"सभी मित्रों को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामना कैसे दूं" ------------------
लेकिन अफसोस ये दिन हम ऐसे व्यक्ति के जन्मदिन पर मनाते हैं जो शिक्षक के नाम पर कलंक है,
जी हाँ सही सुना #सर्वपल्ली राधाकृष्णन शिक्षक के नाम पर कलंक हैं ....
वैसे ही जैसे नेहरू #बालदिवस के लिए कंलक हैं।
इनके बहुत सारे कारनामे हैं लेकिन एक झूठ का - जाल बुनकर - गाँधी की तरह ही - इनको भी -समाज में "महान व्यक्ति" स्थापित कर दिया गया है। -----------------
इनका सबसे घिनौना काम कि इन्होंने अपने ही विद्यार्थी की लिखी पुस्तक अपने नाम से प्रकाशित करवाई थी ....
छात्र #जदुनाथ सिन्हा ने जब अपनी थीसिस जमा की ....
तो चैकिंग के लिए प्रोफेसर राधाकृष्णन के पास आई ....
और इन्होंने उसको अपने पास ही रख लिया,
तथा 2 साल बाद इंग्लैंड से हूबहू अपने नाम से #इंडियन_फिलॉसफी नाम देकर छपवा दिया .....
जिसके लिए इनको बहुत वाहवाही प्रशंसा और शौहरत मिली और ....
जदुनाथ ने जब कोर्ट में केस किया .....
तो उस गरीब को डरा धमका के चुप करवा दिया।
क्योंकि धूर्त और मक्कार लोग बहुत अच्छी तरह से जानते हैं लोगों को कैसे दबाया जाता है .....
------------------
दूसरा घिनौना काम था इनका कि जब ये 1952 में रूस में राजदूत थे ....
तो इन्होंने नेताजी बोस से मुलाकात की थी....
और नेहरू से रिहाई की बात की ....
लेकिन नेहरू ने चुप रहने को कहा ....
और ये चुप हो गए .....
बदले में 1952 में ही भारत बुलाकर उपराष्ट्रपति का पद मिल गया।
बात यहीं खत्म न हुई .....
1954 में इनको #भारतरत्न भी दिया गया.....
बात यहाँ रुकने वाली कहाँ थी ....
क्योंकि नेहरू की मजबूरी बन गयी थी इनको खुश रखना .... क्योंकि नेहरू जानते थे देश नेताजी से कितना प्यार करता है .....
अगर देश को पता चल गया नेताजी जिंदा हैं रूस की जेल में ....
तो देश में भूचाल आ जायेगा लोग नेताजी को छुड़ाने के लिए जी जान लगा देंगे।
बात यहाँ खत्म न हुई ....
इनको 1962 में राष्ट्रपति का पद भी मिला .....
और इस महत्वाकाँक्षी धूर्त व्यक्ति ने राष्ट्रपति बनते ही 1962 में अपने नाम से अपने ही जन्मदिन को #शिक्षकदिवस घोषित कर दिया।
लेकिन अफसोस ये दिन हम ऐसे व्यक्ति के जन्मदिन पर मनाते हैं जो शिक्षक के नाम पर कलंक है,
जी हाँ सही सुना #सर्वपल्ली राधाकृष्णन शिक्षक के नाम पर कलंक हैं ....
वैसे ही जैसे नेहरू #बालदिवस के लिए कंलक हैं।
इनके बहुत सारे कारनामे हैं लेकिन एक झूठ का - जाल बुनकर - गाँधी की तरह ही - इनको भी -समाज में "महान व्यक्ति" स्थापित कर दिया गया है। -----------------
इनका सबसे घिनौना काम कि इन्होंने अपने ही विद्यार्थी की लिखी पुस्तक अपने नाम से प्रकाशित करवाई थी ....
छात्र #जदुनाथ सिन्हा ने जब अपनी थीसिस जमा की ....
तो चैकिंग के लिए प्रोफेसर राधाकृष्णन के पास आई ....
और इन्होंने उसको अपने पास ही रख लिया,
तथा 2 साल बाद इंग्लैंड से हूबहू अपने नाम से #इंडियन_फिलॉसफी नाम देकर छपवा दिया .....
जिसके लिए इनको बहुत वाहवाही प्रशंसा और शौहरत मिली और ....
जदुनाथ ने जब कोर्ट में केस किया .....
तो उस गरीब को डरा धमका के चुप करवा दिया।
क्योंकि धूर्त और मक्कार लोग बहुत अच्छी तरह से जानते हैं लोगों को कैसे दबाया जाता है .....
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दूसरा घिनौना काम था इनका कि जब ये 1952 में रूस में राजदूत थे ....
तो इन्होंने नेताजी बोस से मुलाकात की थी....
और नेहरू से रिहाई की बात की ....
लेकिन नेहरू ने चुप रहने को कहा ....
और ये चुप हो गए .....
बदले में 1952 में ही भारत बुलाकर उपराष्ट्रपति का पद मिल गया।
बात यहीं खत्म न हुई .....
1954 में इनको #भारतरत्न भी दिया गया.....
बात यहाँ रुकने वाली कहाँ थी ....
क्योंकि नेहरू की मजबूरी बन गयी थी इनको खुश रखना .... क्योंकि नेहरू जानते थे देश नेताजी से कितना प्यार करता है .....
अगर देश को पता चल गया नेताजी जिंदा हैं रूस की जेल में ....
तो देश में भूचाल आ जायेगा लोग नेताजी को छुड़ाने के लिए जी जान लगा देंगे।
बात यहाँ खत्म न हुई ....
इनको 1962 में राष्ट्रपति का पद भी मिला .....
और इस महत्वाकाँक्षी धूर्त व्यक्ति ने राष्ट्रपति बनते ही 1962 में अपने नाम से अपने ही जन्मदिन को #शिक्षकदिवस घोषित कर दिया।
इनकी एक और महानता ये भी रही .....
कि जब 1931 में अंग्रेज हमारे महान क्रान्तिकारी भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, चंद्रशेखर आज़ाद को मार रहे थे ....
ताकि स्वतंत्रता संग्राम की दबा दिया जाए,
तो दूसरी ओर राधाकृष्णन को "सर" की उपाधि से नवाजा गया था .....
और उसी समय पता नहीं किस बेशर्मी से इन्होंने अंग्रेजों द्वारा दी "सर" की उपाधि स्वीकार भी की थी। ---------------------
राधाकृष्णन जी ने बड़ी कुशलता से वेदांत दर्शन की ऐसी व्याख्या की जो तत्कालीन ईसाइयों को भी अपने अनुकूल लगी .
उदाहरणार्थ उन्होंने चेतना के ५ स्तरों का निम्नानुसार वर्गीकरण किया :
१)The worshippers of the Absolute(ब्रह्म उपासक )
2)The worshippers of the personal God(जीसस पिता God के उपासक )
3)The worshippers of the incarnations like Rama, Kṛiṣhṇa, Buddha ( राम , कृष्ण , बुद्ध आदि अवतारों के उपासक )
4)Those who worship ancestors, deities and sages(पूर्वजों , ऋषियों एवं विविध देवताओं के उपासक :देवी माता , हनुमान जी आदि के उपासक )
5)The worshippers of the petty forces and spirits(प्रेतादिक उपासक )
अब इसमें चतुराई से ईसाइयत को सबसे ऊपर रख दिया गया है और उधर उन्हें वेदांती प्रचारित करने की भी पूरी युक्ति विद्यमान है ,केवल ब्रह्म नाम लेने से .
पर ब्रह्म का उपासक कोई समाज तो होता नहीं , ब्रह्म को जानने वाला तो ब्रह्ममय हो जाता है (ब्रह्मविद ब्रह्मैव भवति ).अतः यह तो अति विरल स्थिति है .
इस युक्ति श्रृंखला द्वारा ईसाइयत को सर्वोपरि रख दिया गया .
सामान्य शिक्षा प्राप्त हिन्दू ब्रह्म का नाम पढ़कर मगन होकर समझेंगे कि हाँ भाई , सर्वोच्च दशा तो वही है .
क्योंकि हिन्दू समाज अति परिपक्व समाज रहा है और वह मर्यादित रहा है अतः दर्शन के प्रसंग में राजनीति उसके लिए विषयांतर है पर ईसाई और मुसलमान तो धर्म दर्शन के नाम पर भी राजनीति ही करते हैं जिन्हें आधुनिक हिन्दू लोग गलत राज्य व्यवस्था द्वारा फैलाये गए अज्ञान के कारण नहीं समझते ...
ऐसे नियोजित छल से वेदांत की दुहाई देकर भारत में ईसाइयत को प्रतिष्ठा दी गयी है और इसमें मुख्य खेल तो विदेशी विद्वानों का था, पर राधाकृष्णन जी उसके एक उपकरण बने .
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन सर्वपल्ली गांवके एक मेधावी छात्र थे।उन्होंने ईसाइयोंके स्कूलऔर ईसाइयोंके ही कॉलेजमें पढ़ाईकी और उनके अधीन ही अध्यापक बने।
वे कभी कांग्रेस में नहीं गए।किसीअन्य ऐसे प्रयास से भीनहीं जुड़े।
वे कम्युनिस्ट और ईसाइयों के सदा निकट रहे और अंग्रेजोंने उन्हें सदा अपना भरोसेमंद पाया।उनका बेटा गोपाल कट्टर नास्तिक और कम्युनिस्ट है।
उन्हें भारतीय दर्शनका प्रकांड विद्वान प्रचारित किया गया।उनकी स्थापनाएं,:
1) पाश्चात्य जैन बौद्ध दर्शन वेदों से पहलेही भारतमें व्यापक था।
2) बादमें वेदका प्रचार हुआ।
3)वेद ईश्वरीय ज्ञान नहीँ हैं,रचयिताओं के कथन हैं।
4)ईसाइयत औऱ वेदान्त का समन्वय होंना चाहिये।
Dr jadunath sinha
जो राधाकृष्णन के स्टूडेंड थे, ने पीएचडी की थीसिस जमा की, वह लंबे समय लंबित रखी।
इस बीच वह copypaste राधाकृष्णन ने अपने नाम से पब्लिश किये और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की
जदुनाथ जो अपनी योग्यता से कलकत्ता यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर अप्पोइन्ट हुए, ने राधाकृष्णनन पर मुकदमा कर दिया।
कैसल में follow-ups करने पर sir Ashutosh Mukharji के बेटे श्यामाप्रसाद मुखर्जी , जो कलकत्ता विश्वविद्यालय जे VC थे, राधाकृष्णन के मित्र, के दबाव में कोर्ट के बाहर समझौता करना पड़ा।
साक्ष्य
Roundtableindia. Co. In
संशोधन संकलन अजय कर्मयोगी
साभार नितिन भदौया रामेश्वर मिश्र
कि जब 1931 में अंग्रेज हमारे महान क्रान्तिकारी भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, चंद्रशेखर आज़ाद को मार रहे थे ....
ताकि स्वतंत्रता संग्राम की दबा दिया जाए,
तो दूसरी ओर राधाकृष्णन को "सर" की उपाधि से नवाजा गया था .....
और उसी समय पता नहीं किस बेशर्मी से इन्होंने अंग्रेजों द्वारा दी "सर" की उपाधि स्वीकार भी की थी। ---------------------
राधाकृष्णन जी ने बड़ी कुशलता से वेदांत दर्शन की ऐसी व्याख्या की जो तत्कालीन ईसाइयों को भी अपने अनुकूल लगी .
उदाहरणार्थ उन्होंने चेतना के ५ स्तरों का निम्नानुसार वर्गीकरण किया :
१)The worshippers of the Absolute(ब्रह्म उपासक )
2)The worshippers of the personal God(जीसस पिता God के उपासक )
3)The worshippers of the incarnations like Rama, Kṛiṣhṇa, Buddha ( राम , कृष्ण , बुद्ध आदि अवतारों के उपासक )
4)Those who worship ancestors, deities and sages(पूर्वजों , ऋषियों एवं विविध देवताओं के उपासक :देवी माता , हनुमान जी आदि के उपासक )
5)The worshippers of the petty forces and spirits(प्रेतादिक उपासक )
अब इसमें चतुराई से ईसाइयत को सबसे ऊपर रख दिया गया है और उधर उन्हें वेदांती प्रचारित करने की भी पूरी युक्ति विद्यमान है ,केवल ब्रह्म नाम लेने से .
पर ब्रह्म का उपासक कोई समाज तो होता नहीं , ब्रह्म को जानने वाला तो ब्रह्ममय हो जाता है (ब्रह्मविद ब्रह्मैव भवति ).अतः यह तो अति विरल स्थिति है .
इस युक्ति श्रृंखला द्वारा ईसाइयत को सर्वोपरि रख दिया गया .
सामान्य शिक्षा प्राप्त हिन्दू ब्रह्म का नाम पढ़कर मगन होकर समझेंगे कि हाँ भाई , सर्वोच्च दशा तो वही है .
क्योंकि हिन्दू समाज अति परिपक्व समाज रहा है और वह मर्यादित रहा है अतः दर्शन के प्रसंग में राजनीति उसके लिए विषयांतर है पर ईसाई और मुसलमान तो धर्म दर्शन के नाम पर भी राजनीति ही करते हैं जिन्हें आधुनिक हिन्दू लोग गलत राज्य व्यवस्था द्वारा फैलाये गए अज्ञान के कारण नहीं समझते ...
ऐसे नियोजित छल से वेदांत की दुहाई देकर भारत में ईसाइयत को प्रतिष्ठा दी गयी है और इसमें मुख्य खेल तो विदेशी विद्वानों का था, पर राधाकृष्णन जी उसके एक उपकरण बने .
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन सर्वपल्ली गांवके एक मेधावी छात्र थे।उन्होंने ईसाइयोंके स्कूलऔर ईसाइयोंके ही कॉलेजमें पढ़ाईकी और उनके अधीन ही अध्यापक बने।
वे कभी कांग्रेस में नहीं गए।किसीअन्य ऐसे प्रयास से भीनहीं जुड़े।
वे कम्युनिस्ट और ईसाइयों के सदा निकट रहे और अंग्रेजोंने उन्हें सदा अपना भरोसेमंद पाया।उनका बेटा गोपाल कट्टर नास्तिक और कम्युनिस्ट है।
उन्हें भारतीय दर्शनका प्रकांड विद्वान प्रचारित किया गया।उनकी स्थापनाएं,:
1) पाश्चात्य जैन बौद्ध दर्शन वेदों से पहलेही भारतमें व्यापक था।
2) बादमें वेदका प्रचार हुआ।
3)वेद ईश्वरीय ज्ञान नहीँ हैं,रचयिताओं के कथन हैं।
4)ईसाइयत औऱ वेदान्त का समन्वय होंना चाहिये।
Dr jadunath sinha
जो राधाकृष्णन के स्टूडेंड थे, ने पीएचडी की थीसिस जमा की, वह लंबे समय लंबित रखी।
इस बीच वह copypaste राधाकृष्णन ने अपने नाम से पब्लिश किये और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की
जदुनाथ जो अपनी योग्यता से कलकत्ता यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर अप्पोइन्ट हुए, ने राधाकृष्णनन पर मुकदमा कर दिया।
कैसल में follow-ups करने पर sir Ashutosh Mukharji के बेटे श्यामाप्रसाद मुखर्जी , जो कलकत्ता विश्वविद्यालय जे VC थे, राधाकृष्णन के मित्र, के दबाव में कोर्ट के बाहर समझौता करना पड़ा।
साक्ष्य
Roundtableindia. Co. In
संशोधन संकलन अजय कर्मयोगी
साभार नितिन भदौया रामेश्वर मिश्र
