किस तरह हजारों वर्षों तक याद रखे गए वेद........
दुनिया के प्रथम ग्रंथ वेद में आज तक कोई परिवर्तन नहीं हुआ। इसका कारण है उसके छंदबद्ध होने की अद्भुत शैली और वेदपाठ करने की खास विधि। यही कारण है कि उनमें किसी भी प्रकार का जोड़-घटाव नहीं किया जा सकता। शोधकर्ता मानते हैं कि वेदों के मूल दर्शन और ज्ञान को सुरक्षित रखने की ऋषि-मुनियों ने एक तकनीक खोजी थी जिसके बल पर ही यह संभव हो पाया और आज तक वेद अपरिवर्तनशील बने रहे। हालांकि कुछ विद्वानों का यह भी मानना है कि वेद के कुछ सूत्र खो गए हैं और छंदों के बीच के शब्दों में हेरफेर किए गए हैं।
बहुत से विद्वान मैक्समूलर पर हिन्दू धर्मग्रंथों को विकृत करने का आरोप लगाते हैं। यह भी कहा जाता है कि मैक्समूलर, विलियम हंटर और लॉर्ड टॉमस बैबिंग्टन मैकॉले इन तीन लोगों के कारण भारत के धर्म और इतिहास का विकृतिकरण हुआ है। भारतीय समाज को तोड़ने के लिए यह सारा षड़यंत्र रचा गया। हालांकि यह विवाद का विषय है। लेकिन हम यहां बताना चाहते हैं कि किस तरह वेदपाठ किया जाता है।
प्रारंभिक वैदिक काल में कागज तो होते नहीं थे। तब लोग ताड़पत्रों पर या फिर शिलाखंडों पर लिखते थे। लेकिन जब हजारों लोगों को सिखाने की बात हो तो? और भी कई कारण थे जिसके चलते ज्ञान को संवरक्षित करने के लिए मनुष्य के चित्त को ही कागज बना दिया गया। सभी वेदमंत्रों की संभाल बिना किसी कागज-स्याही के ही की गयी है। अर्थात प्राचीनकाल के लोगों ने वेदों को कंठस्थ करने की एक परंपरा शुरू की। यहां यह बताना जरूरी है कि कोई भी किताब को सिर्फ रटने से वह कंठस्थ नहीं होती। वह लंबे समय तक याद रहे इसके लिए एक खास छंद और व्याकरणबद्ध विधि की खोज की गई। इसी विधी को भी वैदिक ऋषियों ने कई प्रकारों में बांटा है।
मूलग्रंथ संरक्षण की इतनी सुरक्षित पद्धति को जानने ही अपने आपमें अद्भुत है। हिंदुओं के पूर्वजों ने विभिन्न प्रकार से वेद मन्त्रों को स्मरण करने की विधियों का अविष्कार किया था, जिसके चलते वेदमन्त्रों की स्वर-संगत और उच्चारण का रक्षण कभी नहीं हुआ।
वैदिक ऋषियों ने व्याकरण के नियमों के आधार पर यह सुनिश्चित किया कि वेद मंत्र का गान करते हुए एक भी अक्षर, मात्रा या स्वर में किसी भी प्रकार का फेरबदल न हो सके और वेदपाठी उसे सरलता से कंठस्थ कर ले। इसमें फेरबदल इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि यदि कोई ऐसा करता है तो छंदों का पहले से अंतिम क्रम पूरी तरह गड़बड़ा जाता। लेकिन जिससे छंदों को कंठस्थ कर लिया है उसे पहला सूत्र याद आने के साथ ही छंद के आगे के सूत्र स्वत: ही उच्चारित होने लगते हैं।
दरअसल, ऋषियों ने शब्द के प्रत्येक अक्षर को उच्चारित करने में लगने वाले समय को निर्धारित किया और समय की इस इकाई या समय के अंतराल को 'मंत्र' नाम दिया। वेद मन्त्रों को शुद्धस्वरूप में उच्चारित करने के लिए विधिवत विश्वसन क्रिया के द्वारा शरीर के एक खास हिस्से में वांछित स्पंदन निर्माण करने की प्रक्रिया के विज्ञान को जिस वेदांग में बताया गया है, उसे 'शिक्षा' कहते हैं। यदि आप वैदिक मंत्र को संहिता में देखें तो आपको अक्षरों के पीछे कुछ चिन्ह मिलेंगे। यह चिन्ह 'स्वर चिन्ह' कहलाते हैं, जो मन्त्रों की उच्चारण पद्धति को दर्शाते हैं। इन चिन्हों से यह पक्का हो जाता है कि वेद मन्त्रों में अक्षर, मात्रा, बिंदु, विसर्ग का भी बदलाव नहीं हो सकता है।
परंपरागत गुरुकुलों में विद्यार्थी वेदमंत्रों के पठन में इन स्वरों के नियत स्थान को हाथ व सिर की विशिष्ट गतिविधि द्वारा स्मरण रखते हैं। अतः आप उन्हें वेदमंत्रों के पठन में हाथ व सिर की विशिष्ट गतिविधियां करते हुए देख सकते हैं और यदि मंत्रपठन में अल्प-सी भी त्रुटी पाई गयी तो वे आसानी से ठीक कर लेते हैं। इसके अलावा अलग-अलग गुरुकुल, पठन की विभिन्न प्रणालियों में अपनी विशेषता रखते हुए भी स्वरों की एक समान पद्धति को निर्धारित करते हैं। जिससे प्रत्येक वैदिक मंत्र की शुद्धता का पता उसके अंतिम अक्षर तक लगाया जा सके।
वेदमन्त्रों या छंदों के शब्दों को साथ में विविध प्रकारों में बांधा गया है, जैसे- 'वाक्य', 'पद', 'क्रम', 'जटा', 'माला', 'शिखा', 'रेखा', 'ध्वज', 'दंड', 'रथ' और 'घन'। ये सभी एक वैदिक मंत्र के शब्दों को विविध क्रम-संचयों में पढ़ने की विधि को प्रस्तुत करते हैं।
जिन्होंने मंत्रगान की उच्च श्रेणी घन का अभ्यास किया है उन्हें घनपठिन् कहते हैं। इसी तरह जटापाठी, मालापाठी, शिखापाठी आदि होते है। 'पठिन्' का अर्थ है जिसने पाठ सीखा हो। जब हम किसी घनपठिन् से घनपाठ का गान सुनते हैं तो हम देख सकते हैं कि वे मंत्र के कुछ शब्दों को अलग-अलग तरीकों से लयबद्ध, आगे-पीछे गा रहे हैं। यह अत्यंत कर्णप्रिय होता है। सभी तरह के पाठ को सुनने की अद्भुत और अलग अनुभूति होती है। मात्र सुनने से ही लगता है कि मानों कानों में अमृतरस घुल गया हो।
उपर जो पाठ के प्रकार बताएं गए है उन सभी के गान की विधि अलग अलग होती है। वेदमंत्र के शब्दों को साथ-साथ इस तरह गूंथा गया है, जिससे उनका प्रयोग बोलने में और आगे-पीछे सस्वर पठन में हो सके। पठनविधि के किसी विशेष प्रकार को अपनाए बिना 'वाक्य पाठ' और 'संहिता पाठ' में मंत्रों का गान उनके मूल क्रम में ही किया जाता है।
'वाक्य पाठ' में मंत्रों के कुछ शब्दों को एक साथ मिलाकर संयुक्त किया जाता है। जिसे 'संधि' कहते हैं। संहिता पाठ के बाद आता है पदपाठ। पदपाठ में शब्दों का संधि-विच्छेद करके लगातार पढ़ते हैं। इसके पश्चात क्रमपाठ है। क्रमपाठ में मंत्र के शब्दों को पहला-दूसरा, दूसरा-तीसरा, तीसरा-चौथा और इसी तरह अंतिम शब्द तक जोड़े बनाकर (1-2, 2-3, 3-4,..) याद किया जाता है।
जटापाठ में पहले शब्द को दूसरे के साथ, दूसरे को तीसरे के साथ और इसी क्रम में आगे-पीछे जाते हुए (1-2, 2-3, 3-4, ..), सम्पूर्ण मंत्र को गाया जाता है। शिखापाठ में जटा की अपेक्षा, दो के स्थान पर तीन शब्द सम्मिलित होते हैं और क्रमानुसार (1-2-3, 2-3-4,…) आगे-पीछे जाते हुए, सम्पूर्ण मंत्रगान होता है। इन पठन विधियों की अपेक्षा घनपाठ अधिक कठिन है। घनपाठ में चार भेद होते हैं। इसमें मंत्र के शब्दों के मूल क्रम में विशिष्ट प्रकार के फेर बदल से विविध क्रमसंचयों में संयोजित करके आगे-पीछे गाया जाता है। इन सबको विस्तारपूर्वक अंकगणित की सहायता से समझा जा सकता है।
संहिता और पद पाठ, प्रकृति पाठ कहलाते हैं। क्योंकि इसमें शब्दों का पठन एकबार ही उनके प्राकृतिक क्रम अर्थात मूल स्वरूप में किया जाता है। अन्य विधियों का समावेश 'विकृति पाठ' (गान की कृत्रिम विधि) के वर्ग में होता है। क्रमपाठ में शब्दों को उनके नियमित प्राकृतिक क्रम (एक-दो-तीन) में ही प्रस्तुत किया जाता है। उसमें शब्दों के क्रम को उलटा करके नही पढ़ा जाता, जैसे पहला शब्द- दूसरे के बाद और दूसरा- तीसरे के बाद (2-1,3-2,—) इत्यादि। अतः उसका समावेश पूर्णतया विकृति पाठ में नहीं होता है। क्रमपाठ को छोड़कर, विकृति पाठ के आठ प्रकार हैं, जो सहजता से याद रखने के लिए, इस छंद में कहे गए हैं:-
जटा, माला, शिखा, रेखा, ध्वज, दण्डो, रथो, घनः
इत्यस्तौ- विक्र्तयः प्रोक्तः क्रमपुर्व महर्षिभिः
इन सभी गान विधियों का अभिप्राय वेदों की स्वर-शैली और उच्चारण की शुद्धता को सदा के लिए सुरक्षित करना है। पदपाठ में शब्द मूल क्रम में, क्रमपाठ में दो शब्द एकसाथ और जटापाठ में शब्द आगे-पीछे जाते हुए भी, संख्या में अनुरूप होते हैं। सभी पाठ विधियों में शब्दों की संख्या को गिनकर आपस में मिलान किया जा सकता है।
गौरतलब है कि इतिहास के लम्बे संकटमय काल के दौरान उत्तर भारत पश्चिम एशिया के क्रूर आक्रान्ताओं और उनके वंशजों के बर्बर आक्रमणों से अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्षरत था। आक्रांतानों ने यहां के धर्म और धर्मग्रंथों को मिटाने के भरपूर प्रयास किए जाकि इतिहस से इस धर्म और संस्कृति का नामोनिशान मिट जाए और नया धर्म स्थापित हो, लेकिन जब यह जाना किया कि लाखों की संख्या में ब्राह्मणों ने अपने चित्त या मन में वेदों को कंठस्थ कर रखा है तो उन्होंने संस्कृत पाठशालाओं और गुरुकुलों को नष्ट करना शुरू किया और ब्राह्मणों को धर्मान्तरित किया।ऐसे समय में उत्तर भारत के जंगलों में बचे हुए ब्राह्मण और दक्षिण भारत के वेदपाठियों ने वेदमन्त्रों का रक्षण किया
दुनिया के प्रथम ग्रंथ वेद में आज तक कोई परिवर्तन नहीं हुआ। इसका कारण है उसके छंदबद्ध होने की अद्भुत शैली और वेदपाठ करने की खास विधि। यही कारण है कि उनमें किसी भी प्रकार का जोड़-घटाव नहीं किया जा सकता। शोधकर्ता मानते हैं कि वेदों के मूल दर्शन और ज्ञान को सुरक्षित रखने की ऋषि-मुनियों ने एक तकनीक खोजी थी जिसके बल पर ही यह संभव हो पाया और आज तक वेद अपरिवर्तनशील बने रहे। हालांकि कुछ विद्वानों का यह भी मानना है कि वेद के कुछ सूत्र खो गए हैं और छंदों के बीच के शब्दों में हेरफेर किए गए हैं।
बहुत से विद्वान मैक्समूलर पर हिन्दू धर्मग्रंथों को विकृत करने का आरोप लगाते हैं। यह भी कहा जाता है कि मैक्समूलर, विलियम हंटर और लॉर्ड टॉमस बैबिंग्टन मैकॉले इन तीन लोगों के कारण भारत के धर्म और इतिहास का विकृतिकरण हुआ है। भारतीय समाज को तोड़ने के लिए यह सारा षड़यंत्र रचा गया। हालांकि यह विवाद का विषय है। लेकिन हम यहां बताना चाहते हैं कि किस तरह वेदपाठ किया जाता है।
प्रारंभिक वैदिक काल में कागज तो होते नहीं थे। तब लोग ताड़पत्रों पर या फिर शिलाखंडों पर लिखते थे। लेकिन जब हजारों लोगों को सिखाने की बात हो तो? और भी कई कारण थे जिसके चलते ज्ञान को संवरक्षित करने के लिए मनुष्य के चित्त को ही कागज बना दिया गया। सभी वेदमंत्रों की संभाल बिना किसी कागज-स्याही के ही की गयी है। अर्थात प्राचीनकाल के लोगों ने वेदों को कंठस्थ करने की एक परंपरा शुरू की। यहां यह बताना जरूरी है कि कोई भी किताब को सिर्फ रटने से वह कंठस्थ नहीं होती। वह लंबे समय तक याद रहे इसके लिए एक खास छंद और व्याकरणबद्ध विधि की खोज की गई। इसी विधी को भी वैदिक ऋषियों ने कई प्रकारों में बांटा है।
मूलग्रंथ संरक्षण की इतनी सुरक्षित पद्धति को जानने ही अपने आपमें अद्भुत है। हिंदुओं के पूर्वजों ने विभिन्न प्रकार से वेद मन्त्रों को स्मरण करने की विधियों का अविष्कार किया था, जिसके चलते वेदमन्त्रों की स्वर-संगत और उच्चारण का रक्षण कभी नहीं हुआ।
वैदिक ऋषियों ने व्याकरण के नियमों के आधार पर यह सुनिश्चित किया कि वेद मंत्र का गान करते हुए एक भी अक्षर, मात्रा या स्वर में किसी भी प्रकार का फेरबदल न हो सके और वेदपाठी उसे सरलता से कंठस्थ कर ले। इसमें फेरबदल इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि यदि कोई ऐसा करता है तो छंदों का पहले से अंतिम क्रम पूरी तरह गड़बड़ा जाता। लेकिन जिससे छंदों को कंठस्थ कर लिया है उसे पहला सूत्र याद आने के साथ ही छंद के आगे के सूत्र स्वत: ही उच्चारित होने लगते हैं।
दरअसल, ऋषियों ने शब्द के प्रत्येक अक्षर को उच्चारित करने में लगने वाले समय को निर्धारित किया और समय की इस इकाई या समय के अंतराल को 'मंत्र' नाम दिया। वेद मन्त्रों को शुद्धस्वरूप में उच्चारित करने के लिए विधिवत विश्वसन क्रिया के द्वारा शरीर के एक खास हिस्से में वांछित स्पंदन निर्माण करने की प्रक्रिया के विज्ञान को जिस वेदांग में बताया गया है, उसे 'शिक्षा' कहते हैं। यदि आप वैदिक मंत्र को संहिता में देखें तो आपको अक्षरों के पीछे कुछ चिन्ह मिलेंगे। यह चिन्ह 'स्वर चिन्ह' कहलाते हैं, जो मन्त्रों की उच्चारण पद्धति को दर्शाते हैं। इन चिन्हों से यह पक्का हो जाता है कि वेद मन्त्रों में अक्षर, मात्रा, बिंदु, विसर्ग का भी बदलाव नहीं हो सकता है।
परंपरागत गुरुकुलों में विद्यार्थी वेदमंत्रों के पठन में इन स्वरों के नियत स्थान को हाथ व सिर की विशिष्ट गतिविधि द्वारा स्मरण रखते हैं। अतः आप उन्हें वेदमंत्रों के पठन में हाथ व सिर की विशिष्ट गतिविधियां करते हुए देख सकते हैं और यदि मंत्रपठन में अल्प-सी भी त्रुटी पाई गयी तो वे आसानी से ठीक कर लेते हैं। इसके अलावा अलग-अलग गुरुकुल, पठन की विभिन्न प्रणालियों में अपनी विशेषता रखते हुए भी स्वरों की एक समान पद्धति को निर्धारित करते हैं। जिससे प्रत्येक वैदिक मंत्र की शुद्धता का पता उसके अंतिम अक्षर तक लगाया जा सके।
वेदमन्त्रों या छंदों के शब्दों को साथ में विविध प्रकारों में बांधा गया है, जैसे- 'वाक्य', 'पद', 'क्रम', 'जटा', 'माला', 'शिखा', 'रेखा', 'ध्वज', 'दंड', 'रथ' और 'घन'। ये सभी एक वैदिक मंत्र के शब्दों को विविध क्रम-संचयों में पढ़ने की विधि को प्रस्तुत करते हैं।
जिन्होंने मंत्रगान की उच्च श्रेणी घन का अभ्यास किया है उन्हें घनपठिन् कहते हैं। इसी तरह जटापाठी, मालापाठी, शिखापाठी आदि होते है। 'पठिन्' का अर्थ है जिसने पाठ सीखा हो। जब हम किसी घनपठिन् से घनपाठ का गान सुनते हैं तो हम देख सकते हैं कि वे मंत्र के कुछ शब्दों को अलग-अलग तरीकों से लयबद्ध, आगे-पीछे गा रहे हैं। यह अत्यंत कर्णप्रिय होता है। सभी तरह के पाठ को सुनने की अद्भुत और अलग अनुभूति होती है। मात्र सुनने से ही लगता है कि मानों कानों में अमृतरस घुल गया हो।
उपर जो पाठ के प्रकार बताएं गए है उन सभी के गान की विधि अलग अलग होती है। वेदमंत्र के शब्दों को साथ-साथ इस तरह गूंथा गया है, जिससे उनका प्रयोग बोलने में और आगे-पीछे सस्वर पठन में हो सके। पठनविधि के किसी विशेष प्रकार को अपनाए बिना 'वाक्य पाठ' और 'संहिता पाठ' में मंत्रों का गान उनके मूल क्रम में ही किया जाता है।
'वाक्य पाठ' में मंत्रों के कुछ शब्दों को एक साथ मिलाकर संयुक्त किया जाता है। जिसे 'संधि' कहते हैं। संहिता पाठ के बाद आता है पदपाठ। पदपाठ में शब्दों का संधि-विच्छेद करके लगातार पढ़ते हैं। इसके पश्चात क्रमपाठ है। क्रमपाठ में मंत्र के शब्दों को पहला-दूसरा, दूसरा-तीसरा, तीसरा-चौथा और इसी तरह अंतिम शब्द तक जोड़े बनाकर (1-2, 2-3, 3-4,..) याद किया जाता है।
जटापाठ में पहले शब्द को दूसरे के साथ, दूसरे को तीसरे के साथ और इसी क्रम में आगे-पीछे जाते हुए (1-2, 2-3, 3-4, ..), सम्पूर्ण मंत्र को गाया जाता है। शिखापाठ में जटा की अपेक्षा, दो के स्थान पर तीन शब्द सम्मिलित होते हैं और क्रमानुसार (1-2-3, 2-3-4,…) आगे-पीछे जाते हुए, सम्पूर्ण मंत्रगान होता है। इन पठन विधियों की अपेक्षा घनपाठ अधिक कठिन है। घनपाठ में चार भेद होते हैं। इसमें मंत्र के शब्दों के मूल क्रम में विशिष्ट प्रकार के फेर बदल से विविध क्रमसंचयों में संयोजित करके आगे-पीछे गाया जाता है। इन सबको विस्तारपूर्वक अंकगणित की सहायता से समझा जा सकता है।
संहिता और पद पाठ, प्रकृति पाठ कहलाते हैं। क्योंकि इसमें शब्दों का पठन एकबार ही उनके प्राकृतिक क्रम अर्थात मूल स्वरूप में किया जाता है। अन्य विधियों का समावेश 'विकृति पाठ' (गान की कृत्रिम विधि) के वर्ग में होता है। क्रमपाठ में शब्दों को उनके नियमित प्राकृतिक क्रम (एक-दो-तीन) में ही प्रस्तुत किया जाता है। उसमें शब्दों के क्रम को उलटा करके नही पढ़ा जाता, जैसे पहला शब्द- दूसरे के बाद और दूसरा- तीसरे के बाद (2-1,3-2,—) इत्यादि। अतः उसका समावेश पूर्णतया विकृति पाठ में नहीं होता है। क्रमपाठ को छोड़कर, विकृति पाठ के आठ प्रकार हैं, जो सहजता से याद रखने के लिए, इस छंद में कहे गए हैं:-
जटा, माला, शिखा, रेखा, ध्वज, दण्डो, रथो, घनः
इत्यस्तौ- विक्र्तयः प्रोक्तः क्रमपुर्व महर्षिभिः
इन सभी गान विधियों का अभिप्राय वेदों की स्वर-शैली और उच्चारण की शुद्धता को सदा के लिए सुरक्षित करना है। पदपाठ में शब्द मूल क्रम में, क्रमपाठ में दो शब्द एकसाथ और जटापाठ में शब्द आगे-पीछे जाते हुए भी, संख्या में अनुरूप होते हैं। सभी पाठ विधियों में शब्दों की संख्या को गिनकर आपस में मिलान किया जा सकता है।
गौरतलब है कि इतिहास के लम्बे संकटमय काल के दौरान उत्तर भारत पश्चिम एशिया के क्रूर आक्रान्ताओं और उनके वंशजों के बर्बर आक्रमणों से अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्षरत था। आक्रांतानों ने यहां के धर्म और धर्मग्रंथों को मिटाने के भरपूर प्रयास किए जाकि इतिहस से इस धर्म और संस्कृति का नामोनिशान मिट जाए और नया धर्म स्थापित हो, लेकिन जब यह जाना किया कि लाखों की संख्या में ब्राह्मणों ने अपने चित्त या मन में वेदों को कंठस्थ कर रखा है तो उन्होंने संस्कृत पाठशालाओं और गुरुकुलों को नष्ट करना शुरू किया और ब्राह्मणों को धर्मान्तरित किया।ऐसे समय में उत्तर भारत के जंगलों में बचे हुए ब्राह्मण और दक्षिण भारत के वेदपाठियों ने वेदमन्त्रों का रक्षण किया
आर्य भाषा की लिपि देवनागरी है। देवनागरी को देवनागरी इसलिए कहा गया है , क्यूंकि यह देवों की भाषा है। भाषाएँ दो प्रकार की होती है।
(1)कल्पित और
(2) अपौरुषेय (ईश्वरीय वैज्ञानिक)
कल्पित भाषा का आधार कल्पना के अतिरिक्त और कोई नहीं होता। ऐसी भाषा में वर्णरचना का आधार भी वैज्ञानिक के स्थान पर काल्पनिक होता है।
अपौरुषेय भाषा का आधार नित्य अनादि वाणी होता है। उसमें समय समय पर परिवर्तन होते रहते है परन्तु वह अपना मूल आधार अनादि अपौरुषेय वाणी को कभी नहीं छोड़ती। ऐसी भाषा का आधार भी अनादि विज्ञान ही होता है।
वैदिक वर्णमाला में मुख्यतः 17 अक्षर है। इन 17 अक्षरों में कितने अक्षर केवल प्रयत्नशील अर्थात मुख और जिव्हा की इधर-उधर गति आकुंचन और प्रसारण से बोले जाते है , और किसी विशेष स्थान से इनका कोई सम्बन्ध नहीं होता। उन्हें स्वर कहते है।
जिनके उच्चारण में स्वर और प्रयत्न दोनों की सहायता लेनी पड़ती है उन्हें व्यंजन कहते है।
कितने ही अवांतर भेद हो जाने पर हमारी इस वर्णमाला के अक्षर 64 हो जाते है। यजुर्वेद में इन्हीं १७ अक्षरों की नीचे के मंत्र द्वारा स्पष्ट गणना है-
“”अग्निरेकाक्षरेण, अश्विनौ द्व्यक्षरेण, विष्णु: त्र्यक्षरेण, सोमश्चतुरक्षेण, पूषा पंचाक्षरेण, सविता षडक्षरेण, मरुत: सप्ताक्षरेण, बृहस्पति अष्टाक्षरेण, मित्रो नवाक्षरेण, वरुणो दशाक्षरेण, इन्द्र एकादशाक्षरेण, विश्वदेवा द्वादशाक्षरेण, वसवस्त्रयोदशाक्षरेण,रुद्रश्चतुर्दशाक्षरेण, आदित्या: पंचदशाक्षरेण, अदिति: षोडशाक्षरेण, प्रजापति: सप्तदशाक्षरेण। “”
(यजुर्वेद ९-३१-३४)
इस प्रकार यह मूलरूप से 17अक्षरों की वर्णमाला वैदिक होने से अनादि और अपौरुषेय है। वर्णमाला के 17 अक्षरों का मूल एक ही अकार है। यह अकार ही अपने स्थान और प्रयत्नों के भेद से अनेक प्रकार का हो जाता है। ओष्ठ बंद करके यदि अकार का उच्चारण किया जाए तो पकार हो जावेगा और यदि अकार का ही कंठ से उच्चारण करें तो ककार सुनाई देगा। इस प्रकार से सभी वर्णों के विषय में समझ लेना चाहिये। अकार प्रत्येक उच्चारण में उपस्थित रहता है, बिना उसकी सहायता के न कोई वर्ण भलीभांति बोला जा सकता है और न सुनाई देता है। इसलिए अकार के निम्न अनेक अर्थ है-
” सब, कुल, पूर्ण, व्यापक, अव्यय, एक और अखंड आदि अकार अक्षर के ही अर्थ है। इन अर्थों को देखकर अकार अक्षर व्यापक और अखंड प्रतीत होता है। क्यूंकि शेष अक्षर उसी में प्रविष्ट होने से इन्हीं के रूप में ही प्रतीत होते है। उपनिषद् में ब्राह्मण कम् और खम् दो अर्थ है। इसलिए इस अपौरुषेय वर्णमाला का उच्चारण करते समय हम एक प्रकार से ब्रह्म की उपासना कर रहे होते है। वर्णों के शब्द बनते हैं और शब्दों का समुदाय भाषा है। इस प्रकार से हिंदी भाषा को ‘ब्रह्मवादिनी’ भी कह सकते है। “”
इस प्रकार देवनागरी लिपि में प्रत्येक अक्षर का उच्चारण करते समय हम ब्रह्म की उपासना कर रहे होते है। इसलिए देवनागरी हमारी संस्कृति का प्रतीक है। हमारी संस्कृति वैदिक है। वैदिक संस्कृति वेद द्वारा भगवान की देन है और वेदों के अनादि होने से हमारी संस्कृति और हमारी भाषा भी अनादि और अपौरुषेय है। एक और तथ्य यह है कि हमारी भाषा में सभी भाषाओँ के शब्द लिखे और पढ़े जा सकते है क्यूंकि इसके 64 अक्षर किसी भी शब्द की तथा उच्चारण की किसी भी न्यूनता को रहने नहीं देते।
देवनागरी लिपि के विकास की जहाँ तक बात है कि इक्ष्वाकु आर्यावर्त का प्रथम राजा हुआ। इक्ष्वाकु के समय अक्षर स्याही आदि से लिखने की लिपि का विकास किया। ऐसा प्रतीत होता है। इक्ष्वाकु के समय वेद को कंठस्थ करने की रीती कुछ कम होने लगी थी । जिस लिपि में वेद लिखे गए उसका नाम देवनागरी है। विद्वान अर्थात देव लोगों ने संकेत से अक्षर लिखना प्रारम्भ किया इसलिए भी इसका नाम देवनागरी है।
इस प्रकार से यह भाषा अपौरुषेय एवं वैदिक काल की भाषा है जिसकी लिपि का विकास भी वैदिक काल में हो गया था।
अब आते है पाली भाषा पर ,
तो सर्व प्रथम आपको बता दे यह भाषा का विकास बहूत बाद में हुआ था ।
पुरानी भाषा कौनसी संस्कृत या पाली
एक लेखक ने संस्कृत को नवीन भाषा बताया उसका आधार उसने शिलालेख आदि बताये | लेकिन यह आधार अयुक्त है क्यूंकि प्राकृत भाषा लोक भाषा थी जब यह शिलालेख आदि लिखे गये थे जबकि संस्कृत केवल कुछ विद्वान लोगो की भाषा थी |
शिलालेख आदि का संदेश आम जन को कोई सुचना या राज्य की परियोजना अथवा कोई संदेश के लिए होता था | आमजन के लिए उन्ही की समझने लायक भाषा में ही संदेश लिखा जाएगा | जैसे आज हिंदी का प्रचलन है तो कोई भी सरकारी घोषणा संस्कृत में नही दी जायेगी बल्कि हिंदी में ही दी जायेगी | इस बात का प्रबल प्रमाण एक जैन लेखक के द्वारा मिलता है जिससे सिद्ध होता है कि प्राकृत बुद्ध ,महावीर के समय की सामान्य जन की भाषा थी –
” जैन आचार्य हरीभद्र सूरी दशवेकालीक टीका की भूमिका 101 पर लिखता है –
” बाल स्त्री मूढ़ मूर्खाणा मूणा चारित्रकांगक्षि
णाम |
अनुग्रहार्थ तत्वज्ञ: सिद्धांत: प्राकृत: स्मृत : ||
अर्थात बाल ,मूढ़ ,मुर्ख के लिए जैन सिद्धांत प्राकृत में दिया गया | ”
इससे सिद्ध है कि संस्कृत भाषा भी महावीर आदि के समय थी महावीर का काल चन्द्रगुप्त से पुराना मानना होगा क्यूंकि तथाकथित इतिहासकार उसे चन्द्रगुप्त का जैन बनना मानते है यदि इसे न माने तो अशोक का चौथा उतराधिकारी शालीशुक मौर्य जैन था | इससे जैन मत इससे भी प्राचीन सिद्ध होता है | अत: संस्कृत की प्राचीनता हरीभद्र अनुसार शालिशुक से पुरानी तो हो ही जाती है |
संस्कृत में ग्रन्थ लेखन का ही कार्य होता था ग्रंथो को भोजपत्र या ताड़पत्र पर लिखा जाता था जिसका काल अधिक नही होता था अधिक से अधिक १०० वर्ष के अंदर वो नष्ट हो जाता था | उसकी पुनरावृत्ति दुसरे ताड़ या भोज पत्र पर हो जाती थी इस तरह नया संस्करण निकाल पुराने ग्रंथो के वचन सुरक्षित रखे जाते थे | आज जो पांडूलिपि मिलती है वो ग्रन्थ के वास्तविक काल की न हो उसके अंत के संस्करणो की है | अच्छी क्वालिटी का कागज भी ६००-७०० साल में टूट टूट नष्ट हो जाता है | इसलिए पांडूलिपि ,शिलालेख यह वास्तविक आधार नही कौनसी भाषा प्राचीन है यह जानने का |
इसका आधार है उस भाषा में लिखे विभिन्न व्याकरण ग्रन्थ जिनमे उसके शब्द विकार ,शब्द सिद्धि दर्शाई जाती है |
प्राकृत के अध्ययन हेतु निम्न सामग्री है –
(१) भरत का नाट्य शास्त्र –
भरत मुनि का उलेख महाभारत में होने से तथा भरत मुनि द्वारा प्राकृत सूत्र दिए जाने से प्राकृत का काल भी महाभारत समकक्ष तो बैठता ही है |
कोहल – मार्कण्डेय कवीन्द्र के अनुसार कोहल के ग्रन्थ में भी प्राकृत का उलेख है |
वाल्मीकि सूत्र – यह प्राकृत भाषा के व्याकरण के सूत्र है इन पर अप्पय दीक्षित की व्याख्या है यह वाल्मीक जी की रचना है | इससे यह सम्भव है प्राकृत भी तथाकथित मूलनिवासियों की भाषा नही बल्कि आर्यों की ही भाषा है ।
शाकल्य – यह ऋग्वेद के एक शाखा के रचेयता है तथा प्राचीन ऋषि है | मार्कंड कवीन्द्र के अनुसार शाकल्य ऋषि प्राकृत पर लिखे है |
लगभग त्रेताकाल से दोनों भाषाए चली है संस्कृत और प्राकृत |
वररुचिकृत प्राकृत लक्षण – यह प्राकृत अध्ययन में सबसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ है | इसमें भामह व्याख्या भी है| भामाह विक्रम सम्वत पूर्व के आसपास था |
प्राकृतदीपिका – यह अभिनवगुप्त द्वारा लिखा ग्रन्थ है |
चंडकृत प्राकृत लक्षण – इसमें महाराष्ट्र तथा जैन प्राकृतो का वर्णन है |
हेमचन्द्र का प्राकृत व्याकरण – यह प्राकृत के शब्दानुशासन का ग्रन्थ है |
प्राकृत पिंगल – इसमें प्राकृत के पद्यो और छन्दों का संग्रह है |
यह सब प्राकृत के जान्ने के ग्रन्थ है | इन सबसे एक निष्कर्ष निकलता है कि संस्कृत में किसी शब्द सिद्धि संस्कृत धातु से प्रत्यय उपसर्ग से ही हो जाती है | अर्थात संस्कृत में किसी अन्य भाषा से कोई शब्द उधार नही लिया लेकिन आगे जब इन प्राकृत व्याकरण ग्रंथो के प्रमाण देखोगे तो पता चलेगा कि संस्कृत के कई अपभ्रंश इस भाषा में लिए गये है अपभ्रष कहलाता है एक भाषा के शुद्ध रूप का बिगड़ कर अन्य भाषा में प्रयुक्त होना इससे अपभ्रश प्रयोग वाली भाषा आत्मजा और शुद्ध प्रयोग वाली जनक सिद्ध हो जाती है |
अब प्राकृत के सामान्य नियम समझिये –
प्राकृत में तीन प्रकार के शब्द प्रयोग करे गये है –
“ समानशब्द विभ्रष्ट देशीगतथापि च – भरतनाट्य शास्त्र १७/३
अर्थात समान ,विभ्रष्ट और देशी पद प्राकृत में है |
इसी पर हरिपाल कृत टीका में लिखा है –
“ तद्भव: तत्समो देशी त्रिविध: प्राकृतकम: “ अर्थात संस्कृत के सदृश्य ,संस्कृत से विकृत और देशी यह तीन प्रकार के शब्द प्राकृत में है |
जैन आचार्य हेमचन्द्र अभिधान चिंतामणि की स्वोपज्ञ टीका में इस बात के प्रमाण देता है कि प्राकृत में प्रयुक्त देशज शब्द भी संस्कृत से आये है –
“ गोसो देश्याम | संस्कृतेsपि
तुंगी देश्याम | संस्कृतेsपि
अब संस्कृत के तत्सम का प्राकृत में किस तरह विकार हो तद्भव होता है यह निम्न नियम से पाया जाता है –
“ ए ओ आर पराणि अ अं आरपरं अ पाअए णत्थि |
व स आर मज्झिमाइ अ क च वग्ग तवग्ग णिहणाइ || “
अर्थात ए ओकार से परे अर्थात ऐ औ अंकार के परे अर्थात विसर्ग नहीं होता अर्थात संस्कृत में आये विसर्ग का प्राकृत में लोप हो जाता है | तथा व सकार के मध्य के श ष वर्ण तथा क च त वर्गो के निधनानि ङ ञ न का भी प्राकृत में लोप कर देते है |
यहा स्पष्ट पता चल रहा है कि प्राकृत संस्कृत के कुछ शब्द को तद्भव कर बनाई गयी भाषा है अर्थात इसके शब्द संस्कृत से उधार लिए गये है |
साहित्य रत्नाकार नामक ग्रन्थ में निम्न श्लोक मिलता है जिससे पता चलता है कि किन किन वर्णों को लुप्त कर प्राकृत वर्णमाला रची –
“ ऐ औ कं क: ऋ ऋ(दीर्घ स्वर में ) लृ लृ(दीर्घ) प्लुप्त श षाबिंदुश्चतुर्थी क्वचित |
प्रान्ते न क्ष डं ञा पृथग द्विवचन नाष्टादश प्राकृते |
रूपञ्चापि यदातमेपदकृत यद्वा परस्मैपद्म |
भेदों नैव तयोर्न लिंगनियमस्ताद्र्ग्यथा संस्कृते ||
अर्थात ऐ औ कं क: ऋकार लृकार प्लुत श ष अबिंदु तथा ४ विभक्ति प्रांत में न क्ष ङ ञ और द्विवचन यह १८ प्राकृत में नही रहे |
यहा भी संस्कृत से प्राकृत का बनना बताया जा रहा है |
प्राकृत पैंगल में उग्गाह छंद में निम्नलिखित गाथा है –
“ एऔ अं म ल पुरऔ सआर ,पुब्बेहि बे बि वण्णाई |
कच्चबग्गे अन्ता दहबणा पाउए ण हूअति || “
ए ओ अं म ल के अगले वर्ण ऐ औ : य व स से पहले दो वर्ण श ष तथा क वर्ग और त वर्ग के अंतिम वर्ण ङ णञ प्राकृत में नही होते | अर्थात प्राकृत में इनका लोप हो जाता है |
संस्कृत से बदलाव लाने के आलावा भी प्राकृत का सिलसिला यही न रुका यह भाषा बार बार बदल बदल नये नये रूप में आती गयी पहले शौरसेनी प्राकृत हुई फिर मागधी में हुआ |
मागधी में संस्कृत के स के स्थान पर श कर कुछ शब्द बना लिए गये – जैसे सामवेद से शामवेद इस पर नामिसाधू श्लोक 12 में व्याख्यात है – “ रसयोर्लशौ मागधिकायाम “
अर्थात र के स्थान पर ल और स के स्थान पर श अर्थात संस्कृत में पुरुष शब्द ष का ल विकार हो माधवी प्राकृत में – पुलिश हो गयी | इसी तरह फिर अर्धमागधी प्राकृत हुई | इसके बाद जैन में श्वेताम्बर सम्प्रदाय की प्राकृत का प्रचलन हुआ इसे महाराष्ट्री भी कहते है | रामदासकृत सेतुबंध टीका में लिखा है – “ महाराष्ट्रभाषाया बहुवचने sप्येकवचन प्रयोगात पृष्ठ 174 तथाच –युद्ध = जुज्झ (सेतुबंध पृष्ठ 502 )
यहा उदाहरण दे बताया है संस्कृत के युद्ध का महाराष्ट्री प्राकृत में किस तरह रूपान्तर हुआ |
अश्वघोष के दो नाटको के त्रुटीयुक्त पत्ते चीन में प्राप्त हुए है अध्यापक लूडर्स (जर्मन ) ने उन्हें जोड़ एक लेख लिखा जिसका अनुवाद श्रीमती तुहिनिका चैटर्जी ने किया –
“ पेज 40 पर लूडर्स लिखता है – “ we can distinguish clearly at least three dialects
अर्थात प्राकृत की तीन बोलिया अश्वगोष के काव्य में है |
यहा स्पष्ट है संकलन
अजय कर्मयोगी





