ईज ऑफ़ डुइंग बिजनेस' कैसे किया जाता है
1983 में यूनिलीवर को मरकरी (पारा) के थर्मामीटर बनाने वाली अपनी न्यूयॉर्क की फैक्ट्री वातावरण को नुकसान पहुँचाने की वजह से बन्द करनी पड़ी। पर वही फैक्ट्री उठ कर आ गई कोडाइकनाल में क्योंकि हमारी सरकारें 'ईज ऑफ़ डुइंग बिजनेस' में पहले से ही यकीन करती आई हैं। 2001 में पास के जंगलों-नदी को हुए भरी नुकसान की वजह से यह फैक्ट्री बन्द करनी पड़ी और यूनिलीवर ने माना कि उसने इन सालों में 13 क्विंटल मरकरी (जोर का झटका लगेगा लेकिन सच है) वातावरण में छोड़ा था। इसको ऐसे समझिये कि मरकरी एक ऐसा खतरनाक जहर है जिसका अगर 1 ग्राम प्रतिवर्ष 20 वर्ष तक वातावरण में छोड़ा जाये तो एक 20 एकड़ की झील इतनी जहरीली हो जाएगी कि उसकी मछलियां खाने लायक न रहेंगी।
इस फैक्ट्री को अब तक पूरी तरह साफ़ नहीं किया गया है और मरकरी इससे अभी भी रिस रहा है। इलाके की आबादी इसकी सफाई की मांग कर रही है। 2002 में यूनिलीवर ने कहा था कि वह इतनी सफाई के लिए राजी है कि 1 किलोग्राम मिटटी में 10 मिलीग्राम मरकरी ही बचे, जबकि खुद इसके अपने मुख्यालय वाले लन्दन में 1 किग्रा मिटटी में 1 मिग्रा मरकरी को ही सुरक्षित माना गया है। लेकिन 2007 में यह एक भाड़े के संस्थान National Environmental Engineering Research Institute (NEERI) की रिपोर्ट ले आई कि 20-25 मिग्रा मरकरी रहने से भी काम चलेगा। इस संस्थान के भाड़े के 'विशेषज्ञों' के अनुसार ज्यादा सख्त कायदे से कंपनी को होने वाले नुकसान को भी ध्यान में रखना जरुरी है! सच बात है पूंजीवादी व्यवस्था में मुनाफे के सामने आम लोगों की जिंदगी-सेहत की क्या कीमत! लेकिन स्थानीय जनता और विधायक के विरोध पर तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 3 वैज्ञानिकों से मशविरा किया तो उन्होंने कंपनी के दावे को पूरे तरह से गलत ठहराया। कंपनी फिर भी मद्रास हाईकोर्ट में 20 मिग्रा से ज्यादा सफाई न करने का मुक़दमा लड़ती रही।
अब आई बारी मोदी जी के 'मेक इन इण्डिया' के लिए 'ईज ऑफ़ डुइंग बिजनेस' करने की| तब के पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने 29 दिसंबर 2014 को एक पत्र लिखा जो 12 जुलाई 2015 को कंपनी के दावे के समर्थन में अदालत में भी पेश किया गया है। मंत्री जी कहते हैं कि उनके मंत्रालय ने इस पर पूरा वैज्ञानिक मंथन कर लिया है, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड व उनके मंत्रालय की ही साइंटिफिक एक्स
1983 में यूनिलीवर को मरकरी (पारा) के थर्मामीटर बनाने वाली अपनी न्यूयॉर्क की फैक्ट्री वातावरण को नुकसान पहुँचाने की वजह से बन्द करनी पड़ी। पर वही फैक्ट्री उठ कर आ गई कोडाइकनाल में क्योंकि हमारी सरकारें 'ईज ऑफ़ डुइंग बिजनेस' में पहले से ही यकीन करती आई हैं। 2001 में पास के जंगलों-नदी को हुए भरी नुकसान की वजह से यह फैक्ट्री बन्द करनी पड़ी और यूनिलीवर ने माना कि उसने इन सालों में 13 क्विंटल मरकरी (जोर का झटका लगेगा लेकिन सच है) वातावरण में छोड़ा था। इसको ऐसे समझिये कि मरकरी एक ऐसा खतरनाक जहर है जिसका अगर 1 ग्राम प्रतिवर्ष 20 वर्ष तक वातावरण में छोड़ा जाये तो एक 20 एकड़ की झील इतनी जहरीली हो जाएगी कि उसकी मछलियां खाने लायक न रहेंगी।
इस फैक्ट्री को अब तक पूरी तरह साफ़ नहीं किया गया है और मरकरी इससे अभी भी रिस रहा है। इलाके की आबादी इसकी सफाई की मांग कर रही है। 2002 में यूनिलीवर ने कहा था कि वह इतनी सफाई के लिए राजी है कि 1 किलोग्राम मिटटी में 10 मिलीग्राम मरकरी ही बचे, जबकि खुद इसके अपने मुख्यालय वाले लन्दन में 1 किग्रा मिटटी में 1 मिग्रा मरकरी को ही सुरक्षित माना गया है। लेकिन 2007 में यह एक भाड़े के संस्थान National Environmental Engineering Research Institute (NEERI) की रिपोर्ट ले आई कि 20-25 मिग्रा मरकरी रहने से भी काम चलेगा। इस संस्थान के भाड़े के 'विशेषज्ञों' के अनुसार ज्यादा सख्त कायदे से कंपनी को होने वाले नुकसान को भी ध्यान में रखना जरुरी है! सच बात है पूंजीवादी व्यवस्था में मुनाफे के सामने आम लोगों की जिंदगी-सेहत की क्या कीमत! लेकिन स्थानीय जनता और विधायक के विरोध पर तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 3 वैज्ञानिकों से मशविरा किया तो उन्होंने कंपनी के दावे को पूरे तरह से गलत ठहराया। कंपनी फिर भी मद्रास हाईकोर्ट में 20 मिग्रा से ज्यादा सफाई न करने का मुक़दमा लड़ती रही।
अब आई बारी मोदी जी के 'मेक इन इण्डिया' के लिए 'ईज ऑफ़ डुइंग बिजनेस' करने की| तब के पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने 29 दिसंबर 2014 को एक पत्र लिखा जो 12 जुलाई 2015 को कंपनी के दावे के समर्थन में अदालत में भी पेश किया गया है। मंत्री जी कहते हैं कि उनके मंत्रालय ने इस पर पूरा वैज्ञानिक मंथन कर लिया है, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड व उनके मंत्रालय की ही साइंटिफिक एक्स
