बुधवार, 10 अक्टूबर 2018


Explanation Based on
 *Einstein Pain Wave (EPW)*

मांसाहार पर वैज्ञानिकों का शोध

प्राकृतिक आपदाओं पर हुई नई खोजों के नतीजें मानें तो इन दिनों बढ़ती मांसाहार की प्रवृत्ति भूकंप और बाढ़ के लिए जिम्मेदार है। आइंस्टीन पेन वेव्ज के मुताबिक मनुष्य की स्वाद की चाहत- खासतौर पर मांसाहार की आदत के कारण प्रतिदिन मारे जाने वाले पशुओं की संख्या दिनोंदिन बढ़ रही है।

सूजडल (रूस) में पिछले दिनों हुए भूस्खलन और प्राकृतिक आपदा पर हुए एक सम्मेलन में भारत से गए भौतिकी के तीन वैज्ञानिकों ने एक शोधपत्र पढ़ा। डा. मदन मोहन बजाज, डा. इब्राहीम और डा. विजयराजसिंह के अलावा दुनियाँ भर के 23 से अधिक वैज्ञानिकों द्वारा  तैयार किए शोधपत्र के आधार पर कहा गया कि भारत जापान नेपाल अमेरिका जार्डन अफगानिस्तान अफ्रीका में पिछले दिनों आए तीस बड़े भूकंपों में आइंस्टीन पैन वेव्ज (इपीडबल्यू) या नोरीप्शन वेव्ज बड़ा कारण रही है।

इन तरंगों की व्याख्या यह की गई है कि कत्लखानों में जब पशु काटे जाते हैं तो उनकी अव्यक्त कराह, फरफराहट, तड़प वातावरण में तब तक रहती है जब तक उस जीव का  माँस, खून, चमड़ी पूरी तरह नष्ट नही होती. उस जीव की कराह खाने वालों से लेकर पूरे वातवरण मे भय रोग और क्रोध उत्पन्न करती है। यों कहें कि प्रकृति अपनी संतानों की पीड़ा से विचलित होती है। अध्ययन मे बताया गया है कि प्रकृति जब ज्यादा क्षुब्ध होती है तो मनुष्य आपस में भी लड़ने भिड़ने लगते हैं चिड्चिडे हो जाते हैं और विभिन्न देश प्रदेशों में दंगे होने लगते हैं।

सिर्फ स्वाद के लिए बेकसूर जीव जंतुओं की हत्या ही  इस तरह के दंगों का कारण बनती है और  कभी कभी आत्महत्या का भी ।

ज्यादातर मामलों में प्राकृतिक उत्पात जैसे अज्ञात बीमारियाँ, हार्टअटेक, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, बाढ़, भूकंप, ज्वालामुखी के विस्फोट जैसे संकट आते हैं। इस अध्ययन के मुताबिक एक कत्लखाने से जिसमें औसतन पचास जानवरों को मारा जाता है 1040 मेगावाट ऊर्जा फेंकने वाली इपीडब्लू पैदा होती है।

दुनिया के करीब 50 लाख छोटे बड़े कत्लखानों में प्रतिदिन 50 लाख करोड़ मेगावाट की मारक क्षमता वाली शोक तरंगे या इपीडव्लू पैदा होती है। विश्व के  700 से अधिक वैज्ञानिकों सहित अनेक डाक्टरों के  सम्मेलन में माना गया कि कुदरत कोई डंडा ले कर तो इन तंरगों के गुनाहगार लोगों को दंड देने नहीं निकलती। उसकी एक ठंडी सांस भी धरती पर रहने वालों को कंपकंपा देने के लिए काफी है।

कत्लखानों में जब जानवरों को कत्ल किया जाता है तो बहुत बेरहमी के साथ किया जाता है बहुत हिंसा होती है बहुत अत्याचार होता है। जानवरों का कतल होते समय उनकी जो चीत्कार निकलती है, उनके शरीर से जो स्ट्रेस हारमोन निकलते है और उनकी जो शोक वेभ निकलती है वो पूरी दुनिया को तरंगित कर देती है कम्पायमान कर देती है। परीक्षण के दौरान लैबरोट्री में भी जानवरों पर ऐसा हीं वीभत्स अत्याचार होता है।

जानवरों को जब कटा जाता है तोह बहुत दिनों तक उनको भूखा रखा जाता है और कमजोर किया जाता है फिर इनके ऊपर ७० डिग्री सेंट्रीगेड गर्म पानी की बौछार डाली जाती है उससे शरीर फूलना शुरु हो जाता है तब गाय भैंस बकरी तड़पना और चिल्लाने लगते हैं तब जीवित स्थिति में उनकी खाल को उतारा जाता है और खून को भी इकठ्ठा किया जाता है | फिर धीरे धीरे गर्दन काटी जाती है, एक एक अंग अलग से निकला जाता है।

आज का आधुनिक विज्ञानं ने ये सिद्ध किया है के मरते समय जानवर हो या इन्सान अगर उसको क्रूरता से या उम्र पूरी होने के पहले  मारा जाता है तो उसके शरीर से निकलने वाली जो चीख पुकार है उसकी बाइब्रेशन में जो नेगेटिव वेव्स निकलते हैं वो पूरे वातावरण को बुरी तरह से प्रभावित करता है और उससे सभी मनुष्यों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, खासतौर पर सबसे ज्यादा असर ऐसे जीव का उन मनुष्यों पर पड़ता है जो उसका माँस खाते है और ये दुष्प्रभाव एक बार खाने के बाद कम से कम 18 महीने तक रहता है बड़ी बात ये है कि  खाने वाले के परिजन और अधिक तनावग्रस्त, दुखी व  भयंकर  रोगॊ से पीडित होते जाते  है । इससे मनुष्य में जिद करने गाली देने, चोरी करने, दूसरो का धन हड़पने, के साथ अत्यंत क्रोध व  हिंसा करने की प्रवृत्ति बढ़ती है जो अत्याचार और पाप पूरी दुनिया में बढ़ा रही है |

अफ्रीका  के दो प्रोफेसर, दो जर्मनी, दो अमेरिका के,  एक भारतीय  मदनमोहन  और चार जर्मनी के वैज्ञानिकों ने अपने अपने हेड  मार्क फीस्ट्न, डेविड थामस, जुँनस अब्राहम व क्रिओइबोँद फिलिप् के साथ बीस साल इस विषय पर रिसर्च किया है और उनकी रिसर्च ये कहती है कि जानवरों का जितना ज्यादा कत्ल किया जायेगा जितना ज्यादा हिंसा से मारा जायेगा उतना ही अधिक दुनिया में भूकंप आएंगे, जलजले आएंगे, प्राकृतिक आपदा आयेगी उतना ही दुनिया में संतुलन बिगड़ेगा और लोग दुखी, तनाव्युक्त व हार्टअटेक से पीडित होंगे.

शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2018



बहुत ही खूबसूरत पोस्ट लिखी है और बड़े दिल से लिखी है एक बार जरूर नमन कीजिए

*जीवन में 45 पार का मर्द........*
*कैसा होता है ?*

थोड़ी सी सफेदी कनपटियों के  पास,
खुल रहा हो जैसे आसमां बारिश के बाद,

जिम्मेदारियों के बोझ से झुकते हुए कंधे,
जिंदगी की भट्टी में खुद को गलाता हुआ,

अनुभव की पूंजी हाथ में लिए,
परिवार को वो सब देने की जद्दोजहद में,
जो उसे नहीं मिल पाया था,

बस बहे जा रहा है समय की धारा में,
*बीवी और प्यारे से बच्चों में*

पूरा दिन दुनिया से लड़ कर थका हारा,
रात को घर आता है, सुकून की तलाश में,

लेकिन क्या मिल पाता है सुकून उसे ?
दरवाजे पर ही तैयार हैं बच्चे,

पापा से ये मंगाया था, वो मंगाया था,
नहीं लाए तो क्यों नहीं लाए,
लाए तो ये क्यों लाए वो क्यों नहीं लाए,

अब वो क्या कहे बच्चों से,
कि जेब में पैसे थोड़े कम थे,

कभी प्यार से, कभी डांट कर,
समझा देता है उनको,

एक बूंद आंसू की जमी रह जाती है, आँख के कोने में,

लेकिन दिखती नहीं बच्चों को,
उस दिन दिखेगी उन्हें, जब वो खुद, बन जाएंगे माँ बाप अपने बच्चों के,

खाने की थाली में दो रोटी के साथ,
परोस दी हैं पत्नी ने दस चिंताएं,

*कभी,*

तुम्हीं नें बच्चों को सर चढ़ा रखा है,
कुछ कहते ही नहीं,

*कभी,*

हर वक्त डांटते ही रहते हो बच्चों को,
कभी प्यार से बात भी कर लिया करो,

लड़की सयानी हो रही है,
तुम्हें तो कुछ दिखाई ही नहीं देता,

लड़का हाथ से निकला जा रहा है,
तुम्हें तो कोई फिक्र ही नहीं है,

पड़ोसियों के झगड़े, मुहल्ले की बातें,
शिकवे शिकायतें दुनिया भर की,

सबको पानी के घूंट के साथ,
गले के नीचे उतार लेता है,

जिसने एक बार हलाहल पान किया,
वो सदियों नीलकंठ बन पूजा गया,

यहाँ रोज़ थोड़ा थोड़ा विष पीना पड़ता है,
जिंदा रहने की चाह में,
फिर लेटते ही बिस्तर पर,
मर जाता है एक रात के लिए,

*क्योंकि*

सुबह फिर जिंदा होना है,
काम पर जाना है,
कमा कर लाना है,
ताकि घर चल सके,....ताकि घर चल सके.....ताकि घर चल सके।।।।

*दिलसे सभी पिताओं को समर्पित,,,,,,,,,,,,,,,*

शुक्रवार, 28 सितंबर 2018

नागेश्वर / नाग केसर -

नागेश्वर एक वनस्पति है इसे हम नाग केसर के नाम से भी जानते है ।
आप यह नाग केसर किसी भी किराने की दूकान से खरीद सकते है ।
लेकिन याद रहे जिस दिन भी आप यह नाग केशर घर ला रहे हो दिन का वह समय शुभ
होना चाहिए ।
नाग केशर को लाकर आप उसे किसी पवित्र स्थान पर रख दें,
एवं 21 सोमवार तक शिव जी का  पूजन करे और शिवजी को  चन्दन और नाग केसर अर्पण करें एवं पूजन उपरांत शिवजी का मंत्र  ॐ नमः शिवाय जप करके मीठे का भोग लगायें।

सोमबार व्रत भी रखें ...
क्रोध एवं अहम् से दूर रहते हुए अपने सामर्थ्य अनुसार पशु पक्षी एवं भिखारी को भोजन प्रदान करें ।
जरुरत मंद लोगो ( भिखारी, संत , महात्मा ) को कुछ पैसों का दान कर सहायता करें।

अंतिम सोमवार के दिन पूजन के उपरांत किसी ब्राह्मीणि माता को घर पर भोजन के लिए आमंत्रित करें एवं यथा संभव उन्हें नए वस्त्र, भोजन, एवं दक्षिणा प्रदान करें ।
तत्पश्चात उन्हें आदर सहित उनके घर तक छोड़कर आवे या विदा करें ।

इस नागकेशर तंत्र से भगवान् शिव प्रसन्न हो साधक को धन, धान्य, सुख, शान्ति एवं संसार के वैभव प्रदान  करते है ।

नागकेसर के अन्य प्रयोग -
- पीत वस्त्र में नागकेसर, हल्दी, सुपारी, एक सिक्का, ताँबे का टुकड़ा, चावल पोटली बना लें।
इस पोटली को शिवजी के सम्मुख रखकर, धूप-दीप से पूजन करके सिद्ध कर लें फिर आलमारी, तिजोरी, भण्डार में कहीं भी रख दें।
यह धनदायक प्रयोग है।
इसके अतिरिक्त “नागकेसर” को प्रत्येक प्रयोग में “ॐ नमः शिवाय” से अभिमन्त्रित करना चाहिए।

- कभी-कभी उधार में बहुत-सा पैसा फंस जाता है।
ऐसी स्थिति में यह प्रयोग करके देखें।
किसी भी शुक्ल पक्ष की अष्टमी को रुई धुनने वाले से थोड़ी साफ रुई खरीदकर ले आएँ।
उसकी चार बत्तियाँ बना लें। बत्तियों को जावित्री, नागकेसर तथा काले तिल (तीनों अल्प मात्रा में) थोड़ा-सा गीला करके सान लें।
यह चारों बत्तियाँ किसी चौमुखे दिए में रख लें।
रात्रि को सुविधानुसार किसी भी समय दिए में तिल का तेल डालकर चौराहे पर चुपके से रखकर जला दें।
अपनी मध्यमा अंगुली का साफ पिन से एक बूँद खून निकाल कर दिए पर टपका दें।
मन में सम्बन्धित व्यक्ति या व्यक्तियों के नाम, जिनसे कार्य है, तीन बार पुकारें।
मन में विश्वास जमाएं कि परिश्रम से अर्जित आपकी धनराशि आपको अवश्य ही मिलेगी।
इसके बाद बिना पीछे मुड़े चुपचाप घर लौट आएँ।

अगले दिन सर्वप्रथम एक रोटी पर गुड़ रखकर गाय को खिला दें।
यदि गाय न मिल सके तो उसके नाम से निकालकर घर की छत पर रख दें।

- जिस किसी पूर्णिमा को सोमवार हो उस दिन यह प्रयोग करें।
कहीं से नागकेसर के फूल प्राप्त कर, किसी भी मन्दिर में शिवलिंग पर पाँच बिल्वपत्रों के साथ यह फूल भी चढ़ा दीजिए।
इससे पूर्व शिवलिंग को कच्चे दूध, गंगाजल, शहद, दही से धोकर पवित्र कर सकते हैं तो यथाशक्ति करें।
यह क्रिया अगली पूर्णिमा तक निरन्तर करते रहें।
इस पूजा में एक दिन का भी नागा नहीं होना चाहिए।
ऐसा होने पर आपकी पूजा खण्डित हो जायेगी।
आपको फिर किसी पूर्णिमा के दिन पड़नेवाले सोमवार को प्रारम्भ करने तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।

इस एक माह के लगभग जैसी भी श्रद्धाभाव से पूजा-अर्चना बन पड़े, करें।
भगवान को चढ़ाए प्रसाद के ग्रहण करने के उपरान्त ही कुछ खाएँ।

अन्तिम दिन चढ़ाए गये फूल तथा बिल्वपत्रों में से एक अपने साथ श्रद्धाभाव से घर ले आएँ।
इन्हें घर, दुकान, फैक्ट्री कहीं भी पैसे रखने के स्थान में रख दें।
धन-सम्पदा अर्जित कराने में नागकेसर के पुष्प चमत्कारी प्रभाव दिखलाते हैं।

!! ॐ नमः शिवाय !!

गुरुवार, 27 सितंबर 2018

#वैदिक_साहित्य_और_विज्ञान - #भाग - 17 ------

--------------------- #चिकित्सा_विज्ञान ---------------------
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वैदिक साहित्य सिर्फ भारत की ही नही अपितु सम्पूर्ण विश्व की अमूल्य और मौलिक निधि है , इसमे ज्ञान विज्ञान का विषद भंडार है , इस सिर्फ भारतीय ही नही अपितु विदेशी भी इसके ज्ञान के सम्मुख श्रद्धा से नत होते है , भारतीय आयुर्विज्ञान या आयुर्वेद वैदिक साहित्य का अभिन्न अंग है और आज का आधुनिक युग मे भी इसकी महत्ता कम नही हुई है , भारतीय विद्याओं में आयुर्वेद की गौरवमयी परम्परा है। महर्षियों ने इसे अतिपुरातन और शाश्वत कहा है। सुश्रुत के अनुसार, ब्रह्मा ने सृष्टि के पूर्व ही इसकी रचना की। सभी संहिताकारों ने ब्रह्मा से आयुर्वेद का प्रादुर्भाव माना है। भारतीय वांग्मय के प्राचीनतम ग्रन्थ वेदों में आयुर्वेद का ज्ञान दक्ष प्रजापति ने प्राप्त किया। प्रजापति से अश्विनीकुमारों ने और उनसे इन्द्र ने उस ज्ञान को प्राप्त किया-
ब्रह्मणा हि यथाप्राक्तमायुर्वेदं प्रजापतिः।
जग्राह निखिलेनादावश्विनौ तु पुनस्ततः।।

मनीषियों ने आयुर्वेद को उपवेद के रूप में स्वीकार किया है। यद्यपि कुछ विद्वान इसे ऋग्वेद का तथा अधिकाँश अथर्ववेद का अविच्छिन्न अंग मानते है। चरणव्यूह तथा प्रस्थानभेद में आयुर्वेद शब्द का प्रयोग हुआ है और वहाँ इसे ऋग्वेद का उपवेद माना गाया है, जबकि चरक, सुश्रुत, कश्यप आदि आयुर्वेदीय संहिताएँ आयुर्वेद का संबन्ध अथर्ववेद से मानती हैं। वैसे अधिकाँश विद्वानों के अनुसार, चिकित्साशास्त्र का उपजीव्य मुख्यतः अथर्ववेद ही है। इसकी नौ शाखाएँ हैं- पैप्पलाद, तौढ़, मौद, शौनकीय, जलद, ब्राह्मपद, देवदर्श एवं चारणवैद्य।

गोपथ ब्राह्मण में इसे यद् भेषजं तद् अमृतं यद् अमृतं तद् ब्रह्म के रूप में निरूपित किया गया है।

अथर्ववेद भृग्वडिंगरस के रूप में भी प्रसिद्ध रहा है। अश्विनौ के समान अथर्वण और अंगिरस युग्म भी चिकित्सा की दो प्रचलित पद्धतियों की ओर संकेत करता है। अथर्वण मुख्यतः दैवव्यापाश्रय चिकित्सा करते थे और अंगिरस अंगों के रस से सम्बन्ध रखने के कारण युक्तिव्यापाश्रय से सम्बन्धित थे। व्यवहार में वे क्रमशः सोम और अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करते थे। वेदों में रुद्र, अग्नि, वरुण, इन्द्र, मरुत आदि देवता भिषक कहे गए हैं। परन्तु अश्विनीकुमारों को देवानां भिषजौ के रूप में निरूपित किया गया है।

  #वैदिक_चिकित्सा_विज्ञान - #मनुष्य_पशु_और_वृक्ष
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"आयुर्वेद " शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है - "आयुष" और "वेद"।

हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्।
मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते॥
-(चरक संहिता 1/40)
(अर्थात जिस ग्रंथ में - हित आयु (जीवन के अनुकूल), अहित आयु (जीवन के प्रतिकूल), सुख आयु (स्वस्थ जीवन), एवं दुःख आयु (रोग अवस्था) - इनका वर्णन हो उसे आयुर्वेद कहते हैं।)

साधारणतया आयुर्वेद के विषय मे हमने पढ़ा होगा कि इसके 8 मुख्य भाग है -

1)शल्य तन्त्र,
2) शालाक्य तन्त्र,
3) काय चिकित्सा तन्त्र,
4) भूत विद्या तन्त्र,
5) कौमारभृत्य तन्त्र,
6) अगद तन्त्र,
7) रसायन तन्त्र और
8- वाजीकरण तन्त्र

उपरोक्त के विषय मे कभी विस्तार से लिखूंगा , कुछ मुख्य वैदिक साहित्य के मानवों के संदर्भ में उल्लेख ऐसे है - ऋषि पिपलाद कृत ‘गर्भ-उपनिष्द’ के अनुसार मानव शरीर में 180 जोड, 107 मर्मस्थल, 109 स्नायुतन्त्र, और 707 नाडियाँ, 360 हड्डियाँ, 500 मज्जा (मैरो) तथा 4.5 करोड सेल होते हैं। हृदय का वजन 8 तोला, जिव्हा का 12 तोला और यकृत (लिवर) का भार ऐक सेर होता है। स्पष्ट किया गया है कि यह मर्यादायें सभी मानवों में ऐक समान नहीं होतीं क्यों कि सभी मानवों की भोजन ग्रहण करने और मल-मूत्र त्यागने की मात्रा भी ऐक समान नहीं होती।  ईसा से सैकड़ो वर्ष पूर्व भारतीय चिकित्सकों ने संतान नियोजन का वैज्ञानिक ज्ञान उल्लेख कर दिया था। उन के मतानुसार मासिक स्त्राव के प्रथम बारह दिनों में गर्भ नहीं ठहरता। गर्भ-उपनिष्द में गर्भ तथा भ्रूण विकास सम्बन्धी जो समय तालिका दी गयी है वह आधुनिक चिकित्सा के अनुरूप ही है। विस्तृत पोस्ट करूँगा कभी इसपर ।

अभी आयुर्वेद के कुछ अन्य विभाग के विषय में जान लेते है , जब हम अथर्ववेद का परिशीलन करते है तो हमे ये ज्ञात होता है कि आयुर्वेद में मनुष्य की चिकित्सा के अतिरिक्त पशु चिकित्सा एवम  वृक्ष चिकित्सा के भी विभाग है -

1) - #वृक्षायुर्वेद - वृक्षों एवम वनस्पतिओ की चिकित्सा -
सस्य वेद , वृहद पराशर संहिता आदि अनेक ग्रन्थ उपलब्ध है इसका वर्गीकरण फिर कभी लिखूंगा ।

2)- #पश्वायुर्वेद - पशुओ की चिकित्सा - इसके मुख्य विभाग -
ऊष्ट्रायुर्वेद
मत्स्यायुर्वेद
मृगपक्षीशास्त्र
श्येनशास्त्र
गजायुर्वेद
अश्वायुर्वेद
गवायुर्वेद

अग्निपुराण में कहा गया है कि
अग्निदेव कहते हैं – वसिष्ठ ! शालिहोत्र ने सुश्रुत को ‘अश्वायुर्वेद’ और पाल्काप्यने अंगराज को ‘गवायुर्वेद’ का उपदेश किया था -
शालिहोत्रः सुश्रुताय हयायुर्वेदमुक्तवान्। पालकाप्योउंगराजाय गजायुर्वेदमब्रवीत्॥
(अग्निपुराण 292.44)

#गजायुर्वेद

हाथी, जिसे संस्कृत में गज, नाग, अर्व, कुंजर, हस्ति, करि आदि भी कहा जाता है, प्राचीन काल में युद्ध के लिए महत्त्वपूर्ण जानवर माना जाता था और यह शत्रुओं के सामने सेना का बड़ा साहस माना जाता था। आचार्य चाणक्य ने हाथी के पालन और उपयोग को लेकर जो सूचनाएँ दी हैं, वे मेगास्थनीज आदि के विवरण से पर्याप्त मेल खाती हैं।

बार्हस्पत्यसंहिता में कहा गया है-
पराशरसंहिता में चार प्रकार के हाथी बताए गए हैं : भद्रा, मन्दा, मृगा और मिश्रा। बल, गति, सत्व, छाया आदि के आधार पर हाथियों की परीक्षा की जाती थी -

रिपुविजयः फलमेषां नागानां नागलक्षणोक्तानाम्।
संचरण साहस निरतस्य भवति नित्यं नरेन्द्रस्य।
सांग्रामिका द्विपा राजन सम्यग्लक्षण लक्षिताः।

मुनि पालकाप्य को प्रथमतः अंगनरेश के प्रति गजशास्त्र तैयार करने का श्रेय है। और उनके नाम से अनेक छोटे-बड़े हस्तिशास्त्र मिलते हैं। पालकाप्य ने हाथी को प्रत्यक्ष देवता कहा है और नागजात्य स्वीकारा है :
प्रत्यक्षदेवता नागा देवजात्या यतस्ततः।
 स्वामिनश्च भवन्त्येते तस्मात् प्रोक्तास्तु भूमिदाः॥ (वीरमित्रोदय, लक्षणप्रकाश, पेज 321)।

पालकाप्य के काल तक हाथियों की विशेष चिकित्सा पर ध्यान दिया जाता था और गजवैद्य राज्याश्रय प्राप्त होते थे।

गजवैद्य भिषक्, विनीत, मेधावी, ग्रन्थों के अर्थों को जाननेवाले, राजा जैसा प्रियभाषी, महाभोग को ग्रहण करनेवाले, वाग्मी, प्रगल्भ, शान्तात्मा, बुद्धिमान, धार्मिक और पवित्रमन सहित सेना के इच्छुक, मधुर व कुलीन होते थे। (पेज 400)

#अश्वायुर्वेद -
संसार के इतिहास में घोड़े पर लिखी गई प्रथम पुस्तक शालिहोत्रसंहिता है, जिसे शालिहोत्र ऋषि ने महाभारत काल से भी बहुत समय पूर्व लिखा था। कहा जाता है कि शालिहोत्र द्वारा अश्वचिकित्सा पर लिखत प्रथम पुस्तक होने के कारण प्राचीन भारत में पशुचिकित्सा विज्ञान को 'शालिहोत्रशास्त्र' नाम दिया गया। शालिहोत्रसंहिता का वर्णन आज संसार की अश्वचिकित्सा विज्ञान पर लिखी गई पुस्तकों में दिया जाता है। भारत में अनिश्चित काल से देशी अश्वचिकित्सक 'शालिहोत्री' कहा जाता है।

शालिहोत्रसंहिता में 48 प्रकार के घोड़े बताए गए हैं। इस पुस्तक में घोड़ों का वर्गीकरण बालों के आवर्तों के अनुसार किया गया है। इसमें लंबे मुँह और बाल, भारी नाक, माथा और खुर, लाल जीभ और होठ तथा छोटे कान और पूँछवाले घोड़ों को उत्तम माना गया है। मुँह की लंबाई 2 अंगुल, कान 6 अँगुल तथा पूँछ 2 हाथ लिखी गई है। घोड़े का प्रथम गुण 'गति का होना' बताया है। उच्च वंश, रंग और शुभ आवर्तोंवाले अश्व में भी यदि गति नहीं है, तो वह बेकार है। शरीर के अंगों के अनुसार भी घोड़ों के नाम, त्रयण्ड (तीन वृषण वाला), त्रिकर्णिन (तीन कानवाला), द्विखुरिन (दोखुरवाला), हीनदंत (बिना दाँतवाला), हीनांड (बिना वृषणवाला), चक्रवर्तिन (कंधे पर एक या तीन अलकवाला), चक्रवाक (सफेद पैर और आँखोंवाला) दिए गए हैं। गति के अनुसार तुषार, तेजस, धूमकेतु, एवं ताड़ज नाम के घोड़े बताए हैं। इस ग्रन्थ में घोड़े के शरीर में 12,000 शिराएँ बताई गई हैं। बीमारियाँ तथा उनकी चिकित्सा आदि, अनेक विषयों का उल्लेख पुस्तक में किया गया है, जो इनके ज्ञान और रुचि को प्रकट करता है। इसमें घोड़े की औसत आयु 32 वर्ष बताई गई है।

#गवायुर्वेद -

पराशरः प्राह बृहद्रथाय गोलक्षणं यत् क्रियते ततोऽयम्। मया समासः शुभलक्षणास्ताः सर्वास्तथा- प्यागमतोऽभिधास्ये॥
(बृहत्संहिता, 61.1)।
पराशर ने गायों के लक्षणों को लिखा है और माना है कि कभी गायों की आँखों में आँसू नहीं हों, न ही कभी आँखें गंदली या रूखी हो। चूहे के समान आँखवाली, हिलते हुए सींगवाली, चपटे सींगवाली गाय, कृष्ण, लोहित वर्णवाली व गदहे के समान वर्णवाली गाय शुभ नहीं होती। इसका अभिप्राय है कि गायें बहुत शुभ लक्षणोंवाली हों और इसके लिए गायों की प्रजातियों का पूरा ध्यान रखा जाए, क्योंकि संकरता शुभदायी नहीं होती-

साश्रुणी लोचने यासां रूक्षाल्पे च न ताः शुभाः। चलच्चिपिट श्रृंगाश्च करटाः खरसन्निभाः॥

मुनि का मत कि दस, सात या चार दाँतवाली, लम्बे मुंहवाली, बिना सींगवाली, झुकी हुई पीठवाली, छोटी तथा मोटी गरदनवाली, जौ के समान बीच से मोटी, फटे हुए खुरवाली, श्याम रंग की, लंबी जिह्वावाली, बहुत छोटे या बहुत बड़े गुल्फवाली, दुबली, कम अंगवाली या अधिक अंगवाली गायें नहीं होनी चाहिए-

दश सप्त चतुर्दन्त्योऽलम्बवक्त्रा न ताः शुभाः। विषाणवर्जिता ह्रस्वाः पृष्ठमध्याति सन्नताः॥ ह्रस्वस्थूल गला याश्च यवमध्याः शुभा न ताः। भिन्नपादा बृहद्गुल्फा याश्च स्युस्तनुगुल्फकाः॥ श्यावातिदीर्घजिह्वाश्च महत्ककुद संयुताः। याश्चाति कृशदेहाश्च हीना अवयवैश्च याः॥ न ताः शुभप्रदा गावो भर्तुयूथस्य नाशना॥
(भट्टोत्पलीयविवृत्ति, 61.2-4)।।

इसके अतिरिक्त उनके रुग्ण होने पर उनकी चिकित्सा भी बताई गई है ।

#विशेष -
सनातन संस्कृति चिकित्साशास्त्र में सदैव अग्रणी रहा है और आयुर्वेद, चरक संहिता, सुश्रुत संहिता आदि ग्रंथ इसके उदाहरण हैं । परंतु इन ग्रंथों के अलावा भी वेदों में अनेक स्थानों पर चिकित्सा-विज्ञान के क्लोनिंग आदि जैसे अद्भुत प्रयोगों की चर्चा की गयी है ।

यहाँ पर इन तथ्यों के सम्बंध में संक्षिप्त जानकारी प्रस्तुत की जा रही है जिससे कम-से-कम यह अनुमान तो अवश्य लगाया जा सकता है कि वैदिक ऋषियों को इसकी सम्पूर्ण जानकारी थी ।

#क्लोनिंग_टिश्यू_कल्चर_एंड_प्लास्टिक_सर्जरी
गांधारी के 100 पुत्र , विभिन्न पुराणों में चमड़े , बाल , अस्थि , मांस से नई पीढ़ी का जन्म कराना अक्सर पढ़ते ही रहते है हम जो आधुनिक युग मे सम्भव दिखता है कुछ वैदिक उल्लेख -

निश्चर्मणो गामरिणीत धीतिभिर्या जरन्ता युवशा ताकृणोतन ।
सौधन्वना अश्वादश्वमतक्षत युक्त्वा रथमुप देवाँ अयातन ॥
(ऋग्वेद 1:161:7)
अर्थात -
हे सुधन्वा पुत्रों ! आपके श्रेष्ठ प्रयासों  से चर्मरहित गौ को पुनर्जीवन मिला । अतिवृद्ध माता-पिता को आपने तरुण बनाया । एक घोडे से दूसरे घोडे को उत्पन्न करके उनको रथ में जोतकर देवों के समीप उपस्थित हुये ।

यत्संवत्समृभवो गामरक्षन्यत्संवत्समृभवो मा अपिंशन  ।
यत्संवत्समभरन्भासो अस्यास्ताभिः शमीभिरमृतत्वमाशुः ॥ऋग्वेद 4:33: 4

उन ऋभुओं ने एक वर्ष पर्यंत मरणासन्न गाय का पालन किया । उन्होंने एक वर्ष पर्यंत उसे अवयवों से युक्त किया तथा उसे सौंदर्य प्रदान किया । एक वर्ष पर्यंत उन्होंने उसमें तेज स्थापित किया । इन सम्पूर्ण कार्यों के द्वारा उन्होंने अमरत्व को प्राप्त किया ।

याभिः शचीभिश्चमसाँ अपिंशत यया धिया गामरिणीत चर्मणः ।
येन हरि मनसा निरतक्षत तेन देवत्वमृभवः समानश ॥
ऋग्वेद 3:60:2
हे ऋभुगणों ! जिस सामर्थ्य से आपने चमसों का सुंदर विभाजन किया, जिस बुद्धि से आपने गौ को चर्म से संयुक्त किया, जिस मानस से आपने इंद्र के अश्वों को समरf

सोमवार, 24 सितंबर 2018





🙏।। मात् श्री नर्मदे हर।।
।।ॐ नमः शिवाय।।
।।जय श्री महांकाल।।🙏एक तस्वीर बहुत दिन से आकर्षित कर रही थी। न जाने कहाँ से आयी थी और कुछ पता भी नहीं चल पा रहा था कि किस संत की है ये तस्वीर। लेकिन इस बार भी बाबा ब्रह्मचारी नर्मदा शंकर काम आये। मैंने तस्वीर उन्हें दिखाई और उन्होंने कहा की कि सिद्ध पुरुष सियाराम बाबा हैं। नर्मदा बाबा के मोरटक्का आश्रम से 40 किलोमीटर दूर तेलिया भट्यान्न गांव के एक वृक्ष ने नीचे रहते हैं सियाराम बाबा। सिर्फ एक लंगोट में उन्होंने अपना जीवन व्यतीत कर दिया। सर्दी, गर्मी, बसंत और बरसात सियाराम बाबा के तन पर सिर्फ यही एक कपड़ा होता है। न उन्हें गर्मी सताती है और न ठण्ड में उन्हें किसी ने कांपते देखा है।
नर्मदा शंकर बाबा बताते हैं कि उनकी उम्र करीब करीब 100 के आसपास होगी। हालाँकि कोई उनके गुरु के बारे में नहीं जानता लेकिन 10 साल उन्होंने खड़ेश्वरी सिद्धि की है। खड़ेश्वरी साधु अपने तप के दौरान सोना – जगाना या कोई भी काम खड़े खड़े ही करते है। अपनी खड़ेश्वरी साधना की दौरान एक बार नर्मदा माँ में बाढ़ आ गयी और जल स्तर इतना बढ़ गया कि पानी उनकी नाभि तक आ गया लेकिन सियाराम बाबा एक क्षण को भी हटे नहीं। डटे रहे नर्मदा में जब तक पानी का स्तर सामान्य नहीं हो गया। बाबा नर्मदा शंकर बहुत बार उनसे मिलने जाते हैं और बाबा अपने हाथ से चाय बना कर सभी साधु और सन्यासियों को पिलाते हैं।


बड़े विरले संत हैं –नर्मदा परिक्रमा करने जो भी व्यक्ति इस गांव से होकर गुजरता है उसको भोजन बाबा खुद अपने हाथ से देते हैं। आगे के रास्ते के लिए हर तीर्थ यात्री को दाल, चावल, नमक, तेल, मिर्च, कपूर और अगरबत्ती की एक पोटली बाबा सबको देते हैं। उनके मंदिर में भी जो प्रसाद आता है उसको इंसान और जानवरों में बराबर बांटते हैं। लोग नारियल का चढ़ावा लाते हैं और बाबा तभी उसे वितरित कर देते।
पूरे दिन राम नाम का जाप करते करते बस उन्हें चिंता रहती है तो बस नर्मदा माँ की परिक्रमा करने वाले लोगों की। बाबा नर्मदा शंकर कहते हैं कि इतने सरल बाबा हैं कि आप 2000 का नोट दे दो, 500  का या 100 का – आपका नाम लिखेंगे और सिर्फ 10 रुपए लेकर बाकी सारे पैसे आपको वापस कर देंगे। अर्जेंटीना और ऑस्ट्रिया से साधक जब नर्मदा शंकर बाबा से योग सीखने आये तो बाबा सभी को सियाराम बाबा से मिलवाने ले गए। वो विदेशी लोगों के दिखाना चाहते थे कि आज भी पृथ्वी पर ऐसे साधु हैं जो सनातन धर्म के सच्चे रखवाले हैं। जिन्हें माया और मोह छू भी नहीं पाया। कुछ विदेशी लोगों ने 500 रुपए दिए – बाबा ने 10 रुपए काट कर बाकी सब लौटा दिए। हैरान हुए विदेशी कि शहर की चकाचौंध से दूर एक बीहड़ गांव में संत आज भी हैं।
बाबा नर्मदा शंकर ने बेहद रोचक जानकारी दी। दरअसल सियाराम बाबा की जगह बांध डूब क्षेत्र में आती हैं और सरकार ने उन्हें 2 करोड़ 18 लाख रुपए मुआवजा दिया। सियाराम बाबा ने पूरा धन आदिवासी क्षेत्र के विकास में दान दे दिया। इलाके के विकास के साथ साथ उन्होंने एक बेहद प्राचीन नाग देवता के मंदिर की जीणोद्धार के लिए भी पैसा आवंटित किया है। आज दिल्ली मुंबई जैसे संभ्रांत और पैसे वाले लोगों की घर कोई चला जाये तो लोग ये सोचते हैं कि ये बिना कुछ खाये ही चला जाये तो बेहतर। परिवार के दिल इतने छोटे हो गए हैं कि माता पिता के लिए घर में जगह नहीं है वहीँ सियाराम बाबा हर किसी अनजाने चेहरे को खाना खिलाते हैं। पैसे के लिए जहाँ भाई का दुश्मन हैं वहीँ ने बाबा ने 2 करोड़ रुपए दान कर दिए।

गुरुवार, 20 सितंबर 2018



!!!---: मुल्तानी मिट्टी के लाभ :---!!!
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हमारे शरीर के पाँच तत्वों में से एक है मिट्टी | मुल्तानी मिटटी प्रयोग के लिए श्रेष्ठ मानी जाती है | यह पाकिस्तान के इलाके मुल्तान में बहुतायत से पायी जाती है | यह हलके पीले रंग की एकदम चिकनी होती है और ढेले के रूप में मिलती है | इसमें सिलिका कम और लाइम स्टोन ज्यादा रहता है | उत्तर भारत में तो वाकई में यह सस्ते में आसानी से मिल जाती है | इसका प्रयोग कई तरह की बीमारियों, स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं और शरीर तथा त्वचा के रोगों से निजात दिलाने में सहायक है |

मुल्तानी मिट्टी के लाभ :---
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(1.) अगर इसे कूट कर हल्दी के साथ मिलकर प्रयोग किया जाए तो झाइयाँ व मुहांसे दूर होते हैं और त्वचा कांतिमय बन जाती है  ।

(2.) रोज रोज साबुन लगाने से शरीर के मित्र जीवाणु नष्ट हो जाते है, जिससे शरीर की रोग-प्रतिरोधक-क्षमता नष्ट हो जाती है और साथ ही देह की कुदरती मानुष गंध- फेरोमोंन का भी सफाया हो जाता है; जो लोगों में परस्पर जैव रासायनिक संचार का एक बहुत ही महत्वपूर्ण जरिया होता है ।

मनुष्य के पारस्परिक व्यवहार, आक्रामकता, प्रेम सबंध आदि के निर्धारण /नियमन में फेरोमोंन की बड़ी भूमिका है । इसलिए कुदरती मुल्तानी मिटटी से स्नान करें, जो मित्र कीटाणु और शरीर की गंध दोनों बचाती है |

(3.) गर्मियों में होने वाली घमौरियों के उपचार में मुल्तानी मिट्टी अचूक औषधि है।

(4.) शरीर पर इसका पतला-पतला लेप खून की गर्मी को कम करता है। तेज बुखार में तापमान तुरंत नीचे लाने के लिये सारे शरीर पर इसका मोटा-मोटा लेप करना चाहिए l

(5.) अगर आप महँगे-महँगे ब्यूटी प्रोडक्ट, शैम्पू, ऑलिव ऑयल का इस्तेमाल करते हुए थक चुके हैं, फिर भी आपको कोई फ़ायदा नहीं हुआ है तो एक बार मुल्तानी मिट्टी ज़रूर इस्तेमाल करके देखें।

(6.) ये नेचुरल कंडीशनर भी है और ब्लीच भी। ये सौन्दर्य निखारने का सबसे सस्ता और आयुर्वेदिक नुस्खा है।

(7.) मुल्तानी मिट्टी सभी फेस पैक का बेस होती है। चेहरे पर मुल्तानी मिट्टी का लेप लगाने से रंगत निखरती है।

(8.) बालों में लगाने से वे घने, मुलायम और काले हो जाते हैं।

(9.) मुहांसों की समस्या से परेशान लोगों के लिए तो मुल्तानी मिट्टी सबसे कारगर इलाज है, क्योंकि मुल्तानी मिट्टी चेहरे का तेल सोख लेती है, जिससे मुहांसे सूख जाते हैं।

(10.) मुंहासों के दाग़ घटाने लिए मुल्तानी मिट्टी में नीम की पत्तियों को पीसकर पेस्ट बना लें और चेहरे के दाग-धब्बों पर लगाएँ । 15 दिनों में ही असर दिखेगा।

(11) धूप में झुलसी त्वचा को ठीक करने के लिए मुल्तानी मिट्टी को गुलाब जल या टमाटर के रस में मिला कर लगाएँ l

(12.) मुल्तानी मिट्टी में सूखे संतरे के छिलकों का पाउडर, जई का आटा मिलाकर चेहरे और गर्दन पर लगाएँ । इस पैक को रोज़ लगाने से रोम छिद्र साफ होते हैं और मुंहासे नहीं होते ।

(13.) मुल्तानी मिटटी को खट्टे छाछ में घोल कर उससे बाल धोने से रूखापन गायब हो जाएगा और बालों में चमक आ जायेगी  ।

(14.) 100 ग्राम मुल्तानी मिट्टी को एक कटोरे पानी में भिगो दें। दो घण्टे बाद जब मुल्तानी मिट्टी पूरी तरह घुल जाये तो इस घोल को सूखे बालों में लगा कर हल्के हाथ से बालों को रगड़े। पाँच मिनट तक ऐसा ही करें।अगर बालों मे ज्यादा गंदगी मौजूद है, तो इस क्रिया को दोबारा फिर करें। हफ्ते में दो बार इस क्रिया को करने से बालों में बहुत ज्यादा निखार आ जाता है। बाल लम्बे, रेशमी और मुलायम हो जाते हैं। इस क्रिया को करने के बाद सिर में हल्केपन के साथ शीतलता का अहसास होता है। ऐसी शीतलता किसी भी शैम्पू में नहीं मिल सकती है l

(15.) रोजाना मुल्‍तानी मिट्टी से बाल धोने पर बाल झडना कम हो जाएंगे।

(16.) धूप में त्वचा की रंगत काली होने पर इसमें सुधार के लिए मुल्तानी मिट्टी का इस्तेमाल एंटी टैनिंग एजेंट के तौर पर करें। मुल्तानी मिट्टी का लेप न सिर्फ त्वचा को राहत पहुँचाता है, बल्कि टैन हुई त्वचा को साफ बनाता है।

(17.) आधा चम्मच संतरे का रस लेकर उसमें 4-5 बूंद नींबू का रस, आधा चम्मच मुल्तानी मिट्टी, आधा चम्मच चंदन पाउडर और कुछ बूंदें गुलाब जल की मिलाकर थोड़ी देर के लिए किसी तरह ठण्डा करें । फिर इसे लगा कर 15-20 मिनट तक रखें। इसके बाद पानी से इसे धो दें। यह ऑयली त्वचा का सबसे अच्छा उपाय है।

(18.) तैलीय त्वचा के लिए मुल्तानी मिट्टी में दही और पुदीने की पत्तियों का पाउडर मिला कर उसे आधे घण्टे तक रखा रहने दें, फिर अच्छे से मिला कर चेहरे और गर्दन पर लगाएँ । सूखने पर हल्के गर्म पानी से धो दें। ये तैलीय त्वचा को चिकनाई रहित रखने का कारगर नुस्खा है।

(19.) अगर आपकी त्वचा ड्राई है तो काजू को रात भर दूध में भिगो दें और सुबह बारीक पीसकर इसमें मुल्तानी मिट्टी और शहद की कुछ बूंदें मिलाकर स्क्रब करें।

(20.) रूखी त्वचा पर मुल्तानी मिट्टी में चन्दन पाउडर या कैलामाइन पाउडर मिला कर लगाएं, इससे चेहरे की नमी बनी रहेगी।

(21.) बडे से बडे फोडे़ पर मिट्टी की पट्टी चढ़ाने से, विद्रावक शक्ति के कारण वह उसे पकाकर निचोड़ देती है एवं घाव भी बहुत जल्दी भर देती है।

(22.) मिट्टी मे विष को शोषित करने की विलक्षण शक्ति होती है । साँप, बिच्छू, कैंसर तक के जहर को खींचकर (सोखकर) कुछ ही दिनों में ठीक कर देती है ।

मंगलवार, 18 सितंबर 2018



दांत को कभी न देवे दुखने सो आजमावे हर पल-

दाँत दर्द में हमें बड़ी कठनाई का सामना करना पड़ता है । कई बार कुछ गलत खाने से तो कई बार दांतों की ठीक से सफाई न करने या कीड़े लगने के कारण दांतों में दर्द होने लगता है. दांतों में दर्द का कारण कोई भी हो, लेकिन इसकी पीड़ा हमारे लिए बेहद कष्टकारी बन जाती है। यहाँ पर हम आपको दाँत दर्द में कुछ बहुत ही आसान से उपचार बता रहे है।

*पिसी हल्दी, नमक व सरसो का तेल मिलाकर पेस्ट सा बना कर उसे डिब्वे में रख ले सुबह इस पेस्ट को ब्रुश अथवा उगली के द्वारा दाँतों व मसूड़ों पर लगा लें थोड़ी देर लगा कर रखे फिर बाद में कुल्ला कर लें इस प्रयोग से हिलते हुए दाँत जम जाते हैं दाँतो से पीलापन दुर होकर दाँत विल्कुल सफेद हो जाते हैं।इस प्रयोग करते रहने से कभी भी पायरिया नही होगा।

*नींबू के छिलकों पर थोड़ा-सा सरसों का तेल डालकर दाँत एवं मसूढ़ों पर लगाने से दाँत सफेद एवं चमकदार होते हैं, मसूढ़े मजबूत होते हैं, हर प्रकार के जीवाणुओं तथा पायरिया आदि रोगों से बचाव होता है।

*जामफल के पत्तों को अच्छी तरह चबाकर उसका रस मुँह में फैलाकर, थोड़ी देर तक रखकर थूक देने से अथवा जामफल की छाल को पानी में उबालकर उसके कुल्ले करने से हर तरह के दाँत के दर्द में लाभ होता है।

*हींग दांत में दर्द से तुरंत मुक्ति दिलाता है । हींग को मौसमी के रस में डुबोकर दांतों में दर्द की जगह पर रखें, मौसमी न होने पर हींग में नींबू भी मिलाया जा सकता है। इससे शीघ्र ही आपको दर्द से छुटकारा मिल जायेगा।

*तिल के तेल में पीसा हुआ नमक मिलाकर उँगली से दाँतों को रोज घिसने से दाँत की पीड़ा दूर होती है ।

*दांतों के दर्द में लौंग दांतों के सभी बैक्टीरिया को नष्ट कर सकता हैं। ऐसे में लौंग को दांतों के दर्द की जगह पर रखना चाहिए, कुछ ही देर में आपका दर्द जाता रहेगा। लेकिन चूँकि इसमें दर्द कम होने की प्रक्रिया थोड़ी धीमी होती है इसलिए इसमें धैर्य रखना चाहिए ।

*जामुन के वृक्ष की छाल के काढ़े के कुल्ले करने से दाँतों के मसूढ़ों की सूजन मिटती है व हिलते दाँत भी मजबूत होते हैं।

*प्याज दांत दर्द के लिए एक उत्तम घरेलू उपचार है। जो व्यक्ति रोजाना कच्चा प्याज खाते हैं उन्हें दांत दर्द की शिकायत होने की संभावना कम रहती है क्योंकि प्याज में कुछ ऐसे औषधीय गुण होते हैं जो बैकटीरिया को नष्ट कर देते हैं। अगर आपके दांत में दर्द है तो प्याज के टुकड़े को दांत के पास रखें अथवा प्याज चबाएं। आपको आराम महसूस होने लगेगा।

*10 ग्राम बायविडंग और 10 ग्राम सफेद फिटकरी थोड़ी कूटकर तीन किलो पानी में उबालें। एक किलो बचा रहने पर छानकर बोतल में भरकर रख लें। तेज दर्द में दिन में 2-3 बार इस पानी से कुल्ला करने से दो दिन में ही आराम आ जाता है। कुछ अधिक दिन कुल्ला करने से दाँत पत्थर की तरह मजबूत हो जाते हैं।

*प्रायः दाढ़ में कीड़ा लगने पर असहय दर्द उठता है। तब अमरूद के पत्ते के काढ़े से कुल्ला करने से दाँत और दाढ़ की भयानक टीस और दर्द दूर हो जाता है। पतीले में पानी में अमरूद के पत्ते डालकर इतना उबालें कि वह पानी उबाले हुए दूध की तरह गाढ़ा हो जाए।

*नमक के पानी के कुल्ले करने एवं कत्थे अथवा हल्दी का चूर्ण लगाने से गिरे हुए दाँत का रक्तस्राव जल्दी ही बंद हो जाता है।

*लहसुन में एंटीबायोटिक गुण पाए जाते हैं जो अनेकों प्रकार के संक्रमण से लड़ने की क्षमता रखते हैं।लहसुन में एलीसिन होता है जो दांत के पास के बैकटीरिया, जर्म्स, जीवाणु इत्यादि को नष्ट कर देता है।इसलिए एक फांक लहसुन को सेंधा नमक के साथ पीसकर यदि आप दांतों में दर्द की जगह पर लगायेंगे तो आपको दर्द में आराम मिलेगा।

*दाँत-दाढ़ दर्द में अदरक का टुकड़ा कुचलकर दर्द वाले दाँत में रखकर मुँह बंद कर लें और धीरे-धीरे रस चूसते रहें। फौरन राहत महसूस होगी।

*नीम के पत्तों की राख में कोयले का चूरा तथा कपूर मिलाकर रोज रात को सोने से पहले लगाकर पायरिया में लाभ होता है।

*सरसों के तेल में सेंधा नमक मिलाकर दाँतों पर लगाने से दाँतों से निकलती दुर्गन्ध एवं रक्त बंद होकर दाँत मजबूत होते हैं तथा पायरिया भी जड़ से ख़त्म हो जाता है।

*फिटकरी को तवे या लोहे की कड़ाही में पानी के साथ आग पर रखें। जब पानी जल जाए और फिटकरी फूल जाए तो तवे को आग पर से उतारकर फिटकरी को पीसकर बारीक चूर्ण बना लें। जितना फिटकरी का पावडर बने उसका 1/4 भाग पिसी हल्दी उसमें मिला कर लकड़ी की सींख की नोक से दाँत के दर्द वाले स्थान पर या सुराख के भीतर यह मिश्रण भर दें।यह बहुत ही लाभकारी प्रयोग है ।

*भोजन अथवा अन्य किसी भी पदार्थ को खाने के बाद अच्छी तरह से कुल्ला जरूर करें तथा गर्म वस्तु के तुरंत पश्चात् ठण्डी वस्तु का सेवन न करें।

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...