बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

महाशिवरात्रि जो राष्ट्र व धर्म विरोधी षड्यंत्रकारीयो को मौन कर देती है

   


  निर्वाण-षटकम्’ ( आदिशंकराचार्य द्वारा लिखित)

मनो बुद्धि अहंकार चित्तानि नाहं
न च श्रोत्र जिव्हे न च घ्राण नेत्रे |
न च व्योम भूमि न तेजो न वायु:
चिदानंद रूपः शिवोहम शिवोहम ||1||

न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायुः
न वा सप्तधातु: न वा पञ्चकोशः |
न वाक्पाणिपादौ न च उपस्थ पायु
चिदानंदरूप: शिवोहम शिवोहम ||2||

न मे द्वेषरागौ न मे लोभ मोहौ
मदों नैव मे नैव मात्सर्यभावः |
न धर्मो नचार्थो न कामो न मोक्षः
चिदानंदरूप: शिवोहम शिवोहम ||3||

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खं
न मंत्रो न तीर्थं न वेदों न यज्ञः |
अहम् भोजनं नैव भोज्यम न भोक्ता
चिदानंद रूप: शिवोहम शिवोहम ||4||

न मे मृत्युशंका न मे जातिभेद:
पिता नैव मे नैव माता न जन्म |
न बंधू: न मित्रं गुरु: नैव शिष्यं
चिदानंद रूप: शिवोहम शिवोहम ||5||

अहम् निर्विकल्पो निराकार रूपो
विभुव्याप्य सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम |
सदा मे समत्वं न मुक्ति: न बंध:
चिदानंद रूप: शिवोहम शिवोहम ||6||

[मैं मन, बुद्धि, अहंकार और स्मृति नहीं हूँ, न मैं कान, जिह्वा, नाक और आँख हूँ। न मैं आकाश, भूमि, तेज और वायु ही हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ…]

[न मैं मुख्य प्राण हूँ और न ही मैं पञ्च प्राणों (प्राण, उदान, अपान, व्यान, समान) में कोई हूँ, न मैं सप्त धातुओं (त्वचा, मांस, मेद, रक्त, पेशी, अस्थि, मज्जा) में कोई हूँ और न पञ्च कोशों (अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय, आनंदमय) में से कोई, न मैं वाणी, हाथ, पैर हूँ और न मैं जननेंद्रिय या गुदा हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ…]

[न मुझमें राग और द्वेष हैं, न ही लोभ और मोह, न ही मुझमें मद है न ही ईर्ष्या की भावना, न मुझमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ही हैं, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ…]

[न मैं पुण्य हूँ, न पाप, न सुख और न दुःख, न मन्त्र, न तीर्थ, न वेद और न यज्ञ, मैं न भोजन हूँ, न खाया जाने वाला हूँ और न खाने वाला हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ…]

[न मुझे मृत्यु का भय है, न मुझमें जाति का कोई भेद है, न मेरा कोई पिता ही है, न कोई माता ही है, न मेरा जन्म हुआ है, न मेरा कोई भाई है, न कोई मित्र, न कोई गुरु ही है और न ही कोई शिष्य, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ…]

[मैं समस्त संदेहों से परे, बिना किसी आकार वाला, सर्वगत, सर्वव्यापक, सभी इन्द्रियों को व्याप्त करके स्थित हूँ, मैं सदैव समता में स्थित हूँ, न मुझमें मुक्ति है और न बंधन, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ…।

ॐ नम: शिवाय
हर हर महादेव

पृथ्वी पर
#शिव के प्रतिनिधि हैं..!!
पेड़-पौधे
-------------
वनस्पति उपासना यानि पेड़-पौधों की पूजा हमारे संस्कृति का मुख्य अंग है... यह पद्घति अकारण नहीं शुरू हुई है...पेड़ों से हमें आक्सीजन, भोजन और जल तीनों मिलता है और इन्हीं से हमारा जीवन चलता है...।
ऐतरेय और कौषितकि ब्राह्मïण ग्रंथ में "प्राणौ वै वनस्पति:"। (ऐतरेय 2.4, कौषितकि 12.7) कहा गया है... जहां वनस्पतियों से हमारे जीवन को संचालित करने वाले तत्व मिलते हैं, वहीं वनस्पतियां ऐसे तत्वों को भी समाप्त करती हैं, जो हमारे जीवन को नुकसान पहुंचाते हैं..... इसीलिये वनस्पतियों को पृथ्वी पर शिव की प्रतिनिधि माना जाता हैं, जोकि कार्बन डाइ आक्साइड का हलाहल पीकर हमें जीवन अमृत आक्सीजन देती हैं...।
शुक्लयजुर्वेद का एक उदाहरण है- "नमो वृक्षेभ्यो हरिकेशेभ्य:।
क्षेत्राणां पतये नम:।
वनानां पतये नम:।
वृक्षाणां पतये नम:।
ओषधीनां पतये नम:।
कक्षाणां पतये नम:"। (यजुर्वेद 16.17.18)।
इसमें शिव को वृक्ष, वन, ओषधियों इत्यादि का स्वामी का कहा गया है.... देवताओं को उनके गुणानुरूप जीवों और पदार्थों का स्वामी नियुक्त किया गया है... यदि शिव वनस्पतियों के स्वामी कहे गये हैं तो इसका मतलब यह हुआ कि वनस्पतियों का गुण भी शिव जैसा होना चाहिये... शिव का शिवत्व बहुत व्यापक है....शिव का मलतब होता है सुंदर और वनस्पतियां भी पृथ्वी का श्रृंगार करती हैं... सुंदरता बढ़ाती हैं.. इस तरह से वनस्पतियों का व्यवहार उनको शिव का प्रतिनिधि साबित कर देता है.. वहीं दूसरी ओर शिव विश्वपूज्य व सर्वपूज्य इसलिये हुये क्योंकि उन्होने #विष पीकर संसार की रक्षा की और अमृत अन्य के लिये छोड़ दिया... विष पीकर अमृत छोड़ देना भी शिवत्व है... हमारे #पर्यावरण में वनस्पतियों की भूमिका शिव सरीखी है....। वनस्पतियां भी कार्बन डाइ आक्साइड जैसे विष को ग्रहण कर हमारे लिये आक्सीजन जैसी अमृत छोड़ देती हैं... यह बताने की आवश्कता नहीं है कि आक्सीजन के बिना जीवन की परिकल्पना नहीं की जा सकती.. एक बात और समझने की है, ओषधियां भी पेड़-पौधों से ही मिलती हैं.. ओषधियों के बारे में हमारे ग्रंथों में कहा गया है कि इनका जन्म देव के रौद्र रूप से हुआ है, इसलिये ओषधियां दोषों और विकारों को समाप्त करने में सक्षम है.. यह भी शिव का ही गुण हैं... सरल सी बात है कि वही शिव का जो स्वभाव है, वनस्पतियां का भाव है... ऐसे विचार कीजिये कि हमारे आस पास कितने ही शिव हैं...।

वेदों में पर्वत, जल, वायु, वर्षा और अग्नि को पर्यावरण का शोधक कहा है और इन सभी पर्यावरण शोधकों का मूल तो वनस्पतियां ही हैं.... वनस्पतियों के कम होने से सबसे पहला प्रभाव आक्सीजन के स्तर पर पड़ता है...।
वेदों में दो प्रकार के वायु की चर्चा है प्राणवायु और अपान वायु...। प्राणवायु से जीवन का संचार होता है और अपानवायु से सारीरिक दोषों का निवारण होता है....। उदाहरण देखें-
"आ वात वाहि भेषजं वि वात वाहि यद् रप:।
त्वं हि विश्व भेषज देवानां दूत ईयसे।।"
(अथर्ववेद 4.13.3)
वायु को विश्वभेषज कहा गया है... यानि की वल्र्ड डाक्टर...अथर्ववेद में वायु और सूर्य को रक्षक के रूप में वंदना की गई है.. उदाहरण देखें-"युवं वायो सविता च भुवनानि रक्षय:।"
(अथर्ववेद 4,24,3)।
अथर्ववेद शुद्घ वायु को औषधि मानता है... ताजी हवा शरीर में प्रवेश करते ही हम तरोताजा हो जाते हैं... बहुत से रोग बहुत से कष्ट ऐसे ही कट जाते हैं..लेकिन जब हमने पेड़-पौधों के महत्व को नकार दिया और हमें संकट से बचाने वाली वनस्पतियों के लिये हम संकट बने तो पर्यावरण का तंत्र खराब हो गया... हम आज जहर पीने को मजबूर हैं... वेदों में प्रदूषण के कारकों को क्रव्याद यानि जीव को सुखाकर निर्जीव करने वाला कहा गया है.. उदाहरण देखें-
"ये पर्वता: सोमपृष्ठा: आप:।
वात: पर्जन्य आदग्निनस्ते क्रव्यादमशीशमन।"
(अथर्ववेद 3.21.10)
तो वहीं यह भी कहा गया है कि यह वनस्पतियों के अभाव में पनपते हैं... जहां आज हम उत्सर्जन कम करने पर जोर दे रहे हैं तो वहीं वेदों ने शोधन बढ़ाने पर जोर दिया है... अथर्ववेद में तमाम ऐसे वनस्पतियों की सूची मिलती है जोकि पर्यावरण के शोध के रूप में काम करते हैं... इसमें #अश्वत्थ (पीपल),कुष्ठ (कठ), भद्र और चीपुत्र (#देवदार और चीड़), #प्लक्ष (#पिलखन और #पाकड़), न्यग्रौध (बड़), खदिर (खैर), #उदुम्बर (गूलर), अपामार्ग (चिरचिरा), और #गुग्गुल (गूगल) हैं...।
अथर्ववेद में कहा गया है कि इन वृक्षों से वायु शुद्घ होती है और पर्यावरण का संतुलन सही बना रहता है... हमारे प्राचीन साहित्य में वृक्षारोपण को बल दिया गया है.. अब तक हमने कई प्रथायें सुनी हैं कि पुत्र होने पर वहां एक वृक्ष रोपा जाता है... जबकि हम नहीं जानते कि मस्त्य पुराण में #दशपुत्रसमोद्रुम:' कहकर वृक्षों का महत्व बताया गया है...। दशपुत्रसमोद्रुम: का मतलब है, एक वृक्ष दश पुत्रों के समान है... ऐसा उदाहरण विश्व के अन्य साहित्यकोश से या संस्कृति से नहीं मिल सकता...।

शिव सदा कल्याण करें..।।
साभार- डॉ.अरुण के.पांडे

महाशिवरात्रि अर्थात् अमान्त माघ मास की कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि या पूर्णिमान्त फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी तिथि पर की जाने वाली पूजा, व्रत, उत्सव तथा जागरण।
शिवधर्म ग्रन्थ में शिवरात्रि पर रामलीला खेले जाने की भी बात कही गई है।
कश्मीर में शिवरात्रि हररात्रि है जो बिगड़कर हेरात कही जाती है, विगत वर्ष बंदीपुरा संबल में शिव मन्दिर की सफाई, जलाभिषेक तथा प्रसाद में अखरोट वितरण भी वहाँ के मुस्लिमों ने किया था।
कहते हैं कि भोलेनाथ और उमा पार्वती का विवाह इसी तिथि को हुआ था। खगोलीय दृष्टि से सूर्य एवं चन्द्रमा के मिलन की रात्रि है तथा संवत्सर की गणना का आधार माघ अमावस्या रही है, काल गणना के हेतु से यह त्योहार चतुर्दशी से तीन दिन पहले से लेकर दो दिन बाद प्रतिपदा तक चलता था।
भारतवर्ष में धनिष्ठा नक्षत्र में उत्तरायणारम्भ होने के समय कालगणना नियम बने थे, एक हजार वर्षों में अयन सरक कर श्रवण में जा पहुँचा था। यह एक बड़ा कारण 'श्रवण' का अनेक त्योहारों से जुड़े होने में है।
इस कारण महाशिवरात्रि को कुछ ग्रन्थ त्रयोदशी तिथि से संयुक्त प्रदोष व्यापिनी चतुर्दशी तिथि ग्रहण कर मनाये जाने की बात करते हैं, इसमें कारण 'नक्षत्र का प्राधान्य' है।
चूँकि तीज-त्योहारों के मनाये जाने सम्बन्धी नियम निर्देश बहुत पहले निश्चित किये गये थे इस कारण अब कालगणना सम्बन्ध नहीं रहा।
काल के भी ईश्वर महाकालेश्वर की जय बोलते हुये उत्सव मनाइये, आशुतोष तो अवढर दानी हैं ही किसी को भी निराश नहीं करते हैं। मन्दिरों में काँच न फैलायें और न बहुत अधिक फूल पत्तियाँ ले जाना आवश्यक है केवल जल चढ़ा देने से भी शिव उतने ही प्रसन्न होते हैं।
अजय कर्मयोगी
आपको "महाशिवरात्रि"की हार्दिक शुभकामनाएँ !

 शिव
का अर्थ
है
कल्याणकारी।
शिव
ने
सृष्टि के
कल्याण
के
लिए
ही समुद्रमंथन से उत्पन्न विष को अपने कंठ में
उतारा और नीलकंठ बन गए। शिव का जो कल्याण
करने का भाव है, वही शिवत्व कहलाता है। शिवोहम्
का उद्घोष वही व्यक्ति कर सकता है, जो अपने
भीतर इस शिवत्व को धारण कर लेता है। उसे अपने
आचार-व्यवहार में उतार लेता है।

 महाशिवरात्रि पर
शिव की उपासना तभी सार्थक होती है, जब हम
दूसरों के कल्याण के लिए विष पीने (मुश्किलें उठाने)
को भी उद्यत हो जाएं। इसी तरह हम शिवत्व
प्राप्त कर सकते हैं।

 शिव जी को त्रयंबक
भी कहा जाता है। त्रयंबकं यजामहे
सुगंधिपुष्टि वर्धनम्। उर्वारुकमिव बंधनात्
मृत्योर्मुक्षीय मामृतात।। त्रयंबक गंगा, यमुना और
सरस्वती की त्रिवेणी है, जिसके देवता महादेव हैं।
अत:  कुंभ पर अमृत प्राप्ति के लिए हम
शिवरात्रि को महादेव शिव के
प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं।

फाल्गुन मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी में उपवास,
रात्रि-जागरण और शिवार्चन करने का विधान है।
उपवास का तात्पर्य मात्र भोजन का त्याग नहीं है।

वराहोपनिषत् के अनुसार इष्टदेव (शिव) के समीप
वास ही उपवास कहा जाता है। भविष्यपुराण
का कहना है कि उपवास से तन और मन, दोनों शुद्ध
होते हैं। देवीपुराण में कहा गया है- भगवान (शिव)
का ध्यान, पूजन स्तोत्र-पाठ आदि के साथ वास
(रहना) करना ही सच्चा उपवास है। उपवास से
इंद्रियों को संयम के अनुशासन में लाया जाता है।

ईशान संहिता के अनुसार फाल्गुन-कृष्ण-
चतुर्दशी की अर्धरात्रि में शिवलिङ्ग सर्वप्रथम
प्रकट हुआ था। अनेक पुराणों में इस तिथि को शिव-
शक्ति के महामिलन की तिथि बताया गया है। इस
कारण शिवरात्रि के दिन शिव-
पार्वती का विवाहोत्सव बड़े धूमधाम से
मनाया जाता है। सही मायनों में शिवरात्रि शिवत्व
प्रदान करती है।

 शिवरात्रि के आध्यात्मिक संदेश
को जानना भी आवश्यक है।
शिव का माहात्म्य
त्रिदेव ब्रह्मा-विष्णु-महेश त्रिगुणात्मक सृष्टि के
संचालक माने जाते हैं। ये तीनों सृष्टि की रचना,
पालन और संहार करने वाली परब्रहम की तीन
विभूतियां हैं। इनमें महेश वेदों में रुद्र के नाम से
पुकारे गए हैं। रुद्र के कई अर्थ हैं- उग्र, महान,
दुखनाशक, संहारक, दुष्टों को दंड देने वाला, भयंकर,
पापियों को रुलाने वाला, धर्म का बोध कराने वाला,
प्राणदाता, संसार-सागर से तारने वाला आदि।

रुद्रोपासना यजुर्वेद के रुद्राध्याय में है। इसमें
वेदादि समस्त शास्त्रों का निचोड़ समाहित है।
अथर्वशिखोपनिषद् का कथन है- रुद्रो वै
सर्वा देवता: यानी रुद्र सर्वदेवमय हैं। बौधायनसूत्र
इससे आगे बढ़कर कहता है-रुद्रो ह्ये वैतत्सर्वम
यानी रुद्र सर्व-स्वरूप है ।

शिवपुराण कहता  है-
प्रणवो वाचकस्तस्य शिवस्य परमात्मन: अर्थात्
प्रणव (ॐ) परमेश्वर शिव का द्योतक है।
लिङ्गपुराण भी इसका समर्थन करता है- शम्भो:
प्रणववाच्यस्य यानी ॐकार वाचक है और शम्भु
(शिव) वाच्य हैं। प्रणव (ॐ) स्वरूप होने से शिव के
विराट रूप में अ-ब्रंा, उ-विष्णु और म-महेश
समा जाते हैं। इसी कारण इन्हें शैव महादेव कहकर
पुकारते हैं। जाबाल्य उपनिषद में शिव को पाप नाशक
तथा श्वेताश्वतरोपनिषद् इन्हें
मुक्तिदाता कहा गया है।
शास्त्रों का उद्घोष है- शेते तिष्ठति सर्व जगत्
यस्मिन् स: शिव: शम्भु विकाररहित:। अर्थात
जिसमें सारा जगत् शयन करता है, जो विकारों से
रहित है, वह शिव है। शिव का शाब्दिक अर्थ है-
कल्याणकारी, सुखदाता, मंगलदायक, विश्वनाथ
आदि। वस्तुत: शिव
परमात्मा या ब्रंा का ही नामांतरण है,
जो सृष्टि का सृजन, पालन और संहार अपनी त्रि-
विभूतियों (त्रिदेव) के माध्यम से करता है।

विद्येश्वर संहिता में ऋषि-मुनियों के पूछने पर
सूतजी उन्हें शिव-तत्त्व का रहस्य बताते हुए कहते
हैं कि एक मात्र भगवान शिव ही ब्रह्मरूप होने के
कारण निष्कल (निराकार) तथा साथ ही रूपवान होने
से वे सकल साकार भी हैं। शिवजी के निर्गुण-
निराकार स्वरूप की पूजा शिवलिङ्ग के माध्यम से
होती है।

शिवलिङ्ग इनके निराकार स्वरूप का प्रतीक
है। शिवलिङ्ग की आकृति ब्रह्म की द्योतक है,
इसीलिए वृहदधर्मपुराण में लिखा है कि शिवलिङ्ग में
सभी देवताओं का पूजन किया जा सकता है-
शिवलिङ्गेपि सर्वेषां देवानां पूजनं भवेत्।
सर्वलोकमये यस्माच्छिवशक्तिर्विभु: प्रभु:॥
शिवलिङ्ग में सारे लोक समाहित हैं। शिव-
शक्ति का युग्म-स्वरूप होने से शिवलिङ्ग सर्वपूज्य
है।

लिङ्गपुराण में कहा गया है कि शिवलिङ्ग
की अर्चना से समस्त देवी-देवताओं की पूजा स्वत:
संपन्न हो जाती है। शिवजी सकल (साकार) भी हैं,
इसलिए उनकी पूजा का आधारभूत विग्रह साकार-रूप
में प्राप्त होता है। शिवजी का साकार विग्रह उनके
सगुण-साकार स्वरूप का प्रतीक है।

 साक्षात्
परब्रह्म परमेश्वर होने से शिवजी का पूजन उनके
शिवलिङ्ग तथा विग्रह (मूर्ति), दोनों के माध्यम से
होता है।

रात्रि का तात्पर्य
रात्रि का शाब्दिक अर्थ है- सुख प्रदान करने वाली।
इस आनंददायिनी रात्रि की स्तुति ऋग्वेद के
रात्रिसूक्त में की गई है। उसका सार-संक्षेप यह है-
ये रात्रिरूपा देवी अपने उत्पन्न किए हुए जगत के
जीवों के शुभाशुभ कर्मो को विशेष रूप से देखती हैं
और उनके अनुरूप फल की व्यवस्था करने के लिए
अनेक विभूतियों को धारण करती है। ये
ज्ञानमयी ज्योति से जीवों के अज्ञानरूपी अंधकार
को समाप्त कर देती हैं।

 मार्कडेय पुराण में वर्णित
देवी-माहात्म्य के अंतर्गत
रात्रि को आध्याशक्ति का स्वरूप मानकर
उनका स्तवन किया गया है।

अत: जब शिव का रात्रि रूपीशक्ति से संयोग
होता है, तब शिवरात्रि का निर्माण होता है।

  ||●|| हर हर महादेव||●||

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...