अंग्रेजो द्वारा किया गया नरसंहार जलियॉवाला बाग कांड से भी भयंकर रक्तपात आजाद भारत में चुने हुए सरकारों के द्वारा किया गया । वही इतने बड़े नरसंहार को और इतने बड़े आंदोलन को लीपापोती व हजम करके पचा दिया गया और आज के नोजवान पीढ़ी को भनक भी नहीं लगने पा रही है। इस आधुनिक शिक्षा और बिकाऊ,बनावटी पालतू इतिहासकार और पत्तल कारों के द्वारा इतना संगठित और श्रेष्ठ आंदोलन ना भूतो न भविष्यति को इस संगठित गिरोह के द्वारा मटियामेट कर दिया गया।इतना बड़ा आंदोलन मात्र 50 साल में सन्नाटा बिरानी छाई हुई है वहीं पार्टियों के सभाएं इस करो़ना काल में भी गुलजार हो रही हैं और गौ हत्या प्रतिबंध का कानून आज तक नहीं बन पाया कई सरकारें आई और गई धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज के दिए गए श्राप से गांधी खानदान के कई लोगों के चिथड़े उड़ चुके हैं और कई की सरकार भी चली गई और कई pm घिसटते घिसटते जिंदगी के नरक भोग कर मर गए पर यह गौरक्षा का यक्ष प्रश्न आज भी हमारे सामने एक चुनौती बनकर के खड़ा है आने वाली सरकारों को भी यह एक विशेष चुनौती है
७ नवंबर की कहानी – आचार्य रामरंग (एक प्रत्यक्षदर्शी) की जुबानी आज भी याद है वो मंजर जब गौरक्षा के लिए सुबह से ही संसद के बाहर लोग जुटने लगे थे। 7 नवम्बर 1966 को सुबह आठ बजे से ही लोग जुटना शुरू हो गए थे। गोरक्षा महाभियान समिति के संचालक व सनातनी करपात्री जी महाराज ने चांदनी चौक स्थित आर्य समाज मंदिर से अपना सत्याग्रह आरंभ किया। पूरी घटना के गवाह आचार्य सोहनलाल रामरंग के अनुसार, ”यह हिंदू समाज के लिए सबसे बड़ा ऐतिहासिक दिन था। नई दिल्ली का पूरा इलाका लोगों की भीड़ से भरा था। संसद गेट से लेकर चांदनी चैक तक सिर ही सिर दिखाई दे रहे थे। कम से कम 10 लाख लोगों की भीड़ जुटी थी, जिसमें 10 से 20 हजार तो केवल महिलाएं ही शामिल थीं। जम्मू-कश्मीर से लेकर केरल तक के लोग गोहत्या बंद कराने के लिए कानून बनाने की मांग लेकर संसद के समक्ष जुटे थे। गौहत्या रोकने के लिए इंदिरा सरकार केवल आश्वासन ही दे रही थी, ठोस कदम कुछ भी नहीं उठा रही थी। सरकार के झूठे वादे से तंग आकर संत समाज ने संसद के बाहर प्रदर्शन करने का निर्णय लिया था।”
रामरंग जी के अनुसार, ”दोपहर एक बजे जुलूस संसद भवन पर पहुंच गया और संत समाज के संबोधन का सिलसिला शुरू हुआ। करीब तीन बजे https://ajaykarmyogi1.blogspot.com/2020/11/50.html?m=1
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”बड़ी त्रासदी हो गई थी और सरकार के लिए इसे दबाना जरूरी था। ट्रक बुलाकर मृत, घायल, जिंदा-सभी को उसमें ठूंसा जाने लगा। जिन घायलों के बचने की संभावना थी, उनकी भी ट्रक में लाशों के नीचे दबकर मौत हो गई। हमें आखिरी समय तक पता ही नहीं चला कि सरकार ने उन लाशों को कहां ले जाकर फूंक डाला या जमीन में दबा डाला। पूरे शहर में कफ्र्यू लागू कर दिया गया और संतों को तिहाड़ जेल में ठूंस दिया गया। केवल शंकराचार्य को छोड़ कर अन्य सभी संतों को तिहाड़ जेल में डाल दिया गया। करपात्री जी महाराज ने जेल से ही सत्याग्रह शुरू कर दिया। जेल उनके ओजस्वी भाषणों से गूंजने लगा। उस समय जेल में करीब 50 हजार लोगों को ठूंसा गया था।”
रामरंग जी के अनुसार, ”शहर की टेलिफोन लाइन काट दी गई। 8 नवंबर की रात मुझे भी घर से उठा कर तिहाड़ जेल पहुंचा दिया गया। नागा साधु छत के नीचे नहीं रहते, इसलिए उन्होंने तिहाड़ जेल के अदंर रहने की जगह आंगन में ही रहने की जिद की, लेकिन ठंड बहुत थी। नागा साधुओं ने जेल का गेट, फर्निचर आदि को तोड़ कर जलाना शुरू किया। उधर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गुलजारीलाल नंदा पर इस पूरे गोलीकांड की जिम्मेवारी डालते हुए उनका इस्तीफा ले लिया। गुलजारीलाल नंदा उस वक्त गृहमंत्री के पद पर आसीन थे।
गुलजारीलाल नंदा गौहत्या क़ानून के पक्ष में थे जिसके बाद उन्हें उनके पद से निष्कासित कर दिया और मंत्रिमंडल में कहीं भी जगह नहीं दी गयी, तत्कालीन महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री व चीन से हार के बाद देश के रक्षा मंत्री बने यशवंत राव बलवतंराव चैहान को गृहमंत्री बना दिया गया। तिहाड़ जेल में नागा साधुओं के उत्पाद की खबर सुनकर गृहमंत्री यशवंत राव बलवतंराव चैहान खुद जेल आए और उन्होंने नागा साधुओं को आश्वासन दिया कि उनके अलाव के लिए लकड़ी का इंतजाम किया जा रहा है। लकड़ी से भरे ट्रक जेल के अंदर पहुंचने और अलाव की व्यवस्था होने पर ही नागा साधु शांत हुए।” बाद में सरकार ने इस पूरे घटनाक्रम को एक तरह से दबा दिया ।









