
संतान को कैसे उत्कृष्ट बनायें **
*-बीज का विशाल वृक्ष होना,कलभ (हाथी का बच्चा) का महागजराज होना,वत्स का महोक्ष( ककुद युक्त सांढ) होना वामन से विराट होने की प्रक्रिया का लघु निदर्शन है।विराटता चैतन्य पुरुष या संचारिणी प्रकृतिकी बढ़ने वाली प्रवृत्ति है।प्रतिभा चाहे जितनी भी हो उसे अनुभव के संग विराटता मिलती है।
*- गर्भ संस्कार के अतिरिक्त भी संतान को श्रेष्ठ बनाने की अनेक प्रक्रियायें होती हैं।इनमें माता-पिता द्वारा दिये जाने वाले संस्कार,शिक्षक-प्रोफेसर द्वारा दिये जाने वाले
संस्कार तथा वातावरण से उत्पन्न होने वाले संस्कार का महत्त्व बहुत अहं होता है।मनुस्मृति में माता को प्रथम गुरु का स्थान दिया गया है।जागरूक पिता भी संस्कार गढ़ता है।आजकल नब्बेप्रतिशत माता-पिता निजसन्तानको उस विद्या को पढ़ाना ही अपना उत्तरदायित्व मानते हैं जिससे अधिक से अधिक धन घर में आ सके।आज की धनदायी विद्या संतानको आर्थिक सक्षमता तो दे रही है पर संस्कार नहीं।संस्कारसे हमारासीधाअर्थहै पारिवारिक,सामाजिक, राष्ट्रीय तथा धर्म-संस्कृति का बोध होना। इस मामले में शिक्षापद्धति ईसाईयतके निकट है। सनातनबोध या भारत की परम्परा के निकट नहीं है।अतःआज यदि श्रेष्ठ डॉक्टर, इंजीनियर, वकील,सी ए , पुलिस अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी संस्कारित दिख रहा हैतो समझ लीजिए उसके
ऊपर परिवार या गुरु का व्यापक प्रभाव है। शिक्षाअवधि का वातावरण तो आज मांस, मदिरा, ड्रग और निशाचरी जीवन पद्धति का हो गया है।
*- इस विषय पर चिंतन करते हुए मैंने २०१२ में हिन्दू जीवन पद्धति का छात्र संस्करण निकाला था पर उसे अंग्रेजी में अनुवादित नहीं करा सका।तैत्तिरीय उपनिषद की शिक्षा वल्ली का व्यापक व्याख्यान भारतके नवयुवकों
में युगबोध के साथ अभिनव संस्कार जागृत कर सकता है।माता पिता को देश में मरने के लिए छोड़ कर विदेश में बसने वाली संतान को पढा कर क्या लाभ जहां न आत्म लाभ हो न राष्ट्र लाभ हो और धर्म लाभ की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती।अतः संतान को उत्कृष्ट बनाने केलिए हमें पारिवारिकस्तर परही बाल्यकालसे सन्तान को गढ़ना
पड़ेगा।
*- १ सत्यं वद ,१ धर्मम् चर ,३ मा अनृतं वद, ४ प्रियं वद,५ अप्रियं सत्यं मा वद,६ मातृ देवो भव, ७ पितृ देवो भव,८ आचार्य देवो भव, ९ अतिथि देवो भव,१० जयैषी भव,११ आस्तिक्यं भज १२ अहिंसको भव १३ धूर्तान् मा परिष्वज१४ परुषवाक्यं मा वद,१५दृढव्रत भव,१६ योगे रमष्व १७ सर्वथा मा विश्वसेत् १८ आत्मरक्षा परायणो भव आदि का उपदेश बच्चों को बचपन से ही देना चाहिए।यदि शिशु बचपन से ही बड़े वृद्धों का चरण स्पर्श करेगा तब उसे माता पिता को प्रणाम करनेमें लज्जा की थोड़ी भी अनुभूति नहीं होगी।यदि कोई मैकाले का शिष्य नमस्ते, प्रणाम कहने पर हंसे, श्रीमान, महोदय ,महोदया कहने पर मुंह बिदकाये तो कहना चाहिए कि ये सर और मैडम क्या है? यदि प्रोफेसर कहे कि चरण स्पर्श करना दकियानूसी हैतो उसे उत्तर मिलना चाहिये कि गुड मॉर्निंग फादर ,गुड मॉर्निंग सिस्टर कहना तो महा मूर्खता है।
घर से जो प्रशिक्षण शुरू होगा वही मृत्युपर्यन्त अभ्यास में बना रहता है। एक परिवार के भीतर कितने प्रकार के सम्बन्ध होते हैं और उनका क्या महत्त्वहै ये बच्चोंको शुरू से बतलाना चाहिये।भाई बहन के सम्बन्ध का क्या महत्त्व है?चाचा चाची क्यों महत्त्वपूर्ण है?सहोदर का क्या महत्त्व है , मामा- मामी ,मौसा-मौसी, फूफा-फूफी का जीवन में क्या भूमिका होती है यह बचपन से बच्चे को मालूम होना चाहिए। माता या घर की ज्येष्ठ महिलाओं द्वारा लड़कियों को वे सभी प्रशिक्षण देने चाहिए जो उसकी रक्षा और चरित्र के लिए अनिवार्य हो।
*- सन्तान को बचपन से ही कोई न कोई कवच पाठ अवश्य याद करादेना चाहिये।उन्हें प्रतिदिन मुह हाथ पैर धोने का अभ्यास कराना चाहिए।स्नान करने का पवित्र कर्म बच्चों को अभ्यास में लाने हेतु प्रेरित करना चाहिए।
व्यंग्य कसने,दूसरे पर हसने की प्रबृत्ति को आरम्भ में ही दबा देना चाहिए। उन्हें व्यायाम करने की आदत डलवानी चाहिए जिससे वे कमजोर न हों।सत्य, ब्रह्मचर्य, व्यायाम, विद्या,देश भक्ति और आत्मत्याग का महत्त्व बच्चों को शुरू से ही अवगत कराना चाहिए।प्राणायाम की आदत डलवाने हेतु बच्चों को प्रेरित करना चाहिए।साथ ही जिस दिशा में बच्चा जाना चाहता है उस क्षेत्र की श्रेष्ठता का स्मरण उसे कराना चाहिए।
*- यदि प्रत्येक माता पिता ने अपनी संतान को श्रेष्ठ बनाने हेतु यत्न नहीं किया तो समझिए व्यक्ति,परिवार, देश,धर्म,संस्कृति और स्वयं उस बच्चे का भी भारी अपकार होगा ही।व्यक्ति व्यक्ति में गुणों के आधान से ही राष्ट्र चमकता है।अतः शास्त्रों में व्यक्तित्व निर्माण के जितने भी आचार, शील और व्यवहार बतलाये गए हैं उन्हें एकत्रित कर लोक में लाना चाहिए। लड़के लड़कियों का परिष्कृत नाम रखने का दायित्व माता पिता का होता है और हजारों की संख्या में श्रेष्ठ नामों की सूची तैयार करने का दायित्व शास्त्रज्ञों का होता है।
एक श्रेष्ठ नागरिक, श्रेष्ठ राष्ट्र की धरोहर होता है जिसे माता पिता या गुरु तैयार करता है। इस तैयारी के षोडश चक्रों को वाल्मीकि रामायण और रघुवंशम में बतलाया गया है।
*** इहा प्रात उठी कर रघुनाथा ।
गुरु पितु मात नवावहीँ माथा।।***
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" कौशल्या सुप्रजा राम ! प्रातः सन्ध्या प्रवर्तते "
का उद्घोष बच्चे को राम बनने की प्रेरणा देता है। हमें यह तय तो करना ही होगा कि क्या हम अपनी भावी पीढ़ी को
सनातनव्रती बनाना चाहते हैंया पर संस्कृतिजीवी मनुष्य?





