मंगलवार, 10 मार्च 2020
बंद करो करोना का रोनाधोना,ऐसे मनाएं होली कुछ नहीं होना
* इस तरीके से बनाये अपने घर में होली का रंग और कोरोना से बचें.
*होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण त्यौहार है। होली भारत का अत्यंत प्राचीन पर्व है जो होली, होलिका या होलाका नाम से मनाया जाता है । वसंत की ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने के कारण इसे वसंतोत्सव भी कहा गया है।*
*यह वैदिक उत्सव है । लाखों वर्ष पहले भगवान रामजी हो गये । उनसे पहले उनके पिता, पितामह, पितामह के पितामह दिलीप राजा और उनके बाद रघु राजा... रघु राजा के राज्य में भी यह महोत्सव मनाया जाता था ।
*होली रंगों का त्यौहार है, हँसी-खुशी का त्यौहार है, लेकिन होली के भी अनेक रूप देखने को मिलते हैं। प्राकृतिक रंगों के स्थान पर रासायनिक रंगों का प्रचलन, ठंडाई की जगह नशेबाजी और लोक संगीत की जगह फ़िल्मी गानों का प्रचलन.... इस आधुनिक रूप से होली मनाने से बहुत नुकसान होता है ।*
*आपको हम रासायनिक रंगों से होने वाली हानियां और अपने घर में ही सस्ते में प्राकृतिक रंग किस प्रकार बना सकते हैं, उसके बारे में बताते है।*
*रासायनिक रंगों से होने वाली हानि...*
*1 - काले रंग में लेड ऑक्साइडत पड़ता है जो गुर्दे की बीमारी, दिमाग की कमजोरी करता है ।*
*2 - हरे रंग में कॉपर सल्फेट होता है जो आँखों में जलन, सूजन, अस्थायी अंधत्व लाता है ।*
*3 - सिल्वर रंग में एल्युमीनियम ब्रोमाइड होता है जो कैंसर का कारक होता है ।*
*4- नीले रंग में प्रूशियन ब्लू (कॉन्टैक्ट डर्मेटाइटिस) होता है जिससे भयंकर त्वचारोग होता है ।
*5 - लाल रंग में मरक्युरी सल्फाइड होता है जिससे त्वचा का कैंसर होता है ।*
*6- बैंगनी रंग में क्रोमियम आयोडाइड होता है जिससे दमा, एलर्जी होती है ।*
*अब आपको घर में ही प्राकृतिक रंग बनाने की सरल विधियाँ बता रहे हैं जो आसानी से बनाकर उपयोग कर सकते हैं और मना सकते हैं एक स्वस्थ होली ।*
*केसरिया रंग - पलाश के फूलों से यह रंग सरलता से तैयार किया जा सकता है। पलाश के फूलों को रात को पानी में भिगो दें । सुबह इस केसरिया रंग को ऐसे ही प्रयोग में लाएं अथवा उबालकर होली का आनंद उठायें ।
*यह रंग होली खेलने के लिए सबसे बढ़िया है। शास्त्रों में भी पलाश के फूलों से होली खेलने का वर्णन आता है । इसमें औषधीय गुण होते हैं। आयुर्वेद के अनुसार यह कफ, पित्त, कुष्ठ, दाह, मूत्रकृच्छ, वायु तथा रक्तदोष का नाश करता है । रक्तसंचार को नियमित व मांसपेशियों को स्वस्थ रखने के साथ ही यह मानसिक शक्ति तथा इच्छाशक्ति में भी वृद्धि करता है ।
*सूखा हरा रंग - मेंहदी का पाउडर तथा गेहूँ या अन्य अनाज के आटे को समान मात्रा में मिलाकर सूखा हरा रंग बनायें । आँवला चूर्ण व मेंहदी को मिलाने से भूरा रंग बनता है, जो त्वचा व बालों के लिए लाभदायी है ।*
*सूखा पीला रंग - हल्दी व बेसन मिला के अथवा अमलतास व गेंदे के फूलों को छांव में सुखाकर पीस के पीला रंग प्राप्त कर सकते हैं।*
*गीला पीला रंग - एक चम्मच हल्दी दो लीटर पानी में उबालें या मिठाइयों में पड़ने वाले रंग जो खाने के काम आते हैं, उनका भी उपयोग कर सकते हैं । अमलतास या गेंदे के फूलों को रात को पानी में भिगोकर रखें, सुबह उबालें ।*
*लाल रंगः लाल चंदन (रक्त चंदन) पाउडर को सूखे लाल रंग के रूप में प्रयोग कर सकते हैं । यह त्वचा के लिए लाभदायक व सौंदर्यवर्धक है । दो चम्मच लाल चंदन एक लीटर पानी में डालकर उबालने से लाल रंग प्राप्त होता है, जिसमें आवश्यकतानुसार पानी मिलायें ।*
*पीला गुलाल : (१) ४ चम्मच बेसन में २ चम्मच हल्दी चूर्ण मिलायें | (२) अमलतास या गेंदा के फूलों के चूर्ण के साथ कोई भी आटा या मुलतानी मिट्टी मिला लें ।*
*पीला रंग : (1) 2 चम्मच हल्दी चूर्ण 2 लीटर पानी में उबालें | (2) अमलतास, गेंदा के फूलों को रातभर भिगोकर उबाल लें ।*
*जामुनी रंग : चुकंदर उबालकर पीस के पानी में मिला लें।*
*काला रंग : आँवले के चूर्ण को लोहे के बर्तन में रातभर भिगोयें ।*
*लाल रंग : (1) आधे कप पानी में दो चम्मच हल्दी चूर्ण व चुटकीभर चूना मिलाकर 10 लीटर पानी में डाल दें | (2) 2 चम्मच लाल चंदन चूर्ण 1 लीटर पानी में उबालें ।*
*लाल गुलाल : सूखे लाल गुड़हल के फूलों का चूर्ण उपयोग करें ।*
*हरा रंग : (1) पालक, धनिया या पुदीने की पत्तियों के पेस्ट को पानी में भिगोकर उपयोग करें | (2) गेहूँ की हरी बालियों को पीस लें ।*
*हरा गुलाल : गुलमोहर अथवा रातरानी की पत्तियों को सुखाकर पीस लें ।
*भूरा हरा गुलाल : मेहँदी चूर्ण के साथ आँवला चूर्ण मिला लें
*सभी देशवासियों से अनुरोध है कि आप केमिकल रंगों से होली न खेलें और न ही जानवरों जैसे कुत्ता, बिल्ली, गाय, भैस आदि पर कोई रंग डाले क्योंकि रंग में केमिकल
होता है। वो अपने आप को साफ़ करने के लिए अपने को जीभ से चाटते हैं और वो केमिकल उनके पेट में जाता है और बीमार पड़ जाते हैं या मर जाते हैं ।*
*होली पर गाए-बजाए जाने वाले ढोल, मंजीरों, फाग, धमार, चैती और ठुमरी, वैदिक गानों से ही करनी चाहिए । फिल्मो के गानों से करने से हानि होती है । उससे भी बचें ।*
*पूरे साल स्वस्थ्य रहने के लिए क्या करें होली पर..??*
*1- होली के बाद 15-20 दिन तक बिना नमक का अथवा कम नमकवाला भोजन करना स्वास्थ्य के लिए हितकारी है ।
*2- इन दिनों में भुने हुए चने - ‘होला का सेवन शरीर से वात, कफ आदि दोषों का शमन करता है ।*
*3- एक महीना इन दिनों सुबह नीम के 20-25 कोमल पत्ते और एक काली मिर्च चबा के खाने से व्यक्ति वर्षभर निरोग रहता है ।*
*4- होली के दिन चैतन्य महाप्रभु का प्राकट्य हुआ था । इन दिनों में हरिनाम कीर्तन करना-कराना चाहिए । नाचना, कूदना-फाँदना चाहिए जिससे जमे हुए कफ की छोटी-मोटी गाँठें भी पिघल जायें और वे ट्यूमर कैंसर का रूप न ले पाएं और कोई दिमाग या कमर का ट्यूमर भी न हो । होली पर नाचने, कूदने-फाँदने से मनुष्य स्वस्थ रहता है।
गुरुवार, 5 मार्च 2020
करोना वायरस के प्रभाव से होलिका दहन सहित संपूर्ण त्यौहार व्रत और संस्कृति आज प्रासंगिक बना
भारतीय सनातन संस्कृति और उसके विभिन्न आयामों का आप सूक्ष्मता से विवेचन करेंगे यह संपूर्ण जीवन पद्धति है इसमें कोई वायरस या त्रिविध तापों का संपूर्ण समाधान है और उसी भारत अपनी सनातन संस्कृति की छोड़कर पागल बनने की तरफ अग्रसर हो रहा है .....
बन्द करो #करोना का रोना
बनो सनातन कुछ ना होना
तन- मन- जीवन हिन्दू हो तो
सदा स्वस्थ कोई रोग ना होना
करना है तो करो नमस्ते
शेक हैंड मत "#करोना"
खाना में शाकाहार करो ,
मांसाहार मत " #करोना"
रोज करो तुलसी का सेवन ,
धूम्रपान मत " #करोना"
नीम गिलोय का घूंट भरो
मदिरा पान मत " #करोना*
देशी भोजन रोज करो
फ़ास्ट फ़ूड मत " #करोना"
हाथ साफ दस बार करो
कहीं गंदगी मत " #करोना*
अग्नि संस्कार करो शव का
लाश दफन मत " #करोना*
#CoronaVirus #WuhanCoronaVirus
भारत की जलवायु और प्रकृति ही करेगी कोरौना का सफाया। 4℃ से 6℃ तक ही कोरौना सक्रिय और पनप पाता है और इससे अधिक तापमान में अपनी ताकत खोता है और असक्रिय होकर दम तोड़ देता है। यही कारण है कि इबोला, सार्स, स्वाइन फ्लू आदि भारत मे पूरी दुनिया की तादाद में कमजोर रहे।
मीडिया फ्लू से डरने से अधिक शाकाहारी जीवन और आयुर्वेद को अपनायें। गिलोय, नीम, तुलसी, हल्दी और गौमूत्र का सेवन तो कोरौना क्या इसकी सात पुश्तों से लड़ सकने लायक रोग प्रतिरोधक क्षमता को बनाता है।
#SAAR #Ebola #SwineFlu #BirdFlu #ZikaVirus #NipahVirus
यज्ञ में जावित्री की आहुति कोरोना वायरस का काल है
कोरोना वायरस दुनिया में कहर ढा रहा है अब यह चीन की महामारी ना होकर विश्वमहारी की ओर बढ़ रहा है| 50 देशों में फैल गया है 2800 से अधिक मौतें 75000 से अधिक केस सामने आ आ चुके हैं| कोरोना इबोला हेपेटाइटिस स्वाइन फ्लू या अन्य महामारी संक्रमण के लिए जिम्मेदार वायरस कोई आजकल के तो है नहीं यह भी उतने ही प्राचीन है कि जितना प्राचीन पृथ्वी पर जीवन है|
14 शताब्दी में मध्य एशिया यूरोप में प्लेग के वायरस ने 20 करोड लोगों का सफाया कर दिया था यह virus भारत का कुछ नहीं बिगाड़ पाया | भारत की संस्कृति यज्ञ संस्कृति रही है यज्ञ ने इस देश को महामारी संक्रामक रोग से बचाया है यहां जो भी महामारी आई पराधीनता के काल में आई या जब से हमने यज्ञ करना कराना छोड़ दिया|
भारत से 9000 किलोमीटर दूर दक्षिण एशियाई देश है इंडोनेशिया यह 2,000 से अधिक छोटे बड़े टापू से मिलकर बना देश है.... यह आर्यव्रत का हिस्सा था सनातन संस्कृति से ही संरक्षित होता था| इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता है जो उसके प्राचीन नाम जयकृत का अपभ्रंश है| राजे महाराजे भारत के इस देश से जावित्री और जायफल मसाले को मंगाते थे यह मसाला अपने देश में नहीं होता... इंडोनेशिया के बाली सुमात्रा जावा द्वीप में यह होता है.... जावित्री , जायफल एक ही पेड़ के उत्पाद है जायफल पेड़ का बीज है तथा जावित्री बीज को घेरा हुए लाल आवरण है|
जावित्री केवल मसाला ही नहीं यह दुनिया की बेस्ट एंटी वायरल मेडिसिन है.... हमारे पूर्वज हवन सामग्री में मिलाकर यज्ञ में इसे डालते थे.... जावित्री इन रोगों का खात्मा करती है जो स्वसन तंत्र को प्रभावित करते हैं कोरोनावायरस से जुकाम फेफड़ों का तीव्र संक्रमण एक्यूट रेस्पिरेट्री सिंड्रोम कहते हैं उसका खात्मा कर देती है| कोरोनावायरस बड़ा ही अजीबोगरीब है| यह वायरसों के एक परिवार का सदस्य है जिसने सभी का कॉमन नाम कोरोना ही है... हाल फिलहाल जिस से चीन में आतंक फैला हुआ है वैज्ञानिकों ने उसका नाम कोविड 2019 रखा है.... यह वायरस गोलाकार होता है इसके चारों तरफ सुनहरे कांटे होते हैं इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप से जब देखते हैं एक क्राउन( ताज) की भांति यह आवरण से ढका हुआ होता है| कोरोना परिवार के वायरस साधारण जुकाम से लेकर खतरनाक निमोनिया के लिए जिम्मेदार है|
United State Disease Control , विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इस कोरोना 2019 वायरस के सामने लाचार है ऐसे में विश्व स्वास्थ्य संगठन केवल एडवाइजरी इस वायरस से बचाव के तरीके ही जारी कर रहा है |
अभी तक तो दुनिया की किसी लेबर्ट्री में इस वायरस के खिलाफ कोई एंटीवायरल ड्रग नहीं बनी है Remedesvir नामक ड्रग को इसका समाधान खोजा जा रहा है लेकिन वह अभी क्लिनिकल ट्रायल से कोसों दूर है|
यह तो रहा संक्षिप्त में इस वायरस का वैज्ञानिक वर्णन अब मुद्दे पर लौटते हैं कोरोना क्या जितने भी ज्ञात अज्ञात वायरस हैं जो खोजे गए हैं या खोजे जाएंगे उनकी संख्या 10 करोड़ से अधिक बताई जाती है सभी का काल है यज्ञ...|
अपने देश में होली, दीपावली जैसे प्राचीन त्योहारों पर ऋतु अनुकूल सामग्री से बड़े-बड़े यज्ञ करने की स्वस्थ परंपरा रही है| फागुन , चैत्र के महीने में जब जावित्री को यज्ञ सामग्री में मिलाकर व खेतों में उगे हुए गेहूं जौ की बालियों को मिलाकर यज्ञ किया जाए तो यह खतरनाक वायरस मानव शरीर तो क्या गांव की सीमाओं में भी नहीं घुस सकते... हमारे ऋषियों ने सावित्री की गणना सुगंधी कारक जड़ी बूटी में की है जावित्री केवल सुगंधीकारक ही नहीं रोग नाशक भी है|
जावित्री कोई बहुत महंगा मसाला नहीं है ₹20 में 10 ग्राम मिलती है अर्थात ₹2000 किलो है 1 किलो जावित्री से एक गांव को वायरस से मुक्त किया जा सकता है यदि विधिवत यज्ञ किया जाए... साथ ही ऋतु अनुकूल सामग्री इस्तेमाल में लाई जाए|
साथियों अपने देश को कोरोनावायरस से सर्वाधिक खतरा है क्योंकि भारत विशाल आबादी का देश है चीन से हमारी सीमाएं मिली हुई है यह तो ईश्वर का कोई कर्म है यह virus भारत में अभी नहीं फैला है... कोरोना वायरस से पीड़ित व्यक्ति की छींक की एक बूंद में करोड़ों वर्ष होते हैं एक व्यक्ति छींक के द्वारा एक समय पर दर्जनों लोगों को संक्रमित कर सकता है|
सरकार के भरोसे मत बैठिए सरकारे इस वायरस से आपको नहीं बचा पाएंगी बताना चाहूंगा ईरान सहित कुछ मध्य एशियाई देशों के तो उपराष्ट्रपति भी इस वायरस से संक्रमित हैं...|
वायरस से आपको केवल और केवल यज्ञ ही बचा सकता है यदि सभी रोगों की एंटीवायरल एंटीबायोटिक थेरेपी है|
सोमवार, 6 जनवरी 2020
गांधी दर्शन में रामराज्य का विचार के प्रतिपादक धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी ही थे
धर्मसम्राट स्वामी करपात्री (१९०७ - १९८२) भारत के एक महान सन्त, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं राजनेता थे। उनका मूल नाम हरि नारायण ओझा था। वे हिन्दू दसनामी परम्परा के संन्यासी थे। दीक्षा के उपरान्त उनका नाम " हरिहरानन्द सरस्वती" था किन्तु वे "करपात्री" नाम से ही प्रसिद्ध थे क्योंकि वे अपने अंजुली का उपयोग खाने के बर्तन की तरह करते थे। उन्होने अखिल भारतीय राम राज्य परिषद नामक राजनैतिक दल भी बनाया था। धर्मशास्त्रों में इनकी अद्वितीय एवं अतुलनीय विद्वता को देखते हुए इन्हें 'धर्मसम्राट' की उपाधि प्रदान की गई।
जीवनी -
स्वामी श्री का जन्म संवत् 1964 विक्रमी (सन् 1907 ईस्वी) में श्रावण मास, शुक्ल पक्ष, द्वितीया को ग्राम भटनी, ज़िला प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश में सनातन धर्मी सरयूपारीण ब्राह्मण स्व. श्री रामनिधि ओझा एवं परमधार्मिक सुसंस्क्रिता स्व. श्रीमती शिवरानी जी के आँगन में हुआ। बचपन में उनका नाम 'हरि नारायण' रखा गया। स्वामी श्री 8-9 वर्ष की आयु से ही सत्य की खोज हेतु घर से पलायन करते रहे। वस्तुतः 9 वर्ष की आयु में सौभाग्यवती कुमारी महादेवी जी के साथ विवाह संपन्न होने के पश्चात 16 वर्ष की अल्पायु में गृहत्याग कर दिया। उसी वर्ष ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाराज से नैष्ठिक ब्रह्मचारी की दीक्षा ली। हरि नारायण से ' हरिहर चैतन्य ' बने। वे स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती के शिष्य थे। स्वामी जी की स्मरण शक्ति 'फोटोग्राफिक' थी, यह इतनी तीव्र थी कि एक बार कोई चीज पढ़ लेने के वर्षों बाद भी बता देते थे कि ये अमुक पुस्तक के अमुक पृष्ठ पर अमुक रूप में लिखा हुआ है। उन्होंने तर्क धुरंधर मदन मोहन मालवीय जी एवं स्वामी दयानंद सरस्वती जी को भी परास्त किया था, उन्हें सरस्वती जी का वरदान था कि स्वप्न में भी उनकी वाणी शास्त्र विरूद्ध नहीं होगी। उनके लिए शास्त्र सम्मत भगवान् का स्वरूप ही ग्राह्य था।स्वामी जी वैष्णव मतों के विरूद्ध नहीं थे, बल्कि जब काशी के विद्वत्परिषद् ने भागवत्पुराण के नवम् दशम् स्कन्ध को अश्लील एवं क्षेपक कहकर निकालने का निर्णय कर लिया तब करपात्रीजी ने पूरे दो माह पर्यन्त भागवत की अद्भुत व्याख्या प्रस्तुत कर सिद्ध कर दिया कि वह तो भागवत की आत्मा ही है, हाँ जब कुछ वैष्णवों ने करपात्रीजी के लिए अपने ग्रंथों में कटु शब्दों का प्रयोग किये तब उनके शास्त्रार्थ महारथी शिष्यों ने उसका उसी भाषा में उत्तर दिया। इससे उन्हें वैष्णव विरोधी समझने की भूल कभी नहीं करनी चाहिए। आज जो रामराज्य संबंधी विचार गांधी दर्शन तक में दिखाई देते हैं, धर्म संघ, रामराज्य परिषद्, राममंदिर अांदोलन, धर्म सापेक्ष राज्य, आदि सभी के मूल में स्वामी जी ही हैं। संतों के वैचारिक विरोधों के साथ ही उनमें आपसी प्रेम भी है हमें उसे नहीं भूलना चाहिए।
शिक्षा-
नैष्ठिक ब्रम्हचर्य श्री जीवन दत्त महाराज जी से संस्कृत अध्ययन षड्दर्शनाचार्य पंडित स्वामी श्री विश्वेश्वराश्रम जी महाराज से व्याकरण शास्त्र, दर्शन शास्त्र, भागवत, न्यायशास्त्र, वेदांत अध्ययन, श्री अचुत्मुनी जी महाराज से अध्ययन ग्रहण किया।
तपस्वी जीवन-
17 वर्ष की आयु से हिमालय गमन प्रारंभ कर अखंड साधना, आत्मदर्शन, धर्म सेवा का संकल्प लिया। काशी धाम में शिखासूत्र परित्याग के बाद विद्वत, सन्यास प्राप्त किया। एक ढाई गज़ कपड़ा एवं दो लंगोटी मात्र रखकर भयंकर शीतोष्ण वर्षा का सहन करना इनका 18 वर्ष की आयु में ही स्वभाव बन गया था। त्रिकाल स्नान, ध्यान, भजन, पूजन, तो चलता ही था। विद्याध्ययन की गति इतनी तीव्र थी कि संपूर्ण वर्ष का पाठ्यक्रम घंटों और दिनों में हृदयंगम कर लेते। गंगातट पर फूंस की झोंपड़ी में एकाकी निवास, घरों में भिक्षाग्रहण करनी, चौबीस घंटों में एक बार। भूमिशयन, निरावण चरण (पद) यात्रा। गंगातट नखर में प्रत्येक प्रतिपदा को धूप में एक लकड़ी की किल गाड कर एक टांग से खड़े होकर तपस्या रत रहते। चौबीस घंटे व्यतीत होने पर जब सूर्य की धूप से कील की छाया उसी स्थान पर पड़ती, जहाँ 24 घंटे पूर्व थी, तब दूसरे पैर का आसन बदलते। ऐसी कठोर साधना और घरों में भिक्षा के कारण "करपात्री" कहलाए। श्री विद्या में दीक्षित होने पर धर्मसम्राट का नाम षोडशानन्द नाथ पड़ा.
दण्ड ग्रहण-
24 वर्ष की आयु में परम तपस्वी 1008 श्री स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाराज से विधिवत दण्ड ग्रहण कर "अभिनवशंकर" के रूप में प्राकट्य हुआ। एक सुन्दर आश्रम की संरचना कर पूर्ण रूप से सन्यासी बन कर "परमहंस परिब्राजकाचार्य 1008 श्री स्वामी हरिहरानंद सरस्वती श्री करपात्री जी महाराज" हलाए।
अखिल भारतीय राम राज्य परिषद-
अखिल भारतीय राम राज्य परिषद भारत की एक परम्परावादी हिन्दू पार्टी थी। इसकी स्थापना स्वामी करपात्री ने सन् 1948 में की थी। इस दल ने सन् 1952 के प्रथम लोकसभा चुनाव में 3 सीटें प्राप्त की थी। सन् 1952, 1957 एवम् 1962 के विधानसभा चुनावों में हिन्दी क्षेत्रों (मुख्यत: राजस्थान) में इस दल ने दर्जनों सीटें हासिल की थी।
गोरक्षा आन्दोलन -
इंदिरा गांधी के लिये उस समय चुनाव जीतना बहुत मुश्किल था , करपात्री जी महाराज के आशीर्वाद से इंदिरा गांधी चुनाव जीती । इंदिरा ग़ांधी ने उनसे वादा किया था चुनाव जीतने के बाद गाय के सारे कत्ल खाने बंद हो जायेगें . जो अंग्रेजो के समय से चल रहे हैं .लेकिन इंदिरा गांधी मुसलमानों और कम्यूनिस्टों के दवाब में आकर अपने वादे से मुकर गयी थी .जब तत्कालीन प्रधानमंत्री ने संतों इस मांग को ठुकरा दिया , जिसमे सविधान में संशोधन करके देश में गौ वंश की हत्या पर पाबन्दी लगाने की मांग की गयी थी ,तो संतों ने 7 नवम्बर 1966 को संसद भवन के सामने धरना शुरू कर दिया , हिन्दू पंचांग के अनुसार उस दिन विक्रमी संवत 2012 कार्तिक शुक्ल की अष्टमी थी , जिसे "गोपाष्टमी" भी कहा जाता है .इस धरने में भारत साधु-समाज, सनातन धर्म, जैन धर्म आदि सभी भारतीय धार्मिक समुदायों ने इसमें बढ़-चढ़कर भाग लिया। इस आन्दोलन में चारों शंकराचार्य तथा स्वामी करपात्री जी भी जुटे थे। जैन मुनि सुशीलकुमार जी तथा सार्वदेशिक सभा के प्रधान लाला रामगोपाल शालवाले और हिन्दू महासभा के प्रधान प्रो॰ रामसिंह जी भी बहुत सक्रिय थे। श्री संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी तथा पुरी के जगद्गुरु शंकराचार्य श्री स्वामी निरंजनदेव तीर्थ तथा महात्मा रामचन्द्र वीर के आमरण अनशन ने आन्दोलन में प्राण फूंक दिये थे.लेकिन इंदिरा गांधी ने उन निहत्ते और शांत संतों पर पुलिस के द्वारा गोली चलवा दी , जिस से कई साधू मारे गए । इस ह्त्या कांड से क्षुब्ध होकर तत्कालीन गृहमंत्री ” गुलजारी लाल नंदा ” ने अपना त्याग पत्र दे दिया , और इस कांड के लिए खुद को सरकार को जिम्मेदार बताया था . लेकिन संत " राम चन्द्र वीर " अनशन पर डटे रहे जो 166 दिनों के बाद उनकी मौत के बाद ही समाप्त हुआ था . राम चन्द्र वीर के इस अद्वितीय और इतने लम्बे अनशन ने दुनिया के सभी रिकार्ड तोड़ दिए है । यह दुनिया की पहली ऎसी घटना थी जिसमे एक हिन्दू संत ने गौ माता की रक्षा के लिए 166 दिनों तक भूखे रह कर अपना बलिदान दिया था .
ब्रह्मलीन-
माघ शुक्ल चतुर्दशी संवत 2038 (7 फरवरी 1982) को केदारघाट वाराणसी में स्वेच्छा से उनके पंच प्राण महाप्राण में विलीन हो गए। उनके निर्देशानुसार उनके नश्वर पार्थिव शरीर का केदारघाट स्थित श्री गंगा महारानी को पावन गोद में जल समाधी दी गई|
उन्होने वाराणसी में "धर्मसंघ" की स्थापना की। उनका अधिकांश जीवन वाराणसी में ही बीता। वे अद्वैत दर्शन के अनुयायी एवं शिक्षक थे। सन् १९४८ में उन्होने अखिल भारतीय राम राज्य परिषद की स्थापना की जो परम्परावादी हिन्दू विचारों का राजनैतिक दल है।
आपने हिन्दू धर्म की बहुत सेवा की। आपने अनेक अद्भुत ग्रन्थ लिखे जैसे :- वेदार्थ पारिजात, रामायण मीमांसा, विचार पीयूष, मार्क्सवाद और रामराज्य आदि। आपके ग्रंथो में भारतीय परंपरा का बड़ा ही अद्भुत व् प्रामाणिक अनुभव प्राप्त होता है। आप ने सदैव ही विशुद्ध भारतीय दर्शन को बड़ी दृढ़ता से प्रस्तुत किया है।
धर्मसम्राट के कुछ महत्पूर्ण उपदेश -
दुस्त्यज दुर्व्यसन एवं पाशविकी चेष्टाओं को दूर करने के लिए दुस्त्यज धर्मनिष्ठा की अपेक्षा होती है और फिर उस दुस्त्यज धर्मनिष्ठा के त्याग के लिये दुस्त्यज ब्रह्मनिष्ठा या भगवद् अनुराग की अपेक्षा होती है।
हमें चमत्कार , सिद्धि या शान्ति आदि गुणों से मोहित नहीं होना है । हमें वेद- पुराणों के अनुसार चलना होगा चाहे उसमें कमियाँ ही क्यों न दीखें । यह वैदिकों का धर्म है ।
भावुक भक्तों और ब्रह्मवादियों को ही भगवत्प्राप्ति हो सकती है ।
कर्मणा वर्ण व्यवस्था मानने पर दिन भर में ही अनेक बार वर्णन बदलते रहेंगे। फिर व्यवस्था क्या होगी ? अतः उपनयन ,वेदाध्ययन, अग्निहोत्र आदि कर्म का अनुष्ठान भोजन विवाह आदि सभी सांस्कृतिक कर्म जन्मना ब्राम्हण आदि के आपस में ही हो सकते हैं । जन्मना ब्राह्मण और कर्मणा मुसलमान ब्राम्हण आदमी भोजन विवाह आदि संबंध तथा जन्मना वर्णों से भिन्न लोगों का उपनयन ,अग्निहोत्र आदि कर्मों का अधिकार सर्वथा शास्त्र विरुद्ध है ।
साधन भक्ति के प्रभाव से मनुष्य क्या नहीं कर सकता, अर्थात् सब कुछ कर सकता है। विशुद्ध भक्ति और भगवच्चरणारविन्द में उत्कट प्रेम होने पर मनुष्य में दैवी ऐश्वर्य प्रकट होने लगता है। जो व्यक्ति केवल परमेश्वर को ही अपना सर्वस्व (सर्वेसर्वा) समझता है, वह असम्भव से असम्भव कार्य को सम्भव कर देता है।
यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः । नश्वरं गृह्यमाणं तं विद्धि मायामनोमयम् ।। (श्रीमद्भागवत 11.7.7) -- यह जगत् क्या है ? यह जगत् मन का विलास है , सारा विश्व-प्रपञ्च मनोमात्र है । " हे उद्धव ! इस जगत् में जो कुछ मन से सोचा जाता है , वाणी से कहा जाता है , नेत्रों से देखा जाता है और श्रवण आदि इन्द्रियों से अनुभव किया जाता है वह सब नाशवान है । स्वप्न की तरह मन का विलास है , माया मात्र है , ऐसा समझो । " मनोदृश्यमिदं द्वैतं यत्किञ्चित्सचराचरम् । मनसो ह्यमनीभावे द्वैतं नैवोपलभ्यते ।। (माण्डूक्य कारिका , 3.31) सर्वं मन इति प्रतिज्ञा । तद्भावेभावात्तदभावेSभावात् , इति अन्वय-व्यतिरेकलक्षणमनुमानम् ।। ( शाङ्करभाष्य ) विमतं मनोमात्रं तद्भावे नियतभावत्वात् , यथा मृद्भावे नियतभावो मृन्मात्रो घटादिः ।। ( आनन्दगिरि ) -- " जाग्रत् अवस्था में , स्वप्नावस्था में प्रपञ्च का उपलम्भ ( उपलब्धि ) होता है । सुषुप्ति और समाधि मे प्रपञ्च का उपलम्भ नहीं होता । इसका कारण क्या है ? जाग्रत् - स्वप्न में मन स्पन्दित होता है , कलना युक्त होता है , ग्राह्य-ग्राहक भाव को प्राप्त होता है । जब कि सुषुप्ति-समाधि में कलना युक्त नहीं होता ,ग्राह्य ग्राहक भाव को प्राप्त नहीं होता । सुषुप्ति में मन सुप्त - विलीन हो जाता है और समाधि में विस्मृत । इससे सिद्ध होता है कि सारा जगत् मन का विलास है ।
"एक दूसरे पर अनन्य प्रीती करनेवाले दो मालिकों के नौकर यदि एक दूसरे के स्वामी की निंदा करें तो वह दोनों जैसे स्वामी द्रोही कहे जाते हैं । वैसे ही एक दूसरे के आत्मा और एक-दूसरे के ध्यान में निमग्न माधव श्री विष्णु और श्री शिव की निंदा करने वाले स्वामी द्रोही है ।"
श्रीआद्यशंकराचार्यजी ने कहा है -- अस्ति न खलु कश्चिदुपापायः सर्वलोकपरितोषकरो यः | सबको संतुष्ट कर पाना संभव नहीं है अतः स्वयं के और सबके हित के अविरुद्ध तथा अनुरूप आचरण निःशंक होकर करते रहना चाहिए सबको संतुष्ट करने के व्यामोह में स्व - पर हित से विमुख नहीं होना चाहिए | स्व - पर हित के अविरुद्ध और अनुकूल प्रिय का ध्यान भी अवश्य रखना चाहिए .
रुद्राक्ष का चमत्कार को ना बनाएं व्यापार
रूद्राक्ष का चमत्कारिक रहस्य:
रूद्राक्ष को मनुष्य जाति के लिए चमत्कार पूर्णं तथा वरदान स्वरूप बताया गया है। इसकी उत्पत्ती मानव मात्र के कल्याण के लिए भगवान शंकर ने अपने अश्रुओं से किया है। कहा जाता है कि रूद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति भगवान शिव को अत्यंत प्रिय होता है।
जो व्यक्ति किसी भी रूप में रूद्राक्ष धारण कर लेता है उसके सारे समस्याओं का निराकरण स्वतः ही होने लगता है, तथा वह समस्त प्रकार के संकटों से बचा रहता है। ऐसे व्यक्ति की कभी भी आकस्मीक दुर्घटना नहीं होती वह हर प्रकार के अला-बलाओं से मुक्त रहता है। रूद्राक्ष धारण करने वाले व्यक्ति के पापों का क्षय होता है चाहे वह गोहत्या अथवा ब्रह्म हत्या जैसा पाप ही क्यों न हो।
रूद्राक्ष की माला को तंत्र शास्त्रों में अत्यधिक महत्व पूर्णं एवं चमत्कारिक माना गया है।
इसे धारण करने वाले व्यक्ति को दीर्घायु जीवन की प्राप्ति होती है तथा उसकी अकाल मृत्यु कभी नही हो सकती। जो मनुष्य रूद्राक्ष धारण करता है उसे जीवन में धर्म, अर्थ, काम, तथा मोक्ष की प्राप्ति सहज ही हो जाती है, साथ ही साथ मनुष्य के अनेकों शारीरिक, मानसिक तथा आर्थिक समस्याओं का समाधान होने लगता है तथा मन में असिम शांति का अनुभव होने लगता है।
रूद्राक्ष धारण करने वाले व्यक्ति के उपर भुत-प्रेत, जादू-टोना, तथा किए-कराए का कोइ आर नही पड़ता। रूद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति रूद्र तुल्य हो जाता है उसके पाप, ताप, संताप पूर्णतः समाप्त हो जाते हैं। चाहे कोई संयासी हो अथवा गृहस्थ सभी के लिए रूद्राक्ष सामान रूप से उपयोगी माना गया है। जिस घर में नित्य रूद्राक्ष का पूजन किया जाए उस घर में हमेशा सुख शांति बनी रहती है तथा उसके घर में अचल लक्ष्मी का सदा वास होता है।
रूद्राक्ष के मुखों के अनुसार पुराणों मे इसका महत्व तथा उपयोगिता का उल्लेख मिलता है। मुख्यतः एक मुख से लेकर इक्किस मुखी तक रूद्राक्ष प्राप्त होता है तथा प्रत्येक रूद्राक्ष का अपना अलग-अलग महत्व तथा उपयोगिता होती है।
एकमुखी रूद्राक्ष
पुराणों मे एकमुखी रूद्राक्ष को साक्षात रूद्र का स्वरूप कहा गया है यह चैतन्य स्वरूप पारब्रह्म का प्रतिक है। एकमुखी रूद्राक्ष को अत्यंत दुर्लभ तथा अद्वितिय माना गया है क्योंकि सौभाग्य शाली मनुष्य को ही एक मुखी रूद्राक्ष प्राप्त होता है।
इसे धारण करने वाले व्यक्ति के जीवन में किसी प्रकार का अभाव नही रहता तथा जीवन में धन, यश, मान-सम्मान, की प्राप्ति होती रहती है तथा लक्ष्मी चिर स्थाई रूप से उसके घर में निवास करती है। एकमुखी रूद्राक्ष को धारण करने से सभी प्रकार के मानसिक एवं शारीरिक रोगों का नाश होने लगता है तथा उसकी समस्त मनोकामनाएं स्वतः पूर्णं होने लगती हैं।
परंतु ध्यान रखें गोलाकार एकमुखी रूद्राक्ष को ही सर्वश्रेष्ठ माना गया है यह अत्यंत दुर्लभ है। काजू दाने की आकार वाली एकमुखी रूद्राक्ष सरलता से प्रप्त होती है परंतु यह कम प्रभावी होता है।
दोमुखी रूद्राक्ष
शास्त्रों में दोमुखी रूद्राक्ष को अर्धनारिश्वर का प्रतिक माना गया है। यह शिव भक्तों के लिए उचित एवं उपयोगी माना गया है। इसे धारण करने से मन में शांति तथा चिŸा में एकाग्रता आने से आध्यात्मीक उन्नती तथा सौभाग्य में वृद्धि होती है।है।
तीनमुखी रूद्राक्ष
तीनमुखी रूद्राक्ष को साक्षात अग्नि स्वरूप माना गया है। इस रूद्राक्ष में त्रिगुणात्मक शक्तियाँ समाहित होती हैं। इसे धारण करने वाला व्यक्ति अग्नि के समान तेजस्वी हो जाता है उसके सभी मनोरथ शीघ्र पुरे हो जाते हैं। तथा घर में धन-धान्य, यश, सौभाग्य की वृद्धि होने लगती है। तीनमुखी रूद्राक्ष धारण करने से परीक्षा, इन्टरव्यु, नौकरी तथा रोजगार के क्षेत्र में पूर्ण रूप से सफलता प्राप्त होती है।
चारमुखी रूद्राक्षचारमुखी रूद्राक्ष को ब्रह्म स्वरूप माना जाता है। यह शिक्षा के क्षेत्र में पूर्णं रूप से सफलता दिलाने में समर्थ है। इसे धारण करने वाले व्यक्ति कि वाक शक्ति प्रखर तथा स्मरण शक्ति तीव्र हो जाती है और शिक्षा के क्षेत्र में व्यक्ति अग्रणी हो जाता है।
पाँचमुखी रूद्राक्ष
पाँचमुखी रूद्राक्ष को साक्षात रूद्र स्वरूप है। यह रूद्रावतारी हनुमान का प्रतिनिधित्व करता है। इसे कालाग्नी नाम से भी जाना जाता है, यह प्रयाप्त मात्रा में उपलब्ध होता है। माला के लिए इसी रूद्राक्ष का उपयोग किया जाता है। पंचमुखी रूद्राक्ष को किसी भी साधना में सिद्धि एवं पूर्णं सफलता दायक माना गया है। इसे धारण करने से सांप, बिच्छु, भुत-प्रेत जादू-टोने से रक्षा होती है तथा मानसिक शांति और प्रफुल्लता प्रदान करते हुए मनुष्य के समस्त प्रकार के पापों तथा रोगों को नष्ट करने में समर्थ है।
छःमुखी रूद्राक्ष
इसे भगवान कार्तिकेय का स्वरूप माना गया है। छःमुखी रूद्राक्ष को धारण करने से मनुष्य की खोई हुई शक्तियाँ पुनः जागृत होने लगती हैं। स्मरण शक्ति प्रबल तथा बुद्धि तीब्र होती है। छःमुखी रूद्राक्ष धारण करने से ब्रह्महत्या से भी बड़ा पाप नष्ट हो जाता है। तथा धर्म, यश तथा पुण्य प्राप्त होता है। इसे धारण करने से हृदय रोग, चर्मरोग, नेत्ररोग, हिस्टिरीया तथा प्रदर रोग जैसे विकार नष्ट हो जाते हैं।
सातमुखी रूद्राक्ष
सातमुखी रूद्राक्ष सप्तऋषियों के स्वरूप है। इसे धारण करने से धन, संपति, कीर्ति और विजय की प्राप्ति होती है तथा कार्य व्यापार में निरंतर बढ़ोŸारी होती है। सप्तमुखी रूद्राक्ष को दुर्घटना तथा अकाल मृत्यु को हरण करने वाला तथा पूर्णं संसारिक सुख प्रदान करने वाला बताया गया है।
अष्टमुखी रूद्राक्ष
इसे अष्टभुजी देवी माँ दुर्गा का स्वरूप माना गया है। इसे धारण करने से दिव्य ज्ञान की प्राप्ति, चित्त में एकाग्रता तथा केश मुकदमों में सफलता प्राप्त होती है। अष्टमुखी रूद्राक्ष को धारणा करने से आँखों मे अजीब सा सम्मोहन शक्ति आ जाती है जिससे सामने वाले व्यक्ति को प्रभावित किया जा सकता है। इसके माध्यम से कुण्डलिनी शक्ति को भी जागृत किया जा सकता है।
नौमुखी रूद्राक्ष
नौमुखी रूद्राक्ष नवदुर्गा, नवग्रह, तथा नवनाथों का प्रतिक माना जाता है। इसे धारण करने से समस्त प्रकार की साधनाओं मंे सफलता प्राप्त होती है। यह अकाल मृत्यु निवारक, शत्रुओं को परास्त करने, मुकदमों में सफलता प्रदान करने तथा धन, यश तथा कीर्ति प्रदान करने में समर्थ है।
दसमुखी रूद्राक्ष
दसमुखी रूद्राक्ष को दसो दिशाओं का सुचक तथा दिग्पाल का प्रतिक है। इसे धारण करने से सभी प्रकार के लौकिक तथा पारलौकिक कामनाओं की पूति होती है। समस्त प्रकार के विघ्न बाधाओं तथा तांत्रिक बाधाओं से रक्षा करते हुए सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
ग्यारहमुखी रूद्राक्षग्यारहमुखी रूद्राक्ष को हनुमान स्वरूप माना गया है। इसे धारण करने पर किसी भी चीज का अभाव नही रहता तथा सभी प्रकार के संकट और कष्ट दुर हो जाते हैं। इसे धारण करने से संक्रामक रोगों का नाश होता है। यदि बंध्या स्त्री को भी इसे धारण कराया जाए तो निश्चय ही उसकी संताने पैदा हो जाती है।
बारहमुखी रूद्राक्ष
बारह मुखी रूद्राक्ष को आदित्य स्वरूप माना गया है। इसे धारण करने वाला व्यक्ति तेजस्वी तथा शक्तिशाली बनता है तथा उसके चेहरे पर हमेशा ओज और तेज झलकता रहता है साथ ही सभी प्रकार के शारीरिक तथा मानसिक व्याधियों से मुक्ति मिल जाती है। इसे धरण करने से आँखों की रोशनी बढ़ जाती है तथा आँखों में सम्मोहन शक्ति बढ़ती है।
तेरहमुखी रूद्राक्ष
इसे इन्द्र स्वरूप माना गया है। इसे धारण करने से समस्त प्रकार के सिद्धियों मे सफलता प्राप्त होती है। शारीरिक सौन्दर्य मे वृद्धि तथा जीवन में यश, मान सम्मान, पद प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है।
चैदहमुखी रूद्राक्ष
इसे साक्षात त्रिपुरारी स्वरूप माना गया है। इसे धारण करने से स्वास्थ्य लाभ शारीरिक, मानसिक तथा व्यापारिक उन्नती मे सहायक होता है। यह स्मस्त प्रकार के आध्यात्मीक तथा भौतिक सुखों को प्रदान करने में समर्थ है।
गौरीशंकर रूद्राक्ष
इसे शिव तथा शक्ति का मिश्रीत स्वरूप माना गया है। यह प्राकृतिक रूप से वृक्ष पर ही जुड़ा हुआ उत्पन्न होता है। इसे धारण करने पर शिव तथा शक्ति की संयुक्त कृपा प्राप्त होती है, यह आर्थिक दृष्टि से पूर्णं सफलता दायक होता है। पारिवारिक सामंजस्य आकर्षण तथा मंगल कामनाओं की सिद्धि में सहायक होने के साथ-साथ लड़का-लड़की के विवाह में आ रही बाधाओं को समाप्त कर वर अथवा बधू की प्राप्ति मे भी सहायक है।
गुरुवार, 19 दिसंबर 2019
फिटकरी का औषधीय उपयोग के 10 तरीके
फिटकरी को अंग्रेजी में एलम कहते है। ये असल में पोटेशियम एल्युमिनीयम सल्फेट है। इसमें कई प्रकार के औषधीय गुण होते है। आयुर्वेद में इसे कई रोगों में उपयोग किया जाता है। यह रक्तशोधक और रक्तस्तम्भक है। ये एंटीसेप्टिक और एंटी बैक्टीरियल की तरह भी काम करती है। फिटकरी लाल व सफेद दो प्रकार की होती है। दोनों के गुण लगभग समान ही होते हैं। सफेद फिटकरी का ही अधिकतर प्रयोग किया जाता है। यह संकोचक अर्थात सिकुड़न पैदा करने वाली होती है। शरीर की त्वचा, नाक, आंखे, मूत्रांग और मलद्वार पर इसका स्थानिक (बाहृय) प्रयोग किया जाता है। रक्तस्राव (खून बहना), दस्त, कुकरखांसी तथा दमा में इसके आंतरिक सेवन से लाभ मिलता है।
आगे जानिए फिटकरी के बेहतरीन उपयोग :-
– यदि पसीना ज्यादा आता हो तो नहाने के पानी में फिटकरी घोलकर नहाएँ। पसीना आना कम हो जाएगा।
– चेहरे की झुर्रियाँ मिटाने के लिए फिटकरी के टुकड़े को पानी में डुबोकर चेहरे पर हल्के हाथ से मलें। सूखने पर सादा पानी से धो लें। कुछ ही दिनों में झुर्रियां मिट जाएंगी।
-मसूड़ों से खून आता हो तो फिटकरी को पानी में घोल कर के कुल्ला करने से ठीक होता है।
– जहरीला कीड़ा या बिच्छू काट ले तो पानी में फिटकरी का पाउडर डालकर गाढ़ा घोल बनाकर लगाने से आराम मिलता है।
– दांत में दर्द हो तो फिटकरी और काली मिर्च बराबर मात्रा में पीस कर इसे दर्द वाले दांत के मसूढ़े पर लगाएं। इससे दर्द कम हो जाता है।
– शरीर पर लगी छोटी चोट से खून बह रहा हो तो फिटकरि का पाउडर चोट पर छिड़कने से ब्लीडिंग बन्द हो जाता है।
– फिटकरी मिले पानी से कुछ दिन सिर धोने से जुएँ खत्म हो जाते हैं।
– बवासीर में फिटकरी का पाउडर मक्खन में मिलाकर मस्सों पर लगाने से बहुत लाभ होता है।
– नाक से खून आने पर फिटकरी के घोल में रुई डुबोकर नाक में लगाने से खून बंद हो जाती है – घाव के लिए फिटकरी को भूनकर पीसकर घी में मिलाकर घाव पर लगाने से घाव भर जाता है।
– दाढ़ी बनाने, बाल काटने के बाद फिटकरी रगडे़ या पानी में गीला कर दाढ़ी पर लगायें। इससे दाढ़ी की त्वचा सुन्दर और स्वस्थ होती है।
– जहां पर चींटिया व दीमक हो वहां पर सरसों का तेल लगाकर फिटकरी को डालने से चींटियां व दीमक वहां नहीं आती है।
विभिन्न रोगों में उपचार (Treatment of various diseases) जननांगों की खुजली: फिटकरी को गर्म पानी में मिलाकर जननांगों को धोने से जननांगों की खुजली में लाभ होता है।
टांसिल का बढ़ना: टांसिल के बढ़ने पर गर्म पानी में चुटकी भर फिटकरी और इतनी ही मात्रा में नमक डालकर गरारे करें। गर्म पानी में नमक या फिटकरी मिलाकर उस पानी को मुंह के अन्दर डालकर और सिर ऊंचा करके गरारे करने से गले की कुटकुटाहट, टान्सिल (गले में गांठ), कौआ बढ़ना, आदि रोगों में लाभ होता है। 5 ग्राम फिटकरी और 5 ग्राम नीलेथोथे को अच्छी तरह से पकाकर इसके अन्दर 25 ग्राम ग्लिसरीन मिलाकर रख लें। फिर साफ रूई और फुहेरी बनाकर इसे गले के अन्दर लगाने और लार टपकाने से टांसिलों की सूजन समाप्त हो जाती है।
घावों में रक्तस्राव (घाव से खून बहना): घाव ताजा हो, चोट, खरोंच लगकर घाव हो गया हो, उससे रक्तस्राव हो। ऐसे घाव को फिटकरी के पानी से धोएं तथा घाव पर फिटकरी को पीसकर इसका पावडर छिड़कने, लगाने व बुरकने से रक्तस्राव (खून का बहना) बंद हो जाता है। शरीर में कहीं से भी खून बह रहा हो तो एक ग्राम फिटकरी पीसकर 125 ग्राम दही और 250 मिलीलीटर पानी मिलाकर लस्सी बनाकर सेवन करना बहुत ही लाभकारी होता है।
घाव: फिटकरी को तवे पर डालकर गर्म करके राख बना लें। इसे पीसकर घावों पर बुरकाएं इससे घाव ठीक हो जाएंगे। घावों को फिटकरी के घोल से धोएं व साफ करें। 2 ग्राम भुनी हुई फिटकरी, 2 ग्राम सिन्दूर और 4 ग्राम मुर्दासंग लेकर चूर्ण बना लें। 120 मिलीग्राम मोम और 30 ग्राम घी को मिलाकर धीमी आग पर पका लें। फिर नीचे उतारकर उसमें अन्य वस्तुओं का पिसा हुआ चूर्ण अच्छी तरह से मिला लें। इस तैयार मलहम को घाव पर लगाने से सभी प्रकार के घाव ठीक हो जाते हैं। 5 ग्राम फूली फिटकिरी का चूर्ण बनाकर देशी घी में मिला दें, फिर उसे घाव पर लगायें। इससे घाव ठीक हो जाता है।
किसी भी अंग से खून बहना: एक ग्राम फिटकरी पीसकर 125 ग्राम दही और 250 मिलीलीटर पानी मिलाकर लस्सी बनाकर पीने से कहीं से भी रक्तस्राव हो, बंद हो जाता है।
नकसीर (नाक से खून बहना): गाय के कच्चे दूध में फिटकरी घोलकर सूंघने से नकसीर (नाक से खून आना) ठीक हो जाती है। यदि नकसीर बंद न हो तो फिटकरी को पानी में घोलकर उसमें कपड़ा भिगोकर मस्तक पर रखते हैं। 5-10 मिनट में रक्तबंद हो जाएगा। चौथाई चाय की चम्मच फिटकरी पानी में घोलकर प्रतिदिन तीन बार पीना चाहिए। अगर नाक से लगातार खून बह रहा हो तो 30 ग्राम फिटकरी को 100 मिलीलीटर पानी में मिलाकर उस पानी में कोई कपड़ा भिगोकर माथे और नाक पर रखने से नाक से खून बहना रुक जाता है। गाय के कच्चे दूध के अन्दर फिटकरी को मिलाकर सूंघने से नाक से खून बहना बंद हो जाता है।
मुंह का लिबलिबापन: काला नमक और फिटकरी समान मात्रा में मिलाकर पीसकर इसके पाउडर से मंजन करने से दांतों और मुंह का लिबलिबापन दूर हो जाता है।
आंखों में दर्द: एक ग्राम फिटकरी, 40 ग्राम गुलाब जल में भिगोकर शीशी में भर लें। इसकी दो-दो बूंद आंखों में प्रतिदिन डालें। इससे आंखों का दर्द, कीचड़ तथा लाली आदि दूर जाएगी। रात को सोते समय आंखों में डालने से तरावट रहती है। इसे रोजाना डाल सकते हैं।
उंगुलियों की सूजन: पानी में ज्यादा काम करने से जाड़ों में उंगुलियों में सूजन या खाज हो जाए तो पानी में फिटकरी उबालकर इससे उंगुलियों को धोने से लाभ होता है। पायरिया, मसूढ़ों में दर्द, सूजन, रक्त आना: एक भाग नमक, दो भाग फिटकरी बारीक पीसकर मसूढ़ों पर प्रतिदिन तीन बार लगायें। फिर एक गिलास गर्म पानी में पांच ग्राम फिटकरी डालकर हिलाकर कुल्ले करें। इससे मसूढ़े व दांत मजबूत होंगे। इससे रक्त आना और मवाद का आना बंद हो जाएगा।
दांतों का दर्द: भुनी फिटकरी, सरसों का तेल, सेंधानमक, नौसादर, सांभर नमक 10-10 ग्राम तथा तूतिया 6 ग्राम को मिलाकर बारीक पीसकर कपड़े से छान लें। इससे दांतों को मलने से दांतों का दर्द, हिलना, टीस मारना, मसूढ़ों का फूलना, मसूढ़ों से पीव का निकलना तथा पायरिया रोग ठीक होता है। फिटकरी को बारीक पीसकर पॉउडर बना लें। इससे प्रतिदिन मंजन करने से दांतों का दर्द जल्द ठीक होता है। फिटकरी को गर्म पानी में घोलकर लगातार कुल्ला करने से दांत में हो रहे तेज दर्द से जल्द आराम मिलता है।
मलेरिया बुखार: एक ग्राम फिटकरी, दो ग्राम चीनी में मिलाकर मलेरिया बुखार आने से पहले दो-दो घंटे से दो बार दें। मलेरिया नहीं आएगा और आएगा तो भी कम। फिर जब दूसरी बार भी मलेरिया आने वाला हो तब इसी प्रकार से दे देते हैं। इस प्रयोग के दौरान रोगी को कब्ज नहीं होनी चाहिए। यदि कब्ज हो तो पहले कब्ज को दूर करें। लगभग 1 ग्राम फिटकरी को फूले बताशे में डालकर उसे बुखार आने से 2 घंटे पहले रोगी को खिलाने से बुखार कम चढ़ता है।
आंतरिक चोट: चार ग्राम फिटकरी को पीसकर आधा किलो गाय के दूध में मिलाकर पिलाने से लाभ प्राप्त होता है।
सूजाक: सूजाक में पेशाब करते समय जलन होती है। इसमें पेशाब बूंद-बूंद करके बहुत कष्ट से आता है। इतना अधिक कष्ट होता है कि रोगी मरना पसन्द करता है। इसमें 6 ग्राम पिसी हुई फिटकरी एक गिलास पानी में घोलकर पिलाएं। कुछ दिन पिलाने से सूजाक ठीक हो जाता है।
हाथ-पैरों में पसीना आना: यदि पसीना आए तो फिटकरी को पानी में घोलकर इससे हाथ-पैरों को धोएं। इससे पसीना आना बंद हो जाता है।
सूखी खांसी: लगभग 10 ग्राम भुनी हुई हुई फिटकरी तथा 100 ग्राम चीनी को बारीक पीसकर आपस में मिला लें और बराबर मात्रा में चौदह पुड़िया बना लेते हैं।
सूखी खांसी में एक पुड़िया रोजाना 125 मिलीलीटर गर्म दूध के साथ सोते समय लेना चाहिए। इससे सूखी में बहुत लाभ मिलता है। गीली खांसी: 010 ग्राम भुनी हुई फिटकरी और 100 ग्राम चीनी को बारीक पीसकर आपस में मिला लें और बराबर मात्रा में 14 पुड़िया बना लें। सूखी खांसी में 125 ग्राम गर्म दूध के साथ एक पुड़िया प्रतिदिन सोते समय लेना चाहिए तथा गीली खांसी में 125 मिलीलीटर गर्म पानी के साथ एक पुड़िया रोजाना लेने से गीली खांसी लाभ होता है।
गर्भ-पात: पिसी हुई फिटकरी चौथाई चम्मच एक कप कच्चे दूध में डालकर लस्सी बनाकर पिलाने से गर्भपात रुक जाता है। गर्भपात के समय दर्द, रक्तस्राव हो रहा हो तो हर दो-दो घंटे से एक-एक खुराक दें।
बांझ-पन: मासिक-धर्म ठीक होने पर भी यदि सन्तान न होती हो तो रूई के फाये में फिटकरी लपेटकर पानी में भिगोकर रात को सोते समय योनि में रखें। सुबह निकालने पर रूई में दूध की खुर्चन सी जमा होगी। फोया तब तक रखें, जब तक खुर्चन आती रहे। जब खुर्चन आना बंद हो जाए तो समझना चाहिए कि बांझपन रोग समाप्त हो गया है।
कान में चींटी चली जाने पर: कान में चींटी चली जाने पर कान में सुरसरी हो तो फिटकरी को पानी में घोलकर पीने से लाभ मिलता है।
बिच्छू के काटने पर: बिच्छू के काटने पर फिटकरी को पानी में पीसकर लेप करने से बिच्छू का विष उतर जाता है।
आगे जानिए फिटकरी के बेहतरीन उपयोग :-
– यदि पसीना ज्यादा आता हो तो नहाने के पानी में फिटकरी घोलकर नहाएँ। पसीना आना कम हो जाएगा।
– चेहरे की झुर्रियाँ मिटाने के लिए फिटकरी के टुकड़े को पानी में डुबोकर चेहरे पर हल्के हाथ से मलें। सूखने पर सादा पानी से धो लें। कुछ ही दिनों में झुर्रियां मिट जाएंगी।
-मसूड़ों से खून आता हो तो फिटकरी को पानी में घोल कर के कुल्ला करने से ठीक होता है।
– जहरीला कीड़ा या बिच्छू काट ले तो पानी में फिटकरी का पाउडर डालकर गाढ़ा घोल बनाकर लगाने से आराम मिलता है।
– दांत में दर्द हो तो फिटकरी और काली मिर्च बराबर मात्रा में पीस कर इसे दर्द वाले दांत के मसूढ़े पर लगाएं। इससे दर्द कम हो जाता है।
– शरीर पर लगी छोटी चोट से खून बह रहा हो तो फिटकरि का पाउडर चोट पर छिड़कने से ब्लीडिंग बन्द हो जाता है।
– फिटकरी मिले पानी से कुछ दिन सिर धोने से जुएँ खत्म हो जाते हैं।
– बवासीर में फिटकरी का पाउडर मक्खन में मिलाकर मस्सों पर लगाने से बहुत लाभ होता है।
– नाक से खून आने पर फिटकरी के घोल में रुई डुबोकर नाक में लगाने से खून बंद हो जाती है – घाव के लिए फिटकरी को भूनकर पीसकर घी में मिलाकर घाव पर लगाने से घाव भर जाता है।
– दाढ़ी बनाने, बाल काटने के बाद फिटकरी रगडे़ या पानी में गीला कर दाढ़ी पर लगायें। इससे दाढ़ी की त्वचा सुन्दर और स्वस्थ होती है।
– जहां पर चींटिया व दीमक हो वहां पर सरसों का तेल लगाकर फिटकरी को डालने से चींटियां व दीमक वहां नहीं आती है।
विभिन्न रोगों में उपचार (Treatment of various diseases) जननांगों की खुजली: फिटकरी को गर्म पानी में मिलाकर जननांगों को धोने से जननांगों की खुजली में लाभ होता है।
टांसिल का बढ़ना: टांसिल के बढ़ने पर गर्म पानी में चुटकी भर फिटकरी और इतनी ही मात्रा में नमक डालकर गरारे करें। गर्म पानी में नमक या फिटकरी मिलाकर उस पानी को मुंह के अन्दर डालकर और सिर ऊंचा करके गरारे करने से गले की कुटकुटाहट, टान्सिल (गले में गांठ), कौआ बढ़ना, आदि रोगों में लाभ होता है। 5 ग्राम फिटकरी और 5 ग्राम नीलेथोथे को अच्छी तरह से पकाकर इसके अन्दर 25 ग्राम ग्लिसरीन मिलाकर रख लें। फिर साफ रूई और फुहेरी बनाकर इसे गले के अन्दर लगाने और लार टपकाने से टांसिलों की सूजन समाप्त हो जाती है।
घावों में रक्तस्राव (घाव से खून बहना): घाव ताजा हो, चोट, खरोंच लगकर घाव हो गया हो, उससे रक्तस्राव हो। ऐसे घाव को फिटकरी के पानी से धोएं तथा घाव पर फिटकरी को पीसकर इसका पावडर छिड़कने, लगाने व बुरकने से रक्तस्राव (खून का बहना) बंद हो जाता है। शरीर में कहीं से भी खून बह रहा हो तो एक ग्राम फिटकरी पीसकर 125 ग्राम दही और 250 मिलीलीटर पानी मिलाकर लस्सी बनाकर सेवन करना बहुत ही लाभकारी होता है।
घाव: फिटकरी को तवे पर डालकर गर्म करके राख बना लें। इसे पीसकर घावों पर बुरकाएं इससे घाव ठीक हो जाएंगे। घावों को फिटकरी के घोल से धोएं व साफ करें। 2 ग्राम भुनी हुई फिटकरी, 2 ग्राम सिन्दूर और 4 ग्राम मुर्दासंग लेकर चूर्ण बना लें। 120 मिलीग्राम मोम और 30 ग्राम घी को मिलाकर धीमी आग पर पका लें। फिर नीचे उतारकर उसमें अन्य वस्तुओं का पिसा हुआ चूर्ण अच्छी तरह से मिला लें। इस तैयार मलहम को घाव पर लगाने से सभी प्रकार के घाव ठीक हो जाते हैं। 5 ग्राम फूली फिटकिरी का चूर्ण बनाकर देशी घी में मिला दें, फिर उसे घाव पर लगायें। इससे घाव ठीक हो जाता है।
किसी भी अंग से खून बहना: एक ग्राम फिटकरी पीसकर 125 ग्राम दही और 250 मिलीलीटर पानी मिलाकर लस्सी बनाकर पीने से कहीं से भी रक्तस्राव हो, बंद हो जाता है।
नकसीर (नाक से खून बहना): गाय के कच्चे दूध में फिटकरी घोलकर सूंघने से नकसीर (नाक से खून आना) ठीक हो जाती है। यदि नकसीर बंद न हो तो फिटकरी को पानी में घोलकर उसमें कपड़ा भिगोकर मस्तक पर रखते हैं। 5-10 मिनट में रक्तबंद हो जाएगा। चौथाई चाय की चम्मच फिटकरी पानी में घोलकर प्रतिदिन तीन बार पीना चाहिए। अगर नाक से लगातार खून बह रहा हो तो 30 ग्राम फिटकरी को 100 मिलीलीटर पानी में मिलाकर उस पानी में कोई कपड़ा भिगोकर माथे और नाक पर रखने से नाक से खून बहना रुक जाता है। गाय के कच्चे दूध के अन्दर फिटकरी को मिलाकर सूंघने से नाक से खून बहना बंद हो जाता है।
मुंह का लिबलिबापन: काला नमक और फिटकरी समान मात्रा में मिलाकर पीसकर इसके पाउडर से मंजन करने से दांतों और मुंह का लिबलिबापन दूर हो जाता है।
आंखों में दर्द: एक ग्राम फिटकरी, 40 ग्राम गुलाब जल में भिगोकर शीशी में भर लें। इसकी दो-दो बूंद आंखों में प्रतिदिन डालें। इससे आंखों का दर्द, कीचड़ तथा लाली आदि दूर जाएगी। रात को सोते समय आंखों में डालने से तरावट रहती है। इसे रोजाना डाल सकते हैं।
उंगुलियों की सूजन: पानी में ज्यादा काम करने से जाड़ों में उंगुलियों में सूजन या खाज हो जाए तो पानी में फिटकरी उबालकर इससे उंगुलियों को धोने से लाभ होता है। पायरिया, मसूढ़ों में दर्द, सूजन, रक्त आना: एक भाग नमक, दो भाग फिटकरी बारीक पीसकर मसूढ़ों पर प्रतिदिन तीन बार लगायें। फिर एक गिलास गर्म पानी में पांच ग्राम फिटकरी डालकर हिलाकर कुल्ले करें। इससे मसूढ़े व दांत मजबूत होंगे। इससे रक्त आना और मवाद का आना बंद हो जाएगा।
दांतों का दर्द: भुनी फिटकरी, सरसों का तेल, सेंधानमक, नौसादर, सांभर नमक 10-10 ग्राम तथा तूतिया 6 ग्राम को मिलाकर बारीक पीसकर कपड़े से छान लें। इससे दांतों को मलने से दांतों का दर्द, हिलना, टीस मारना, मसूढ़ों का फूलना, मसूढ़ों से पीव का निकलना तथा पायरिया रोग ठीक होता है। फिटकरी को बारीक पीसकर पॉउडर बना लें। इससे प्रतिदिन मंजन करने से दांतों का दर्द जल्द ठीक होता है। फिटकरी को गर्म पानी में घोलकर लगातार कुल्ला करने से दांत में हो रहे तेज दर्द से जल्द आराम मिलता है।
मलेरिया बुखार: एक ग्राम फिटकरी, दो ग्राम चीनी में मिलाकर मलेरिया बुखार आने से पहले दो-दो घंटे से दो बार दें। मलेरिया नहीं आएगा और आएगा तो भी कम। फिर जब दूसरी बार भी मलेरिया आने वाला हो तब इसी प्रकार से दे देते हैं। इस प्रयोग के दौरान रोगी को कब्ज नहीं होनी चाहिए। यदि कब्ज हो तो पहले कब्ज को दूर करें। लगभग 1 ग्राम फिटकरी को फूले बताशे में डालकर उसे बुखार आने से 2 घंटे पहले रोगी को खिलाने से बुखार कम चढ़ता है।
आंतरिक चोट: चार ग्राम फिटकरी को पीसकर आधा किलो गाय के दूध में मिलाकर पिलाने से लाभ प्राप्त होता है।
सूजाक: सूजाक में पेशाब करते समय जलन होती है। इसमें पेशाब बूंद-बूंद करके बहुत कष्ट से आता है। इतना अधिक कष्ट होता है कि रोगी मरना पसन्द करता है। इसमें 6 ग्राम पिसी हुई फिटकरी एक गिलास पानी में घोलकर पिलाएं। कुछ दिन पिलाने से सूजाक ठीक हो जाता है।
हाथ-पैरों में पसीना आना: यदि पसीना आए तो फिटकरी को पानी में घोलकर इससे हाथ-पैरों को धोएं। इससे पसीना आना बंद हो जाता है।
सूखी खांसी: लगभग 10 ग्राम भुनी हुई हुई फिटकरी तथा 100 ग्राम चीनी को बारीक पीसकर आपस में मिला लें और बराबर मात्रा में चौदह पुड़िया बना लेते हैं।
सूखी खांसी में एक पुड़िया रोजाना 125 मिलीलीटर गर्म दूध के साथ सोते समय लेना चाहिए। इससे सूखी में बहुत लाभ मिलता है। गीली खांसी: 010 ग्राम भुनी हुई फिटकरी और 100 ग्राम चीनी को बारीक पीसकर आपस में मिला लें और बराबर मात्रा में 14 पुड़िया बना लें। सूखी खांसी में 125 ग्राम गर्म दूध के साथ एक पुड़िया प्रतिदिन सोते समय लेना चाहिए तथा गीली खांसी में 125 मिलीलीटर गर्म पानी के साथ एक पुड़िया रोजाना लेने से गीली खांसी लाभ होता है।
गर्भ-पात: पिसी हुई फिटकरी चौथाई चम्मच एक कप कच्चे दूध में डालकर लस्सी बनाकर पिलाने से गर्भपात रुक जाता है। गर्भपात के समय दर्द, रक्तस्राव हो रहा हो तो हर दो-दो घंटे से एक-एक खुराक दें।
बांझ-पन: मासिक-धर्म ठीक होने पर भी यदि सन्तान न होती हो तो रूई के फाये में फिटकरी लपेटकर पानी में भिगोकर रात को सोते समय योनि में रखें। सुबह निकालने पर रूई में दूध की खुर्चन सी जमा होगी। फोया तब तक रखें, जब तक खुर्चन आती रहे। जब खुर्चन आना बंद हो जाए तो समझना चाहिए कि बांझपन रोग समाप्त हो गया है।
कान में चींटी चली जाने पर: कान में चींटी चली जाने पर कान में सुरसरी हो तो फिटकरी को पानी में घोलकर पीने से लाभ मिलता है।
बिच्छू के काटने पर: बिच्छू के काटने पर फिटकरी को पानी में पीसकर लेप करने से बिच्छू का विष उतर जाता है।
बुधवार, 11 दिसंबर 2019
क्या आप दवा खाते-खाते परेशान हो चुके हैं तो एनिमा उपयोगी हो सकता है बिना दवा जीवन जिनें में
क्या आप दवाइयों का सेवन करते करते थक गए हैं और स्वास्थ्य में कोई परिवर्तन नहीं हो रहा है तो यह यह विधि आपके लिए सर्वोत्तम हो सकती है क्योंकि जब तक आपका देह रूपी पात्र आपका साफ नहीं होगा चाहे उसमें कितने ही पोस्टिक और महंगे महंगे फल फ्रूट ड्राई फ्रूट अखरोट बादाम ही क्यों ना आप सेवन करें पर सब कचड़ा मैं डालेंगे तो कचरा ही बनेगा और कोई परिणाम नहीं आएगा आइए जानते हैं इस कचरे को साफ करने का तरीका
पेट के आंतरिक भागों की सफाई – एनीमा
जो लोग अभी तक सफाई का अर्थ नहाना, धोना आदि बाहरी सफाई ही समझते हैं वे बड़े भ्रम में हैं। शरीर के ऊपर का मैल तो हमको दिखाई ही पड़ता है और इसलिए हमारा ध्यान बार−बार उसकी ओर जाता रहता है और हम उसे साफ कर ही डालते हैं। पर भीतरी गन्दगी आँखों से दिखाई नहीं देती उसे केवल अनुभव से या लक्षणों से जाना जाता है। इसलिए अनेक लोगों का ध्यान उस तरफ नहीं जाता। पर कुछ भी हो वह गन्दगी अधिक हानि पहुँचाने वाली होती है और धीरे−धीरे हमारे समस्त शरीर को मल से भर देती है। यही मल सब प्रकार के रोगों तथा अस्वस्थता का कारण होता है और जो लोग बीमारी और कमजोरी को दूर करना चाहते हैं उनका सबसे पहला कर्तव्य इस मल की सफाई कर डालना ही है। शरीर की इस अवस्था की तुलना हम उस नाली के साथ कर सकते हैं जो कीचड़ रुक जाने से सड़ रही हो और दुर्गन्ध फैला रही हो। बहुत से लोग ऐसी नाली में फिनाइल आदि डालकर उसकी बदबू को रोकने की कोशिश करते हैं पर यह उपाय टिकाऊ नहीं होता। दूसरे ही दिन फिर पहले से अधिक बदबू आने लगती है। तब अन्त में यही करना पड़ता है कि एक बार नाली में जमें हुए कीचड़ को पूरी तरह निकाल दिया जाय और फिर उसे साफ पानी से धो डाला जाये । ठीक इसी प्रकार छोटी और बड़ी आँतों में इकट्ठा होकर हमारे जो मल शरीर को अस्वस्थ बनाता है जब तक एक बार उसकी पूरी सफाई नहीं की जायेगी तब तक रोग की जड़ कटना सम्भव नहीं है। जुलाब की हानियाँ अनेक व्यक्ति इस मल को निकालने के लिये जुलाब या दस्तावर दवाओं का सहारा लेते हैं। पर सड़ा हुआ मल, गाँठें, सुद्दे, कृमि, विकृत वायु आदि जो तरह−तरह के विकार बड़ी आँत में जमा रहते हैं वे इन दस्तों की औषधियों से बहुत कम निकल पाते हैं। दस्तावर औषधियाँ जब पेट में पहुँचती हैं तो तीक्ष्णता के कारण आमाशय में पाचन रसों का स्राव होने लगता है। इस रस के साथ आधा पचा हुआ भोजन बह कर नीचे की तरफ चला जाता है। औषधि की बहुत शक्ति तो इस आमाशय में ही खर्च हो जाती है, जो थोड़ी बहुत बचती है उसके द्वारा छोटी आँतों से रस निचुड़ता है। इस प्रकार कच्चा मल पतला होकर दस्त के रूप में निकल जाता है। दस्तावर दवा का असर छोटी आँतों में खत्म हो जाता है और बड़ी आँत में उपस्थित विकार ज्यों के त्यों बने रहते हैं। पुराने दोष जो बड़ी आँतों में थे वे जैसे के तैसे रहे केवल आमाशय और छोटी आँतों का कच्चा मल निकल गया। ऐसे दस्तों से सफाई का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं होता। इसके अतिरिक्त दवा की गर्मी, जलन तथा आमाशय के कीमती रस के दस्त के साथ बहने से पेट में कमजोरी आ जाती है ये दोनों ही बातें स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकर हैं, और इसलिए इस जुलाब की प्रणाली में लाभ की अपेक्षा हानि अधिक है। दस्तावर दवाएँ प्रायः अत्यन्त उष्ण और विषाक्त भी होती हैं, वे यदि दस्त लाने के बजाय शरीर में पच जायँ तो खून खराबी, कोढ़ भयंकर व्रण आदि उत्पन्न कर देती हैं। यही कारण है कि कभी−कभी जुलाब के बाद बहुत दिन तक बड़ी गर्मी और बेचैनी का अनुभव होता रहता है, और कई छोटे−बड़े रोग उत्पन्न हो जाते हैं। एनीमा कैसे लिया जाय इस दृष्टि से मलाशय को साफ करने के लिये एनीमा का प्रयोग सबसे अच्छा है। एनीमा का साधारण सा यंत्र हर नगर के बाजार में मिल सकता है। चीनी के लम्बे से डिब्बे में 4-5 फीट लम्बी रबड़ की नली लगी रहती है जिसके दूसरे सिरे पर प्लास्टिक की एक टोंटी फिट कर दी जाती है। डिब्बे में सेर−डेढ़ सेर मामूली ठंडा या जरा गुन−गुना पानी जिसका तापक्रम शरीर के समान हो, भर दिया जाता है। जब टोंटी को खोला जाता है तो पानी नल की तरह बाहर निकलने लगता है। पानी सादा होना ही ठीक है। अगर मिल सके तो उसमें एक नींबू का रस मिला दिया जाय जिससे उसका असर कुछ बढ़ जाता है। विशेष अवस्थाओं में थोड़ा नमक या नीम का पानी या प्याज का रस आदि भी निकाला जाता है। एनीमा लेते समय जमीन पर चटाई बिछाकर दाँयी करवट लेट जाना चाहिये। एनीमा के बर्तन को बगल में लगभग तीन फीट की ऊँचाई पर टाँग देना चाहिये। टोंटी के सिरे पर जरा सा−तेल मलकर गुदा−मार्ग में एक इंच प्रवेश कर लीजिये और टोंटी को खोल दीजिये। धीरे−धीरे समस्त पानी मलाशय में चला जायेगा। इस समय पेट को धीरे−धीरे मलते भी रहिये जिससे मल के छूटने में सहायता मिले। आरंभ में पानी जाने पर पेट में दर्द−सा जान पड़ता है और तुरन्त ही टट्टी की इच्छा होती है। अगर ये बातें साधारण हों तो सहन करके पानी लेते जाना चाहिये और यदि ज्यादा दर्द जान पड़े तो टोंटी बन्द करके पानी चढ़ना रोक देना चाहिये। कुछ देर बाद जब दर्द बन्द हो जाय तो फिर टोंटी खोलकर पानी चढ़ाना चाहिये। अगर इस प्रकार कई बार पानी बन्द करना पड़े तो कोई हर्ज की बात नहीं है। अगर पानी जाना शुरू होने के थोड़ी देर बाद ही मल त्याग की अत्यन्त तीव्र इच्छा हो तो उसी समय उठकर मल त्याग करना चाहिये और दस−पाँच मिनट बाद फिर पूरा जल भर कर एनीमा लेना चाहिये। जब पूरा पानी चला जाय तो टोंटी को बाहर निकाल कर 15-20 मिनट तक सीधे और दाँयी−बाँयी करवट से लेटना चाहिये और पेट को थोड़ा-थोड़ा फुलाते और सिकोड़ते रहना चाहिए जिससे पानी हिलकर मल को घुला सके। जब मल त्याग की इच्छा काफी तीव्र हो तो मल−त्याग को चले जायें। इसलिये एनीमा का प्रयोग शौचस्थान के समीप ही करना उचित होता है। इसके लिये सुबह या शाम का समय अधिक ठीक रहता है। एनीमा लेने के लिये पहले मामूली ढंग से शौच हो आना उचित है। एनीमा विधि की प्राचीनता एनीमा की यह प्रणाली कोई नई बात नहीं है। हमारे यहाँ के अति प्राचीन ऋषि मुनि और योगी लोग भी इसी प्रकार की “वस्ति−क्रिया” से गुदा−मार्ग में पानी चढाकर मलाशय की सफाई किया करते थे। वे जल में बैठकर पेट की नसों को चला कर पिचकारी की तरह पानी खींच लेते थे। यह विधि अधिक लाभदायक और दोष रहित है और अब भी योगाभ्यासी इस तरह पानी चढ़ाया करते हैं। पर साधारण लोगों के लिये इसका अभ्यास कर सकना कठिन है। वह कार्य एनीमा द्वारा सहज में हो जाता है। इसमें कोई कठिनाई या खतरा नहीं है और हर एक मामूली समझ का आदमी इसे कर सकता है। यह क्रिया हर एक मौसम में और अस्वस्थ तथा स्वस्थ दशा में बिना किसी आशंका के प्रयोग में लाई जा सकती है। केवल एक दिन एनीमा लेने से सफाई नहीं हो सकती। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये इसे एक सप्ताह तक तो नियमित रूप से लगाना ही चाहिए। फिर सप्ताह में तीन बार और फिर दो बार लगाकर छोड़ा जा सकता है। कठिन और पुराने रोगों में महीने, दो महीने तक भी लगातार एनीमा लगानी पड़ती है। पेट में जमा हुआ, आँतों में चिपका हुआ, सूखा, सड़ा मल, मल की गाँठें सुद्दे धीरे−धीरे निकलते हैं। नींबू का पानी उन्हें फुलाता है, छुड़ाता है, खुरचता है, कुरेदता है तब कहीं उनका निकलना आरम्भ होता है। देखने में आता है कि जब दो चार दिन एनीमा ले चुके होते हैं तब काला−काला बदबूदार मल बाहर निकलता है। साधारण अवस्था में भी पेट की ठीक तरह से सफाई होने में कम से कम एक सप्ताह तो लगता ही है। जब तक खराब, पुराना मल निकलता रहे तब तक एनीमा लेना जारी रखना आवश्यक है। एनीमा द्वारा शरीर की सफाई का कार्य तब तक ठीक तरह पूरा नहीं होता जब तक साथ में कुछ उपवास भी न किया जाय। दो−तीन दिन का उपवास तो सभी को करना चाहिये। उपवास के समय पानी खूब पीना चाहिये और दिन में दो−चार बार पानी, शहद तथा नींबू मिलाकर भी पानी चाहिए। इन दिनों साधारण परिश्रम करना, कुछ टहलना तो आवश्यक है पर अधिक परिश्रम का कोई काम करना न चाहिए। ज्यादा काम करने से शरीर की शक्ति उसमें लग जाती है और सफाई के काम में कमी पड़ जाती है। इसलिये उस समय शरीर की पूरी शक्ति को जहाँ तक सम्भव हो मल के निकालने और अंगों को ठीक करने में ही लगाना चाहिये। अजय कर्मयोगी
बुधवार, 6 नवंबर 2019
भारतीय गोवंश की ऐसी दुर्दशा का कौन जिम्मेदार
मैं #सांड हूं ,लोग कहते हैं कि मैं तुम्हारी फसल उजाड़ रहा हूँ ,सड़कों पर कब्जा कर रहा हूँ ,मैं तुम मनुष्यों से पूंछता हूँ कि कितने कम समय में मैं इतना अराजक हो गया ! मैं मनुष्यों का दुश्मन कैसे बन गया । अभी कुछ सालों पहले तो लोग मुझे पालते थे ,चारा देते थे मेरे जन्म पर बधाइयां गाई जाती थी और घर में एक पुत्र की तरह मैं सम्मानित था लेकिन मनुष्य ज्यादा सभ्य हो गया ट्रैक्टर ले आया ,पम्पिंग सेट से पानी निकालने लगा और मुझे खुला छोड़ दिया ,मैं कहाँ जाता ?कहाँ चरता ?मनुष्य ने चरागाहों पर कब्जा कर लिया ,अब पापी पेट का सवाल है अपने पेट के लिए अपने मित्र मनुष्य से संघर्ष शुरू हो गया । यहां तक कि कुछ लोगों ने अपना पेट भरने के लिए मुझे काटना भी शुरू कर दिया ,मैं फिर भी चुप रहा ,चलो किसी काम तो आया तुम्हारे। मेरी माँ ने मेरे हिस्से का दूध देकर तुम्हे और तुम्हारे बच्चों को पाला लेकिन अब तो तुमने उसे भी खुला छोड़ दिया । इधर पिछले सालों से कई मनुष्य मित्रों ने मुझे कटने से बचाने के लिए अभियान चलाया ,लेकिन जब मैं अपना पेट भरने गलती से उनकी फसल खा गया तो वही मित्र मुझे बर्बादी का कारण बताने लगे ,शायद अब यही चाहते हैं कि मैं काट ही दिया जाता । मित्र बस इतना कहना चाहता हूं कि मैं तुम्हारी जीवन भर सेवा करूंगा तुम्हारे घर के सामने बंधा रहूँगा ,थोड़े से चारे के बदले तुम्हारे खेत जोत दूंगा ,रहट से पानी निकाल दूंगा ,गाड़ी से सामान ढो दूंगा ,बस मुझे अपना लो लेकिन क्या मेरे इस निवेदन का तुम पर कोई असर होगा ? अरे तुम लोग तो अपने लाचार मां बाप को भी घर से बाहर निकाल देते हो ,फिर मेरी क्या औकात ?😥😥 #जेहि दिन धरा धेनु विन होइ #तेहि दिन धरा रसातल होई
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