बुधवार, 18 मई 2022
सोमवार, 16 मई 2022
. कश्यप और कूर्म जयंती वैशाख मास की पूर्णिमा पर मनाते हैं पर बुद्ध जयंती की गूंँज में भुलाया गया हजारों साल का पौराणिक महत्व
भगवान विष्णु के कूर्म अवतार रूप में कूर्म जयंती का पर्व मनाया जाता है. कूर्म जयंती वैशाख मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन भगवान विष्णु कच्छप (कछुआ) अवतार लेकर प्रकट हुए थे. साथ ही समुद्र मंथन के वक्त अपनी पीठ पर मंदरांचल पर्वत को उठाकर रखा था.
कमठ या कूर्म स्वरूप मिस्र के देव
मिस्र में 664-332 ईसा पूर्व खेप्री स्करब देव की मान्यता रही है। यह कमठ के समान पेट वाला माना गया था जिसका वह कवच आयुध भी था। भारतीय कथाओं में भी ऐसे रूप वर्णित है।
किसी भी तरह की रचना, चिंतन और नियमन के साथ साथ स्वरूप के लिए उसके पास मानव मस्तिष्क और मानव जैसी ही मुखाकृति स्वीकारी गई थी। इसे गुबरेला के रूप में भी देखकर पहचान दी जा सकती है।
अनोखी आकृति अभी बर्लिन के मिस्र संग्रहालय में संरक्षित है और देखी जा सकती है...
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Humanoid Khepri Scarab
This rare model of the Egyptian scarab beetle creator god Khepri, with a human head and arms emerging from a scarab’s exoskeleton.
Most likely from the Late Period, ca. 664-332 BC.
Now in the Egyptian Museum of Berlin.
✍🏻श्रीकृष्ण जुगनु
वेदोंमें कूर्म अवतार
- #स_यत्कूर्मो_नाम ! #एतद्वै_रूपं_कृत्वा_प्रजापतिः_प्रजा_असृजत ! (शतपथ ब्राह्मण ७/५/१५ शुक्ल यजुर्वेद)
-"प्रजापति परमेश्वरने कूर्मरूप धारण कर प्रजाकी रचनाकी है ।"
#अन्तरतः_कूर्मभूतं_सर्पन्तम् ! #तमब्रवीत् ! #मम_वै_त्वङ्मांसात्_समभुः ! #नेत्यब्रवीत् ! #पूर्वमेवाहमिहासमिति ! #तत्पुरुषस्य_पुरुषत्वम् ! #सहस्राक्षः_सहस्रपात् !(तैत्तरीय आरण्यक १/२३ कृष्णयजुर्वेद) - " कूर्म होकर जल में संचार करते हुए कूर्म से प्रजापति ब्रह्माजी ने कहा "हे कूर्म ! तुम हमारे त्वक् माँसादि सम्बन्धी रस से उत्पन्न हुए हो " , कूर्म ने कहा " जो तुमने कहा वह सही नहीं है ,मैं तो पहले से ही था अर्थात् कूर्मशरीरमात्र तुम्हारे त्वक् मांसादि से उत्पन्न हुआ । मैं अनन्त चैतन्यरूप ईश्वर (सनातन विष्णु) तो पहले से ही हूँ । पूर्व में होने से ही ईश्वरका पुरुष नाम हुआ (आदिपुरुष भगवान् )! वह कुर्मावताधारी भगवान् श्रीहरिः अपना महत्त्व प्रकट करने के लिये विराटरूप धारणकर हजारों सिरों ,आँखों और चरणोंसे युक्त होकर आविर्भूत हुए !"
✍🏻वरुण शिवाय
कश्य॑प जयन्ती
वैशाख मास की पूर्णिमा को कूर्मावतार जयन्ती मनाई जाती है। कूर्म अर्थात् कश्यप ।
ब्रह्मा के मानस पुत्र मरीचि, मरीचि के पुत्र हुये कश्यप ।
कश्यप के पुत्र विवस्वान् और विवस्वान् के वैवस्वत मनु हुये।
शतपथब्राह्मण में कूर्म के सम्बन्ध में - स यत्कूर्मो नाम । एतद्वै रूपं कृत्वा प्रजापतिः प्रजा असृजत यदसृजताकरोत्तद्यदकरोत्तस्मात्कूर्मः कश्यपो वै कूर्मस्तस्मादाहुः सर्वाः प्रजाः काश्यप्य इति - ७/५/१/५ |
ऋग्वेदसंहिता के सूक्त-पाठ को सुनिये जिसमें #कश्यप का स्मरण किया गया है।
♥❥ वैशाख पूर्णिमा माने भगवान् कश्यप की जयन्ती ।
✍🏻अत्रि विक्रमार्क
महर्षि कश्यप जयंती की शुभ कामनाएं । कश्यप ऋषि ;
जब हम सृष्टि विकास की बात करते हैं तो इसका मतलब है जीव, जंतु या मानव की उत्पत्ति से होता है। सभी मूलतः इन्ही ब्रह्मा के कुल के है ।
ऋषि कश्यप ब्रह्माजी के मानस-पुत्र मरीची के विद्वान पुत्र थे। मान्यता अनुसार इन्हें अनिष्टनेमी के नाम से भी जाना जाता है। इनकी माता 'कला' कर्दम ऋषि की पुत्री और ऋषि कपिल देव की बहन थी।
विष्णु पुराण के अनुसार इस मन्वन्तर के सप्तऋषि इस प्रकार है :-
वशिष्ठकाश्यपो यात्रिर्जमदग्निस्सगौत।
विश्वामित्रभारद्वजौ सप्त सप्तर्षयोभवन्।।
अर्थात् सातवें मन्वन्तर में सप्तऋषि इस प्रकार हैं:- वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्९वाज।
परशुराम जी के गुरु ब्रह्मऋषि कश्यप थे। इनको वचन देने वश परशुराम जी रात्रि में महेंद्र पर्वत में सीमित रहते है।
कश्यप को ऋषि-मुनियों में श्रेष्ठ माना गया हैं। पुराणों अनुसार हम सभी उन्हीं की संतानें हैं। सुर-असुरों के मूल पुरुष ऋषि कश्यप का आश्रम मेरू पर्वत के शिखर पर था, जहाँ वे परब्रह्म परमात्मा के ध्यान में लीन रहते थे। समस्त देव, दानव एवं मानव ऋषि कश्यप की आज्ञा का पालन करते थे। कश्यप ने बहुत से स्मृति-ग्रंथों की रचना की थी।
कश्यप कथा :
पुराण अनुसार सृष्टि की रचना और विकास के काल में धरती पर सर्वप्रथम भगवान ब्रह्माजी प्रकट हुए। ब्रह्माजी से दक्ष प्रजापति का जन्म हुआ। ब्रह्माजी के निवेदन पर दक्ष प्रजापति ने अपनी पत्नी असिक्नी के गर्भ से 66 कन्याएँ पैदा की।
इन कन्याओं में से 13 कन्याएँ ऋषि कश्यप की पत्नियाँ बनीं। मुख्यत इन्हीं कन्याओं से सृष्टि का विकास हुआ और कश्यप सृष्टिकर्ता कहलाए। ऋषि कश्यप सप्तऋषियों में प्रमुख माने जाते हैं।
विष्णु पुराणों अनुसार सातवें मन्वन्तर में सप्तऋषि इस प्रकार रहे हैं- वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज।
श्रीमद्भागवत के अनुसार दक्ष प्रजापति ने अपनी साठ कन्याओं में से 13 कन्याओं का विवाह ऋषि कश्यप के साथ तथा अन्य कन्याओ के विवाह बाद शेष 4 कन्याओं का विवाह भी कश्यप के साथ ही कर दिया गया।
*कश्यप की 17 पत्नीयाँ : इस प्रकार ऋषि कश्यप की अदिति, दिति, दनु, काष्ठा, अरिष्टा, सुरसा, इला, मुनि, क्रोधवशा, ताम्रा, सुरभि, सुरसा, तिमि, विनता, कद्रू, पतांगी और यामिनी आदि पत्नियाँ बनीं।
अदिति : पुराणों अनुसार कश्यप ने अपनी पत्नी अदिति के गर्भ से बारह आदित्यों को जन्म दिया, जिनमें भगवान नारायण का वामन अवतार भी शामिल था।
माना जाता है कि चाक्षुष मन्वन्तर काल में तुषित नामक बारह श्रेष्ठगणों ने बारह आदित्यों(सूर्य) के रूप में जन्म लिया, जो कि इस प्रकार थे- विवस्वान्, अर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरुण, मित्र, इंद्र और त्रिविक्रम (भगवान वामन)।
ऋषि कश्यप के पुत्र विस्वान से मनु का जन्म हुआ। महाराज मनु को इक्ष्वाकु, नृग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, प्रान्शु, नाभाग, दिष्ट, करूष और पृषध्र नामक दस श्रेष्ठ पुत्रों की प्राप्ति हुई।
दिति : कश्यप ऋषि ने दिति के गर्भ से हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष नामक दो पुत्र एवं सिंहिका नामक एक पुत्री को जन्म दिया। श्रीमद्भागवत् के अनुसार इन तीन संतानों के अलावा दिति के गर्भ से कश्यप के 49 अन्य पुत्रों का जन्म भी हुआ, जो कि मरुन्दण कहलाए। कश्यप के ये पुत्र निसंतान रहे। जबकि हिरण्यकश्यप के चार पुत्र थे- अनुहल्लाद, हल्लाद, भक्त प्रह्लाद और संहल्लाद। इन्ही के आगे ययाति हुए जिनका विवाह दैत्य गुरु शुराचार्य की कन्या देवयानी से हुआ। जिनके राजा पुरु हुए।
दनु : ऋषि कश्यप को उनकी पत्नी दनु के गर्भ से द्विमुर्धा, शम्बर, अरिष्ट, हयग्रीव, विभावसु, अरुण, अनुतापन, धूम्रकेश, विरूपाक्ष, दुर्जय, अयोमुख, शंकुशिरा, कपिल, शंकर, एकचक्र, महाबाहु, तारक, महाबल, स्वर्भानु, वृषपर्वा, महाबली पुलोम और विप्रचिति आदि 61 महान पुत्रों की प्राप्ति हुई।
रानी काष्ठा से घोड़े आदि एक खुर वाले पशु उत्पन्न हुए।
पत्नी अरिष्टा से गंधर्व पैदा हुए।
सुरसा नामक रानी से यातुधान (राक्षस) उत्पन्न हुए।
इला से वृक्ष, लता आदि पृथ्वी पर उत्पन्न होने वाली वनस्पतियों का जन्म हुआ।
मुनि के गर्भ से अप्सराएँ जन्मीं।
कश्यप की क्रोधवशा नामक रानी ने साँप, बिच्छु आदि विषैले जन्तु पैदा किए।
ताम्रा ने बाज, गिद्ध आदि शिकारी पक्षियों को अपनी संतान के रूप में जन्म दिया।
सुरभि ने भैंस, गाय तथा दो खुर वाले पशुओं की उत्पत्ति की।
रानी सरसा ने बाघ आदि हिंसक जीवों को पैदा किया। तिमि ने जलचर जन्तुओं को अपनी संतान के रूप में उत्पन्न किया।
रानी विनता के गर्भ से गरुड़ (विष्णु का वाहन) और वरुण (सूर्य का सारथि) पैदा हुए।
कद्रू की कोख से बहुत से नागों की उत्पत्ति हुई, जिनमें प्रमुख आठ नाग थे-अनंत (शेष), वासुकी, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंख और कुलिक।
रानी पतंगी से पक्षियों का जन्म हुआ।
यामिनी के गर्भ से शलभों (पतंगों) का जन्म हुआ। ब्रह्माजी की आज्ञा से प्रजापति कश्यप ने वैश्वानर की दो पुत्रियों पुलोमा और कालका के साथ भी विवाह किया।
उनसे पौलोम और कालकेय नाम के साठ हजार रणवीर दानवों का जन्म हुआ जो कि कालान्तर में निवातकवच के नाम से विख्यात हुए।
माना जाता है कि कश्यप ऋषि के नाम पर ही कश्मीर का प्राचीन नाम था। समूचे कश्मीर पर ऋषि कश्यप और उनके पुत्रों का ही शासन था। कश्यप ऋषि का इतिहास प्राचीन माना जाता है। शोध करें तो पाएंगे जानवरो की जातिया होती थी जिनका आपस मे मैथुन सम्भव न हुआ किन्तु मनुष्य जाति के आपस मे विवाह सम्बन्ध मैथुन आदि हुए है। मनुष्य जाति के जीव ही कर्म भाव से सुर- असुर / दैत्य देवता की दो जातियों में बदलते है।
कैलाश पर्वत के आसपास भगवान शिव के गणों की सत्ता थी। उक्त इलाके में ही दक्ष राजाओं का साम्राज्य भी था। कश्यप ऋषि के जीवन पर शोध किए जाने की आवश्यकता है।
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शुक्रवार, 8 अप्रैल 2022
शाकाहार शास्त्र की दृष्टि में एवं मांसाहार पश्चिमी अवधारणा
शास्त्रों में शाकाहार
प्रायः लोग मांस भोजन के लिए शास्त्रों का अपने अनुसार विकृत अर्थ लगाते हैं। विशेषकर भारत में वामपन्थियों का उद्देश्य है कि भारत में गो पूजा परम्परा नष्ट करने के लिए गोमांस भोजन की परम्परा दिखायी जाय। उनको केवल ३ शब्द अलग अलग स्थानों से खोज कर जोड़ देना है-गो, मांस, भोजन। विभिन्न प्रसंगों में इनके क्या अर्थ हिं, उनसे इनको कोई मतलब नहीं है। ये ३ शब्द मिलते ही उनके जीवन का उद्देश्य पूरा हो गया।
१. यज्ञ में पशुबलि-
(१) मांसाहार के लिए मिथ्या अर्थ-यज्ञ में उपरिचर वसु ने पशु बलि का समर्थन किया था जिस पर ऋषियों ने उनको शाप दिया था।
महाभारत, शान्ति पर्व, अध्याय ३३७-
देवानां तु मतं ज्ञात्वा वसुना पक्षसंश्रयात्॥१३॥
छागेनाजेन यष्टव्यमेवमुक्तं वचस्तदा।
कुपितास्ते ततः सर्वे मुनयः सूर्यवर्चसः॥१४॥
ऊचुर्वसुं विमानस्थं देवपक्षार्थविदिनम्।
सुरपक्षो गृहीतस्ते यस्मात् तस्माद दिवः पत॥१५॥
अद्यप्रभृति ते याजन्नाकाशे विहता गतिः।
अस्मच्छापाभिघातेन महीं भित्वा प्रवेक्ष्यसि॥१६॥
यहां अज का अर्थ बीजी पुरुष कहा गया है, जिसकी यज्ञ द्वारा उपासना होती है।
(२) रन्तिदेव पर दैनिक गोहत्या का आक्षेप-महाभारत, द्रोण पर्व, अध्याय ६७-
सांकृते रन्तिदेवस्य यां रात्रिमतिथिर्वसेत्।
आलभ्यन्त तदा गावः सहस्राण्येकविंशतिः॥१४॥
= जो भी अतिथि संकृति पुत्र रन्तिदेव के यहाँ रात में आता था, उसे २१,००० गौ छू कर दान करते थे।
कोई भी २१,००० गौ एक बार क्या, जीवन भर में नहीं खा सकता है। यहां गो शब्द सम्पत्ति की माप भी है। मुद्राओं के नाम बदलते रहे हैं। उनका स्थायी नाम था-गो, धेनु। किसी को एक लाख गाय दी जायेगी तो वह उनको रख नहीं पायेगा, न देख भाल कर सकता है। यहाँ गो बड़ी मुद्रा (स्वर्ण), धेनु छोटी मुद्रा (रजत), निष्क सबसे छोटी मुद्रा है। निष्क से पंजाबी में निक्का, या धातु नाम निकेल हुआ है। निष्क मिलना अच्छा है, अतः नीक का अर्थ अच्छा है।
अन्नं वै गौः (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/९/८/३ आदि)
इन्द्र मूर्ति १० धेनु में खरीदने का उल्लेख है-
क इमं दशभिर्ममेन्द्रं क्रीणाति धेनुभिः। (ऋक, ४/२४/१०)
२१००० गो या स्वर्ण मुद्रा देने के बाद उनको अच्छा भोजन कराते थे-
तत्र स्म सूदाः क्रोशन्ति सुमृष्ट मणिकुण्डलाः।
सूपं भूयिष्ठमश्नीध्वं नाद्य भोज्यं यथा पुरा॥
वहाँ कुण्डल, मणि पहने रसोइये पुकार पुकार कर कहते थे-आप लोग खूब दाल भात खाइये। आज का भोजन पहले जैसा नहीँ है, उससे अच्छा है।
यही वर्णन शान्ति पर्व (६७/१२७-१२८) में भी है।
अनुशासन पर्व (११५/६३-६७) में बहुत से राजाओं की सूची है जिन्होंने तथा कई अन्य महान् राजाओं ने कभी मांस नहीँ खाया था। इनमें रन्तिदेव का भी नाम है-
श्येनचित्रेण राजेन्द्र सोमकेन वृकेण च।
रैवते रन्तिदेवेन वसुना, सृञ्जयेन च॥६३॥
एतैश्चान्यैश्च राजेन्द्र कृपेण भरतेन च।
दुष्यन्तेन करूषेण रामालर्कनरैस्तथा॥६४॥
विरूपश्वेन निमिना जनकेन च धीमता।
ऐलेन पृथुना चैव वीरसेनेन चैव ह॥६५॥
इक्ष्वाकुणा शम्भुना च श्वेतेन सगरेण च।
अजेन धुन्धुना चैव तथैव च सुबाहुना॥६६॥
हर्यश्वेन च राजेन्द्र क्षुपेण भरतेन च।
एतैश्चान्यैश्च राजेन्द्र पुरा मांसं न भक्षितम॥६७॥
श्येनचित्र, सोमक, वृक, रैवत, रन्तिदेव , वसु, सृञ्जय, अन्यान्य नरेश, कृप, भरत, दुष्यन्त, करूष, राम, अलर्क, नर, विरूपाश्व, निमि, बुद्धिमान जनक, पुरूरवा, पृथु, वीरसेन, इक्ष्वाकु, शम्भु, श्वेतसागर, अज, धुन्धु, सुबाहु, हर्यश्व, क्षुप, भरत-इन सबने तथा अन्य राजाओं ने कभी मांस नहीँ खाया था।
(३) भगवान् राम आदि कई राजाओं का ऊपर उल्लेख है कि उन लोगों ने जीवन में कभी मांस नहीं खाया।
(४) वामपन्थी झूठ-उत्तर रामचरित में एक प्रसंग है कि वसिष्ट दशरथ से मिलने आये तो उनको वत्सतरी दी गयी। वत्सतरी के बाद मडमड ध्वनि हुई। इसका अर्थ किया गया कि २ वर्ष की गाय दी गयी जिसे देखते ही वसिष्ठ ने उसे खाना आरम्भ कर दिया जिसकी हड्डियों के टूटने से मडमड शब्द हुआ। उसके बाद दशरथ ने कहा कि मधुपर्क हो गया अब प्रसंग पर चर्चा करें। यहां स्पष्टतः वत्सतरी का अर्थ मधुपर्क है जो सभी अतिथियों को दिया जाता है। अतिथि यात्रा में थके होने से उनको मीठा तथा जल की कमी होने से जल देते हैं। छोटे बच्चों को भी पेट खराब होने पर नमक-चीनी का घोल देते हैं। खाली पेट में मधुपर्क जाने पर हलका शब्द होता है। कभी कभी जोर की डकार भी होती है। गाय को खाना बाघ या मगरमच्छ के लिये भी सम्भव नहीं है। उसके पैर मे मनुश्य की हड्डी भले ही टूट जाय, मनुष्य से मुंह में नहीं ले सकता।
इसी प्रकार राहुल सांकृत्यायन ने अपनी पुस्तक वोल्गा से गंगा में लिखा है कि ऋषि लोग घोड़े की हड्डी का सूप पीते थे। यह श्वेताश्वतर उपनिषद् के नाम का मूर्खतापूर्ण अनुवाद है। अश्व = घोड़ा, उसका श्वेत भाग = हड्डी, तर = सूप। वास्तव में इस उपनिषद् में घोड़े की चर्चा ही नहीं है। यहां सूर्य या वरुण को अश्व कहा है, उससे बड़े ब्रह्म की व्याख्या होने से यह श्वेताश्वतर है।
२. शमिता-
यज्ञ में पशु का आलभन करते हैं-उसका पीठ, कन्धा आदि छूते है। इसे शमिता कहते हैं, अर्थात् शान्त करने वाला। शान्त करने के लिए हत्या नहीँ की जाती है। पर इसका अर्थ किया जाता है कि पशु का कन्धा आदि छू कर देखते हैं कि कहाँ से उसका मांस काटना अच्छा होगा। आजकल भी घुड़सवारी सिखाई जाती है कि घोड़े पर चढ़ने के पहले उसकी गर्दन तथा कन्धा थपथपाना चाहिए। इससे वह प्रसन्न हो कर अच्छी तरह दौड़ता है। बच्चों की भी प्रशंसा के लिए उनकी पीठ थपथपाते हैं, यद्यपि वे भाषा भी समझ सकते हैं। यही आलभन है। शिष्य भी पहले गुरु को जा कर नमस्कार करता है तो गुरु उसके कन्धे पर हाथ रख कर आलभन करते हैं। यदि आलभन द्वारा उसकी हत्या करेंगे तो शिक्षा कौन लेगा? गुरु को भी फांसी होगी। हर अवसर पर यदि कोई पैर छूकर नमस्कार करे तो उसकी पीठ पर ही हाथ रख कर ही आशीर्वाद दिया जाता है।
शमितार उपेतन यज्ञं देवेभिरिन्वितम्। पाशात् पशुं प्र मुञ्चत बन्धाद् यज्ञपतिं परि। (तैत्तिरीय सं, ३/१/४/१०)
प्राजापत्या वै पशवः तेषां रुद्रो अधिपतिः यत् एताभ्यां उपाकरोति, ताभ्यां एव एनं प्रतिप्रोच्या आलभत आत्मनो अनाव्रस्काय द्वाभ्यां उपाकरोति
द्विपाद् यजमानः प्रतिष्ठित्या उपाकृत्य पञ्च जुहोति। पाङ्क्ताः पशवः पशून् एव अवरुन्धे, मृत्यवे वा एष नीयते यत् पसुः तं यत् अन्वारभेत प्रमायुको यजमानः स्यात् नाना प्राणो यजमानस्य पशूनेत्याह व्यावृत्यै॥१॥ यत् पशुः मायुं अकृत इति जुहोति शान्त्यै शमितार उपेनेत्याह यथा यजुः एव एतत् वपायां वा आह्नियमाणायां अग्नेः मेधो अपक्रामति त्वां उ ते दधिरे हव्यवाहमिति वपामपि जुहोति अग्नेः एव मेधं अवरुन्धे अथो शृतत्वाय पुरस्तात् स्वाहा कृतयो वा अन्ये देवा उपरिष्टात् स्वाहा कृतयो अन्ये स्वाहा देवेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा इति अभितो वपां जुहोति॥२॥ (तैत्तिरीय सं, ३/१/५/१-२)
इसका आशय है कि प्रजापति से पशु हुए, उनका स्वामी रुद्र है (पशुपति)। उनको २ मन्त्रों से तैयार करता है जिससे उनको क्षति नहीं पहुंचे। यजमान के २ पाद (रंगाचारी कश्यप के अनुसार चेतना के २ स्तर) हैं, जो उसके आधार हैं। उसके बाद वह ५ पशुओं का प्रयोग करता है। पशु को कष्ट नहीं होना चाहिए। उनकी शान्ति के लिए मन्त्र पढ़ता है। इसकी त्रुटिपूर्ण नकल कुरान में है, पशु को मारते समय मन्त्र पढ़ते हैं। यहां, ५ प्रकार के पशुओं के कै अर्थ हैं, जिनकी व्याख्या ब्राह्मण ग्रन्थों में है।
देव, पिता, माता आदि को शमिता कहा गया है। स्पष्टतः उनका उद्देश्य अपने सन्तान का पालन है, हत्या नहीं-
दैव्याः शमितार उत मनुष्या आरभध्वम्। ... उपनयत् मेध्या दुरः। अन्वेनं माता मनयताम्। अनुं पिता। ... उदीचीनां अस्य पदो निधत्तात्। ,,, अध्रिगो शमीध्वं शमीध्वं अध्रिगो। अध्रिगुश्च अपापश्च उभौ देवानां शमितारौ। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/६/६/४)
इसी प्रकार उपनयन, विवाह आदि में सन्तान माता-पिता से अलग होती है, तो माता-पिता को कष्ट की शान्ति करायी जाती है, सन्तान को आश्वासन देते हैं कि दैव सहायक होगा। पहले माता को सान्त्वना दी जाती है, जिसे लोकभाषा में इमली घोटाना कहते हैं।
शक्ति का प्रयोग या खर्च होना आंशिक मृत्यु है। यदि पशु नहीं रहेगा तो प्रयोग किसका होगा-
मृत्युः तत् अभवत् धाता शमिता उग्रः विशां पतिः (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/१२/९/६)
अथर्व सं (१०/९) शतौदना गौ के विषय में है। गौ यज्ञ या निर्माण स्वरूप है-(१) निर्माण स्थान (शरीर, वेदी), (२) गति या क्रिया (गम् = गति), (३) स्रोत तथा निर्मित पदार्थ। गौ पशु भी मूल यज्ञ कृषि का साधन है तथा उसका दुग्ध भोजन है। इसके बिना जीवन नहीं चल सकता है अतः गौ पशु तथा यज्ञ दोनों अवध्य हैं (यजुर्वेद प्रथ सूक्त में अघ्न्या)। १०० ओदन (पकाया चावल, भात) के कई अर्थ हैं-(१) १०० प्रकार की निर्माण सामग्री , (२) शरीर में हृदय से निकली १०० नाड़ियां (कठोपनिषद्, २/३/१६), (३) या लोकों के निर्माण के प्रत्येक स्तर पर आनन्द के १०० भाग में १ भाग का उपयोग जिससे मनुष्य लोक से आरम्भ कर उच्च लोकों में आनन्द १००-१०० गुणा बढ़ता जाता है (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/८)
हिरण्य ज्योतिषं कृत्वा यो ददाति शतौदनाम्। यो देवि शमितारः पक्तारो ये च ते जनाः॥७॥
घृतं प्रोक्षन्ती सुभगा देवी देवान् गमिष्यति। पक्तारमघ्न्ये मा हिंसीः दिवं प्रेहि शतौदने॥११॥ (अथर्व, १०/९)
कुछ वनस्पति शान्त करती हैं, उनको भी शमिता कहा है-
वनस्पतिः शमिता देवो अग्निः स्वदन्तु हव्यं मधुना घृतेन। (ऋक्, १०/११/८, अथर्व, ५/१२/१२, वाज. यजु, २९/३५, मैत्रायणी सं, ४/१३/३, काण्व सं, १६/२०, तैत्तिरीय ब्रा, ३/६/३/४) = गार्हपत्य अग्नि (वनस्पतिः) दक्षिणाग्नि (शमिता) और आहवनीय अग्नि (देवः अग्निः) मिष्ट और घृत के साथ (मधुना घृतेन) हवि का आस्वादन करावे (हव्यं स्वदन्तु)।
शान्तिपूर्वक २ हाथों से निर्माण करना भी शमिता है-
सोमस्य या शमितरा सुहस्ता (ऋक्, ५/४३/४)
निर्माण के क्रम अश्वत्थ हैं (ऊर्ध्व मूल अश्वत्थ-गीता, १५/१), शमी वृक्ष से भी शान्ति मिलती है, अतः शमी नाम है। पत्नी में दोनों गुण होते हैं अतः कहा है कि शमी और अश्वत्थ पर चढ़ो-शमीमश्वत्थमारूढ (अथर्व, ६/११/१)
व्यवसाय या यज्ञ भी शमी है जिससे कर्ता सूर्य जैसा तेजस्वी होता है-
विष्ट्वी शमी तरणित्वेन वाधतः (ऋक्, १/११०/४)
शमी से यज्ञ करने पर शान्ति होती है-
शमीभिर्यज्ञमाशत (ऋक्, १/२०/२)
इच्छाग्नयः शम्या ये सुकृत्यया (ऋक्, १/८३/४, अथर्व, २०/२५/४)
यज्ञ के लिए बिना बाधा लगातार क्रिया चाहिये, जिसे अध्रिगु कहा है (निरुक्त, ५/११) = मन्त्र, अग्नि, इन्द्र आदि। बाधा दूर करना शमिध्वम् है-
अध्रिगो शमीध्वं सुशमि शमीध्वं शमीध्वमध्रिगो। (मैत्रायणी सं, ४/१३/४, काण्व सं, १६/२१, ऐतरेय ब्रा, २/७/११, तैत्तिरीय ब्रा, ३/६/६/४)
बुद्धि के आवरण या कर्म बन्धन भी शमी द्वारा काटे जाते हैं (गीता, १५/२)-
धिया नहुषि अस्य बोधताम् (ऋक्, १०/९२/१२)-यहां बुद्धि प्रेरित करने वाला नहुष (तन्त्र का कुण्डलिनी?) कहा है।
जीवन यज्ञ पत्नी के साथ शान्ति पूर्वक (शंयु) रहने से होता है-
शंयुना पत्नी संयाजान् (वाज यजु, १९/२९)
अथा नः शं योरपो दधात (ऋक्, १०/१५/४, वाज यजु, १९/५५, मैत्रायणी सं, ४/१०/६, काण्व सं, २१/१४)
तच्छं योरावृणीमहे। गातुं यज्ञाय यज्ञपतये। (ऋक् खिल, १०/१९१/१५, तैत्तिरीय सं, २/६/१०/३, मैत्रायनी सं, ४/ १३/१०, शतपथ ब्रा, १/९/१/२७, तैत्तिरीय ब्रा, ३/५/११/१, तैत्तिरीय आरण्यक, १/९/७) = शंयु के निकट प्रार्थना करते हैं कि यज्ञ का देवों के प्रति गमन हो (गातु यज्ञाय) और यजमान का देवों के प्रति गमन हो (गातुं यज्ञ पतये)। यही गीता (३/१०) में कहा है कि देव (आन्तरिक और बाह्य प्राण) और मनुष्य यज्ञ द्वारा परस्पर की उन्नति करते हैं।
शंयु को बृहस्पति का पुत्र कहा है, अर्थात् बुद्धि के अभ्यास से शान्ति होती है।
३. यज्ञ, पशु, मेध-
(१) ब्रह्म, कर्म, यज्ञ-(गीता, ८/१-४)-ब्रह्म सब कुछ है।
जो गति है, वह कर्म है।
चक्रीय कर्म में आवश्यक उत्पादन यज्ञ है।
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविध्यष्वमेषवोऽस्त्विष्टकामधुक्॥ (गीता ३/१०)
एवं प्रवर्तितं चक्रं ... (गीता ३/१६)
यज्ञ चक्र (गीता, ३/१४-१६)
अक्षर-ब्रह्म-कर्म-यज्ञ-पर्जन्य-अन्न-भूत-(भूत के अक्षर रूप से पुनः आरम्भ।
(२) निर्माण, उत्पाद-निर्माण के लिए २ प्रकार का मिश्रण होता ह-
अग्नि या अन्नाद - भोक्ता
सोम = आकाश में बिखरा पदार्थ, भुक्त, अन्न।
पाक ४ प्रकार से है-१. अग्नि + अग्नि, २, अग्नि + सोम (क) पूरा सोम इन्धन कि तरह जलता है। (ख) अग्नि ही सोम की तरह फैल जाता है। ३. सोम + सोम-जैसे गैस + गैस, वायु + जल (मेघ), जल + ठोस। २ प्रकार का मिश्रण वेद में वराह (जल स्थल का पशु) या मेघ कहा गया है।
(३) पशुमेध-१. पशु-कोई भी दृश्य पदार्थ (पश्य = देखना)। प्रजापति द्वारा दृश्य जगत् में जो कुछ भी निर्माण हुआ वह पशु है। यह ५ प्रकार के हैं-१’ पुरुष (मनुष्य, जो पुर या किसी रचना में रहे), २. अश्व (घोड़ा, चलाने वाली ऊर्जा), ३. गौ (निर्माण क्रिया, गति, स्थान), ४. अवि (भेड़ा, अग्र गति), ५. अज (बकरा, अजन्मा, सनातन निर्माण चक्र)।
(अग्निः) एतान् पञ्च पशून् अपश्यत्। पुरुषं अश्वं गां, अविं, अजं-यद् अपश्यत्, तस्मात् एते पशवः। (शतपथ ब्राह्मण, ६/२/१/२)
देवा यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम्॥१५॥
तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः। गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः॥८॥ (पुरुष सूक्त)
मेध-चेतन तत्त्व पुरुष २ प्रकार से निर्माण करता है-
२. मेध (विचार, योजना) यह क्रिया करने की शक्ति मेधा = बुद्धि है।
मेधृ मेधा-हिंसनयोः संगमे च (पाणिनीय धातु पाठ, १/६११)-कई विचारों को आत्मसात् (हिंसा) कर योजना (योग, संगम) होती है।
३. तप-कर्म, श्रम।
यत् सप्तान्नानि मेधया तपसा अजनयत् पिता। इति मेधया हि तपसा अजनयत् पिता। (शतपथ ब्राह्मण, १४/४/३/१, बृहदारण्यक उपनिषद्, १/५/१)
यहां निर्माण करने वाला चेतन तत्त्व पुरुष या पिता है। निर्माण का स्थान माता है (मा माने, माप करना, माता)।
यो नः पिता यो जनिता विधाता। (ऋक्, १०/८२/३, वाज. यजु, १७/२७, काण्व सं, १८/१, तैत्तिरीय सं, ४/६/२/१)
निर्माण के लिये प्रयुक्त बुद्धि मेधा ह, उसके लिए किसी वस्तु का प्रयोग मेध है। जिन वस्तुओं का प्रयोग निर्माण के लिए हो सकता है, वे मेध्य या ग्राम्य पशु हैं। जो उपलब्ध या उपयोगी नहीं हैं वे आरण्य पशु हैं।
विश्वरूपं वै पशूनां रूपम् (ताण्ड्य महाब्राह्मण, ५/४/६)
पशूँस्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये॥६॥ (पुरुष सूक्त)
सप्त ग्राम्याः पशवः सप्तारण्याः (शतपथ ब्राह्मण, ३/८/४/१६, ९/५/२/८)
अस्मै वै लोकाय ग्राम्याः पशवः आलभ्यन्ते। अमुष्मा आरण्याः। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/९/३/१)
४. अन्न, मद्य, मांस-
(१) जो प्राणियों द्वारा खाया जाय वह अन्न है (अद् भोजने)-
अद्यते अत्ति च भूतानि। तस्मात् अन्नं तदुच्यते। (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/२)
अद्भ्यो वा अन्नं जायते (तैत्तिरीय आरण्यक, ८/२) = जल (या उसके जैसे फैले पदार्थ) से अन्न होता है।
अन्न पशु है (केवल देखता है, कर नहीं शकता)-अन्नमु वै पशवः (जैमिनीय उपनिषद्, ३/१४१)
(२). मद-पदार्थों का सत्त्व (सत्) अन्न है। यह आनन्द देता है।
रसो वै मदः (जैमिनीय उपनिषद्, १/२१५, २१६, ३/२८, १५९, २२२, २९५)
दृश्य रूप ऋक् है, उसका प्रभाव साम या रस है-
यो वा ऋचि मदो यः सामन् रसो वै सः (माध्य. शतपथ, ४/३/२५)
जो भी स्वादिष्ट है तथा ऊर्जा देता है वह मद है-
मदन्तीभिः प्रोक्षति। तेज एवास्मिन् दधाति। (तैत्तिरीय आरण्यक, ५/४/१)
मदिन्तम इति स्वादिष्ट इत्येवैतदाह। (माध्य. शतपथ, ३/८/३/२५)
(३) मांस-उत्तम अन्न जो आकाश की तरह फैला विराट् (पृथ्वी पर उत्पन्न) है-
नभो मांसानि (तैत्तिरीय सं. ७/५/२५/१) मांसानि विराट् (छन्दः) जैमिनीय उपनिषद् (२/५८)
एतदु ह वै परममन्नाद्यं यन्मांसम् (माध्य. शतपथ, ११/७/१/३)
(४) मद्य, मांस, काम का निषेध-न मांसं समश्नीयात्। न स्त्रियं उपेयात्। यन्मांसं अश्नीयात्, यत् स्त्रियं उपेयात्, निर्वीर्यः स्यात्। न एनं अग्निं उपनमेत्। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/१/९/७-८)
शरीर या फल दोनों का कोमल भाग मांस है। पशु शरीर के कोमल भाग को मांस इसलिए कहते हैं कि यह कहता है कि मैं उसे (सः) खाऊंगा, जो मुझे (मां) खाता है-
मां स भक्षयिताऽमुत्र यस्य मांसमिहाद्म्यहम्।
एतन्मांसस्य मांसत्वं प्रवदन्ति मनीषिणः॥ (मनु स्मृति, ५/५५)
बकरे का मांस अधिक खाने वाले प्रायः उसके जैसी दाढ़ी भी रखते हैं।
मद्य, मांस, मैथुन मनुष्य की प्रवृत्ति है। उसे पूरी तरह बन्द नहीं किया जा सकता है। किन्तु कल्याण तथा उन्नति के लिए उसे सीमित और नियन्त्रित करना चाहिए।
न मांस भक्षणे दोषः न मद्ये न च मैथुने।
प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला॥ (मनुस्मृति, ५/५६)
मनु स्मृति (५/३९-४१) के अनुसार केवल यज्ञ के लिए पशु बलि दी जा सकती है। यहां यज्ञ का अर्थ उपयोगी निर्माण है, अनावश्यक बलि नहीं होती है। बलि का अर्थ हत्या नहीं, उसकी ऊर्जा या श्राम् का उपयोग है। मरने पर बेकार हो जायेगा।
(५) बाइबिल, कुरान में निषेध-
Genesis-(1/29) And God said, Behold, I have given you every herb bearing seed, which [is] upon the face of all the earth, and every tree, in the which [is] the fruit of a tree yielding seed; to you it shall be for meat.
Koran (2/61) And when you said, Musa , we will no longer confine ourselves to a single food: So, pray for us to your Lord that He may bring forth for us of what the earth grows — of its vegetable, its cucumbers, its wheat, its lentils and its onions. He said, do you want to take what is inferior in exchange for what is better?
Koran (2/174) also prohibits eating of-Khinjar = which is seen. But it is taken only as swine.
एक प्रकार से यहां वही कहा है जो वेद या स्मृति में लिखा है। बाइबिल (जेनेसिस, १/२९) या कुरान (२/६१) में कहा है कि पृथ्वी से जो निकले वही खाना चाहिये। इसका अर्थ है कि कृषि उत्पाद ही खाना चाहिये। जैन लोग इसका विशेष अर्थ करते हैं कि केवल सतह से ऊपर का अन्न खाना चाहिए, आलू आदि नीचे की जड़ नहीं। जड़ से पुनः उत्पत्ति होती है, अतः उत्पादन स्रोत नहीं बन्द करना है, या उसके साथ सूक्ष्म जीव रहते हैं जिनकी हिंसा नहीं करनी है। अपने लोभ के कारण बाइबिल, कुरान में इसी का विपरीत अर्थ किया जाता है कि पृथ्वी के ऊपर जो कुछ है वह खाया जा सकता है। मनुस्मृति में पूर्ण निषेध मना किया है, क्योंकि सभी मानते नहीं है। कुरान में पूर्ण निषेध के कारण सदा मांस मैथुन की योजना बनाते रहते हैं।
६. मेध यज्ञ-
(१) अश्वमेध- किसी जीव से अश्रु की तरह पिण्ड से तेज निकलता है, अतः उस तेज को अश्रु या परोक्ष में अश्व कहते हैं। जैसे पशु अश्व गाड़ी खींचता है, उसी प्रकार किसी भी कार्य के लिऊर्जा को अश्व कहते हैं। इंजन की शक्ति की माप भी अश्वशक्ति कहते हैं।
प्रजापतेरक्ष्यश्वयत्। तत्पराततत्ततोऽश्वः समभवद्, यदश्वयत् तत् अश्वस्य अश्वत्वम्। (शतपथ ब्राह्मण, १३/३/१/१)
वारुणो वा अश्वः। (शतपथ ब्राह्मण, ७/५/२/१८) सौर्यो वा अश्वः (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ३/१९) अश्वो मनुष्यान् (अवहत्)- (शतपथ ब्राह्मण, १०/६/४/१)
प्राचीन साहित्य में कई रथों में हजारों अश्व लगाने का वर्णन है, जो भौतिक रूप में किसी गाड़ी में लगाना असम्भव है। ऋक् (८/४६/२९) में ६०,००० अश्वों के रथ का वर्णन है। महाभारत, वन पर्व (४२/२-७) में इन्द्र के रथ में १०,००० अश्व का उल्लेख है। महाभारत, आदि पर्व (२२४/१०-१५) के अनुसार अर्जुन के दिव्य रथ में दिव्य गान्धर्व अश्व थे जिनसे तेज प्रकाश निकलता था। महाभारत, द्रोण पर्व (१७५/१३) के अनुसार घटोत्कच के रथ में सैकड़ों घोड़े थे तथा वह आकाश में चल सकता था।
आकाश में ऊर्जा का स्रोत सूर्य ही अश्व है। सूर्य का स्रोत वरुण (आकाशगंगा का विरल अप्) भी अश्व कहा है।
पृथ्वी पर वायु अश्व है जो मेघ को चलाता है, तूफान लाता है या समुद्र की पाल-नौका को चलने की शक्ति देता है। पूर्व एशिया के जापान-कोरिया को भद्राश्व कहते थे (भारत से ९० अंश पूर्व), क्योंकि वहां समुद्री वायु की गति कम होती है (आधुनिक भूगोल में-horse latitude)
किसी देश में परिवहन और सञ्चार अश्व है। राजा का कर्तव्य है इनकी बाधा दूर करना, जिसे अश्वमेध कहते हैं। नाटकीय रूप से घोड़ा पूरे देश में घूमता रहता है, जिसके पीछे राजा सेना ले कर चलते हैं। बिना खाये पिये घोड़ा नहीं घूम सकता है, न उसको पता है कि अगले देश में जाने का मार्ग क्या है। उसके पीछे राजा भी सेना ले कर नहीं चल सकता, लाखों की सेना एक साथ नहीं चल सकती है। उनको रोकने के लिए अन्य देश का राजा चेक गेट पर नहीं बैठा रहेगा।
मनुष्य शरीर में नाड़ी तथा नस में प्राण का सञ्चार अश्व है। इसको पुनः सशक्त करना अश्वमेध है जिसे वाजीकरण (वाजि = अश्व) या काया-कल्प भी कहते हैं। दशरथ की पुत्र प्राप्ति यज्ञ को भी रामायण में अश्व (हय) मेध कहा है। दशरथ और उनकी रानियों की पुत्र जन्म देने की आयु बीत चुकी थी। पुत्र जन्म के लिए उनमें प्राण का सञ्चार आवश्यक था। यहां घोड़ा छोड़ने का अर्थ है प्राण प्रवाह मुक्त करना।
वीर्यं वा अश्वः (शतपथ ब्राह्मण २/१/४/२३)
प्राणापानौ वा एतौ देवानाम्। यदर्काश्वमेधौ। (तैत्तिरीय ब्राह्मण ३/९/२१/३)
सुतार्थी वाजिमेधेन किमर्थं न यजाम्यहम् (रामायण, बालकाण्ड, ८/२)
तदर्थं हयमेधेन यक्ष्यामीति मतिर्मम (बालकाण्ड, ८/८)
(२) नरमेध-ब्रह्म पुराण, गौतमी माहात्म्य, अध्याय ३४ में सूर्य वंश के राजा हरिश्चन्द्र (प्रायः ७,३०० ईपू) की कथा है जिनको वरुण ने ऐसे पुत्र होने का वरदान दिया था जिसके कर्म और गुणों की ख्याति तीनों लोकों में फैलेगी। जैसे ही उनके पुत्र रोहित का जन्म हुआ, वरुण ने उसकी बलि की मांग की। हरिश्चन्द्र उसे कई बार टालते गये-दांत नहीं निकला है, यज्ञोपवीत नहीं हुआ या शिक्षा नहीं हुई, आदि। वरुण ने क्रुद्ध हो कर उनको जलोदर होने का शाप दिया। तब रोहित भाग गया और एक व्यक्ति शुनःशेप को बलि के लिए खरीद लाया। किन्तु वरुण उनकी पूजा से प्रसन्न हो गये और कहा कि बलि की आवश्यकता नहीं है।
यही कथा भागवत पुराण (९/७), ऐतरेय ब्राह्मण, अध्याय ३१, ऋक् सूक्त (१/२४) में है जिसमें शुनःशेप के मन्त्र हैं।
इसका एक अर्थ है कि मिथ्या आचरण से अप्वा (जलोदर-Ascites) होता है (अथर्व, ३/२/५, ऋक्, १०/१०३/१२)। इसकी ओषधि रोहित (Tecomella undulata) नाम की वनस्पति है (चरक संहिता, चिकित्सा स्थान, १३/४५-८४)। किन्तु मुख्य अर्थ है कि यदि रोहित को मार कर बलि दी जाती, तो वरुण के वरदान का कोई अर्थ नहीं था कि पुत्र तीनों लोकों में विख्यात होगा। यहां बलि का अर्थ है अपनी पूरी शक्ति शिक्षा तथा देश की उन्नति में लगा देना।
इसी प्रकार अब्राहम की कथा बाइबिल और कुरान में है। अब्राहम ईराक के उर नगर में रहते थे। उनको भी गुणी पुत्र होने का वरदान मिला था। पर जन्म होते ही पुत्र इस्माइल की बलि मांगने लगे। मार कर बलि देने पर वह गुणी कैसे होता? अपने या पुत्र के बदले मुस्लिम लोग भेड़ (अरब में) या बकरे की बलि देते हैं। शुनःशेप सूक्त (ऋक्, १/२४) में भी कहा है कि राजा वरुण ने उरु नगर बनाया था। ईराक में इसके अवशेष प्रायः ८,००० वर्ष पुराने अनुमानित हैं।
उरुं हि राजा वरुण श्चकार (ऋग्वेद, १/२४/८)।
अतः नरमेध का अर्थ है किसी उद्देश्य या देश के लिए जीवन लगाना। हत्या से कोई लाभ नहीं होना है। इसके लिए माता-पिता भी सन्तान को शान्त कर कर्मठ होने का आशीर्वाद देते हैं, जिसे शमिता कहते हैं।
दैव्याः शमितार उत मनुष्या आरभध्वम्। उपनयत् मेध्या दुरः। अन्वेनं माता मनयताम्। अनुं पिता। ... उदीचीनां अस्य पदो निधत्तात्। ... अध्रिगो शमीध्वं शमीध्वमध्रिगो। अध्रिगुश्चापापश्च उभौ शमितारौ॥ (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/६/६/४)
(३) गोमेध-एक अर्थ में सभी यज्ञ गो हैं। इसके मेध का अर्थ है, इसके उत्पाद का उपभोग। शतोदना गौ के मेध का आध्यात्मिक अर्थ है हृदय से निकली १०० नाड़ियों का मार्ग छोड़ कर १०१वी नाड़ी से जा कर मोक्ष प्राप्त करना।
शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका।
तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति, विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति॥ (कठोपनिषद्, २/३/१६)
हिरण्यं ज्योतिषं कृत्वा यो ददाति शतौदनाम्। यो ते देवि शमितारः पक्तारो ये च ते जनाः॥ (अथर्व, १०/९/७)
आधिभौतिक रूप में गोमेध का अर्थ है गो रूपी पृथ्वी (स्थल, जल, वायु और जीव मण्डल इसके ४ स्तन हैं) या उसके अंश अप्ने देश का पालन करना।
अथैष गोसवः स्वाराजो यज्ञः। (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १९/१३/१)
इमे वै लोका गौः यद् हि किं अ गच्छति इमान् तत् लोकान् गच्छति। (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/२/३४)
इमे लोका गौः। (शतपथ ब्राह्मण, ६/५/२/१७)
धेनुरिव वाऽइयं (पृथिवी) मनुष्येभ्यः सर्वान् कामान् दुहे माता धेनुर्मातेव वाऽइयं (पृथिवी) मनुष्यान् बिभर्त्ति। (शतपथ ब्राह्मण, २/२/१/२१)
(४) सर्वमेध यज्ञ-सभी यज्ञों में समन्वय का भाव सर्वहुत या गीता का ब्रह्म यज्ञ है। ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है। अतः यज्ञ स्थान, हवि, हवन, उत्पाद, कर्ता आदि सभी कुछ ब्रह्म है। ब्रह्म का ही ब्रह्म में हवन हो रहा है। कर्ता, कर्म आदि सभी एक हैं, अतः इसे सुकृत कहा है। बाइबिल में इसका अनुवाद है कि हर सृष्टि के बाद भगवान् ने कहा कि बहुत अच्छा बना ह। उनको किसी से अपने काम का प्रमाण पत्र लेने की आवश्यकता नहीं थी।
असत् वा इदमग्र आसीत्। ततो वै सत् अजायत। तदा आत्मानं स्वयं अकुरुत। तस्मात् तत् सुकृतं उच्यत, इति। (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/७/१)
तत् सर्वेषु भूतेषु आत्मानं हुत्वा, भूतानि चात्मनि, सर्वेषां भूतानां श्रैष्ठ्यं स्वाराज्यं आधिपत्यम् पर्यैत्, तथैव एतद् यजमानः सर्वमेधे सर्वान् मेधान् हुत्वा सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठ्यं स्वाराज्यं आधिपत्यं पर्येति (शतपथ ब्राह्मण, १३/७/१/१)
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतं।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्म कर्म समाधिना गीता 4/24
शनिवार, 26 फ़रवरी 2022
कॉमेडियन actor यूक्रेन के राष्ट्रपति Volodymyr Zelensky को हथियार और drug कंपनियों का डायरेक्शन
अपोन ए टाइम दियर वाझ ए यूक्रेन।
यूक्रेन के साथ एक समस्या थी।
उसमे आधे लोग खुद को रूसी मानते रूसी भाषा, रहन सहन खान पान, Culture, सभ्यता संस्कृति सब रूसी ही थी।
बाकी आधे यूक्रेनी थे।
मने यूक्रेन वाझ ए कन्फ्यूज्ड नेशन ऑफ कन्फ्यूज़्ड पीपुल।
मने ऊ सब यही decide नही कर पाए कि ऊ सब रूसी हैं या यूक्रेनी।
बहरहाल, ऐसे जनता एक फंतासी की दुनिया मे जीती है, Utopian World में... कल्पना लोक में.... एक राजकुमार घोड़े पे सवार हो के आएगा और राजकुमारी सिंड्रेला को छुड़ा के ले जाएगा।
सो 2015 में यूक्रेन में एक TV धारावाहिक शुरू हुआ।
उसका नाम था Servant Of The People ।
वो धारावाहिक 2015 से 2019 तक लगातार चला और यूक्रेन में अत्यधिक पॉपुलर हुआ।
मने लोगबाग उस सीरियल के दीवाने थे।
सीरियल में Volodymyr Zelensky नामक एक कॉमेडियन actor यूक्रेन के राष्ट्रपति का रोल करता था।
2019 में सीरियल की लोकप्रियता को भुनाने के लिये उसने उसी नाम - Servant of the People नाम की एक political पाल्टी बनाई और घोषणा कर दी कि वो राष्ट्रपति का चुनाव लड़ेगा। और उसने ये भी दावा किया कि वो बेहद ईमानदार है और देश से Corruption दूर कर देगा।
उसने बाकायदे चुनाव लड़ा और जनता ने उसे 73%से भी ज़्यादा मत दे के चुनाव जिता दिया।
इस तरह Volodymyr Zelensky यूक्रेन का राष्ट्रपति बन गया।
कालांतर में Feb 2022 में यूक्रेन बर्बादी के कगार पर खड़ा
#Bhagwant_Mann
#Comedian_actor
#Punjab
कभी कशमीर आईये .....!!!!!
गली -गली मे डाॅक्टर और डेंटल सर्जन बैठे है । हर मेडिकल स्टोर के अंदर बने केबिन मे एक डाॅक्टर साहब विराजमान मिलेंगें । MBBS ड्रिग्री धारी ......
कभी गुडगाँव मे "मेदांता द मेडिसिटी" हो आईये , बाकायदा हिजाबधारी लडकियां और दाढीयुक्त मोमिन डाॅक्टर मिलेंगें ।
कभी मूड हो तो थोडी पडताल कर लेना , सब के सब बांग्लादेश जाकर डाॅक्टरी पढे है , बचे खुचे वुहान (चीन) या फिर यूक्रेन ,जाॅर्जिया और रशियन फेडरेशन के देशो के मेडिकल काॅलेजो से ।
कशमीरियो मे तो एक परम्परा ही बन गई है , "हलाल डिग्री" लेने की , जो केवल बांग्लादेश मे मिलती है । ये हलाल डिग्री वाले डाॅक्टर इतने एक्सपर्ट डाॅक्टर है कि बगैर MCI का एग्जाम पास किये , प्रैक्टिस करते है , कशमीर है भाई , जहाँ इंडिया के नाम से ही चिढ हो , तो मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया गई तेल लेने , भारत सरकार तक चूँ ना करे ।
बेखौफ , बेलौस प्रेक्टिस करते है "बांग्लादेश" से हलाल डिग्री लेकर आये डाॅक्टर साहब । राज्य सरकार भी सबसे ज्यादा वरीयता बांग्लादेश से डिग्री लेकर लौटे दढियलो को ही देती है ।
और काबिलियत तो पूछिये ही मत , जम्मू परिक्षेत्र है ,तो दस्त की दवाई लेने 300 किलोमीटर दूर जम्मू भागिये , कशमीर रीजन है तो चलिये शेर ए कशमीर श्रीनगर ।
एक दाँत तक निकलवाना तो जम्मू जाईये , जबकि एक एक ड्रिस्ट्रिक्ट हाॅस्पिटल के पे रोल पर पचास पचास डाॅक्टर मौजूद है ।
यही हाल यूक्रेन ,जाॅर्जिया , रोमानिया , बुल्गारिया , रूस , के डिग्रीधारियो का है । कमाल तो ये है कि वहाँ मेडिकल की पढाई स्थानीय भाषा मे होती है , ना कि अंग्रेजी मे । सीधे M.D. की डिग्री मिलती है ,जो यहाँ एग्जाम पास करने के बाद MBBS के समकक्ष मानी जाती है , और इसे लेने मे मात्र 07 साल लगते है । पहला साल केवल लैंग्वेज सिखाई जाती है , क्योंकि मेडिसिन की पढाई का माध्यम केवल और केवल स्थानीय भाषा है ।
अरे मेडिकल तो छोडिये , फाईटर एयरक्राफ्ट / पनडुब्बी के क्रू , नेवल नेविगेशन , और एडमिरल गोर्शकोव (विक्रमादित्य) की ट्रेनिंग रूस मे पाने वाले सैनिको से पूछकर देखिये ,वही बता देंगें कि उनको ट्रैनिंग किस भाषा मे दी जाती है रूस , और रशियन फेडरेशन के देशो मे .....????
शायद वो वर्ष था , 1984 जब हमारे स्कवाड्रन लीडर राकेश शर्मा जी को पहले कास्मोनॅट बनने का गौरव प्राप्त हुआ था , जो USSR के बैकानूर (वर्तंमान मे कजाकिस्तान) से अंतरिक्ष मे गये थे रूसियो के साथ । कभी पता करिये कि उन्होने रूसी भाषा क्यों सीखी थी ??? ट्रेनिंग का माध्यम कौन सी भाषा थी ???
ड्रग कंपनी का षड्यंत्र में फंसा विश्व https://youtu.be/bbZyrHmMEnE
चलिये फिर से डाॅक्टरो की काबिलियत पर आते है । तो जनाब इन डाॅक्टर साहब ने डिग्री प्राप्त कर ली , MCI का छोटा सा दफ्तर है , सेक्टर -8 द्वारका दिल्ली मे मलेरिया इंस्टीट्यूट के बगल मे । मेडिकल काउंसिल का एग्जाम पास किया या नही किया कौन पूछने आता है इनसे ???? किसी भी बी-ग्रेड सिटी मे नर्सिंग होम खोलकर बैठ गये । कौन सा मरीज इलाज से पहले डाॅक्टर की ड्रिगी चैक कर रहा है ????
इलाके के थानेदार को क्या पडी है , कि वो डाॅक्टर से मगजमारी करता फिरे। हो गये डाॅगदर , चल पडी डाॅगदरी । दस दिन ICU का बिल बनाओ , और रेफर कर दो , घंटा किसी को फर्क नही पडता , ना डाॅगदर को , ना मरीज के तीमारदारो को । इंसानी जिंदगी बहुत सस्ती है ना अपने देश मे ।
जरा सोचिये , साल दर साल तीस हजार डाॅक्टर तो अकेले यूक्रेन से आ रहे है , उसके बाद जाॅर्जिया , दस बीस हजार बांग्लादेश से, उतने ही चीन , रोमानिया , बुल्गारिया , हंगरी , कजाकिस्तान , ताजिकिस्तान , मालदोवा , उजबेकिस्तान , नेपाल, मॉरीशस जैसे देशो से आ रहे है । फिर हम ये भी बोलते है कि डाॅक्टर कसांई है , ऐसे लूट लिया ,ऐसे काट लिया , ऐसे मेडिकल नेग्लीजेंसी के चलते मरीज मर गया ।
हरियाणा जैसे राज्यो मे तो जमींदारो मे मशहूर कहावते जन्म ले चुकी है ....
ये दो किल्ले ,रामप्यारी के ब्याह मे बेच देंगें , दो किल्ले बेच के रामकिशन को यूक्रेन/रूस से MBBS करवाणी है , अर फेर ये पाँच किल्ले बेच के इसका नर्सिंग होम बण ज्यागा ।
मै दस फैमिलीज को जानता हूँ , जो अपनी SUV लेकर , सपरिवार छोरी को मेडिकल ऐट्रेंस एग्जाम दिलवाने हरियाणा से बैंगलोर, चेन्नई , गुवाहाटी तक गये है । चल्लो छोरी पेपर दे लेगी , अर हम घूम यांगे ।
और बाद मे यही भारत जैसा देश मेडिकल प्रैक्टिस मे डाॅक्टरो से नेकनीयती , शुचिता , ईमानदारी , सच्चाई , की उम्मीद भी करता है ।
भाई ठगी , चालाकी , बेईमानी , जोड तोड , और मक्कारी से नाममात्र के डाक्टर बनने वाले वही सब तरीके तो अपनायेंगें ना ???
काबिल होते तो यही डाॅक्टर बन लेते , एग्जाम पास कर लेते । किसी लायक नही थे ,तभी तो जोड -तोड , पैसे , संपर्को , दौड धूप , और येन केण प्रकारेण डाॅक्टर बनने डोनेशन सीट पर बांग्लादेश , चीन , यूक्रेन, जाॅर्जिया , रोमानिया , कजाकिस्तान , ताजिकिस्तान से डाॅक्टर बनकर आये है ।
अब सोच लो भाई , क्योंकि जान है तुम्हारी , पैसा है तुम्हारा , बीमारी है तुम्हारी । और डाॅक्टर है यूक्रेन /बांग्लादेश का ....
यूक्रेन का संकट वे फंसे हुए mbbs डिग्री के आकांक्षी चिखते चिल्लाते भारतीय अपने ही हाथों अपने बिनाश कर अपने ही जाल में उलझ कर फडफ़ड़ा रहे हैं वैश्विक फार्मा ड्रग लॉबी और हथियार लॉबी यूक्रेन और रुस के राष्ट्रपति जो चतुर जासूस रह चुका है को अपने जाल में फंसा कर पूरी दुनिया में भय और तनाव से आक्रांत किए हुए है वही दिशाहीन भारत 70 सालों से इनकी बनाए हुए मेडिकल व्यवस्था MCI के चंगुल में फस कर पूरा देश इस मेडिकल लूट का शिकार बना हुआ है कोई आदिवासी बनवासी अपने मूल परंपरागत चिकित्सा से लोगों को ठीक कर रहा है तो उसे मारपीट कर बंद कर दिया जाता है उसको जुर्माना लगाया जाता है उसको आजीवन कारावास कर दिया जाता है वहीं यह फर्जी डिग्रियां पूरे दुनिया से भारत में बांटकर सबके जान के साथ खिलवाड़ हो रहा है पर कोई व्यवस्था कोई सरकारी तंत्र इस पर कोई भी कारवाई करने में अक्षम हो रहा जो पिछले 70 साल से चल रहा है इसलिए अब एक ही समाधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान यूरोपियन देश #यूक्रेन में बड़ी बड़ी शानदार बिल्डिंगें है.. चमचमाती हुई सड़कें और लंबी लक्जरी कार गाडियां हैं सड़कों पर साइकिल तो क्या दोपहिया वाहन भी दिखाई नहीं देते क्योंकि सबके पास महंगी लक्जरी गाडियां जो है अच्छे मेडिकल कॉलेज भी है...
युनिवर्सिटी है तभी तो मेडिकल शिक्षा के लिए भारत के हजारों छात्र यूक्रेन में पढ़ाई कर रहें हैं यानि यूक्रेन में चारों तरफ संपन्नता है अगर नहीं है तो सामरिक शक्ति ,मजबूत सेना , अत्याधुनिक हथियार और वहां की जनता में राष्ट्रवादी भावना यही कारण है कि मात्र दो घंटे में रुस ने यूक्रेन को घुटनों पर लाकर खड़ा कर दिया यूक्रेन के
सेनिक भाग खड़े हुए हैं। यूक्रेन के राष्ट्रपति आम लोगों से युद्ध लड़ने की अपील कर रहें हैं..
इसके लिए सारी पाबंदियां भी हटा दी गई है... यूक्रेन आम नागरिकों को युद्ध लड़ने के लिए हथियार देने की बात भी कह रहा है पर मजाल यूक्रेन का एक भी नागरिक युद्ध लड़ने को तैयार हुआ हो , क्योंकि यूक्रेन के नागरिकों में इजराइल के नागरिकों की तरह राष्ट्रवाद की भावना ही नहीं है।
वह तो एशो आराम की जिन्दगी जीने के आदी हो चुके हैं। यूक्रेन के स्कूल कालेज, युनिवर्सिटी, बाजार, दुकान,आफिस सब बन्द कर दिये गये हैं। सब कारोबार चौपट हो गया है। कारखाने फैक्ट्री सब बन्द हो गये
सब कारोबार चौपट हो गया है कारखाने फैक्ट्री बंद हो गई लोग रोजगार तो क्या अपनी जान बचाने के लिए सिमित संख्या में मौजूद बंकरों में छुप रहें हैं अंडरग्राउंड मेट्रो स्टेशनों में शरण ले रहें हैं। यानि सब कुछ होते हुए भी यूक्रेन आज जिंदगी की भीख मांग रहा है।
ये लेख भारत के उन लोगों को समर्पित है जो राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादियों को गाहे बगाहे गालियां देते रहते हैं तथा सिर्फ महंगाई, बेरोजगारी और आलू प्याज टमाटर तथा मुफ्त की योजनाओं को ही देश के विकास का पैमाना मान बैठे हैं।
शनिवार, 12 फ़रवरी 2022
अपने pin को सुरक्षित और गोपनीय रखने की विद्या का नाम है "कटपयादी सन्ख्या विद्या"
जी हाँ, शास्त्रों में एक ऐसी भी विद्या है जिससे आप अपने pin को सुरक्षित और गोपनीय रख सकते हैं,
उस विद्या का नाम है "कटपयादी सन्ख्या विद्या"
●कटपयादि संख्या
हममें से बहुत से लोग अपना Password, या ATM PIN भूल जाते हैं इस कारण हम उसे कहीं पर लिख कर रखते हैं पर अगर वो कागज का टुकड़ा किसी के हाथ लग जाए या खो जाए तो परेशानी हो जाती
पर अपने Password या Pin No. को हम लोग “कटपयादि संख्या” से आसानी से याद रख सकते है।
“कटपयादि”( क ट प य आदि) संख्याओं को शब्द या श्लोक के रूप में आसानी से याद रखने की प्राचीन भारतीय पद्धति है
चूँकि भारत में वैज्ञानिक/तकनीकी/खगोलीय ग्रंथ पद्य रूप में लिखे जाते थे, इसलिये संख्याओं को शब्दों के रूप में अभिव्यक्त करने हेतु भारतीय चिन्तकों ने इसका समाधान 'कटपयादि' के रूप में निकाला।
कटपयादि प्रणाली के उपयोग का सबसे पुराना उपलब्ध प्रमाण, 869 AD में “शंकरनारायण” द्वारा लिखित “लघुभास्कर्य” विवरण में मिलता है
तथा “शंकरवर्मन” द्वारा रचित “सद्रत्नमाला” का निम्नलिखित श्लोक इस पद्धति को स्पष्ट करता है -
इसका शास्त्रीय प्रमाण -
नज्ञावचश्च शून्यानि संख्या: कटपयादय:।
मिश्रे तूपान्त्यहल् संख्या न च चिन्त्यो हलस्वर: ॥
[अर्थ: न, ञ तथा अ शून्य को निरूपित करते हैं। (स्वरों का मान शून्य है) शेष नौ अंक क, ट, प और य से आरम्भ होने वाले व्यंजन वर्णों द्वारा निरूपित होते हैं।
किसी संयुक्त व्यंजन में केवल बाद वाला व्यंजन ही लिया जायेगा। बिना स्वर का व्यंजन छोड़ दिया जायेगा।]
अब चर्चा करते हैं कि आधुनिक काल में इस की उपयोगिता क्या है और कैसे की जाए ?
कटपयादि – अक्षरों के द्वारा संख्या को बताकर संक्षेपीकरण करने का एक शास्त्रोक्त विधि है, हर संख्या का प्रतिनिधित्व कुछ अक्षर करते हैं जैसे
1 – क,ट,प,य
2 – ख,ठ,फ,र
3 – ग,ड,ब,ल
4 – घ,ढ,भ,व
5 – ङ,ण,म,श
6 – च,त,ष
7 – छ,थ,स
8 – ज,द,ह
9 – झ,ध
0-ञ,न,अ,आ,इ,ई,उ,ऊ,ऋ,ॠ,लृ,ए,ऐ, ओ,
हमारे आचार्यों ने संस्कृत के अर्थवत् वाक्यों में इन का प्रयोग किया, जैसे गौः = 3, श्रीः = 2 इत्यादि ।
इस के लिए बीच में विद्यमान मात्रा को छोड देते हैं । स्वर अक्षर ( vowel) यदि शब्द के आदि (starting) मे हो तो ग्राह्य ( acceptable) है, अन्यथा अग्राह्य (unacceptable) होता
जैसे समझिए कि मेरा ATM PIN 0278 है- पर कभी कभी संख्या को याद रखते हुए ATM में जाकर हम Confuse हो जातें हैं कि 0728 था कि 0278 ? यह भी अक्सर बहुत लोगों के साथ होता है, ये इन से बचने के उपाय हैं
जैसे ATM PIN के लिए कोई भी चार अक्षर वाले संस्कृत शब्द को उस के कटपयादि मे परिवर्तन करें ( उस शब्द को सिर्फ अपने ही मन मे रखें, किसी को न बताएं )
उदाहरण के लिए –
इभस्तुत्यः = 0461
गणपतिः = 3516
गजेशानः = 3850
नरसिंहः = 0278
जनार्दनः = 8080
सुध्युपास्यः = 7111
शकुन्तला = 5163
सीतारामः = 7625
इत्यादि ( अपने से किसी भी शब्द को चुन लें )
ऐसे किसी भी शब्द को याद रखें और तत्काल “कटपयादि संख्या” मे परिवर्तन कर के अपना ATM PIN आदि में प्रयोग करें ।
नोट, कृपया दिए गए उदाहरण का नकल करके अपना पिन ना बदलें अपने दिमाग का इस्तेमाल करके फिर पिन बदलें क्योंकि यह मैसेज वायरल हो चुका है और कई तिकड़मबाज इसका दुरुपयोग कर सकते हैं
सत्य सनातन धर्म की जय।
साभार धरोहर पत्रिका
मंगलवार, 25 जनवरी 2022
आत्मोत्कर्ष की महायात्रा जिस मार्ग से होती है उसे मेरुदण्ड या सुषुम्ना कहते हैं । उसका एक सिरा मस्तिष्क का-दूसरा काम केन्द्र का स्पर्श करता है । कुण्डलिनी साधना की समस्त गतिविधियाँ प्रायः इसी क्षेत्र को परिष्कृत एवं सरल बनाने के लिए हैं । इड़ा पिंगला के प्राण प्रवाह इसी क्षेत्र को दुहराने के लिए नियोजित किये जाते हैं । साबुन पानी में कपड़े धोये जाते हैं । झाड़ू झाड़न से कमरे की सफाई होती है । इड़ा पिंगला के माध्यम से किये जाने वाले नाड़ी शोधन प्राणायाम मेरुदण्ड का संशोधन करने के लिए है । इन दोनों ऋणात्मक और धनात्मक शक्तियों का उपयोग सृजनात्मक उद्देश्य से भी होता है ।
इमारतें बनाने वाले कारीगर कुछ समय नींव खोद का गड्डा करते हैं, इसके बाद ही दीवार चुनने के काम में लग जाते हैं । इसी प्रकार इड़ा पिंगला संशोधन और सृजन का दुहरा काम करते हैं । जो आवश्यक है उसे विकसित करने में वे कुशल माली की भूमिका निभाते हैं । यों आरंभ में जमीन जोतने जैसा ध्वंसात्मक कार्य भी उन्हीं को करना पड़ता है पर यह उत्खनन निश्चित रूप से उन्नयन के लिए होता है ।
माली भूमि खोदने, खर-पतवार उखाड़ने, पौधे की काट-छाँट करने का काम करते समय ध्वंस में संलग्न प्रतीत होता है, पर खाद पानी देने, रखवाली करने में उसकी उदार सृजनशीलता का भी उपयोग होता है । इड़ा पिंगला के माध्यम से सुषम्ना क्षेत्र में काम करने वाली प्राण विद्युत का विशिष्ट संचार क्रम प्रस्तुत करके कुण्डलिनी जागरण की साधना सम्पन्न की जाती है ।
मेरुदण्ड को राजमार्ग-महामार्ग कहते हैं । इसे धरती से स्वर्ग पहुँचने का देवयान मार्ग कहा गया है । इस यात्रा के मध्य में सात लोक हैं । इस्लाम धर्म के सातवें आसमान पर खुदा का निवास माना गया है । ईसाई धर्म में भी इससे मिलती-जुलती मान्यता है । हिन्दू धर्म के भूःभुवःस्वःतपःमहःसत्यम् यह सात लोक प्रसिद्ध है । आत्मा और परमात्मा के मध्य इन्हें विराम स्थल माना गया है । लम्बी मंजिलें पूरा करने के लिए लगातार ही नहीं चला जाता । बीच-बीच में विराम भी लेने होते हैं । रेलगाड़ी गन्तव्य स्थान तक बीच के स्टेशनों पर रुकती-कोयला, पानी लेती चलती है । इन विराम स्थलों को 'चक्र ' कहा गया है । चक्रों की व्याख्या दो रूपों में होती है, एक अवरोध के रूप में दूसरे अनुदान के रूप में महाभारत में चक्रव्यूह की कथा है । अभिमन्यु उसमें फँस गया था । वेधन कला की समुचित जानकारी न होने से वह मारा गया था । चक्रव्यूह में सात परकोटे होते हैं । इस अलंकारिक प्रसंग को आत्मा का सात चक्रों में फँसा होना कह सकते हैं । भौतिक आकर्षणों की, भ्राँतियों की विकृतियों की चहारदीवारी के रूप में भी चक्रों की गणना होती है । इसलिए उसके वेधन का विधान बताया गया है ।
रामचन्द्रजी ने बाली को मार सकने की अपने क्षमता का प्रमाण सुग्रीव को दिया था । उन्होंने सात ताड़ वृक्षों का एक बाण से वेधकर दिखाया था । इसे चक्रवेधन की उपमा दी जा सकती है । भागवत माहात्य में धुन्धकारी प्रेत के बाँस की सात गाँठें फोड़ते हुए सातवें दिन कथा प्रभाव से देव देहधारी होने की कथा है । इसे चक्रवेधन का संकेत समझा जा सकता है । चक्रों को अनुदान केन्द्र इसलिए कहा जाता है कि उनके अन्तराल में दिव्य सम्पदाएँ भरी पड़ी हैं । उन्हें ईश्वर ने चक्रों की तिजोरियों में इसलिए बन्द करके छोड़ा है कि प्रौढ़ता, पात्रता की स्थिति आने पर ही उन्हें खोलने उपयोग करने का अवसर मिले कुपात्रता अयोग्यता की स्थिति में बहुमूल्य साधन मिलने पर तो अनर्थ ही होता है । कुसंस्कारी संताने उत्तराधिकारी में मिली बहुमूल्य सम्पदा से दुर्व्यसन अपनानी और विनाश पथ पर तेजी से बढ़ती हैं । छोटे बच्चों को बहुमूल्य जेबर पहना देने से उनकी जान जोखिम का खतरा उत्पन्न हो जाता है ।
धातुओं की खदानें जमीन की ऊपरी परत पर बिखरी नहीं होती, उन्हें प्राप्त करने के लिए गहरी खुदाई करनी पड़ती है । मोती प्राप्त करने के लिए लिए समुद्र में गहरे गोते लगाने पड़ते हैं । यह अवरोध इसलिए है कि साहसी एवं सुयोग्य सत्पात्रों को ही विभूतियों को वैभव मिल सके । मेरुदण्ड में अवस्थित चक्रों को ऐसी सिद्धियों का केन्द्र माना गया है जिनकी भौतिक और आत्मिक प्रगति के लिए नितान्त आवश्यकता रहती है ।
चक्रवेधन, चक्रशोधन, चक्र परिष्कार, चक्र जागरण आदि नामों से बताये गये विवेचनों एवं विधानों में कहा गया है कि इस प्रयास से अदक्षताओं एवं विकृतियों का निराकरण होता है । जो उपयुक्त है उसकी अभिवृद्धि का पथ प्रशस्त होता है । सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन, दुष्प्रवृत्तियों के दमन में यह चक्रवेधन विधान कितना उपयोगी एवं सहायक है इसकी चर्चा करते हुए शारदा तिलक ग्रंथ के टीकाकार ने 'आत्म विवेक' नामक किसी साधना ग्रंथ का उदाहरण प्रस्तुत किया है । कहा गया है कि-
गुदलिङान्तरे चक्रमाधारं तु चतुर्दलम् ।
परमः सहजस्तद्वदानन्दो वीरपूर्वकः॥
योगानन्दश्च तस्य स्यादीशानादिदले फलम् ।
स्वाधिष्ठानं लिंगमूले षट्पत्रञ्त्र् क्रमस्य तु॥
पूर्वादिषु दलेष्वाहुः फलान्येतान्यनुक्रमात् ।
प्रश्रयः क्रूरता गर्वों नाशो मूच्छर् ततः परम्॥
अवज्ञा स्यादविश्वासो जीवस्य चरतो धु्रवम् ।
नाभौ दशदलं चक्रं मणिपूरकसंज्ञकम् ।
बुधवार, 29 दिसंबर 2021
लीलावती ग्रंथ Vadik math ke सुप्रसिद्ध ग्रंथ के निर्माण की भूमिका और भास्कराचार्य की पुत्री एवं कॉल का योगदान
सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...
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यह करवा रहे हैं वैज्ञानिक जो कभी इन जानवरों ने भी करना नहीं चाहा, #भगवान बनना चाहता है #इंसान।। यह सिंह (टाइगर) और बब्बर शेर का वर्ण स...
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गलती होने पर कान क्यों पकड़ते हैं गौतम, वसिष्ठ, आपस्तंब धर्मसूत्रों और पाराशर स्मृति सहित अन्य ग्रंथों में ज्ञान की कई बातें बताई गई हैं। इन ...
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शिष्य गुरु का चयन नहीं करता अपितु गुरु शिष्य का चयन स्वयं करता हैं। शिष्य अपने अंदर स्वार्थ लेकर गुरु ढूंढेगा तो उसे केवल कालनेमि गुरु म...


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