रविवार, 12 अगस्त 2018



बाणस्तंभ’*
..................‘इतिहास’ बडा चमत्कारी विषय हैं. इसको खोजते खोजते हमारा सामना ऐसे स्थिति से होता हैं, की हम आश्चर्य में पड जाते हैं. पहले हम स्वयं से पूछते हैं, यह कैसे संभव हैं..?
......करीब डेढ़ हजार वर्ष पहले इतना उन्नत और अत्याधुनिक ज्ञान हम भारतीयों के पास था, इस पर विश्वास ही नहीं होता..!

गुजरात के सोमनाथ मंदिर में आकर कुछ ऐसी ही स्थिति होती हैं. वैसे भी सोमनाथ मंदिर का इतिहास बड़ा ही विलक्षण और गौरवशाली रहा हैं. १२ ज्योतिर्लिंगों में से पहला ज्योतिर्लिंग हैं सोमनाथ..!.... एक वैभवशाली, सुंदर शिवलिंग..!! इतना समृध्द था की की उत्तर-पश्चिम से आने वाले प्रत्येक आक्रांता की पहली नजर सोमनाथ पर जाती थी. अनेकों बार सोमनाथ मंदिर पर हमले हुए. उसे लूटा गया. सोना, चांदी, हिरा, माणिक, मोती आदि गाड़ियाँ भर-भर कर आक्रांता ले गए. इतनी संपत्ति लुटने के बाद भी हर बार सोमनाथ का शिवालय उसी वैभव के साथ खड़ा रहता था.........

लेकिन केवल इस वैभव के कारण ही सोमनाथ का महत्व नहीं हैं. सोमनाथ का मंदिर भारत के पश्चिम समुद्र तट पर हैं. विशाल अरब सागर रोज भगवान सोमनाथ के चरण पखारता हैं. और गत हजारों वर्षों के ज्ञात इतिहास में इस अरब सागर ने कभी भी अपनी मर्यादा नहीं लांघी हैं. न जाने कितने आंधी, तूफ़ान आये, चक्रवात आये लेकिन किसी भी आंधी, तूफ़ान, चक्रवात से मंदिर की कोई हानि नहीं हुई हैं.

*इस मंदिर के प्रांगण में एक स्तंभ (खंबा) हैं. यह ‘बाणस्तंभ’ नाम से जाना जाता हैं. यह स्तंभ कब से वहां पर हैं बता पाना कठिन हैं.* लगभग छठी शताब्दी से इस बाणस्तंभ का इतिहास में नाम आता हैं. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं की बाणस्तंभ का निर्माण छठवे शतक में हुआ हैं. उस के सैकड़ों वर्ष पहले इसका निर्माण हुआ होगा. यह एक दिशादर्शक स्तंभ हैं, जिस पर समुद्र की ओर इंगित करता एक बाण हैं. इस बाणस्तंभ पर लिखा हैं –

*‘आसमुद्रांत दक्षिण धृव पर्यंत*
*अबाधित ज्योतिरमार्ग..’*

इसका अर्थ यह हुआ – ‘इस बिंदु से दक्षिण धृव तक सीधी रेषा में एक भी अवरोध या बाधा नहीं हैं.’ अर्थात ‘इस समूची दूरी में जमीन का एक भी टुकड़ा नहीं हैं’.

*जब मैंने पहली बार इस स्तंभ को देखा और यह शिलालेख पढ़ा, तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए. यह ज्ञान इतने वर्षों पहले हम भारतीयों को था........? कैसे संभव हैं..? ......और यदि यह सच हैं, तो सोचिये की हम कितने समृध्दशाली ज्ञान की वैश्विक धरोहर संजोये हुए हैं..!*

संस्कृत में लिखे हुए इस पंक्ति के अर्थ में अनेक गूढ़ अर्थ समाहित हैं. इस पंक्ति का सरल अर्थ यह हैं की ‘सोमनाथ मंदिर के उस बिंदु से लेकर दक्षिण धृव तक (अर्थात अंटार्टिका तक), एक सीधी रेखा खिंची जाए तो बीच में एक भी भूखंड नहीं आता हैं’. क्या यह सच हैं..? आज के इस तंत्रविज्ञान के युग में यह ढूँढना संभव तो हैं, लेकिन उतना आसान नहीं.

गूगल मैप में ढूंढने के बाद भूखंड नहीं दिखता हैं, लेकिन वह बड़ा भूखंड. छोटे, छोटे भूखंडों को देखने के लिए मैप को ‘एनलार्ज’ या ‘ज़ूम’ करते हुए आगे जाना पड़ता हैं. वैसे तो यह बड़ा ही ‘बोरिंग’ सा काम हैं. लेकिन धीरज रख कर धीरे-धीरे देखते गए तो रास्ते में एक भी भूखंड (अर्थात 10 किलोमीटर X 10 किलोमीटर से बड़ा भूखंड. उससे छोटा पकड में नहीं आता हैं) नहीं आता हैं. अर्थात हम मान कर चले की उस संस्कृत श्लोक में सत्यता हैं.

किन्तु फिर भी मूल प्रश्न वैसा ही रहता हैं. अगर मान कर भी चलते हैं की सन ६०० में इस बाण स्तंभ का निर्माण हुआ था, तो भी उस जमाने में पृथ्वी को दक्षिणी धृव हैं, यह ज्ञान हमारे पुरखों के पास कहां से आया..? अच्छा, अगर ये मान भी लें की दक्षिण धृव ज्ञात था ...................... तो भी *सोमनाथ मंदिर से दक्षिण धृव तक सीधी रेषा में एक भी भूखंड नहीं आता हैं, यह जबरदस्त निर्धारण किसने किया होगा ..? कैसे किया..?
.........सब कुछ अद्भुत ज्ञान था ..!!*

इसका अर्थ यह हैं की *‘बाण स्तंभ’ के निर्माण काल में भारतीयों को पृथ्वी गोल हैं, इसका ज्ञान था. इतना ही नहीं, पृथ्वी को दक्षिण धृव हैं (अर्थात उत्तर धृव भी हैं) यह भी ज्ञान था.* यह कैसे संभव हुआ..? इसके लिए पृथ्वी का ‘एरिअल व्यू’ लेने का कोई साधन उपलब्ध था..? अथवा पृथ्वी का विकसित नक्शा बना था..?

नक़्शे बनाने का एक शास्त्र होता हैं. अंग्रेजी में इसे ‘कार्टोग्राफी’ (यह मूलतः फ्रेंच शब्द हैं.) कहते हैं. यह प्राचीन शास्त्र हैं. इसा से पहले छह से आठ हजार वर्ष पूर्व की गुफाओं में आकाश के ग्रह तारों के नक़्शे मिले थे. परन्तु पृथ्वी का पहला नक्शा किसने बनाया इस पर एकमत नहीं हैं. हमारे भारतीय ज्ञान का कोई सबूत न मिलने के कारण यह सम्मान ‘एनेक्झिमेंडर’ इस ग्रीक वैज्ञानिक को दिया जाता हैं. इनका कालखंड इसा पूर्व ६११ से ५४६ वर्ष था. किन्तु इन्होने बनाया हुआ नक्शा अत्यंत प्राथमिक अवस्था में था. उस कालखंड में जहां जहां मनुष्यों की बसाहट का ज्ञान था, बस वही हिस्सा नक़्शे में दिखाया गया हैं. इस लिए उस नक़्शे में उत्तर और दक्षिण धृव दिखने का कोई कारण ही नहीं था.

आज की दुनिया के वास्तविक रूप के करीब जाने वाला नक्शा ‘हेनरिक्स मार्टेलस’ ने साधारणतः सन १४९० के आसपास तैयार किया था. ऐसा माना जाता हैं, की कोलंबस ने इसी नक़्शे के आधार पर अपना समुद्री सफर तय किया था.

‘पृथ्वी गोल हैं’ इस प्रकार का विचार यूरोप के कुछ वैज्ञानिकों ने व्यक्त किया था. ‘एनेक्सिमेंडर’ इसा पूर्व ६०० वर्ष, पृथ्वी को सिलेंडर के रूप में माना था. ‘एरिस्टोटल’ (इसा पूर्व ३८४ – इसा पूर्व ३२२) ने भी पृथ्वी को गोल माना था.

लेकिन भारत में यह ज्ञान बहुत प्राचीन समय से था, जिसके प्रमाण भी मिलते हैं. इसी ज्ञान के आधार पर आगे चलकर *आर्यभट्ट ने सन ५०० के आस पास इस गोल पृथ्वी का व्यास ४,९६७ योजन हैं (अर्थात नए मापदंडोंके अनुसार ३९,९६८ किलोमीटर हैं) यह भी दृढतापूर्वक बताया. आज की अत्याधुनिक तकनीकी की सहायता से पृथ्वी का व्यास ४०,०७५ किलोमीटर माना गया हैं. इसका अर्थ यह हुआ की आर्यभट्ट के आकलन में मात्र ०.२६% का अंतर आ रहा हैं, जो नाममात्र हैं..! लगभग डेढ़ हजार वर्ष पहले आर्यभट्ट के पास यह ज्ञान कहां से आया..?*

सन २००८ में जर्मनी के विख्यात इतिहासविद जोसेफ श्वार्ट्सबर्ग ने यह साबित कर दिया की इसा पूर्व दो-ढाई हजार वर्ष, भारत में नक्शा  शास्त्र अत्यंत विकसित था. नगर रचना के नक्शे उस समय उपलब्ध तो थे ही, परन्तु नौकायन के लिए आवश्यक नक़्शे भी उपलब्ध थे.

भारत में नौकायन शास्त्र प्राचीन काल से विकसित था. संपूर्ण दक्षिण एशिया  में जिस प्रकार से हिन्दू संस्कृति के चिन्ह पग पग पर दिखते हैं, उससे यह ज्ञात होता हैं की भारत के जहाज पूर्व दिशा में जावा, सुमात्रा, यवद्वीप को पार कर के जापान तक प्रवास कर के आते थे. सन १९५५ में गुजरात के ‘लोथल’ में ढाई हजार वर्ष पूर्व के अवशेष मिले हैं. इसमें भारत के प्रगत नौकायन के अनेक प्रमाण मिलते हैं.

सोमनाथ मंदिर के निर्माण काल में दक्षिण धृव तक दिशादर्शन, उस समय के भारतियों को था यह निश्चित हैं. लेकिन सबसे महत्वपूर्व प्रश्न सामने आता हैं की *दक्षिण धृव तक सीधी रेखा में समुद्र में कोई अवरोध नहीं हैं, ऐसा बाद में खोज निकाला, या दक्षिण धृव से भारत के पश्चिम तट पर, बिना अवरोध के सीधी रेखा जहां मिलती हैं, वहां पहला ज्योतिर्लिंग स्थापित किया..?*

उस बाण स्तंभ पर लिखी गयी उन पंक्तियों में,
(‘आसमुद्रांत दक्षिण धृव पर्यंत, अबाधित ज्योतिरमार्ग..’)
जिसका उल्लेख किया गया हैं, वह ‘ज्योतिरमार्ग’ क्या है..?

यह आज भी प्रश्न ही हैं..!

सोमवार, 23 जुलाई 2018

माओवादी और मिशनरीज की रोटी पर पलता अग्निवेश फर्जी गेरुआधारी है: वस्तुतः ईसाई है: वेटिकन का प्यादा है अग्निवेश।

सोनियाँ सरकार में बड़ी दलाली का काम वही कर सकता था जो रोमन कैथोलिक ईसाई हो। आपको पता होना चाहिए कि सोनियाँ काँग्रेस के शासनकाल में सबसे बड़े लायजनर्स में अग्निवेश की गिनती होती थी। अग्निवेश सत्ता के गलियारे के चमकते सितारे थे उन दिनों। अग्निवेश की कृपा प्राप्त हो जाने पर सोनियाँ सरकार में बड़े से बड़ा काम करा लेते थे लोग।

अग्निवेश का जन्म हुआ आंध्रप्रदेश में। पले बढ़े पढ़े छत्तीसगढ़ में और जीवन भर काम किया मिशनरीज और माओवाद के लिए। विनायक सेन जैसे दुर्दांत माओवादी को सोनियाँ सरकार के सहारे फाँसी से बचा लेने का चमत्कार कर दिखाया था अग्निवेश ने। आज तक भी विनायक सेन की गर्दन फाँसी के फंदे तक न पहुँच सका। यह सोनियाँ की शक्ति नहीं है यह चर्च की शक्ति का परिणाम है।

अग्निवेश एक संगठन चलाता है सर्व धर्म संसद। उस संगठन की जहाँ भी बैठक होती है वहाँ सर्व धर्म के नाम पर केवल चर्च का बोलबाला होता है। और सनातन धर्म का स्वयंभू प्रतिनिधि हर बार अग्निवेश ही होता है। अर्थात यह सर्व धर्म संसद केवल चर्च की संसद बनकर रह गया है। या यूँ कहें कि चर्च के हितों को ध्यान में रखकर ही यह संगठन बनाया गया है।

19 जून 2009 को G8 सम्मेलन से ठीक पहले रोम में सर्व धर्म संसद का आयोजन हुआ। आयोजक अग्निवेश थे। चूँकि इस संगठन के सर्वेसर्वा अग्निवेश ही हैं। उस सम्मेलन से तीन दिन पहले सभी डेलीगेट्स भारी सुरक्षा व सुविधा के अंतर्गत भूकंप प्रभावित ला अकीला शहर में ले जाए गए। जहाँ वेटिकन के पादरियों द्वारा मृतकों के लिए सामूहिक प्रेयर का आयोजन हुआ। सारी व्यवस्था वेटिकन ने ही किया था। प्रेयर का आइडिया अग्निवेश का ही था। यदि तुम आर्य समाजी थे और सनातनी थे तो वहाँ वैदिक स्वस्तिवाचन व शांति पाठ भी करवा सकते थे। किन्तु चर्च का प्रेयर जिसको आनन्दित करता हो वह वैदिक शांति पाठ क्यों करेगा?

सर्व धर्म संसद का उद्घाटन संध्या 5 बजे रोम के प्रसिद्ध विला मडामा में हुआ। उद्घाटनकर्ता था कम्युनिटी ऑफ सेंट इडिगो का संस्थापक प्रोफेसर एंड्रिया रिकार्डी। एंड्रिया रिकार्डी चर्च के सम्बंध में ही पुस्तकें लिखता रहा है। इसी लेखन के कारण वह इतिहासकार कहा जाता है। चर्च के विश्वस्त लोगों में से एक वफादार है एंड्रिया रिकार्डी। वही व्यक्ति अग्निवेश के सर्व धर्म संसद का उद्घाटनकर्ता महापुरुष था। अग्निवेश के रिश्ते सम्बंधों को समझने के लिए यह लिंक महत्वपूर्ण है।

अपने वेटिकन के लिंक के कारण ही अग्निवेश लगातार हिन्दू धर्म के विविध तीर्थ, पर्व-उत्सवों और रीति नीति पर आक्रमण करता रहा है। अग्निवेश का माओवाद के साथ गहरा संबंध भी उसके हिन्दू विरोधी होने का एक प्रमुख कारण रहा है। अग्निवेश झारखंड और छत्तीसगढ़ के माओवादियों से बड़े निकट से जुड़ा रहा है। इन दोनों राज्यों के चर्च और मिशनरीज से भी अग्निवेश के बड़े गहरे संबंध रहे हैं। अग्निवेश इनके लिए अनेकों बार काम करता हुआ दिखाई देता है।

अभी की अग्निवेश की झारखंड यात्रा भी चर्च के लिए ही थी। अग्निवेश राँची के समीप खूँटी में वहाँ के सभी मिशनरीज के प्रमुख लोगों से मिलकर उनको साहस देने का काम किया। हीलिंग टच टू मिशनरीज। बच्चा बेचने वाली घटना में सिस्टर कोनसिलिया और सिस्टर मेरिडियन के पकड़े जाने और अपराध स्वीकार कर लेने के बाद राज्य सरकार द्वारा मिशनरीज ऑफ चैरिटी के ठिकानों पर पड़े छापे के बाद मिशनरीज की चूलें हिल गई हैं।

भारत का कैथोलिक विशप थियोडोर मैशकरेनहैस इस छापे के तुरंत बाद दिल्ली से दौड़ते हुए राँची पहुँचा था। किंतु उसके वहाँ जाने और दलाली के तमाम प्रयत्न विफल रहे तब दलाल शिरोमणि अग्निवेश को थियोडोर मैशकरेनहैस ने खूंटी भेजा। पाकुड़ यात्रा लोगों को भ्रमित करने के लिए आयोजित किया गया था।
किन्तु कुछ नैजवानों के आक्रामक रवैये ने सारा भ्रम निवारण कर दीया पर इसकी संरचना इसने स्वयं तैयार किया था
  जी 8 सम्मेलन होने से पहले और बच्चे बेचने के आरोप में चर्च पर शिकंजा कसता जा रहा था इसके दोनों नन गिरफ्तार हो चुके थे जिसके लिए यह एक प्रमुख नाटक करना आवश्यक हो गया था यह वेटिकन का आदेश था

शुक्रवार, 20 जुलाई 2018



आज हम अमेरिका और पश्चिमी देशों की नकल में अपने बच्चे को बर्बाद कर रहे हैं और पाश्चात्य शिक्षा व्यवस्था की तरफ भागे जा रहे हैं वही अमेरिका वायरल हुआ यह वीडियो  स्पष्ट  बताता है की अमेरिका के लोग भारत के उस पुरानी पनिशमेंट सिस्टम दंड व्यवस्था को कैसे अपना रहे हैं सुपरपावर ब्रेन योगा नाम से।
 हमारी बच्चों को पढ़ाने की लिए बच्चों के दंड की जो व्यवस्था थी  आज सारे अमेरिकी दंड भुगत भुगतने में अपने को गर्व महसूस करते हैं और इस दंड को लेने के लिए वह बकायदा  भुगतान भी करना पड़ता है और डॉक्टर का एक विधिवत प्रिस्क्रिप्शन भी है यह  लिंक में दिए गए वीडियो को देखने के बाद आप स्वयं अपना निर्णय स्वयं करें
 अजय कर्मयोगी
 https://youtu.be/5H1pRDWJOfo

गुरुवार, 7 जून 2018



स्वास्थ्य का खजाना

शंख

शंख दो प्रकार के होते हैं – दक्षिणावर्त एवं वामावर्त। दक्षिणावर्त शंख पुण्य योग से मिलता है। यह जिसके यहाँ होता है उसके यहाँ लक्ष्मी जी निवास करती हैं। यह त्रिदोषशामक, शुद्ध एवं नवनिधियों में से एक निधि है तथा ग्रह एवं गरीबी की पीड़ा, क्षय, विष, कृशता एवं नेत्ररोग का नाश करता है। जो शंख सफेद चन्द्रकान्तमणि जैसा होता है वह उत्तम माना जाता है। अशुद्ध शंख गुणकारी नहीं होते, उन्हें शुद्ध करके ही दवा के रूप में प्रयोग में लाया जाता है।
भारत के महान वैज्ञानिक श्री जगदीशचन्द्र बसु ने सिद्ध करके बताया है कि शंख को बजाने पर जहाँ तक उसकी ध्वनि पहुँचती वहाँ तक रोग उत्पन्न करने वाले कई प्रकार के हानिकारक जीवाणु नष्ट हो जाते हैं। इसीलिए अनादिकाल से प्रातःकाल एवं संध्या के समय मंदिरों में शंख बजाने का रिवाज चला आ रहा है।
संध्या के समय हानिकारक जंतु प्रकट होकर रोग उत्पन्न करते हैं, अतः उस समय शंख बजाना आरोग्य के लिए लाभदायक हैं और इससे भूत-प्रेत, राक्षस आदि भाग जाते हैं।
औषधि-प्रयोगः
मात्राः अधोलिखित प्रत्येक रोग में 50 से 250 मि.ग्रा. शंखभस्म ले सकते हैं।
गूँगापनः गूँगे व्यक्ति के द्वारा प्रतिदिन 2-3 घंटे तक शंख बजवायें। एक बड़े शंख में 24 घंटे तक रखा हुआ पानी उसे प्रतिदिन पिलायें, छोटे शंखों की माला बनाकर उसके गले में पहनायें तथा 50 से 250 मि.ग्रा. शंखभस्म सुबह शाम शहद  साथ चटायें। इससे गूँगापन में आराम होता है।
तुतलापनः 1 से 2 ग्राम आँवले के चूर्ण में 50 से 250 मि.ग्रा. शंखभस्म मिलाकर सुबह शाम गाय के घी के साथ देने से तुतलेपन में लाभ होता है।
तेजपात (तमालपत्र) को जीभ के नीचे रखने से रूक रूककर बोलने अर्थात् तुतलेपन में लाभ होता है।
सोते समय दाल के दाने के बराबर फिटकरी का टुकड़ा मुँह में रखकर सोयें। ऐसा नित्य करने से तुतलापन ठीक हो जाता है।
दालचीनी चबाने व चूसने से भी तुतलापन में लाभ होता है।
दो बार बादाम प्रतिदिन रात को भिगोकर सुबह छील लो। उसमें 2 काली मिर्च, 1 इलायची मिलाकर, पीसकर 10 ग्राम मक्खन में मिलाकर लें। यह उपाय कुछ माह तक निरंतर करने से काफी लाभ होता है।
मुख की कांति के लिएः शंख को पानी में घिसकर उस लेप को मुख पर लगाने से मुख कांतिवान बनता है।
बल-पुष्टि-वीर्यवर्धकः शंखभस्म को मलाई अथवा गाय के दूध के साथ लेने से बल-वीर्य में वृद्धि होती है।
पाचन, भूख बढ़ाने हेतुः लेंडीपीपर का 1 ग्राम चूर्ण एवं शंखभस्म सुबह शाम शहद के साथ भोजन के पूर्व लेने से पाचनशक्ति बढ़ती है एवं भूख खुलकर लगती है।
श्वास-कास-जीर्णज्वरः 10 मि.ली. अदरक के रस के साथ शंखभस्म सुबह शाम लेने से उक्त रोगों में लाभ होता है।
उदरशूलः 5 ग्राम गाय के घी में 1.5 ग्राम भुनी हुई हींग एवं शंखभस्म लेने से उदरशूल मिटता है।
अजीर्णः नींबू के रस में मिश्री एवं शंखभस्म डालकर लेने से अजीर्ण दूर होता है।
खाँसीः नागरबेल के पत्तों (पान) के साथ शंखभस्म लेने से खाँसी ठीक होती है।
आमातिसारः (Diarhoea) 1.5 ग्राम जायफल का चूर्ण, 1 ग्राम घी एवं शंखभस्म एक एक घण्टे के अंतर पर देने से मरीज को आराम होता है।
आँख की फूलीः शहद में शंखभस्म को मिलाकर आँखों में आँजने से लाभ होता है।
परिणामशूल (भोजन के बाद का पेट दर्द)- गरम पानी के साथ शंखभस्म देने से भोजन के बाद का पेटदर्द दूर होता है।
प्लीहा में वृद्धिः (Enlarged Spleen) अच्छे पके हुए नींबू के 10 मि.ली. रस में शंखभस्म डालकर पीने से कछुए जैसी बढ़ी हुई प्लीहा भी पूर्ववत् होने लगती है।
सन्निपात-संग्रहणीः (Sprue) शंखभस्म को 3 ग्राम सैंधव नमक के साथ दिन में तीन बार (भोजन के बाद) देने से कठिन संग्रहणी में भी आराम होता है।
हिचकी ()- मोरपंख के 50 मि.ग्रा. भस्म में शंखभस्म मिलाकर शहद के साथ डेढ़-डेढ़ घंटे के अंतर पर चाटने से लाभ होता है।

बुधवार, 6 जून 2018




तेलिया कंद - एक चमत्कारिक जड़ी बूटी, Teliya kand
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भारत के गौरव्मान इतिहास को कोन नहीं जानता,यह तो विश्व व्यापी है  की भारत एक ऋषि मुनियों का देश रहा है और सभी क्षेत्रों जैसे विज्ञानं गणित आयुर्वेद में बहुत पहले से सभी दुसरे देशों से आगे है| भारत में प्राचीन काल में ऐसे बहुत सी खोज हो चुकी थी जो की बाकी देशों ने कई सदियों बाद की| भारत शुरू से ही सोने की चिड़िया कहलाता रहा है जिसे न जाने कितने देश सदियों तक लूटते रहे लेकिन फिर भी इसका खजाना खाली ना कर पाए|
भारत के सोने की चिड़िया होने और यहाँ पर सोना बनाये जाने के बारे में हो सकता है कुछ जोड़ हो|
भारत देश में सेंकडों ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपनी आखों के सामने जड़ी बूटियों से पारा, ताम्बा, जस्ता, तथा चांदी से सोना बनते देखा है तथा आज भी देश में हजारों लोग इस रसायन क्रिया में लगे हुए हैं| अकेले बूंदी जिले (राज.) में ही सेंकडों लोग इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं| पूर्व में बूंदी के राजा हाडा प्रतिदिन क्विन्त्लों में चांदी का दान किया करते थे जो की मान्यताओं के अनुसार बुन्टियों के माध्यम से ही तैयार की जाती थी| इस पूरी प्रक्रिया में लोग पारे को ठोस रूप में बदलने की कोशिश करते हैं तथा गंधक के तेल से पारे का एक एलेक्ट्रोन कम हो जाता है तथा वो गंधक पारे को पीला रंग दे देता है|
2Hg+ S = Hg2S (-2e ) ( सोना)

देश के हजारों लोग मानते हैं की देश के कॉर्पोरेट जगत के बड़े बड़े उद्योगपतियों ने इन्ही जड़ी बूटियों के माध्यम से तथा साधुओं के सहयोग से टनों सोना तैयार किया है|

सोने के निर्माण में तेलिया कंद जड़ी बूटी का बहुत बड़ा योगदान है इसलिए पहले तेलिया कंद के बारे में जान लेते हैं|
तेलिया कंद एक चमत्कारी जड़ी बूटी है| देश विदेश के लोगों की रूचि को देखते हुए में तेलिया कंद के बारे में अपनी राय दे रहा हूँ|

तेलिया कंद एक चमत्कारिक पोधा है| जिसका सबसे पहला गुण परिपक्वता की स्थिति में जेहरीले से जेहरिले सांप से काटे हुए इंसान का जीवन बचा सकता है|
दूसरा ये पारे को सोने में बदल सकता है|

तेलिया कंद का पोधा 12 वर्ष उपरांत अपने गुण दिखता है| तेलिया कंद male और female 2 प्रकार का होता है|
इसके चमत्कारी गुण सिर्फ male में ही होते है| इसके male कंद में सुई चुभोने पर इसके तेजाबी असर से
वो गलकर निचे गिर जाती है| पहचान स्वरुप जबकि female जड़ी बूटी में ऐसा नहीं होता|

इसका कंद शलजम जैसा रंग आकृति लिए हुए होता है तथा पोधा सर्पगंधा से मिलती जुलती पत्ती जैसा
होता है| इसका पोधा वर्षा ऋतू में फूटता है और वर्षा ऋतू ख़तम होने के बाद ख़तम हो जाता है|
जबकि इसका कंद जमीन में ही सुरक्षित रह जाता है| इस तरह से लगातार हर मौसम में ऐसा ही होता है|
और ऐसा 12 वर्षों में लगातार होने के बाद इसमें चमत्कारिक गुण आते हैं| इसके पोधे के आसपास की जमीन का क्षेत्र
तेलिय हो जाता है तथा उस क्षेत्र में आने वाले छोटे मोटे कीड़े मकोड़े उसके तेलिये असर से मर जाते हैं|
हम लोगों ने पारस पत्थर के बारे में तो सुना ही होगा| पारस पत्थर पारे का ठोस रूप होता है जो प्रकर्ति में गंधक के साथ मिलकर उच्च दाब और उच्च ताप की
परिस्थितिओं में बनता है| उसी उच्च दाब और उच्च ताप की परिस्थितिओं में तेलिया कंद पारे को ठोस रूप में बदलने में सहायक होता है|

जैसा की आयुर्वेदिक के हिसाब से पारा शिवजी का रूप है और गंधक पार्वती का रूप है| उसी तर्ज पर पारा

[hg,80] + गंधक (sulphar) ----> उत्प्रेरक ( तेलिया कंद )

तेलिया कंद
Hg + S =============> gold
उत्प्ररेक

पारे को गंधक के तेल में घोटकर उसमे तेलिया कंद मिलाकर बंद crucible में गरम करते हैं| इस क्रिया में
पारे का 1 अणु गंधक खा जाता है| गंधक पारे में अपना पीला रंग देता है| तेलिया कंद पारे को उड़ने नहीं देता
तथा पारा मजबूर होकर ठोस रूप में बदल जाता है और वो सोना बन जाता है|
ये बूटी कहाँ मिलती है| हमारे knowledge के हिसाब से ये बूटी भारत के कई जंगलों में पायी जाती है| 1982 तक भीलों का डेरा mount abu में बालू भील से देश के सभी क्षेत्र के लोग ये बूटी खरीद के
ले जाते थे| बालू भील का देहांत हो चूका है तथा उसके बच्चे इसकी अधिक जानकारी नहीं रखते|

इस बूटी का चमत्कार करते हुए अंतिम बार बूंदी में बाबा गंगादास के आश्रम 1982 में देखा गया था| आज भी देश में हजारों लोग खासकर काल्बेलिये और साधू इसके चमत्कारिक गुण का उपयोग करते हैं|
तेलिया कंद की जगह देश में अन्य चमत्कारिक बूटियां भी काम में ली जाती हैं जैसे रुद्रबंती, अंकोल का तेल, तीन धार की हाद्जोद इत्यादि। आज के व्यज्ञानिक युग में पारे और गंधक को मिलाकर अन्य जड़ी बुटिओं को इस्तेमाल करके भी व्यग्यानिकों को इसपर काम करना चाहिए| क्यूंकि पारे का 1 एलेक्ट्रोन कम होते ही और गंधक में जाते ही वो पारा ठोस रूप में आके सोने में बदल सकता है| ऐसे कोई भी जडीबुटी जो पारे को गरम करने पर उड़ने से रोक सकती है और गंधक के तेल के साथ क्रिया करने पर पारे को सोने में बदल सकती है    अजय कर्मयोगी

बुधवार, 23 मई 2018


अमेरिका जहां का वालमार्ट खुद है वहीं उसका विरोध होता है।भारत मे व्यापारी ओर जनता इसका विरोध करें क्योंकि सरकार तो देश बेचने के लिए तैयार हैं क्योंकि कर्जदार है।
10 कारण है की क्यों वालमार्ट से अमेरिका के लोग इतनी घृणा करते है ओर जिसे मोदी सरकार ने भारत मे व्यापार करने की अनुमति Make In India के तहत दे दी है।
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1) Walmart hurts local communities
सच्चाई यह है कि जहां वॉलमार्ट है, वहां वह चीजों को बेहतर नही और भी बदतर बना देता हैं,और इससे वहां के लोगों की आर्थिक व्यवस्था खराब होने लगती है।
2)The company uses foreign labor, including child workers
बंगलादेश,वालमार्ट में बच्चों को नियमित रूप से दिन में 12 से 14 घंटे काम करने के लिए मजबूर होना पड़ता है,यहां तक ​​कि कुछ तो सारी रात,19 -20-घंटे की शिफ्ट तक काम करते हैं ओर उन्हें मजदूरी इतनी कम मिलती है कि बच्चे दांत साफ करने के लिए टूथ ब्रश ओर टूथ पेस्ट भी नही खरीद पाते।
3)Walmart underpays women and neglects pregnant workers
गर्भवती महिलाओं को कोई राहत नही मिलती गर्भवती होने पर वॉलमार्ट द्वारा निकाल दिया जाता हैं।
4)The company also discriminates against workers with a disability and elderly employees
विकलांग और वृद्ध कर्मचारियों से भेदभाव करती है।उन्हें न कोई विशेष सहायता और न ही आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है।
5) It isn’t a safe environment for employees
विदेशों में कारखानों में असुरक्षित परिस्थितियों के अलावा,वॉलमार्ट भी अपने कर्मचारियों को घर पर खतरे में डाल देने के लिए कुख्यात रहा है।इसका सबसे प्रचारित उदाहरण रात की "लॉक-इन्स" नीति का अभ्यास रहा है।वे अपनी नौकरियों में रहे,कई वॉलमार्ट आउटलेट कर्मचारियों को रात में सचमुच बंद(लॉक)कर दिया जाता है।2004 में,न्यूयॉर्क टाइम्स 'स्टीवन ग्रीनहाउस ने नोट किया कि इस नीति ने "निराशाजनक स्थितियों का निर्माण किया है,जैसे कि जब इंडियाना में एक कर्मचारी को दिल का दौरा पड़ा गया।फ्लोरिडा में तूफान में एक कर्मचारी मारा गया।ये लॉक -इन्स श्रमिक रूप से कड़ी मेहनत कर रहे थे,जिन्हें जेनिटर के रूप में नियुक्त किया गया था,जिनमें से कुछ ने कंपनी के खिलाफ एक क्लास एक्शन सूट दायर किया था और दावा किया था कि उन्हें सात दिन, 70 घंटे के सप्ताह में 1,500 डॉलर प्रति माह काम करने के लिए मजबूर होना पड़ा था,कई बार रात भर स्टोर में काम करना पड़ता है।
6) The company is notorious for wage theft
अपने कर्मचारियों से दुर्व्यवहार करने के अलावा,वॉलमार्ट ने कुछ तरीकों से वर्षों से कर्मचारियों का धन चुराया है। एक उदाहरण में, कंपनी ने कर्मचारियों को नई पौशाक खरीदने के लिए मजबूर कर दिया गया।अन्य उधारणों में कर्मचारियों को वालमार्ट में लंच टाइम में भी काम करवाने के लिए मजबूर किया गया ताकि एक वक्त के भोजन का पैसा बचाया जा सके।
7) Walmart provides poor healthcare for workers
वॉलमार्ट के कर्मचारियों को अधिकतर अमेरिकी श्रमिकों की तुलना में औसत अधिक बीमार पाया गया।हालांकि कंपनी ने लोभ के रूप में सस्ता बीमा एवं सब्सिडी प्रदान करने के लिए विभिन्न कदम उठाए जिसमें की कर्मचारियों कम देखभाल शामिल हों।
8.) Walmart has a bad track record on animal welfare
रिपोर्टों से पता चलता है कि वॉलमार्ट सबसे बुरी कंपनियों में से एक है।जानवरों के उत्पादों को बेचने के लिए पशुओं के उत्पादों से पशुओं का उत्पादन किया गया था।यदि आप जानवरों की परवाह करते हैं, तो वॉलमार्ट से खरीदारी न करें।
9) However, Walmart does care about rich people
वॉलमार्ट सिर्फ लालची नहीं है। कंपनी लालच का प्रतीक है। चूंकि इसके अत्यधिक कामकाजी और कम वेतन वाले कर्मचारी अपने काम का समाप्त होने के लिए संघर्ष करते हैं,ओर वॉलमार्ट इनका शौषण कर अरबों बना लेता है, भले ही स्टॉक गिर रहा है पर कम्पनी के लिए पूंजीवाद ही सबकुछ है।
10) The chain has a deceptive public image
यह पोस्ट एक निवेदन ओर मेरी सार्वजनिक सेवा है जो कि ये घोषणा करती है कि वहां से कभी खरीदारी न करें।अगर आप देश की मदद कर सकते हैं तो वहां काम न करें और यदि आपको वहां काम करना है,तो अच्छे इलाज की अपेक्षा न करें। वॉलमार्ट आपके देश का रोजगार और आपसे सबकुछ छीन ले उससे पहले इससे बाहर निकलें।वॉलमार्ट की बदसूरत प्रथाएं,नीतियां,शक्ति और दुर्व्यवहार का चक्र हैं,इसे तोड़ने का एक ही तरीका है इसका बहिष्कार करें और यह आपके साथ से ही सम्भव है।
(गरीबी हटा नही सकते तो गरीबों का शौषण कर के उसे मार डालो।
ये आज कि सरकार की नीति है)
Report By _ Rohit Sharma(जीत)

शुक्रवार, 18 मई 2018

भैरवी शक्ति साधना और कुंडलिनी शक्ति जागरण

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नाड़ी (योग)

योग के सन्दर्भ में नाड़ी वह मार्ग है जिससे होकर शरीर की ऊर्जा प्रवाहित होती है। योग में यह माना जाता है कि नाडियाँ शरीर में स्थित नाड़ीचक्रों को जोड़तीं है।

पद्मासन मुद्रा 1. मूलाधार चक्र 2. स्वाधिस्ठान चक्र 3. नाभि चक्र 4. अनाहत चक्र 5. विशुद्धि चक्र 6. आज्ञा चक्र 7. सहस्रार चक्र ; A. कुण्डलिनी B. ईड़ा नाड़ी C. सुषुम्ना नाड़ी D. पिंगला नाड़ी
कई योग ग्रंथ १० नाड़ियों को प्रमुख मानते हैं[1]। इनमें भी तीन का उल्लेख बार-बार मिलता है - ईड़ा, पिंगला और सुषुम्ना। ये तीनों मेरुदण्ड से जुड़े हैं। इसके आलावे गांधारी - बाईं आँख से, हस्तिजिह्वा दाहिनी आँख से, पूषा दाहिने कान से, यशस्विनी बाँए कान से, अलंबुषा मुख से, कुहू जननांगों से तथा शंखिनी गुदा से जुड़ी होती है। अन्य उपनिषद १४-१९ मुख्य नाड़ियों का वर्णन करते हैं।

ईड़ा ऋणात्मक ऊर्जा का वाह करती है। शिव स्वरोदय, ईड़ा द्वारा उत्पादित ऊर्जा को चन्द्रमा के सदृश्य मानता है अतः इसे चन्द्रनाड़ी भी कहा जाता है। इसकी प्रकृति शीतल, विश्रामदायक और चित्त को अंतर्मुखी करनेवाली मानी जाती है। इसका उद्गम मूलाधार चक्र माना जाता है - जो मेरुदण्ड के सबसे नीचे स्थित है।

पिंगला धनात्मक ऊर्जा का संचार करती है। इसको सूर्यनाड़ी भी कहा जाता है। यह शरीर में जोश, श्रमशक्ति का वहन करती है और चेतना को बहिर्मुखी बनाती है।

पिंगला का उद्गम मूलाधार के दाहिने भाग से होता है जबकि ईडां का बाएँ भाग से।

सुषुम्ना नाड़ियों में इंगला, पिगला और सुषुम्ना तीन प्रधान हैं. इनमें भी सुषुम्ना सबसे मुख्य है। सुषुम्ना नाड़ी जिससे श्वास, प्राणायाम और ध्यान विधियों से ही प्रवाहित होती है। सुषुम्ना नाड़ी से श्वास प्रवाहित होने की अवस्था को ही 'योग' कहा जाता है। योग के सन्दर्भ में नाड़ी वह रास्ता है जिसके द्वारा शरीर की ऊर्जा का परिवहन होता है।

सुषुम्ना नाड़ी मूलाधार (Basal plexus) से आरंभ होकर यह सिर के सर्वोच्च स्थान पर अवस्थित सहस्रार तक आती है। सभी चक्र सुषुम्ना में ही विद्यमान हैं।
अधिकतर लोग इड़ा और पिंगला में जीते और मरते हैं और मध्य स्थान सुषुम्ना निष्क्रिय बना रहता है। परन्तु सुषुम्ना मानव शरीर-विज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। जब ऊर्जा सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करती है, असल में तभी से यौगिक जीवन शुरू होता है

सावधान....एक साधना ऐसी भी (वाममार्ग)
कल मैंने आप सभी को इड़ा और पिंगला नाड़ी के विषय में बताया था शायद आप सभी को याद होगा इडा ऋणात्मक हैं और पिंगला धनात्मक है पुरुष के देह में आधा शरीर स्त्री का ही होता है बिना स्त्री तत्व के पुरुष पूर्ण नहीं हो सकता यह स्वयं पिंगला का प्रतिरूप होता है जबकि स्त्री स्वयं इडा का प्रतिरूप होती है ॠणात्मक होती हैं आगे का लेख इसी क्रम को आगे बढ़ाता है ध्यान से पढे
तंत्र साधना शक्ति साधना है |शक्ति प्राप्त करके उससे मोक्ष की अवधारणा तंत्र की मूल अवधारणा है |स्त्रियों को शक्ति का रूप माना जाता है ,कारण प्रकृति की ऋणात्मक ऊर्जा जिसे शक्ति कहते हैं स्त्रियों में शीघ्रता से अवतरित होती है ,और तंत्र शक्ति को शीघ्र और अत्यधिक पाने का मार्ग है अतः तंत्र के क्षेत्र में प्रविष्ट होने के उपरांत साधक को किसी न किसी चरण में भैरवी का साहचर्य ग्रहण करना पड़ता ही है। तंत्र की एक निश्चित मर्यादा होती है। प्रत्येक साधक, चाहे वह युवा हो, अथवा वृद्ध, इसका उल्लंघन कर ही नहीं सकता, क्योंकि भैरवी ‘शक्ति’ का ही एक रूप होती है, तथा तंत्र की तो सम्पूर्ण भावभूमि ही, ‘शक्ति’ पर आधारित है।भैरवी ,स्त्री होती है और स्त्री शरीर रचना की दृष्टि से और मानसिक संरचना की दृष्टि से कोमल और भावुकता प्रधान होती है |यह उसका नैसर्गिक प्राकृतिक गुण है |उसमे ऋण ध्रुव अधिक शक्तिशाली होता है और शक्ति साधना प्रकृति के ऋण शक्ति की साधना ही है |इसलिए भैरवी में ऋण शक्ति का अवतरण अतिशीघ्र और सुगमता से होता है जबकि पुरुष अथवा भैरव में इसका वतरण और प्राप्ति कठिनता से होती है ,|इस कारण भैरव को भैरवी से शीघ्रता और सुगमता से शक्ति प्राप्त हो जाती है |भैरवी साधना या भैरवी पूजा का रहस्य यही है, कि साधक को इस बात का साक्षात करना होता है, कि स्त्री केवल वासनापूर्ति का एक माध्यम ही नहीं, वरन शक्ति का उदगम भी होती है और यह क्रिया केवल सदगुरुदेव ही अपने निर्देशन में संपन्न करा सकते है, क्योंकि उन्हें ही अपने किसी शिष्य की भावनाओं व् संवेदनाओं का ज्ञान होता है। इसी कारणवश तंत्र के क्षेत्र में तो पग-पग पर गुरु साहचर्य की आवश्यकता पड़ती है, अन्य मार्गों की अपेक्षा कहीं अधिक। किन्तु यह भी सत्य है, कि समाज जब तक भैरवी साधना या श्यामा साधना जैसी उच्चतम साधनाओं की वास्तविकता नहीं समझेगा, तब तक वह तंत्र को भी नहीं समझ सकेगा, तथा, केवल कुछ धर्मग्रंथों पर प्रवचन सुनकर अपने आपको बहलाता ही रहेगा।
प्रारम्भिक काल से ही शक्ति साधना तंत्र का अंग रहा है |इसके अपने सूत्र रहे हैं |बाद में इसमें दो धाराएं चलने लगी वाम मार्गी और दक्षिण मार्गी |दक्षिण मार्गी साधना वैदिक मार्ग से प्रेरित रही और समाज का वह वर्ग इससे जुड़ा रहा जो सात्विक विचारधारा का था |दूसरा मार्ग वाम मार्ग शक्ति साधना को तामसिकता से करने की और बढ़ा और उसके एकाग्रता आदि बढाने के लिए शराब आदि का सेवन शुरू किया |इस प्रकार शक्ति उपासकों का जो दुसरा वाम मार्गी मत था, उसमें शराब को जगह दी गई। उसके बाद बलि प्रथा आई और माँस का सेवन होने लगा। इसी प्रकार इसके भी दो हिस्से हो गये, जो शराब और माँस का सेवन करते थे, उन्हे साधारण-तान्त्रिक कहा जाने लगा। लेकिन जिन्होनें माँस और मदिरा के साथ-साथ मीन(मछली), मुद्रा(विशेष क्रियाँऐं), मैथुन(स्त्री का संग) आदि पाँच मकारों का सेवन करने वालों को सिद्ध-तान्त्रिक कहाँ जाने लगा। आम व्यक्ति इन सिद्ध-तान्त्रिकों से डरने लगा। किन्तु आरम्भ में चाहें वह साधारण-तान्त्रिक हो या सिद्ध-तान्त्रिक, दोनों ही अपनी-अपनी साधनाओं के द्वारा उस ब्रह्म को पाने की कोशिश करते थे। जहाँ आरम्भ में पाँच मकारों के द्वार ज्यादा से ज्यादा ऊर्जा बनाई जाती थी और उस ऊर्जा को कुन्डलिनी जागरण में प्रयोग किया जाता था। ताकि कुन्डलिनी जागरण करके सहस्त्र-दल का भेदन किया जा सके और दसवें द्वार को खोल कर सृष्टि के रहस्यों को समझा जा सके।कोई माने या न माने लेकिन यदि काम-भाव का सही इस्तेमाल किया जा सके तो इससे ब्रह्म की प्राप्ति सम्भव है।
इसी वक्त एक और मत सामने आया जिसमें की भैरवी-साधना या भैरवी-चक्र को प्राथमिकता दी गई। इस मत के साधक वैसे तो पाँचों मकारों को मानते थे, किन्तु उनका मुख्य ध्येय काम के द्वारा ब्रह्म की प्राप्ति था।इसमें कुंडलिनी जागरण हेतु काम भाव का सहारा लिया गया जिसकी तीब्रता से मूलाधार की शक्ति बढाकर उसे जागृत किये जाने का सूत्र अपनाया गया |यह सूत्र प्राकृतिक होने पर भी अति कठिन था ,और अधिकतर साधकों के भटकने ,नष्ट होने ,पथभ्रष्ट होने का खतरा था ,अतः इसे अति गोपनीय रखा गया और इस पर कोई भी प्रामाणिक और पूर्ण जानकारी देने वाले ग्रन्थ की रचना नहीं की गयी ,केवल इसे गुरु परंपरा से ही चलाया गया |यही कारण है की इस विद्या के सांकेतिक विवरण ही मिलते हैं ,पूर्ण ज्ञान केवल गुरु द्वारा ही प्राप्त हो सकता है |इस साधना में भी बाद में कई भेद उत्पन्न हो गए |मूल भैरवी साधना कुंडलिनी जागरण की साधना है ,जिसमे काम भाव को तीब्र से तीब्रतर करके मूलाधार का जागरण और तदुपरांत ऊर्जा को उर्ध्वमुखी करते हुए अन्य चक्रों का भेदन किया जाता है |इसकी अपनी गोपनीय विधियाँ हैं |इस मार्ग में बाद में अपने अनुसार परिवर्तन किये गए |कुछ मार्ग पंचमकार का सेवन करते हुए मैथुनोपरांत वीर्य -रज को शक्ति को समर्पित करने लगे |यह अति भावुकता का मार्ग था जिसमे देवी को सब समर्पित किया जाने लगा |कुछ में अन्य विधियाँ भी अपनाई जाने लगी |सात्विक मार्ग में कन्याओं का पूजन ,किसी मार्ग में योनी पूजन मात्र आदि अनेक मार्ग विकसित हुए |जबकि मूल भैरवी साधना काम शक्ति को तीब्रतर करके शक्ति प्राप्त करने की थी और उसमे स्खलन की सख्त मनाही है ,क्योकि स्खलन होने ही शक्ति का क्षय हो जाता है जबकि वह सम्बंधित चक्र को न भेद पाया हो |अतः एक निश्चित लक्ष्य तक इसमें स्खलन की सख्त मनाही है |इसी तरह इसमें कुछ ऐसी बातें भी सामने आने लगी की इसका नाम और स्वरुप बदनाम हो गया |भैरवी साधना के नाम पर कुछ शोषण की घटनाएँ भी दिखी |जबकि मूल साधना परम पवित्र और शिव-शक्ति की प्राप्ति का मार्ग है और उसका उद्देश्य मोक्ष है |…………………………………………………………………………हर-हर महादेव

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...