जी हाँ, शास्त्रों में एक ऐसी भी विद्या है जिससे आप अपने pin को सुरक्षित और गोपनीय रख सकते हैं,
उस विद्या का नाम है "कटपयादी सन्ख्या विद्या"
●कटपयादि संख्या
हममें से बहुत से लोग अपना Password, या ATM PIN भूल जाते हैं इस कारण हम उसे कहीं पर लिख कर रखते हैं पर अगर वो कागज का टुकड़ा किसी के हाथ लग जाए या खो जाए तो परेशानी हो जाती
पर अपने Password या Pin No. को हम लोग “कटपयादि संख्या” से आसानी से याद रख सकते है।
“कटपयादि”( क ट प य आदि) संख्याओं को शब्द या श्लोक के रूप में आसानी से याद रखने की प्राचीन भारतीय पद्धति है
चूँकि भारत में वैज्ञानिक/तकनीकी/खगोलीय ग्रंथ पद्य रूप में लिखे जाते थे, इसलिये संख्याओं को शब्दों के रूप में अभिव्यक्त करने हेतु भारतीय चिन्तकों ने इसका समाधान 'कटपयादि' के रूप में निकाला।
कटपयादि प्रणाली के उपयोग का सबसे पुराना उपलब्ध प्रमाण, 869 AD में “शंकरनारायण” द्वारा लिखित “लघुभास्कर्य” विवरण में मिलता है
तथा “शंकरवर्मन” द्वारा रचित “सद्रत्नमाला” का निम्नलिखित श्लोक इस पद्धति को स्पष्ट करता है -
इसका शास्त्रीय प्रमाण -
नज्ञावचश्च शून्यानि संख्या: कटपयादय:।
मिश्रे तूपान्त्यहल् संख्या न च चिन्त्यो हलस्वर: ॥
[अर्थ: न, ञ तथा अ शून्य को निरूपित करते हैं। (स्वरों का मान शून्य है) शेष नौ अंक क, ट, प और य से आरम्भ होने वाले व्यंजन वर्णों द्वारा निरूपित होते हैं।
किसी संयुक्त व्यंजन में केवल बाद वाला व्यंजन ही लिया जायेगा। बिना स्वर का व्यंजन छोड़ दिया जायेगा।]
अब चर्चा करते हैं कि आधुनिक काल में इस की उपयोगिता क्या है और कैसे की जाए ?
कटपयादि – अक्षरों के द्वारा संख्या को बताकर संक्षेपीकरण करने का एक शास्त्रोक्त विधि है, हर संख्या का प्रतिनिधित्व कुछ अक्षर करते हैं जैसे
1 – क,ट,प,य
2 – ख,ठ,फ,र
3 – ग,ड,ब,ल
4 – घ,ढ,भ,व
5 – ङ,ण,म,श
6 – च,त,ष
7 – छ,थ,स
8 – ज,द,ह
9 – झ,ध
0-ञ,न,अ,आ,इ,ई,उ,ऊ,ऋ,ॠ,लृ,ए,ऐ, ओ,
हमारे आचार्यों ने संस्कृत के अर्थवत् वाक्यों में इन का प्रयोग किया, जैसे गौः = 3, श्रीः = 2 इत्यादि ।
इस के लिए बीच में विद्यमान मात्रा को छोड देते हैं । स्वर अक्षर ( vowel) यदि शब्द के आदि (starting) मे हो तो ग्राह्य ( acceptable) है, अन्यथा अग्राह्य (unacceptable) होता
जैसे समझिए कि मेरा ATM PIN 0278 है- पर कभी कभी संख्या को याद रखते हुए ATM में जाकर हम Confuse हो जातें हैं कि 0728 था कि 0278 ? यह भी अक्सर बहुत लोगों के साथ होता है, ये इन से बचने के उपाय हैं
जैसे ATM PIN के लिए कोई भी चार अक्षर वाले संस्कृत शब्द को उस के कटपयादि मे परिवर्तन करें ( उस शब्द को सिर्फ अपने ही मन मे रखें, किसी को न बताएं )
उदाहरण के लिए –
इभस्तुत्यः = 0461
गणपतिः = 3516
गजेशानः = 3850
नरसिंहः = 0278
जनार्दनः = 8080
सुध्युपास्यः = 7111
शकुन्तला = 5163
सीतारामः = 7625
इत्यादि ( अपने से किसी भी शब्द को चुन लें )
ऐसे किसी भी शब्द को याद रखें और तत्काल “कटपयादि संख्या” मे परिवर्तन कर के अपना ATM PIN आदि में प्रयोग करें ।
नोट, कृपया दिए गए उदाहरण का नकल करके अपना पिन ना बदलें अपने दिमाग का इस्तेमाल करके फिर पिन बदलें क्योंकि यह मैसेज वायरल हो चुका है और कई तिकड़मबाज इसका दुरुपयोग कर सकते हैं
सत्य सनातन धर्म की जय।
साभार धरोहर पत्रिका
शनिवार, 12 फ़रवरी 2022
अपने pin को सुरक्षित और गोपनीय रखने की विद्या का नाम है "कटपयादी सन्ख्या विद्या"
मंगलवार, 25 जनवरी 2022
आत्मोत्कर्ष की महायात्रा जिस मार्ग से होती है उसे मेरुदण्ड या सुषुम्ना कहते हैं । उसका एक सिरा मस्तिष्क का-दूसरा काम केन्द्र का स्पर्श करता है । कुण्डलिनी साधना की समस्त गतिविधियाँ प्रायः इसी क्षेत्र को परिष्कृत एवं सरल बनाने के लिए हैं । इड़ा पिंगला के प्राण प्रवाह इसी क्षेत्र को दुहराने के लिए नियोजित किये जाते हैं । साबुन पानी में कपड़े धोये जाते हैं । झाड़ू झाड़न से कमरे की सफाई होती है । इड़ा पिंगला के माध्यम से किये जाने वाले नाड़ी शोधन प्राणायाम मेरुदण्ड का संशोधन करने के लिए है । इन दोनों ऋणात्मक और धनात्मक शक्तियों का उपयोग सृजनात्मक उद्देश्य से भी होता है ।
इमारतें बनाने वाले कारीगर कुछ समय नींव खोद का गड्डा करते हैं, इसके बाद ही दीवार चुनने के काम में लग जाते हैं । इसी प्रकार इड़ा पिंगला संशोधन और सृजन का दुहरा काम करते हैं । जो आवश्यक है उसे विकसित करने में वे कुशल माली की भूमिका निभाते हैं । यों आरंभ में जमीन जोतने जैसा ध्वंसात्मक कार्य भी उन्हीं को करना पड़ता है पर यह उत्खनन निश्चित रूप से उन्नयन के लिए होता है ।
माली भूमि खोदने, खर-पतवार उखाड़ने, पौधे की काट-छाँट करने का काम करते समय ध्वंस में संलग्न प्रतीत होता है, पर खाद पानी देने, रखवाली करने में उसकी उदार सृजनशीलता का भी उपयोग होता है । इड़ा पिंगला के माध्यम से सुषम्ना क्षेत्र में काम करने वाली प्राण विद्युत का विशिष्ट संचार क्रम प्रस्तुत करके कुण्डलिनी जागरण की साधना सम्पन्न की जाती है ।
मेरुदण्ड को राजमार्ग-महामार्ग कहते हैं । इसे धरती से स्वर्ग पहुँचने का देवयान मार्ग कहा गया है । इस यात्रा के मध्य में सात लोक हैं । इस्लाम धर्म के सातवें आसमान पर खुदा का निवास माना गया है । ईसाई धर्म में भी इससे मिलती-जुलती मान्यता है । हिन्दू धर्म के भूःभुवःस्वःतपःमहःसत्यम् यह सात लोक प्रसिद्ध है । आत्मा और परमात्मा के मध्य इन्हें विराम स्थल माना गया है । लम्बी मंजिलें पूरा करने के लिए लगातार ही नहीं चला जाता । बीच-बीच में विराम भी लेने होते हैं । रेलगाड़ी गन्तव्य स्थान तक बीच के स्टेशनों पर रुकती-कोयला, पानी लेती चलती है । इन विराम स्थलों को 'चक्र ' कहा गया है । चक्रों की व्याख्या दो रूपों में होती है, एक अवरोध के रूप में दूसरे अनुदान के रूप में महाभारत में चक्रव्यूह की कथा है । अभिमन्यु उसमें फँस गया था । वेधन कला की समुचित जानकारी न होने से वह मारा गया था । चक्रव्यूह में सात परकोटे होते हैं । इस अलंकारिक प्रसंग को आत्मा का सात चक्रों में फँसा होना कह सकते हैं । भौतिक आकर्षणों की, भ्राँतियों की विकृतियों की चहारदीवारी के रूप में भी चक्रों की गणना होती है । इसलिए उसके वेधन का विधान बताया गया है ।
रामचन्द्रजी ने बाली को मार सकने की अपने क्षमता का प्रमाण सुग्रीव को दिया था । उन्होंने सात ताड़ वृक्षों का एक बाण से वेधकर दिखाया था । इसे चक्रवेधन की उपमा दी जा सकती है । भागवत माहात्य में धुन्धकारी प्रेत के बाँस की सात गाँठें फोड़ते हुए सातवें दिन कथा प्रभाव से देव देहधारी होने की कथा है । इसे चक्रवेधन का संकेत समझा जा सकता है । चक्रों को अनुदान केन्द्र इसलिए कहा जाता है कि उनके अन्तराल में दिव्य सम्पदाएँ भरी पड़ी हैं । उन्हें ईश्वर ने चक्रों की तिजोरियों में इसलिए बन्द करके छोड़ा है कि प्रौढ़ता, पात्रता की स्थिति आने पर ही उन्हें खोलने उपयोग करने का अवसर मिले कुपात्रता अयोग्यता की स्थिति में बहुमूल्य साधन मिलने पर तो अनर्थ ही होता है । कुसंस्कारी संताने उत्तराधिकारी में मिली बहुमूल्य सम्पदा से दुर्व्यसन अपनानी और विनाश पथ पर तेजी से बढ़ती हैं । छोटे बच्चों को बहुमूल्य जेबर पहना देने से उनकी जान जोखिम का खतरा उत्पन्न हो जाता है ।
धातुओं की खदानें जमीन की ऊपरी परत पर बिखरी नहीं होती, उन्हें प्राप्त करने के लिए गहरी खुदाई करनी पड़ती है । मोती प्राप्त करने के लिए लिए समुद्र में गहरे गोते लगाने पड़ते हैं । यह अवरोध इसलिए है कि साहसी एवं सुयोग्य सत्पात्रों को ही विभूतियों को वैभव मिल सके । मेरुदण्ड में अवस्थित चक्रों को ऐसी सिद्धियों का केन्द्र माना गया है जिनकी भौतिक और आत्मिक प्रगति के लिए नितान्त आवश्यकता रहती है ।
चक्रवेधन, चक्रशोधन, चक्र परिष्कार, चक्र जागरण आदि नामों से बताये गये विवेचनों एवं विधानों में कहा गया है कि इस प्रयास से अदक्षताओं एवं विकृतियों का निराकरण होता है । जो उपयुक्त है उसकी अभिवृद्धि का पथ प्रशस्त होता है । सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन, दुष्प्रवृत्तियों के दमन में यह चक्रवेधन विधान कितना उपयोगी एवं सहायक है इसकी चर्चा करते हुए शारदा तिलक ग्रंथ के टीकाकार ने 'आत्म विवेक' नामक किसी साधना ग्रंथ का उदाहरण प्रस्तुत किया है । कहा गया है कि-
गुदलिङान्तरे चक्रमाधारं तु चतुर्दलम् ।
परमः सहजस्तद्वदानन्दो वीरपूर्वकः॥
योगानन्दश्च तस्य स्यादीशानादिदले फलम् ।
स्वाधिष्ठानं लिंगमूले षट्पत्रञ्त्र् क्रमस्य तु॥
पूर्वादिषु दलेष्वाहुः फलान्येतान्यनुक्रमात् ।
प्रश्रयः क्रूरता गर्वों नाशो मूच्छर् ततः परम्॥
अवज्ञा स्यादविश्वासो जीवस्य चरतो धु्रवम् ।
नाभौ दशदलं चक्रं मणिपूरकसंज्ञकम् ।
बुधवार, 29 दिसंबर 2021
लीलावती ग्रंथ Vadik math ke सुप्रसिद्ध ग्रंथ के निर्माण की भूमिका और भास्कराचार्य की पुत्री एवं कॉल का योगदान
शनिवार, 18 दिसंबर 2021
दत्तात्रेय जयंती जिन्हें सर्वोच्च गुरु माना जाता
मंगलवार, 30 नवंबर 2021
वैदिक शिक्षा का सनातन आधार से इसका उद्देश्य और विषय का संपूर्ण विवेचन
कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा के अंतर्गत तैत्तिरीय आरण्यक के सातवें आठवें और नवम अध्याय को तैत्तिरीय उपनिषद कहा जाता है। इसमें से सातवें अध्याय को उपनिषद में शिक्षा वल्ली के रूप में स्मरण किया जाता है। इस शिक्षा वल्ली का प्रथम अनुवाक मंगलाचरण की तरह है। इसके उपरांत द्वितीय अनुवाक में ऋषि कहते हैं कि हम शिक्षा की व्याख्या करेंगे। तीसरे अनुवाक में वे इसका प्रयोजन बताते हैं कि इससे गुरु और शिष्य दोनों का ब्रह्मवर्चस और ब्रह्म तेज बढ़ेगा, यशस्वी होंगे और शिक्षा के द्वारा लोकों के विषय में, ब्रह्मांड की ज्योतियों के विषय में, सभी प्रकार की विद्याओं के विषय में, विश्व की समस्त प्रकार की प्रजाओं के विषय में तथा शरीर और उसके स्थूल,सूक्ष्म तथा कारण इन सभी रूपों के विषय में और इस प्रकार लोक, प्रजा, ज्योति, विद्या और जीवात्मा के समस्त स्तरों और रहस्यों के विषय में वर्णन करेंगे।
आगे इसी अध्याय में नौवे अनुवाक में बताते हैं कि स्वाध्याय और प्रवचन के मुख्य फल हैं – ऋत अर्थात कॉस्मिक यानी ब्रह्मांडीय व्यवस्था के नियमों का ज्ञान, सत्य का ज्ञान और सत्य पालन की सामथ्र्य, तप की शक्ति, आंतरिक शांति की सामथ्र्य, इंद्रिय निग्रह की सामथ्र्य, वेदों के पठन पाठन की सामथ्र्य, योग्य संतान प्रजनन की सामथ्र्य, कुटुंब की वृद्धि (प्रजाति) की सामथ्र्य, मनुष्यों के लिए आवश्यक समस्त व्यवहार की सामथ्र्य, यज्ञ की सामथ्र्य और अतिथियों की यथायोग्य सेवा की सामथ्र्य।
समस्त ज्ञान प्रदान कर आचार्य 11 वें अनुवाक में अनुशासन देते हैं –
”सदा सत्यनिष्ठ रहना, इसमें प्रमाद नहीं करना। धर्ममय ही आचरण करना, इसमें प्रमाद नहीं करना। शुभ कर्मों में कभी प्रमाद मत करना। देव कार्य और पूर्वजों की परंपरा को आगे ले जाने के कार्य में कभी चूक नहीं करना तथा संतति परंपरा गतिमय रखना। ऐश्वर्य की साधना में कभी प्रमाद मत करना और स्वाध्याय तथा ज्ञान विस्तार में कभी चूक नहीं करना। माता, पिता, आचार्य और अतिथि को देवतुल्य मानना (विद्या, आयु, तप और आचरण में श्रेष्ठ व्यक्ति जब घर पर बिना आमंत्रण आ जाएँ, तो वे ही अतिथि कहलाते हैं। आजकल के गेस्ट या मेहमान को अतिथि नहीं कहते।)। जो निर्दोष कर्म हैं, उनका ही आचरण करना। हमारे भी जो सुचरित हैं, अच्छे आचरण हैं, उनका ही अनुसरण करना, अन्य आचरणों का नहीं। जो श्रेष्ठ विद्वान आयें, उन्हे आसन देना, विश्राम देना और श्रद्धापूर्वक दान देना। विवेकपूर्वक संकोच सहित अपनी आर्थिक स्थिति के अनुरूप दान देना चाहिए। जब जहां कोई दुविधा या शंका हो, तो उत्तम विचार वाले सदाचारी से परामर्श कर कर्तव्य का निश्चय करना। यही आदेश है। यही उपदेश है।”
शिक्षा वल्ली के बाद आगे ब्रह्मानन्द वल्ली है और भृगु वल्ली है। शिक्षा वल्ली में वर्णित पुरुषार्थों को सम्पन्न कर चुके व्यक्ति में ही ब्रह्मानन्द की साधना और ज्ञान की सामथ्र्य आती है, अन्य में नहीं। वस्तुत: ब्रह्मानन्द का संबंध परा विद्या से है। तृतीय मुंडक में द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया वाला प्रख्यात मंत्र है जो आत्मा और परमात्मा संबंधी प्रभावशाली विवेचना है। इसलिए योग विद्या ही परा विद्या का मूल आधार है जिसके अनंत भेद या रूप संभव हैं। अत्यंत प्राचीन काल से भारत में यह ज्ञान था कि ज्ञान अनंत है। ब्रह्मानन्द वल्ली के आरंभ में ही उपनिषद मंत्र है – सत्यं ज्ञानं अनंतं ब्रह्म। ब्रह्म सत्य हैं, ज्ञान हैं, अनंत हैं। इसीलिए यहाँ विद्या के अनंत रूप सहज विद्यमान हैं। आयुर्वेद से लेकर योग तक प्रत्येक ज्ञान शाखा में ज्ञान के अनंत रूप वर्णित हैं।
इसीलिए विविध पंथ यहाँ सहज स्वीकृत हैं परंतु उन सबका एक सामान्य आधार है, जो सार्वभौम है, यह भी प्रारम्भ से ज्ञात है। ये सार्वभौम नियम या आधुनिक यूरोपीय पदावली में कहें तो सार्वभौम मूल्य हैं। ये ही सामान्य धर्म या सार्वभौम धर्म और मानव धर्म कहे गए हैं। अहिंसा अर्थात् किसी भी प्राणी या प्रकृति के किसी भी तत्व के प्रति द्रोह और द्वेष का सर्वथा अभाव, सत्य, संयम, अन्य के वस्तुओं के प्रति गिद्धदृष्टि नहीं रखना, मर्यादित भोग और उसके लिए मर्यादित संग्रह – ये पाँच सार्वभौम यम या मूल्य हैं। इनके सर्वमान्य आधार के साथ व्यक्ति, समूह, समाज और राष्ट्रों की अपनी विशेषताओं का सतत् संवर्धन ही अपरा विद्या का विस्तार है और जिन उपकरणों से अर्थात मन और बुद्धि की जिस सामथ्र्य से यह सब ज्ञान होता है, उस आत्मसत्ता के मूल स्वरूप का ज्ञान परा विद्या है।
जब किसी समाज में आत्मसत्ता के स्वरूप का ज्ञान रखने वाले श्रेष्ठ लोग होंगे और वे सम्मानित होंगे, तब वहाँ सभी मानस संरचनाएं, ( मेंटल या इंटेलेक्चुअल कान्स्टृक्ट) मर्यादित मान्य होंगी क्योंकि यह ज्ञात होगा कि वे परमार्थ रूप में अंतिम सत्य नहीं हैं, वे सब सापेक्ष सत्य हैं और परिवर्तनशील सत्य हैं। इसीलिए व्यक्ति, कुल, गोत्र, वर्ण, क्षेत्र, आदि सब से परे जो मूल तत्व है, उसके ज्ञान की साधना को परा विद्या कहा गया और उसके ज्ञाता ही सर्वमान्य रहे। इस प्रकार प्रारम्भ से ही भारत में परा और अपरा दोनों विद्याओं की साधना परंपरा प्रवाहित है और शिक्षा वही है जो इन दोनों का ज्ञान दे।
इसमें से परा का मूल ज्ञान सबको आवश्यक है, अत: योग और ध्यान की किसी न किसी पद्धति के द्वारा आत्मस्वरूप का ज्ञान सबके लिए सर्वोपरि मान्य रहा। जबकि अपने संस्कारों और सामथ्र्य तथा प्रतिभा के अनुरूप अपरा विद्या के किस एक या कतिपय अनुशासनों में दक्षता को स्वधर्म माना गया। अत: सामान्य धर्म और स्वधर्म, दोनों का ज्ञान प्रत्येक विद्यार्थी को कराना शिक्षा का भारतीय लक्ष्य है।
यहाँ कुछ और आधारभूत तथ्य स्मरण कर लेना चाहिए। समस्त शिक्षा वृद्ध संवाद है अर्थात ज्ञान की किसी न किसी शाखा या अनुशासन में उत्कर्ष प्राप्त अपने पूर्वज लोगों के द्वारा जो ज्ञान प्रदान किया गया, प्रस्तुत किया गया, उसे नयी पीढ़ी को देना ही शिक्षा का मूल आधार है। वही शिक्षा है। इस प्रकार किसी भी समाज की सम्यक शिक्षा वह है जो सर्वप्रथम अपने ही समाज और राष्ट्र में हुए ज्ञानियों के द्वारा प्रस्तुत, निरूपित और व्याख्यायित ज्ञान के स्वरूप को ठीक-ठीक नयी पीढ़ी को प्रदान करे। अर्थात् अपने वृद्धों से संवाद करें। परंतु वर्तमान में 1947 ईसवी के बाद से जो लोग शासन में रहे, उन्होंने शिक्षा के नाम पर यूरोप और बाद में संयुक्त राज्य अमेंरिका के जो कुछ अनुशासनों में वृद्धि प्राप्त या उत्कर्ष प्राप्त ज्ञानी लोग हैं, उनसे ही भारत के विद्यार्थियों का संवाद बलपूर्वक कराया।
उदाहरण के लिए इतिहास में, राजनीति शास्त्र में, अर्थशास्त्र में, समाजशास्त्र में, मानस शास्त्र यानी मनोविज्ञान में और शब्दशास्त्र, भाषा शास्त्र आदि में यूरोप के सयाने लोग, वृदध लोग क्या क्या कहते रहे हैं और क्या कह रहे हैं, उसे ही भारत के विश्वविद्यालयों में मूल रूप से पढ़ाया जाता है और मात्र शोभा या अलंकार की भांति एकाध भारतीय विद्वानों के भी अंश उस विषय में प्रस्तुत कर दिए जाते हैं। इसका अर्थ है कि भारत के सभी विद्यार्थियों को शासन के द्वारा यूरोप के और बाद में संयुक्त राज्य अमेरिका के वृद्धों से संवाद करने को विवश किया जाता है। यह तो शिक्षा के प्रयोजन से रहित शिक्षा हुई। शिक्षा का मूल प्रयोजन है सर्वप्रथम अपने समाज और राष्ट्र के वृद्धों से विद्यार्थियों का संवाद कराना। उनके ज्ञान को उन्हें प्रदान करना। इतिहास, पुराण, गणित, ज्योतिष, विज्ञान, आयुर्वेद, योगशास्त्र सहित समस्त भारतीय दर्शन शास्त्र, व्याकरण, भाषा शास्त्र आदि सभी रूपों में सबसे पहले अपने देश के ज्ञानियों को जानना आवश्यक है। फिर यूरो-अमेरिकी विद्वानों को भी अवश्य वे जानें।
अपरा विद्या के प्रत्येक अनुशासन में सर्वप्रथम विद्यार्थियों को अपने ही राष्ट्र और अपने ही समाज के वृद्धों के द्वारा जाने गए और प्रस्तुत किए गए ज्ञान को जानना चाहिए तथा सर्वप्रथम अपने ही वृद्धों से संवाद करना चाहिए। इसके बाद जैसा हमारे वृद्धों ने निर्देश दिया है, सारे संसार के भी वृद्धों से ज्ञान प्राप्त करना सहज स्वाभाविक है। अपनों से संवाद न करके केवल बाहरी वृद्धों के ज्ञान को जानना तो शिक्षा के प्रयोजन को नष्ट करना है। अत: भारतीय शिक्षा वही है जो सर्वप्रथम इतिहास में, अर्थशास्त्र में, राजनीति शास्त्र में, मानस शास्त्र में, मनोविज्ञान सहित प्रत्येक मानविकी अनुशासन में भारत का ज्ञान नयी पीढ़ी को प्रदान करे। भारत के शास्त्र ज्ञान को, भारत के महान ज्ञानियों के ज्ञान को अपने विद्यार्थियों तक पहुंचाएं। यही भारतीय शिक्षा का मूल लक्ष्य है।
भारत में ज्ञान की अनंत शाखाएं हैं और उनका अत्यधिक विस्तार है। अत: जिसमें अपने संस्कार और प्रतिभा और रुचि के कारण विशेष गति हो, उस अनुशासन में विशेष ज्ञान प्रदान किया जाना चाहिए और यूरोप या संयुक्त राज्य अमेंरिका सहित विश्व के अन्य देशों के भी वृद्धों का ज्ञान यदि संबंधित विषय में प्राप्त हो सके तो और अच्छा है। परंतु शिक्षा के मूल में अपने राष्ट्र और अपने समाज के वृद्धों के ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुंचाना ही आधार बनना चाहिए। यही भारतीय शिक्षा का लक्ष्य है।
वैसे भी समस्त विश्व में शिक्षा का मूल लक्ष्य और प्रयोजन यही है। आखिर यूरोप में और संयुक्त राज्य अमेंरिका में भी प्रत्येक विद्यार्थी को सर्वप्रथम अपने ही ज्ञानवृद्धिप्राप्त सयानों का ज्ञान ही प्रदान किया जाता है। भारत में इतने महान ज्ञानी हुए हैं, इतिहास संबंधी, राजनीति शास्त्र संबंधी, वित्तशास्त्र संबंधी अथवा मानसशास्त्र संबंधी या धर्मशास्त्र संबंधी उन महान भारतीय ज्ञानियों के ज्ञान को तो यूरोप के किसी भी देश में प्रारंभ में विद्यार्थियों को नहीं पढ़ाया जाता। यहां तक कि बाद में भी कुछ यदि पढ़ाया जाता है तो उनकी अपनी व्याख्याओं के साथ पढ़ाया जाता है, उनके अपने दृष्टिकोण से पढ़ाया जाता है। भारतीय ऋषियों के दृष्टिकोण को यथावत किसी भी यूरोपीय देश में अथवा संयुक्त राज्य अमेंरिका में किसी भी अनुशासन में नहीं पढ़ाया जाता। जिन क्षेत्रों में भारतीय ऋषि और भारतीय गुरुजन सर्वश्रेष्ठ मान्य है, उन क्षेत्रों में भी पहले हमारा ज्ञान वहाँ विद्यार्थियों को नहीं दिया जाता। क्योंकि सर्वत्र शिक्षा का मूल प्रयोजन अपने ही पूर्वजों के ज्ञान को नई पीढ़ी को प्रदान करना है। भारत में भी शिक्षा के इसी सार्वभौम प्रयोजन के अनुरूप शिक्षा प्रदान की जानी आवश्यक है।
हमारे जिस परंपरागत शैक्षणिक ढांचे को अंग्रेजों ने बलपूर्वक तथा योजना पूर्वक तोड़ा और फिर 15 अगस्त 1947 ईस्वी के बाद उस परंपरा गत शिक्षा के ढांचे को टूटा फूटा और बिखरा ही रहने दिया गया, उसे फिर से नए उत्साह के साथ प्रामाणिक रूप में रचे जाने की आवश्यकता है। वस्तुत: शिक्षा के लक्ष्य ज्ञानी लोग ही तय कर सकते हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के तत्वावधान में भारत के श्रेष्ठ विद्वानों का एक वृहद निकाय व्यापक विचार-विमर्श करें और वेदों उपनिषदों पुराणों महाकाव्यों आदि के परंपरागत विद्वानों तथा अन्य सभी ज्ञान धाराओं के मुखिया लोगों और ज्ञानी लोगों और भारतीय कला रूपों तथा शिल्प परंपराओं के ज्ञानी और हुनरमंद व्यक्तियों तथा अन्य समूहों के प्रतिनिधियों का एक समवाय हो और उसमें शिक्षा के नए स्वरूपों के विषय में सर्व अनुमति के आधार पर एक प्रामाणिक स्वरुप विकसित किया जाए।
हमारी ज्ञान परंपराएं विराट और विविध हैं। उनके प्रतिनिधियों के संवाद से राष्ट्रीय शिक्षा के लक्ष्य का निर्धारण का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा। इस विषय में राजनेताओं और प्रशासकों को स्वयं अपने स्तर पर निर्णय लेने का हठ नहीं करना चाहिए क्योंकि वे इन विषयों के अधिकारी विद्वान नहीं हैं। राजनीति शास्त्र या विधिशास्त्र अथवा प्रशासनिक शास्त्र में उनका कोई योगदान अवश्य हो सकता है परंतु ज्ञान के अन्य विराट क्षेत्रों में राजपुरुषों और प्रशासकों का कोई निर्णायक योगदान नहीं हो सकता। भारतीय शिक्षा सदा ही परंपरा से शिक्षक केंद्रित यानी आचार्य केंद्रित रही है और उसे पुन: आचार्य केंद्रित ही किए जाने की वश्यकता है।
शिक्षा को शिक्षक के स्थान पर प्रशासक और मंत्रालय के सचिव तथा मुखिया लोग तय करें, यह तो अंग्रेजी काल से चला था और यह परंपरा भारत की ज्ञान परंपरा को नष्ट करने वाली प्रमाणित हुयी है। भारतीय शिक्षा के स्वरूप और लक्ष्यों का निर्धारण भारत के ज्ञानियों के द्वारा ही हो, ऐसी व्यवस्था करना शासन का कर्तव्य है। ऐसी समृद्ध शिक्षा परंपरा का पुन: उत्कर्ष ही भारतीय शिक्षा के लक्ष्य होने चाहिए। भारतीय धरोहर
आज देश की दो विशेष पुण्य आत्माओं का तिथि है पर दुर्भाग्य से हम सब अनजान हैं एक भोग में डूबी हुई आधुनिक संस्कृति के कुछ युवा नौजवान के प्रेरणास्रोत महान बलिदानी क्रांतिकारी खुदीराम बोस जिनका शब्द हृदय को झंकृत कर देता है मैं गरीब हूं यह जीवन या प्राण न्योछावर करने के अलावा मेरे पास और कुछ नहीं है जो भारत मां को अर्पण कर सकूं दूसरे महान राष्ट्र भक्त श्री राजीव दीक्षित जी जिन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा के लिए अपना प्राण न्योछावर कर दिया और मानसिक गुलामी से बाहर निकालने में अपना अमूल्य योगदान दिया ऐसे महापुरुषों को सत-सत नमन
अब एक ही समाधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान 9336919081 पर whatsapp टेलीग्राम या डायरेक्ट कॉल 7984113987 यदि दोनों नंबर यदि नहीं लग रहे हैं मैसेज या whatsapp कॉल कर सकते हैं क्योंकि पिछले तीन साल से हमारा नंबर अपडेट नहीं हो रहा है google पर। हमारे संपर्क संचार में व्यवधान किया जा रहा है https://ajaykarmyogi1.blogspot.com/2021/11/blog-post.html?m=1
हमारे जिस परंपरागत शैक्षणिक ढांचे को अंग्रेजों ने बलपूर्वक तथा योजना पूर्वक तोड़ा और फिर 15 अगस्त 1947 ईस्वी के बाद उस परंपरा गत शिक्षा के ढांचे को टूटा फूटा और बिखरा ही रहने दिया गया, उसे फिर से नए उत्साह के साथ प्रामाणिक रूप में रचे जाने की आवश्यकता है। वस्तुत: शिक्षा के लक्ष्य ज्ञानी लोग ही......यह फोटो जयपुर के महाराजा सवाई रामसिंह द्वितीय की है। जनेऊ, रुद्राक्ष धारण कर नियमित त्रिकाल संध्यावंदन करते हुए। सामान्यतः राजा-महाराजों की वैभवशाली छवियां प्रदर्शित की जाती हैं। भोगी बताया जाता है। कभी नहीं बताया जाता, क्षत्रिय राजा निष्ठा से कर्मकांड करते थे। सहयोग : समीर मोहन एवम आकाश फोटो स्टेटस में देखें
बुधवार, 29 सितंबर 2021
उन्नत बीज जिससे किसान समृद्ध खुशहाल और भारत की प्रजा कुपोषण से मुक्त हो जाएगी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका की यात्रा के पश्चात भारत मैं कल घोषणा की गई कि भारत में उन्नत तकनीक के अनेक फसलों का बीज राष्ट्र को देने की घोषणा की है जिससे किसान समृद्ध खुशहाल और भारत की प्रजा कुपोषण से मुक्त हो जाएगी
किसी समय में सेम का पौधा घर की सुरक्षा में लगी घास फूस की टटिया पर फैल कर रसोई की महीने 2 महीने का इंतजाम कर देता था!
और कभी छप्पर (खपरैल) की छत पर फैली लौकी कद्दू की बेले मिलकर महीने 2 महीने सब्जी का खर्च निकाल देती थी!
खलियान में फैली कद्दू की बेल पर लगने वाले पीले पीले फूलों से स्वादिष्ट और सुगंधित पकोडीयों से सुबह के नाश्ता में महीना कब निकल जाता था; पता ही नहीं लगता था!
जेठ, बैशाख के महीने में दाल और कुमड़े(कुमेहड़ा) से बनी बडीयां (बरीं) जाड़ों तक का रसोई का खर्च झेल जाती थी!
इन्हीं महीनों में अम्मा के हाथ का बना बथुआ और भात खाने का भी अपना अलग ही तरह का आनंद होता था; ऐसा लगता था! मानो! स्वर्ग में परोसे जाने वाले भोजन का आनंद ले रहे हो!
सावन,भादो के महीने में भूसे के गुगों पर फैली तोरई की बेलें; तथा तालाब पर पानी में उगने वाली चोलाई और नारी के साग से रसोई के कई महा निकल जाते थे!
यह वह दिन थे; जब सब्जी पर होने वाले खर्च का अहसास! तक नहीं होता था!
जाड़े के मौसम में गांव के बाहर घूरें के ढेरों पर या फिर पानी के नल के पास के स्थान को साफ कर; धनिए के बीज को जूते से रगड़ कर कुछ समय तक घूरे में; पोटली बांधकर गाड़ दिया जाता था!
उसके बाद उसकी क्यारियां बनाकर देते थे; और उसके चारों ओर लहसन, बाकला, मूली, देसी टमाटर, फूलगोभी की लगा दिए जाते थे!
फिर जाड़े की सीजन में इन सभी सब्जियों का भोकाल चलता था! जैसे-जैसे शरद ऋतु आगे बढ़ती;
मूली और टमाटर तथा हरे धनिया की चटनी को तो जमाई वाला रुतबा हासिल हो जाता था!
खिचड़ी के साथ तो हरी चटनी, मूली का चोली दामन का साथ होता था!
तब हम लोगों को जीडीपी का कोई ज्ञान नहीं था!
राजनीति में पडकर हम अपना आपसी व्यवहार खराब नहीं करते थे!
ना! ही! एक दूसरे के प्रति बैर और जलन की भावना थी! लाख वैचारिक मतभेद होने के बाद भी; हम सब में आपसी प्रेम और मानवता थी!
यह सभी सब्जियां सर्व सुलभ और रसोई की साथी थीं!
अगर घर पर कोई मेहमान आ जाते थे; तो तीन चार सब्जियों का इंतजाम तो चुटकी बजाते यूं ही हो जाता था!
वह भी बिल्कुल ऑर्गेनिक एकदम शुद्ध!
गर्मी के मौसम में गांव के चारों ओर आम की बगिया से आंधी में गिरे आमों से पूरे साल के अचार का इंतजाम हो जाता था!
गांव के अंदर लगी आटा पीसने वाली चक्की से गेहूं का आटा पीसकर शुद्ध आता था!
जैसे-जैसे शाम को एक घर से धुआं उठता था; तो फिर क्या? गोबर से बने कंडे के टुकड़े को लेकर आग मांग कर लाने का सिलसिला भी शुरू हो जाता था!
सूरज के ढलने के समय रेडियो पर चौपाल और आकाशवाणी के मनमोहक समाचारों और कार्यक्रमों से दिन विदा लेता था!
रात में छतों पर सोते समय फुल आवाज में रेडियो पर विविध भारती के सतरंगी गानों की धुनें गूंजा करती थी; जिसकी स्वर लहरियां हवा में एक गांव से दूसरे गांव तक सुनाई देती थी!
रातें बड़ी होती थी; द्वा!रे द्वारे! खटीयों पर बिस्तर लगाए जाते थे!
मर्द घर से बाहर दरवाजों पर सोते थे;वहीं महिलाएं घर के आंगन में खटिया बिछा कर सोती थी!
हर तीसरे दरवाजे पर कथा कहानियां, बुझजनीयां होती थी! कहीं-कहीं तो बड़े बूढ़े एक साथ बैठकर आल्हा का राग छेड़ देते थे!
जो किसी बड़े मनोरंजक कार्यक्रम से कम नहीं होता था!
घर के बीच आंगन में लगे नीम के पेड़ के नीचे पड़ी खटिया में बहुएं अपनी साड़ी से पर्दा खींचकर सोती थी!
वहीं बच्चे अपनी दादी से कहानी सुनते सुनते सो जाते थे!
एक एक व्यक्ति के कम से कम पांच पांच बच्चे होते थे! लेकिन सब खुश, हष्ट पुष्ट, सबके सपने पूरे होते थे!
लेकिन महंगाई कभी उन बड़े बूढ़ों को हडी नहीं!
उन्होंने कभी आंदोलन नहीं किया!
एकदम खुश और मस्त लोग थे!
तब किसानों में कर्ज का फैशन बिल्कुल नहीं था!
किसान कर्ज से ऐसे घबराते थे; नाम लेने मात्र से ही जैसे सांप की पूंछ पर पैर पड़ गया हो!
समय बदला,आ गया टेलीविजन और नौकरी का जमाना!
बच्चे सरकारी नौकरी पाते ही टीवी देख कर कोट पैंट और जींस पहनने लगे सेंट का तो जैसे चलन ही चल पड़ा!
सरकारी नौकरी वाले दामादो में बेटियों के पिताओं को भगवान विष्णु नजर आने लगे!
बच्चियों को नारायण के साथ बिहाने के लिए किसान क्रेडिट कार्ड, गृह ऋण, गोल्ड लोन मजबूरी बन गया!
और वक्त बदलता ही चला गया, और फिर आया वकीलों और इंजीनियरों का दौर!
इनसे रिश्तो के लिए बेटियों के बाप अपने पूर्वजों की संपत्ति भी बेचने को तैयार थे! फिर क्या था?
धीरे धीरे घर की कच्ची दीवारों पर सेम की बैलों को फैलाने वाली बेटियां अपने पति के साथ रहने फ्लैटों में चली गई!
जहां जाकर, उन्हीं बेटियों ने कैक्टस के पौधे उगाने शुरू कर दिए!
और फिर देखते ही! देखते! सब्जियां भी महंगी हो गई!
बहुत पुरानी यादें ताजा हो गई।
सच में सब्जी पर कुछ भी खर्च नहीं होता था! कहीं महंगाई नहीं थी!
जिसके पास कुछ नहीं था उसका भी काम चलता था।
महंगाई का दूर-दूर तक नामोनिशान न था।
सिर्फ था! तो चैनो अमन, प्यार, सम्मान, भाईचारा, बड़े छोटे की तहजीब!
पुराने दिनों में दही,मट्ठा की भरमार थी;
जिसके पास कुछ नहीं था,उसका भी काम चलता था।
चना, मटर गुड,आम,जामुन;
सबके लिए उपलब्ध रहता था।
बेमेल विचारों के रहते भी;
अगाध आपसी प्रेम था।
आज की दकियानूसी,बैर,वैमनस्य,जलन भरी मानसिकता;
तब उसका नामोनिशान न था।
हाय रे! आधुनिकता! हाय रे! ऊंची शिक्षा;
कहां तक ले आई,
चारों तरफ सिर्फ महंगाई ही महंगाई;
बेफिजूल खर्चों से घिरे इंसान,आडंबर में अपनी नींद गवाई।
विचारणीय है कि:
क्या हमारा लक्ष्य यही है, जिधर हम जा रहे हैं। या फिर सिर्फ हम गफलत में हैं!और जिंदगी का सफर यूं ही जारी है!
बुधवार, 4 अगस्त 2021
online education के आत्मघाती परिणाम
खबर है कि जुआ में पैसा हारने के बाद भय से तेरह वर्ष के लड़के ने फाँसी लगा कर आत्महत्या कर ली। लड़का किसी अच्छे प्रतिष्ठित विद्यालय का विद्यार्थी था। मैं ऐसे असँख्य बच्चों को जानता हूँ जो इससे भी कम आयु के हैं और अपना परिवार चलाने के लिए कहीं दैनिक मजदूरी कर रहे हैं। और हाँ! उन लड़कों ने कभी प्राइवेट स्कूल का मुँह भी नहीं देखा।! वो अपने जीवन जीने के साथ दूसरे के जीवन जीने में सहयोगी बन गए
सोच कर देखिये! 13 वर्ष की उम्र आत्महत्या की होती है क्या? तेरह वर्ष की उम्र होती है कहानियां पढ़ने की। यह उम्र होती है दोस्तों के संग उछलने-कूदने की, सीखने की, हँसने-खिलखिलाने की... तेरह वर्ष का बच्चा यदि आत्महत्या कर रहा है, इसका एक ही अर्थ है कि वह पूरी तरह अकेला हो गया है। उसके पास अपनी बात बताने के लिए न कोई अच्छा दोस्त है, न ही वैसे रिश्ते हैं जिनसे वह हर बात कह सके। उसे इतना अकेला कौन बना गया है? यकीन कीजिये, उसे उसके धूर्त विद्यालय और मूर्ख अभिभावकों ने अकेला कर दिया है।
https://ajaykarmyogi1.blogspot.com/2021/08/13.html?m=1
प्राचीन काल में शिक्षा ज्ञान के लिए ली जाती थी, फिर समय आया जब शिक्षा का लक्ष्य नौकरी प्राप्त करना हो गया। पर अभी शिक्षा स्टेटस सिम्बल है। अधिकांश परिवार फी के नाम पर शौक से लुट रहे हैं, ताकि कह सकें कि "मेरा बच्चा शहर के सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ता है" उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं कि बच्चा क्या सीख रहा है, उन्हें बस यह पता है कि वे गर्व से छाती फुला कर कह सकते हैं कि हम दो लाख पर ईयर फी भरते हैं।
दरअसल शिक्षा प्राप्त करना जीवन जीने की एक सामान्य प्रक्रिया है, जिसे अब हौवा बना दिया गया है। बच्चों को जैसे हल में जोत दिया जा रहा है, जहाँ वे चाह कर भी किताबों से बाहर सर निकाल कर दूसरी ओर नहीं देख पा रहे हैं। हम यह सोच कर खुश हो रहे हैं कि हमारा छोटा बच्चा फर्राटेदार अंग्रेजी बोलता है। हम यह सोच कर प्रसन्न हैं कि वह कम्प्यूटर, मोबाइल वगैरह चला लेता है। हमें पता भी नहीं चलता कि वह धीरे धीरे मूर्ख बन रहा है। उसमें न सामाजिकता की समझ विकसित हो रही, न व्यवहारिकता की समझ हो रही है। वह न धर्म को समझ रहा है, न नैतिकता को... वह बिल गेट्स के बारे में सबकुछ जानता है, पर अपने रामगढ़ वाले मौसा के बारे में कुछ नहीं जानता।
आधुनिक परिवारों के अधिकांश अभिभावक यह भूल चुके हैं कि बच्चों को समय देना भी उनका कर्तव्य है। वे बच्चों को स्कूल में हाँक कर निश्चिन्त हो जाते हैं। वे उसे महंगे सामान दे देते हैं, उसके लिए हर आवश्यक-अनावश्यक वस्तु खरीद देते हैं, पर समय नहीं देते।
जीवन जीने की कला स्कूल नहीं सिखाता, यह सिखाना एक श्रेष्ठ गुरु का काम है। श्रेष्ठ गुरु और गुरुकुलों से दूर करके अभिभावक भी यदि न सिखाये तो बच्चा भले बड़ा अधिकारी बन जाये, पर कभी सुखपूर्वक जी नहीं पायेगा। और यही कारण है कि आजकल अच्छे खासे सुखी सम्पन्न परिवार के लोग भी छोटी सी परेशानी से हार कर आत्महत्या कर लेते हैं। या घुट घुट करके जीते हैं
हमारी पीढ़ी तक बच्चों को माता पिता नहीं बल्कि दादा-दादी पालते थे उनके लिए लिए ना केवल कहानियों की किताबें आदि लाते थे बल्कि उनका उंगली पकड़कर चलाने से लेकर जागने से लेकर सोने तक बच्चे दादा दादी के सानिध्य में ही रहते थे। बच्चों के चरित्र निर्माण में उन किताबों से भी बड़ा महत्वपूर्ण प्रशिक्षण साक्षात होता था। ऐसा नहीं है कि अब के आधुनिक पढ़े-लिखे माता पिता अभिभावक उन का महत्व नहीं समझते,वे समझते हैं पर दादा दादी और परिवार की परंपराओं में उन्हें हीनता नजर आता है। उन्हें लगता है कि कम्प्यूटर के युग में दादा दादी की और परिवार की सानिध्य कहीं बच्चों को पीछे न ढकेल दे। वस्तुतः वे प्राइवेट विद्यालयी शिक्षा प्रणाली के हौवे में फँस गए हैं, जो चाह कर भी अपने बच्चों को सही दिशा नहीं दे पा रहे हैं।
यदि ऐसी घटनाओं से बचना है तो स्कूलों पर निर्भरता छोड़ कर अपने बच्चों को दादा दादी परिवार का सानिध्य और समय देना ही होगा। बात केवल आत्महत्या की नहीं है, यदि उसे सही तरीके से जीवन जीना न सिखाया तो आपका उच्च शिक्षित लड़का अपने जीवन में अनपढ़ लड़कों से पराजित होता रहेगा। अब एक ही समाधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान 9336919081 पे whatsapp या 7984113987 पर काल करें
पहले *भटूरे* को फुलाने के लिये उसमें *ENO* डालिये
फिर *भटूरे* से फूले पेट को पिचकाने के लिये *ENO* पीजिये
*जीवन के कुछ गूढ़ रहस्य आप कभी नहीं समझ पायेंगे*
*पांचवीं* तक *स्लेट* की बत्ती को *जीभ* से चाटकर *कैल्शियम* की कमी पूरी करना हमारी स्थाई आदत थी
*लेकिन*
इसमें *पापबोध* भी था कि कहीं *विद्यामाता* नाराज न हो जायें ...!!!
*पढ़ाई* के *तनाव* हमने *पेन्सिल* का पिछला हिस्सा चबाकर मिटाया था ...!!!
*पुस्तक* के बीच *पौधे की पत्ती* और *मोरपंख* रखने से हम *होशियार* हो जाएंगे ... ऐसा हमारा *दृढ विश्वास* था
*कपड़े* के *थैले* में *किताब-कॉपियां* जमाने का *विन्यास* हमारा *रचनात्मक कौशल* था ...!!!
हर साल जब नई *कक्षा* के *बस्ते बंधते* तब *कॉपी किताबों* पर *जिल्द* चढ़ाना हमारे जीवन का *वार्षिक उत्सव* मानते थे ...!!!
*माता - पिता* को हमारी *पढ़ाई* की कोई *फ़िक्र* नहीं थी, न हमारी *पढ़ाई* उनकी *जेब* पर *बोझा* थी ...
*सालों साल* बीत जाते पर *माता - पिता* के *कदम* हमारे *स्कूल* में न पड़ते थे ...!!!
एक *दोस्त* को *साईकिल* के बिच वाले *डंडे* पर और *दूसरे* को *पीछे कैरियर* पर *बिठा* हमने कितने रास्ते *नापें* हैं, यह अब याद नहीं बस कुछ *धुंधली* सी *स्मृतियां* हैं ...!!!
*स्कूल* में *पिटते* हुए और *मुर्गा* बनते हमारा *ईगो* हमें कभी *परेशान* नहीं करता था दरअसल हम जानते ही नही थे कि, *ईगो* होता क्या है❓️
*पिटाई* हमारे *दैनिक जीवन* की *सहज सामान्य प्रक्रिया* थी
*पीटने वाला* और *पिटाने वाला* दोनो *खुश* थे,
* पिटाने वाला* इसलिए कि हमे *कम पिटे* *पीटने वाला* इसलिए *खुश* होता था कि *हाथ साफ़* हुवा ...!!!
हम अपने *माता - पिता* को कभी नहीं बता पाए कि हम उन्हें कितना *प्यार* करते हैं, क्योंकि हमें *"आई लव यू"* कहना आता ही नहीं था ...!!!
आज हम *गिरते - सम्भलते*, *संघर्ष* करते दुनियां का हिस्सा बन चुके हैं, कुछ *मंजिल* पा गये हैं तो कुछ न जाने *कहां खो* गए हैं ...!!!
हम दुनिया में कहीं भी हों लेकिन यह सच है, हमे *हकीकतों* ने *पाला* है, हम सच की दुनि�
🙏🏻🌹🌹🙏🏻
सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...
-
यह करवा रहे हैं वैज्ञानिक जो कभी इन जानवरों ने भी करना नहीं चाहा, #भगवान बनना चाहता है #इंसान।। यह सिंह (टाइगर) और बब्बर शेर का वर्ण स...
-
गलती होने पर कान क्यों पकड़ते हैं गौतम, वसिष्ठ, आपस्तंब धर्मसूत्रों और पाराशर स्मृति सहित अन्य ग्रंथों में ज्ञान की कई बातें बताई गई हैं। इन ...
-
शिष्य गुरु का चयन नहीं करता अपितु गुरु शिष्य का चयन स्वयं करता हैं। शिष्य अपने अंदर स्वार्थ लेकर गुरु ढूंढेगा तो उसे केवल कालनेमि गुरु म...








