सोमवार, 6 जनवरी 2020
रुद्राक्ष का चमत्कार को ना बनाएं व्यापार
रूद्राक्ष का चमत्कारिक रहस्य:
रूद्राक्ष को मनुष्य जाति के लिए चमत्कार पूर्णं तथा वरदान स्वरूप बताया गया है। इसकी उत्पत्ती मानव मात्र के कल्याण के लिए भगवान शंकर ने अपने अश्रुओं से किया है। कहा जाता है कि रूद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति भगवान शिव को अत्यंत प्रिय होता है।
जो व्यक्ति किसी भी रूप में रूद्राक्ष धारण कर लेता है उसके सारे समस्याओं का निराकरण स्वतः ही होने लगता है, तथा वह समस्त प्रकार के संकटों से बचा रहता है। ऐसे व्यक्ति की कभी भी आकस्मीक दुर्घटना नहीं होती वह हर प्रकार के अला-बलाओं से मुक्त रहता है। रूद्राक्ष धारण करने वाले व्यक्ति के पापों का क्षय होता है चाहे वह गोहत्या अथवा ब्रह्म हत्या जैसा पाप ही क्यों न हो।
रूद्राक्ष की माला को तंत्र शास्त्रों में अत्यधिक महत्व पूर्णं एवं चमत्कारिक माना गया है।
इसे धारण करने वाले व्यक्ति को दीर्घायु जीवन की प्राप्ति होती है तथा उसकी अकाल मृत्यु कभी नही हो सकती। जो मनुष्य रूद्राक्ष धारण करता है उसे जीवन में धर्म, अर्थ, काम, तथा मोक्ष की प्राप्ति सहज ही हो जाती है, साथ ही साथ मनुष्य के अनेकों शारीरिक, मानसिक तथा आर्थिक समस्याओं का समाधान होने लगता है तथा मन में असिम शांति का अनुभव होने लगता है।
रूद्राक्ष धारण करने वाले व्यक्ति के उपर भुत-प्रेत, जादू-टोना, तथा किए-कराए का कोइ आर नही पड़ता। रूद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति रूद्र तुल्य हो जाता है उसके पाप, ताप, संताप पूर्णतः समाप्त हो जाते हैं। चाहे कोई संयासी हो अथवा गृहस्थ सभी के लिए रूद्राक्ष सामान रूप से उपयोगी माना गया है। जिस घर में नित्य रूद्राक्ष का पूजन किया जाए उस घर में हमेशा सुख शांति बनी रहती है तथा उसके घर में अचल लक्ष्मी का सदा वास होता है।
रूद्राक्ष के मुखों के अनुसार पुराणों मे इसका महत्व तथा उपयोगिता का उल्लेख मिलता है। मुख्यतः एक मुख से लेकर इक्किस मुखी तक रूद्राक्ष प्राप्त होता है तथा प्रत्येक रूद्राक्ष का अपना अलग-अलग महत्व तथा उपयोगिता होती है।
एकमुखी रूद्राक्ष
पुराणों मे एकमुखी रूद्राक्ष को साक्षात रूद्र का स्वरूप कहा गया है यह चैतन्य स्वरूप पारब्रह्म का प्रतिक है। एकमुखी रूद्राक्ष को अत्यंत दुर्लभ तथा अद्वितिय माना गया है क्योंकि सौभाग्य शाली मनुष्य को ही एक मुखी रूद्राक्ष प्राप्त होता है।
इसे धारण करने वाले व्यक्ति के जीवन में किसी प्रकार का अभाव नही रहता तथा जीवन में धन, यश, मान-सम्मान, की प्राप्ति होती रहती है तथा लक्ष्मी चिर स्थाई रूप से उसके घर में निवास करती है। एकमुखी रूद्राक्ष को धारण करने से सभी प्रकार के मानसिक एवं शारीरिक रोगों का नाश होने लगता है तथा उसकी समस्त मनोकामनाएं स्वतः पूर्णं होने लगती हैं।
परंतु ध्यान रखें गोलाकार एकमुखी रूद्राक्ष को ही सर्वश्रेष्ठ माना गया है यह अत्यंत दुर्लभ है। काजू दाने की आकार वाली एकमुखी रूद्राक्ष सरलता से प्रप्त होती है परंतु यह कम प्रभावी होता है।
दोमुखी रूद्राक्ष
शास्त्रों में दोमुखी रूद्राक्ष को अर्धनारिश्वर का प्रतिक माना गया है। यह शिव भक्तों के लिए उचित एवं उपयोगी माना गया है। इसे धारण करने से मन में शांति तथा चिŸा में एकाग्रता आने से आध्यात्मीक उन्नती तथा सौभाग्य में वृद्धि होती है।है।
तीनमुखी रूद्राक्ष
तीनमुखी रूद्राक्ष को साक्षात अग्नि स्वरूप माना गया है। इस रूद्राक्ष में त्रिगुणात्मक शक्तियाँ समाहित होती हैं। इसे धारण करने वाला व्यक्ति अग्नि के समान तेजस्वी हो जाता है उसके सभी मनोरथ शीघ्र पुरे हो जाते हैं। तथा घर में धन-धान्य, यश, सौभाग्य की वृद्धि होने लगती है। तीनमुखी रूद्राक्ष धारण करने से परीक्षा, इन्टरव्यु, नौकरी तथा रोजगार के क्षेत्र में पूर्ण रूप से सफलता प्राप्त होती है।
चारमुखी रूद्राक्षचारमुखी रूद्राक्ष को ब्रह्म स्वरूप माना जाता है। यह शिक्षा के क्षेत्र में पूर्णं रूप से सफलता दिलाने में समर्थ है। इसे धारण करने वाले व्यक्ति कि वाक शक्ति प्रखर तथा स्मरण शक्ति तीव्र हो जाती है और शिक्षा के क्षेत्र में व्यक्ति अग्रणी हो जाता है।
पाँचमुखी रूद्राक्ष
पाँचमुखी रूद्राक्ष को साक्षात रूद्र स्वरूप है। यह रूद्रावतारी हनुमान का प्रतिनिधित्व करता है। इसे कालाग्नी नाम से भी जाना जाता है, यह प्रयाप्त मात्रा में उपलब्ध होता है। माला के लिए इसी रूद्राक्ष का उपयोग किया जाता है। पंचमुखी रूद्राक्ष को किसी भी साधना में सिद्धि एवं पूर्णं सफलता दायक माना गया है। इसे धारण करने से सांप, बिच्छु, भुत-प्रेत जादू-टोने से रक्षा होती है तथा मानसिक शांति और प्रफुल्लता प्रदान करते हुए मनुष्य के समस्त प्रकार के पापों तथा रोगों को नष्ट करने में समर्थ है।
छःमुखी रूद्राक्ष
इसे भगवान कार्तिकेय का स्वरूप माना गया है। छःमुखी रूद्राक्ष को धारण करने से मनुष्य की खोई हुई शक्तियाँ पुनः जागृत होने लगती हैं। स्मरण शक्ति प्रबल तथा बुद्धि तीब्र होती है। छःमुखी रूद्राक्ष धारण करने से ब्रह्महत्या से भी बड़ा पाप नष्ट हो जाता है। तथा धर्म, यश तथा पुण्य प्राप्त होता है। इसे धारण करने से हृदय रोग, चर्मरोग, नेत्ररोग, हिस्टिरीया तथा प्रदर रोग जैसे विकार नष्ट हो जाते हैं।
सातमुखी रूद्राक्ष
सातमुखी रूद्राक्ष सप्तऋषियों के स्वरूप है। इसे धारण करने से धन, संपति, कीर्ति और विजय की प्राप्ति होती है तथा कार्य व्यापार में निरंतर बढ़ोŸारी होती है। सप्तमुखी रूद्राक्ष को दुर्घटना तथा अकाल मृत्यु को हरण करने वाला तथा पूर्णं संसारिक सुख प्रदान करने वाला बताया गया है।
अष्टमुखी रूद्राक्ष
इसे अष्टभुजी देवी माँ दुर्गा का स्वरूप माना गया है। इसे धारण करने से दिव्य ज्ञान की प्राप्ति, चित्त में एकाग्रता तथा केश मुकदमों में सफलता प्राप्त होती है। अष्टमुखी रूद्राक्ष को धारणा करने से आँखों मे अजीब सा सम्मोहन शक्ति आ जाती है जिससे सामने वाले व्यक्ति को प्रभावित किया जा सकता है। इसके माध्यम से कुण्डलिनी शक्ति को भी जागृत किया जा सकता है।
नौमुखी रूद्राक्ष
नौमुखी रूद्राक्ष नवदुर्गा, नवग्रह, तथा नवनाथों का प्रतिक माना जाता है। इसे धारण करने से समस्त प्रकार की साधनाओं मंे सफलता प्राप्त होती है। यह अकाल मृत्यु निवारक, शत्रुओं को परास्त करने, मुकदमों में सफलता प्रदान करने तथा धन, यश तथा कीर्ति प्रदान करने में समर्थ है।
दसमुखी रूद्राक्ष
दसमुखी रूद्राक्ष को दसो दिशाओं का सुचक तथा दिग्पाल का प्रतिक है। इसे धारण करने से सभी प्रकार के लौकिक तथा पारलौकिक कामनाओं की पूति होती है। समस्त प्रकार के विघ्न बाधाओं तथा तांत्रिक बाधाओं से रक्षा करते हुए सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
ग्यारहमुखी रूद्राक्षग्यारहमुखी रूद्राक्ष को हनुमान स्वरूप माना गया है। इसे धारण करने पर किसी भी चीज का अभाव नही रहता तथा सभी प्रकार के संकट और कष्ट दुर हो जाते हैं। इसे धारण करने से संक्रामक रोगों का नाश होता है। यदि बंध्या स्त्री को भी इसे धारण कराया जाए तो निश्चय ही उसकी संताने पैदा हो जाती है।
बारहमुखी रूद्राक्ष
बारह मुखी रूद्राक्ष को आदित्य स्वरूप माना गया है। इसे धारण करने वाला व्यक्ति तेजस्वी तथा शक्तिशाली बनता है तथा उसके चेहरे पर हमेशा ओज और तेज झलकता रहता है साथ ही सभी प्रकार के शारीरिक तथा मानसिक व्याधियों से मुक्ति मिल जाती है। इसे धरण करने से आँखों की रोशनी बढ़ जाती है तथा आँखों में सम्मोहन शक्ति बढ़ती है।
तेरहमुखी रूद्राक्ष
इसे इन्द्र स्वरूप माना गया है। इसे धारण करने से समस्त प्रकार के सिद्धियों मे सफलता प्राप्त होती है। शारीरिक सौन्दर्य मे वृद्धि तथा जीवन में यश, मान सम्मान, पद प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है।
चैदहमुखी रूद्राक्ष
इसे साक्षात त्रिपुरारी स्वरूप माना गया है। इसे धारण करने से स्वास्थ्य लाभ शारीरिक, मानसिक तथा व्यापारिक उन्नती मे सहायक होता है। यह स्मस्त प्रकार के आध्यात्मीक तथा भौतिक सुखों को प्रदान करने में समर्थ है।
गौरीशंकर रूद्राक्ष
इसे शिव तथा शक्ति का मिश्रीत स्वरूप माना गया है। यह प्राकृतिक रूप से वृक्ष पर ही जुड़ा हुआ उत्पन्न होता है। इसे धारण करने पर शिव तथा शक्ति की संयुक्त कृपा प्राप्त होती है, यह आर्थिक दृष्टि से पूर्णं सफलता दायक होता है। पारिवारिक सामंजस्य आकर्षण तथा मंगल कामनाओं की सिद्धि में सहायक होने के साथ-साथ लड़का-लड़की के विवाह में आ रही बाधाओं को समाप्त कर वर अथवा बधू की प्राप्ति मे भी सहायक है।
गुरुवार, 19 दिसंबर 2019
फिटकरी का औषधीय उपयोग के 10 तरीके
फिटकरी को अंग्रेजी में एलम कहते है। ये असल में पोटेशियम एल्युमिनीयम सल्फेट है। इसमें कई प्रकार के औषधीय गुण होते है। आयुर्वेद में इसे कई रोगों में उपयोग किया जाता है। यह रक्तशोधक और रक्तस्तम्भक है। ये एंटीसेप्टिक और एंटी बैक्टीरियल की तरह भी काम करती है। फिटकरी लाल व सफेद दो प्रकार की होती है। दोनों के गुण लगभग समान ही होते हैं। सफेद फिटकरी का ही अधिकतर प्रयोग किया जाता है। यह संकोचक अर्थात सिकुड़न पैदा करने वाली होती है। शरीर की त्वचा, नाक, आंखे, मूत्रांग और मलद्वार पर इसका स्थानिक (बाहृय) प्रयोग किया जाता है। रक्तस्राव (खून बहना), दस्त, कुकरखांसी तथा दमा में इसके आंतरिक सेवन से लाभ मिलता है।
आगे जानिए फिटकरी के बेहतरीन उपयोग :-
– यदि पसीना ज्यादा आता हो तो नहाने के पानी में फिटकरी घोलकर नहाएँ। पसीना आना कम हो जाएगा।
– चेहरे की झुर्रियाँ मिटाने के लिए फिटकरी के टुकड़े को पानी में डुबोकर चेहरे पर हल्के हाथ से मलें। सूखने पर सादा पानी से धो लें। कुछ ही दिनों में झुर्रियां मिट जाएंगी।
-मसूड़ों से खून आता हो तो फिटकरी को पानी में घोल कर के कुल्ला करने से ठीक होता है।
– जहरीला कीड़ा या बिच्छू काट ले तो पानी में फिटकरी का पाउडर डालकर गाढ़ा घोल बनाकर लगाने से आराम मिलता है।
– दांत में दर्द हो तो फिटकरी और काली मिर्च बराबर मात्रा में पीस कर इसे दर्द वाले दांत के मसूढ़े पर लगाएं। इससे दर्द कम हो जाता है।
– शरीर पर लगी छोटी चोट से खून बह रहा हो तो फिटकरि का पाउडर चोट पर छिड़कने से ब्लीडिंग बन्द हो जाता है।
– फिटकरी मिले पानी से कुछ दिन सिर धोने से जुएँ खत्म हो जाते हैं।
– बवासीर में फिटकरी का पाउडर मक्खन में मिलाकर मस्सों पर लगाने से बहुत लाभ होता है।
– नाक से खून आने पर फिटकरी के घोल में रुई डुबोकर नाक में लगाने से खून बंद हो जाती है – घाव के लिए फिटकरी को भूनकर पीसकर घी में मिलाकर घाव पर लगाने से घाव भर जाता है।
– दाढ़ी बनाने, बाल काटने के बाद फिटकरी रगडे़ या पानी में गीला कर दाढ़ी पर लगायें। इससे दाढ़ी की त्वचा सुन्दर और स्वस्थ होती है।
– जहां पर चींटिया व दीमक हो वहां पर सरसों का तेल लगाकर फिटकरी को डालने से चींटियां व दीमक वहां नहीं आती है।
विभिन्न रोगों में उपचार (Treatment of various diseases) जननांगों की खुजली: फिटकरी को गर्म पानी में मिलाकर जननांगों को धोने से जननांगों की खुजली में लाभ होता है।
टांसिल का बढ़ना: टांसिल के बढ़ने पर गर्म पानी में चुटकी भर फिटकरी और इतनी ही मात्रा में नमक डालकर गरारे करें। गर्म पानी में नमक या फिटकरी मिलाकर उस पानी को मुंह के अन्दर डालकर और सिर ऊंचा करके गरारे करने से गले की कुटकुटाहट, टान्सिल (गले में गांठ), कौआ बढ़ना, आदि रोगों में लाभ होता है। 5 ग्राम फिटकरी और 5 ग्राम नीलेथोथे को अच्छी तरह से पकाकर इसके अन्दर 25 ग्राम ग्लिसरीन मिलाकर रख लें। फिर साफ रूई और फुहेरी बनाकर इसे गले के अन्दर लगाने और लार टपकाने से टांसिलों की सूजन समाप्त हो जाती है।
घावों में रक्तस्राव (घाव से खून बहना): घाव ताजा हो, चोट, खरोंच लगकर घाव हो गया हो, उससे रक्तस्राव हो। ऐसे घाव को फिटकरी के पानी से धोएं तथा घाव पर फिटकरी को पीसकर इसका पावडर छिड़कने, लगाने व बुरकने से रक्तस्राव (खून का बहना) बंद हो जाता है। शरीर में कहीं से भी खून बह रहा हो तो एक ग्राम फिटकरी पीसकर 125 ग्राम दही और 250 मिलीलीटर पानी मिलाकर लस्सी बनाकर सेवन करना बहुत ही लाभकारी होता है।
घाव: फिटकरी को तवे पर डालकर गर्म करके राख बना लें। इसे पीसकर घावों पर बुरकाएं इससे घाव ठीक हो जाएंगे। घावों को फिटकरी के घोल से धोएं व साफ करें। 2 ग्राम भुनी हुई फिटकरी, 2 ग्राम सिन्दूर और 4 ग्राम मुर्दासंग लेकर चूर्ण बना लें। 120 मिलीग्राम मोम और 30 ग्राम घी को मिलाकर धीमी आग पर पका लें। फिर नीचे उतारकर उसमें अन्य वस्तुओं का पिसा हुआ चूर्ण अच्छी तरह से मिला लें। इस तैयार मलहम को घाव पर लगाने से सभी प्रकार के घाव ठीक हो जाते हैं। 5 ग्राम फूली फिटकिरी का चूर्ण बनाकर देशी घी में मिला दें, फिर उसे घाव पर लगायें। इससे घाव ठीक हो जाता है।
किसी भी अंग से खून बहना: एक ग्राम फिटकरी पीसकर 125 ग्राम दही और 250 मिलीलीटर पानी मिलाकर लस्सी बनाकर पीने से कहीं से भी रक्तस्राव हो, बंद हो जाता है।
नकसीर (नाक से खून बहना): गाय के कच्चे दूध में फिटकरी घोलकर सूंघने से नकसीर (नाक से खून आना) ठीक हो जाती है। यदि नकसीर बंद न हो तो फिटकरी को पानी में घोलकर उसमें कपड़ा भिगोकर मस्तक पर रखते हैं। 5-10 मिनट में रक्तबंद हो जाएगा। चौथाई चाय की चम्मच फिटकरी पानी में घोलकर प्रतिदिन तीन बार पीना चाहिए। अगर नाक से लगातार खून बह रहा हो तो 30 ग्राम फिटकरी को 100 मिलीलीटर पानी में मिलाकर उस पानी में कोई कपड़ा भिगोकर माथे और नाक पर रखने से नाक से खून बहना रुक जाता है। गाय के कच्चे दूध के अन्दर फिटकरी को मिलाकर सूंघने से नाक से खून बहना बंद हो जाता है।
मुंह का लिबलिबापन: काला नमक और फिटकरी समान मात्रा में मिलाकर पीसकर इसके पाउडर से मंजन करने से दांतों और मुंह का लिबलिबापन दूर हो जाता है।
आंखों में दर्द: एक ग्राम फिटकरी, 40 ग्राम गुलाब जल में भिगोकर शीशी में भर लें। इसकी दो-दो बूंद आंखों में प्रतिदिन डालें। इससे आंखों का दर्द, कीचड़ तथा लाली आदि दूर जाएगी। रात को सोते समय आंखों में डालने से तरावट रहती है। इसे रोजाना डाल सकते हैं।
उंगुलियों की सूजन: पानी में ज्यादा काम करने से जाड़ों में उंगुलियों में सूजन या खाज हो जाए तो पानी में फिटकरी उबालकर इससे उंगुलियों को धोने से लाभ होता है। पायरिया, मसूढ़ों में दर्द, सूजन, रक्त आना: एक भाग नमक, दो भाग फिटकरी बारीक पीसकर मसूढ़ों पर प्रतिदिन तीन बार लगायें। फिर एक गिलास गर्म पानी में पांच ग्राम फिटकरी डालकर हिलाकर कुल्ले करें। इससे मसूढ़े व दांत मजबूत होंगे। इससे रक्त आना और मवाद का आना बंद हो जाएगा।
दांतों का दर्द: भुनी फिटकरी, सरसों का तेल, सेंधानमक, नौसादर, सांभर नमक 10-10 ग्राम तथा तूतिया 6 ग्राम को मिलाकर बारीक पीसकर कपड़े से छान लें। इससे दांतों को मलने से दांतों का दर्द, हिलना, टीस मारना, मसूढ़ों का फूलना, मसूढ़ों से पीव का निकलना तथा पायरिया रोग ठीक होता है। फिटकरी को बारीक पीसकर पॉउडर बना लें। इससे प्रतिदिन मंजन करने से दांतों का दर्द जल्द ठीक होता है। फिटकरी को गर्म पानी में घोलकर लगातार कुल्ला करने से दांत में हो रहे तेज दर्द से जल्द आराम मिलता है।
मलेरिया बुखार: एक ग्राम फिटकरी, दो ग्राम चीनी में मिलाकर मलेरिया बुखार आने से पहले दो-दो घंटे से दो बार दें। मलेरिया नहीं आएगा और आएगा तो भी कम। फिर जब दूसरी बार भी मलेरिया आने वाला हो तब इसी प्रकार से दे देते हैं। इस प्रयोग के दौरान रोगी को कब्ज नहीं होनी चाहिए। यदि कब्ज हो तो पहले कब्ज को दूर करें। लगभग 1 ग्राम फिटकरी को फूले बताशे में डालकर उसे बुखार आने से 2 घंटे पहले रोगी को खिलाने से बुखार कम चढ़ता है।
आंतरिक चोट: चार ग्राम फिटकरी को पीसकर आधा किलो गाय के दूध में मिलाकर पिलाने से लाभ प्राप्त होता है।
सूजाक: सूजाक में पेशाब करते समय जलन होती है। इसमें पेशाब बूंद-बूंद करके बहुत कष्ट से आता है। इतना अधिक कष्ट होता है कि रोगी मरना पसन्द करता है। इसमें 6 ग्राम पिसी हुई फिटकरी एक गिलास पानी में घोलकर पिलाएं। कुछ दिन पिलाने से सूजाक ठीक हो जाता है।
हाथ-पैरों में पसीना आना: यदि पसीना आए तो फिटकरी को पानी में घोलकर इससे हाथ-पैरों को धोएं। इससे पसीना आना बंद हो जाता है।
सूखी खांसी: लगभग 10 ग्राम भुनी हुई हुई फिटकरी तथा 100 ग्राम चीनी को बारीक पीसकर आपस में मिला लें और बराबर मात्रा में चौदह पुड़िया बना लेते हैं।
सूखी खांसी में एक पुड़िया रोजाना 125 मिलीलीटर गर्म दूध के साथ सोते समय लेना चाहिए। इससे सूखी में बहुत लाभ मिलता है। गीली खांसी: 010 ग्राम भुनी हुई फिटकरी और 100 ग्राम चीनी को बारीक पीसकर आपस में मिला लें और बराबर मात्रा में 14 पुड़िया बना लें। सूखी खांसी में 125 ग्राम गर्म दूध के साथ एक पुड़िया प्रतिदिन सोते समय लेना चाहिए तथा गीली खांसी में 125 मिलीलीटर गर्म पानी के साथ एक पुड़िया रोजाना लेने से गीली खांसी लाभ होता है।
गर्भ-पात: पिसी हुई फिटकरी चौथाई चम्मच एक कप कच्चे दूध में डालकर लस्सी बनाकर पिलाने से गर्भपात रुक जाता है। गर्भपात के समय दर्द, रक्तस्राव हो रहा हो तो हर दो-दो घंटे से एक-एक खुराक दें।
बांझ-पन: मासिक-धर्म ठीक होने पर भी यदि सन्तान न होती हो तो रूई के फाये में फिटकरी लपेटकर पानी में भिगोकर रात को सोते समय योनि में रखें। सुबह निकालने पर रूई में दूध की खुर्चन सी जमा होगी। फोया तब तक रखें, जब तक खुर्चन आती रहे। जब खुर्चन आना बंद हो जाए तो समझना चाहिए कि बांझपन रोग समाप्त हो गया है।
कान में चींटी चली जाने पर: कान में चींटी चली जाने पर कान में सुरसरी हो तो फिटकरी को पानी में घोलकर पीने से लाभ मिलता है।
बिच्छू के काटने पर: बिच्छू के काटने पर फिटकरी को पानी में पीसकर लेप करने से बिच्छू का विष उतर जाता है।
आगे जानिए फिटकरी के बेहतरीन उपयोग :-
– यदि पसीना ज्यादा आता हो तो नहाने के पानी में फिटकरी घोलकर नहाएँ। पसीना आना कम हो जाएगा।
– चेहरे की झुर्रियाँ मिटाने के लिए फिटकरी के टुकड़े को पानी में डुबोकर चेहरे पर हल्के हाथ से मलें। सूखने पर सादा पानी से धो लें। कुछ ही दिनों में झुर्रियां मिट जाएंगी।
-मसूड़ों से खून आता हो तो फिटकरी को पानी में घोल कर के कुल्ला करने से ठीक होता है।
– जहरीला कीड़ा या बिच्छू काट ले तो पानी में फिटकरी का पाउडर डालकर गाढ़ा घोल बनाकर लगाने से आराम मिलता है।
– दांत में दर्द हो तो फिटकरी और काली मिर्च बराबर मात्रा में पीस कर इसे दर्द वाले दांत के मसूढ़े पर लगाएं। इससे दर्द कम हो जाता है।
– शरीर पर लगी छोटी चोट से खून बह रहा हो तो फिटकरि का पाउडर चोट पर छिड़कने से ब्लीडिंग बन्द हो जाता है।
– फिटकरी मिले पानी से कुछ दिन सिर धोने से जुएँ खत्म हो जाते हैं।
– बवासीर में फिटकरी का पाउडर मक्खन में मिलाकर मस्सों पर लगाने से बहुत लाभ होता है।
– नाक से खून आने पर फिटकरी के घोल में रुई डुबोकर नाक में लगाने से खून बंद हो जाती है – घाव के लिए फिटकरी को भूनकर पीसकर घी में मिलाकर घाव पर लगाने से घाव भर जाता है।
– दाढ़ी बनाने, बाल काटने के बाद फिटकरी रगडे़ या पानी में गीला कर दाढ़ी पर लगायें। इससे दाढ़ी की त्वचा सुन्दर और स्वस्थ होती है।
– जहां पर चींटिया व दीमक हो वहां पर सरसों का तेल लगाकर फिटकरी को डालने से चींटियां व दीमक वहां नहीं आती है।
विभिन्न रोगों में उपचार (Treatment of various diseases) जननांगों की खुजली: फिटकरी को गर्म पानी में मिलाकर जननांगों को धोने से जननांगों की खुजली में लाभ होता है।
टांसिल का बढ़ना: टांसिल के बढ़ने पर गर्म पानी में चुटकी भर फिटकरी और इतनी ही मात्रा में नमक डालकर गरारे करें। गर्म पानी में नमक या फिटकरी मिलाकर उस पानी को मुंह के अन्दर डालकर और सिर ऊंचा करके गरारे करने से गले की कुटकुटाहट, टान्सिल (गले में गांठ), कौआ बढ़ना, आदि रोगों में लाभ होता है। 5 ग्राम फिटकरी और 5 ग्राम नीलेथोथे को अच्छी तरह से पकाकर इसके अन्दर 25 ग्राम ग्लिसरीन मिलाकर रख लें। फिर साफ रूई और फुहेरी बनाकर इसे गले के अन्दर लगाने और लार टपकाने से टांसिलों की सूजन समाप्त हो जाती है।
घावों में रक्तस्राव (घाव से खून बहना): घाव ताजा हो, चोट, खरोंच लगकर घाव हो गया हो, उससे रक्तस्राव हो। ऐसे घाव को फिटकरी के पानी से धोएं तथा घाव पर फिटकरी को पीसकर इसका पावडर छिड़कने, लगाने व बुरकने से रक्तस्राव (खून का बहना) बंद हो जाता है। शरीर में कहीं से भी खून बह रहा हो तो एक ग्राम फिटकरी पीसकर 125 ग्राम दही और 250 मिलीलीटर पानी मिलाकर लस्सी बनाकर सेवन करना बहुत ही लाभकारी होता है।
घाव: फिटकरी को तवे पर डालकर गर्म करके राख बना लें। इसे पीसकर घावों पर बुरकाएं इससे घाव ठीक हो जाएंगे। घावों को फिटकरी के घोल से धोएं व साफ करें। 2 ग्राम भुनी हुई फिटकरी, 2 ग्राम सिन्दूर और 4 ग्राम मुर्दासंग लेकर चूर्ण बना लें। 120 मिलीग्राम मोम और 30 ग्राम घी को मिलाकर धीमी आग पर पका लें। फिर नीचे उतारकर उसमें अन्य वस्तुओं का पिसा हुआ चूर्ण अच्छी तरह से मिला लें। इस तैयार मलहम को घाव पर लगाने से सभी प्रकार के घाव ठीक हो जाते हैं। 5 ग्राम फूली फिटकिरी का चूर्ण बनाकर देशी घी में मिला दें, फिर उसे घाव पर लगायें। इससे घाव ठीक हो जाता है।
किसी भी अंग से खून बहना: एक ग्राम फिटकरी पीसकर 125 ग्राम दही और 250 मिलीलीटर पानी मिलाकर लस्सी बनाकर पीने से कहीं से भी रक्तस्राव हो, बंद हो जाता है।
नकसीर (नाक से खून बहना): गाय के कच्चे दूध में फिटकरी घोलकर सूंघने से नकसीर (नाक से खून आना) ठीक हो जाती है। यदि नकसीर बंद न हो तो फिटकरी को पानी में घोलकर उसमें कपड़ा भिगोकर मस्तक पर रखते हैं। 5-10 मिनट में रक्तबंद हो जाएगा। चौथाई चाय की चम्मच फिटकरी पानी में घोलकर प्रतिदिन तीन बार पीना चाहिए। अगर नाक से लगातार खून बह रहा हो तो 30 ग्राम फिटकरी को 100 मिलीलीटर पानी में मिलाकर उस पानी में कोई कपड़ा भिगोकर माथे और नाक पर रखने से नाक से खून बहना रुक जाता है। गाय के कच्चे दूध के अन्दर फिटकरी को मिलाकर सूंघने से नाक से खून बहना बंद हो जाता है।
मुंह का लिबलिबापन: काला नमक और फिटकरी समान मात्रा में मिलाकर पीसकर इसके पाउडर से मंजन करने से दांतों और मुंह का लिबलिबापन दूर हो जाता है।
आंखों में दर्द: एक ग्राम फिटकरी, 40 ग्राम गुलाब जल में भिगोकर शीशी में भर लें। इसकी दो-दो बूंद आंखों में प्रतिदिन डालें। इससे आंखों का दर्द, कीचड़ तथा लाली आदि दूर जाएगी। रात को सोते समय आंखों में डालने से तरावट रहती है। इसे रोजाना डाल सकते हैं।
उंगुलियों की सूजन: पानी में ज्यादा काम करने से जाड़ों में उंगुलियों में सूजन या खाज हो जाए तो पानी में फिटकरी उबालकर इससे उंगुलियों को धोने से लाभ होता है। पायरिया, मसूढ़ों में दर्द, सूजन, रक्त आना: एक भाग नमक, दो भाग फिटकरी बारीक पीसकर मसूढ़ों पर प्रतिदिन तीन बार लगायें। फिर एक गिलास गर्म पानी में पांच ग्राम फिटकरी डालकर हिलाकर कुल्ले करें। इससे मसूढ़े व दांत मजबूत होंगे। इससे रक्त आना और मवाद का आना बंद हो जाएगा।
दांतों का दर्द: भुनी फिटकरी, सरसों का तेल, सेंधानमक, नौसादर, सांभर नमक 10-10 ग्राम तथा तूतिया 6 ग्राम को मिलाकर बारीक पीसकर कपड़े से छान लें। इससे दांतों को मलने से दांतों का दर्द, हिलना, टीस मारना, मसूढ़ों का फूलना, मसूढ़ों से पीव का निकलना तथा पायरिया रोग ठीक होता है। फिटकरी को बारीक पीसकर पॉउडर बना लें। इससे प्रतिदिन मंजन करने से दांतों का दर्द जल्द ठीक होता है। फिटकरी को गर्म पानी में घोलकर लगातार कुल्ला करने से दांत में हो रहे तेज दर्द से जल्द आराम मिलता है।
मलेरिया बुखार: एक ग्राम फिटकरी, दो ग्राम चीनी में मिलाकर मलेरिया बुखार आने से पहले दो-दो घंटे से दो बार दें। मलेरिया नहीं आएगा और आएगा तो भी कम। फिर जब दूसरी बार भी मलेरिया आने वाला हो तब इसी प्रकार से दे देते हैं। इस प्रयोग के दौरान रोगी को कब्ज नहीं होनी चाहिए। यदि कब्ज हो तो पहले कब्ज को दूर करें। लगभग 1 ग्राम फिटकरी को फूले बताशे में डालकर उसे बुखार आने से 2 घंटे पहले रोगी को खिलाने से बुखार कम चढ़ता है।
आंतरिक चोट: चार ग्राम फिटकरी को पीसकर आधा किलो गाय के दूध में मिलाकर पिलाने से लाभ प्राप्त होता है।
सूजाक: सूजाक में पेशाब करते समय जलन होती है। इसमें पेशाब बूंद-बूंद करके बहुत कष्ट से आता है। इतना अधिक कष्ट होता है कि रोगी मरना पसन्द करता है। इसमें 6 ग्राम पिसी हुई फिटकरी एक गिलास पानी में घोलकर पिलाएं। कुछ दिन पिलाने से सूजाक ठीक हो जाता है।
हाथ-पैरों में पसीना आना: यदि पसीना आए तो फिटकरी को पानी में घोलकर इससे हाथ-पैरों को धोएं। इससे पसीना आना बंद हो जाता है।
सूखी खांसी: लगभग 10 ग्राम भुनी हुई हुई फिटकरी तथा 100 ग्राम चीनी को बारीक पीसकर आपस में मिला लें और बराबर मात्रा में चौदह पुड़िया बना लेते हैं।
सूखी खांसी में एक पुड़िया रोजाना 125 मिलीलीटर गर्म दूध के साथ सोते समय लेना चाहिए। इससे सूखी में बहुत लाभ मिलता है। गीली खांसी: 010 ग्राम भुनी हुई फिटकरी और 100 ग्राम चीनी को बारीक पीसकर आपस में मिला लें और बराबर मात्रा में 14 पुड़िया बना लें। सूखी खांसी में 125 ग्राम गर्म दूध के साथ एक पुड़िया प्रतिदिन सोते समय लेना चाहिए तथा गीली खांसी में 125 मिलीलीटर गर्म पानी के साथ एक पुड़िया रोजाना लेने से गीली खांसी लाभ होता है।
गर्भ-पात: पिसी हुई फिटकरी चौथाई चम्मच एक कप कच्चे दूध में डालकर लस्सी बनाकर पिलाने से गर्भपात रुक जाता है। गर्भपात के समय दर्द, रक्तस्राव हो रहा हो तो हर दो-दो घंटे से एक-एक खुराक दें।
बांझ-पन: मासिक-धर्म ठीक होने पर भी यदि सन्तान न होती हो तो रूई के फाये में फिटकरी लपेटकर पानी में भिगोकर रात को सोते समय योनि में रखें। सुबह निकालने पर रूई में दूध की खुर्चन सी जमा होगी। फोया तब तक रखें, जब तक खुर्चन आती रहे। जब खुर्चन आना बंद हो जाए तो समझना चाहिए कि बांझपन रोग समाप्त हो गया है।
कान में चींटी चली जाने पर: कान में चींटी चली जाने पर कान में सुरसरी हो तो फिटकरी को पानी में घोलकर पीने से लाभ मिलता है।
बिच्छू के काटने पर: बिच्छू के काटने पर फिटकरी को पानी में पीसकर लेप करने से बिच्छू का विष उतर जाता है।
बुधवार, 11 दिसंबर 2019
क्या आप दवा खाते-खाते परेशान हो चुके हैं तो एनिमा उपयोगी हो सकता है बिना दवा जीवन जिनें में
क्या आप दवाइयों का सेवन करते करते थक गए हैं और स्वास्थ्य में कोई परिवर्तन नहीं हो रहा है तो यह यह विधि आपके लिए सर्वोत्तम हो सकती है क्योंकि जब तक आपका देह रूपी पात्र आपका साफ नहीं होगा चाहे उसमें कितने ही पोस्टिक और महंगे महंगे फल फ्रूट ड्राई फ्रूट अखरोट बादाम ही क्यों ना आप सेवन करें पर सब कचड़ा मैं डालेंगे तो कचरा ही बनेगा और कोई परिणाम नहीं आएगा आइए जानते हैं इस कचरे को साफ करने का तरीका
पेट के आंतरिक भागों की सफाई – एनीमा
जो लोग अभी तक सफाई का अर्थ नहाना, धोना आदि बाहरी सफाई ही समझते हैं वे बड़े भ्रम में हैं। शरीर के ऊपर का मैल तो हमको दिखाई ही पड़ता है और इसलिए हमारा ध्यान बार−बार उसकी ओर जाता रहता है और हम उसे साफ कर ही डालते हैं। पर भीतरी गन्दगी आँखों से दिखाई नहीं देती उसे केवल अनुभव से या लक्षणों से जाना जाता है। इसलिए अनेक लोगों का ध्यान उस तरफ नहीं जाता। पर कुछ भी हो वह गन्दगी अधिक हानि पहुँचाने वाली होती है और धीरे−धीरे हमारे समस्त शरीर को मल से भर देती है। यही मल सब प्रकार के रोगों तथा अस्वस्थता का कारण होता है और जो लोग बीमारी और कमजोरी को दूर करना चाहते हैं उनका सबसे पहला कर्तव्य इस मल की सफाई कर डालना ही है। शरीर की इस अवस्था की तुलना हम उस नाली के साथ कर सकते हैं जो कीचड़ रुक जाने से सड़ रही हो और दुर्गन्ध फैला रही हो। बहुत से लोग ऐसी नाली में फिनाइल आदि डालकर उसकी बदबू को रोकने की कोशिश करते हैं पर यह उपाय टिकाऊ नहीं होता। दूसरे ही दिन फिर पहले से अधिक बदबू आने लगती है। तब अन्त में यही करना पड़ता है कि एक बार नाली में जमें हुए कीचड़ को पूरी तरह निकाल दिया जाय और फिर उसे साफ पानी से धो डाला जाये । ठीक इसी प्रकार छोटी और बड़ी आँतों में इकट्ठा होकर हमारे जो मल शरीर को अस्वस्थ बनाता है जब तक एक बार उसकी पूरी सफाई नहीं की जायेगी तब तक रोग की जड़ कटना सम्भव नहीं है। जुलाब की हानियाँ अनेक व्यक्ति इस मल को निकालने के लिये जुलाब या दस्तावर दवाओं का सहारा लेते हैं। पर सड़ा हुआ मल, गाँठें, सुद्दे, कृमि, विकृत वायु आदि जो तरह−तरह के विकार बड़ी आँत में जमा रहते हैं वे इन दस्तों की औषधियों से बहुत कम निकल पाते हैं। दस्तावर औषधियाँ जब पेट में पहुँचती हैं तो तीक्ष्णता के कारण आमाशय में पाचन रसों का स्राव होने लगता है। इस रस के साथ आधा पचा हुआ भोजन बह कर नीचे की तरफ चला जाता है। औषधि की बहुत शक्ति तो इस आमाशय में ही खर्च हो जाती है, जो थोड़ी बहुत बचती है उसके द्वारा छोटी आँतों से रस निचुड़ता है। इस प्रकार कच्चा मल पतला होकर दस्त के रूप में निकल जाता है। दस्तावर दवा का असर छोटी आँतों में खत्म हो जाता है और बड़ी आँत में उपस्थित विकार ज्यों के त्यों बने रहते हैं। पुराने दोष जो बड़ी आँतों में थे वे जैसे के तैसे रहे केवल आमाशय और छोटी आँतों का कच्चा मल निकल गया। ऐसे दस्तों से सफाई का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं होता। इसके अतिरिक्त दवा की गर्मी, जलन तथा आमाशय के कीमती रस के दस्त के साथ बहने से पेट में कमजोरी आ जाती है ये दोनों ही बातें स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकर हैं, और इसलिए इस जुलाब की प्रणाली में लाभ की अपेक्षा हानि अधिक है। दस्तावर दवाएँ प्रायः अत्यन्त उष्ण और विषाक्त भी होती हैं, वे यदि दस्त लाने के बजाय शरीर में पच जायँ तो खून खराबी, कोढ़ भयंकर व्रण आदि उत्पन्न कर देती हैं। यही कारण है कि कभी−कभी जुलाब के बाद बहुत दिन तक बड़ी गर्मी और बेचैनी का अनुभव होता रहता है, और कई छोटे−बड़े रोग उत्पन्न हो जाते हैं। एनीमा कैसे लिया जाय इस दृष्टि से मलाशय को साफ करने के लिये एनीमा का प्रयोग सबसे अच्छा है। एनीमा का साधारण सा यंत्र हर नगर के बाजार में मिल सकता है। चीनी के लम्बे से डिब्बे में 4-5 फीट लम्बी रबड़ की नली लगी रहती है जिसके दूसरे सिरे पर प्लास्टिक की एक टोंटी फिट कर दी जाती है। डिब्बे में सेर−डेढ़ सेर मामूली ठंडा या जरा गुन−गुना पानी जिसका तापक्रम शरीर के समान हो, भर दिया जाता है। जब टोंटी को खोला जाता है तो पानी नल की तरह बाहर निकलने लगता है। पानी सादा होना ही ठीक है। अगर मिल सके तो उसमें एक नींबू का रस मिला दिया जाय जिससे उसका असर कुछ बढ़ जाता है। विशेष अवस्थाओं में थोड़ा नमक या नीम का पानी या प्याज का रस आदि भी निकाला जाता है। एनीमा लेते समय जमीन पर चटाई बिछाकर दाँयी करवट लेट जाना चाहिये। एनीमा के बर्तन को बगल में लगभग तीन फीट की ऊँचाई पर टाँग देना चाहिये। टोंटी के सिरे पर जरा सा−तेल मलकर गुदा−मार्ग में एक इंच प्रवेश कर लीजिये और टोंटी को खोल दीजिये। धीरे−धीरे समस्त पानी मलाशय में चला जायेगा। इस समय पेट को धीरे−धीरे मलते भी रहिये जिससे मल के छूटने में सहायता मिले। आरंभ में पानी जाने पर पेट में दर्द−सा जान पड़ता है और तुरन्त ही टट्टी की इच्छा होती है। अगर ये बातें साधारण हों तो सहन करके पानी लेते जाना चाहिये और यदि ज्यादा दर्द जान पड़े तो टोंटी बन्द करके पानी चढ़ना रोक देना चाहिये। कुछ देर बाद जब दर्द बन्द हो जाय तो फिर टोंटी खोलकर पानी चढ़ाना चाहिये। अगर इस प्रकार कई बार पानी बन्द करना पड़े तो कोई हर्ज की बात नहीं है। अगर पानी जाना शुरू होने के थोड़ी देर बाद ही मल त्याग की अत्यन्त तीव्र इच्छा हो तो उसी समय उठकर मल त्याग करना चाहिये और दस−पाँच मिनट बाद फिर पूरा जल भर कर एनीमा लेना चाहिये। जब पूरा पानी चला जाय तो टोंटी को बाहर निकाल कर 15-20 मिनट तक सीधे और दाँयी−बाँयी करवट से लेटना चाहिये और पेट को थोड़ा-थोड़ा फुलाते और सिकोड़ते रहना चाहिए जिससे पानी हिलकर मल को घुला सके। जब मल त्याग की इच्छा काफी तीव्र हो तो मल−त्याग को चले जायें। इसलिये एनीमा का प्रयोग शौचस्थान के समीप ही करना उचित होता है। इसके लिये सुबह या शाम का समय अधिक ठीक रहता है। एनीमा लेने के लिये पहले मामूली ढंग से शौच हो आना उचित है। एनीमा विधि की प्राचीनता एनीमा की यह प्रणाली कोई नई बात नहीं है। हमारे यहाँ के अति प्राचीन ऋषि मुनि और योगी लोग भी इसी प्रकार की “वस्ति−क्रिया” से गुदा−मार्ग में पानी चढाकर मलाशय की सफाई किया करते थे। वे जल में बैठकर पेट की नसों को चला कर पिचकारी की तरह पानी खींच लेते थे। यह विधि अधिक लाभदायक और दोष रहित है और अब भी योगाभ्यासी इस तरह पानी चढ़ाया करते हैं। पर साधारण लोगों के लिये इसका अभ्यास कर सकना कठिन है। वह कार्य एनीमा द्वारा सहज में हो जाता है। इसमें कोई कठिनाई या खतरा नहीं है और हर एक मामूली समझ का आदमी इसे कर सकता है। यह क्रिया हर एक मौसम में और अस्वस्थ तथा स्वस्थ दशा में बिना किसी आशंका के प्रयोग में लाई जा सकती है। केवल एक दिन एनीमा लेने से सफाई नहीं हो सकती। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये इसे एक सप्ताह तक तो नियमित रूप से लगाना ही चाहिए। फिर सप्ताह में तीन बार और फिर दो बार लगाकर छोड़ा जा सकता है। कठिन और पुराने रोगों में महीने, दो महीने तक भी लगातार एनीमा लगानी पड़ती है। पेट में जमा हुआ, आँतों में चिपका हुआ, सूखा, सड़ा मल, मल की गाँठें सुद्दे धीरे−धीरे निकलते हैं। नींबू का पानी उन्हें फुलाता है, छुड़ाता है, खुरचता है, कुरेदता है तब कहीं उनका निकलना आरम्भ होता है। देखने में आता है कि जब दो चार दिन एनीमा ले चुके होते हैं तब काला−काला बदबूदार मल बाहर निकलता है। साधारण अवस्था में भी पेट की ठीक तरह से सफाई होने में कम से कम एक सप्ताह तो लगता ही है। जब तक खराब, पुराना मल निकलता रहे तब तक एनीमा लेना जारी रखना आवश्यक है। एनीमा द्वारा शरीर की सफाई का कार्य तब तक ठीक तरह पूरा नहीं होता जब तक साथ में कुछ उपवास भी न किया जाय। दो−तीन दिन का उपवास तो सभी को करना चाहिये। उपवास के समय पानी खूब पीना चाहिये और दिन में दो−चार बार पानी, शहद तथा नींबू मिलाकर भी पानी चाहिए। इन दिनों साधारण परिश्रम करना, कुछ टहलना तो आवश्यक है पर अधिक परिश्रम का कोई काम करना न चाहिए। ज्यादा काम करने से शरीर की शक्ति उसमें लग जाती है और सफाई के काम में कमी पड़ जाती है। इसलिये उस समय शरीर की पूरी शक्ति को जहाँ तक सम्भव हो मल के निकालने और अंगों को ठीक करने में ही लगाना चाहिये। अजय कर्मयोगी
बुधवार, 6 नवंबर 2019
भारतीय गोवंश की ऐसी दुर्दशा का कौन जिम्मेदार
मैं #सांड हूं ,लोग कहते हैं कि मैं तुम्हारी फसल उजाड़ रहा हूँ ,सड़कों पर कब्जा कर रहा हूँ ,मैं तुम मनुष्यों से पूंछता हूँ कि कितने कम समय में मैं इतना अराजक हो गया ! मैं मनुष्यों का दुश्मन कैसे बन गया । अभी कुछ सालों पहले तो लोग मुझे पालते थे ,चारा देते थे मेरे जन्म पर बधाइयां गाई जाती थी और घर में एक पुत्र की तरह मैं सम्मानित था लेकिन मनुष्य ज्यादा सभ्य हो गया ट्रैक्टर ले आया ,पम्पिंग सेट से पानी निकालने लगा और मुझे खुला छोड़ दिया ,मैं कहाँ जाता ?कहाँ चरता ?मनुष्य ने चरागाहों पर कब्जा कर लिया ,अब पापी पेट का सवाल है अपने पेट के लिए अपने मित्र मनुष्य से संघर्ष शुरू हो गया । यहां तक कि कुछ लोगों ने अपना पेट भरने के लिए मुझे काटना भी शुरू कर दिया ,मैं फिर भी चुप रहा ,चलो किसी काम तो आया तुम्हारे। मेरी माँ ने मेरे हिस्से का दूध देकर तुम्हे और तुम्हारे बच्चों को पाला लेकिन अब तो तुमने उसे भी खुला छोड़ दिया । इधर पिछले सालों से कई मनुष्य मित्रों ने मुझे कटने से बचाने के लिए अभियान चलाया ,लेकिन जब मैं अपना पेट भरने गलती से उनकी फसल खा गया तो वही मित्र मुझे बर्बादी का कारण बताने लगे ,शायद अब यही चाहते हैं कि मैं काट ही दिया जाता । मित्र बस इतना कहना चाहता हूं कि मैं तुम्हारी जीवन भर सेवा करूंगा तुम्हारे घर के सामने बंधा रहूँगा ,थोड़े से चारे के बदले तुम्हारे खेत जोत दूंगा ,रहट से पानी निकाल दूंगा ,गाड़ी से सामान ढो दूंगा ,बस मुझे अपना लो लेकिन क्या मेरे इस निवेदन का तुम पर कोई असर होगा ? अरे तुम लोग तो अपने लाचार मां बाप को भी घर से बाहर निकाल देते हो ,फिर मेरी क्या औकात ?😥😥 #जेहि दिन धरा धेनु विन होइ #तेहि दिन धरा रसातल होई
गुरुवार, 24 अक्टूबर 2019
गोवत्स द्वादशी को लक्ष्मी पूजा दीपावली की शुरुआत होती है कैसे करें गोवत्स द्वादशी की पूजा
हिन्दू धर्मग्रंथों के अनुसार पौराणिक काल से कार्तिक के महीने में कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को गोवत्स द्वादशी मनाई जाती है। दीपावली के पूर्व आने वाली इस द्वादशी को गाय तथा बछड़ों की पूजा-सेवा की जाती है। द्वादशी के दिन सुबह नित्य कर्म से निवृत्त होकर गाय तथा बछड़े की पूजा करनी चाहिए। द्वादशी के व्रत में गाय के दूध से बने खाद्य पदार्थों का उपयोग नहीं किया जाता है।सत्त्वगुणी, अपने सान्निध्यसे दूसरोंको पावन करनेवाली, अपने दूधसे समाजको पुष्ट करनेवाली, अपना अंग-प्रत्यंग समाजके लिए अर्पित करनेवाली, खेतोंमें अपने गोबरकी खादद्वारा उर्वराशक्ति बढानेवाली, ऐसी गौ सर्वत्र पूजनीय है । हिंदू कृतज्ञतापूर्वक गौको माता कहते हैं । जहां गोमाताका संरक्षण-संवर्धन होता है, भक्तिभावसे उसका पूजन किया जाता है, वहां व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्रका उत्कर्ष हुए बिना नहीं रहता। भारतीय संस्कृतिमें गौको अत्यंत महत्त्व दिया गया है । वसुबारस अर्थात गोवत्स द्वादशी दीपावलीके आरंभमें आती है । यह गोमाताका सवत्स अर्थात उसके बछडेके साथ पूजन करनेका दिन है ।
१. गोमाता काे सम्पूर्ण विश्वकी माता क्याें कहते हैं ?
गोमाताकी रीढमें सींगसे पूंछतक ‘सूर्यकेतु’ नामक एक विशेष नाडी होती है । गोमाता अपने सींगोंके माध्यमसे सूर्यकी ऊर्जा अवशोषित करती है तथा ‘सूर्यकेतु’ नाडीमें वाहित करती है । सूर्यसे मिलनेवाली ऊर्जा दो प्रकारकी होती है । क्रिया ऊर्जा एवं ज्ञा ऊर्जा । क्रिया ऊर्जा गति तथा ज्ञा ऊर्जा विचारशक्ति दान करती है । जुगालीकी क्रियाके समय सूर्यसे प्राप्त दोनों ऊर्जाआेंको चबाकर वह अन्नमें मिला देती है । औषधीय वनस्पतियोंके रस, क्रिया ऊर्जा एवं ज्ञा ऊर्जा का संयोग होकर एक अमृत गोमाताके उदरमें पहुंचता है । वहां सर्व पाचन पूर्ण होनेके पश्चात यह अमृत तीन भागोंमें बंटता है – पृथ्वीके पोषण हेतु गोमय, वायुमण्डलके पोषण हेतु गोमूत्र तथा प्राणिजगत, विशेषतः मानवके पोषणके लिए दूध । इस कार गोमाताके कारण सम्पूर्ण सृष्टिका पोषण होता है । इसलिए विष्णुधर्मोत्तर पुराणमें कहा गया है कि ‘गावो विश्वस्य मातरः ।’ अर्थात गाय सम्पूर्ण विश्वकी माता है ।
२. गौमें सभी देवताओंके तत्त्व आकर्षित होते हैं
गौ भगवान श्रीकृष्णको प्रिय हैं । दत्तात्रेय देवताके साथ भी गौ है । उनके साथ विद्यमान गौ पृथ्वीका प्रतीक है । प्रत्येक सात्त्विक वस्तुमें कोई-ना-कोई देवताका तत्त्व आकर्षितहोता है । परंतु गौकी यह विशेषता है, कि उसमें सभी देवताओंके तत्त्व आकृष्ट होते हैं । इसीलिए कहते हैं, कि गौमें सर्व देवी-देवता वास करते हैं । गौसे प्राप्त सभी घटकोंमें, जैसे दूध, घी, गोबर अथवा गोमूत्रमें सभी देवताओंके तत्त्व संग्रहित रहते हैं ।
३. गोवत्स द्वादशी का अध्यात्मशास्त्रीय महत्त्व
ऐसी कथा है कि समुद्रमंथनसे पांच कामधेनु उत्पन्न हुर्इं । उनमेंसे नंदा नामक धेनुको उद्देशित कर यह व्रत मनाया जाता है । वर्तमान एवं भविष्यके अनेक जन्मोंकी कामनाएं पूर्ण हों एवं पूजित गौके शरीरपर जितने केश हैं, उतने वर्षोंका स्वर्गमें वास हो । शक संवत अनुसार आश्विन कृष्ण द्वादशी तथा विक्रम संवत अनुसार कार्तिक कृष्ण द्वादशी गोवत्स द्वादशीके नामसे जानी जाती है । यह दिन एक व्रतके रूपमें मनाया जाता है । गोवत्स द्वादशी के दिन श्री विष्णुकी आपतत्त्वात्मक तरंगें सक्रिय होकर ब्रह्मांडमें आती हैं । इन तरंगोंका विष्णुलोकसे ब्रह्मांडतकका वहन विष्णुलोककी एक कामधेनु अविरत करती हैं । उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करनेके लिए कामधेनुके प्रतीकात्मक रूपमें इस दिन गौका पूजन किया जाता है ।
४. गोवत्स द्वादशी व्रतके अंतर्गत उपवास
इस दिन सौभाग्यवती स्त्रियां उपवास एक समय भोजन कर रखाती है । परंतु भोजनमें गायका दूध अथवा उससे बने पदार्थ, जैसे दही, घी, छाछ एवं खीर तथा तेलमें पके पदार्थ, जैसे भुजिया, पकौडी इत्यादि ग्रहण नहीं करते, साथ ही इस दिन तवेपर पकाया हुआ भोजन भी नहीं करते । प्रातः अथवा सायंकालमें सवत्स गौकी पूजा की जाती हैं ।
५. गोवत्स द्वादशी को गौपूजन प्रात अथवा सायंकालमें करनेका शास्त्रीय आधार
प्रातः अथवा सायंकालमें श्री विष्णुके प्रकट रूपकी तरंगें गौमें अधिक मात्रामें आकर्षित होती हैं । ये तरंगें श्री विष्णुके अप्रकट रूपकी तरंगोंको १० प्रतिशत अधिक मात्रामें गतिमान करती है । इसलिए गोवत्स द्वादशीको गौपूजन सामान्यतः प्रातः अथवा सायंकालमें करनेके लिए कहा गया है ।
उपरांत ‘इस गौके शरीरपर जितने केश हैं, उतने वर्षोंतक मुझे स्वर्गसमान सुख की प्राप्ति हो, इसलिए मैं गौपूजन करता हूं । इस प्रकार संकल्प किया जाता है । प्रथम गौ पूजनका संकल्प किया जाता है । तत्पश्चात पाद्य, अर्घ्य, स्नान इत्यादि उपचार अर्पित किए जाते हैं। वस्त्र अर्पित किए जाते हैं । उपरांत गोमाताको चंदन, हलदी एवं कुमकुम अर्पित किया जाता है । उपरांत अलंकार अर्पित किए जाते हैं । पुष्पमाला अर्पित की जाती है । तदुपरांत गौके प्रत्येक अंगको स्पर्श कर न्यास किया जाता है । गौ पूजनके उपरांत बछडेको चंदन, हलदी, कुमकुम एवं पुष्पमाला अर्पित की जाती है । उपरांत गौ तथा उसके बछडेको धूपके रूपमें दो अगरबत्तियां दिखाई जाती हैं । उपरांत दीप दिखाया जाता है । दोनोंको नैवेद्य अर्पित किया जाता है । उपरांत गौकी परिक्रमा की जाती है । पूजनके उपरांत पुनः गोमाताको भक्तिपूर्वक प्रणाम करना चाहिए । गौ प्राणी है । भयके कारण वह यदि पूजन करने न दें अथवा अन्य किसी कारणवश गौका षोडशोपचार पूजन करना संभव न हों, तो पंचोपचार पूजन भी कर सकते हैं । इस पूजनके लिए पुरोहितकी आवश्यकता नहीं होती ।
६. गोवत्सद्वादशीसे मिलनेवाले लाभ
गोवत्सद्वादशीको गौपूजनका कृत्य कर उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है । इससे व्यक्तिमें लीनता बढती है । फलस्वरूप कुछ क्षण उसका आध्यात्मिक स्तर बढता है । गौपूजन व्यक्तिको चराचरमें ईश्वरीय तत्त्वका दर्शन करनेकी सीख देता है । व्रती सभी सुखोंको प्राप्त करता है ।
सोमवार, 7 अक्टूबर 2019
अयोध्या के राजवंस का कीर्ति पताका आज भी विदेशों में फहरा रहा है
पुर्वी अयोध्या का ऐतिहासिक तथ्य
जयश्रीराम
ये कहानी इतिहास के उन पन्नों की है, जिन्हें आज फड़फड़ाने की भी इजाज़त नहीं!
सदियों पहले, कमसकम आठ सदी पहले, भारत के एक अज्ञात क्षत्रिय राजवंश का युवा राजपुत्र राज्य से निष्कासित कर दिया गया। उसका अपराध क्या था, ये तक उगलने की इजाज़त इतिहास के पन्नों को नहीं।
इतिहास के टूटे पुर्ज़े, कई कड़ियों में, बस इतना बता पाते हैं कि उस राजपुत्र को न केवल राज्य में, बल्कि इस पूरी भारतभूमि में उसके निवास करने पर मनाही थी।
वैसी स्थिति में वो कहाँ जाता?
उत्तर का छोर पकड़ता तो रम्यकवर्ष का अज्ञात क्षेत्र था। जो वो पश्चिम का मार्ग लेता, तो म्लेच्छों के क्षेत्र में निहत्थे क्षत्रिय का होना घोर अदूरदर्शिता कहलाती। और दक्षिण में तो समुद्र तक महान भारतभूमि ही फैली थी, जहाँ उसका निवास निषिद्ध था।
वैसी स्थिति में, वो जाता तो कहाँ जाता? केवल पूरब ही सुरक्षित विकल्प था, सो उस निष्कासित राजपुत्र के पाँव भी पूरब की ओर मुड़ गए। और वो सुदूर पूरब के द्वीप स्यामदेश पर जा पहुँचा।
उस राजपुत्र ने सुदूर पूरब में प्रवास किया, निवास किया, भोजन आदि की नियमित व्यवस्था की और तब कहीं जाकर उस क्षेत्र की लोकमान्यताओं से लेकर संस्कृति और राजनीति तक को समझा!तत्पश्चात् उस निष्कासित राजपुत्र ने सेना निर्मित की, स्यामदेश के तत्कालीन शासक राजवंश पर आक्रमण किया, और विजय के पश्चात् उसने संसार को बताया कि वो अपने आर्य संस्कारों को भूला नहीं है, वो अपने राष्ट्र और उसकी यशस्वी परम्परा के वाहक पुरुषों को भूला नहीं है।
उस राजपुत्र ने अपने जीते हुए भूभाग का नामकरण “अयोध्या” किया। यों तो “अयोध्या” का अर्थ ही यही है कि उस भूभाग पर युद्ध न हो, किंतु पूर्वी “अयोध्या” की स्थापना ही युद्ध के ठीक बाद में हुई थी।
वस्तुतः युद्धपर्व के समापन में ही शांतिपर्व का प्रवेश हो पाता है। युद्ध की सभी संभावनाओं का समापन, केवल एक महायुद्ध से ही संभव है!##
पूरब की “अयोध्या” तो बन गई और तिस पर भी आर्य क्षत्रिय का शासन हो गया, किंतु हमारा धर्म हमें दमन नहीं सिखाता। हमारे ऐतिहासिक राजाओं ने प्रजा की इच्छाओं को ही सर्वोपरि माना है।
पूर्वी “अयोध्या” की प्रजा यशस्वी परम्परा “ताई” से ताल्लुक़ रखती थी। इसी के नाम पर स्यामभूमि को आधुनिक काल में “थाईलैंड” पुकारा गया है।
आर्यावर्त के उस निष्कासित राजपुत्र ने स्यामदेश के सांस्कृतिक परिवेश को नहीं बदला, बल्कि स्वयं अपनी परम्पराओं को “ताई” परिवेश में ढाल लिया। पहला बदलाव था, राज्य के नाम का ताई-उच्चारण शैली में प्रवाहित हो जाना।
पूर्वी “अयोध्या” का ताई-नाम “अयूथया” पुकारा गया! और राजधानी को “अयुध्या” कहा गया!
वस्तुत: राजधानी, राज्य व राजवंश तीनों के नाम, एक ही शब्द “अयोध्या” से प्रणीत थे। वैसा भाषाई आश्चर्य इतिहास में दूजा कोई नहीं मिलता।
“अयूथया” राजवंश के प्रथम इतिहास उल्लिखित राजा का नाम रामाथिबोदी प्रथम मिलता है। अवश्य ही, ये नाम ताई-नामशैली से प्रभावित है।
हालाँकि यों नहीं कहा जा सकता कि वे ही निष्कासित राजपुत्र थे। किंतु इतना अवश्य है कि वे इस वंश के प्रथम यशस्वी सम्राट अवश्य थे!
वे सन् तेरह सौ पचास के काल में राजा थे, किंतु आज भी, थाईलैंड की राजधानी में रामाथिबोदी के नाम पर बड़ा ही प्रसिद्ध हॉस्पिटल है। यानी कि ताई-स्मृतियाँ उन्हें अब भी सहेजे हुए हैं।
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“अयूथया” राज्य की स्थापना के समय, जो भूभाग प्राचीन ताई-राजवंशों के अधीन रह गया था, वो स्यामदेश का पूर्वी भाग था। उस राज्य का नाम “सुखोथाई” था।
किंतु सन् चौदह सौ अड़तीस में, “सुखोथाई” सम्पूर्ण विलय “अयूथया” में हो गया। उन दिनों “अयूथया” के राजा बोरोम्माराचा द्वितीय हुआ करते थे और “सुखोथाई” के राजा पुत्रहीन थे।
“सुखोथाई” की राजकुमारी का विवाह बोरोम्माराचा से हुआ और उन दोनों का पुत्र रामेसुअन, पूरे स्यामदेश का अधिपति बन गया।
यदि इतनी अधिक सत्ता, सम्पत्ति और सेना का उपयोग दिग्विजय में न हुआ, तो उसका अंतिम उपभोग क्या? सो, रामेसुअन ने कम्बोडिया पर आक्रमण कर दिया और उसके प्रमुख नगर “अंगकोर” तक अपना साम्राज्य विस्तार किया।
यही “अंगकोर” नगर, प्रसिद्ध अंकोरवाट मंदिर के लिए प्रसिद्ध है!
अब “अयूथया” की संरचना प्राचीन आर्यवर्त के राज्यों की भाँति हो गयी थी, एक चक्रवर्तिन दिग्विजयी सम्राट और तमाम अधीनस्थ करद राज्य।
इस “अयूथया” की समृद्धि इतनी थी कि उसके व्यापारिक सम्बंध जापान, वियतनाम, चीन और भारत से थे। साथ ही, महाद्वीपीय व्यापारिक तंत्र का फैलाव स्पेन, हॉलैंड, फ्राँस और पुर्तगाल तक था।
ये सुनहरा कालखंड राजा नरई का समय था, सन् सोलह सौ छप्पन से अट्ठासी तक। राजा नरई और राजा लुई चौदहवें के बड़े गहरे मैत्री सम्बंध थे।
किंतु, राजा नरई के उत्तरवर्तियों के हाथ में आई “अयूथया” राज्य की तलवार कमज़ोर पड़ गई। और इस कमज़ोरी के साथ विनाश की घड़ी ने भी प्रवेश किया।
सन् सत्रह सौ पैंसठ में “बर्मा” राज्य की मात्र पचास हज़ार सैनिकों की सेना ने आक्रमण किया और दो बरस तकचले इस युद्ध में “अयूथया” पराजित हो गया। पराजित राज्य का क्या हश्र होता है, ये सर्वविदित है।
बर्मियों ने, सन् सत्रह सौ सरसठ में राजधानी “अयुध्या” को जलाकर सम्पूर्ण भस्म कर दिया। “अयूथया” की सम्पूर्ण सांस्कृतिक थाती को, समृद्ध पुस्तकालय को, निर्दोष कलाकृतियों को और यहाँ तक कि ऐतिहासिक अभिलेखों के गृह तक को जला कर नष्ट कर दिया।
अब वहाँ केवल आधे-अधूरे-से सीमेंटी वस्त्रों से झाँकती, नग्न-अर्धनग्न छोटी लखौरी ईंटें ही शेष हैं। और शेष हैं, ताई-शैली में बनीं तीन शंक्वाकार पथरीली आकृतियाँ, जो तत्कालीन “अयूथया” के वैभव और पराभव की अथक कथा सुना रही हैं।
शनिवार, 5 अक्टूबर 2019
रानू मंडल का संगीत जगत में छा जाना चमत्कार या साजिश
रानू मंडल संगीत जगत में छा जाना प्रतिभा का चमत्कार या सोची समझी साजिश .. !! .. ??_*
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*#STEP 1*
आप लोगों को याद होगी बल्कि ज़ेहन में ताजा होगी, *स्टेशन पर गाना गाती हुई एक भिखारिन रानू मंडल की वीडियो ।*
उस वीडियो को जबरदस्त तरीके से सोशल मीडिया पर वायरल किया गया। इस क्लिप को वायरल करते समय उसके गायन की तुलना लता मंगेशकर जी से करना पोस्ट-कर्ता नहीं भूले ।
*#STEP 2*
आश्चर्यजनक रूप से संगीत जगत से लगभग गायब हो चुके संगीतकार और गायक हिमेश रेशमिया ने उस महिला को लपक लिया और उस महिला के ब्यूटी पार्लर में श्रृंगार की वीडियो वायरल होने लगी।
*#STEP 3*
चार-पांच दिन बाद एक गाने के क्लिप वायरल की गई जिसमें वह महिला हिमेश रेशमिया के साथ एक गीत गा रही थी।
*#STEP 4*
चौथे स्टैप में रानू मंडल , जिसका पूरा नाम रानू मारिया मंडल है, उसने लता मंगेशकर जी पर डैरोगेटरी कमेंट करना शुरू कर दिये।
*#STEP 5*
अचानक रानू मंडल देखते देखते ईसाई चमत्कार दिखाने लग। गई पर क्या, यह वास्तव में अचानक हुआ।
शायद नहीं, *_It was a complete plan to launch her and in the script was written for launching...!_* यह कहानी (पटकथा) लिखी कुछ वामियों ने, जो _लता मंगेशकर जी के राष्ट्रवादी बयानों_ से व्यथित थे क्षतथा *_इस पटकथा को स्पॉन्सर किया धर्मांतरण कराने के लिए ईसाई संस्थाओं ने।_*
मुख्य पात्र के लिए चयन किया गया रानू मंडल का और सहायक भूमिकाओं के लिए वीडियो बनाने वाले चक्रवर्ती का और काम की तलाश में भटकते _संगीत जगत के हिमेश रेशमिया का।_ *_अच्छा भुगतान किया गया होगा इन दोनों को_ ; ऐसा लगता है और इन दोनों को केवल आधी पटकथा बताई गई होगी वीडियो खींचकर पोस्ट करने की , और हिमेश को रानू मंडल को चांस देने के लिए थोड़े से पैसे दिए गए होंगे पर इस फिल्म का उद्देश्य शायद इन दोनों को ना पता चला हो।*
आधी कहानी इंटरवल तक की पूरी होने के बाद फाइनेंसर ने अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिए इंटरवल के बाद की फिल्म रिलीज करना अब शुरू कर दिया है । शायद आपने जरूर देखी होगी ना देखी हो तो मैं इस पोस्ट के साथ संलग्न कर रहा हूं ।
अपने आप से एक सवाल जरूर पूछियेगा ,
यदि आपको इस कहानी पर भरोसा ना आ रहा हो तो , _रानू मंडल_ से 10 गुना अधिक क्षमता वाले 1000 लोगों के वीडियो मीडिया में भरे पड़े हैं
*_हिमेश रेशमियां_* कितने लोगों को स्पॉन्सर करने को तैयार है और *वह 1000 लोग तो अपने पहले गाने के लिए कोई शुल्क भी नहीं लेंगे।*
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