बुधवार, 10 फ़रवरी 2021

day या वार की शुरुआत कब से



 

 १. इतिहास-प्रायः यह कहा जाता है कि भारत में वार का प्रचलन नहीं था, यह सुमेरिया से आया था। ६० वर्ष के चक्र को भी कहते हैं कि यह सुमेरिया से आया था। अभी तक सुमेरिया की कोई ऐसी पुस्तक नहीं मिली है जिसमें वार प्रवृत्ति या ६० वर्ष के चक्र का वर्णन हो। यदि कहें कि विष्णु धर्मोत्तर पुराण में ६० वर्ष के चक्र का विस्तृत वर्णन है, तो उसका उत्तर मिलता है कि यह १२०० ई के बाद की रचना है। भारत के अधिकांश बुद्धिजीवियों का विश्वास है कि दिल्ली पर मुस्लिम अधिकार होने के बाद ही भारत में पुराण लिखे गये। आर्यभट का समय खिसका कर कहा गया कि उन्होंने ग्रीस के हिप्पार्कस की ज्या सारणी की नकल की। एक बार डेविड पिंगरी से मैंने पूछा भी था कि हिप्पार्कस की ज्या सारणा कहां है तो उन्होंने कहा कि यह नहीं है। उनको कहा कि अपने मत के समर्थन में कम से कम अब हिप्पार्कस के नाम पर ग्रीक में ज्या सारणी बना दें। उनहोंने कहा किग्रीक नहीं आती है। आर्यभट ने किस विद्यालय में और क्यों ग्रीक पढ़ा था? ग्रीक में अंक की दशमलव पद्धति नहीं थी, अतः उनकी संख्या पद्धति में कोई गणित सारणी नहीं बन सकती है। इस कारण वहां गणना सम्बन्धी कोई पुस्तक नहीं है।
कहा जाता है कि रामायण, महाभारत में उल्लेख नहीं है अतः भारत में वार का उल्लेख नहीं था। भारत विरुद्ध तर्कों के अनुसार यदि विश्व इतिहास की समीक्षा हो तो अभी तक विश्व में कहीं भी वार प्रवृत्ति आरम्भ नहीं हुई है। अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति ने २० जनवरी को शपथ ली। वह कौन सा वार था या वार के अनुसार इस समय का निर्णय हुआ था? भारत १५अगस्त १९४७ को स्वाधीन हुआ? उस दिन कौन सा वार था तथा यह किस पुस्तक में लिखा है?
वार के प्रयोग कहां तथा क्यों है, इसकी समीक्षा की जा रही है।
२. वैदिक प्रयोग-वेद में वार तथा वासर दोनों शब्दों का प्रयोग है।
वासर का स्पष्ट अर्थ दिन है जो सूर्य के उदय से आरम्भ होता है-
आद् इत् प्रत्नस्य रेतसः ज्योतिष्पश्यन्ति वासरम्। परो यदिध्यते दिवा॥
(ऋक्. ८/६/३०, सामवेद १/२०, काण्व सं. २/१४, ऐतरेय आरण्यक, ३/२/४८, छान्दोग्य उपनिषद्, ३/१७/७)
सोम राजन् प्र ण आयूंषि तारीः। अहानीव सूर्यो वासराणि। (ऋक्, ८/४८/७, निरुक्त,४/७)
वार या वाः के अन्य अर्थ भी हैं। वाः या वार् का अर्थ जल है जो सबको अपने में रख लेता है (अवाप्नोति, गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, १/१/२-तद्यदब्रवीदाभिर्वा अहमिदं सर्वमाप्स्यामि यदिदं किञ्चेति तस्मादापो ऽभवंस्तदपामप्त्वमाप्नोति)। कुछ स्थलों पर इसका अर्थ दिन क्रम भी हो सकता है, जो बार-बार आता है।
अश्व्यो वारो अभवस्तदिन्द्र सृके यत्त्वा प्रत्यहन् देव एक।
अजयो गा अजयः शूर स्सोममवासृजः सर्तवे सप्त सिन्धून्॥ (ऋक्, १/३२/१२)
यहां प्रति अहः (दिन) में सूर्य देव (देव = जो प्रकाशित करे) के उदय से वार का निर्देश है।
विश्वस्मा इदिषुध्यते देवत्रा हव्यमोहिषे। विश्वस्मा इत् सुकृते वारमृण्वत्यग्निर्द्वारा व्यृण्वति॥ (ऋक्, १/१२८/६)
यहां एक वार के समाप्त होने पर अन्य वार के उत्पन्न होने का निर्देश है। विश्वस्मै सुकृते वारं ऋण्वति, द्वारा वि-ऋण्वति। विश्वस्मै = सबके लिए। सुकृत -विश्व सृष्टि, जिसमें, कर्ता, कर्म, फल आदि सभी एक ही ब्रह्म हैं( तैत्तिरीय उपनिषद्, २/७)
वार ७ होने का आधार है-७ प्रकार के चक्र।
स॒प्तास्या॑सन्परि॒धय॒स्त्रिः स॒प्त स॒मिधः॑ कृ॒ताः। दे॒वा यद्य॒ज्ञन्त॑न्वा॒नाऽअब॑ध्न॒न्पुरु॑षम्प॒शुम्॥१५॥
(पुरुष सूक्त, वाज. सं. ३१/१५)
यहां यज्ञ के लिए ४ प्रकार के सप्त हैं-त्रि-सप्त समिधा, सप्त परिधि। समिधा का अर्थ यज्ञ की सामग्री। परिधि के कई अर्थ हैं-७ लोक, जो परिधि के भीतर सीमित हैं, काल चक्र में ७ प्रकार के युग, या उसकी प्रतिमा रूप ७ वार के चक्र।
सप्त युञ्जन्ति रथमेक चक्रो एको अश्वो वहति सप्तनामा-(अस्य वामीय सूक्त, ऋक्, १/१६४/२)
काल प्रवाह को ही अश्व कहा गया है-
कालो अश्वो वहति सप्तरश्मिः सहस्राक्षो अजरो भूरिरेताः। तमारोहन्ति कवयो विपश्चितस्तस्य चक्रा भुवनानि विश्वा॥१॥
सप्त चक्रान् वहति काल एष सप्तास्य नाभीरमृतं न्वक्षः। सा इमा विश्वा भुवनान्यञ्जत् कालः स ईषते प्रथमो नु देवः॥२॥
(अथर्व, शौनक, १९/५३)
अश्व का अर्थ है गति का साधन। गति या परिवर्तन से काल का ज्ञान तथा उसकी माप होती है।
रूपान्तरं तद् द्विज कालसंज्ञम् (विष्णु पुराण, २/२/२४)
गति या क्रिया से यज्ञ होता है। यज्ञ से निर्मित पदार्थ ऋक् या मूर्ति रूप है। काल अनुसार निर्माण क्रिया यज्ञ है। पिण्ड या दृश्य जात् के अनुसार ऋक् प्रथम वेद है। क्रिया या यज्ञ के अनुसार यजुर्वेद मुख्य है। ज्ञान के अनुसार साम मुख्य है, हम तक किसी वस्तु का साम या प्रभाव पहुंचने पर उसका ज्ञान होता है (वेदानां सामवेदोऽस्मि-गीता, १०/२२)।
कालो ह भूत भव्यं च पुत्रो अजनयत् पुरा। कालादृचः समभवन् यजुः कालादजायत॥३॥
कालो यज्ञं समैरद् देवेभ्यो भागमक्षितम्। काले गन्धर्वाप्सरसः काले लोकाः प्रतिष्ठिताः॥४॥
इमं च लोकं परमं च लोकं पुण्यांश्च लोकान् विधितिश्च पुण्याः।
सर्वांल्लोकानभिजित्य ब्रह्मणा कालः स ईयते परमो नु देवः॥५॥
(अथर्व, शौनक, १९/५४)
काल गणना का यह रूप ब्रह्मा द्वारा निर्धारित हुआ जब अभिजित् नक्षत्र की दिशा में ध्रुव था (३८,००० ईपू)। उस समय अभिजित् से वर्ष आरम्भ होता था। बाद में कार्त्तिकेय के समय से अभिजित् का पतन होने पर धनिष्ठा से वर्ष तथा वर्षा का आरम्भ हुआ (महाभारत, वन पर्व, २३०/८-१०)
३. वेदाङ्ग ज्योतिष- इस नाम के ३ ग्रन्थ हैं-ऋक्, याजुष, अथर्वण। ऋक् तथा यजुर्वेद में लिखा है कि वेद यज्ञ के लिए हैं, यज्ञ काल के अनुसार करते हैं। अतः काल निर्धारण के लिए ज्योतिष है।
वेदा हि यज्ञार्थमभिप्रवृत्ताः, कालानुपूर्व्या विहिताश्च यज्ञाः।
तस्मादिदं कालविधानशास्त्रं, यो ज्योतिषं वेद स वेद यज्ञान्॥
(ऋक् ज्योतिष, ३६, याजुष ज्योतिष, ३)
ऋक् ज्योतिष में काल की गणना है जिसके अनुसार १९ वर्ष का युग होता है, इसमें ५ वर्ष संवत्सर हैं, अन्य १४ वर्ष अन्य ४ प्रकार के हैं-परिवत्सर, इदावत्सर, अनुवत्सर, इद्वत्सर। पर कौन सा यज्ञ कब किया जाय यह कहीं नहीं लिखा है। याजुष ज्योतिष में यज्ञ काल के संक्षिप्त उल्लेख हैं-श्लोक ३२-३४ में नक्षत्र देवताओं की सूची दे कर श्लोक ३५ में कहा है कि इन देवों के अनुसार यज्ञ होना चाहिए। नक्षत्र के अनुसार नाम रखने का भी विधान है, पर किस नक्षत्र या उसके पाद के अनुसार क्या नाम होगा, वह (अवकहडा चक्र) नहीं है। श्लोक ३६ में उग्र तथा क्रूर नक्षत्रों के नाम हैं। श्लोक ३८ में मुहूर्त्त मान, तथा ४२ में उपयुक्त समय अर्थ में मुहूर्त्त उल्लेख है।
आथर्वण ज्योतिष में विभिन्न कामों के लिए शुभ-अशुभ मुहूर्त्त तथा पञ्चाङ्ग के ५ अंग दिये हैं-तिथि, वार, नक्षत्र, योग तथा करण। इन सभी के अनुसार मुहूर्त्त के शुभ होने का निर्णय दिया है। श्लोक ९३ में वार का वर्तमान क्रम दिया गया है। उसके बाद किस वार में कौन सा काम उपयुक्त है, यह कहा है। तीनों वेदाङ्ग ज्योतिष मिल कर यज्ञ समय के उद्देश्य से वेदाङ्ग हैं
किन्तु ज्योतिष को वेद का नेत्र कहा है, इस अर्थ में वेद का ज्ञान इनसे नहीं हो रहा है। वेद के ७ लोकों की माप पुराणों के भुवन कोष में है। पौराणिक मापों का मान जैन ज्योतिष में है, तथा इन नामों की परिभाषा यजुर्वेद में है। सूर्य सिद्धान्त में पृथ्वी तथा सौरमण्डल का आकार, गति माप तथा युगमान दिया है। ब्रह्माण्ड का आकार दिया है। इसका सृष्टि सिद्धान्त पुरुष सूक्त, सांख्य तथा पाञ्चरात्र दर्शन का समन्वय है। यजुर्वेद वाज. संहिता (१५/१५-१९, १७/५८, १८/४०) तथा कूर्म पुराण (४१/२-८), मत्स्य पुराण (१२८/२९-३३), ब्रह्माण्ड पुराण, १/२/२४-६५-७३) आदि में सूर्य रश्मियों के माध्यम या उसकी गति से मनुष्य पर प्रभाव तथा ग्रह नक्षत्रों द्वारा उसमें परिवर्तन का वर्णन है। यह मनुष्य को विश्व की प्रतिमा रूप में वर्णन करते हैं, जो वेद का आधार है। किन्तु इसकी व्याख्या सम्बन्धी वेदाङ्ग ज्योतिष ग्रन्थ नहीं है। यह होरा का विषय है जिस पर पराशर तथा वराहमिहिर की प्राचीन पुस्तकें हैं। ये सभी वेदाङ्ग हैं।
४. वार की आवश्यकता-ऐतिहासिक कालक्रम या घटना का वर्णन करने के लिए वार की आवश्यकता नहीं है। अतः इतिहास ग्रन्थों में इसका प्रयोग नहीं है।
सूर्य सिद्धान्त में किसी निर्दिष्ट काल से दिन समूह (अहर्गण) की गणना में वार की आवश्यकता है। सौर वर्ष में क्रमागत दिनों की गणना होती है, उसमें भी ऋतुशेष निकालने के लिए दिनों का जोड़ घटाव करना पड़ता है। चाद्र मास का समन्वय करने के लिए लम्बी गणना है। चान्द्र तिथि, मास, वर्ष का क्रमागत दिनों, सौर मास या वर्ष से स्पष्ट सम्बन्ध नहीं है तथा वह बदलता रहता है। उसकी शुद्धि के लिए देखा जाता है कि दिन संख्या के अनुसारआज जो वार आ रहा है, वह ठीक है या नहीं। अशुद्धि होने पर १-२ दिन कम या अधिक करते हैं। इसे वार शुद्धि कहते हैं।
आधुनिक ज्योतिष में भी प्राचीन गणनाके लिए एक काल्पनिक आधार लिया गया है-१-१-४७१३ ईपू, जिस दिन शुक्रवार था। सूर्य सिद्धान्त के अनुसार सृष्ट्यादि अहर्गण के लिए रविवार से वार आरम्भ करते हैं। सम्भवतः पूरे विश्व में यह स्वीकृत था अतः रविवार की छुट्टी का प्रचलन हुआ। बाइबिल के आरम्भ में सृष्टि का सप्तम दिन (मन्वन्तर) चल रहा है। कलि आरम्भ से गणना के लिए प्रथम वार बुधवार मानते हैं।
सूर्य सिद्धान्त के पूर्व ब्रह्मा द्वारा अभिजित् से या १५८०० ईपू में कार्त्तिकेय द्वारा धनिष्ठा से वर्ष आरम्भ होने पर वर्ष का प्रथम मास माघ होता था। यह भी चान्द्र मास था जिसमें पूर्णिमा के चान्द्र नक्षत्र के अनुसार मास नाम होता था। अतः उस समय की काल गणना बिना वार शुद्धि के सम्भव नहीं थी।
वार का प्रयोग मुहूर्त्त निर्णय या साप्ताहिक दिनचर्या, शिक्षा का कार्यक्रम (रुटीन) आदि के लिए है।
५. वार क्रम-सूर्य सिद्धान्त, भूगोल अध्याय (७८), आर्यभटीय के कालक्रिया पाद (१६) में वार क्रम का आधार दिया है। मन्द गति से क्रमशः तीव्र गति के ग्रह हैं-शनि, बृहस्पति, मंगल, सूर्य (पृथ्वी), शुक्र, बुध, चन्द्र। प्रतिदिन पूर्व क्षितिज पर १२ राशियों का क्रमागत उदय होता है जिसे उस स्थान का लग्न कहते हैं। प्रत्येक राशि का आधा भाग होरा (अहो-रात्र का के मध्य अक्षर) है। अतः प्रतिदिन २४ होरा का उदय होता है। होरा से अंग्रेजी में आवर (hour) हुआ है। किसी वार की प्रथम होरा उसी ग्रह की होती है। उसके बाद बढ़ती गति के क्रम से अन्य ग्रहों की होरा होगी। यथा शनि वार को प्रथम होरा शनि ग्रह की होगी। उसके बाद २१ होरा तक ७ ग्रहों का ३ चक्र पूरा हो जायेगा। दिन रूपी समिधा भी त्रि-सप्त है। उसके बाद उस दिन की ३ होरा तथा अगले दिन की प्रथम होरा आयेगी। इनकी गिनती पुनः शनि से होगी-शनि, बृहस्पति, मंगल, सूर्य। अतः अगला दिन रविवार होगा।
सूर्य सिद्धान्त का वर्तमान रूप मयासुर द्वारा संशोधित है (९२२३ ईपू) में। इसमें पृथ्वी अक्ष का झुकाव, दिन-वर्ष का अनुपात आदि उसी काल के हैं। अतः कम से कम ११,००० वर्ष से वार प्रवृत्ति चल रही है। साभार अरुण उपाध्याय

शनिवार, 9 जनवरी 2021

 

 

   

हिन्दू धर्म में धूप देने और दीपक जलाने का बहुत अधिक महत्त्व है। सामान्य तौर पर धूप दो तरह से ही दी जाती है। पहला गुग्गुल-कर्पूर से और दूसरा गुड़-घी मिलाकर जलते कंडे पर उसे रखा जाता है।  वर्तमान परिस्थितियों में समय की कमी एवं प्रचार की अधिकता के कारण आमतौर पर हम बाजार से लाई गई धूप ही प्रयोग करते है जिनमे भी हमे विभिन्न प्रकार की सुगंघ वाली धूप मिल जाती है लेकिन इनके निर्माण में अधिकांशतः कैमिकल और गाड़ियों का बचा हुआ काला तेल प्रयोग किया जाता है।  गुड़ और घी से दी गई धूप का ख़ास महत्त्व है। इसके लिए सर्वप्रथम एक कंडा जलाया जाता है। फिर कुछ देर बाद जब उसके अंगारे ही रह जाएँ, तब गुड़ और घी बराबर मात्रा में लेकर उक्त अंगारे पर रख दिया जाता है और उसके आस-पास अँगुली से जल अर्पण किया जाता है। अँगुली से देवताओं को और अँगूठे से अर्पण करने से वह धूप पितरों को लगती है। जब देवताओं के लिए धूप दान करें, तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश का ध्यान करना चाहिए और जब पितरों के लिए अर्पण करें, तब अर्यमा सहित अपने पितरों का ध्यान करना चाहिए तथा उनसे सुख-शांति की कामना करें।  नियम 〰️〰️〰️ हिन्दू धर्म में धूपबत्ती आदि से धूप देने के भी नियम बताए गये हैं, जैसे-  किसी कारण से यदि रोज धूप नहीं दे पाएँ तो त्रयोदशी, चतुर्दशी तथा अमावस्या और पूर्णिमा को सुबह-शाम धूप अवश्य देना चाहिए। सुबह दी जाने वाली धूप देवगणों के लिए और शाम को दी जाने वाली धूप पितरों के लिए होती है।  धूप देने के पूर्व घर की सफाई करनी चाहिए। पवित्र होकर-रहकर ही धूप देना चाहिए। धूप ईशान कोण में ही दें। घर के सभी कमरों में धूप की सुगंध फैल जानी चाहिए। धूप देने और धूप का असर रहे तब तक किसी भी प्रकार का संगीत नहीं बजाना चाहिए। हो सके तो कम से कम बात करना चाहिए।  धूप के प्रकार 〰️〰️〰️〰️ तंत्रसार के अनुसार अगर, तगर, कुष्ठ, शैलज, शर्करा, नागरमाथा, चंदन, इलायची, तज, नखनखी, मुशीर, जटामांसी, कर्पूर, ताली, सदलन और गुग्गुल ये सोलह प्रकार के धूप माने गए हैं। इसे 'षोडशांग धूप' कहते हैं।   'मदरत्न' के अनुसार चंदन, कुष्ठ, नखल, राल, गुड़, शर्करा, नखगंध, जटामांसी, लघु और क्षौद्र सभी को समान मात्रा में मिलाकर जलाने से उत्तम धूप बनती है। इसे 'दशांग धूप' कहा जाता है।   इसके अतिरिक्त भी अन्य मिश्रणों का भी उल्लेख मिलता है, जैसे- छह भाग कुष्ठ, दो भाग गुड़, तीन भाग लाक्षा, पाँचवाँ भाग नखला, हरीतकी, राल समान अंश में, दपै एक भाग, शिलाजय तीन लव जिनता, नागरमोथा चार भाग, गुग्गुल एक भाग लेने से अति उत्तम धूप तैयार होती है। रुहिकाख्य, कण, दारुसिहृक, अगर, सित, शंख, जातीफल, श्रीश ये धूप में श्रेष्ठ माने जाते हैं।  इन सबके अतिरिक्त दैनिक पूजन अथवा विशेष कामना से निम्न धूप अथवा धूनी का प्रयोग भी किया जाता है इनके प्रकार और फल निम्नलिखित है। 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 1- कर्पूर और लौंग 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ रोज़ाना सुबह और शाम घर में कर्पूर और लौंग जरूर जलाएं। आरती या प्रार्थना के बाद कर्पूर जलाकर उसकी आरती लेनी चाहिए। इससे घर के वास्तुदोष ख़त्म होते हैं। साथ ही पैसों की कमी नहीं होती।  2- गुग्गल की धूनी 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ हफ्ते में 1 बार किसी भी दिन घर में कंडे जलाकर गुग्गल की धूनी देने से गृहकलह शांत होता है। गुग्गल सुगंधित होने के साथ ही दिमाग के रोगों के लिए भी लाभदायक है।  3- पीली सरसों 〰️〰️〰️〰️〰️ पीली सरसों, गुग्गल, लोबान, गौघृत को मिलाकर सूर्यास्त के समय उपले (कंडे) जलाकर उस पर ये सारी सामग्री डाल दें। नकारात्मकता दूर हो जाएगी।  4- धूपबत्ती 〰️〰️〰️〰️ घर में पैसा नहीं टिकता हो तो रोज़ाना महाकाली के आगे एक धूपबत्ती लगाएं। हर शुक्रवार को काली के मंदिर में जाकर पूजा करें।  5- नीम के पत्ते 〰️〰️〰️〰️〰️ घर में सप्ताह में एक या दो बार नीम के पत्ते की धूनी जलाएं। इससे जहां एक और सभी तरह के जीवाणु नष्ट हो जाएंगे। वही वास्तुदोष भी समाप्त हो जाएगा।  6- षोडशांग धूप 〰️〰️〰️〰️〰️ अगर, तगर, कुष्ठ, शैलज, शर्करा, नागर, चंदन, इलायची, तज, नखनखी, मुशीर, जटामांसी, कर्पूर, ताली, सदलन और गुग्गल, ये सोलह तरह के धूप माने गए हैं। इनकी धूनी से आकस्मिक दुर्घटना नहीं होती है।  7- लोबान धूनी 〰️〰️〰️〰️〰️ लोबान को सुलगते हुए कंडे या अंगारे पर रख कर जलाया जाता है, लेकिन लोबान को जलाने के नियम होते हैं इसको जलाने से पारलौकिक शक्तियां आकर्षित होती है। इसलिए बिना विशेषज्ञ से पूछे इसे न जलाएं।  8- दशांग धूप 〰️〰️〰️〰️ चंदन, कुष्ठ, नखल, राल, गुड़, शर्करा, नखगंध, जटामांसी, लघु और क्षौद्र सभी को समान मात्रा में मिलाकर जलाने से उत्तम धूप बनती है। इसे दशांग धूप कहते हैं। इससे घर में शांति रहती है।  9- गायत्री केसर 〰️〰️〰️〰️〰️ घर पर यदि किसी ने कुछ तंत्र कर रखा है तो जावित्री, गायत्री केसर लाकर उसे कूटकर मिला लें। इसके बाद उसमें उचित मात्रा में गुग्गल मिला लें। अब इस मिश्रण की धुप रोज़ाना शाम को दें। ऐसा 21 दिन तक करें।  पुराण में उल्लेख 〰️〰️〰️〰️〰️ 'हेमाद्रि' ने धूप के कई मिश्रणों का उल्लेख किया है, यथा- अमृत, अनन्त, अक्षधूप, विजयधूप, प्राजापत्य, दस अंगों वाली धूप का भी वर्णन है।  'कृत्यकल्पतरु' ने 'विजय' नामक धूप के आठ अंगों का उल्लेख किया है।  'भविष्य पुराण' का कथन है कि विजय धूपों में श्रेष्ठ है, लेपों में चन्दन लेप सर्वश्रेष्ठ है, सुरभियों (गन्धों) में कुंकुम श्रेष्ठ है, पुष्पों में जाती तथा मीठी वस्तुओं में मोदक (लड्डू) सर्वोत्तम है। 'कृत्यकल्पतरु' ने इसका उदधृत किया है। धूप से मक्खियाँ एवं पिस्सू नष्ट हो जाते हैं।  सामान्य धुप बत्ती बनाने की सामग्री 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ गोबर 100 ग्राम लकड़ी कोयला 125 ग्राम नागरमोथा 125 ग्राम लाल चन्दन 125 ग्राम जटामासी 125 ग्राम कपूर कांचली 100 ग्राम राल। 250 ग्राम घी 200 ग्राम चावल की धोवन 200 ग्राम चन्दन तेल या केवड़ा तेल 20 ml  षोडशांग धूप के लिये सामग्री 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ अगर, तगर, कुष्ठ, शैलज, शर्करा, नागरमाथा, चंदन, इलायची, तज, नखनखी, मुशीर, जटामांसी, कर्पूर, ताली, सदलन और गुग्गुल ये सोलह प्रकार की सामग्री मिलाकर बनाए।  दशांग धूप के लिये सामग्री 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ चंदन, कुष्ठ, नखल, राल, गुड़, शर्करा, नखगंध, जटामांसी, लघु और क्षौद्र सभी को समान मात्रा में मिलाकर जलाने से उत्तम धूप बनती है। इसे 'दशांग धूप' कहा जाता है।   इन सभी को मिलाकर आटे की तरह गूथ ले यहाँ ध्यान दें इसे गूथने में जितनी ज्यादा मेहनत करेंगे परिणाम उतने ही अच्छे मिलेंगे अन्यथा बाद में जलाने से पहले इसे आकार देने के लिये हाथों में जब रगड़ते है तो यह बत्ती बनने की जगह फैल भी सकती है। अच्छी तरह गूथने पर बाद में मनचाहे आकर की धूपबत्ती बना सकते है।   धूप जलाने के लाभ 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ गोमय और जड़ी बूटियों से बनी इस पूजा धुप के उपयोग से कई लाभ है। यह पर्यावरण को शुद्ध कर प्रदूषणमुक्त करता है। इसके धुंए से वातावरण में फैले रोगाणु नष्ट होते है। धूप देने से मन, शरीर और घर में शांति की स्थापना होती है। रोग और शोक मिट जाते हैं। गृह कलह और आकस्मिक घटना-दुर्घटना नहीं होती। घर के भीतर व्याप्त सभी तरह की नकारात्मक ऊर्जा बाहर निकलकर घर का वास्तुदोष मिट जाता है। ग्रह-नक्षत्रों से होने वाले छिटपुट बुरे असर भी धूप देने से दूर हो जाते हैं। श्राद्ध पक्ष में 16 दिन ही दी जाने वाली धूप से पितृ तृप्त होकर मुक्त हो जाते हैं तथा पितृदोष का समाधान होकर पितृयज्ञ भी पूर्ण होता है।  प्रतिदिन घर, कार्यालय में धुप का उपयोग करने से गो शाला स्वावलम्बी बनेगी और उसकी रक्षा होगी।

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2020

सिख सनातन का अंग और अभेद्य सुरक्षा कवच की जिम्मेदारी से अलगाव अंग्रेजों की चाल है

  



सिख पंथ में अलगाववाद कैसे फैलाया गया?

सिख , हिन्दू नहीं होते है , इस फर्ज़ीवाड़े को सबसे पहले गढ़ने वाला मैक्स आर्थर मेकलीफ़ ( Max Arthur Macauliffe) था ।

यह गुरुमुखी का विद्वान भी था जिसने Guru Granth Sahib का English translation भी किया था ।

Max Arthur Macauliffe जिसे सिख पंथ को एक धार्मिक संस्था का रूप दिया था का हिंदूइस्म के विषय में क्या विचार थे जरा ध्यान दे-

It (Hinduism) is like the boa constrictor of the Indian forests. When a petty enemy appears to worry it, it winds round its opponent, crushes it in its folds, and finally causes it to disappear in its capacious interior....Hinduism has embraced Sikhism in its folds; the still comparatively young religion is making a vigorous struggle for life, but its ultimate destruction is, it is apprehended, inevitable without State support.

【 हिंदी अनुवाद - यह (हिंदू धर्म) भारतीय जंगलों का Boa Constrictor (उष्णकटिबंधीय अमेरिका का एक बड़ा और शक्तिशाली सर्प, कभी-कभी बीस या तीस फुट लंबा ) की तरह है। जब एक छोटा विरोधी इसकी चिंता करता प्रतीत होता है, तो यह अपने प्रतिद्वंद्वी के चारों ओर घूमता है, इसे अपने लपेटे में ले लेता है, और आखिरकार इसे अपने विशालता में गायब कर देता है .... हिंदू धर्म ने सिख धर्म को अपने लपेटे में लिया है; अभी भी तुलनात्मक रूप से यह युवा धर्म जीवन के लिए एक सशक्त संघर्ष कर रहा है, लेकिन इसका अंतिम विनाश यह है कि इसे राज्य समर्थन के बिना अपरिहार्य माना जाता है। 】

Max Arthur Macauliffe 1864 मे इंडियन सिविल सर्विसेज से पंजाब में आया था। 1882 में ये पंजाब का डिप्टी कमीशनर बना।

मेकलीफ़ वो पहला इंसान था जिसने सिख हिन्दू नहीं है कि परिकल्पना की थी। उसने देखा कि सिख एक मार्शल कौम है। इसलिए सिख आर्मी के लिए उपयुक्त है।

इसलिए इन्होंने पंजाब मे आर्मी की नौकरी में सिखों के लिए आरक्षण लागु कर दिया। जिसके परिणाम स्वरूप कोई भी राम कुमार सरकारी नौकरी नही पा सकता था पर वही राम कुमार दाड़ी मूछ और पगडी रखकर राम सिंह बनकर नौकरी पा सकता था। उस समय तक इसे धर्म परिवर्तन नहीं माना जाता था।

इसका नतीजा ये हुआ कि पंजाब मे सिख population 1881 से 1891 के बीच 8.5% बढी।

1891 से 1901 के बीच 14% बढी।

1901 से 1911 के बीच 37% बढी।

1911 से 1921 के बीच 8% बढी।

इनके पंजाबी के ट्यूटर थे Kahn Singh Nabha जिन्होने 1889 मे "हम हिन्दू नहीं" नामक पुस्तक लिखी । जिसको Macauliffe जी ने फंड किया और ये सबसे पहला कुटिल प्रयास था हिन्दू सिखों को अलग बताने का

1909 मे खुद Macauliffe साहब ने भी Sikh religion: Its Gurus, Sacred writings, and authors नामक पुस्तक लिखी । जिसकी भूमिका में इन्होंने ये भी बताया है कि किस तरह इन्होंने खालसा पूजा पद्यति आरम्भ की और सिखो के लिए आर्मी में अलग शपथ परम्परा की शुरुआत की ।

इस समय तक गुरूद्वारो ( दरबार) महंतो और साधुओं की देखरेख मे होते थे। गुरूद्वारो के लिए महंतो और हिन्दु पुरोहित की जगह खालसा सिखो की प्रबंधक कमेटी का विचार भी इन्हीं का था। इन गुरूद्वारो से जुड़ी हुई जमीन और सम्पत्ति भी थी।

1920 के शुरूआत से महंतो से गुरूद्वारो को छीनने का अकाली दल का सिलसिला चालू हुआ। इसके लिए महंतो पर तरह तरह के आरोप लगाकर( महिलाओ से दुष्कर्म, गलत कर्मकांड आदि) उन्हे बदनाम किया गया, जनता मे उनके खिलाफ छवि बनाई गयी।

सबसे पहले बाबे दी बेर गुरूद्वारा, सियालकोट जो एक महंत की विधवा की देखरेख मे था, बलपूर्वक कब्जाया गया।

फिर हरमंदिर साहिब ( स्वर्ण मंदिर) छीना गया। फिर गुरूद्वारा पंजा साहिब कब्जाया गया। इसका कब्जे के विरोध 5-6 हजार लोगो ने गुरूद्वारा घेर लिया जिन्हे पुलिस ने बलपूर्वक हटाया।

फिर गुरूद्वारा सच्चा सौदा, गुरूद्वारा तरन तारन साहिब आदि महंतो पर आरोप लगा पुलिस के सहयोग से कब्जाये गये।

इन कब्जो के लिए महंतो को पीटा गया उनकी हत्यारे की गई। जिसके लिए बाकायदा बब्बर अकाली नामक दल का गठनकर मूवमेंट चलाया गया।

ननकाना साहिब गुरूद्वारे पर कब्जा सबसे अधिक बडा खूनी इतिहास है। जिसमे दोनो के कई सैकडो लोग तक मारे गये।

फिर गुरूद्वारा गंजसर नाभा और कई अन्य हिसंक तरीके एवं पुलिस के सहयोग से महंतो से छीने गये।

1925 मे सिख गुरूद्वारा बिल पारित हुआ और कानून बना कर गुरूद्वारो के कब्जे खालसा सिखो को दिये गये। SGPC का गठन हुआ।

फिर एक रेहता मर्यादा बनाई गई जो तय करती है कि कौन सिख है और कौन नही। जिसका पूर्णरूपेण उद्देश्य सिख से हिन्दू विघटन निकाला है।

SGPC के तत्वावधान मे सिख इतिहास को नये सिरे से लिखा गया। हिन्दू परछाई को को सिख मे से जितना हो सके अलग किया गया। नये नये हिन्दू ( खासकर ब्राह्मण) विलेन कैरेक्टर सिख इतिहास में घड़े गए।

पंजाबी मे पारसी भाषा के शब्दो का अधिकधिक प्रयोग किया गया। गंगू बामन और स्वर्ण मंदिर की नीव मुसलमान के हाथो रखवाना, जिसका इससे पहले कोई प्रमाण और इतिहास नही है, घडे गये और इनका प्रचार किया गया ।

गुरू गोविंद सिंह जी की वाणी दशम ग्रंथ मे चंडी दी वार और विचित्र नाटक को इसमे ब्राह्मणी मिलावट घोषित किया गया।

हकीकत राय, सति दास, मति दास, भाई दयाल आदि के बलिदानों को सिखों के बलिदान बताकर प्रचारित किया गया। जबकि इनके वंशज तो आज की तारीख मे भी हिन्दू है।

बंदा बहादुर जिसका की उस समय तत खालसा बनाकर विरोध किया गया और मुग़लों से मिलकर मिलकर उन्हें पकड़वाया गया था। SGPC आज उन्हें सिख हीरो के रूप में बताती है।

निर्मली अखाडा जोकि गुरू गोविंद सिंह जी का ही डाला हुआ है और संस्कृत एवं वेदांत के प्रचार प्रसार को समर्पित है हिन्दू विरोध की खातिर इस तक को SGPC ने सिख इतिहास से नकार दिया।

गुरू नानक के पुत्र थे श्रीचंद जोकि अपने समय कै महानतम और प्रसिद्ध योगी थे ने उदासीन पंथ की स्थापना की थी।

गुरू राम राय जोकि गुरू हर राय के बडे पुत्र थे ने देहरादून मे अपनी गद्दी स्थापित की। इनकी जगह इनके छोटे भाई कृष्ण राय ने पिता की गद्दी सम्भाली और अगले सिख गुरू कहलाये।

ये सभी अखाडे आज भी महंतो द्वारा संचालित है। समाज सेवा मे है।

आनंद मैरिज एक्ट पास कर सिखों के लिए अलग से विवाह पद्यति आरम्भ की गई। अन्यथा 1920 से पहले तक तो हिन्दू पुरोहित ही सिख घरों में विवाह आदि वैदिक संस्कार करवाने जाते थे।

पर Max Arthur Macauliffe की नीति जिससे एक अलग खालसा सिख पंथ की नीव पड़ी की परिणति खालिस्तान आन्दोलन के रूप में सामने आई। बब्बर खालसा उग्रवादियों ने करीब 50000 हजार निरपराध हिन्दुओं की हत्या कर दी। अवसरवादी राजनीती के चलते इन हत्याओ को इस देश ने भुला दिया।

सिखों का धार्मिक ग्रन्थ है "गुरु ग्रन्थ साहिब" इसको आप उठाकर पढ़ेंगे और देखेंगे तो इसमें "हरी" शब्द 8 हज़ार से भी अधिक बार इस्तेमाल किया गया है, वहीँ "राम" शब्द 2500 से अधिक बार हैं।

गोविन्द सिंह का तो नाम भी "गोविन्द है" और "सिंह" हिन्दू उपनाम है, जो सिख समूह के बनने से पहले से ही हिन्दू इस्तेमाल करते आये है ।

खालिस्तानी वो लोग हैं जो श्री गुरु ग्रन्थ साहिब में दर्ज हिंदुओं की बानी के बावजूद अपने ही धर्म ग्रन्थ को झुठला कर कहते हैं कि "यह वो राम , वो। कृष्णा, वो जगदीश " नहीं हैं। अपने ही दसवें गुरु के लिखे चण्डी दी वार " चढ़ मैदान चण्डी महिषासुर नु मारे" को झुठलाते हैं। "देव शिवा वर मोहे इहे" को झुठलाते हैं। लाखों खालिस्तानी है आज, इनका पूरा गैंग सक्रिय है, कनाडा, ब्रिटैन जैसे देशों में तो इनका पूरा गैंग ही सक्रिय है, और पाकिस्तान से इनकी बड़ी मित्रता है

ये हिन्दुओ को गाली देते है । ये हिन्दुओ की ही संतान, इन सभी के पूर्वज हिन्दू ही थे, स्वयं नानक भी पैदा होते हुए हिन्दू थे

उनके पिता का नाम कालू चंद, (कालू, कल्याण मेहता) था ।

और ये खालिस्तानी हिन्दुओ को गाली देते है, इन खालिस्तानियों को औरंगजेब और पाकिस्तान प्यारा है ।

आईये इस अलगववदवादी मानसिकता से बचे। एकता में ही शक्ति है। यह सन्देश स्मरण करे।

सलंग्न चित्र-पाकिस्तान में स्थित एक गुरूद्वारे का है जिसमें पाकिस्तान सरकार ने एक इस्लामिक स्कूल में परिवर्तित कर दिया।

रविवार, 29 नवंबर 2020

मोतियाबिंद और आखों की संपूर्ण स्वदेशी चिकित्सा

स्वदेशी अपनाओ देश बचाओ मोतियाबिंद एक आम समस्या बनता जा रहा है, अब तो युवा भी इस रोग के शिकार होने लगे हैं। अगर इस रोग का समय रहते इलाज न किया जाए तो रोगी अंधेपन का शिकार हो जाता है। कारण : मोतियाबिंद रोग कई कारणों से होता है। आंखों में लंबे समय तक सूजन बने रहना, जन्मजात सूजन होना, आंख की संरचना में कोई कमी होना, आंख में चोट लग जाना, चोट लगने पर लंबे समय तक घाव बना रहना, कनीनिका में जख्म बन जाना, दूर की चीजें धूमिल नजर आना या सब्जमोतिया रोग होना, आंख के परदे का किसी कारणवश अलग हो जाना, कोई गम्भीर दृष्टि दोष होना, लंबे समय तक तेज रोशनी या तेज गर्मी में कार्य करना, डायबिटीज होना, गठिया होना, धमनी रोग होना, गुर्दे में जलन का होना, अत्याधिक कुनैन का सेवन, खूनी बवासीर का रक्त स्राव अचानक बंद हो जाना आदि समस्याएँ मोतियाति‍बिंद को जन्म दे सकती हैं। मोतियाबिंद का आयुर्वेदिक इलाज रक्त मोतियाबिंद में सभी चीजें लाल, हरी, काली, पीली और सफेद नजर आती हैं। परिम्लामिन मोतियाबिंद में सभी ओर पीला-पीला नजर आता है। ऐसा लगता है जैसे कि पेड़-पौधों में आग लग गई हो। सभी प्रकार के मोतियाबिंद में आंखों के आस-पास की स्थिति भी अलग-अलग होती है। वातज मोतियाबिंद में आंखों की पुतली लालिमायुक्त, चंचल और कठोर होती है। पित्तज मोतियाबिंद में आंख की पुतली कांसे के समान पीलापन लिए होती है। कफज मोतियाबिंद में आंख की पुतली सफेद और चिकनी होती है या शंख की तरह सफेद खूँटों से युक्त व चंचल होती है। सन्निपात के मोतियाबिंद में आंख की पुतली मूंगे या पद्म पत्र के समान तथा उक्त सभी के मिश्रित लक्षणों वाली होती है। परिम्लामिन में आंख की पुतली भद्दे रंग के कांच के समान, पीली व लाल सी, मैली, रूखी और नीलापन लिए होती है। मोतियाबिंद का आयुर्वेदिक इलाज आंखों में लगाने वाली औषधियाँ- त्रिफला के जल से आंखें धोना:: आयुर्वेद में हरड़ की छाल (छिलका), बहेड़े की छाल और आमले की छाल धोने की विधि त्रिफला की टिकिया (१) त्रिफला को जल के साथ पीसकर टिकिया बनायें और आंखों पर रखकर पट्टी बांध दें । इससे तीनों दोषों से दुखती हुई आंखें ठीक हो जाती हैं । (२) हरड़ की गिरी (बीज) को जल के साथ निरन्तर आठ दिन तक खरल करो । इसको नेत्रों में डालते रहने से मोतियाबिन्द रुक जाता है । यह रोग के आरम्भ में अच्छा लाभ करता है । * मोतियाबिंद की शुरुआती अवस्था में भीमसेनी कपूर स्त्री के दूध में घिसकर नित्य लगाने पर यह ठीक हो जाता है। * हल्के बड़े मोती का चूरा 3 ग्राम और काला सुरमा 12 ग्राम लेकर खूब घोंटें। जब अच्छी तरह घुट जाए तो एक साफ शीशी में रख लें और रोज सोते वक्त अंजन की तरह आंखों में लगाएं। इससे मोतियाबिंद अवश्य ही दूर हो जाता है। * छोटी पीपल, लाहौरी नमक, समुद्री फेन और काली मिर्च सभी 10-10 ग्राम लें। इसे 200 ग्राम काले सुरमा के साथ 500 मिलीलीटर गुलाब अर्क या सौंफ अर्क में इस प्रकार घोटें कि सारा अर्क उसमें सोख लें। अब इसे रोजाना आंखों में लगाएं। * 10 ग्राम गिलोय का रस, 1 ग्राम शहद, 1 ग्राम सेंधा नमक सभी को बारीक पीसकर रख लें। इसे रोजाना आंखों में अंजन की तरह प्रयोग करने से मोतियाबिंद दूर होता है। * मोतियाबिंद में उक्त में से कोई भी एक औषधि आंख में लगाने से सभी प्रकार का मोतियाबिंद धीरे-धीरे दूर हो जाता है। सभी औषधियां परीक्षित हैं। नेत्र रोगों में कुदरती पदार्थों से ईलाज करना फ़ायदेमंद रहता है। मोतियाबिंद बढती उम्र के साथ अपना तालमेल बिठा लेता है। अधिमंथ बहुत ही खतरनाक रोग है जो बहुधा आंख को नष्ट कर देता है। आंखों की कई बीमारियों में नीचे लिखे सरल उपाय करने हितकारी सिद्ध होंगे- १) सौंफ़ नेत्रों के लिये हितकर है। मोतियाबिंद रोकने के लिये इसका पावडर बनालें। एक बडा चम्मच भर सुबह शाम पानी के साथ लेते रहें। नजर की कमजोरी वाले भी यह उपाय करें। २) विटामिन ए नेत्रों के लिये अत्यंत फ़ायदेमंद होता है। इसे भोजन के माध्यम से ग्रहण करना उत्तम रहता है। गाजर में भरपूर बेटा केरोटिन पाया जाता है जो विटामिन ए का अच्छा स्रोत है। गाजर कच्ची खाएं और जिनके दांत न हों वे इसका रस पीयें। २०० मिलि.रस दिन में दो बार लेना हितकर माना गया है। इससे आंखों की रोशनी भी बढेगी। मोतियाबिंद वालों को गाजर का उपयोग अनुकूल परिणाम देता है। ३) आंखों की जलन,रक्तिमा और सूजन हो जाना नेत्र की अधिक प्रचलित व्याधि है। धनिया इसमें उपयोगी पाया गया है।सूखे धनिये के बीज १० ग्राम लेकर ३०० मिलि. पानी में उबालें। उतारकर ठंडा करें। फ़िर छानकर इससे आंखें धोएं। जलन,लाली,नेत्र शौथ में तुरंत असर मेहसूस होता है। ४) आंवला नेत्र की कई बीमारियों में लाभकारी माना गया है। ताजे आंवले का रस १० मिलि. ईतने ही शहद में मिलाकर रोज सुबह लेते रहने से आंखों की ज्योति में वृद्धि होती है। मोतियाबिंद रोकने के तत्व भी इस उपचार में मौजूद हैं। ५) भारतीय परिवारों में खाटी भाजी की सब्जी का चलन है। खाटी भाजी के पत्ते के रस की कुछ बूंदें आंख में सुबह शाम डालते रहने से कई नेत्र समस्याएं हल हो जाती हैं। मोतियाबिंद रोकने का भी यह एक बेहतरीन उपाय है। ६) अनुसंधान में साबित हुआ है कि कद्दू के फ़ूल का रस दिन में दो बार आंखों में लगाने से मोतियाबिंद में लाभ होता है। कम से कम दस मिनिट आंख में लगा रहने दें। ७) घरेलू चिकित्सा के जानकार विद्वानों का कहना है कि शहद आंखों में दो बार लगाने से मोतियाबिंद नियंत्रित होता है। ८) लहसुन की २-३ कुली रोज चबाकर खाना आंखों के लिये हितकर है। यह हमारे नेत्रों के लेंस को स्वच्छ करती है। ९) पालक का नियमित उपयोग करना मोतियाबिंद में लाभकारी पाया गया है। इसमें एंटीआक्सीडेंट तत्व होते हैं। पालक में पाया जाने वाला बेटा केरोटीन नेत्रों के लिये परम हितकारी सिद्ध होता है। ब्रिटीश मेडीकल रिसर्च में पालक का मोतियाबिंद नाशक गुण प्रमाणित हो चुका है। १०) एक और सरल उपाय बताते हैं ११) किशमिश ,अंजीर और खारक पानी में रात को भिगो दें और सुबह खाएं । मोतियाबिंद की अच्छी घरेलू दवा है। १२) भोजन के साथ सलाद ज्यादा मात्रा में शामिल करें । सलाद पर थोडा सा जेतून का तेल भी डालें। इसमें प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत करने के गुण हैं जो नेत्रों के लिये भी हितकर है। मोतियाबिंद दो प्रकार का होता है। 1.nuclear cataract. 2.cortical cataract. उक्त दोनो तरह के मोतियाबिंद बनने से रोकने के लिये विटामिन ए तथा बी काम्प्प्लेक्स का दीर्घावधि तक उपयोग करने की सलाह दी जाती है। अगर मोतियाबिंद प्रारंभिक हालत में है तो रोक लगेगी। खाने वाली औषधियाँ- आंखों में लगने वाली औषधि के साथ-साथ जड़ी-बूटियों का सेवन भी बेहद फायदेमन्द साबित होता है। एक योग इस प्रकार है, जो सभी तरह के मोतियाबिंद में फायदेमन्द है- * 500 ग्राम सूखे आँवले गुठली रहित, 500 ग्राम भृंगराज का संपूर्ण पौधा, 100 ग्राम बाल हरीतकी, 200 ग्राम सूखे गोरखमुंडी पुष्प और 200 ग्राम श्वेत पुनर्नवा की जड़ लेकर सभी औषधियों को खूब बारीक पीस लें। इस चूर्ण को अच्छे प्रकार के काले पत्थर के खरल में 250 मिलीलीटर अमरलता के रस और 100 मिलीलीटर मेहंदी के पत्रों के रस में अच्छी तरह मिला लें। इसके बाद इसमें शुद्ध भल्लातक का कपड़छान चूर्ण 25 ग्राम मिलाकर कड़ाही में लगातार तब तक खरल करें, जब तक वह सूख न जाए। इसके बाद इसे छानकर कांच के बर्तन में सुरक्षित रख लें। इसे रोगी की शक्ति व अवस्था के अनुसार 2 से 4 ग्राम की मात्रा में ताजा गोमूत्र से खाली पेट सुबह-शाम सेवन करें। फायदेमन्द व्यायाम व योगासन- * औषधियाँ प्रयोग करने के साथ-साथ रोज सुबह नियमित रूप से सूर्योदय से दो घंटे पहले नित्य क्रियाओं से निपटकर शीर्षासन और आंख का व्यायाम अवश्य करें। * आंख के व्यायाम के लिए पालथी मारकर पद्मासन में बैठें। सबसे पहले आंखों की पुतलियों को एक साथ दाएँ-बाएँ घुमा-घुमाकर देखें फिर ऊपर-नीचे देखें। इस प्रकार यह अभ्यास कम से कम 10-15 बार अवश्य करें। इसके बाद सिर को स्थिर रखते हुए दोनों आंखों की पुतलियों को एक गोलाई में पहले सीधे फिर उल्टे (पहले घड़ी की गति की दिशा में फिर विपरीत दिशा में) चारों ओर घुमाएँ। इस प्रकार कम से कम 10-15 बार करें। इसके बाद शीर्षासन करें। कुछ खास हिदायतें * मोतियाबिंद के रोगी को गेहूँ की ताजी रोटी खानी चाहिए। गाय का दूध बगैर चीनी का ही पीएँ। गाय के दूध से निकाला हुआ घी भी सेवन करें। आंवले के मौसम में आंवले के ताजा फलों का भी सेवन अवश्य करें। फलों में अंजीर व गूलर अवश्यक खाएं। * सुबह-शाम आंखों में ताजे पानी के छींटे अवश्य मारें। मोतियाबिंद के रोगी को कम या बहुत तेज रोशनी में नहीं पढ़ना चाहिए और रोशनी में इस प्रकार न बैठें कि रोशनी सीधी आंखों पर पड़े। पढ़ते-लिखते समय रोशनी बार्ईं ओर से आने दें। * वनस्पति घी, बाजार में मिलने वाले घटिया-मिलावटी तेल, मांस, मछली, अंडा आदि सेवन न करें। मिर्च-मसाला व खटाई का प्रयोग न करें। कब्ज न रहने दें। अधिक ठंडे व अधिक गर्म मौसम में बाहर न निकलें

शुक्रवार, 27 नवंबर 2020

विशुद्धानंद परमहंस सूर्य साधक गंध बाब हिमालय की रहस्यमई और रोमांचकारी दुनिया के

   

  हिमालय के जितने अंदर जाएंगे, उतनी हमें नई जानकारियां उपलब्ध होती जाएंगी। देवात्मा हिमालय का वर्णन अवर्णनीय है। कहते हैं हिमालय में बडे-बडे आश्रम हैं। जहां पर आज भी सैकडों साधक अपनी-अपनी साधना में लगे हुए हैं। हिमालय की हसीन वादियों में छुपा है एक गहरा राज़.. राज़ उन अनजाने चेहरों का जो इस दुनिया में कहीं नहीं दिखाई देते, राज़ उन अनजाने लोगों को जिन्हें इस दुनिया का नहीं कहा जा सकता. ये रहस्य करीब 250 साल पुराना है और इसे जानने के लिए हिमालय की बर्फीली घाटियों में तांत्रिक कर रहे हैं अब तक की सबसे बड़ी साधना; कहते हैं हिमालय में बडे-बडे आश्रम हैं। जहां पर आज भी सैकडों साधक अपनी-अपनी साधना में लगे हुए हैं। ऐसे ही इस हिमाच्छादित प्रदेश में अनंत रहस्यों से भरा है एक मठ जिसका नाम है ज्ञानगंज। वैसे तो इस आश्रम की स्थापना एक हजार पांच सौ वर्ष पूर्व हुई थी परन्तु इसको प्रकट करने का श्रेय जाता है बनारस के मायावी या गंधबाबा के नाम से प्रसिद्ध स्वामी श्री विशुद्धानंद परमहंस को। हम हिमालय के जितने अंदर जाएंगे, उतनी हमें नई जानकारियां उपलब्ध होती जाएंगी। देवात्मा हिमालय का वर्णन अवर्णनीय है। महर्षि महातपा की उम्र है लगभग १४०० वर्ष जो अधिकतर निराहार ही रहते हैं। श्री भृगराम परमहंस देव जी लगभग ४५० वर्ष के हैं। इसके अलावा पायलट बाबा का भी कहना है कि वह हिमालय में छह-छह माह निराहार रहते है। हिमालय के रहस्यमय व दिव्य स्वरुप के बारे में उनकी दो पुस्तकें बेजोड हैं
  "गंध बाबा"
(रोचक,विस्मयकारी जानकारी)
गंध बाबा के नाम से प्रसिद्ध विशुद्धानंद परमहंस सूर्य विग्यान के प्रवर्तक माने जाते हैं। वे तत्काल कोई भी गंध पैदा कर सकते थे। गुलाब, चमेली, केवड़ा और ऐसे ही अनंत फूलों का गंध पैदा करने में उन्हें एक सेकेंड लगता था। वे सिर्फ गंध ही नहीं, फल, मिठाई या कुछ भी हवा से पैदा कर देते थे। लेकिन ठहरिए। हवा से नहीं, सूर्य की किरणों से पैदा करते थे क्योंकि सूर्य विग्यान में वे पारंगत थे। तो फिर रात को सूर्य की किरणें कहां रहती हैं? उनका कहना था सूर्य की किरणों का प्रभाव रात में भी रहता ही है। सूर्य विग्यान, चंद्र विग्यान, नक्षत्र विग्यान, वायु विग्यान और शब्द विग्यान पर उनकी पुस्तकें आज भी मिल सकती हैं। वे एक वस्तु को दूसरे में बदलने में माहिर थे। यानी आपके सामने अगर एक गिलास रखा है तो उसे वे बड़े मेज में बदल सकते थे। गंध बाबा यानी विशुद्धानंद सरस्वती १८वीं शताब्दी में पैदा हुए और उनका निधन १९३७ में हुआ था। यह प्रश्न सहज ही उठ सकता है कि उनकी जन्मतिथि कैसे पता चलेगी? जैसा कि अनेक संतों के साथ यह रहस्य है, गंध बाबा की प्रामाणिक जन्म तिथि कहीं उपलब्ध नहीं है। उनके एक प्रसिद्ध भक्त गोपीनाथ कविराज ने लिखा है कि एक बार वे सिद्धियों के बारे में उन्हें (गोपीनाथ कविराज को) समझा रहे थे। इसी क्रम में उन्होंने अपनी तर्जनी उंगली को इतना लंबा और मोटा कर दिया कि वे अवाक् रह गए। गोपीनाथ कविराज काफी दिनों तक वाराणसी में रहे औऱ बाद में वे कोलकाता के पास मध्यमग्राम नामक इलाके में बस गए औऱ अंतिम समय तक वहीं रहे। वे गंध बाबा के बहुत करीबी शिष्य थे और उच्च कोटि के साधक थे। उन्होंने भी विस्तार से अपने गुरु के बारे में लिखा है। गंध बाबा का कहना था कि मान लीजिए कपूर बनाना है। तो सूर्य की श्वेत रश्मियों के ऊपर क म त र शब्द स्थापित कर देने से कपूर तत्काल आपके सामने हाजिर हो जाएगा। लेकिन कपूर में तो म या त शब्द है ही नहीं? इस पर वे मुस्करा देते थे। यानी यह रहस्य है। बहरहाल गंध बाबा कहते थे कि यह सब चमत्कार ईश्वर की शक्तियों का मामूली अंश है। कोई भी यह चमत्कार कर सकता है, बशर्ते कि उसमें एकाग्रता और अत्यंत गहरी आस्था हो।

मंगलवार, 17 नवंबर 2020

शनि देव के काले रुप का कारण ब्रम्हर्षि दधिची और उनके पुत्र पिप्लादि बनें


  श्मशान में जब महर्षि दधीचि के मांसपिंड का दाह संस्कार हो रहा था तो उनकी पत्नी अपने पति का वियोग सहन नहीं कर पायीं और पास में ही स्थित विशाल पीपल वृक्ष के कोटर में 3 वर्ष के बालक को रख स्वयम् चिता में बैठकर सती हो गयीं। इस प्रकार महर्षि दधीचि और उनकी पत्नी का बलिदान हो गया किन्तु पीपल के कोटर में रखा बालक भूख प्यास से तड़प तड़प कर चिल्लाने लगा।जब कोई वस्तु नहीं मिली तो कोटर में गिरे पीपल के गोदों(फल) को खाकर बड़ा होने लगा। कालान्तर में पीपल के पत्तों और फलों को खाकर बालक का जीवन येन केन प्रकारेण सुरक्षित रहा।
एक दिन देवर्षि नारद वहाँ से गुजरे। नारद ने पीपल के कोटर में बालक को देखकर उसका परिचय पूंछा-
नारद- बालक तुम कौन हो ?
बालक- यही तो मैं भी जानना चाहता हूँ ।
नारद- तुम्हारे जनक कौन हैं ?
बालक- यही तो मैं जानना चाहता हूँ ।
तब नारद ने ध्यान धर देखा।नारद ने आश्चर्यचकित हो बताया कि हे बालक ! तुम महान दानी महर्षि दधीचि के पुत्र हो। तुम्हारे पिता की अस्थियों का वज्र बनाकर ही देवताओं ने असुरों पर विजय पायी थी। नारद ने बताया कि तुम्हारे पिता दधीचि की मृत्यु मात्र 31 वर्ष की वय में ही हो गयी थी।
बालक- मेरे पिता की अकाल मृत्यु का कारण क्या था ?
नारद- तुम्हारे पिता पर शनिदेव की महादशा थी।
बालक- मेरे ऊपर आयी विपत्ति का कारण क्या था ?
नारद- शनिदेव की महादशा।
इतना बताकर देवर्षि नारद ने पीपल के पत्तों और गोदों को खाकर जीने वाले बालक का नाम पिप्पलाद रखा और उसे दीक्षित किया।
नारद के जाने के बाद बालक पिप्पलाद ने नारद के बताए अनुसार ब्रह्मा जी की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी ने जब बालक पिप्पलाद से वर मांगने को कहा तो पिप्पलाद ने अपनी दृष्टि मात्र से किसी भी वस्तु को जलाने की शक्ति माँगी।ब्रह्मा जी से वर्य मिलने पर सर्वप्रथम पिप्पलाद ने शनि देव का आह्वाहन कर अपने सम्मुख प्रस्तुत किया और सामने पाकर आँखे खोलकर भष्म करना शुरू कर दिया।शनिदेव सशरीर जलने लगे। ब्रह्मांड में कोलाहल मच गया। सूर्यपुत्र शनि की रक्षा में सारे देव विफल हो गए। सूर्य भी अपनी आंखों के सामने अपने पुत्र को जलता हुआ देखकर ब्रह्मा जी से बचाने हेतु विनय करने लगे।अन्ततः ब्रह्मा जी स्वयम् पिप्पलाद के सम्मुख पधारे और शनिदेव को छोड़ने की बात कही किन्तु पिप्पलाद तैयार नहीं हुए।ब्रह्मा जी ने एक के बदले दो वर्य मांगने की बात कही। तब पिप्पलाद ने खुश होकर निम्नवत दो वरदान मांगे-

1- जन्म से 5 वर्ष तक किसी भी बालक की कुंडली में शनि का स्थान नहीं होगा।जिससे कोई और बालक मेरे जैसा अनाथ न हो।

2- मुझ अनाथ को शरण पीपल वृक्ष ने दी है। अतः जो भी व्यक्ति सूर्योदय के पूर्व पीपल वृक्ष पर जल चढ़ाएगा उसपर शनि की महादशा का असर नहीं होगा।

ब्रह्मा जी ने तथास्तु कह वरदान दिया।तब पिप्पलाद ने जलते हुए शनि को अपने ब्रह्मदण्ड से उनके पैरों पर आघात करके उन्हें मुक्त कर दिया । जिससे शनिदेव के पैर क्षतिग्रस्त हो गए और वे पहले जैसी तेजी से चलने लायक नहीं रहे।अतः तभी से शनि "शनै:चरति य: शनैश्चर:" अर्थात जो धीरे चलता है वही शनैश्चर है, कहलाये और शनि आग में जलने के कारण काली काया वाले अंग भंग रूप में हो गए।
सम्प्रति शनि की काली मूर्ति और पीपल वृक्ष की पूजा का यही धार्मिक हेतु है।आगे चलकर पिप्पलाद ने प्रश्न उपनिषद की रचना की,जो आज भी ज्ञान का वृहद भंडार है  



सोमवार, 16 नवंबर 2020

भैया दूज अन्नकूट का महत्व भारतीय संस्कृति में



 
भारत की सनातन संस्कृति प्रकृति के साथ संबंधों से उत्सव और आनंद के साथ सह जीवन जीने की एक बड़ी श्रेष्ठ परंपरा आज भी हमारे गांव में लोक ब्यवहार व त्योहार में प्रचलित हैं  अच्छा या बुरा दोनों की परिकल्पना हम अपनी जरुरत के हिसाब से तय करते हैं पर अच्छा बुरा,दिन रात, कांटे और फूल सब कुछ यह इश्वर की सृष्टि का भाग है इसी को चरितार्थ करते हुए इस भैयादूज अन्नकूट के उत्सव में यह देखने को मिलता है जो उपेक्षित है उसे भी आज एक विशेष सादर और सम्मान दिया जाता है चाहे वह कांटे या कटीली झाड़ियां जो कभी पूजी नहीं जाती आज उनका पूजन का विधान है। बहन बेटियों को केवल देने का विधान था आज उनके घर जाकर भोजन करने का भी विधान गंगा स्नान का एक विशेष महत्व पूरे साल भर व जीवन भर रहता है पर आज यमुना का भी पूजन और स्नान का विधान व कलम दवात के पूजन का विधान  इस उत्सव में मनाया जाता । प्रकृति की दी हुई सभी वस्तुओं को आदर और सम्मान करने का यह उत्सव है। पर इस आधुनिक भोग वादी व्यवस्था में सब तहस नहस हो गया है इसमें इस डिग्रीधारी शिक्षा व्यवस्था का बहुत बड़ा और मुख्य योगदान है

मित्रोआज पंच दिवसीय त्यौहार दिवाली
का आखिरी दिन भैया दूज है, आपको आपके परिवार को इस पावन पर्व की बहुत बहुत शुभकामनाएं!!!!!!!!!

भाई दूज का त्योहार भाई बहन के स्नेह को सुदृढ़ करता है। यह त्योहार दीवाली के दो दिन बाद मनाया जाता है। हिन्दू धर्म में भाई-बहन के स्नेह-प्रतीक दो त्योहार मनाये जाते हैं - एक रक्षाबंधन जो श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इसमें भाई बहन की रक्षा करने की प्रतिज्ञा करता है। दूसरा त्योहार, 'भाई दूज' का होता है। इसमें बहनें भाई की लम्बी आयु की प्रार्थना करती हैं। भाई दूज का त्योहार कार्तिक मास की द्वितीया को मनाया जाता है।
भैया दूज को भ्रातृ द्वितीया भी कहते हैं। इस पर्व का प्रमुख लक्ष्य भाई तथा बहन के पावन संबंध व प्रेमभाव की स्थापना करना है। इस दिन बहनें बेरी पूजन भी करती हैं। इस दिन बहनें भाइयों के स्वस्थ तथा दीर्घायु होने की मंगल कामना करके तिलक लगाती हैं। इस दिन बहनें भाइयों को तेल मलकर गंगा यमुना में स्नान भी कराती हैं। यदि गंगा यमुना में नहीं नहाया जा सके तो भाई को बहन के घर नहाना चाहिए।

यदि बहन अपने हाथ से भाई को जीमाए तो भाई की उम्र बढ़ती है और जीवन के कष्ट दूर होते हैं। इस दिन चाहिए कि बहनें भाइयों को चावल खिलाएं। इस दिन बहन के घर भोजन करने का विशेष महत्व है। बहन चचेरी अथवा ममेरी कोई भी हो सकती है। यदि कोई बहन न हो तो गाय, नदी आदि स्त्रीत्व पदार्थ का ध्यान करके अथवा उसके समीप बैठ कर भोजन कर लेना भी शुभ माना जाता है।

इस दिन गोधन कूटने की प्रथा भी है। गोबर की मानव मूर्ति बना कर छाती पर ईंट रखकर स्त्रियां उसे मूसलों से तोड़ती हैं। स्त्रियां घर-घर जाकर चना, गूम तथा भटकैया चराव कर जिव्हा को भटकैया के कांटे से दागती भी हैं। दोपहर पर्यन्त यह सब करके बहन भाई पूजा विधान से इस पर्व को प्रसन्नता से मनाते हैं। इस दिन यमराज तथा यमुना जी के पूजन का विशेष महत्व है।

भगवान सूर्य नारायण की पत्नी का नाम छाया था। उनकी कोख से यमराज तथा यमुना का जन्म हुआ था। यमुना यमराज से बड़ा स्नेह करती थी। वह उससे बराबर निवेदन करती कि इष्ट मित्रों सहित उसके घर आकर भोजन करो। अपने कार्य में व्यस्त यमराज बात को टालता रहा। कार्तिक शुक्ला का दिन आया। यमुना ने उस दिन फिर यमराज को भोजन के लिए निमंत्रण देकर, उसे अपने घर आने के लिए वचनबद्ध कर लिया।
यमराज ने सोचा कि मैं तो प्राणों को हरने वाला हूं। मुझे कोई भी अपने घर नहीं बुलाना चाहता। बहन जिस सद्भावना से मुझे बुला रही है, उसका पालन करना मेरा धर्म है। बहन के घर आते समय यमराज ने नरक निवास करने वाले जीवों को मुक्त कर दिया। यमराज को अपने घर आया देखकर यमुना की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने स्नान कर पूजन करके व्यंजन परोसकर भोजन कराया। यमुना द्वारा किए गए आतिथ्य से यमराज ने प्रसन्न होकर बहन को वर मांगने का आदेश दिया।
यमुना ने कहा कि भद्र! आप प्रति वर्ष इसी दिन मेरे घर आया करो। मेरी तरह जो बहन इस दिन अपने भाई को आदर सत्कार करके टीका करे, उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने तथास्तु कहकर यमुना को अमूल्य वस्त्राभूषण देकर यमलोक की राह की। इसी दिन से पर्व की परम्परा बनी। ऐसी मान्यता है कि जो आतिथ्य स्वीकार करते हैं, उन्हें यम का भय नहीं रहता। इसीलिए भैयादूज को यमराज तथा यमुना का पूजन किया जाता है

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...