गुरुवार, 27 सितंबर 2018

#वैदिक_साहित्य_और_विज्ञान - #भाग - 17 ------

--------------------- #चिकित्सा_विज्ञान ---------------------
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वैदिक साहित्य सिर्फ भारत की ही नही अपितु सम्पूर्ण विश्व की अमूल्य और मौलिक निधि है , इसमे ज्ञान विज्ञान का विषद भंडार है , इस सिर्फ भारतीय ही नही अपितु विदेशी भी इसके ज्ञान के सम्मुख श्रद्धा से नत होते है , भारतीय आयुर्विज्ञान या आयुर्वेद वैदिक साहित्य का अभिन्न अंग है और आज का आधुनिक युग मे भी इसकी महत्ता कम नही हुई है , भारतीय विद्याओं में आयुर्वेद की गौरवमयी परम्परा है। महर्षियों ने इसे अतिपुरातन और शाश्वत कहा है। सुश्रुत के अनुसार, ब्रह्मा ने सृष्टि के पूर्व ही इसकी रचना की। सभी संहिताकारों ने ब्रह्मा से आयुर्वेद का प्रादुर्भाव माना है। भारतीय वांग्मय के प्राचीनतम ग्रन्थ वेदों में आयुर्वेद का ज्ञान दक्ष प्रजापति ने प्राप्त किया। प्रजापति से अश्विनीकुमारों ने और उनसे इन्द्र ने उस ज्ञान को प्राप्त किया-
ब्रह्मणा हि यथाप्राक्तमायुर्वेदं प्रजापतिः।
जग्राह निखिलेनादावश्विनौ तु पुनस्ततः।।

मनीषियों ने आयुर्वेद को उपवेद के रूप में स्वीकार किया है। यद्यपि कुछ विद्वान इसे ऋग्वेद का तथा अधिकाँश अथर्ववेद का अविच्छिन्न अंग मानते है। चरणव्यूह तथा प्रस्थानभेद में आयुर्वेद शब्द का प्रयोग हुआ है और वहाँ इसे ऋग्वेद का उपवेद माना गाया है, जबकि चरक, सुश्रुत, कश्यप आदि आयुर्वेदीय संहिताएँ आयुर्वेद का संबन्ध अथर्ववेद से मानती हैं। वैसे अधिकाँश विद्वानों के अनुसार, चिकित्साशास्त्र का उपजीव्य मुख्यतः अथर्ववेद ही है। इसकी नौ शाखाएँ हैं- पैप्पलाद, तौढ़, मौद, शौनकीय, जलद, ब्राह्मपद, देवदर्श एवं चारणवैद्य।

गोपथ ब्राह्मण में इसे यद् भेषजं तद् अमृतं यद् अमृतं तद् ब्रह्म के रूप में निरूपित किया गया है।

अथर्ववेद भृग्वडिंगरस के रूप में भी प्रसिद्ध रहा है। अश्विनौ के समान अथर्वण और अंगिरस युग्म भी चिकित्सा की दो प्रचलित पद्धतियों की ओर संकेत करता है। अथर्वण मुख्यतः दैवव्यापाश्रय चिकित्सा करते थे और अंगिरस अंगों के रस से सम्बन्ध रखने के कारण युक्तिव्यापाश्रय से सम्बन्धित थे। व्यवहार में वे क्रमशः सोम और अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करते थे। वेदों में रुद्र, अग्नि, वरुण, इन्द्र, मरुत आदि देवता भिषक कहे गए हैं। परन्तु अश्विनीकुमारों को देवानां भिषजौ के रूप में निरूपित किया गया है।

  #वैदिक_चिकित्सा_विज्ञान - #मनुष्य_पशु_और_वृक्ष
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"आयुर्वेद " शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है - "आयुष" और "वेद"।

हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्।
मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते॥
-(चरक संहिता 1/40)
(अर्थात जिस ग्रंथ में - हित आयु (जीवन के अनुकूल), अहित आयु (जीवन के प्रतिकूल), सुख आयु (स्वस्थ जीवन), एवं दुःख आयु (रोग अवस्था) - इनका वर्णन हो उसे आयुर्वेद कहते हैं।)

साधारणतया आयुर्वेद के विषय मे हमने पढ़ा होगा कि इसके 8 मुख्य भाग है -

1)शल्य तन्त्र,
2) शालाक्य तन्त्र,
3) काय चिकित्सा तन्त्र,
4) भूत विद्या तन्त्र,
5) कौमारभृत्य तन्त्र,
6) अगद तन्त्र,
7) रसायन तन्त्र और
8- वाजीकरण तन्त्र

उपरोक्त के विषय मे कभी विस्तार से लिखूंगा , कुछ मुख्य वैदिक साहित्य के मानवों के संदर्भ में उल्लेख ऐसे है - ऋषि पिपलाद कृत ‘गर्भ-उपनिष्द’ के अनुसार मानव शरीर में 180 जोड, 107 मर्मस्थल, 109 स्नायुतन्त्र, और 707 नाडियाँ, 360 हड्डियाँ, 500 मज्जा (मैरो) तथा 4.5 करोड सेल होते हैं। हृदय का वजन 8 तोला, जिव्हा का 12 तोला और यकृत (लिवर) का भार ऐक सेर होता है। स्पष्ट किया गया है कि यह मर्यादायें सभी मानवों में ऐक समान नहीं होतीं क्यों कि सभी मानवों की भोजन ग्रहण करने और मल-मूत्र त्यागने की मात्रा भी ऐक समान नहीं होती।  ईसा से सैकड़ो वर्ष पूर्व भारतीय चिकित्सकों ने संतान नियोजन का वैज्ञानिक ज्ञान उल्लेख कर दिया था। उन के मतानुसार मासिक स्त्राव के प्रथम बारह दिनों में गर्भ नहीं ठहरता। गर्भ-उपनिष्द में गर्भ तथा भ्रूण विकास सम्बन्धी जो समय तालिका दी गयी है वह आधुनिक चिकित्सा के अनुरूप ही है। विस्तृत पोस्ट करूँगा कभी इसपर ।

अभी आयुर्वेद के कुछ अन्य विभाग के विषय में जान लेते है , जब हम अथर्ववेद का परिशीलन करते है तो हमे ये ज्ञात होता है कि आयुर्वेद में मनुष्य की चिकित्सा के अतिरिक्त पशु चिकित्सा एवम  वृक्ष चिकित्सा के भी विभाग है -

1) - #वृक्षायुर्वेद - वृक्षों एवम वनस्पतिओ की चिकित्सा -
सस्य वेद , वृहद पराशर संहिता आदि अनेक ग्रन्थ उपलब्ध है इसका वर्गीकरण फिर कभी लिखूंगा ।

2)- #पश्वायुर्वेद - पशुओ की चिकित्सा - इसके मुख्य विभाग -
ऊष्ट्रायुर्वेद
मत्स्यायुर्वेद
मृगपक्षीशास्त्र
श्येनशास्त्र
गजायुर्वेद
अश्वायुर्वेद
गवायुर्वेद

अग्निपुराण में कहा गया है कि
अग्निदेव कहते हैं – वसिष्ठ ! शालिहोत्र ने सुश्रुत को ‘अश्वायुर्वेद’ और पाल्काप्यने अंगराज को ‘गवायुर्वेद’ का उपदेश किया था -
शालिहोत्रः सुश्रुताय हयायुर्वेदमुक्तवान्। पालकाप्योउंगराजाय गजायुर्वेदमब्रवीत्॥
(अग्निपुराण 292.44)

#गजायुर्वेद

हाथी, जिसे संस्कृत में गज, नाग, अर्व, कुंजर, हस्ति, करि आदि भी कहा जाता है, प्राचीन काल में युद्ध के लिए महत्त्वपूर्ण जानवर माना जाता था और यह शत्रुओं के सामने सेना का बड़ा साहस माना जाता था। आचार्य चाणक्य ने हाथी के पालन और उपयोग को लेकर जो सूचनाएँ दी हैं, वे मेगास्थनीज आदि के विवरण से पर्याप्त मेल खाती हैं।

बार्हस्पत्यसंहिता में कहा गया है-
पराशरसंहिता में चार प्रकार के हाथी बताए गए हैं : भद्रा, मन्दा, मृगा और मिश्रा। बल, गति, सत्व, छाया आदि के आधार पर हाथियों की परीक्षा की जाती थी -

रिपुविजयः फलमेषां नागानां नागलक्षणोक्तानाम्।
संचरण साहस निरतस्य भवति नित्यं नरेन्द्रस्य।
सांग्रामिका द्विपा राजन सम्यग्लक्षण लक्षिताः।

मुनि पालकाप्य को प्रथमतः अंगनरेश के प्रति गजशास्त्र तैयार करने का श्रेय है। और उनके नाम से अनेक छोटे-बड़े हस्तिशास्त्र मिलते हैं। पालकाप्य ने हाथी को प्रत्यक्ष देवता कहा है और नागजात्य स्वीकारा है :
प्रत्यक्षदेवता नागा देवजात्या यतस्ततः।
 स्वामिनश्च भवन्त्येते तस्मात् प्रोक्तास्तु भूमिदाः॥ (वीरमित्रोदय, लक्षणप्रकाश, पेज 321)।

पालकाप्य के काल तक हाथियों की विशेष चिकित्सा पर ध्यान दिया जाता था और गजवैद्य राज्याश्रय प्राप्त होते थे।

गजवैद्य भिषक्, विनीत, मेधावी, ग्रन्थों के अर्थों को जाननेवाले, राजा जैसा प्रियभाषी, महाभोग को ग्रहण करनेवाले, वाग्मी, प्रगल्भ, शान्तात्मा, बुद्धिमान, धार्मिक और पवित्रमन सहित सेना के इच्छुक, मधुर व कुलीन होते थे। (पेज 400)

#अश्वायुर्वेद -
संसार के इतिहास में घोड़े पर लिखी गई प्रथम पुस्तक शालिहोत्रसंहिता है, जिसे शालिहोत्र ऋषि ने महाभारत काल से भी बहुत समय पूर्व लिखा था। कहा जाता है कि शालिहोत्र द्वारा अश्वचिकित्सा पर लिखत प्रथम पुस्तक होने के कारण प्राचीन भारत में पशुचिकित्सा विज्ञान को 'शालिहोत्रशास्त्र' नाम दिया गया। शालिहोत्रसंहिता का वर्णन आज संसार की अश्वचिकित्सा विज्ञान पर लिखी गई पुस्तकों में दिया जाता है। भारत में अनिश्चित काल से देशी अश्वचिकित्सक 'शालिहोत्री' कहा जाता है।

शालिहोत्रसंहिता में 48 प्रकार के घोड़े बताए गए हैं। इस पुस्तक में घोड़ों का वर्गीकरण बालों के आवर्तों के अनुसार किया गया है। इसमें लंबे मुँह और बाल, भारी नाक, माथा और खुर, लाल जीभ और होठ तथा छोटे कान और पूँछवाले घोड़ों को उत्तम माना गया है। मुँह की लंबाई 2 अंगुल, कान 6 अँगुल तथा पूँछ 2 हाथ लिखी गई है। घोड़े का प्रथम गुण 'गति का होना' बताया है। उच्च वंश, रंग और शुभ आवर्तोंवाले अश्व में भी यदि गति नहीं है, तो वह बेकार है। शरीर के अंगों के अनुसार भी घोड़ों के नाम, त्रयण्ड (तीन वृषण वाला), त्रिकर्णिन (तीन कानवाला), द्विखुरिन (दोखुरवाला), हीनदंत (बिना दाँतवाला), हीनांड (बिना वृषणवाला), चक्रवर्तिन (कंधे पर एक या तीन अलकवाला), चक्रवाक (सफेद पैर और आँखोंवाला) दिए गए हैं। गति के अनुसार तुषार, तेजस, धूमकेतु, एवं ताड़ज नाम के घोड़े बताए हैं। इस ग्रन्थ में घोड़े के शरीर में 12,000 शिराएँ बताई गई हैं। बीमारियाँ तथा उनकी चिकित्सा आदि, अनेक विषयों का उल्लेख पुस्तक में किया गया है, जो इनके ज्ञान और रुचि को प्रकट करता है। इसमें घोड़े की औसत आयु 32 वर्ष बताई गई है।

#गवायुर्वेद -

पराशरः प्राह बृहद्रथाय गोलक्षणं यत् क्रियते ततोऽयम्। मया समासः शुभलक्षणास्ताः सर्वास्तथा- प्यागमतोऽभिधास्ये॥
(बृहत्संहिता, 61.1)।
पराशर ने गायों के लक्षणों को लिखा है और माना है कि कभी गायों की आँखों में आँसू नहीं हों, न ही कभी आँखें गंदली या रूखी हो। चूहे के समान आँखवाली, हिलते हुए सींगवाली, चपटे सींगवाली गाय, कृष्ण, लोहित वर्णवाली व गदहे के समान वर्णवाली गाय शुभ नहीं होती। इसका अभिप्राय है कि गायें बहुत शुभ लक्षणोंवाली हों और इसके लिए गायों की प्रजातियों का पूरा ध्यान रखा जाए, क्योंकि संकरता शुभदायी नहीं होती-

साश्रुणी लोचने यासां रूक्षाल्पे च न ताः शुभाः। चलच्चिपिट श्रृंगाश्च करटाः खरसन्निभाः॥

मुनि का मत कि दस, सात या चार दाँतवाली, लम्बे मुंहवाली, बिना सींगवाली, झुकी हुई पीठवाली, छोटी तथा मोटी गरदनवाली, जौ के समान बीच से मोटी, फटे हुए खुरवाली, श्याम रंग की, लंबी जिह्वावाली, बहुत छोटे या बहुत बड़े गुल्फवाली, दुबली, कम अंगवाली या अधिक अंगवाली गायें नहीं होनी चाहिए-

दश सप्त चतुर्दन्त्योऽलम्बवक्त्रा न ताः शुभाः। विषाणवर्जिता ह्रस्वाः पृष्ठमध्याति सन्नताः॥ ह्रस्वस्थूल गला याश्च यवमध्याः शुभा न ताः। भिन्नपादा बृहद्गुल्फा याश्च स्युस्तनुगुल्फकाः॥ श्यावातिदीर्घजिह्वाश्च महत्ककुद संयुताः। याश्चाति कृशदेहाश्च हीना अवयवैश्च याः॥ न ताः शुभप्रदा गावो भर्तुयूथस्य नाशना॥
(भट्टोत्पलीयविवृत्ति, 61.2-4)।।

इसके अतिरिक्त उनके रुग्ण होने पर उनकी चिकित्सा भी बताई गई है ।

#विशेष -
सनातन संस्कृति चिकित्साशास्त्र में सदैव अग्रणी रहा है और आयुर्वेद, चरक संहिता, सुश्रुत संहिता आदि ग्रंथ इसके उदाहरण हैं । परंतु इन ग्रंथों के अलावा भी वेदों में अनेक स्थानों पर चिकित्सा-विज्ञान के क्लोनिंग आदि जैसे अद्भुत प्रयोगों की चर्चा की गयी है ।

यहाँ पर इन तथ्यों के सम्बंध में संक्षिप्त जानकारी प्रस्तुत की जा रही है जिससे कम-से-कम यह अनुमान तो अवश्य लगाया जा सकता है कि वैदिक ऋषियों को इसकी सम्पूर्ण जानकारी थी ।

#क्लोनिंग_टिश्यू_कल्चर_एंड_प्लास्टिक_सर्जरी
गांधारी के 100 पुत्र , विभिन्न पुराणों में चमड़े , बाल , अस्थि , मांस से नई पीढ़ी का जन्म कराना अक्सर पढ़ते ही रहते है हम जो आधुनिक युग मे सम्भव दिखता है कुछ वैदिक उल्लेख -

निश्चर्मणो गामरिणीत धीतिभिर्या जरन्ता युवशा ताकृणोतन ।
सौधन्वना अश्वादश्वमतक्षत युक्त्वा रथमुप देवाँ अयातन ॥
(ऋग्वेद 1:161:7)
अर्थात -
हे सुधन्वा पुत्रों ! आपके श्रेष्ठ प्रयासों  से चर्मरहित गौ को पुनर्जीवन मिला । अतिवृद्ध माता-पिता को आपने तरुण बनाया । एक घोडे से दूसरे घोडे को उत्पन्न करके उनको रथ में जोतकर देवों के समीप उपस्थित हुये ।

यत्संवत्समृभवो गामरक्षन्यत्संवत्समृभवो मा अपिंशन  ।
यत्संवत्समभरन्भासो अस्यास्ताभिः शमीभिरमृतत्वमाशुः ॥ऋग्वेद 4:33: 4

उन ऋभुओं ने एक वर्ष पर्यंत मरणासन्न गाय का पालन किया । उन्होंने एक वर्ष पर्यंत उसे अवयवों से युक्त किया तथा उसे सौंदर्य प्रदान किया । एक वर्ष पर्यंत उन्होंने उसमें तेज स्थापित किया । इन सम्पूर्ण कार्यों के द्वारा उन्होंने अमरत्व को प्राप्त किया ।

याभिः शचीभिश्चमसाँ अपिंशत यया धिया गामरिणीत चर्मणः ।
येन हरि मनसा निरतक्षत तेन देवत्वमृभवः समानश ॥
ऋग्वेद 3:60:2
हे ऋभुगणों ! जिस सामर्थ्य से आपने चमसों का सुंदर विभाजन किया, जिस बुद्धि से आपने गौ को चर्म से संयुक्त किया, जिस मानस से आपने इंद्र के अश्वों को समरf

सोमवार, 24 सितंबर 2018





🙏।। मात् श्री नर्मदे हर।।
।।ॐ नमः शिवाय।।
।।जय श्री महांकाल।।🙏एक तस्वीर बहुत दिन से आकर्षित कर रही थी। न जाने कहाँ से आयी थी और कुछ पता भी नहीं चल पा रहा था कि किस संत की है ये तस्वीर। लेकिन इस बार भी बाबा ब्रह्मचारी नर्मदा शंकर काम आये। मैंने तस्वीर उन्हें दिखाई और उन्होंने कहा की कि सिद्ध पुरुष सियाराम बाबा हैं। नर्मदा बाबा के मोरटक्का आश्रम से 40 किलोमीटर दूर तेलिया भट्यान्न गांव के एक वृक्ष ने नीचे रहते हैं सियाराम बाबा। सिर्फ एक लंगोट में उन्होंने अपना जीवन व्यतीत कर दिया। सर्दी, गर्मी, बसंत और बरसात सियाराम बाबा के तन पर सिर्फ यही एक कपड़ा होता है। न उन्हें गर्मी सताती है और न ठण्ड में उन्हें किसी ने कांपते देखा है।
नर्मदा शंकर बाबा बताते हैं कि उनकी उम्र करीब करीब 100 के आसपास होगी। हालाँकि कोई उनके गुरु के बारे में नहीं जानता लेकिन 10 साल उन्होंने खड़ेश्वरी सिद्धि की है। खड़ेश्वरी साधु अपने तप के दौरान सोना – जगाना या कोई भी काम खड़े खड़े ही करते है। अपनी खड़ेश्वरी साधना की दौरान एक बार नर्मदा माँ में बाढ़ आ गयी और जल स्तर इतना बढ़ गया कि पानी उनकी नाभि तक आ गया लेकिन सियाराम बाबा एक क्षण को भी हटे नहीं। डटे रहे नर्मदा में जब तक पानी का स्तर सामान्य नहीं हो गया। बाबा नर्मदा शंकर बहुत बार उनसे मिलने जाते हैं और बाबा अपने हाथ से चाय बना कर सभी साधु और सन्यासियों को पिलाते हैं।


बड़े विरले संत हैं –नर्मदा परिक्रमा करने जो भी व्यक्ति इस गांव से होकर गुजरता है उसको भोजन बाबा खुद अपने हाथ से देते हैं। आगे के रास्ते के लिए हर तीर्थ यात्री को दाल, चावल, नमक, तेल, मिर्च, कपूर और अगरबत्ती की एक पोटली बाबा सबको देते हैं। उनके मंदिर में भी जो प्रसाद आता है उसको इंसान और जानवरों में बराबर बांटते हैं। लोग नारियल का चढ़ावा लाते हैं और बाबा तभी उसे वितरित कर देते।
पूरे दिन राम नाम का जाप करते करते बस उन्हें चिंता रहती है तो बस नर्मदा माँ की परिक्रमा करने वाले लोगों की। बाबा नर्मदा शंकर कहते हैं कि इतने सरल बाबा हैं कि आप 2000 का नोट दे दो, 500  का या 100 का – आपका नाम लिखेंगे और सिर्फ 10 रुपए लेकर बाकी सारे पैसे आपको वापस कर देंगे। अर्जेंटीना और ऑस्ट्रिया से साधक जब नर्मदा शंकर बाबा से योग सीखने आये तो बाबा सभी को सियाराम बाबा से मिलवाने ले गए। वो विदेशी लोगों के दिखाना चाहते थे कि आज भी पृथ्वी पर ऐसे साधु हैं जो सनातन धर्म के सच्चे रखवाले हैं। जिन्हें माया और मोह छू भी नहीं पाया। कुछ विदेशी लोगों ने 500 रुपए दिए – बाबा ने 10 रुपए काट कर बाकी सब लौटा दिए। हैरान हुए विदेशी कि शहर की चकाचौंध से दूर एक बीहड़ गांव में संत आज भी हैं।
बाबा नर्मदा शंकर ने बेहद रोचक जानकारी दी। दरअसल सियाराम बाबा की जगह बांध डूब क्षेत्र में आती हैं और सरकार ने उन्हें 2 करोड़ 18 लाख रुपए मुआवजा दिया। सियाराम बाबा ने पूरा धन आदिवासी क्षेत्र के विकास में दान दे दिया। इलाके के विकास के साथ साथ उन्होंने एक बेहद प्राचीन नाग देवता के मंदिर की जीणोद्धार के लिए भी पैसा आवंटित किया है। आज दिल्ली मुंबई जैसे संभ्रांत और पैसे वाले लोगों की घर कोई चला जाये तो लोग ये सोचते हैं कि ये बिना कुछ खाये ही चला जाये तो बेहतर। परिवार के दिल इतने छोटे हो गए हैं कि माता पिता के लिए घर में जगह नहीं है वहीँ सियाराम बाबा हर किसी अनजाने चेहरे को खाना खिलाते हैं। पैसे के लिए जहाँ भाई का दुश्मन हैं वहीँ ने बाबा ने 2 करोड़ रुपए दान कर दिए।

गुरुवार, 20 सितंबर 2018



!!!---: मुल्तानी मिट्टी के लाभ :---!!!
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हमारे शरीर के पाँच तत्वों में से एक है मिट्टी | मुल्तानी मिटटी प्रयोग के लिए श्रेष्ठ मानी जाती है | यह पाकिस्तान के इलाके मुल्तान में बहुतायत से पायी जाती है | यह हलके पीले रंग की एकदम चिकनी होती है और ढेले के रूप में मिलती है | इसमें सिलिका कम और लाइम स्टोन ज्यादा रहता है | उत्तर भारत में तो वाकई में यह सस्ते में आसानी से मिल जाती है | इसका प्रयोग कई तरह की बीमारियों, स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं और शरीर तथा त्वचा के रोगों से निजात दिलाने में सहायक है |

मुल्तानी मिट्टी के लाभ :---
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(1.) अगर इसे कूट कर हल्दी के साथ मिलकर प्रयोग किया जाए तो झाइयाँ व मुहांसे दूर होते हैं और त्वचा कांतिमय बन जाती है  ।

(2.) रोज रोज साबुन लगाने से शरीर के मित्र जीवाणु नष्ट हो जाते है, जिससे शरीर की रोग-प्रतिरोधक-क्षमता नष्ट हो जाती है और साथ ही देह की कुदरती मानुष गंध- फेरोमोंन का भी सफाया हो जाता है; जो लोगों में परस्पर जैव रासायनिक संचार का एक बहुत ही महत्वपूर्ण जरिया होता है ।

मनुष्य के पारस्परिक व्यवहार, आक्रामकता, प्रेम सबंध आदि के निर्धारण /नियमन में फेरोमोंन की बड़ी भूमिका है । इसलिए कुदरती मुल्तानी मिटटी से स्नान करें, जो मित्र कीटाणु और शरीर की गंध दोनों बचाती है |

(3.) गर्मियों में होने वाली घमौरियों के उपचार में मुल्तानी मिट्टी अचूक औषधि है।

(4.) शरीर पर इसका पतला-पतला लेप खून की गर्मी को कम करता है। तेज बुखार में तापमान तुरंत नीचे लाने के लिये सारे शरीर पर इसका मोटा-मोटा लेप करना चाहिए l

(5.) अगर आप महँगे-महँगे ब्यूटी प्रोडक्ट, शैम्पू, ऑलिव ऑयल का इस्तेमाल करते हुए थक चुके हैं, फिर भी आपको कोई फ़ायदा नहीं हुआ है तो एक बार मुल्तानी मिट्टी ज़रूर इस्तेमाल करके देखें।

(6.) ये नेचुरल कंडीशनर भी है और ब्लीच भी। ये सौन्दर्य निखारने का सबसे सस्ता और आयुर्वेदिक नुस्खा है।

(7.) मुल्तानी मिट्टी सभी फेस पैक का बेस होती है। चेहरे पर मुल्तानी मिट्टी का लेप लगाने से रंगत निखरती है।

(8.) बालों में लगाने से वे घने, मुलायम और काले हो जाते हैं।

(9.) मुहांसों की समस्या से परेशान लोगों के लिए तो मुल्तानी मिट्टी सबसे कारगर इलाज है, क्योंकि मुल्तानी मिट्टी चेहरे का तेल सोख लेती है, जिससे मुहांसे सूख जाते हैं।

(10.) मुंहासों के दाग़ घटाने लिए मुल्तानी मिट्टी में नीम की पत्तियों को पीसकर पेस्ट बना लें और चेहरे के दाग-धब्बों पर लगाएँ । 15 दिनों में ही असर दिखेगा।

(11) धूप में झुलसी त्वचा को ठीक करने के लिए मुल्तानी मिट्टी को गुलाब जल या टमाटर के रस में मिला कर लगाएँ l

(12.) मुल्तानी मिट्टी में सूखे संतरे के छिलकों का पाउडर, जई का आटा मिलाकर चेहरे और गर्दन पर लगाएँ । इस पैक को रोज़ लगाने से रोम छिद्र साफ होते हैं और मुंहासे नहीं होते ।

(13.) मुल्तानी मिटटी को खट्टे छाछ में घोल कर उससे बाल धोने से रूखापन गायब हो जाएगा और बालों में चमक आ जायेगी  ।

(14.) 100 ग्राम मुल्तानी मिट्टी को एक कटोरे पानी में भिगो दें। दो घण्टे बाद जब मुल्तानी मिट्टी पूरी तरह घुल जाये तो इस घोल को सूखे बालों में लगा कर हल्के हाथ से बालों को रगड़े। पाँच मिनट तक ऐसा ही करें।अगर बालों मे ज्यादा गंदगी मौजूद है, तो इस क्रिया को दोबारा फिर करें। हफ्ते में दो बार इस क्रिया को करने से बालों में बहुत ज्यादा निखार आ जाता है। बाल लम्बे, रेशमी और मुलायम हो जाते हैं। इस क्रिया को करने के बाद सिर में हल्केपन के साथ शीतलता का अहसास होता है। ऐसी शीतलता किसी भी शैम्पू में नहीं मिल सकती है l

(15.) रोजाना मुल्‍तानी मिट्टी से बाल धोने पर बाल झडना कम हो जाएंगे।

(16.) धूप में त्वचा की रंगत काली होने पर इसमें सुधार के लिए मुल्तानी मिट्टी का इस्तेमाल एंटी टैनिंग एजेंट के तौर पर करें। मुल्तानी मिट्टी का लेप न सिर्फ त्वचा को राहत पहुँचाता है, बल्कि टैन हुई त्वचा को साफ बनाता है।

(17.) आधा चम्मच संतरे का रस लेकर उसमें 4-5 बूंद नींबू का रस, आधा चम्मच मुल्तानी मिट्टी, आधा चम्मच चंदन पाउडर और कुछ बूंदें गुलाब जल की मिलाकर थोड़ी देर के लिए किसी तरह ठण्डा करें । फिर इसे लगा कर 15-20 मिनट तक रखें। इसके बाद पानी से इसे धो दें। यह ऑयली त्वचा का सबसे अच्छा उपाय है।

(18.) तैलीय त्वचा के लिए मुल्तानी मिट्टी में दही और पुदीने की पत्तियों का पाउडर मिला कर उसे आधे घण्टे तक रखा रहने दें, फिर अच्छे से मिला कर चेहरे और गर्दन पर लगाएँ । सूखने पर हल्के गर्म पानी से धो दें। ये तैलीय त्वचा को चिकनाई रहित रखने का कारगर नुस्खा है।

(19.) अगर आपकी त्वचा ड्राई है तो काजू को रात भर दूध में भिगो दें और सुबह बारीक पीसकर इसमें मुल्तानी मिट्टी और शहद की कुछ बूंदें मिलाकर स्क्रब करें।

(20.) रूखी त्वचा पर मुल्तानी मिट्टी में चन्दन पाउडर या कैलामाइन पाउडर मिला कर लगाएं, इससे चेहरे की नमी बनी रहेगी।

(21.) बडे से बडे फोडे़ पर मिट्टी की पट्टी चढ़ाने से, विद्रावक शक्ति के कारण वह उसे पकाकर निचोड़ देती है एवं घाव भी बहुत जल्दी भर देती है।

(22.) मिट्टी मे विष को शोषित करने की विलक्षण शक्ति होती है । साँप, बिच्छू, कैंसर तक के जहर को खींचकर (सोखकर) कुछ ही दिनों में ठीक कर देती है ।

मंगलवार, 18 सितंबर 2018



दांत को कभी न देवे दुखने सो आजमावे हर पल-

दाँत दर्द में हमें बड़ी कठनाई का सामना करना पड़ता है । कई बार कुछ गलत खाने से तो कई बार दांतों की ठीक से सफाई न करने या कीड़े लगने के कारण दांतों में दर्द होने लगता है. दांतों में दर्द का कारण कोई भी हो, लेकिन इसकी पीड़ा हमारे लिए बेहद कष्टकारी बन जाती है। यहाँ पर हम आपको दाँत दर्द में कुछ बहुत ही आसान से उपचार बता रहे है।

*पिसी हल्दी, नमक व सरसो का तेल मिलाकर पेस्ट सा बना कर उसे डिब्वे में रख ले सुबह इस पेस्ट को ब्रुश अथवा उगली के द्वारा दाँतों व मसूड़ों पर लगा लें थोड़ी देर लगा कर रखे फिर बाद में कुल्ला कर लें इस प्रयोग से हिलते हुए दाँत जम जाते हैं दाँतो से पीलापन दुर होकर दाँत विल्कुल सफेद हो जाते हैं।इस प्रयोग करते रहने से कभी भी पायरिया नही होगा।

*नींबू के छिलकों पर थोड़ा-सा सरसों का तेल डालकर दाँत एवं मसूढ़ों पर लगाने से दाँत सफेद एवं चमकदार होते हैं, मसूढ़े मजबूत होते हैं, हर प्रकार के जीवाणुओं तथा पायरिया आदि रोगों से बचाव होता है।

*जामफल के पत्तों को अच्छी तरह चबाकर उसका रस मुँह में फैलाकर, थोड़ी देर तक रखकर थूक देने से अथवा जामफल की छाल को पानी में उबालकर उसके कुल्ले करने से हर तरह के दाँत के दर्द में लाभ होता है।

*हींग दांत में दर्द से तुरंत मुक्ति दिलाता है । हींग को मौसमी के रस में डुबोकर दांतों में दर्द की जगह पर रखें, मौसमी न होने पर हींग में नींबू भी मिलाया जा सकता है। इससे शीघ्र ही आपको दर्द से छुटकारा मिल जायेगा।

*तिल के तेल में पीसा हुआ नमक मिलाकर उँगली से दाँतों को रोज घिसने से दाँत की पीड़ा दूर होती है ।

*दांतों के दर्द में लौंग दांतों के सभी बैक्टीरिया को नष्ट कर सकता हैं। ऐसे में लौंग को दांतों के दर्द की जगह पर रखना चाहिए, कुछ ही देर में आपका दर्द जाता रहेगा। लेकिन चूँकि इसमें दर्द कम होने की प्रक्रिया थोड़ी धीमी होती है इसलिए इसमें धैर्य रखना चाहिए ।

*जामुन के वृक्ष की छाल के काढ़े के कुल्ले करने से दाँतों के मसूढ़ों की सूजन मिटती है व हिलते दाँत भी मजबूत होते हैं।

*प्याज दांत दर्द के लिए एक उत्तम घरेलू उपचार है। जो व्यक्ति रोजाना कच्चा प्याज खाते हैं उन्हें दांत दर्द की शिकायत होने की संभावना कम रहती है क्योंकि प्याज में कुछ ऐसे औषधीय गुण होते हैं जो बैकटीरिया को नष्ट कर देते हैं। अगर आपके दांत में दर्द है तो प्याज के टुकड़े को दांत के पास रखें अथवा प्याज चबाएं। आपको आराम महसूस होने लगेगा।

*10 ग्राम बायविडंग और 10 ग्राम सफेद फिटकरी थोड़ी कूटकर तीन किलो पानी में उबालें। एक किलो बचा रहने पर छानकर बोतल में भरकर रख लें। तेज दर्द में दिन में 2-3 बार इस पानी से कुल्ला करने से दो दिन में ही आराम आ जाता है। कुछ अधिक दिन कुल्ला करने से दाँत पत्थर की तरह मजबूत हो जाते हैं।

*प्रायः दाढ़ में कीड़ा लगने पर असहय दर्द उठता है। तब अमरूद के पत्ते के काढ़े से कुल्ला करने से दाँत और दाढ़ की भयानक टीस और दर्द दूर हो जाता है। पतीले में पानी में अमरूद के पत्ते डालकर इतना उबालें कि वह पानी उबाले हुए दूध की तरह गाढ़ा हो जाए।

*नमक के पानी के कुल्ले करने एवं कत्थे अथवा हल्दी का चूर्ण लगाने से गिरे हुए दाँत का रक्तस्राव जल्दी ही बंद हो जाता है।

*लहसुन में एंटीबायोटिक गुण पाए जाते हैं जो अनेकों प्रकार के संक्रमण से लड़ने की क्षमता रखते हैं।लहसुन में एलीसिन होता है जो दांत के पास के बैकटीरिया, जर्म्स, जीवाणु इत्यादि को नष्ट कर देता है।इसलिए एक फांक लहसुन को सेंधा नमक के साथ पीसकर यदि आप दांतों में दर्द की जगह पर लगायेंगे तो आपको दर्द में आराम मिलेगा।

*दाँत-दाढ़ दर्द में अदरक का टुकड़ा कुचलकर दर्द वाले दाँत में रखकर मुँह बंद कर लें और धीरे-धीरे रस चूसते रहें। फौरन राहत महसूस होगी।

*नीम के पत्तों की राख में कोयले का चूरा तथा कपूर मिलाकर रोज रात को सोने से पहले लगाकर पायरिया में लाभ होता है।

*सरसों के तेल में सेंधा नमक मिलाकर दाँतों पर लगाने से दाँतों से निकलती दुर्गन्ध एवं रक्त बंद होकर दाँत मजबूत होते हैं तथा पायरिया भी जड़ से ख़त्म हो जाता है।

*फिटकरी को तवे या लोहे की कड़ाही में पानी के साथ आग पर रखें। जब पानी जल जाए और फिटकरी फूल जाए तो तवे को आग पर से उतारकर फिटकरी को पीसकर बारीक चूर्ण बना लें। जितना फिटकरी का पावडर बने उसका 1/4 भाग पिसी हल्दी उसमें मिला कर लकड़ी की सींख की नोक से दाँत के दर्द वाले स्थान पर या सुराख के भीतर यह मिश्रण भर दें।यह बहुत ही लाभकारी प्रयोग है ।

*भोजन अथवा अन्य किसी भी पदार्थ को खाने के बाद अच्छी तरह से कुल्ला जरूर करें तथा गर्म वस्तु के तुरंत पश्चात् ठण्डी वस्तु का सेवन न करें।

बाजार की कोई भी डिब्बा बंद चीज में कई महीनों तक सुरक्षित रखने के लिए जो वस्तु मिलाई जाती वह एक धीमा जहर जो खाने वालों की जान तक ले लेती है |डिब्बेपैक फलों के रस से बचोः
बंद डिब्बों का रस भूलकर भी उपयोग में न लें। उसमें बेन्जोइक एसिड होता है। यह एसिड तनिक भी कोमल चमड़ी का स्पर्श करे तो फफोले पड़ जाते हैं। और उसमें उपयोग में लाया जानेवाला सोडियम बेन्जोइक नामक रसायन यदि कुत्ता भी दो ग्राम के लगभग खा ले तो तत्काल मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। उपरोक्त रसायन फलों के रस, कन्फेक्शनरी, अमरूद, जेली, अचार आदि में प्रयुक्त होते हैं। उनका उपयोग मेहमानों के सत्कारार्थ या बच्चों को प्रसन्न करने के लिए कभी भूलकर भी न करें।

'फ्रेशफ्रूट' के लेबल में मिलती किसी भी बोतल या डिब्बे में ताजे फल अथवा उनका रस कभी नहीं होता। बाजार में बिकता ताजा 'ओरेन्ज' कभी भी संतरा-नारंगी का रस नहीं होता। उसमें चीनी, सैक्रीन और कृत्रिम रंग ही प्रयुक्त होते हैं जो आपके दाँतों और आँतड़ियों को हानि पहुँचा कर अंत में कैंसर को जन्म देते हैं। बंद डिब्बों में निहित फल या रस जो आप पीते हैं उन पर जो अत्याचार होते हैं वे जानने योग्य हैं। सर्वप्रथम तो बेचारे फल को उफनते गरम पानी में धोया जाता है। फिर पकाया जाता है। ऊपर का छिलका निकाल लिया जाता है। इसमें चाशनी डाली जाती है और रस ताजा रहे इसके लिए उसमें विविध रसायन (कैमीकल्स) डाले जाते हैं। उसमें कैल्शियम नाइट्रेट, एलम और मैग्नेशियम क्लोराइड उडेला जाता है जिसके कारण अँतड़ियों में छेद हो जाते हैं, किडनी को हानि पहुँचती है, मसूढ़े सूज जाते हैं। जो लोग पुलाव के लिए बाजार के बंद डिब्बों के मटर उपयोग में लेते हैं उन्हें हरे और ताजा रखने के लिए उनमें मैग्नेशियम क्लोराइड डाला जाता है। मक्की के दानों को ताजा रखने के लिए सल्फर डायोक्साइड नामक विषैला रसायन (कैमीकल) डाला जाता है। एरीथ्रोसिन नामक रसायन कोकटेल में प्रयुक्त होता है। टमाटर के रस में नाइट्रेटस डाला जाता है। शाकभाजी के डिब्बों को बंद करते समय शाकभाजी के फलों में जो नमक डाला जाता है वह साधारण नमक से 45 गुना अधिक हानिकारक होता है।

इसलिए अपने और बच्चों के स्वास्थ्य के लिए और मेहमान-नवाजी के फैशन के लिए भी ऐसे बंद डिब्बों की शाकभाजी का उपयोग करके स्वास्थ्य को स्थायी जोखिम में न डालें।

सोमवार, 17 सितंबर 2018



  आज हमने शरीर का शोधन किया और   खेचरी मुद्रा का अभ्यास भी किया, जिसका एक छोटा सा वीडियो भी बनाया। योग ग्रन्थों में अनेक योग मुद्राओं का वर्णन है। इनमें से एक  मुद्रा है खेचरी। यह मुद्राओं में सर्वश्रेष्ठ है। इसमें जीभ को मोड़कर, तालु के पीछे ,ऊपर की ओर स्थित विवर में जीभ के अग्र भाग को लगाया जाता है। हमारे ब्रह्मरन्ध्र से एक रस  24 घन्टे टपकता है जिसे अमृत भी कहा जाता है, जो हमारी नाभि में स्थित अग्नि में जाकर नष्ट हो जाता है।
खेचरी मुद्रा द्वारा इस रस का पान किया जाता है। जो योगी 6 महीने निरन्तर इस मुद्रा  का अभ्यास करता है, वह अपनी इच्छा से शरीर का त्याग करता है। किसी भी विष का प्रभाव उसके शरीर पर नहीं होता। हिंसक जानवर उसको हानि नहीं  पहुचाते। इससे रसानन्द समाधि का लाभ होता है, जो शीघ्र ही सहज समाधि में बदल  जाता है। अनेक विभूतियाँ ऐसे योगी को प्राप्त हो जाती हैं। चलते समय लगता है कि शरीर, जमीन से ऊपर चल रहा है अर्थात् शरीर बहुत हल्का हो जाता है। इस मुद्रा को करने के लिए अनेक गुरु छेदन का उपयोग करते हैं। छेदन में जिह्वा के नीचे स्थित  तन्तु को ब्लेड से हल्का सा काट देते हैं, इसके बाद चालन- दोहन  किया जाता है। छेदन की अपनी हानियाँ भी हैं। कुछ अन्य तरीके भी हैं  जिससे महीने में  ही खेचरी लग जाती है। जब योगी चाहे तब इस मुद्रा  की सहायता से बिन भोजन पानी के भी आराम से रह सकता है।  इस मुद्रा को करने के 2 से 3 घन्टे बाद तक भूख नहीं लगती। ग्रन्थों में  अनेक बातें इस सम्बन्ध में कही गयी हैं, जिनमें से कुछ निम्न हैं -------

●प्रथमं लवण पश्चात् क्षारं क्षीरोपमं ततः। द्राक्षारससमं पश्चात् सुधासारमयं ततः।       
                                     -   (योग रसायनम्)

खेचरी मुद्रा के समय उस रस का स्वाद पहले लवण जैसा, फिर क्षार जैसा, फिर दूध जैसा, फिर द्राक्षारस जैसा और तदुपरान्त अनुपम सुधा, रस-सा अनुभव होता है।

●आदौ लवण क्षारं च ततस्तिक्त कषायकम्। नवनीतं धृत क्षीर दधित क्रम धूनि च। द्राक्षा रसं च पीयूषं जप्यते रसनोदकम।
                              -------(  घरेण्डसंहिता)

खेचरी मुद्रा में जिव्हा को क्रमशः नमक, क्षार, तिक्त, कषाय, नवनीत, धृत, दूध, दही, द्राक्षारस, पीयूष, जल जैसे रसों की अनुभूति होती है।

●अमृतास्वादनाछेहो योगिनो दिव्यतामियात्।      जरारोगविनिर्मुक्तश्चिर जीवति भूतले ।।
                                    ---     (योग रसायनम्)

भावनात्मक अमृतोपम स्वाद मिलने पर योगी के शरीर में दिव्यता आ जाती है और वह रोग तथा जीर्णता से मुक्त होकर दीर्घकाल तक जीवित रहता है।

एक योग सूत्र में खेचरी मुद्रा से अणिमादि सिद्धियों की प्राप्ति का उल्लेख है-

●तालु मूलोर्ध्वभागे महज्ज्योति विद्यतें तर्द्दशनाद् अणिमादि सिद्धिः।

तालु के ऊर्ध्व भाग में महा ज्योति स्थित है, उसके दर्शन से अणिमादि सिद्धियाँ प्राप्त होती है।

ब्रह्मरन्ध्र साधना की खेचरी मुद्रा प्रतिक्रिया के सम्बन्ध में शिव संहिता में इस प्रकार उल्लेख मिलता है-

● ब्रह्मरंध्रे मनोदत्वा क्षणार्ध मदि तिष्ठति । सर्व पाप विनिर्युक्त स याति परमाँ गतिम्॥

अस्मिल्लीन मनोयस्य स योगी मयि लीयते। अणिमादि गुणान् भुक्तवा स्वेच्छया पुरुषोत्तमः॥

एतद् रन्ध्रज्ञान मात्रेण मर्त्यः स्सारेऽस्मिन् बल्लभो के भवेत् सः। पपान् जित्वा मुक्तिमार्गाधिकारी ज्ञानं दत्वा तारयेदद्भुतं वै॥

अर्थात्-ब्रह्मरन्ध्र में मन लगाकर खेचरी मुद्रा की साधना करने वाला योगी आत्मनिष्ठ हो जाता है। पाप मुक्त होकर परम गति को प्राप्त करता है। इस साधना में मनोलय होने पर साधक ब्रह्मलीन हो जाता है और अणिमा आदि सिद्धियों का अधिकारी बनता है।

●न च मूर्च्छा क्षुधा तृष्णा नैव लस्यं प्रजायते। न च रोगो जरा मृत्युर्देव देहः स जायते॥
                                     -------     (घेरण्ड सहिंता )

खेचरी मुद्रा की निष्णात देव देह को मूर्च्छा, क्षुधा, तृष्णा, आलस्य, रोग, जरा, मृत्यु का भय नहीं रहता।

●लवण्यं च भवेद्गात्रे समाधि जयिते ध्रुवम।
कपाल वक्त्र संयोगे रसना रस माप्नुयात।

शरीर सौंदर्यवान बनता है। समाधि का आनन्द मिलता है। रसों की अनुभूति होती है। खेचरी मुद्रा का प्रकार श्रेयस्कर है।

गुरुवार, 13 सितंबर 2018

धर्म के दस अंग या लक्षण धर्म ,मजहब या रिलिजन क्या एक ही है

   


क्या #धर्म #मजहब और #रिलिजन के एक ही मायने होते हैं ?
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अब प्रश्न ये है कि #धर्म क्या है ?
"इति धारयति सः धर्मः" /
अर्थात जो धारण किया जाय वही धर्म है /
तो जिन #गुणों को जीवन मे धारण किया जाय , जो धर्म को परिभासित करते हैं , वे क्या हैं और उनके लक्षण क्या हैं ? तो धर्म के 10 लक्षण होते हैं जिनको धरण करने को ही धर्म कहते है /
क्या हैं वो 10 लक्षण
.धर्म के 10 लक्षण हैं यानि 10 अंग है । उनको जीवन में प्राप्त करना और उसको व्यक्ति के चरित्र का अंग बनाना यानि धारण करना ही धर्म है।
" धृति क्षमा दमोस्तेय च सौच इन्द्रियनिग्रह ।
धी विद्या सत्य अक्रोधम दसकं धर्म लक्षणं ।।
1. धृति = धैर्य
2. क्षमा = करने की क्षमता प्राप्त करना
3. दम = कर्मेंन्द्रियों का दमन
4. स्तेय = चोरी न करना
5. सौच = मनसा वाचा कर्मणा व् शरीर को स्वच्छ रखना
6.धी = बुद्धि विवेक
7. इन्द्रियनिग्रह = ज्ञानेन्द्रियों पर नियंत्रण
8. विद्या
9. सत्य
10. अक्रोधम = क्रोध पर नियंत्रण रखना।

ये तो हुवा धर्म । लेकिन आम भारतीय कहता है कि सारे धर्म एक ही शिक्षा देते हैं / तो क्या इसमे कोई सच्चाई है ? या ये भी #इसाइ #इस्लामिक और #वामपंथियों का बिछाया हुआ माया जाल है ?
तो क्या #धर्म #मजहब और #रिलिजन के एक ही मायने होते हैं ?? आइये समझते है , आधुनिक #विश्वामित्र_Rajiv Malhotra के ब्लॉग से कि आखिर इन तीनों मे फर्क क्या है ?
#धर्म और #Religion में क्या अंतर है।।
धर्म के अनेक अर्थ हैं जो इस बात पर निर्भर करता है कि किस सन्दर्भ में उसका प्रयोग किया जा रहा है।मोनियर - विलिएम की संस्कृत शब्दकोष के अनुसार इसके अनेक अर्थ हैं जिसमे conduct कर्तव्य अधिकार न्याय गुण नैतिकता ; धर्म के लक्षण , किसी नियम के तहत किया गया सद्कर्म । इसके और भी अर्थ सुझये गए हैं जैसे Law कानून या टोरा ( यहूदी) लोगो (ग्रीक) way / रास्ता (ईसाई) या यहाँ तक की ताओ (चीनी) ।
इनमे से कोई भी शब्द पूरी तरह से समर्थ नहीं है जो संस्कृत शब्द "धर्म" को सच्चे अर्थों में परिभाषित कर सके।पश्चिमी लेक्सिकन में धर्म का समानार्थी कोई शब्द ही नहीं है।

धर्म संस्कृत के धृ धातु से बना है जिसका अर्थ है " जो धारण करता हो ; या जिसके विना किसी वस्तु का कोई अस्तित्व संभव नहीं है। या जो ब्रम्हांड के harmony और स्टेबिलिटी को मेन्टेन रखता है। " धर्म के अंतर्गत कर्तव्य , नियमावली , सदशीलता गुड़ और नीतिशष्ट्र जैसे तमाम चीजों के प्राकृतिक और नैसर्गिक आचरण आते हैं । ब्रम्हांड के प्रत्येक इकाई का एक व्यक्तिगत धर्म होता है - एक इलेक्ट्रान, जिसका धर्म एक निश्चित दिशा में घूमना है , से लेकर बादल गैलक्सी पेड़ पौधे कीट पतंगे और मनुष्य सबका। मनुष्य के निर्जीव वस्तुओं के धर्म को समझने को ही हम भौतकी या फिजिक्स कहते हैं ।
ब्रिटिश उपनिवेशकारों ने रिलिजन के विचारों के आधार पर धर्म को समझने और समझाने (mapping) करने की कोशिस की जिससे वे भारतवासियों को समविसट कर सकें और उनको शासित कर सकें : उसके बाद भी धर्म की अवधारणा क्षदमवेशी (Elusive) ही रही।धर्म का रिलिजन में अनुवाद एक भ्रामक तथ्य है ; क्योंकि पश्चिमवासियों के अनुसार एक सच्चे रिलिजन के निम्नलिखित अनिवार्य अंग होते हैं :
(1) ये एक हु बहू परिभाषित ऐतिहासिक घटना पर आधारित God द्वारा प्रदत्त एक क़ानूनी किताब पर आधारित हैं ।
(2) एक ऐसी दैवीय शक्ति की प्रार्थना होनी चाहिए जो हमसे और ब्रम्हांड से अलग हो।
(3) किसी मानवीय संस्था से संचालित होनी चाहिए / जैसे चर्च :
(4) जिसमे औपचारिक सदस्य हों
(5) जो नियुक्त पुरोहित / पादरी द्वारा संचालित होना चाहिए।
(6) एक तयशुदा अनुष्ठानपन का ही पालन किया काना चाहिए।
लेकिन #धर्म किसी विशेष् स्वीकृत मत / मजहब या किसी विशेष पूजविधो से बंधा नहीं होता। किसी पश्चिम वासी के लिए "नास्तिक वृत्ति का ( Atheistic) religion " अपने आपमे एक विरोधाभाषी शब्द है। लेकिन बुद्धिज़्म जैनिज़्म और चार्वाक धर्म में किसी परंपरागत ईश्वर का कोई स्थान नहिं है ;कुछ हिन्दू विधाओं में तो ईश्वर के अस्तित्व पर ही विवाद है ; और न ही किसी एकमात्र देवता की पूजा की जाती है , और व्यक्ति अपने इष्टदेवता का चयन करने को स्वतंत्र है।
#धर्म जीवन के हर पहलु के सामञ्जस्यपूर्ण पूर्ति के सिद्धांत का प्रतिपादन करता है ; जैसे अर्थ काम और मोक्ष।अतः रिलिजन धर्म के विस्तृत एवरूप का मात्र एक हिस्सा (subset) भर है।
रिलिजन सिर्फ मनुष्य मात्र पर लागू होता है ,पूरे ब्रम्हांड पर नहीं ; इलेक्ट्रान बन्दर पौधों और गैलक्सी का कोई रिलिजन नहीं है , जबकि इन सबका अपना अपना धर्म है चाहे वे उसका पालन निरुद्देश्य ही क्यों न करते हों ।
चूँकि मानवता का सार उसके देवत्व (divinity) में है ; इसलिए सब अपने #धर्म को व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर , बिना बाहरी हस्तक्षेप के या इतिहास का सहारा लिए बिना भी जान सकते हैं । पाश्चात्य religions में एकमात्र संगठित केंद्रीय सत्ता है जो ऊपर से ( नियम /कानूनों) को प्रकट करती है और शासित करती है।
धार्मिक परम्पराओं में अधर्म का अर्थ मनुष्य को अपने दयित्वों को सही तरीके से न निभा पाने के अर्थों में लिया जाता है ; इसका अर्थ ये कत्तई नहीं होता कि एक मान्यताप्राप्त विश्वास के प्रस्ताव को अस्वीकार करना , या फिर तयशुदा कानूनों (Commandments/ Canaons) का उल्लंघन करना।
#धर्म का अनुवाद प्रायः 'विधि' (Law) में भी किया जाता है , लेकिन अगर यह विधि है तो इसके कुछ तयशुदा विधान/ नियम भी होने चाहिए :
(1) इसको एक अथॉरिटी द्वारा प्रख्यायित (promulgated) और निर्णीत (डिक्री) किया जाना चाहिए , जिसकी एक निर्धारित क्षेत्र में सार्वभौमिक राजनैतिक सत्ता स्थापित हो।
(2) ये अनिवार्य और बाध्यकारी होना चाहिए
(3) किसी कोर्ट द्वारा व्याख्या निर्णय और बलपूर्वक क्रियान्वयन होने की व्यवस्था भी होनी चाहिए
(4) इन विधानों को भंग करने पर सजा/पेनाल्टी होनी चाहिए।
लेकिन धर्म की परम्परा में ऐसा कोई व्याख्या उपलब्ध नही है।
रोमन सम्राट कांस्टिन्टिने ने धर्मविधान (canon laws) के सिस्टम की शुरुवात की जिसका निर्धारण और बलपूर्वक क्रियान्वयन चर्च किया करता था। यहूदी ईश्वर का आधारभूत स्रोत इज़राइल का ईश्वर (God) था। पश्चिमी रेलिजन इस बात से सहमति जाहिर करते हैं कि ईश्वर के विधानों (Laws ऑफ़ God ) का पालन अवश्य होना चाहिए क्योंकि ये सार्वभौमिक सत्ता का ईश्वरीय आदेश है। इसलिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण (critical) हो जाता है कि झूठे ईश्वरों (false Gods) की निंदा/ भर्त्सना किया जाय और उनको पराजित किया जाय; क्योंकि वे सच्चे विधि (true laws) को कमजोर करने के लिए नकली (illigitimate) आदेश पारित कर सकते हैं ।और यदि कई ईश्वरों (dieties) के अस्तित्व को स्वीकार किया गया तो ये निर्णय लेने में भ्रम की स्थिति पैदा होगी कि सच्चा विधि/विधान कौन सा है।
वहीँ दूसरी तरफ (धर्म में ) ऐसे किसी भी सार्वभौमिक सत्ता का रिकॉर्ड / जिक्र नहीं है जो किसी क्षेत्र विशेष में या विशेष समयकाल मे, बिभिन्न धर्म -शास्त्रो (Texrs of Dharma for society) को व्याख्यायित करता हो , और न ही ऐसा कोई दावा कि ईश्वर ने उन सामाजिक विधानों (शाश्त्रो) के रहस्य को स्वयं बताया (revealed) हो, या फिर किसी शासक द्वारा उनका पालन करवाया जाना बाध्यकारी हो । सामजिक विधानों के किसी भी धर्म शाश्त्र के रचयिता को किसी भी राजा द्वारा नियुक्त नहीं किया गया था , और न ही उन्होंने कानून प्रवर्तक (Law Enforcer) की भूमिका में किसी (राजसत्ता ) को अपनी सेवाएं अर्पित की थी , या कभी भी किसी राजसत्ता के किसी भी रूप में कोई अंग रहे थे । वे आधुनिक काल के विधि वेत्ता (Jurists) के बजाय आज के सामजिक विज्ञानियों के समतुल्य थे।प्रसिद्द याज्ञवल्क स्मृति की रचना एक तपस्वी द्वारा सुदूर अभ्यारण्य में किया गया था।प्रसिद्द मनुस्मृति की रचना मनु के आश्रम में की गयी थी जिसकी शुरुवात में ही वे बताया गया है कि , उन्होंने समाधिस्त अवस्था में पूंछे गए प्रश्नो का उत्तर दिया था।मनु (1-82) में वे ऋषियों को बताते हैं कि हर युग का अपना अलग विशिष्ट सामाजिक और व्याहारिक धर्म होता है ।
धर्मशाष्ट्र किसी भी नियम को बलपूर्वक बाध्यकारी नहीं बनाते ; बल्कि एक प्रचलित परिपाटी का वर्णन भर करते हैं।कई परम्परागत स्मृतियाँ (Codified Social Dharma ) किसी वर्गविशेष (community) की प्रचलित स्थानीय रीतिरिवाज का ही वर्णन करती हैं ।( इनमे अन्तर्निहित ) महत्वपूर्ण सिद्धांत ये था कि वर्गविशेष के अंदर से ही आत्मनियंत्रण और अनुशासन को स्थापित करना। स्मतीतियों ने धर्मोपदेशक के आसन पर बैठकर कोई रूढ़िवादी विचार न लादने का दावा करती थी , न करती हैं ; जब तक कि 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश उपनिवेशी शासकों ने , स्मृतियों की जगह सत्ताधारी शासकों द्वारा बनाये गए कानूनों को बाध्यकारी बनाया।
धर्म की महिमा गिराकर उसका रिलिजन और विधि के कांसेप्ट से तुलना करने नुकसानदायक परिणाम हुए हैं : धर्म के अध्ययन को पश्चिम के चश्मे से पढ़ा जाने लगा है , जो इसको इसके खुद के स्थापित प्रतिमानों से बहुत दूर ले जाकर खड़ा करता है।
इसके अतिरिक्त ये धर्म के बारे में एक गलत अवधारणा पैदा करता है कि धर्म , विधिनियमक चर्चों , जो सत्तासंघर्ष में शामिल है , उसी के समतुल्य है।
भारत में धर्म की रिलिजन से तुलना एक अनर्थकारी कार्य सिद्ध हुवा है; #सेकुलरिज्म के नाम पर धर्म को उन्ही बंधनों में जकङ दिया गया है , जैसे ईसाइयत को यूरोप में ।
एक Non Religious समाज भी ईश्वर में आश्था न रखने के बावजूद भी अपनी नैतिकता को बचाकर रख सकता है ;लेकिन एक अ-धार्मिक समाज अपनी नैतिक दिसा खो बैठता है और भ्रस्टाचार और अधोपतन की खाई में गिर जाता है ।
नोट- अनुवाद है राजीव मल्होत्रा के इस लेख का।
लेख थोड़ा लंबा है / परंतु पढ़ें अवश्य / और शेयर न करें / कॉपी और पेस्ट करें /

हिन्दू काल गणना - विकिपीडिया
प्राचीन हिन्दू खगोलीय और पौराणिक पाठ्यों में वर्णित समय चक्र आश्चर्यजनक रूप से एक समान हैं। प्राचीन भारतीय भार और मापन पद्धतियां, अभी भी प्रयोग में हैं (मुख्यतः हिन्दू और जैन धर्म के धार्मिक उद्देश्यों में)। यह सभी सुरत शब्द योग में भी पढ़ाई जातीं हैं। इसके साथ साथ ही हिन्दू ग्रन्थों मॆं लम्बाई, भार…
#धर्म_मजहब_रेलीजन  क्या एक ही चीज है ?
पैगंबर प्रॉफ़ेट और ऋषि क्या एक दूसरे के समकक्ष हैं ?
हममें से बहुतायत लोग जो माइकाले के भूत से अभी भी प्रभावित है , वो  तीनों को एक ही मानते हैं / क्योंकि हम अनुवाद के गुलाम हैं / पिछले 250 साल से हम अङ्ग्रेज़ी से हिन्दी मे अनुवाद पढ़ते आए हैं , और उसको सच मानते हैं /
लेकिन क्या वाकई मे ऐसा है ?
दुनिया के तीन मजहब या रेलीजन यहूद इसाइयत और इस्लाम एक ही कुल से निकले हैं जिनको अब्राहमिक रेलीजन कहते हैं / जिसमे god या अल्लाह एक माध्यम (mediator ) के जरिये अपना संदेश आमजन तक पहुंचता है , जिसको प्रॉफ़ेट या पैगंबर कहते हैं / उस प्रॉफ़ेट का कोई विशेष शिक्षा  साधना तप जप करना , और उसमे पारंगत होना जरूरी नहीं है / बस वो god या अल्लाह का प्रिय व्यक्ति हो , और उसका चुना हुआ व्यक्ति हो / Noah (नूह  )  से लेकर मूसा ईशा और पैगंबर मोहम्मद तक यही सिद्धान्त रहा है ओल्ड टेस्टमेंट  के हिसाब से / और उस मजहब या रेलीजन के लोगों को god / अल्लाह के प्रॉफ़ेट या पैगंबर के माध्यम से दिये गए संदेशों को एक होली बुक मे संकलित किया गया है जोकि उस खास समुदाय के लिए code of conduct है /
जबकि धर्म के मामले मे न तो प्रॉफ़ेट का कोई स्थान है न किसी खास होली बुक की / और ऋषि बनने के लिए शिक्षा साधना जप तप आवश्यक है / वो किसी खास समुदाय के लिए नहीं है , पूरे विश्व की अवधारणा है

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...