका क्या है? यह पार्श्व में सबसे पीछे है | उसी प्रकार आपकी सभी गतिविधियों में, आपके दिमाग का भगवान के साथ तालमेल होना चाहिए। सुबह, जब आप अपना दिन शुरू करते हैं, तो ध्यान से या प्रार्थना के माध्यम से, भगवान के साथ संवाद करें, उनका आशीष लें । यह आधा घंटा शेष साढ़े तेईस घंटे आपके दिमाग में रहेगा। यही आपको सही रास्ते पर रखेगा | यह आपको कभी भी अपना आधार खोने नहीं देगा | यही भगवान के साथ ध्यान या सम्वाद का उद्देश्य है। "

यदि हम इस अनुपात खो देते हैं, तो हम न तो यहां रहेंगे और न ही वहां होंगे। एक बार दायित्व स्वीकार करने का अर्थ है, कि हमने अपना रास्ता चुन लिया है। अगर हमने इस पथ को चुना है तो पूरी योजना कार्य उन्मुख होना चाहिए। इस प्रकार, कार्य के प्रति हमारी प्रतिबद्धता स्पष्ट हो जाती है - कर्मयोगैकनिष्ठः | फिर आसन, प्रार्थना, ध्यान, स्वाध्याय के सभी अभ्यास सार्थक और उद्देश्यपूर्ण बनते हैं और हमारे जीवन में सही अनुपात में स्थापित होते हैं। हम अपने समय की सही योजना बनायें, ताकि हम घर या कार्यस्थल पर हमारी सभी जिम्मेदारियों को पूरा कर सकें | और फिर हमारे दायित्व को पूरा कर सकें। 

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...