सोमवार, 9 नवंबर 2020

मनुष्य को निर्वीज नष्ट भ्रष्ट कर समाप्त करने की तैयारी पशुओं पौधों की परीक्षण पूर्ण इस GM टेक्नोलॉजी से

 


 


 
यह करवा रहे हैं वैज्ञानिक जो कभी इन जानवरों ने भी करना नहीं चाहा, #भगवान बनना चाहता है #इंसान।।
यह सिंह (टाइगर) और बब्बर शेर का वर्ण सङ्कर बच्चा है, इसे #Tigon कहते हैं, यह न शिकार कर सकता है न अपना शरीर संभाल सकता है।
दुनिया के 2 सर्वश्रेष्ठ शिकारियों का वर्ण संकर भी किसी काम का नहीं है।
#प्रकृति के कानूनों में छेड़ छाड़ दुनिया तबाह कर रही है।।
  आईवीएफ नामक व्यापार जो अरबों खरबो का होता जा रहा है। जल्दी ही क्रिकेट को स्पॉन्सर करते हुए दिख गए तो समझ जाना की षड्यंत्र सफल हुआ। जैसे खेतों के लिए अब बीज से बीज नहीं होते वैसे ही अब इंसानो से बच्चे नहीं होंगे। बीज बाज़ार से लाने पड़ते हैं तो बच्चे भी बाज़ार से लाने पड़ेंगे।
कृत्रिम बच्चे।
इन का लक्ष्य है 2050 तक सब बच्चे ऐसे ही पैदा हो। एकता तुषार शाहरुख़ करण इस के सेल्स और मार्केटिंग वाले है। ये सब थोड़ा और मेहनत कर रहे हैं जाति, परिवार ,गोत्र,कुल  सब नष्ट करने की योजना है भारत से परिवार प्रथा ख़त्म करो विवाह प्रथा पर भी कुठाराघात किया जा रहा है। एक तीर दो निशाने भारत की संस्कृति मिटाओ और आईवीएफ़ से पैसा कमाओ। बीज बो रहे हैं ये एक भ्रष्ट समाज और परिवार का।        अब चाहे आपकी पूर्वजों के साथ कितना भी अत्याचार हुआ हो चाहे आपकी कोई भी संस्कृति रही हो या आपके खानदान और उनकी कोई भी मर्यादा रही हो चाहे नीचे दिए गए वीडियो में चाहे कितना भी राजीव दीक्षित कितना भी चिल्लाऐं  अब कोई लड़ने वाला नया नौजवान पैदा ही नहीं होगा अभी बीज ही नष्ट हो जाए उनकी योजना का यह मूल प्रयास है क्योंकि हो सकता है अगर बीज है तो कोई गुरु कोई अब इस बीज बचाने में केवल श्रेष्ठ गुरुकुल ज्ञान गाय और गांव से ही इन षड्यंत्रों से बचा जा सकता है अब एक ही समाधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान
केवल श्रेष्ठ बौद्धिक विचार से युक्त कर्मशील ही संपर्क करें
गुरुकुल की व्यवस्था के लिए whatsapp संपर्क 9336919081 कॉल  7984113987 इसका फोटो स्टेटस में देखें


  जितेंद्र को जानते हो?
वो ही ताकि ताकि ........ताकिताकि ताकि रे जब से तू आँख में झाँकी रे। बहुत ही हारामी चीज है। इस की ममेरी बहन ने इस पर बलटकार का आरोप लगाया । बलटकार 1971 में हुआ था और FIR 2018 में करी। असल में बलटकार हुआ ही नहीं था ये तो metoo की स्क्रिप्ट थी। चुनाव नहीं आते तो अब तक क़ानून बन गया होता। केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी फूल मूड में थी जनसुनवाई की, कमेटी और क़ानून बनाने की तैयारी थी। कोई नहीं चुनाव के बाद हो जाएगा। जितेंद्र की ममेरी बहन को पैसा मिला होगा अच्छा ख़ासा बलटकार की कहानी के लिए। पैसा बड़ी चीज़ है।
जितेंद्र का एक बेटा है तुषार कपूर ए ओ आई ओ मा अ अ चो..... ऐसी औलाद को जन्म भर बैठ कर खिलाना पड़ता है।
ऐसी ही एक बेटी है एकता कपूर, जैसा भाई वैसी बहन। अब जीने के लिए पैसा तो चाहिए ही। जितेंद्र को भी उस के बेटे और बेटी को भी।
यहाँ ये बिक गए। काम मिला भारत को बर्बाद करने का। भारत माता को बेचने का। एकता निर्माता बनी सास बहु सीरियल की। कम्पनी का नाम रखा बालाजी टेली फ़िल्म। बाला जी मतलब आप जानते ही हो। ये सब से ज़्यादा वेतन लेने वाली CEO भी बनी, इस की कम्पनी से जितेंद्र को भी 5 करोड़ वेतन मिलता था तो इतना ही इस की माँ को भी भाई को भी। उस के अलावा मुनाफ़ा अलग से। हज़ार करोड़ की कम्पनी बन गयी।
ज़्यादा तो नहीं पता मगर विस्तारवादी नीति के तहत इस ने बहुत से प्रोडक्सन हाउस ख़रीदे बहुत से मतलब बहुत से। सास भी कभी बहु थी के समय से जनता हूँ मैं इस के अलावा कुछ नहीं देखा। स्टार टीवी पर आता था और स्टार टीवी जिस के साथ उस को नाम शौहरत दौलत की क्या कमी। होते होते इस ने स्टार टीवी के शेयर भी ख़रीद लिए। बहुत जल्दी सफलता मिलती गयी। 2017 में रीलाइंस ने इस से हाथ मिलाया डील हुयी कुछ 400-500 करोड़ में।
तुषार कपूर ने शादी नहीं की, फिर भी जितेंद्र और उस की बीवी शोभा दादा दादी बन गए। तुषार का बेटा हुआ था। उस का अपना ख़ून। किराए की कोख से। घर में बच्चे की किलकारियाँ गूँज उठी।
27 जनवरी को जितेंद्र और उस की बीवी शोभा नाना नानी बन गए। बिना दामाद के। किराए की कोख भी ली और विकी डोनर से स्पर्म भी लिए। घर में फिर बच्चे की किलकारियाँ गूँज उठी।

ये है “कहानी घर घर की” । (थोड़े दिन पहले ये सब हिजड़े मोदी जी से मिले थे।)
ऐसा ही शाहरुख़ खान ने किया तो करण जौहर ने भी किया। उस ही कड़ी में तुषार और एकता भी जुड़े।

रवीना टंडन ने 2 लड़कियाँ गोद ली। वहीं सुष्मिता सेन ने शादी नहीं की उस ने भी 2 लड़कियाँ गोद ली। सलमान खान की माँ हेलन ने एक लड़की गोद ली। सुभाष घई ने तो मिथुन ने भी एक बच्ची गोद ली। पहले ये चलता था। तब अनाथ बच्चों को गोद लेते थे।

मगर ये नया ट्रेंड चल पड़ा। किराए का गर्भ या स्पर्म ख़रीद का लड़का पैदा करो। जल्दी ही ये आम हो जाएगा। आज कल की भाग दौड़ भरी लाइफ़, काम का, कैरियर का लोड, स्ट्रेस ........जिस कारण अब दंपत्तियों के बच्चे नहीं हो रहे। इलाज करवाते हैं कम से कम 2 से 3 साल इलाज चलता है। असल में इलाज नहीं चलता ये ब्लाकिज किया जाता है। 4 - 5 लाख का ख़र्चा हो जाता है। फिर बोला जाता है की कनसिव नहीं हो रहा। आपको कृत्रिम प्रक्रिया करवानी होगी। ख़र्चा 4 से 5 लाख। तब दवाइयाँ बंद।

फिर किसी और के अंडाशय से अंडे तो किसी और के शुक्राणुओं को मिला कर तैयार किया जाता है मोटा ताज़ा लड़का।
ये है आईवीएफ नामक व्यापार जो अरबों खरबो का होता जा रहा है। जल्दी ही क्रिकेट को स्पॉन्सर करते हुए दिख गए तो समझ जाना की षड्यंत्र सफल हुआ। जैसे खेतों के लिए अब बीज से बीज नहीं होते वैसे ही अब इंसानो से बच्चे नहीं होंगे। बीज बाज़ार से लाने पड़ते हैं तो बच्चे भी बाज़ार से लाने पड़ेंगे।
कृत्रिम बच्चे।
इन का लक्ष्य है 2050 तक सब बच्चे ऐसे ही पैदा हो। एकता तुषार शाहरुख़ करण इस के सेल्स और मार्केटिंग वाले है। ये सब थोड़ा और मेहनत कर रहे हैं भारत से परिवार प्रथा ख़त्म करो विवाह प्रथा पर भी कुठाराघात किया जा रहा है। एक तीर दो निशाने भारत की संस्कृति मिटाओ और आईवीएफ़ से पैसा कमाओ। बीज बो रहे हैं ये एक भ्रष्ट समाज और परिवार का।        अब चाहे आपकी पूर्वजों के साथ कितना भी अत्याचार हुआ हो चाहे आपकी कोई भी संस्कृति रही हो या आपके खानदान और उनकी कोई भी मर्यादा रही हो चाहे नीचे दिए गए वीडियो में चाहे कितना भी राजीव दीक्षित कितना भी चिल्लाऐं  अब कोई लड़ने वाला नया नौजवान पैदा ही नहीं होगा अभी बीज ही नष्ट हो जाए उनकी योजना का यह मूल प्रयास है क्योंकि हो सकता है अगर बीज है तो कोई गुरु कोई गुरुकुल उनमें भाव पैदा कर सकता है अब जब भेज ही नहीं होगा तो कोई भी गुरुकुल कोई भी गुरु कोई भी श्रेष्ठ महा मानव का कोई प्रभाव नहीं होगा आप चिल्लपों मचाते रहिए बचाओ बचाओ करते रहिए

 


शनिवार, 7 नवंबर 2020

गौरक्षा के प्रश्न पर मात्र 50 साल के बाद इतना सन्नाटा क्यों

 


अंग्रेजो द्वारा किया गया नरसंहार जलियॉवाला बाग कांड से भी भयंकर रक्तपात आजाद भारत में चुने हुए सरकारों के द्वारा किया गया । वही इतने बड़े नरसंहार को और इतने बड़े आंदोलन को लीपापोती व हजम करके पचा दिया गया और आज के नोजवान पीढ़ी को भनक भी नहीं लगने पा रही है। इस आधुनिक शिक्षा और  बिकाऊ,बनावटी पालतू इतिहासकार और पत्तल कारों के द्वारा इतना संगठित और श्रेष्ठ आंदोलन ना भूतो न भविष्यति को इस संगठित गिरोह के द्वारा मटियामेट कर दिया गया।इतना बड़ा आंदोलन मात्र 50 साल में सन्नाटा बिरानी छाई हुई है वहीं पार्टियों के सभाएं इस करो़ना काल में भी गुलजार हो रही हैं और गौ हत्या प्रतिबंध का कानून आज तक नहीं बन पाया कई सरकारें आई और गई धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज के दिए गए श्राप से गांधी खानदान के कई लोगों के चिथड़े उड़ चुके हैं और कई की सरकार भी चली गई और कई pm घिसटते घिसटते जिंदगी के नरक भोग कर मर  गए पर यह गौरक्षा का यक्ष प्रश्न आज भी हमारे सामने एक चुनौती बनकर के खड़ा है आने वाली सरकारों को भी यह एक विशेष चुनौती है
७ नवंबर की कहानी – आचार्य रामरंग (एक प्रत्यक्षदर्शी) की जुबानी     आज भी याद है वो मंजर जब गौरक्षा के लिए सुबह से ही संसद के बाहर लोग जुटने लगे थे। 7 नवम्बर 1966 को सुबह आठ बजे से ही लोग जुटना शुरू हो गए थे। गोरक्षा महाभियान समिति के संचालक व सनातनी करपात्री जी महाराज ने चांदनी चौक स्थित आर्य समाज मंदिर से अपना सत्याग्रह आरंभ किया। पूरी घटना के गवाह आचार्य सोहनलाल रामरंग के अनुसार, ”यह हिंदू समाज के लिए सबसे बड़ा ऐतिहासिक दिन था। नई दिल्ली का पूरा इलाका लोगों की भीड़ से भरा था। संसद गेट से लेकर चांदनी चैक तक सिर ही सिर दिखाई दे रहे थे। कम से कम 10 लाख लोगों की भीड़ जुटी थी, जिसमें 10 से 20 हजार तो केवल महिलाएं ही शामिल थीं। जम्मू-कश्मीर से लेकर केरल तक के लोग गोहत्या बंद कराने के लिए कानून बनाने की मांग लेकर संसद के समक्ष जुटे थे। गौहत्या रोकने के लिए इंदिरा सरकार केवल आश्वासन ही दे रही थी, ठोस कदम कुछ भी नहीं उठा रही थी। सरकार के झूठे वादे से तंग आकर संत समाज ने संसद के बाहर प्रदर्शन करने का निर्णय लिया था।”
रामरंग जी के अनुसार, ”दोपहर एक बजे जुलूस संसद भवन पर पहुंच गया और संत समाज के संबोधन का सिलसिला शुरू हुआ। करीब तीन बजे  https://ajaykarmyogi1.blogspot.com/2020/11/50.html?m=1

अब एक ही के समाधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान इस गाय गांव गुरुकुल की व्यवस्था के लिए whatsapp संपर्क 9336919081 कॉल  7984113987

 करीब तीन बजे का समय होगा, जब आर्य समाज के स्वामी रामेश्वरानंद भाषण देने के लिए खड़े हुए। स्वामी रामेश्वरानंद ने कहा, ‘यह सरकार बहरी है। यह गो हत्या को रोकने के लिए कोई भी ठोस कदम नहीं उठाएगी। इसे झकझोरना होगा। मैं यहां उपस्थित सभी लोगों से आह्वान करता हूं कि सभी संसद के अंदर घुस जाओ और सारे सांसदों को खींच-खींच कर बाहर ले आओ, तभी गो हत्या बंदी कानून बन सकेगा।’
    ”इतना सुनना था कि नौजवान संसद भवन की दीवार फांद-फांद कर अंदर घुसने लगे। लोगों ने संसद भवन को घेर लिया और दरवाजा तोड़ने के लिए आगे बढ़े। पुलिसकर्मी पहले से ही लाठी-बंदूक के साथ तैनात थे। पुलिस ने लाठी और अश्रुगैस चलाना शुरू कर दिया। भीड़ और आक्रामक हो गई। इतने में अंदर से गोली चलाने का आदेश हुआ और पुलिस ने भीड़ पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। संसद के सामने की पूरी सड़क खून से लाल हो गई। लोग मर रहे थे, एक-दूसरे के शरीर पर गिर रहे थे और पुलिस की गोलीबारी जारी थी। नहीं भी तो कम से कम, पांच हजार लोग उस गोलीबारी में मारे गए थे।”
    ”बड़ी त्रासदी हो गई थी और सरकार के लिए इसे दबाना जरूरी था। ट्रक बुलाकर मृत, घायल, जिंदा-सभी को उसमें ठूंसा जाने लगा। जिन घायलों के बचने की संभावना थी, उनकी भी ट्रक में लाशों के नीचे दबकर मौत हो गई। हमें आखिरी समय तक पता ही नहीं चला कि सरकार ने उन लाशों को कहां ले जाकर फूंक डाला या जमीन में दबा डाला। पूरे शहर में कफ्र्यू लागू कर दिया गया और संतों को तिहाड़ जेल में ठूंस दिया गया। केवल शंकराचार्य को छोड़ कर अन्य सभी संतों को तिहाड़ जेल में डाल दिया गया। करपात्री जी महाराज ने जेल से ही सत्याग्रह शुरू कर दिया। जेल उनके ओजस्वी भाषणों से गूंजने लगा। उस समय जेल में करीब 50 हजार लोगों को ठूंसा गया था।”
रामरंग जी के अनुसार, ”शहर की टेलिफोन लाइन काट दी गई। 8 नवंबर की रात मुझे भी घर से उठा कर तिहाड़ जेल पहुंचा दिया गया। नागा साधु छत के नीचे नहीं रहते, इसलिए उन्होंने तिहाड़ जेल के अदंर रहने की जगह आंगन में ही रहने की जिद की, लेकिन ठंड बहुत थी। नागा साधुओं ने जेल का गेट, फर्निचर आदि को तोड़ कर जलाना शुरू किया। उधर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गुलजारीलाल नंदा पर इस पूरे गोलीकांड की जिम्मेवारी डालते हुए उनका इस्तीफा ले लिया। गुलजारीलाल नंदा उस वक्त गृहमंत्री के पद पर आसीन थे।
    गुलजारीलाल नंदा गौहत्या क़ानून के पक्ष में थे जिसके बाद उन्हें उनके पद से निष्कासित कर दिया और मंत्रिमंडल में कहीं भी जगह नहीं दी गयी, तत्कालीन महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री व चीन से हार के बाद देश के रक्षा मंत्री बने यशवंत राव बलवतंराव चैहान को गृहमंत्री बना दिया गया। तिहाड़ जेल में नागा साधुओं के उत्पाद की खबर सुनकर गृहमंत्री यशवंत राव बलवतंराव चैहान खुद जेल आए और उन्होंने नागा साधुओं को आश्वासन दिया कि उनके अलाव के लिए लकड़ी का इंतजाम किया जा रहा है। लकड़ी से भरे ट्रक जेल के अंदर पहुंचने और अलाव की व्यवस्था होने पर ही नागा साधु शांत हुए।” बाद में सरकार ने इस पूरे घटनाक्रम को एक तरह से दबा दिया ।


शुक्रवार, 6 नवंबर 2020

कोटिल्य के 10 सूत्र से श्रेष्ठ और सुखी भारत की संकल्पना साकार हो सकती है जिसे बद्री प्रसाद टुलधरिया के देशिक शास्त्र भी प्रमाणित करता है

 






इस देश के एक मुख सन्यासी और संत चिंतक विचारक हिमालय वासी श्री बद्री प्रसाद टूलधरिया नी एक शास्त्र की रचना की जो भारत की श्रेष्ठ और सुखी भारत की संकल्पना साकार हो सकती है उसका नाम देशिक शास्त्र है इसमें समग्र चिंतन निहित है जिसे
 कौटिल्य ने मात्र 10 सूत्रों में सुखी राज्य के मूलमंत्र को वर्णित किया है।
लोग कहते आये हैं कि भारत केवल धर्म प्रधान देश था – उसका अर्थ इतिहासकारों समाजशास्त्रियों और अंग्रेजी काल में  उत्पन्न नकली धार्मिक समाजों ने पूजा पाठ और आत्म साक्षात्कार तक सीमित कर दिया।
जबकि धर्म का अर्थ था कर्तव्य - एकाउंटेबिलिटी, जिसकी डिमांड सदैव किसी विभीषिका के समय होती है।
स्वतंत्र भारत अधिकार प्रधान व्यवस्था को अपनाने को क्यो बाध्य हुआ ये भी विश्लेषण की विषय वस्तु है। अब यह बात चिंतकों विचारको समझ जानी चाहिए कि भारत ना केवल धर्म प्रधान बल्कि कर्म प्रधान भी था
दूसरी बात कौटिल्य सदैव राज्य को और उसके समस्त नागरिकों के सुख वैभव और कर्तव्य की बात करते हैं। व्यक्तिगत सुख उसी सामूहिक सुख का एक अंग मात्र था।
तीसरी बात निम्नलिखित मंत्र यद्यपि समस्त नागरिक समुदाय के लिए है, लेकिन राजा और राज्य कर्मचारियो के लिए अनिवार्य आवश्यकता थी।
10 मंत्र :
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कौटिल्य अर्थशास्त्र :
सुखस्य मूलं धर्म:
धर्मस्य मूलं अर्थः
अर्थस्य मूलं राज्यम्
राज्यस्य मूलं इन्द्रिय जयः
इन्द्रिय जयस्य मूलं विनयः
विनयस्य मूलं वृद्धोपसेवा
वृद्धोपसेवाया विज्ञानम्
विज्ञानेन आत्मनम् सम्पादयेत
संपादित आत्मा जितात्मा भवति
जितात्मा सर्व अर्थ इह संयुज्येत ।।
भावार्थ :
1- सुखस्य मूलं धर्म: : राज्य और प्रजा के सुख का मूल धर्म ( नीति या मानवोचित कर्तव्य) होता है।
2- धर्मश्य मूलं अर्थः : धर्म अर्थात नीतिमत्ता को सुरक्षित रखने में राज्यश्री का महत्वपूर्ण स्थान है। राजकोष भरा पूरा होना चाहिए।
3- अर्थस्य मूलं राज्यम् : : राज्य की स्थिरता और राज कर्मचारियों के कर्तव्य ही अर्थ का मूल है।
अर्थात् राज्यश्री तभी तक सुरक्षित रहेगी जब तक राजा और उसके अधिकारी कर्तव्यच्युत न हों।
4- राज्यस्य मूलं इन्द्रीयजय: : राज्य के मूल में इन्द्रिय निग्रह है। अर्थात् राज्य के राज्याधिकारियों की स्वेच्छाचारिता, विषय लोलुपता और स्वार्थ परायणता राज्य के लिए विष का कार्य करती है।
इंद्रियों पर विजय न पाने वाले राज्याधिकारी जनता को राज्य का शत्रु बना लेते है।
5- इंद्रियजयस्य मूलं विनयः : विनय ही इन्द्रिय जय का मुख्य साधन है।
अहंकार का परित्याग कर विनयी लोगों की संगति में सत्य असत्य का ज्ञान प्राप्त करने का विवेक उतपन्न होता है।
पात्र अपात्र परिचय, व्यवहार कुशलता, उचितज्ञता, न्याय अन्याय बोध, कार्य अकार्य विवेक (आनवीक्षकी) आदि सब विनय के व्यवहारिक रूप है।
विनयी मनुष्यो की इंद्रियाँ सदैव उसके वश में रहती हैं।
6- विनयस्य मूलं वृद्धोपसेवा: : ज्ञान वृद्धों की सेवा ही विनय का मूल है । मनुषय विद्या तपस्या और अनुभव से ही ज्ञान वृद्ध बनता है।
इन ज्ञान वृद्धों की योग्य परिचर्या करते हुए जिज्ञासु बने रहना वृद्ध सेवा कहलाती है।
विनय अर्थात् नैतिकता, नम्रता, उचितज्ञता, शासन कुशलता आदि गुणों को ज्ञान वृद्धों से राजा सीख सकता है, और राजा से यह विनय जनता सीख सकती है।
7- वृद्ध सेवाया विज्ञानम्: : विजिज्ञासु मनुष्य वृद्धों की सेवा से विवेक का ज्ञान होता है, अर्थात् कर्तव्य अकर्तव्य और व्यवहार कुशलता का भान होता है -
"न सा सभा यत्र न संति वृद्धा।
न ते वृद्धा ये न वदन्ति धर्मम।।
ना सौ धर्मो यत्र न सत्यं अस्ति।
न तत सत्यं यत छलेन अभ्युपेतम ।।
अर्थात् : वह सभा कोई सभा नही है जिसमे कोई अनुभवी ज्ञान वृद्ध न हो। वह वृद्ध वृद्ध नही है जो धर्म की बात न करे।।
वह धर्म धर्म नही है जो सत्यता की बात न करे।
और वह सत्य सत्य नही है जिसमे छल का मिश्रण होता है।
8- विज्ञानेन आत्मानम् सम्पादयेत: : राज्याधिकारी लोग विवेक से अपनी आत्मा को आलोकित कर अपने को योग्य शासक बनाएं।
9- संपादित आत्मा जितात्मा भवति: : नीति और विवेक से युक्त मनुष्य को संपादित आत्मा कहा गया है।
जितात्मा अर्थात् सुपरिष्कृत मन और इंद्रियों वाला व्यक्ति।
ऐसा व्यक्ति आत्म संयमित होता है।
10 -जितात्मा सर्व अर्थ इह संयुज्येत।।
जितात्मा नीतिवान लोग समस्त संपत्तियों से सम्पन्न होकर रहें।।
नोट - देखिए भारत का शेयर कौटिल्य के राजनीति के दर्शन से पिछले 2000 वर्ष की विश्व जीडीपी में 0 AD से तब तक लगभग एक तिहाई हिस्सेदारी बनी रही जब तक कि तुर्क मोघल डकैत नही आये थे।
0 AD से 1500 AD तक भारत का विश्व जीडीपी में 33 % हिस्सा।
अकबर महान के आने के बाद ये गिरकर 23% आ गया।
फिर आये आज के भारत के दलितों के माई बाप्स - गोरे ईसाई डकैत। उनके आने पर भारत विश्व की 23% जीडीपी का हिस्सेदार बचा था जो कि उनके जाते 1900 AD तक गिरकर मात्र 2% बची।
1809 - 13 में बिहार के गंगेटिक इलाके - भागलपुर , पटना-गया, पूर्णिया और और शाहाबाद की हैमिलटन बुचनन के अध्ययन और आकलन के आँकड़ों से, और 1901 की जनगणना के आँकड़ो के अध्ययन से पता चलता है क़ि मात्र एक शताब्दी में #प्रोडक्शन_इंडस्ट्री पर आधारित लोगों की संख्या में 50 प्रतिशत की कमी आई ।
अर्थात् 50 प्रतिशत लोग मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री से बाहर हो कर बेरोजगार हो गए ।
1809-13 के बीच कुल मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री पर आधारित जनसँख्या का, 62.3% जनसंख्या स्पिनिंग और वीविंग करती थी , जिसकी संख्या 1901 में घटकर मात्र 15.1% बची।
(बाकी सब बेरोजगार हो गए )
- अमिय कुमार बागची पेज 61 -63 ।
और मात्र डेढ़ शताब्दी पूर्व जो भारत विश्व के 25% जीडीपी का हिस्सेदार था, (जबाकि इंग्लैंड और अमेरिका विश्व जीडीपी के मात्र 2% के मालिक थे) 1900 आते आते भारत मात्र 2% जीडीपी का हिस्सेदार बचा।
कौन थे इस जीडीपी के निर्माता , और क्या हुअा उनका डेढ़ शताब्दियों में?
#पंडीजी तुम लोगों ने बहुत अत्याचार किया #ग्रन्थ लिख लिख कर ।
न तुम ग्रन्थ लिखते न ये लोग बेरोजगार होते।
1875 के आस पास भारत की जनसँख्या लगभग 22 करोड़ थी।
1875 -1900 के बीच करीब 2.5 से 5 करोड़ भारतीय अन्न न खरीद पाने के कारण भूख से मर गए।
अन्न कौन खरीदता है - जो पैदा नहीं करता है - Industrialist या मैन्युफैक्चरिंग करने वाले ही अन्न खरीदते हैं -किसान नही 

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2020

चंद्रमा करते हैं अमृत की बरसात आज शरद पूर्णिमा की रात व इन ऋतुओं में खाए जानेवालेे खाद्यान्न का प्रभाव


शरदपूर्णिमाा पर सभी को हार्दिक बधाई और मंगलकामनाएं ~~~
इस बार शरद पूर्णिमा कई दुर्लभ संयोगों एवं महत्‍वपूर्ण योग के साथ आ रही है। इस वर्ष शुक्रवार प्रदोष काल में निशा काल ( मध्य रात्रि) मे पूर्ण पूर्णिमा तिथि व्यापत होने से शरद पूर्णिमा का पर्व होगा। शनिवार को प्रदोष काल में पूर्णिमा तिथि है पर पर्व शुक्रवार को होगा। धर्माचार्यों के अनुसार इस बार शरद पूर्णिमा के योग में महालक्ष्मी जी का पूजन वैभवता का योग है। शुक्रवार को ही राजराजेश्वरी महालक्ष्मी जी का व इंद्र देव की पूजा करके रात्रि जागरण किया जाता है। इसे ही कोजागरी व्रत कहा जाता है।

जो लोग स्थिर लक्ष्मी व सुख समृद्धि वैभव की कामना करते हैं उन्हें शरद पूर्णिमा को महा लक्ष्मी जी का पूजन व इंद्र देव की पूजा पूर्ण शास्त्रोक्त क्रिया से करना चाहिए। सभी मनोकामनाएं को पूर्ण करने  हैतु
प्रदोष काल में पूजा करें। रात भर जागरण करें, पूजा पाठ अभिषेक अर्चना आरती करें। लक्ष्मी जी रात्रि मे पृथ्वी पर भ्रमण करती है जो जागरण करता है उसे स्थिर लक्ष्मी , सुख समृद्धि सौभाग्य संतान सुख का आशीर्वाद देती हैं।

आश्विन मास की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण जी गीता में कहते हैं ---
‘पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः।।
अर्थात रसस्वरूप अमृतमय चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण औषधियों को अर्थात वनस्पतियों को पुष्ट करता हूं।
रात्रि में चंद देव अपनी 16 कलाओं से पूर्ण होकर अमृत वर्षा करते हैं। वह वर्षा अमृत के रूप मे आपनी 16 कलाओं से परिपूर्ण होकर रोशनी से करते हैं।
शरद पूर्णिमा पर ~  मंदिर में ~ देवालयों मे ~ तीर्थ मे ~ पवित्र नदी के तटों पर ~ गोशाला में  घी या तिल तेल के 108  दीपक  जलाने चाहिए ।
आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को ‘शरद पूर्णिमा’ बोलते हैं । शरद पूर्णिमा की रात्रि पर चंद्रमा पृथ्वी के सबसे निकट होता है और अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण रहता है। इस रात्रि में चंद्रमा का ओज सबसे तेजवान और ऊर्जावान होता है। पृथ्वी पर शीतलता, पोषक शक्ति एवं शांतिरूपी अमृतवर्षा करता है । इस साल 30 अक्टूबर की रात में खीर बनाकर खानी है व 31 अक्टूबर को व्रत-पूजन करना है।
इस दिन रास-उत्सव और कोजागर व्रत किया जाता है । गोप बासीयों को शरद पूर्णिमा की रात्रि में भगवान श्रीकृष्ण ने  ईश्वरीय अमृत का पान कराया था ।
यूं तो हर माह में पूर्णिमा आती है, लेकिन शरद पूर्णिमा का महत्व उन सभी से कहीं अधिक है। हिंदू धर्म ग्रंथों में भी इस पूर्णिमा को विशेष बताया गया है।
 शरद पूर्णिमा से जुड़ी बातें....
ईस दिन चंद्रमा की किरणें विशेष अमृतमयी गुणों से युक्त रहती हैं, जो कई बीमारियों का नाश कर देती हैं। यही कारण है कि शरद पूर्णिमा की रात को लोग अपने घरों की छतों पर खीर रखते हैं, जिससे चंद्रमा की किरणें उस खीर के संपर्क में आती है, इसके बाद उसे खाया जाता है।
 नारद पुराण के अनुसार शरद पूर्णिमा की धवल चांदनी में मां लक्ष्मी अपने वाहन उल्लू पर सवार होकर अपने कर-कमलों में वर और अभय लिए निशिद काल में पृथ्वी पर भ्रमण करती है। माता यह देखती है कि कौन जाग रहा है?
यानी अपने कर्तव्‍यों को लेकर कौन जागृत है? जो इस रात में जागकर मां लक्ष्मी की उपासना करते हैं, मां उन पर असीम कृपा करती है।
वैज्ञानिक भी मानते हैं कि शरद पूर्णिमा की रात स्वास्थ्य व सकारात्मकता देने वाली मानी जाती है क्योंकि चंद्रमा धरती के बहुत समीप होता है। शरद पूर्णिमा की रात चन्द्रमा की किरणों में खास तरह के लवण व विटामिन आ जाते हैं। पृथ्वी के पास होने पर इसकी किरणें सीधे जब खाद्य पदार्थों पर पड़ती हैं तो उनकी क्वालिटी में बढ़ोतरी हो जाती है।
 शरद पूर्णिमा के शुभ अवसर पर सुबह उठकर व्रत करके अपने इष्ट देव का पूजन करना चाहिए। इन्द्र और महालक्ष्मी जी का पूजन करके घी का दीपक जलाकर, गंध पुष्प आदि से पूजन करना चाहिए। ब्राह्मणों को खीर का भोजन कराना चाहिए और उन्हें दान दक्षिणा प्रदान करनी चाहिए।
लक्ष्मी प्राप्ति के लिए इस व्रत को विशेष रूप से किया जाता है। कहा जाता है कि इस दिन जागरण करने वाले की धन-संपत्ति में वृद्धि होती है।
 शरद पूनम की रात को क्या करें, क्या न करें ?
 अश्विनी कुमार देवताओं के वैद्य हैं । जो भी इन्द्रियाँ शिथिल हो गयी हों, उनको पुष्ट करने के लिए चन्द्रमा की चाँदनी में खीर रखना और भगवान को भोग लगाकर अश्विनी कुमारों से प्रार्थना करना कि ‘हमारी इन्द्रियों का बल-ओज बढ़ायें ।’ फिर वह खीर खा लेना ।
इस रात सूई में धागा पिरोने का अभ्यास करने से नेत्रज्योति बढ़ती है ।
शरद पूर्णिमा की चन्द्रमा की चाँदनी गर्भवती महिला की नाभि पर पड़े तो गर्भ पुष्ट होता है ।
 अमावस्या और पूर्णिमा को चन्द्रमा के विशेष प्रभाव से समुद्र में ज्वार-भाटा आता है । जब चन्द्रमा इतने बड़े दिगम्बर समुद्र में उथल-पुथल कर विशेष कम्पायमान कर देता है तो हमारे शरीर में जो जलीय अंश है, सप्तधातुएँ हैं, सप्त रंग हैं, उन पर भी चन्द्रमा का प्रभाव पड़ता है । इन दिनों में अगर काम-विकार भोगा तो विकलांग संतान अथवा जानलेवा बीमारी हो जाती है और यदि उपवास, व्रत तथा सत्संग किया तो तन तंदुरुस्त, मन प्रसन्न होता है।
 खीर को बनायें अमृतमय प्रसाद...
खीर को रसराज कहते हैं । सीताजी को अशोक वाटिका में रखा गया था । रावण के घर का क्या खायेंगी सीताजी ! तो इन्द्रदेव उन्हें खीर भेजते थे ।
खीर बनाते समय घर में चाँदी का गिलास आदि जो बर्तन हो, आजकल जो मेटल (धातु) का बनाकर चाँदी के नाम से देते हैं वह नहीं, असली चाँदी के बर्तन अथवा असली सोना धोकर खीर में डाल दो तो उसमें रजतक्षार या सुवर्णक्षार आयेंगे । लोहे की कड़ाही अथवा पतीली में खीर बनाओ तो लौह तत्त्व भी उसमें आ जायेगा । खीर में इलायची, खजूर या छुहारा डाल सकते हो लेकिन बादाम, काजू, पिस्ता, चारोली ये रात को पचने में भारी पड़ेंगे । रात्रि 8 बजे महीन कपड़े से ढँककर चन्द्रमा की चाँदनी में रखी हुई खीर 11 बजे के बाद भगवान को भोग लगा के प्रसादरूप में खा लेनी चाहिए । लेकिन देर रात को खाते हैं इसलिए थोड़ी कम खाना । सुबह गर्म करके भी खा सकते हो ।
(खीर दूध, चावल, मिश्री, चाँदी, चन्द्रमा की चाँदनी - इन पंचश्वेतों से युक्त होती है, अतः सुबह बासी नहीं मानी जाती ।) यह खीर खाने से सालभर मनुष्य स्वथ्य रहता है ।
स्वास्थ्य प्रयोग...
इस रात्रि में 3-4 घंटे तक बदन पर चन्द्रमा की किरणों को अच्छी तरह पड़ने दें ।
दो पके सेवफल के टुकड़े करके शरद पूर्णिमा को रातभर चाँदनी में रखने से उनमें चन्द्रकिरणें और ओज के कण समा जाते हैं । सुबह खाली पेट सेवन करने से कुछ दिनों में स्वास्थ्य में आश्चर्यजनक लाभकारी परिवर्तन होते हैं ।
250 ग्राम दूध में 1-2 बादाम व 2-3 छुहारों के टुकड़े करके उबालें । फिर इस दूध को पतले सूती कपड़े से ढँककर चन्द्रमा की चाँदनी में 2-3 घंटे तक रख दें । यह दूध औषधीय गुणों से पुष्ट हो जायेगा । सुबह इस दूध को पी लें ।

सोंठ, काली मिर्च और लौंग डालकर उबाला हुआ दूध चाँदनी रात में 2-3 घंटे रखकर पीने से बार-बार जुकाम नहीं होता, सिरदर्द में लाभ होता है ।
तुलसी के 10-12 पत्ते एक कटोरी पानी में भिगोकर चाँदनी रात में 2-3 घंटे के लिए रख दें । फिर इन पत्तों को चबाकर खा लें व थोड़ा पानी पियें । बचे हुए पानी को छानकर एक-एक बूँद आँखों में डालें, नाभि में मलें तथा पैरों के तलुओं पर भी मलें । आँखों से धुँधला दिखना, बार-बार पानी आना आदि में इससे लाभ होता है । तुलसी के पानी की बूँदें चन्द्रकिरणों के संग मिलकर प्राकृतिक अमृत बन जाती हैं ।*
नोट : दूध व तुलसी के सेवन में दो घंटे का अंतर रखें ।
 भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, 'पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः।।'

अर्थात रसस्वरूप अमृतमय चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण औषधियों को अर्थात वनस्पतियों को पुष्ट करता हूं।(गीताः15.13)
फिर स्वास्थ्य कोई बाजार में मिलने वाली बाजारु वस्तु नहीं है जो आज के शहरों में समाहित मानसिक गुलाम जीवन भर की कमाई का झोला लटकाए इस हास्पिटल उस हॉस्पिटल और बड़े-बड़े फार्मेसी और डॉक्टर के चक्कर लगाते फिर रहे हैं 
 पर ऐसे गुलामों को यह आभास भी नहीं है कि आज अमृत की बरसा भी होती है  जो अंग्रेजी काल गणना में नहीं केवल अपने भारतीय काल गणना में ही संभव है जो शरद ऋतु में अश्विन पूर्णिमा की रात में ही यह अद्भुत संयोग का साक्षात्कार कर पूरे वर्ष भर की निरोगी जीवन को साकार करते हैं
हमेशा मौसमी सब्ज़ी फल खाएं ।
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जो भी फल, सब्ज़ी अथवा आनाज हम खाते हैं, उनकी मियाद 15 से 90 दिन की होती है। इस बीच वे खा लिए गए तो अमृत अन्यथा भूसा। कोई भी फल, सब्ज़ी बारहों महीने उपयोगी नहीं होते और प्रकृति में पैदा होने वाली कोई चीज़ फ़िज़ूल नहीं होती। इसलिए इनका समयानुकूल प्रयोग ही स्वास्थ्यकारी है। अब आज के मौसम में मूली उपयोगी है, पर एक महीने बाद यह सरसों की जड़ होगी, जिसकी वह उपयोगिता नहीं होगी, जो आज की मूली में है। इसके बावजूद लोग वह सरसों की जड़ पराठों में भर कर खाएँगे और वातावरण को प्रदूषित करेंगे। आलू खाना हो, तो अभी रुकें। पंद्रह रोज़ बाद खाना शुरू करें। यानी दिवाली के बाद और होली के पहले तक। प्याज़ भी बारहों महीने नहीं, मार्च से जून तक खाना चाहिए। अमरूद का मौसम भी अब आया है और सेब व संतरे का भी। यह मौसम बाजरा और मक्का खाने का है तथा चावल का भी। गेहूं रबी की फसल है। इसीलिए इसे चने और जौ के साथ मिला कर खाया जाता है। जाड़े में उड़द की दाल खानी चाहिए और गर्मियों में अरहर तथा बरसात में मूँग। दाल कोई भी हो, शाम को न खाएँ। चावल सिर्फ़ उस क्षेत्र में पैदा होने वाला खाएँ, बासमती सिर्फ़ बास मारता है। धनिया, मिर्च और नींबू अगहन तक खा सकते हैं। अदरक शीत में। जो लोग बारहों महीने आम, अमरूद या सेब खाते हैं, उनकी नक़ल न करें। वे बेचारे बाज़ार के मारे हैं। उन्हें बाज़ारू चीजें ही पसंद हैं। इसलिए फल, सब्ज़ी और आनाज मौसम के अनुरूप खाएँ।
ध्यान रखें, बीमार वही पड़ता है जिसका आहार-विहार गड़बड़ होता है। कोरोना भी उसे ही सताता है। इसलिए कभी भी कुलक (किसान कुल कलंक) के चक्कर में न पड़ें। वे बाज़ार के लिए जोतते और बोते हैं।

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2020

अनमोल धातुएं के वर्तन गायबअब इसपर जहर का लेप टेफ्लान कोटिंग का षड्यंत्र


 

 ■ टेफलोन कोटिंग या काला जहर ????

टेफलोन कोटिंग वाले बर्तनों का इतना प्रचार या दुष्प्रचार हुआ कि आजकल हर घर में ये काली कोटिंग वाले बर्तन होना शान की बात समझी जाती है।
न जाने कितने ही ये टेफलोन कोटिंग वाले बर्तन हमारे घर में आ गये हैं, जैसे कि नॉन स्टिक तपेली (पतीली), तवा, फ्राई पेन आदि....अब इजी टू कुक, इजी टू क्लीन वाली छवि वाले ये बर्तन हमारी जिंदगी का हिस्सा बन गए है।
मुझे आज भी दादी नानी वाला ज़माना याद आ जाता है, जब चमकते हुए बर्तन किसी भी घर के स्टेंडर्ड की निशानी माने जाते थे, लेकिन आजकल उनकी जगह इन काले बर्तनों ने ले ली है।
हम सब इन बर्तनों को अपने घर में बहुतायत से उपयोग में ले रहे हैं और शायद कोई बहुत बेहतर विकल्प नहीं मिल जाने तक आगे भी उपयोग करते रहेंगे।
किन्तु इनका उपयोग करते समय हम ये बात भूल जाते हैं कि ये काले बर्तन हमारे शरीर को भी काला करके नुकसान पहुंचा रहे हैं।
हम में से कई लोग यह बात जानते भी नहीं हैं कि वास्तव में ये बर्तन हमारी बीमारियाँ बढ़ा रहे हैं और इनका प्रयोग करके हम हमारे अपनों को ही तकलीफ दे रहे हैं।
टेफलोन को 20 वी शताब्दी की सबसे बेहतरीन केमिकल खोज में से एक माना गया है, जिसका प्रयोग इंजीनियरिंग के क्षेत्र जैसे कि स्पेस सुइट और पाइप में उर्जा रोधी के रूप में किया जा रहा है, किन्तु यह भी एक बड़ा सच है की ये टेफलोन कोटिंग का काला जहर स्वास्थ्य के लिए बना ही नहीं है और अत्यंत खतरनाक है।
इसके प्रयोग से श्वास की बीमारी, कैंसर, ह्रदय रोग आदि कई गंभीर बिमारियां भी होती देखी जा रही हैं।
यह भी सच है की जब टेफलोन कोटेड बर्तन को अधिक गर्म किया जाता है, तो आसपास के क्षेत्र में रह रहे पालतू पक्षियों की जान जाने का खतरा तुरंत ही काफी बढ़ जाता है।
एक न्यूज के अनुसार कुछ समय पहले एक घर के आसपास के 14 पालतू पक्षी तब मारे गए, जब टेफलोन के बर्तन को पहले से गरम किया गया और तेज आंच पर खाना बनाया गया ये पूरी घटना होने में सिर्फ 15 मिनिट लगे....टेफलोन कोटेड बर्तनों में सिर्फ 5 मिनिट में 700 डिग्री टेम्प्रेचर तक गर्म हो जाने की प्रवृति होती है और इसी दौरान 6 तरह की खतरनाक गैस वातावरण में फैल जाती हैं इनमे से 2 गैस ऐसी होती हैं जो केंसर को भी जन्म देती हैं।
अध्ययन बताते हैं कि टेफलोन को अधिक गर्म करने से पक्षियों के लिए हानिकारक टेफलोन टोक्सिकोसिस बनती है और इंसानों के लिए खतरनाक पोलिमर फ्यूम फीवर की सम्भावना बहुत बढ़ जाती है टेफलोन कोटिंग से उत्पन्न होने वाले केमिकल के शरीर में जाने से होने वाली बीमारियाँ इस तरह की होती हैं....
1- पुरुष इनफर्टिलिटी - हाल ही में हुए एक सर्वे में ये बात सामने आई है कि लम्बे समय तक टेफलोन केमिकल के शरीर में जाने से पुरुष इनफर्टिलिटी का खतरा बढ़ जाता है और इससे सम्बंधित कई बीमारियाँ पुरुषों में देखी जा सकती हैं।
थायराइड - हाल ही में एक अमेरिकन एजेंसी द्वारा किया गए अध्ययन में यह बात सामने आई है कि टेफलोन की मात्र लगातार शरीर में जाने से थायराइड ग्रंथि सम्बन्धी समस्याएं हो सकती है।
2- बच्चे को जन्म देने में समस्या - केलिफोर्निया में हुई एक स्टडी में ये पाया गया है कि जिन महिलाओं के शरीर में जल, भोजन या हवा के माध्यम से पी ऍफ़ ओ (टेफलोन) की मात्रा सामान्य से अधिक पाई गई थी, उन्हें बच्चो को जन्म देते समय अधिक समस्याओं का सामना करना पड़ा. इसी के साथ उनमे बच्चो को जन्म देने की क्षमता भी अपेक्षाकृत कम हो गई, जिससे सीजेरियन ऑपरेशन करना पड़ा।
3- शारीरिक समस्याएं व अन्य बीमारियाँ - पी ऍफ़ ओ की अधिक मात्रा शरीर में पाई जाने वाली महिलाओं के बच्चो पर भी इसका असर जन्मजात शारीरिक विकार या समस्याओं के रूप में देखा गया है ।
4- लीवर केंसर का बढ़ा खतरा - एक अध्ययन में यह भी सामने आया है कि पी ऍफ़ ओ की अधिक मात्रा होने पर लीवर केंसर का खतरा बढ़ जाता है ।
5- केंसर या ब्रेन ट्यूमर का खतरा - एक प्रयोग के दौरान जब चूहों को पी ऍफ़ ओ के इंजेक्शन लगाए गए तो उनमे ब्रेन ट्यूमर विकसित हो गया. साथ ही केंसर के लक्षण भी दिखाई देने लगे।
6- जहरीला पी ऍफ़ ओ 4 साल तक शरीर में बना रहता है - पी ऍफ़ ओ जब एक बार शरीर के अन्दर चला जाता है तो लगभग 4 साल तक शरीर में बना रहता है जो एक बड़ा खतरा हो जाता है।
■ टेफलोन के दुष्प्रभाव से बचने के उपाय...
1- टेफलोन कोटिंग वाले बर्तनों को कभी भी गैस पर बिना कोई सामान डाले अकेले गर्म करने के लिए न छोड़े।
2- इन बर्तनों को कभी भी 450 डिग्री से अधिक टेम्प्रेचर पर गर्म न करे सामान्यतया इन्हें 350 से 450 डिग्री तक गर्म करना बेहतर होता है।
3- लेकिन हमारे देश में महिलाओं को पता ही नहीं रहता है कि गेस के बर्नर पर रखे बर्तन का टेम्प्रेचर कितना हुआ है, तो वे कंट्रोल कैसे करेंगी???
4- टेफलोन कोटिंग वाले बर्तनों में पक रहा खाना बनाने के लिए कभी भी मेटल की चम्मचो का इस्तेमाल ना करे इनसे कोटिंग हटने का खतरा बढ़ जाता है।
5- टेफलोन कोटिंग वाले बर्तनों को कभी भी लोहे के औजार या कूंचे ब्रश से साफ़ ना करे, हाथ या स्पंज से ही इन्हें साफ़ करे।
6- इन बर्तनों को कभी भी एक दूसरे के ऊपर जमाकर ना रखे।
7- घर में अगर पालतू पक्षी हैं, तो इन्हें अपने किचन से दूर रखें।
8- अगर गलती से घर में ऐसा कोई बर्तन ज्यादा टेम्प्रेचर पर गर्म हो गया है, तो कुछ देर के लिए घर से बाहर चले जाए और सारे खिड़की दरवाजे खोल दे।
9- ये गलती बार-बार ना दोहराएं, क्यूंकि चारो ओर के वातावरण के लिए भी ये गैस हानिकारक होती हैं और लाखों सूक्ष्म जीवों को भी मार देती हैं।
10- टूटे या जगह-जगह से घिसे हुए टेफलोन कोटिंग वाले बर्तनों का उपयोग बंद कर दे. क्यूंकि ये धीरे धीरे आपके भोजन में ज़हर घोल सकते हैं।
11- अगर आपके बर्तन नहीं भी घिसे हैं, तो भी इन्हें हर दो साल में अवश्य ही बदल दें।
12- जहाँ तक हो सके इन बर्तनों कम ही प्रयोग करिए।
13- इन छोटी छोटी बातों का ध्यान रखकर आप अपने और अपने परिवार के स्वास्थ को बेहतर बना सकते हैं...
टेफलोन कोटिंग के काले जहर से अपने परिवार को बचाएं।

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2020

गर्भ संस्कार के माध्यम से श्रेष्ठ आत्मा के अवतरण का विधान

   



*प्रसव पीड़ाकम या दूर करने के लिए उपयोग में आनेवाली पेनकिलर दवाएँ माता व बालक के बीच पय:पान (दुग्धपान) के समय स्नेह संबंध विकसित होने में बाधा पैदा करती है | संशोधकों ने देखा है कि पेनकिलर दवा लेने से माता में तरल मातृत्व हार्मोन ऑक्सिटोसिन स्त्रावित नहीं होता | इससे नवजात शिशु जन्म के समय चेतनाशून्य या स्तम्भ हो जाता है | यही कारण हैं कि वह अपने प्रारम्भिक क्षणों में माता के प्रति आकृष्ट नहीं होता और स्वत: पय:पान करने की कोशिश भी नहीं करता | इसके विपरीत जो माताएँ पेनकिलर दवा का सेवन नहीं करती, उनमें यह हार्मोन स्त्रावित होने से माता और बालक के बीच स्तनपान के हर अवसर पर दोनों और से प्रेम बढ़ता देखा गया हैं |*
*अत: पेनकिलर दवाइयों का सेवन न करके निम्न उपचारों में से किसी भी एक का प्रयोग करें*

*१] स्वच्छ चारा खानेवाली देशी गाय के ताजे गोबर का एक चम्मच (१० मि.ली.) रस आसन्न प्रसवा (जिसकी प्रसूति का समय निकट आ गया हो) को पिलाने से प्रसव सुलभ हो जाता है*

 *(इस उपचार से व होमेओपेथी की मदद से पिछले 3 माह  में आज 5 अगस्त 2019  ज्योति बहन जबलपुर  9399341299  के मार्गदर्शन में 10 बहनो ने सामान्य प्रसव से स्वस्थ व तंदरुस्त बच्चे को इस ब्रह्मांड में जन्म दी
 
*२] पीपर (पिप्पली) व वचा चूर्ण जल में पीसकर एरंड तेल के साथ मिला के नाभि में लेप करने से अनेक कष्टों से पीड़ित स्त्री भी सुखपूर्वक प्रसव करती है*

*३] सूर्यमुखी की जड़ को डोरी में बाँधकर प्रसूता के हाथ या सिर पर बाँधने से शीघ्र प्रसव होता है*
*४] प्रसूता के हाथ-पैर के नाख़ून व् नाभि पर थूहर के दूध का लेप करें |*
*5 अगस्त 2019 को मोनिका बहन तारानगर राजस्थान 8233322334 से गर्भधारण से लेकर प्रसव तक मार्गदर्शन में एक बहन ने जिसकी आखरी समय मे बच्चे का गर्दन नाल में फंसा हुआ था बिना शल्य क्रिया के सामान्य प्रसव से इस ब्रह्मांड में आगमन हुआ आज के एलोपैथी चिकित्सा शल्य क्रिया की सलाह दे रहे  थे परन्तु गर्भवती बहन के अटल विश्वास ने मोनिका बहन की बात मान पहले जायफल का रस एक चम्मच सेवन कर हॉस्पिटल गयी व शल्य कक्ष  में जाने से पहले परिवार वालो से पुनः आधे घण्टे का समय माँग मोनिका बहन के अनुसार एक एक कप गर्म दूध व देशी गाय का घी व स्वादानुसार मिश्री मिलाकर सेवन की और सेवन करने के मात्र 15 मिंट बाद ही सामान्य प्रसव से अपने स्वस्थ तंदरुस्त बच्चे (लड़का) को जन्म दी घरेलू उपचारों के चमत्कार को शत शत नमन व इन दोनों बहन के सेवा व विश्वास को*
*सुखपूर्वक प्रसवकारक मंत्र :*

*१] पहला उपाय :- “एं ह्रीं भगवति भगमालिनि चल चल भ्रामय भ्रामय पुष्पं विकासय विकासय स्वाहा “ इस मंत्र द्वारा अभिमंत्रित दूध गर्भिणी स्त्री को पिलायें तो सुखपूर्वक प्रसव होगा*

*२] दूसरा उपाय :- गर्भिणी स्त्री स्वयं प्रसव के समय ‘जम्भला-जम्भला‘ जप करे*
*३] तीसरा उपाय:- देशी गाय के गोबर का १२ से १५ मि.ली. रस ‘ॐ नमो नारायणाय‘ मंत्र का २१ बार जप करके पीने से भी प्रसव-बाधाएँ दूर होंगी और बिना ऑपरेशन के प्रसव होगा*

*४] प्रसुति के समय अमंगल की आशंका हो तो निम्न मंत्र का जप करें :सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिकेशरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोSस्तुते(दुर्गासप्तशती)*

*५) मंत्रः ॐ कौंरा देव्यै नमः। ॐ नमो आदेश गुरु का…. कौंरा वीरा का बैठी हात… सब दिराह मज्ञाक साथ…. फिर बसे नाति विरति…. मेरी भक्ति… गुरु की शक्ति…. कौंरा देवी की आज्ञा।*

*प्रसव के समय कष्ट उठा रही स्त्री को इस मंत्र से अभिमंत्रित किया हुआ जल पिलाने से वह स्त्री बिना पीड़ा के बच्चे को जन्म देती है।*

*विशेष : “सुवर्णप्राश टेबलेट ”   सुवर्ण भस्म से पुष्य नक्षत्र में बनाई यह पुण्यदायी गोली आयु,शक्ति,मेधा,बुद्धि,कांति व जठराग्निवर्धक तथा ग्रहबाधा निवारक, उत्तम गर्भपोषक है ।गर्भवती स्त्री इसका सेवन करके निरोगी,तेजस्वी ,मेधावी संतती को जन्म दे सकती है*

*आयुर्वेदिक घरेलु उपाय*

*पहला प्रयोगः प्रसूति के समय ताजे गोबर (1-2 घण्टे के भीतर का) को कपड़े में निचोड़कर एक चम्मच रस पिला देने से प्रसूति शीघ्र हो जाती है।*

*दूसरा प्रयोगः तुलसी का 20 से 50 मि.ली. रस पिलाने से प्रसूति सरलता से हो जाती है।*

*तीसरा प्रयोगः पाँच तोला आँवले को 20 तोला पानी में खूब उबालिये। जब पानी 8 तोला रह जाये तब उसमें 10 ग्राम शहद मिलाकर देने से बिना किसी प्रसव पीड़ा के शिशु का जन्म होता है*

*चौथा प्रयोगः नीम अथवा बिजौरे की जड़ कमर में बाँधने से प्रसव सरलता से हो जाता है। प्रसूति के बाद जड़ छोड़ दें।*

*विशेष : “सुवर्णप्राश टेबलेट ” सुवर्ण भस्म से पुष्य नक्षत्र में बनाई यह पुण्यदायी गोली आयु,शक्ति,मेधा,बुद्धि,कांति व जठराग्निवर्धक तथा ग्रहबाधा निवारक, उत्तम गर्भपोषक है ।गर्भवती स्त्री इसका सेवन करके निरोगी,तेजस्वी ,मेधावी संतती को जन्म दे सकती है*

*औषधियों से उपचार*

*1. एरण्ड: एरण्ड का तेल गर्म दूध में 50 मिलीलीटर की मात्रा में मिलाकर पिलाने से अगर प्रसव में दर्द हो तो दर्द तेज होकर बंद हो जायेगा*

*2. सोंठ: 10 ग्राम सोंठ का चूर्ण लगभग 500 मिलीलीटर दूध में अच्छी तरह पकाकर लेने से 15 मिनट के अन्दर-अन्दर बच्चा बाहर आ जायेगा*

*3. केला:> केले की जड़ लाकर प्रसूता (बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री) के बांयी जांघ पर बांधे। इससे जल्द लाभ होग*

*> केले के ऊपर कपूर का चूर्ण डालकर खाने से प्रसव यानी डिलीवरी में दर्द नहीं होता है*

*4. पीपल लता: पीपल लता की गांठदार जड़ को पीपला मूल कहते हैं। कुछ पंसारी लोग पीपल लता की मोटी शाखाओं के टुकड़े कर बेचते हैं। अत: सावधानी से ही लें। प्रसव में ज्यादा देर होने पर पीपलामूल, ईश्वर मूल और हींग, पान के साथ खिलाने से प्रसव यानी डिलीवरी का दर्द बढ़कर प्रसव हो जाता है। प्रसव के तुरन्त बाद इसके बारीक चूर्ण का घोल देने से लाभ होता है*
*5. लोध्र: लोध्र का लेप करने से प्रसूता (बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री) को प्रसव के समय हुए योनिक्षत पर लगाने से लाभ होता है*
*6. जायफल: प्रसव यानी डिलीवरी के समय होने वाले कमर दर्द में जायफल घिसकर लेप करने व सेवन करने से लाभ होता है*
*7. पीपरामूल: प्रसव के समय पीपरा मूल, दालचीनी का चूर्ण लगभग 1.20 ग्राम में थोड़ी सी भांग के साथ प्रसूता (बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री) को पिलाने से प्रसव यानी बच्चे का जन्म आराम से होता है*
*8. कलिहारी: सुख से प्रसव के लिए कलिहारी करी जड़ पीसकर नाभि के नीचे लगाने से लाभ होता है*
*9. कपास: डिलीवरी के बाद में कपास की छाल का काढ़ा प्रसूता (बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री) को पिलाने से गर्भाशय जल्दी ही ठीक हो जाता है*
*10. सरपत: प्रसूता (बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री) आसपास वातावरण साफ करने के लिये सरपत की धूनी जला कर धुंआ करें*
*11. कंगुनी: प्रसव पीड़ा को कम करने के लिये कंगुनी के चूर्ण को दूध में बुझाकर, मिश्री को मिलाकर खाने से लाभ होता है। अगर पहले से ही लिया जाये तो दर्द कम रहता है*
*12. काफी: शरीर में स्फूर्ति पैदा करने के लिए काफी के बीज भूनकर, अच्छी तरह से पीसकर पानी में उबालकर पीने से लाभ होता है।*
*13. अजाझाड़े: अजाझाड़े की जड़ कमर में बांधने से प्रसव सुखपूर्वक होता है।*
*14. बादाम :आखिरी महीने में प्रसूता (बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री) को 2 बादाम और 10-15 मुनक्का के दाने पानी में भिगोकर पीसकर खिलाने से लाभ होग*
*15. तुलसी: महिला को प्रसव (बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री) के समय 2 चम्मच तुलसी का रस पिलाने से प्रसव का दर्द कम हो जाता है*
*16. बथुए: बथुए के 20 ग्राम बीजों को पानी में उबालकर, छानकर बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री को पिलाने से पीड़ा कम होगी*
*17. हल्दी: बच्चा होने के आखिरी माह में एक चम्मच पिसी हुई हल्दी गर्म दूध के साथ सुबह-शाम पिलाएं*
*18. नींबू: गर्भ के आखिरी महीने में पानी में नींबू का रस डालकर रोज पीने से लाभ होता है*
*19. लौकी: लौकी को बिना पानी के साथ उबालकर उसका रस 30 ग्राम की मात्रा में निकालकर प्रसूता (बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री) को पिला देने से दर्द में आराम मिलता है।*
*20. हींग: चुटकी भर हींग लेकर, 10 ग्राम गुड़ में मिलाकर खाकर, ऊपर से आधा कप पानी या गाय का दूध पियें*
*21. अंजीर: प्रसव के समय में 15-20 दिन तक रोज दो अंजीर दूध के साथ खाने से लाभ होता है*
*22. लालघुंघची: लाल घुंघची के दाने लेकर इसे बारीक पीस लें, फिर इसे पुराने गुड़ के साथ खायें इससे प्रसव के समय दर्द नहीं होता है।*
*23. जंगली पुदीना: जंगली पुदीना और हंसराज दोनों को थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लेकर काढ़ा बना लें। फिर इसमें थोड़ी सी मिश्री मिलाकर सेवन करने से दर्द में लाभ होता है।*
*24. कलिहारी: कलिहारी की जड़ हाथ-पैरों में थोड़ी-थोड़ी बांध लें। कुछ देर बाद प्रसव के समय स्त्री को बिना अधिक पीड़ा के डिलीवरी हो जायेगी*
*25. पोई: पोई की जड़ लेकर उसका काढ़ा बनाकर 4-5 चम्मच में 2 चम्मच तिल्ली का तेल मिलाकर स्त्री के पेट पर धीरे-धीरे लेप करने से प्रसव (बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री) शीघ्र और बिना दर्द के हो जाता है।*

*26. बिजौरा: बिजौरा की जड़ 10 ग्राम और महुआ 10 ग्राम दोनों को घी में पीस लें, फिर उसमें 2 चम्मच लेकर हर 1 घंटे बाद पिलाते रहें। इससे प्रसव यानी डिलिवरी में तकलीफ कम होती है।*
*27. अपामार्ग: अपामार्ग की जड़ और कलिहारी की जड़ को लेकर एक पोटली में रखें। फिर स्त्री की कमर से पोटली को बांधने प्रसव यानी डिलीवरी आसानी से हो जाती है।*
*28. हींग: हींग और बाजरे को गुड़ में रखकर निगल जाएं। दो घूंट से ज्यादा पानी न पियें। यह करने से बच्चा देने के समय दर्द नहीं होगा।*
*29. कपूर: पके केले में लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग कपूर मिलाकर खाने से बच्चे का जन्म (चाइल्ड बर्थ) आराम से होता है*
*30. पान: पान को योनि में रखने तथा पान का सेंक व लेप करने से सूजन नष्ट हो जाती है और औरत का दूध साफ होकर निकलता है।*
*31. कसौंदी: कसौंदी के पत्तों का रस देने से प्रसव (चाइल्ड बर्थ) जल्दी होता है।*
*32. कुचला: कुचला की मज्जा (बीच के हिस्से) को पानी में घिसकर नाभि पर लगायें।*
*33. तेजपात: तेजपत्ते के पत्तों की धूनी देने से बच्चा सुख से उत्पन्न हो जाता है।*
*34. प्रसव में देरी होने पर या गर्भ में पल रहे है बच्चे का आडा या उल्टा होने की सबसे अच्छी दवाई है जब डॉक्टर कितना भी चिल्लाये अॉपेशन करवाओ तब आप अपने मरीज को घर ले आओ या ऐसे किसी डॉक्टर के पास मरीज को लेकर ही मत जाइए. गाय के गोबर और गोमूत्र एक ऐसी विशिष्ट दवा हैं जो इस प्रकार के आपात अवस्था मे देने पर फौरन अपना प्रभाव उत्पन्न करती हैं चाहे डॉक्टर कितना ही चिल्लाये आप किसी देशी बछडी का गोमूत्र और गोबर लेकर आपस में मिलाइये और उसका रस निकल कर माँ को चार चार घंटे के अंतर में 3 बार पिला दीजिये पेट के आदत उल्टा बच्चा भी सीधा हो जाता है और बिना किसी दर्द बच्चा बाहर आ जाता है लेकिन ये दवा 9 महीना पूरा होने के बाद होने वाले प्रसव में ही काम आती है उससे पहले ये अगर बच्चा 7-8 महीने में होता है तो ये दवा इतना काम नही आती है ये रुकी हुई प्रसव पीडा को पुन: प्रारंभ करती हैं, शिशु जन्म को सरल बनती हैं तथा गर्भ में   शिशु   की स्थिति को भी पुन: सही कर देती है।*
*35. जब कोई माँ गर्भावस्था में है तो चुना रोज खाना चाहिए क्योकि गर्भवती माँ को सबसे ज्यादा काल्सियम की जरुरत होती है और चुना कैल्सियम का सबसे बड़ा भंडार है । गर्भवती माँ को चुना खिलाना चाहिए अनार के रस में - अनार का रस एक कप और चुना गेहूँ के दाने के बराबर ये मिलाकर रोज पिलाइए नौ महीने तक लगातार दीजिये तो चार फाईदे होंगे - पहला फाईदा होगा के माँ को बच्चे के जनम के समय कोई तकलीफ नही होगी और नोर्मलmk डेलीभरी होगा, दूसरा बच्चा जो पैदा होगा वो बहुत हस्त-पुष्ट और तंदरुस्त होगा, तीसरा फायदा वो बच्चा जिन्दगी में जल्दी बीमार नही पड़ता जिसकी माँ ने चुना खाया, और चौथा सबसे बड़ा लाभ है वो बच्चा बहुत होसियार होता है बहुत Intelligent और ठतपससपंदज होता है उसका IQ बहुत अच्छा होता है ।*

*36. एक गिलास देशी गाय के दूध में एक चम्मच देशी गाय का नियमित सेवन करना ही चाहिए*

*होमओपैथी
 भाई राजीव दीक्षित जी के ज्ञान से प्रोत्साहित हो प्राप्त आत्मविश्वास से इस दवा के मात्र एक दो ज्यादा से ज्यादा तीन खुराक में पिछले 3 सालों में सैकड़ो बहन का सामान्य प्रसव सम्भव हो पाया है*
*जब पल्साटिला से फायदा न हो - (गौसिपियम Q)*

*जब दर्द काफी समय तक रहने के बाद कम हो जाए - (कॉलोफाइलम 30 या 200)*

*दुर्बल या रक्तहीन औरतों में जब प्रसव पीड़ा बंद हो जाए या कम हो जाए - (सीकेल कोर 200)*

*जब चिड़चिड़ी औरत प्रसव वेदना सहन न कर चिल्लाए - (कैमोमिला 200 या 1M)*

*जब दर्द के साथ पेशाब और पाखाने की हाज़त हो - (नक्स वोमिका 200)*

*जब तेज प्रसव दर्द अचानक आए, जाए, चेहरा व आंखे लाल, जरा सा झटका लगते ही तकलीफ बढ़े - (बेलाडोना 200)*

*जब दर्द के साथ तेज मितली रहे - (इपिकैक 30 या 200)*

*जब दर्द बंद होकर रोगिणी पसीने से तर होकर बर्फ की तरह ठंडी हो जाए मगर फिर भी कपड़ा ओढ़ना पसंद न करे - (कैम्फर 30 या 200)*

*बायोकैमिक औषधि - (काली फॉस 6X)*
*प्रसव सरल करने के लिए गर्भ के अंतिम माह में 15 दिन तक कॉलोफाइलम 30, रोज एक खुराक दें।*
*निरोगी रहने हेतु महामन्त्र*
*मन्त्र 1 :-*
*• भोजन व पानी के सेवन प्राकृतिक नियमानुसार करें*
*• ‎रिफाइन्ड नमक,रिफाइन्ड तेल,रिफाइन्ड शक्कर (चीनी) व रिफाइन्ड आटा ( मैदा ) का सेवन न करें*
*• ‎विकारों को पनपने न दें (काम,क्रोध, लोभ,मोह,इर्ष्या,)*
*• ‎वेगो को न रोकें ( मल,मुत्र,प्यास,जंभाई, हंसी,अश्रु,वीर्य,अपानवायु, भूख,छींक,डकार,वमन,नींद,)*
*• ‎एल्मुनियम बर्तन का उपयोग न करें ( मिट्टी के सर्वोत्तम)*
*• ‎मोटे अनाज व छिलके वाली दालों का अत्यद्धिक सेवन करें*
*• ‎भगवान में श्रद्धा व विश्वास रखें*
*मन्त्र 2 :-*
*• पथ्य भोजन ही करें ( जंक फूड न खाएं)*
*• ‎भोजन को पचने दें ( भोजन करते समय पानी न पीयें एक या दो घुट भोजन के बाद जरूर पिये व डेढ़ घण्टे बाद पानी जरूर पिये)*
*• ‎सुबह उठेते ही 2 से 3 गिलास गुनगुने पानी का सेवन कर शौच क्रिया को जाये*
*• ‎ठंडा पानी बर्फ के पानी का सेवन न करें*
*• ‎पानी हमेशा बैठ कर घुट घुट कर पिये*
*• ‎बार बार भोजन न करें आर्थत एक भोजन पूणतः पचने के बाद ही दूसरा भोजन करें*
*भाई राजीव दीक्षित जी के सपने स्वस्थ भारत समृद्ध भारत और स्वदेशी भारत स्वावलंबी भारत स्वाभिमानी भारत के निर्माण में एक पहल आप सब भी अपने जीवन मे भाई राजीव दीक्षित जी को अवश्य सुनें*
*स्वदेशीमय भारत ही हमारा अंतिम लक्ष्य है :- भाई राजीव दीक्षित जी*
*मैं भारत को भारतीयता के मान्यता के आधार पर फिर से खड़ा करना चाहता हूँ उस काम मे लगा हुआ हूँ*
*उनके बताए आयुर्वेद के पानी के सूत्रों का कट्टर अनुयायी व क्षमता व परिस्थिति अनुसार आयुर्वेद के यम नियम का पालनकर्ता।*
*उनके व हमसब के सपने स्वस्थ भारत समृद्ध भारत निर्माण हेतु (मोक्ष प्राप्ति हेतु अपने व औरो के त्रैहिक (दैहिक दैविक व भौतिक)दुःखो  को दूर करने का प्रयासरत्त आदरणीय के मार्गदर्शन के सहयोग से*
*आयुर्वेद, घरेलू,पंचगव्य व होमेओपेथी के अध्ययन  व भाई राजीवदीक्षित के विचार ज्ञान  से ज्ञानित हो ज्ञान को निस्वार्थ भाव से ज्ञान का प्रचार प्रसार हेतु अब एक ही समाधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान के सहयोगी वन श्रेष्ठ उन्नत भारत के योगदान हेतू 9336919081 पर whatsapp संपर्क
*वन्देमातरम*



मंगलवार, 20 अक्टूबर 2020

गणित के समीकरण से दुर्गा देवी की प्रतिमा निर्माण इसी गणित से ईश्वर को प्राप्त करना सिखाया जाता है

 





समझिए गणित के 100 समीकरणों से कैसे बना माँ दुर्गा का चित्र: प्राचीन भारत, जिसने गणित से ईश्वर को प्राप्त करना सिखाया

माँ दुर्गा की तस्वीर, गणित के समीकरणों से
इसी तरह से डाले गए लगभग 100 गणितीय समीकरण (बाएँ) और बन गया माँ दुर्गा का चित्र

गणित के समीकरणों (Equations) की मदद से माँ दुर्गा की तस्वीर उकेरी जाता है। इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि जैसे-जैसे गणित के अलग-अलग समीकरण डाले जाते हैं, वैसे-वैसे अलग-अलग आकृतियाँ बनती हैं और अंत में माँ दुर्गा के चेहरे की तस्वीर बन कर उभरती है। यहाँ हम ये तो जानेंगे ही कि ये कैसे हो रहा है, लेकिन साथ में ही भारत में गणित और ईश्वर के साथ आध्यात्मिक जुड़ाव की भी बात करेंगे।

गणित के समीकरणों की मदद से कैसे बनी माँ दुर्गा की तस्वीर?
इस ग्राफ का सोर्स ऑनलाइन ग्राफ़िंग प्लेटफॉर्म ‘Desmos’ है, जहाँ से इसे बनाया गया है। लेकिन, इसमें सबसे कमाल की बात है कि अलग-अलग आकृतियों के लिए अलग-अलग समीकरणों को डिराइव करना और फिर उसे सटीक क्रम में लगाना। ग्राफ में एक-एक बिंदु का महत्व होता है और पिक्सेल्स व स्क्रीन के आकर के हिसाब से इसे सजाने के लिए अलग-अलग गणितीय समीकरणों को लगाना ही इस वीडियो की खासियत है।

अर्थात, जिसने भी ‘Desmos’ पर ये समीकरण डाले होंगे उसे क्रमशः उसी तरह से ग्राफ प्राप्त होता गया होगा और अंत में ये तस्वीर बनी। इस तस्वीर के लिए गणित के एक-दो नहीं, बल्कि लगभग 100 समीकरण प्रयोग में लाए गए हैं और उन्हें देख कर लगता नहीं कि ये आसान हैं। सभी समीकरण अपने-आप में कई गणितीय कैलकुलेशंस समाए हुए हैं। इसके बाद एक-एक करके हर समीकरण को एक्टिवेट किया जाता है, और उसका ग्राफ मिलता चला जाता है।

जैसे, एक स्ट्रेट लाइन का ग्राफ बनाने के लिए आप ‘y = 2x+1‘ लीनियर एक्वेशन का प्रयोग कर सकते हैं। ये एक बेसिक और साधारण उदाहरण है। इसी तरह से वृत्त और त्रिभुज से लेकर पैराबोला और हायपरबोला तक के लिए अलग-अलग समीकरणों का प्रयोग किया जाता है और उन्हें कैसे और कहाँ एडजस्ट करना है ताकि मनपसंद ग्राफ आए, इसमें दिमाग लगाना पड़ता है। इसी तरह से माँ दुर्गा की भौं और आँखें वगैरह बनाने के लिए समीकरणों का प्रयोग किया गया है।

जैसे माँ दुर्गा की नाक में जो नथुनी है, वो वृत्ताकार है। इसी तरह से समीकरणों के हिसाब से ग्राफ कहाँ मिलना चाहिए, उसी हिसाब से उन्हें शिफ्ट किया जाता है। ये तो थी तकनीकी चीजें कि कैसे इस ग्राफ को बनाया गया। 20वीं सदी के पहले और दूसरे दशक में अपने ज्ञान और प्रतिभा से पूरी दुनिया को लोहा मनवाने वाले भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन भी गणित और ईश्वर को एक साथ जोड़ कर देखते थे।

उन्होंने कहा था कि उनके लिए किसी भी गणितीय समीकरण का तब तक कोई महत्व नहीं है, जब तक वो ईश्वरीय विचार को व्यक्त न करे। यानी, हर समीकरण को वो ईश्वर से जोड़ कर देखते थे और फिर आगे बढ़ते थे। जो नास्तिक हैं और ईश्वर में विश्वास नहीं रखते, उनके लिए भी एक तरह से कहा जा सकता है कि गणित जो है, वो इस ब्रह्मांड की भाषा है। किसी भी चीज को गणितीय समीकरण के रूप में डिराइव किया जा सकता है।

श्रीनिवास रामानुजन किसी भी फिजिकल या मेटा-फिजिकल चीज को गणितीय समीकरणों के रूप में देखा करते थे। इसीलिए, उन्होंने ऐसे-ऐसे समीकरण बनाए, जो सभी के पल्ले भी नहीं पड़ती थी और उन्हें समझने के लिए आज भी लगातार रिसर्च हो ही रहे हैं। इसी तरह आप स्विस गणितज्ञ लियोनार्ड ओइलर का उदाहरण भी ले सकते हैं। यहाँ ये समझने की ज़रूरत है कि जितने भी ईश्वरीय रूप हैं, उनका मूल प्रकृति ही है।

भारत, जिसने हमेशा गणित को ईश्वर को प्राप्त करने का माध्यम माना
भारत में तो हमेशा से प्रकृति की पूजा होती आई है। यहाँ वैदिक काल से ही ये चला आ रहा है। दुनिया की सबसे प्राचीन पुस्तक ऋग्वेद में अग्नि की स्तुति के साथ ही शुरुआत की जाती है। तो, हम कह सकते हैं कि गणित एक ऐसा माध्यम है, जिसके द्वारा एक नास्तिक भी ईश्वर की पूजा कर सकता है। इसी मामले में हम हमेशा से सभ्यताओं से आगे रहे हैं। हमने गणित और प्रकृति के संबंधों को समझा है और ईश्वर तक पहुँचने का माध्यम बनाया है।

पश्चिमी सभ्यता की सोच हमेशा से ‘बिजनेस ड्रिवेन’ रही है, लीनियर रही है। हमारे साथ ऐसा नहीं है। हम अनिश्चितताओं के साथ खुद का तालमेल बिठाने में हमेशा से अभ्यस्त रहे हैं। यही कारण है कि हम शून्य (0) और अनंत (∞) के साथ तालमेल बिठाते आए हैं। हमने ईश्वर और मनुष्य के अंतर को इस रूप में देखा है कि जहाँ ईश्वर अनंत है, वहीं मनुष्य अनंत बार जन्मता-मरता है। और ये क्रम, ये सायकल, चलता ही चला जाता है।

भारत में हमेशा से शून्य (0) और अनंत (∞) की चर्चा होती आई है और इन दोनों के माध्यम से हर चीज को समझने की कोशिश होती आई है। पूरी दुनिया में आज भी एक हिस्सा है, जो अपने मजहब के आधार पर दुनिया को गोल मानता है। लेकिन, हम कभी इस बात पर आश्चर्यचकित नहीं रहे कि दुनिया गोल है। क्यों? क्योंकि हमें ये बातें आदिकाल से मालूम थी। ये गणित को लेकर हमारी समझ का ही कमाल था।

हालाँकि, पश्चिमी सभ्यता के लिए ये काफी बड़ा शॉक बन कर आया था कि अरे, पृथ्वी गोल है? आज भी ‘वर्ल्ड इज फ्लैट’ कर के एक संस्था है, जो इन बातों को नकारती है। तो भले ही ये पश्चिमी जगत के लिए एक खोज था, प्राचीन भारत के लिए एक ऐसी चीज थी, जो उनकी समझ में पहले से समाई हुई थी। आप भारत की प्राचीन संरचनाओं को ही ले लीजिए, आपको पता चलेगा कि हम शुरू से ही ज्योमेट्री और सीमेट्रीसिटी को लेकर अच्छी समझ रखते हैं।

हजारों उदाहरण हैं लेकिन गुजरात स्थित मोढेरा का सूर्य मंदिर को हम यहाँ देख सकते हैं। साल में दो बार ऐसा होता है, जब पृथ्वी की भूमध्य रेखा से सूर्य के केंद्र का आमना-सामना होता है। इसे Equinox कहते हैं। 20 मार्च और 23 सितम्बर के आसपास हर साल यह होता है। सीधे शब्दों में कहें तो यही वो मौका होता है जब सूर्य का केंद्र सीधा भूमध्य रेखा के ऊपर होता है। जब Equinox के दिन सूर्योदय होता था तो सूर्य की किरणें सबसे पहले यहाँ सूर्य की प्रतिमा के सिर पर स्थित हीरे के ऊपर पड़ती थी। इसके बाद पूरा मंदिर स्वर्ण प्रकाश से नहा जाता था।

सीमेट्रीसिटी हमारी पुरानी संरचनाओं का एक अहम भाग रहा है। क्यों? क्योंकि एक ऐसा ही समभाव, एक ऐसी ही सीमेट्रीसिटी आपको प्रकृति हर जगह दिखाती है। ये प्रकृति की एक खासियत है। इसीलिए, प्राचीन भारत की हर संरचनाओं में इसका इस्तेमाल किया जाता था, परफेक्शन के साथ। हम प्रकृति के साथ कितने सहज थे और कितने अच्छे तरीके से उसे समझते थे, उसका ये एक अहम प्रमाण है।

गणित और उसके समीकरणों पर आधारित रहा है हमारा आध्यात्मिक इतिहास
हमारी जो ‘Thought Process’ थी, यानी हमारी जो सोच-विचार की प्रक्रिया थी, हमारा जो दर्शन था, वो हमेशा से गणित पर आधारित रहा है। कहा जाता है कि गणित ‘प्राकृतिक दर्शन (Natural Philosophy)’ का ही एक भाग है। यहाँ तक कि अध्यात्म में भी हम गणित का इस्तेमाल करते थे। दुनिया की कई सभ्यताओं में 16वीं शताब्दी से पहले भी एक से बढ़ कर एक गणितज्ञ हुए हैं, जो मेटा-फिजिक्स में भी पारंगत रहे हैं।

भारत में 7वीं शताब्दी में ही ब्रह्मगुप्त हुए थे, जिन्होंने गणित और खगोलीय ज्ञान से दुनिया को एक नया रास्ता दिखाया। उन्होंने इस पर पुस्तकें लिख कर शून्य (0) की गणना की प्रक्रियाएँ समझाईं। उनके सारे टेक्स्ट अंडाकार, या दीर्घवृत्तीय रूप में हैं। उस समय संस्कृत में ऐसा ही किया जाता है। यानी, हमारी भाषा और उसका साहित्य भी गणित की समझ के हिसाब से लिखे जाते थे। खगोलीय विज्ञान भी प्लेनेट मोशन का कैलकुलेशन है।

गैलीलियो ने भी इसकी गणना की थी। हालाँकि, खगोलीय विज्ञान को व्यक्ति के जीवन के साथ कैसे जोड़ा जाता है या फिर इसका किसी के जन्म-मरण पर क्या प्रभाव है – इस पर बहस हो सकती है। लेकिन, इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि इन सबका आधार गणित ही रहा है। किसी भी सिद्धांत को साबित करने के लिए ‘causality’ या कारण स्पष्ट होना चाहिए। कोई भी चीज क्यों और कैसे हो रही, उसे गणितीय ढंग से साबित किया जा सकता है।

आप कह सकते हैं कि महान ब्रिटिश वैज्ञानिक न्यूटन से पहले ‘नेचुरल फिलॉसोफी’ और विज्ञान एक-दूसरे के साथ ही चलते थे लेकिन उसके बाद वैज्ञानिकों ने इन दोनों को अलग-अलग रूप में लेना शुरू किया और विज्ञान एक अलग ब्रांच बन कर उभरा। इसीलिए, प्राचीन भारतवर्ष में जो गणितज्ञ रहे हैं, वो ऋषि भी रहे हैं। क्योंकि वो गणित और ईश्वर को साथ में देखते थे। वो प्रकृति का अध्ययन करते थे, इसीलिए गणित और ईश्वर को साथ में देखते थे।

भारत में आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य जैसे विद्वानों ने हमेशा से गणित और ईश्वर को साथ में देखा। यहाँ आपको एक काफी रोचक चीज भी बताना चाहेंगे। केरल में 14-16वीं शताब्दी में ही ‘केरला स्कूल ऑफ मैथमेटिक्स एंड एस्ट्रोनॉमी’ (केरलीय गणित समुदाय) का संचालन होता था, जिसकी स्थापना ‘संगमग्राम के माधव’ ने की थी। उनका त्रिकोणमिति, बीजगणित और ज्यामिति के अध्ययन में अहम योगदान था।

उन्होंने ही दुनिया में सबसे पहले π (Pi) की गणना ट्रिगोनोमेट्री के रूप में दी थी। केरल के इस गणितीय समुदाय ने एक के बाद एक आगे बढ़ कर कई समीकरण दिए, जिनका काफी बाद में अध्ययन हुआ और दुनिया भर में लोकप्रिय हुए। यानी, हमारी प्राचीन सभ्यता गणित को लेकर निश्चितता (समीकरण और डेरिवेशन) और ईश्वर को लेकर अनिश्चितता, इन दोनों के साथ ही तारतम्य बिठाने में काफी कुशल हुआ करते थे।
इसी तरह ‘Metaphysics’ दर्शन की वह शाखा है जो किसी ज्ञान की शाखा के वास्तविकता (Reality) का अध्ययन करती है। भारतीय सभ्यता में ‘Personification’ का एक ट्रेंड रहा है, जैसे उन्होंने नदियों, पहाड़ों और प्रकृति के विभिन्न स्वरूपों को जहाँ एक व्यक्ति के रूप में देखा, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने गणित के माध्यम से ईश्वर को डिराइव करने की चेष्टा भी जारी रखी। आज जब गणितीय समीकरणों से माँ दुर्गा की तस्वीर बनाना संभव है, तो ऐसी चीजों को विकसित करने में भारत का बड़ा योगदान है।



सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...