शुक्रवार, 13 अप्रैल 2018




संभवामि युगे युगे तो भगवानने खूदके लिए कहा है लेकिन वो बात सच होती दिखती नही है, क्योंकि आज उनकी सर्वाधिक जरूरत है और उनका कोइ अतापता नही है ।
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भगवान न सही लेकिन उनके प्रतिनिधि जरूर आते रहते है ।
२०० साल पहले एक राजपूत का बेटा संत दादा मेकरण कच्छ की भूमि पर आए थे, आज सौराष्ट्र की भूमि पर पटेल का बेटा देवाभाई मानो मेकरण बन के आ गए हैं ।
मेकरण दादाने गुजरात और सिन्ध को जोडते रास्ते जो कच्छ के रण से गुजरते थे उसी रण में अपनी झोपडी बनाकर रहते थे और भूले भटके राहदारियों के लिए पानी और बाजरे की रोटी से भरी कावड लेकर दूर दूर तक घुमते रहते थे । खूद का शरीर चला तब तक कावड लेकर खूद जाते थे, शारीर ने जवाब दे दिया तो उनका काम उनके पालतु गधे और कुत्ते ने उठा लिया था । अधिक जानकारी के लिए दादा की ऐतिहासिक कहानी राष्ट्रिय शायर झवेरचन्द मेघाणी लिखी है जीसका यहां लिन्क दे रहा हूं ।
https://www.facebook.com/…/a.831176416893…/867093879968431/…
देवाभाई साधन संपन्न किसान है । उनक कहना है कि मेरे जीवनकी संघर्ष रूपी प्यास भोलेनाथने बुजाई है अब में जनता की प्यास बुजाने निकल पडा हूं, भोएनाथ का ऋण चुका रहा हूं । सौराष्ट्र के गोंडल शहर के धोमधखते ताप में देवाभाई पिछले तीन साल से अपनी सायकल रथ पर 50 जीतनी मशक (पानी की थेली ) रखकर शहर भर में घुमते हैं और प्यासे राहदारियों को फोगट में थंडा पानी पीलाते हैं । खूद सुखी किसान है, काफी जमीन और मिल्कत है, वो कहते हैं भगवानने उनके जीवन की सभी जरूरियात पूरी की है, अब वो जनसेवा करके बाकी का जीवन बीताना चाहते हैं ।
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देवाभाईका पानी के लिए जीवन मंत्र (सुत्र) है, "ठंडा, मिठा और फोगट" । ये सुत्र तो सरकार को याद होना चाहिए लेकिन २० रुपिए में बोटल बीकवाने वाली सरकार ये याद भी क्यों करें ! हर स्टेशन पर फोगट के प्याउ होते थे वो भी गायब हो गए, या है तो उसमें पानी नही भरते, या पानी है भी तो फॅशन जनता की जेब में घुसकर नाचती है और बोतल का २० रुपिया निकाल ही लेती है ।
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"ठंडा, मिठा और फोगट", इस सुत्र के साथ देवाभाई सुबह ७ बजे निकल जाते हैं और शाम सात बजे तक 2000 लीटर पानी राहदारियों को पिला देते हैं । गोंडल से पसार होते बसवाले भी देवाभाई को देखकर रुक जाते है और अपने मुसाफिरों को पानी पिलाते हैं और उनकी खाली बोटलों को भरवाते हैं । बिलकुल मुफ्त में ।
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गोंडल में और सौराष्ट्र के पूरे क्षेत्र में पानी की तंगी है । देवाभाई को 4 कि.मी दूर रहे कुएं तक जाना पडता है । दिन में तीन से चार बार जाना पडता है । सायकल पर पानी लादकर हर दिन 25 कि.मी चलना आसान नही होता है । देवाभाई की सेवा से पूरे शहर में उनका नाम हो गया है, बच्चा बच्चा जानता है कि पानीवाले देवाभाई कौन है । वैसे तो सेवाभावि लोग पानी के प्याउ बनवाते थे/हैं, देवाभाई चलता फिरता प्याउ है ।
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पिछले 25 साल से चैत्री नवरात्री में देवाभाई रामजी मंदिर पर बीना कोइ पैसे लिए छास वितरण करते आए हैं । नव दिन तक गांव में से दुध एकत्रित करते हैं और खूद छास बनाते हैं ।
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असली या नकली, सेवा के अनेक क्षेत्र है .....उनमे से सही सेवक, या प्रधान सेवक को ढुंढना ढेर में सुई ढुंढना बराबर है...

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...