शनिवार, 26 फ़रवरी 2022

कॉमेडियन actor यूक्रेन के राष्ट्रपति Volodymyr Zelensky को हथियार और drug कंपनियों का डायरेक्शन


 







अपोन ए टाइम दियर वाझ ए यूक्रेन।

यूक्रेन के साथ एक समस्या थी।

उसमे आधे लोग खुद को रूसी मानते रूसी भाषा, रहन सहन खान पान, Culture, सभ्यता संस्कृति सब रूसी ही थी।

बाकी आधे यूक्रेनी थे।

मने यूक्रेन वाझ ए कन्फ्यूज्ड नेशन ऑफ कन्फ्यूज़्ड पीपुल।

मने ऊ सब यही decide नही कर पाए कि ऊ सब रूसी हैं या यूक्रेनी।

बहरहाल, ऐसे जनता एक फंतासी की दुनिया मे जीती है, Utopian World में... कल्पना लोक में.... एक राजकुमार घोड़े पे सवार हो के आएगा और राजकुमारी सिंड्रेला को छुड़ा के ले जाएगा।

सो 2015 में यूक्रेन में एक TV धारावाहिक शुरू हुआ।

उसका नाम था Servant Of The People ।

वो धारावाहिक 2015 से 2019 तक लगातार चला और यूक्रेन में अत्यधिक पॉपुलर हुआ।

मने लोगबाग उस सीरियल के दीवाने थे।

सीरियल में Volodymyr Zelensky नामक एक कॉमेडियन actor यूक्रेन के राष्ट्रपति का रोल करता था।

2019 में सीरियल की लोकप्रियता को भुनाने के लिये उसने उसी नाम - Servant of the People नाम की एक political पाल्टी बनाई और घोषणा कर दी कि वो राष्ट्रपति का चुनाव लड़ेगा। और उसने ये भी दावा किया कि वो बेहद ईमानदार है और देश से Corruption दूर कर देगा।

उसने बाकायदे चुनाव लड़ा और जनता ने उसे 73%से भी ज़्यादा मत दे के चुनाव जिता दिया।

इस तरह Volodymyr Zelensky यूक्रेन का राष्ट्रपति बन गया।

कालांतर में Feb 2022 में यूक्रेन बर्बादी के कगार पर खड़ा

#Bhagwant_Mann

#Comedian_actor

#Punjab

कभी कशमीर आईये .....!!!!!

गली -गली मे डाॅक्टर और डेंटल सर्जन बैठे है । हर मेडिकल स्टोर के अंदर बने केबिन मे एक डाॅक्टर साहब विराजमान मिलेंगें । MBBS ड्रिग्री धारी ......

कभी गुडगाँव मे "मेदांता द मेडिसिटी" हो आईये , बाकायदा हिजाबधारी लडकियां और दाढीयुक्त मोमिन डाॅक्टर मिलेंगें । 

कभी मूड हो तो थोडी पडताल कर लेना , सब के सब बांग्लादेश जाकर डाॅक्टरी पढे है , बचे खुचे वुहान (चीन) या फिर यूक्रेन ,जाॅर्जिया और रशियन फेडरेशन के देशो के मेडिकल काॅलेजो से । 

कशमीरियो मे तो एक परम्परा ही बन गई है , "हलाल डिग्री" लेने की , जो केवल बांग्लादेश मे मिलती है । ये हलाल डिग्री वाले डाॅक्टर इतने एक्सपर्ट डाॅक्टर है कि बगैर MCI का एग्जाम पास किये , प्रैक्टिस करते है , कशमीर है भाई , जहाँ इंडिया के नाम से ही चिढ हो , तो मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया गई तेल लेने , भारत सरकार तक चूँ ना करे । 

बेखौफ , बेलौस प्रेक्टिस करते है "बांग्लादेश" से हलाल डिग्री लेकर आये डाॅक्टर साहब । राज्य सरकार भी सबसे ज्यादा वरीयता बांग्लादेश से डिग्री लेकर लौटे दढियलो को ही देती है । 

और काबिलियत तो पूछिये ही मत , जम्मू परिक्षेत्र है ,तो दस्त की दवाई लेने 300 किलोमीटर दूर जम्मू भागिये , कशमीर रीजन है तो चलिये शेर ए कशमीर श्रीनगर । 

एक दाँत तक निकलवाना तो जम्मू जाईये , जबकि एक एक ड्रिस्ट्रिक्ट हाॅस्पिटल के पे रोल पर पचास पचास डाॅक्टर मौजूद है । 

यही हाल यूक्रेन ,जाॅर्जिया , रोमानिया , बुल्गारिया , रूस , के डिग्रीधारियो का है । कमाल तो ये है कि वहाँ मेडिकल की पढाई स्थानीय भाषा मे होती है , ना कि अंग्रेजी मे । सीधे M.D. की डिग्री मिलती है ,जो यहाँ एग्जाम पास करने के बाद MBBS के समकक्ष मानी जाती है , और इसे लेने मे मात्र 07 साल लगते है । पहला साल केवल लैंग्वेज सिखाई जाती है , क्योंकि मेडिसिन की पढाई का माध्यम केवल और केवल स्थानीय भाषा है । 

अरे मेडिकल तो छोडिये , फाईटर एयरक्राफ्ट / पनडुब्बी के क्रू , नेवल नेविगेशन , और एडमिरल गोर्शकोव (विक्रमादित्य) की ट्रेनिंग रूस मे पाने वाले सैनिको से पूछकर देखिये ,वही बता देंगें कि उनको ट्रैनिंग किस भाषा मे दी जाती है रूस , और रशियन फेडरेशन के देशो मे .....????

शायद वो वर्ष था , 1984 जब हमारे स्कवाड्रन लीडर राकेश शर्मा जी को पहले कास्मोनॅट बनने का गौरव प्राप्त हुआ था , जो USSR के बैकानूर (वर्तंमान मे कजाकिस्तान) से अंतरिक्ष मे गये थे रूसियो के साथ । कभी पता करिये कि उन्होने रूसी भाषा क्यों सीखी थी ??? ट्रेनिंग का माध्यम कौन सी भाषा थी ??? 

ड्रग कंपनी का षड्यंत्र में फंसा विश्व https://youtu.be/bbZyrHmMEnE

चलिये फिर से डाॅक्टरो की काबिलियत पर आते है । तो जनाब इन डाॅक्टर साहब ने डिग्री प्राप्त कर ली , MCI का छोटा सा दफ्तर है , सेक्टर -8 द्वारका दिल्ली मे मलेरिया इंस्टीट्यूट के बगल मे । मेडिकल काउंसिल का एग्जाम पास किया या नही किया कौन पूछने आता है इनसे ???? किसी भी बी-ग्रेड सिटी मे नर्सिंग होम खोलकर बैठ गये । कौन सा मरीज इलाज से पहले डाॅक्टर की ड्रिगी चैक कर रहा है ???? 

इलाके के थानेदार को क्या पडी है , कि वो डाॅक्टर से मगजमारी करता फिरे। हो गये डाॅगदर , चल पडी डाॅगदरी । दस दिन ICU का बिल बनाओ , और रेफर कर दो , घंटा किसी को फर्क नही पडता , ना डाॅगदर को , ना मरीज के तीमारदारो को । इंसानी जिंदगी बहुत सस्ती है ना अपने देश मे । 

जरा सोचिये , साल दर साल तीस हजार डाॅक्टर तो अकेले यूक्रेन से आ रहे है , उसके बाद जाॅर्जिया , दस बीस हजार बांग्लादेश से, उतने ही चीन , रोमानिया , बुल्गारिया , हंगरी , कजाकिस्तान , ताजिकिस्तान , मालदोवा , उजबेकिस्तान , नेपाल, मॉरीशस जैसे देशो से आ रहे है । फिर हम ये भी बोलते है कि डाॅक्टर कसांई है , ऐसे लूट लिया ,ऐसे काट लिया , ऐसे मेडिकल नेग्लीजेंसी के चलते मरीज मर गया । 

हरियाणा जैसे राज्यो मे तो जमींदारो मे मशहूर कहावते जन्म ले चुकी है ....

ये दो किल्ले ,रामप्यारी के ब्याह मे बेच देंगें , दो किल्ले बेच के रामकिशन को यूक्रेन/रूस से MBBS करवाणी है , अर फेर ये पाँच किल्ले बेच के इसका नर्सिंग होम बण ज्यागा । 

मै दस फैमिलीज को जानता हूँ , जो अपनी SUV लेकर , सपरिवार छोरी को मेडिकल ऐट्रेंस एग्जाम दिलवाने हरियाणा से बैंगलोर, चेन्नई , गुवाहाटी तक गये है । चल्लो छोरी पेपर दे लेगी , अर हम घूम यांगे । 

और बाद मे यही भारत जैसा देश मेडिकल प्रैक्टिस मे डाॅक्टरो से नेकनीयती , शुचिता , ईमानदारी , सच्चाई , की उम्मीद भी करता है । 

भाई ठगी , चालाकी , बेईमानी , जोड तोड , और मक्कारी से नाममात्र के डाक्टर बनने वाले वही सब तरीके तो अपनायेंगें ना ???

काबिल होते तो यही डाॅक्टर बन लेते , एग्जाम पास कर लेते । किसी लायक नही थे ,तभी तो जोड -तोड , पैसे , संपर्को , दौड धूप , और येन केण प्रकारेण डाॅक्टर बनने डोनेशन सीट पर बांग्लादेश , चीन , यूक्रेन, जाॅर्जिया , रोमानिया , कजाकिस्तान , ताजिकिस्तान से डाॅक्टर बनकर आये है । 

अब सोच लो भाई , क्योंकि जान है तुम्हारी , पैसा है तुम्हारा , बीमारी है तुम्हारी । और डाॅक्टर है यूक्रेन /बांग्लादेश का ....

यूक्रेन का संकट वे फंसे हुए mbbs डिग्री के आकांक्षी चिखते चिल्लाते भारतीय अपने ही हाथों अपने बिनाश कर अपने ही जाल में उलझ कर फडफ़ड़ा रहे हैं वैश्विक फार्मा ड्रग लॉबी और हथियार लॉबी यूक्रेन और रुस के राष्ट्रपति जो चतुर जासूस रह चुका है को अपने जाल में फंसा कर पूरी दुनिया में भय और तनाव से आक्रांत किए हुए है वही दिशाहीन भारत 70 सालों से इनकी बनाए हुए मेडिकल व्यवस्था MCI के चंगुल में फस कर पूरा देश इस मेडिकल लूट का शिकार बना हुआ है कोई आदिवासी बनवासी अपने मूल परंपरागत चिकित्सा से लोगों को ठीक कर रहा है तो उसे मारपीट कर बंद कर दिया जाता है उसको जुर्माना लगाया जाता है उसको आजीवन कारावास कर दिया जाता है वहीं यह फर्जी डिग्रियां पूरे दुनिया से भारत में बांटकर सबके जान के साथ खिलवाड़ हो रहा है पर कोई व्यवस्था कोई सरकारी तंत्र इस पर कोई भी कारवाई करने में अक्षम हो रहा जो पिछले 70 साल से चल रहा है इसलिए अब एक ही समाधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान यूरोपियन देश #यूक्रेन में बड़ी बड़ी शानदार बिल्डिंगें है.. चमचमाती हुई सड़कें और लंबी लक्जरी कार गाडियां हैं सड़कों पर साइकिल तो क्या दोपहिया वाहन भी दिखाई नहीं देते क्योंकि सबके पास महंगी लक्जरी गाडियां जो है अच्छे मेडिकल कॉलेज भी है...

युनिवर्सिटी है तभी तो मेडिकल शिक्षा के लिए भारत के हजारों छात्र यूक्रेन में पढ़ाई कर रहें हैं यानि यूक्रेन में चारों तरफ संपन्नता है अगर नहीं है तो सामरिक शक्ति ,मजबूत सेना , अत्याधुनिक हथियार और वहां की जनता में राष्ट्रवादी भावना यही कारण है कि मात्र दो घंटे में रुस ने यूक्रेन को घुटनों पर लाकर खड़ा कर दिया यूक्रेन के

सेनिक भाग खड़े हुए हैं। यूक्रेन के राष्ट्रपति आम लोगों से युद्ध लड़ने की अपील कर रहें हैं..

इसके लिए सारी पाबंदियां भी हटा दी गई है... यूक्रेन आम नागरिकों को युद्ध लड़ने के लिए हथियार देने की बात भी कह रहा है पर मजाल यूक्रेन का एक भी नागरिक युद्ध लड़ने को तैयार हुआ हो , क्योंकि यूक्रेन के नागरिकों में इजराइल के नागरिकों की तरह राष्ट्रवाद की भावना ही नहीं है।

वह तो एशो आराम की जिन्दगी जीने के आदी हो चुके हैं। यूक्रेन के स्कूल कालेज, युनिवर्सिटी, बाजार, दुकान,आफिस सब बन्द कर दिये गये हैं। सब कारोबार चौपट हो गया है। कारखाने फैक्ट्री सब बन्द हो गये

सब कारोबार चौपट हो गया है कारखाने फैक्ट्री बंद हो गई लोग रोजगार तो क्या अपनी जान बचाने के लिए सिमित संख्या में मौजूद बंकरों में छुप रहें हैं अंडरग्राउंड मेट्रो स्टेशनों में शरण ले रहें हैं। यानि सब कुछ होते हुए भी यूक्रेन आज जिंदगी की भीख मांग रहा है।

ये लेख भारत के उन लोगों को समर्पित है जो राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादियों को गाहे बगाहे गालियां देते रहते हैं तथा सिर्फ महंगाई, बेरोजगारी और आलू प्याज टमाटर तथा मुफ्त की योजनाओं को ही देश के विकास का पैमाना मान बैठे हैं।

शनिवार, 12 फ़रवरी 2022

अपने pin को सुरक्षित और गोपनीय रखने की विद्या का नाम है "कटपयादी सन्ख्या विद्या"


  

जी हाँ, शास्त्रों में एक ऐसी भी विद्या है जिससे आप अपने pin को सुरक्षित और गोपनीय रख सकते हैं,
उस विद्या का नाम है "कटपयादी सन्ख्या विद्या"
●कटपयादि संख्या
हममें से बहुत से लोग अपना Password, या ATM PIN भूल जाते हैं इस कारण हम उसे कहीं पर लिख कर रखते हैं पर अगर वो कागज का टुकड़ा किसी के हाथ लग जाए या खो जाए तो परेशानी हो जाती
पर अपने Password या Pin No. को हम लोग “कटपयादि संख्या” से आसानी से याद रख सकते है।
“कटपयादि”( क ट प य आदि) संख्याओं को शब्द या श्लोक के रूप में आसानी से याद रखने की प्राचीन भारतीय पद्धति है
चूँकि भारत में वैज्ञानिक/तकनीकी/खगोलीय ग्रंथ पद्य रूप में लिखे जाते थे, इसलिये संख्याओं को शब्दों के रूप में अभिव्यक्त करने हेतु भारतीय चिन्तकों ने इसका समाधान 'कटपयादि' के रूप में निकाला।
कटपयादि प्रणाली के उपयोग का सबसे पुराना उपलब्ध प्रमाण, 869 AD में “शंकरनारायण” द्वारा लिखित “लघुभास्कर्य” विवरण में मिलता है
तथा “शंकरवर्मन” द्वारा रचित “सद्रत्नमाला” का निम्नलिखित श्लोक इस पद्धति को स्पष्ट करता है -
इसका शास्त्रीय प्रमाण -
नज्ञावचश्च शून्यानि संख्या: कटपयादय:।
मिश्रे तूपान्त्यहल् संख्या न च चिन्त्यो हलस्वर: ॥
[अर्थ: न, ञ तथा अ शून्य को निरूपित करते हैं। (स्वरों का मान शून्य है) शेष नौ अंक क, ट, प और य से आरम्भ होने वाले व्यंजन वर्णों द्वारा निरूपित होते हैं।
किसी संयुक्त व्यंजन में केवल बाद वाला व्यंजन ही लिया जायेगा। बिना स्वर का व्यंजन छोड़ दिया जायेगा।]
अब चर्चा करते हैं कि आधुनिक काल में इस की उपयोगिता क्या है और कैसे की जाए ?
कटपयादि – अक्षरों के द्वारा संख्या को बताकर संक्षेपीकरण करने का एक शास्त्रोक्त विधि है, हर संख्या का प्रतिनिधित्व कुछ अक्षर करते हैं जैसे
1 – क,ट,प,य
2 – ख,ठ,फ,र
3 – ग,ड,ब,ल
4 – घ,ढ,भ,व
5 – ङ,ण,म,श
6 – च,त,ष
7 – छ,थ,स
8 – ज,द,ह
9 – झ,ध
0-ञ,न,अ,आ,इ,ई,उ,ऊ,ऋ,ॠ,लृ,ए,ऐ, ओ,
हमारे आचार्यों ने संस्कृत के अर्थवत् वाक्यों में इन का प्रयोग किया, जैसे गौः = 3, श्रीः = 2 इत्यादि ।
इस के लिए बीच में विद्यमान मात्रा को छोड देते हैं । स्वर अक्षर ( vowel) यदि शब्द के आदि (starting) मे हो तो ग्राह्य ( acceptable) है, अन्यथा अग्राह्य (unacceptable) होता
जैसे समझिए कि मेरा ATM PIN 0278 है- पर कभी कभी संख्या को याद रखते हुए ATM में जाकर हम Confuse हो जातें हैं कि 0728 था कि 0278 ? यह भी अक्सर बहुत लोगों के साथ होता है, ये इन से बचने के उपाय हैं
जैसे ATM PIN के लिए कोई भी चार अक्षर वाले संस्कृत शब्द को उस के कटपयादि मे परिवर्तन करें ( उस शब्द को सिर्फ अपने ही मन मे रखें, किसी को न बताएं )
उदाहरण के लिए –
इभस्तुत्यः = 0461
गणपतिः = 3516
गजेशानः = 3850
नरसिंहः = 0278
जनार्दनः = 8080
सुध्युपास्यः = 7111
शकुन्तला = 5163
सीतारामः = 7625
इत्यादि ( अपने से किसी भी शब्द को चुन लें )
ऐसे किसी भी शब्द को याद रखें और तत्काल “कटपयादि संख्या” मे परिवर्तन कर के अपना ATM PIN आदि में प्रयोग करें ।
नोट, कृपया दिए गए उदाहरण का नकल करके अपना पिन ना बदलें अपने दिमाग का इस्तेमाल करके फिर पिन बदलें क्योंकि यह मैसेज वायरल हो चुका है और कई तिकड़मबाज इसका दुरुपयोग कर सकते हैं
सत्य सनातन धर्म की जय।
साभार धरोहर पत्रिका

मंगलवार, 25 जनवरी 2022

  

 आत्मोत्कर्ष की महायात्रा जिस मार्ग से होती है उसे मेरुदण्ड या सुषुम्ना कहते हैं । उसका एक सिरा मस्तिष्क का-दूसरा काम केन्द्र का स्पर्श करता है । कुण्डलिनी साधना की समस्त गतिविधियाँ प्रायः इसी क्षेत्र को परिष्कृत एवं सरल बनाने के लिए हैं । इड़ा पिंगला के प्राण प्रवाह इसी क्षेत्र को दुहराने के लिए नियोजित किये जाते हैं । साबुन पानी में कपड़े धोये जाते हैं । झाड़ू झाड़न से कमरे की सफाई होती है । इड़ा पिंगला के माध्यम से किये जाने वाले नाड़ी शोधन प्राणायाम मेरुदण्ड का संशोधन करने के लिए है । इन दोनों ऋणात्मक और धनात्मक शक्तियों का उपयोग सृजनात्मक उद्देश्य से भी होता है ।

इमारतें बनाने वाले कारीगर कुछ समय नींव खोद का गड्डा करते हैं, इसके बाद ही दीवार चुनने के काम में लग जाते हैं । इसी प्रकार इड़ा पिंगला संशोधन और सृजन का दुहरा काम करते हैं । जो आवश्यक है उसे विकसित करने में वे कुशल माली की भूमिका निभाते हैं । यों आरंभ में जमीन जोतने जैसा ध्वंसात्मक कार्य भी उन्हीं को करना पड़ता है पर यह उत्खनन निश्चित रूप से उन्नयन के लिए होता है ।

माली भूमि खोदने, खर-पतवार उखाड़ने, पौधे की काट-छाँट करने का काम करते समय ध्वंस में संलग्न प्रतीत होता है, पर खाद पानी देने, रखवाली करने में उसकी उदार सृजनशीलता का भी उपयोग होता है । इड़ा पिंगला के माध्यम से सुषम्ना क्षेत्र में काम करने वाली प्राण विद्युत का विशिष्ट संचार क्रम प्रस्तुत करके कुण्डलिनी जागरण की साधना सम्पन्न की जाती है ।

मेरुदण्ड को राजमार्ग-महामार्ग कहते हैं । इसे धरती से स्वर्ग पहुँचने का देवयान मार्ग कहा गया है । इस यात्रा के मध्य में सात लोक हैं । इस्लाम धर्म के सातवें आसमान पर खुदा का निवास माना गया है । ईसाई धर्म में भी इससे मिलती-जुलती मान्यता है । हिन्दू धर्म के भूःभुवःस्वःतपःमहःसत्यम् यह सात लोक प्रसिद्ध है । आत्मा और परमात्मा के मध्य इन्हें विराम स्थल माना गया है । लम्बी मंजिलें पूरा करने के लिए लगातार ही नहीं चला जाता । बीच-बीच में विराम भी लेने होते हैं । रेलगाड़ी गन्तव्य स्थान तक बीच के स्टेशनों पर रुकती-कोयला, पानी लेती चलती है । इन विराम स्थलों को 'चक्र ' कहा गया है । चक्रों की व्याख्या दो रूपों में होती है, एक अवरोध के रूप में दूसरे अनुदान के रूप में महाभारत में चक्रव्यूह की कथा है । अभिमन्यु उसमें फँस गया था । वेधन कला की समुचित जानकारी न होने से वह मारा गया था । चक्रव्यूह में सात परकोटे होते हैं । इस अलंकारिक प्रसंग को आत्मा का सात चक्रों में फँसा होना कह सकते हैं । भौतिक आकर्षणों की, भ्राँतियों की विकृतियों की चहारदीवारी के रूप में भी चक्रों की गणना होती है । इसलिए उसके वेधन का विधान बताया गया है ।

रामचन्द्रजी ने बाली को मार सकने की अपने क्षमता का प्रमाण सुग्रीव को दिया था । उन्होंने सात ताड़ वृक्षों का एक बाण से वेधकर दिखाया था । इसे चक्रवेधन की उपमा दी जा सकती है । भागवत माहात्य में धुन्धकारी प्रेत के बाँस की सात गाँठें फोड़ते हुए सातवें दिन कथा प्रभाव से देव देहधारी होने की कथा है । इसे चक्रवेधन का संकेत समझा जा सकता है । चक्रों को अनुदान केन्द्र इसलिए कहा जाता है कि उनके अन्तराल में दिव्य सम्पदाएँ भरी पड़ी हैं । उन्हें ईश्वर ने चक्रों की तिजोरियों में इसलिए बन्द करके छोड़ा है कि प्रौढ़ता, पात्रता की स्थिति आने पर ही उन्हें खोलने उपयोग करने का अवसर मिले कुपात्रता अयोग्यता की स्थिति में बहुमूल्य साधन मिलने पर तो अनर्थ ही होता है । कुसंस्कारी संताने उत्तराधिकारी में मिली बहुमूल्य सम्पदा से दुर्व्यसन अपनानी और विनाश पथ पर तेजी से बढ़ती हैं । छोटे बच्चों को बहुमूल्य जेबर पहना देने से उनकी जान जोखिम का खतरा उत्पन्न हो जाता है ।


धातुओं की खदानें जमीन की ऊपरी परत पर बिखरी नहीं होती, उन्हें प्राप्त करने के लिए गहरी खुदाई करनी पड़ती है । मोती प्राप्त करने के लिए लिए समुद्र में गहरे गोते लगाने पड़ते हैं । यह अवरोध इसलिए है कि साहसी एवं सुयोग्य सत्पात्रों को ही विभूतियों को वैभव मिल सके । मेरुदण्ड में अवस्थित चक्रों को ऐसी सिद्धियों का केन्द्र माना गया है जिनकी भौतिक और आत्मिक प्रगति के लिए नितान्त आवश्यकता रहती है ।


चक्रवेधन, चक्रशोधन, चक्र परिष्कार, चक्र जागरण आदि नामों से बताये गये विवेचनों एवं विधानों में कहा गया है कि इस प्रयास से अदक्षताओं एवं विकृतियों का निराकरण होता है । जो उपयुक्त है उसकी अभिवृद्धि का पथ प्रशस्त होता है । सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन, दुष्प्रवृत्तियों के दमन में यह चक्रवेधन विधान कितना उपयोगी एवं सहायक है इसकी चर्चा करते हुए शारदा तिलक ग्रंथ के टीकाकार ने 'आत्म विवेक' नामक किसी साधना ग्रंथ का उदाहरण प्रस्तुत किया है । कहा गया है कि-


गुदलिङान्तरे चक्रमाधारं तु चतुर्दलम् ।

परमः सहजस्तद्वदानन्दो वीरपूर्वकः॥

योगानन्दश्च तस्य स्यादीशानादिदले फलम् ।

स्वाधिष्ठानं लिंगमूले षट्पत्रञ्त्र् क्रमस्य तु॥

पूर्वादिषु दलेष्वाहुः फलान्येतान्यनुक्रमात् ।

प्रश्रयः क्रूरता गर्वों नाशो मूच्छर् ततः परम्॥

अवज्ञा स्यादविश्वासो जीवस्य चरतो धु्रवम् ।

नाभौ दशदलं चक्रं मणिपूरकसंज्ञकम् ।

बुधवार, 29 दिसंबर 2021

लीलावती ग्रंथ Vadik math ke सुप्रसिद्ध ग्रंथ के निर्माण की भूमिका और भास्कराचार्य की पुत्री एवं कॉल का योगदान

 

 
   गणितज्ञ #लीलावती का नाम हममें से अधिकांश लोगों ने नहीं सुना है। उनके बारे में कहा जाता है कि वो पेड़ के पत्ते तक गिन लेती थी।
शायद ही कोई जानता हो कि आज यूरोप सहित विश्व के सैंकड़ो देश जिस गणित की पुस्तक से गणित को पढ़ा रहे हैं, उसकी रचयिता भारत की एक महान गणितज्ञ महर्षि भास्कराचार्य की पुत्री लीलावती है। आज गणितज्ञो को गणित के प्रचार और प्रसार के क्षेत्र में लीलावती #पुरूस्कार से सम्मानित किया जाता है।
आइए जानते हैं महान गणितज्ञ लीलावती के बारे में जिनके नाम से गणित को पहचाना जाता था।
दसवीं सदी की बात है, दक्षिण भारत में #भास्कराचार्य नामक गणित और ज्योतिष विद्या के एक बहुत बड़े पंडित थे। उनकी कन्या का नाम लीलावती था।
वही उनकी एकमात्र संतान थी। उन्होंने ज्यो‍तिष की गणना से जान लिया कि ‘वह विवाह के थोड़े दिनों के ही बाद विधवा हो जाएगी।’
उन्होंने बहुत कुछ सोचने के बाद ऐसा लग्न खोज निकाला, जिसमें विवाह होने पर कन्या विधवा न हो। विवाह की तिथि निश्चित हो गई। जलघड़ी से ही समय देखने का काम लिया जाता था।
एक बड़े कटोरे में छोटा-सा छेद कर पानी के घड़े में छोड़ दिया जाता था। सूराख के पानी से जब कटोरा भर जाता और पानी में डूब जाता था, तब एक घड़ी होती थी।
पर विधाता का ही सोचा होता है। लीलावती सोलह श्रृंगार किए सजकर बैठी थी, सब लोग उस शुभ लग्न की प्रतीक्षा कर रहे थे कि एक मोती लीलावती के आभूषण से टूटकर कटोरे में गिर पड़ा और सूराख बंद हो गया; शुभ लग्न बीत गया और किसी को पता तक न चला।
विवाह दूसरे लग्न पर ही करना पड़ा। लीलावती विधवा हो गई, पिता और पुत्री के धैर्य का बांध टूट गया। लीलावती अपने पिता के घर में ही रहने लगी।
पुत्री का वैधव्य-दु:ख दूर करने के लिए भास्कराचार्य ने उसे गणित पढ़ाना आरंभ किया। उसने भी गणित के अध्ययन में ही शेष जीवन की उपयोगिता समझी।
थोड़े ही दिनों में वह उक्त विषय में पूर्ण पंडिता हो गई। पाटी-गणित, बीजगणित और ज्योतिष विषय का एक ग्रंथ ‘सिद्धांतशिरोमणि’ भास्कराचार्य ने बनाया है। इसमें गणित का अधिकांश भाग लीलावती की रचना है।
पाटीगणित के अंश का नाम ही भास्कराचार्य ने अपनी कन्या को अमर कर देने के लिए ‘लीलावती’ रखा है।
भास्कराचार्य ने अपनी बेटी लीलावती को गणित सिखाने के लिए गणित के ऐसे सूत्र निकाले थे जो काव्य में होते थे। वे सूत्र कंठस्थ करना होते थे।
उसके बाद उन सूत्रों का उपयोग करके गणित के प्रश्न हल करवाए जाते थे।कंठस्थ करने के पहले भास्कराचार्य लीलावती को सरल भाषा में, धीरे-धीरे समझा देते थे।
वे बच्ची को प्यार से संबोधित करते चलते थे, “हिरन जैसे नयनों वाली प्यारी बिटिया लीलावती, ये जो सूत्र हैं…।” बेटी को पढ़ाने की इसी शैली का उपयोग करके भास्कराचार्य ने गणित का एक महान ग्रंथ लिखा, उस ग्रंथ का नाम ही उन्होंने “लीलावती” रख दिया।
आजकल गणित एक शुष्क विषय माना जाता है पर भास्कराचार्य का ग्रंथ ‘लीलावती‘ गणित को भी आनंद के साथ मनोरंजन, जिज्ञासा आदि का सम्मिश्रण करते हुए कैसे पढ़ाया जा सकता है,
इसका नमूना है। लीलावती का एक उदाहरण देखें- ‘निर्मल कमलों के एक समूह के तृतीयांश, पंचमांश तथा षष्ठमांश से क्रमश: शिव, विष्णु और सूर्य की पूजा की, चतुर्थांश से पार्वती की और शेष छ: कमलों से गुरु चरणों की पूजा की गई।
अये, बाले लीलावती, शीघ्र बता कि उस कमल समूह में कुल कितने फूल थे..?‘
उत्तर-120 कमल के फूल।
वर्ग और घन को समझाते हुए भास्कराचार्य कहते हैं ‘अये बाले,लीलावती, वर्गाकार क्षेत्र और उसका क्षेत्रफल वर्ग कहलाता है।
दो समान संख्याओं का गुणन भी वर्ग कहलाता है। इसी प्रकार तीन समान संख्याओं का गुणनफल घन है और बारह कोष्ठों और समान भुजाओं वाला ठोस भी घन है।‘
‘मूल” शब्द संस्कृत में पेड़ या पौधे की जड़ के अर्थ में या व्यापक रूप में किसी वस्तु के कारण, उद्गम अर्थ में प्रयुक्त होता है।
इसलिए प्राचीन गणित में वर्ग मूल का अर्थ था ‘वर्ग का कारण या उद्गम अर्थात् वर्ग एक भुजा‘।
इसी प्रकार घनमूल का अर्थ भी समझा जा सकता है। वर्ग तथा घनमूल निकालने की अनेक विधियां प्रचलित थीं।
लीलावती के प्रश्नों का जबाब देने के क्रम में ही “सिद्धान्त शिरोमणि” नामक एक विशाल ग्रन्थ लिखा गया, जिसके चार भाग हैं- (1) लीलावती (2) बीजगणित (3) ग्रह गणिताध्याय और (4) गोलाध्याय।
‘लीलावती’ में बड़े ही सरल और काव्यात्मक तरीके से गणित और खगोल शास्त्र के सूत्रों को समझाया गया है।
अकबर के दरबार के विद्वान फैजी ने सन् 1587 में “लीलावती” का #फारसी भाषा में अनुवाद किया।
अंग्रेजी में “लीलावती” का पहला अनुवाद जे. वेलर ने सन् 1716 में किया।
कुछ समय पहले तक भी भारत में कई शिक्षक गणित को दोहों में पढ़ाते थे। जैसे कि पन्द्रह का पहाड़ा…तिया पैंतालीस, चौके साठ, छक्के नब्बे… अट्ठ बीसा, नौ पैंतीसा…।
इसी तरह कैलेंडर याद करवाने का तरीका भी पद्यमय सूत्र में था, “सि अप जूनो तीस के, बाकी के इकतीस, अट्ठाईस की फरवरी चौथे सन् उनतीस!” इस तरह गणित अपने पिता से सीखने के बाद लीलावती भी एक महान गणितज्ञ एवं खगोल शास्त्री के रूप में जानी गयी।
मनुष्य के मरने पर उसकी कीर्ति ही रह जाती है अतः आज गणितज्ञो को लीलावती पुरूस्कार से सम्मानित किया जाता है।
हमारे पास बहुत कीमती इतिहास है जिसे छोड़कर हम आधुनिकता की दौड़ में विदेशों की नकल कर रहे हैं

शनिवार, 18 दिसंबर 2021

दत्तात्रेय जयंती जिन्हें सर्वोच्च गुरु माना जाता

दत्त जयंती – पूर्वजों को मुक्ति देने वाले श्री दत्तात्रेय जी की जयंती  प्रत्येक वर्ष मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन, दत्त जयंती उत्सव न केवल महाराष्ट्र में अपितु महाराष्ट्र के बाहर भी मनाई जाती है। आनंद के वातावरण में मनाए जाने वाले इस त्योहार में कुछ जगहों पर जन्मोत्सव मनाने की परंपरा है। इस अवसर पर कहीं-कहीं दत्त यज्ञ का आयोजन किया जाता है। दत्त जयंती के अवसर पर बड़ी संख्या में भक्त गुरुचरित्र का पाठ करते हैं। यह दत्त जयंती के महत्व को रेखांकित करता है । इस वर्ष दत्त जयंती 18 दिसंबर को है। पिछले दो वर्षों से कोरोना महामारी के कारण हिंदू त्योहारों को मनाने पर रोक लगी हुई है। अभी यह त्योहार कुछ नियमों के साथ भावपूर्ण वातावरण में मनाते हुए, आइए इस अवधि के दौरान ‘श्री गुरुदेव दत्त’ का अधिक से अधिक जप करके दत्तगुरु की कृपा का लाभ उठाएं। संतों के कहे अनुसार नाम संकीर्तन साधना आसान है, इस से जन्मों जन्मों के पाप जल जाते हैं । नाम स्मरण के महत्व को ध्यान में रखते हुए ऐसा करने का प्रयास हो, ऐसे श्री दत्त गुरु के चरणों में प्रार्थना है। वर्तमान लेख में दत्त देवता का इतिहास और दत्त जयंती मनाने की पद्धति के बारे में  जानकारी देने का प्रयास किया है। मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन शाम को मृग नक्षत्र में दत्त का जन्म हुआ था, इसलिए उस दिन सभी दत्त क्षेत्रों में दत्त जयंती मनाई जाती है। दत्त जयंती का महत्व – दत्त जयंती के दिन दत्त तत्व सामान्य से 1000 गुना अधिक पृथ्वी पर कार्यरत रहता है। इस दिन दत्त का नाम जप आदि उपासना करने से दत्त तत्व का अधिकतम लाभ मिलता है। कैसे मनाएं जन्मोत्सव – दत्त जयंती मनाने की कोई शास्त्रोक्त विशिष्ट विधि नहीं है। इस त्योहार से पहले सात दिनों तक गुरुचरित्र का पाठ करने की प्रथा है। इसे गुरुचरित्र सप्ताह कहा जाता है। भक्ति के प्रकार जैसे भजन, पूजन और विशेष रूप से कीर्तन आदि प्रचलन में हैं। महाराष्ट्र में जैसे औदुंबर, नरसोबा की वाडी, गाणगापुर आदि आदि स्थानों पर इस पर्व का विशेष महत्व है। दत्त जयंती तमिलनाडु में भी मनाई जाती है। कुछ स्थानों पर इस दिन दत्त यज्ञ किया जाता है। दत्त यज्ञ के बारे में जानकारी – दत्त यज्ञ में, पवमान पंचसूक्त संस्करण (जप) और उसके दशमांश या एक तिहाई घी और तिल से हवन करते हैं। दत्त यज्ञ के लिए किए जाने वाले जपों की संख्या निश्चित नहीं है। स्थानीय पुजारियों के आदेश के अनुसार जप और हवन किया जाता है। पुराणों के अनुसार जन्म का इतिहास – अत्रि ऋषि की पत्नी अनुसूया एक पतिव्रता स्त्री थी। पतिव्रता होने कारण उनके पास बहुत ही सामर्थ्य था जिसके कारण इन्द्रादि देव घबरा गए थे और ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास जाकर उन्होंने कहा की सती अनसूया के वरदान के कारण किसी को भी देवता का स्थान प्राप्त हो सकता है इसलिए आप कुछ उपाय करें अन्यथा हम उनकी सेवा करेंगे, यह सुनकर त्रिमूर्ति बोले कि वह कितनी बड़ी पतिव्रता और सती है वह हम देखेंगे।    एक बार अत्रि ऋषि अनुष्ठान के लिए बाहर गए, तो त्रिमूर्ति एक अतिथि के रूप में आए और अनुसूया से भीख माँगने लगे। अनुसूया ने उत्तर दिया, “ऋषि अनुष्ठान के लिए बाहर गए हैं। उनके आने तक रुको।” तब त्रिदेव ने अनुसूया से कहा, “ऋषि  को लौटने में समय लगेगा। हम बहुत भूखे हैं। हमें तुरंत भोजन दो, नहीं तो हम कहीं और चले जाएंगे। हमने सुना है कि ‘आश्रम में आने वाले अतिथियों को आप इच्छानुसार भोजन देते हैं’; इसलिए हम यहां इच्छित भोजन करने आए हैं।” और वे भोजन करने बैठ गए। जैसे ही भोजन आया, उन्होंने कहा, “आपकी सुंदरता को देखते हुए, हम चाहते हैं कि आप हमें विवस्त्र होकर भोजन कराएं ।” मेरा मन शुद्ध है, तो कामदेव की क्या बात है? ऐसा विचार कर के उसने अतिथियों से कहा, “मैं विवस्त्र हो कर आप को भोजन कराऊंगी ।” आप आनंद से खाना। ”फिर वह रसोई में गई और अपने पति का चिंतन कर के प्रार्थना कर के सोचा,” मेहमान मेरे बच्चे हैं ”और नग्न होकर भोजन परोसने आई । उन्होंने मेहमानों के स्थान पर तीन बच्चों को रोता हुआ देखा। वह उन्हें एक ओर ले गई और स्तनपान कराया तथा बच्चों ने रोना बंद कर दिया। अत्रि ऋषि आए। उसने उन्हें सारी कहानी सुनाई। उन्होंने कहा, “स्वामी देवेन दत्त।” इसका अर्थ है – “हे स्वामी, ईश्वर द्वारा दिए हुए बच्चे (बच्चे)।” इसलिए अत्री जी ने बच्चों का दत्त ऐसे नामकरण किया । बच्चे पालने में रहे और ब्रह्मा, विष्णु और महेश उनके सामने खड़े हो गए और प्रसन्न होकर वर मांगने के लिए कहा । अत्री और अनुसूया ने, “बच्चे हमारे घर में रहने चाहिए।” यह वर मांगा । बाद में ब्रह्मा से चन्द्रमा, विष्णु से दत्त और शंकर से दुर्वासा हुए । तीनों में से, चंद्र और दुर्वासा तपस्या के लिए जाने की अनुमति लेकर क्रमशः चंद्रलोक की ओर तीर्थक्षेत्र गए। तीसरे, दत्त विष्णुकार्य के लिए पृथ्वी पर ही रहे । दत्त अवतार – दत्त के परिवार का अर्थ – दत्त के पीछे गाय अर्थात पृथ्वी और चार कुत्ते चार वेद हैं। औदुंबर वृक्ष दत्त का एक श्रद्धेय रूप है; क्योंकि इसमें दत्त तत्व अधिक प्रमाण में है। दत्तगुरु ने पृथ्वी को अपना गुरु बनाया और पृथ्वी से सहिष्णु और सहनशील होना सीखा। साथ ही अग्नि को गुरु बनाकर यह शरीर क्षणभंगुर है, यह सीखा । इस प्रकार, दत्तगुरु ने चराचर में प्रत्येक वस्तु में ईश्वर के अस्तित्व को देखने के लिए चौबीस गुरु बनाए। ‘श्रीपाद श्रीवल्लभ’ दत्त के प्रथम अवतार ‘श्री नृसिंह सरस्वती’ दूसरे अवतार, माणिकप्रभु तीसरे अवतार और श्री स्वामी समर्थ महाराज चौथे अवतार थे। चार पूर्ण अवतार और कई आंशिक अवतार हैं। जैन दत्तगुरु को ‘नेमिनाथ’ और मुसलमान ‘फकीर’ के रूप में देखते हैं। दत्त भगवान प्रतिदिन बहुत भ्रमण करते थे। वे स्नान करने हेतु वाराणसी जाते थे, चंदन लगाने के लिए हेतु प्रयाग जाते थे प्रतिदिन भिक्षा कोल्हापुर, महाराष्ट्र में मांगते थे दोपहर के भोजन  पंचालेश्वर, महाराष्ट्र के  बीड जिले के गोदावरी के पात्र में लेते थे । पान ग्रहण करने के लिए महाराष्ट्र के मराठवाड़ा जिले के राक्षसभुवन जाते हैं, तथा जबकि  प्रवचन और कीर्तन बिहार के नैमिषारण्य में सुनने जाते हैं। निद्रा करने के लिए माहुरगड़ और योग गिरनार में करने जाते थे । दत्तपूजा के लिए, सगुण मूर्ति की अपेक्षा पादुका और औदुंबर वृक्ष की पूजा करते हैं। पूर्व काल में, मूर्ति अधिकतर एकमुखी होती थीं परन्तु आजकल त्रिमुखी मूर्ति अधिक प्रचलित हैं। दत्त गुरुदेव हैं। दत्तात्रेय को सर्वोच्च गुरु माना जाता है। उन्हें गुरु के रूप में पूजा जाता है । ‘श्री गुरुदेव दत्त’, ‘श्री गुरुदत्त’ इस प्रकार उनका जयघोष किया जाता है। ‘दिगंबर दिगंबर श्रीपाद वल्लभ दिगंबर’ यह नाम धुन है । दत्तात्रेय के कंधे पर एक झोली है। इसका अर्थ इस प्रकार है- झोली मधुमक्खी का प्रतीक है। जैसे मधुमक्खियां एक जगह से दूसरी जगह जाकर शहद इकट्ठा करती हैं , वैसे ही दत्त घर-घर जाकर भिक्षा मांगकर झोली में इकट्ठा करते हैं। घर-घर जाकर भिक्षा माँगने से अहंकार शीघ्र कम हो जाता है; तथा झोली भी अहंकार के विनाश का प्रतीक है। दत्त जयंती उत्सव को भावपूर्ण करने के लिए करने के प्रयास –  महिलाएं साड़ी पहन सकती हैं और पुरुष सात्विक वस्त्र जैसे धोती, कुर्ता पहन सकते हैं। सात्विक वेशभूषा से भक्तों को अधिक लाभ हो सकता है । ‘श्रीदत्तात्रेय कवच’ का पठन करने के साथ-साथ दत्त नाम का जप विद्यार्थियों के लिए लाभकारी हो सकता है। उत्सव स्थल पर ऊंची आवाज में संगीत नहीं बजना चाहिए, रज तम निर्माण करने वाली बिजली की रोशनी ना करें। दत्त जयंती के जुलूस में ताल, मृदंग जैसे सात्विक वाद्य यंत्रों का प्रयोग करना चाहिए

मंगलवार, 30 नवंबर 2021

वैदिक शिक्षा का सनातन आधार से इसका उद्देश्य और विषय का संपूर्ण विवेचन



 




 कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा के अंतर्गत तैत्तिरीय आरण्यक के सातवें आठवें और नवम अध्याय को तैत्तिरीय उपनिषद कहा जाता है। इसमें से सातवें अध्याय को उपनिषद में शिक्षा वल्ली के रूप में स्मरण किया जाता है। इस शिक्षा वल्ली का प्रथम अनुवाक मंगलाचरण की तरह है। इसके उपरांत द्वितीय अनुवाक में ऋषि कहते हैं कि हम शिक्षा की व्याख्या करेंगे। तीसरे अनुवाक में वे इसका प्रयोजन बताते हैं कि इससे गुरु और शिष्य दोनों का ब्रह्मवर्चस और ब्रह्म तेज बढ़ेगा, यशस्वी होंगे और शिक्षा के द्वारा लोकों के विषय में, ब्रह्मांड की ज्योतियों के विषय में, सभी प्रकार की विद्याओं के विषय में, विश्व की समस्त प्रकार की प्रजाओं के विषय में तथा शरीर और उसके स्थूल,सूक्ष्म तथा कारण इन सभी रूपों के विषय में और इस प्रकार लोक, प्रजा, ज्योति, विद्या और जीवात्मा के समस्त स्तरों और रहस्यों के विषय में वर्णन करेंगे।
आगे इसी अध्याय में नौवे अनुवाक में बताते हैं कि स्वाध्याय और प्रवचन के मुख्य फल हैं – ऋत अर्थात कॉस्मिक यानी ब्रह्मांडीय व्यवस्था के नियमों का ज्ञान, सत्य का ज्ञान और सत्य पालन की सामथ्र्य, तप की शक्ति, आंतरिक शांति की सामथ्र्य, इंद्रिय निग्रह की सामथ्र्य, वेदों के पठन पाठन की सामथ्र्य, योग्य संतान प्रजनन की सामथ्र्य, कुटुंब की वृद्धि (प्रजाति) की सामथ्र्य, मनुष्यों के लिए आवश्यक समस्त व्यवहार की सामथ्र्य, यज्ञ की सामथ्र्य और अतिथियों की यथायोग्य सेवा की सामथ्र्य।
समस्त ज्ञान प्रदान कर आचार्य 11 वें अनुवाक में अनुशासन देते हैं –

”सदा सत्यनिष्ठ रहना, इसमें प्रमाद नहीं करना। धर्ममय ही आचरण करना, इसमें प्रमाद नहीं करना। शुभ कर्मों में कभी प्रमाद मत करना। देव कार्य और पूर्वजों की परंपरा को आगे ले जाने के कार्य में कभी चूक नहीं करना तथा संतति परंपरा गतिमय रखना। ऐश्वर्य की साधना में कभी प्रमाद मत करना और स्वाध्याय तथा ज्ञान विस्तार में कभी चूक नहीं करना। माता, पिता, आचार्य और अतिथि को देवतुल्य मानना (विद्या, आयु, तप और आचरण में श्रेष्ठ व्यक्ति जब घर पर बिना आमंत्रण आ जाएँ, तो वे ही अतिथि कहलाते हैं। आजकल के गेस्ट या मेहमान को अतिथि नहीं कहते।)। जो निर्दोष कर्म हैं, उनका ही आचरण करना। हमारे भी जो सुचरित हैं, अच्छे आचरण हैं, उनका ही अनुसरण करना, अन्य आचरणों का नहीं। जो श्रेष्ठ विद्वान आयें, उन्हे आसन देना, विश्राम देना और श्रद्धापूर्वक दान देना। विवेकपूर्वक संकोच सहित अपनी आर्थिक स्थिति के अनुरूप दान देना चाहिए। जब जहां कोई दुविधा या शंका हो, तो उत्तम विचार वाले सदाचारी से परामर्श कर कर्तव्य का निश्चय करना। यही आदेश है। यही उपदेश है।”
शिक्षा वल्ली के बाद आगे ब्रह्मानन्द वल्ली है और भृगु वल्ली है। शिक्षा वल्ली में वर्णित पुरुषार्थों को सम्पन्न कर चुके व्यक्ति में ही ब्रह्मानन्द की साधना और ज्ञान की सामथ्र्य आती है, अन्य में नहीं। वस्तुत: ब्रह्मानन्द का संबंध परा विद्या से है। तृतीय मुंडक में द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया वाला प्रख्यात मंत्र है जो आत्मा और परमात्मा संबंधी प्रभावशाली विवेचना है। इसलिए योग विद्या ही परा विद्या का मूल आधार है जिसके अनंत भेद या रूप संभव हैं। अत्यंत प्राचीन काल से भारत में यह ज्ञान था कि ज्ञान अनंत है। ब्रह्मानन्द वल्ली के आरंभ में ही उपनिषद मंत्र है – सत्यं ज्ञानं अनंतं ब्रह्म। ब्रह्म सत्य हैं, ज्ञान हैं, अनंत हैं। इसीलिए यहाँ विद्या के अनंत रूप सहज विद्यमान हैं। आयुर्वेद से लेकर योग तक प्रत्येक ज्ञान शाखा में ज्ञान के अनंत रूप वर्णित हैं।
इसीलिए विविध पंथ यहाँ सहज स्वीकृत हैं परंतु उन सबका एक सामान्य आधार है, जो सार्वभौम है, यह भी प्रारम्भ से ज्ञात है। ये सार्वभौम नियम या आधुनिक यूरोपीय पदावली में कहें तो सार्वभौम मूल्य हैं। ये ही सामान्य धर्म या सार्वभौम धर्म और मानव धर्म कहे गए हैं। अहिंसा अर्थात् किसी भी प्राणी या प्रकृति के किसी भी तत्व के प्रति द्रोह और द्वेष का सर्वथा अभाव, सत्य, संयम, अन्य के वस्तुओं के प्रति गिद्धदृष्टि नहीं रखना, मर्यादित भोग और उसके लिए मर्यादित संग्रह – ये पाँच सार्वभौम यम या मूल्य हैं। इनके सर्वमान्य आधार के साथ व्यक्ति, समूह, समाज और राष्ट्रों की अपनी विशेषताओं का सतत् संवर्धन ही अपरा विद्या का विस्तार है और जिन उपकरणों से अर्थात मन और बुद्धि की जिस सामथ्र्य से यह सब ज्ञान होता है, उस आत्मसत्ता के मूल स्वरूप का ज्ञान परा विद्या है।
जब किसी समाज में आत्मसत्ता के स्वरूप का ज्ञान रखने वाले श्रेष्ठ लोग होंगे और वे सम्मानित होंगे, तब वहाँ सभी मानस संरचनाएं, ( मेंटल या इंटेलेक्चुअल कान्स्टृक्ट) मर्यादित मान्य होंगी क्योंकि यह ज्ञात होगा कि वे परमार्थ रूप में अंतिम सत्य नहीं हैं, वे सब सापेक्ष सत्य हैं और परिवर्तनशील सत्य हैं। इसीलिए व्यक्ति, कुल, गोत्र, वर्ण, क्षेत्र, आदि सब से परे जो मूल तत्व है, उसके ज्ञान की साधना को परा विद्या कहा गया और उसके ज्ञाता ही सर्वमान्य रहे। इस प्रकार प्रारम्भ से ही भारत में परा और अपरा दोनों विद्याओं की साधना परंपरा प्रवाहित है और शिक्षा वही है जो इन दोनों का ज्ञान दे।

इसमें से परा का मूल ज्ञान सबको आवश्यक है, अत: योग और ध्यान की किसी न किसी पद्धति के द्वारा आत्मस्वरूप का ज्ञान सबके लिए सर्वोपरि मान्य रहा। जबकि अपने संस्कारों और सामथ्र्य तथा प्रतिभा के अनुरूप अपरा विद्या के किस एक या कतिपय अनुशासनों में दक्षता को स्वधर्म माना गया। अत: सामान्य धर्म और स्वधर्म, दोनों का ज्ञान प्रत्येक विद्यार्थी को कराना शिक्षा का भारतीय लक्ष्य है।
यहाँ कुछ और आधारभूत तथ्य स्मरण कर लेना चाहिए। समस्त शिक्षा वृद्ध संवाद है अर्थात ज्ञान की किसी न किसी शाखा या अनुशासन में उत्कर्ष प्राप्त अपने पूर्वज लोगों के द्वारा जो ज्ञान प्रदान किया गया, प्रस्तुत किया गया, उसे नयी पीढ़ी को देना ही शिक्षा का मूल आधार है। वही शिक्षा है। इस प्रकार किसी भी समाज की सम्यक शिक्षा वह है जो सर्वप्रथम अपने ही समाज और राष्ट्र में हुए ज्ञानियों के द्वारा प्रस्तुत, निरूपित और व्याख्यायित ज्ञान के स्वरूप को ठीक-ठीक नयी पीढ़ी को प्रदान करे। अर्थात् अपने वृद्धों से संवाद करें। परंतु वर्तमान में 1947 ईसवी के बाद से जो लोग शासन में रहे, उन्होंने शिक्षा के नाम पर यूरोप और बाद में संयुक्त राज्य अमेंरिका के जो कुछ अनुशासनों में वृद्धि प्राप्त या उत्कर्ष प्राप्त ज्ञानी लोग हैं, उनसे ही भारत के विद्यार्थियों का संवाद बलपूर्वक कराया।
उदाहरण के लिए इतिहास में, राजनीति शास्त्र में, अर्थशास्त्र में, समाजशास्त्र में, मानस शास्त्र यानी मनोविज्ञान में और शब्दशास्त्र, भाषा शास्त्र आदि में यूरोप के सयाने लोग, वृदध लोग क्या क्या कहते रहे हैं और क्या कह रहे हैं, उसे ही भारत के विश्वविद्यालयों में मूल रूप से पढ़ाया जाता है और मात्र शोभा या अलंकार की भांति एकाध भारतीय विद्वानों के भी अंश उस विषय में प्रस्तुत कर दिए जाते हैं। इसका अर्थ है कि भारत के सभी विद्यार्थियों को शासन के द्वारा यूरोप के और बाद में संयुक्त राज्य अमेरिका के वृद्धों से संवाद करने को विवश किया जाता है। यह तो शिक्षा के प्रयोजन से रहित शिक्षा हुई। शिक्षा का मूल प्रयोजन है सर्वप्रथम अपने समाज और राष्ट्र के वृद्धों से विद्यार्थियों का संवाद कराना। उनके ज्ञान को उन्हें प्रदान करना। इतिहास, पुराण, गणित, ज्योतिष, विज्ञान, आयुर्वेद, योगशास्त्र सहित समस्त भारतीय दर्शन शास्त्र, व्याकरण, भाषा शास्त्र आदि सभी रूपों में सबसे पहले अपने देश के ज्ञानियों को जानना आवश्यक है। फिर यूरो-अमेरिकी विद्वानों को भी अवश्य वे जानें।
अपरा विद्या के प्रत्येक अनुशासन में सर्वप्रथम विद्यार्थियों को अपने ही राष्ट्र और अपने ही समाज के वृद्धों के द्वारा जाने गए और प्रस्तुत किए गए ज्ञान को जानना चाहिए तथा सर्वप्रथम अपने ही वृद्धों से संवाद करना चाहिए। इसके बाद जैसा हमारे वृद्धों ने निर्देश दिया है, सारे संसार के भी वृद्धों से ज्ञान प्राप्त करना सहज स्वाभाविक है। अपनों से संवाद न करके केवल बाहरी वृद्धों के ज्ञान को जानना तो शिक्षा के प्रयोजन को नष्ट करना है। अत: भारतीय शिक्षा वही है जो सर्वप्रथम इतिहास में, अर्थशास्त्र में, राजनीति शास्त्र में, मानस शास्त्र में, मनोविज्ञान सहित प्रत्येक मानविकी अनुशासन में भारत का ज्ञान नयी पीढ़ी को प्रदान करे। भारत के शास्त्र ज्ञान को, भारत के महान ज्ञानियों के ज्ञान को अपने विद्यार्थियों तक पहुंचाएं। यही भारतीय शिक्षा का मूल लक्ष्य है।
भारत में ज्ञान की अनंत शाखाएं हैं और उनका अत्यधिक विस्तार है। अत: जिसमें अपने संस्कार और प्रतिभा और रुचि के कारण विशेष गति हो, उस अनुशासन में विशेष ज्ञान प्रदान किया जाना चाहिए और यूरोप या संयुक्त राज्य अमेंरिका सहित विश्व के अन्य देशों के भी वृद्धों का ज्ञान यदि संबंधित विषय में प्राप्त हो सके तो और अच्छा है। परंतु शिक्षा के मूल में अपने राष्ट्र और अपने समाज के वृद्धों के ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुंचाना ही आधार बनना चाहिए। यही भारतीय शिक्षा का लक्ष्य है।

वैसे भी समस्त विश्व में शिक्षा का मूल लक्ष्य और प्रयोजन यही है। आखिर यूरोप में और संयुक्त राज्य अमेंरिका में भी प्रत्येक विद्यार्थी को सर्वप्रथम अपने ही ज्ञानवृद्धिप्राप्त सयानों का ज्ञान ही प्रदान किया जाता है। भारत में इतने महान ज्ञानी हुए हैं, इतिहास संबंधी, राजनीति शास्त्र संबंधी, वित्तशास्त्र संबंधी अथवा मानसशास्त्र संबंधी या धर्मशास्त्र संबंधी उन महान भारतीय ज्ञानियों के ज्ञान को तो यूरोप के किसी भी देश में प्रारंभ में विद्यार्थियों को नहीं पढ़ाया जाता। यहां तक कि बाद में भी कुछ यदि पढ़ाया जाता है तो उनकी अपनी व्याख्याओं के साथ पढ़ाया जाता है, उनके अपने दृष्टिकोण से पढ़ाया जाता है। भारतीय ऋषियों के दृष्टिकोण को यथावत किसी भी यूरोपीय देश में अथवा संयुक्त राज्य अमेंरिका में किसी भी अनुशासन में नहीं पढ़ाया जाता। जिन क्षेत्रों में भारतीय ऋषि और भारतीय गुरुजन सर्वश्रेष्ठ मान्य है, उन क्षेत्रों में भी पहले हमारा ज्ञान वहाँ विद्यार्थियों को नहीं दिया जाता। क्योंकि सर्वत्र शिक्षा का मूल प्रयोजन अपने ही पूर्वजों के ज्ञान को नई पीढ़ी को प्रदान करना है। भारत में भी शिक्षा के इसी सार्वभौम प्रयोजन के अनुरूप शिक्षा प्रदान की जानी आवश्यक है।
हमारे जिस परंपरागत शैक्षणिक ढांचे को अंग्रेजों ने बलपूर्वक तथा योजना पूर्वक तोड़ा और फिर 15 अगस्त 1947 ईस्वी के बाद उस परंपरा गत शिक्षा के ढांचे को टूटा फूटा और बिखरा ही रहने दिया गया, उसे फिर से नए उत्साह के साथ प्रामाणिक रूप में रचे जाने की आवश्यकता है। वस्तुत: शिक्षा के लक्ष्य ज्ञानी लोग ही तय कर सकते हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के तत्वावधान में भारत के श्रेष्ठ विद्वानों का एक वृहद निकाय व्यापक विचार-विमर्श करें और वेदों उपनिषदों पुराणों महाकाव्यों आदि के परंपरागत विद्वानों तथा अन्य सभी ज्ञान धाराओं के मुखिया लोगों और ज्ञानी लोगों और भारतीय कला रूपों तथा शिल्प परंपराओं के ज्ञानी और हुनरमंद व्यक्तियों तथा अन्य समूहों के प्रतिनिधियों का एक समवाय हो और उसमें शिक्षा के नए स्वरूपों के विषय में सर्व अनुमति के आधार पर एक प्रामाणिक स्वरुप विकसित किया जाए।
हमारी ज्ञान परंपराएं विराट और विविध हैं। उनके प्रतिनिधियों के संवाद से राष्ट्रीय शिक्षा के लक्ष्य का निर्धारण का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा। इस विषय में राजनेताओं और प्रशासकों को स्वयं अपने स्तर पर निर्णय लेने का हठ नहीं करना चाहिए क्योंकि वे इन विषयों के अधिकारी विद्वान नहीं हैं। राजनीति शास्त्र या विधिशास्त्र अथवा प्रशासनिक शास्त्र में उनका कोई योगदान अवश्य हो सकता है परंतु ज्ञान के अन्य विराट क्षेत्रों में राजपुरुषों और प्रशासकों का कोई निर्णायक योगदान नहीं हो सकता। भारतीय शिक्षा सदा ही परंपरा से शिक्षक केंद्रित यानी आचार्य केंद्रित रही है और उसे पुन: आचार्य केंद्रित ही किए जाने की वश्यकता है।
शिक्षा को शिक्षक के स्थान पर प्रशासक और मंत्रालय के सचिव तथा मुखिया लोग तय करें, यह तो अंग्रेजी काल से चला था और यह परंपरा भारत की ज्ञान परंपरा को नष्ट करने वाली प्रमाणित हुयी है। भारतीय शिक्षा के स्वरूप और लक्ष्यों का निर्धारण भारत के ज्ञानियों के द्वारा ही हो, ऐसी व्यवस्था करना शासन का कर्तव्य है। ऐसी समृद्ध शिक्षा परंपरा का पुन: उत्कर्ष ही भारतीय शिक्षा के लक्ष्य होने चाहिए। भारतीय धरोहर

आज देश की दो विशेष पुण्य आत्माओं का तिथि है पर दुर्भाग्य से हम सब अनजान हैं एक भोग में डूबी हुई आधुनिक संस्कृति के कुछ युवा नौजवान के प्रेरणास्रोत महान बलिदानी क्रांतिकारी खुदीराम बोस जिनका शब्द हृदय को झंकृत कर देता है मैं गरीब हूं यह जीवन या प्राण न्योछावर करने के अलावा मेरे पास और कुछ नहीं है जो भारत मां को अर्पण कर सकूं दूसरे महान राष्ट्र भक्त श्री राजीव दीक्षित जी जिन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा के लिए अपना प्राण न्योछावर कर दिया और मानसिक गुलामी से बाहर निकालने में अपना अमूल्य योगदान दिया ऐसे महापुरुषों को सत-सत नमन
अब एक ही समाधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान 9336919081 पर whatsapp टेलीग्राम या डायरेक्ट कॉल 7984113987 यदि दोनों नंबर  यदि नहीं लग रहे हैं मैसेज या whatsapp कॉल कर सकते हैं क्योंकि पिछले तीन साल से हमारा नंबर अपडेट नहीं हो रहा है google पर। हमारे संपर्क संचार में व्यवधान किया जा रहा है https://ajaykarmyogi1.blogspot.com/2021/11/blog-post.html?m=1
 हमारे जिस परंपरागत शैक्षणिक ढांचे को अंग्रेजों ने बलपूर्वक तथा योजना पूर्वक तोड़ा और फिर 15 अगस्त 1947 ईस्वी के बाद उस परंपरा गत शिक्षा के ढांचे को टूटा फूटा और बिखरा ही रहने दिया गया, उसे फिर से नए उत्साह के साथ प्रामाणिक रूप में रचे जाने की आवश्यकता है। वस्तुत: शिक्षा के लक्ष्य ज्ञानी लोग ही......यह फोटो जयपुर के महाराजा सवाई रामसिंह द्वितीय की है। जनेऊ, रुद्राक्ष धारण कर नियमित त्रिकाल संध्यावंदन करते हुए। सामान्यतः राजा-महाराजों की वैभवशाली छवियां प्रदर्शित की जाती हैं। भोगी बताया जाता है। कभी नहीं बताया जाता, क्षत्रिय राजा निष्ठा से कर्मकांड करते थे। सहयोग : समीर मोहन एवम आकाश फोटो स्टेटस में देखें

बुधवार, 29 सितंबर 2021

उन्नत बीज जिससे किसान समृद्ध खुशहाल और भारत की प्रजा कुपोषण से मुक्त हो जाएगी

 



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका की यात्रा के पश्चात भारत मैं कल घोषणा की गई कि भारत में उन्नत तकनीक के अनेक फसलों का बीज राष्ट्र को देने की घोषणा की है जिससे किसान समृद्ध खुशहाल और भारत की प्रजा कुपोषण से मुक्त हो जाएगी

किसी समय में सेम का पौधा घर की सुरक्षा में लगी घास फूस की टटिया पर फैल कर रसोई की महीने 2 महीने का इंतजाम कर देता था!
और कभी छप्पर (खपरैल) की छत पर फैली लौकी कद्दू की बेले मिलकर महीने 2 महीने सब्जी का खर्च निकाल देती थी!
 खलियान में फैली कद्दू की बेल पर लगने वाले पीले पीले फूलों से स्वादिष्ट और सुगंधित पकोडीयों से सुबह के नाश्ता में महीना कब निकल जाता था; पता ही नहीं लगता था!
जेठ, बैशाख के महीने में दाल और कुमड़े(कुमेहड़ा) से बनी बडीयां (बरीं) जाड़ों तक का रसोई का खर्च झेल जाती थी!
 इन्हीं महीनों में अम्मा के हाथ का बना बथुआ और भात खाने का भी अपना अलग ही तरह का आनंद होता था; ऐसा लगता था! मानो! स्वर्ग में परोसे जाने वाले भोजन का आनंद ले रहे हो!
सावन,भादो के महीने में भूसे के गुगों पर फैली तोरई की बेलें; तथा तालाब पर पानी में उगने वाली चोलाई और नारी के साग से रसोई के कई महा निकल जाते थे!
यह वह दिन थे; जब सब्जी पर होने वाले खर्च का अहसास! तक नहीं होता था!
जाड़े के मौसम में गांव के बाहर घूरें के ढेरों पर या फिर पानी के नल के पास के स्थान को साफ कर; धनिए के बीज को जूते से रगड़ कर कुछ समय तक घूरे में; पोटली बांधकर गाड़ दिया जाता था!
 उसके बाद उसकी क्यारियां बनाकर  देते थे; और उसके चारों ओर लहसन, बाकला, मूली, देसी टमाटर, फूलगोभी की लगा दिए जाते थे!
फिर जाड़े की सीजन में इन सभी सब्जियों का भोकाल चलता था! जैसे-जैसे शरद ऋतु आगे बढ़ती;
 मूली और टमाटर तथा हरे धनिया की चटनी को तो जमाई वाला रुतबा हासिल हो जाता था!
 खिचड़ी के साथ तो हरी चटनी, मूली का चोली दामन का साथ होता था!
तब हम लोगों को जीडीपी का कोई ज्ञान नहीं था!
 राजनीति में पडकर हम अपना आपसी व्यवहार खराब नहीं करते थे!
 ना! ही! एक दूसरे के प्रति बैर और जलन की भावना थी! लाख वैचारिक मतभेद होने के बाद भी; हम सब में आपसी प्रेम और मानवता थी!
यह सभी सब्जियां सर्व सुलभ और रसोई की साथी थीं!
अगर घर पर कोई मेहमान आ जाते थे; तो तीन चार सब्जियों का इंतजाम तो चुटकी बजाते यूं ही हो जाता था!
 वह भी बिल्कुल ऑर्गेनिक एकदम शुद्ध!
गर्मी के मौसम में गांव के चारों ओर आम की बगिया से आंधी में गिरे आमों से पूरे साल के अचार का इंतजाम हो जाता था!
गांव के अंदर लगी आटा पीसने वाली चक्की से गेहूं का आटा पीसकर शुद्ध आता था!
 जैसे-जैसे शाम को एक घर से धुआं उठता था; तो फिर क्या? गोबर से बने कंडे के टुकड़े को लेकर आग मांग कर लाने का सिलसिला भी शुरू हो जाता था!
सूरज के ढलने के समय रेडियो पर चौपाल और आकाशवाणी के मनमोहक समाचारों और कार्यक्रमों से दिन विदा लेता था!
रात में  छतों पर सोते समय फुल आवाज में रेडियो पर विविध भारती के सतरंगी गानों की धुनें गूंजा करती थी; जिसकी स्वर लहरियां हवा में एक गांव से दूसरे गांव तक सुनाई देती थी!
रातें बड़ी होती थी; द्वा!रे द्वारे! खटीयों पर बिस्तर लगाए जाते थे!
 मर्द घर से बाहर दरवाजों पर सोते थे;वहीं महिलाएं घर के आंगन में खटिया बिछा कर सोती थी!
 हर तीसरे दरवाजे पर कथा कहानियां, बुझजनीयां होती थी! कहीं-कहीं तो बड़े बूढ़े एक साथ बैठकर आल्हा का राग छेड़ देते थे!
 जो किसी बड़े मनोरंजक कार्यक्रम से कम नहीं होता था!
 घर के बीच आंगन में लगे नीम के पेड़ के नीचे पड़ी खटिया में बहुएं अपनी साड़ी से पर्दा खींचकर सोती थी!
वहीं बच्चे अपनी दादी से कहानी सुनते सुनते सो जाते थे!
एक एक व्यक्ति के कम से कम पांच पांच बच्चे होते थे! लेकिन सब खुश, हष्ट पुष्ट, सबके सपने पूरे होते थे!
 लेकिन महंगाई कभी उन बड़े बूढ़ों को हडी नहीं!
 उन्होंने कभी आंदोलन नहीं किया!
एकदम खुश और मस्त लोग थे!
तब किसानों में कर्ज का फैशन बिल्कुल नहीं था!
 किसान कर्ज से ऐसे घबराते थे; नाम लेने मात्र से ही जैसे सांप की पूंछ पर पैर पड़ गया हो!
समय बदला,आ गया टेलीविजन और नौकरी का जमाना!
 बच्चे सरकारी नौकरी पाते ही टीवी देख कर कोट पैंट और जींस पहनने लगे सेंट का तो जैसे चलन ही चल पड़ा!
 सरकारी नौकरी वाले दामादो में बेटियों के पिताओं को भगवान विष्णु नजर आने लगे!
 बच्चियों को नारायण के साथ बिहाने के लिए किसान क्रेडिट कार्ड, गृह ऋण, गोल्ड लोन मजबूरी बन गया!
और वक्त बदलता ही चला गया, और फिर आया वकीलों और इंजीनियरों का दौर!
इनसे रिश्तो के लिए बेटियों के बाप अपने पूर्वजों की संपत्ति भी बेचने को तैयार थे! फिर क्या था?
 धीरे धीरे घर की कच्ची दीवारों पर सेम की बैलों को फैलाने वाली बेटियां अपने पति के साथ रहने फ्लैटों में चली गई!
 जहां जाकर, उन्हीं बेटियों ने कैक्टस के पौधे उगाने शुरू कर दिए!
 और फिर देखते ही! देखते! सब्जियां भी महंगी हो गई!
 बहुत पुरानी यादें ताजा हो गई।
 सच में सब्जी पर कुछ भी खर्च नहीं होता था! कहीं महंगाई नहीं थी!
 जिसके पास कुछ नहीं था उसका भी काम चलता था।
 महंगाई का दूर-दूर तक नामोनिशान न था।
 सिर्फ था! तो चैनो अमन, प्यार, सम्मान, भाईचारा, बड़े छोटे की तहजीब!
पुराने दिनों में दही,मट्ठा की भरमार थी;
 जिसके पास कुछ नहीं था,उसका भी काम चलता था।
 चना, मटर गुड,आम,जामुन;
 सबके लिए उपलब्ध रहता था।
 बेमेल विचारों के रहते भी;
 अगाध आपसी प्रेम था।
 आज की दकियानूसी,बैर,वैमनस्य,जलन भरी मानसिकता;
 तब उसका नामोनिशान न था।
 हाय रे! आधुनिकता! हाय रे! ऊंची शिक्षा;
 कहां तक ले आई,
 चारों तरफ सिर्फ महंगाई ही महंगाई;
 बेफिजूल खर्चों से घिरे इंसान,आडंबर में अपनी नींद गवाई।
विचारणीय है कि:
 क्या हमारा लक्ष्य यही है, जिधर हम जा रहे हैं। या फिर सिर्फ हम गफलत में हैं!और जिंदगी का सफर यूं ही जारी है!


सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...