वर्ष आरम्भ-वर्ष गणना की भारत में दो पद्धति हैं। दिनों की क्रमागत गणना के अनुसार दिन (सूर्योदय से आगामी सूर्योदय) तथा सौर मास-वर्ष की गणना को शक कहते हैं। इसमें प्रत्येक सूर्योदय में (या मध्यरात्रि, सूर्यास्त, मध्याह्न) में १ दिन बदल जाता है, अतः गणना में सुविधा होती है। १-१ की गणना कुश द्वारा होती है, हर भाषा में १ का चिह्न कुश है। उनको मिलाने से वह शक्तिशाली होता है अतः उसे शक कहते हैं।
पूजा या अन्य पर्व (सौर संक्रान्ति को छोड़ कर) चान्द्र तिथि के अनुसार होते हैं क्यों कि यह मन का कारक है-चन्द्रमा मनसो जातः (पुरुष सूक्त)। तिथि निर्णय के लिये शक दिनों के अनुसार तिथि की गणना होती है। १२ चान्द्र मास का वर्ष प्रायः ३५४ दिन का होता है, अतः ३० या ३१ मासों के बाद १ अधिक मास जोड़ते हैं, जिस मास में सूर्य की संक्रान्ति (राशि परिवर्तन नहीं होता है। यह दीर्घ काल में सौर मास वर्ष के अनुसार चलता है, या इसके अनुसार समाज चलता है, अतः इसे सम्वत्सर (सम्+ वत्+ सरति) कहते हैं।
बार्हस्पत्य संवत्सर २ प्रकार का होता है। गुरु (बृहस्पति) ग्रह १२ वर्ष में सूर्य की १ परिक्रमा करता है। मध्यम गुरु १ राशि जितने समय में पार करता है वह ३६१.०२६७२१ दिन (सूर्य सिद्धान्त, अध्याय १४) का गुरु वर्ष कहा जाता है। यह सौर वर्ष से ४.२३२ दिन छोटा है। अतः ८५+ ६५/२११ सौर वर्ष में ८६ + ६५/२११ बार्हस्पत्य वर्ष होते हैं। दक्षिण भारत में पैतामह सिद्धान्त के अनुसार सौर वर्ष को ही गुरु वर्ष कहा गया है। रामदीन पण्डित द्वारा संग्रहीत-बृहद्दैवज्ञरञ्जनम्, अध्याय ४-
अतः कलि आरम्भ (१७-२-३१०२ ई.पू. उज्जैन मध्य रात्रि) के समय सूर्य सिद्धान्त मत से विजय सम्वत्सर (२७ वां) चल रहा था। उसके ६ मास ११ दिन (१८८ दिन बाद, २९.५ दिन का चान्द्र मास) २५-८-३१०२ ई.पू. को जय संवत्सर आरम्भ हुआ तो परीक्षित को राज्य दे कर पाण्डव अभ्युदय के लिये हिमालय गये। इस दिन से युधिष्ठिर जयाभ्युदय शक आरम्भ हुआ। दक्षिण भारत के पितामह सिद्धान्त के अनुसार कलि आरम्भ से प्रमाथी (१३वां) संवत्सर आरम्भ हुआ। इसके १२ वर्ष पूर्व से प्रभव वर्ष का चक्र आरम्भ हुआ था। अतः मेक्सिको के मय पञ्चाङ्ग का आरम्भ १२ वर्ष पूर्व ३११४ ई.पू. से हुआ था। दोनों प्रकार के बार्हस्पत्य वर्ष चक्र ५१०० (८५x ६०) वर्ष में मिल जाते हैं अतः मय पञ्चाङ्ग ५१०० वर्ष का था।
वर्त्तमान विक्रम संवत् का आरम्भ ६ अप्रैल २०१९ को हो रहा है। इस दिन परिधावी (४६वां) सम्वत्सर है जो ७ अप्रैल २०१९ तक चलेगा। उसके बाद प्रमादी (५७ वां) संवत्सर आरम्भ होगा। अधिकांश पञ्चाङ्ग निर्माता विक्रम संवत् तथा बार्हस्पत्य संवत्सर का अन्तर भूल गये हैं तथा लिख रहे हैं कि विक्रम संवत् के साथ ही परिधावी संवत्सर भी आरम्भ हो रहा है। वाराणसी के हृषीकेश पञ्चाङ्ग ने लिखा है कि वर्ष आरम्भ में परिधावी संवत्सर है, पर कितने दिन तक रहेगा यह नहीं लिखा है। केवल पण्डित मदनमोहन पाठक (लखनऊ राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के ज्योतिष विभागाध्यक्ष) के जगन्नाथ पञ्चाङ्ग में लिखा है कि इस वर्ष मेष संक्रान्ति (१४ अप्रैल, १५-०५ बजे) परिधावी के गत मास आदि ११/०७/२०/३९ दिन तथा भोग्य मास आदि ०/२२/३९/२१ हैं (कुल ३६० दिन मान कर गणना)। अतः प्रमादी संवत्सर (४७वां) ७ अप्रैल २०१९ को २०-३० बजे आरम्भ हो रहा है।
गणना की कठिनाई के कारण अधिकतर पञ्चाङ्ग पूरे वर्ष यही संवत्सर मान लेते हैं तथा सङ्कल्प में भी यही पढ़ा जाता है। प्रमादी (४७ वां) है, इसे भूल से प्रमाथी लिख देते हैं जो १३ वां है।
दक्षिण भारत के लिये विकारी (३३वां) संवत्सर है जो पूरे वर्ष रहेगा।
बार्हस्पत्य वर्ष को फल की दृष्टि से ५-५ वर्ष के १२ युगों में बांटा गया है। अन्य विभाजन है २०-२० वर्षों के ३ खण्ड-ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र विंशतिका।
ब्रह्मा-१. प्रभव, २. विभव, ३ शुक्ल, ४. प्रमोद, ५. प्रजापति, ६. अङ्गिरा, ७. श्रीमुख, ८. भाव, ९. युवा, १०. धाता, ११. ईश्वर, १२. बहुधान्य, १३. प्रमाथी, १४. विक्रम, १५. वृष, १६. चित्रभानु, १७. सुभानु, १८. तारण, १९. पार्थिव, २०. व्यय।
विष्णु-२१. सर्वजित्, २२. सर्वधारी, २३. विरोही, २४. विकृत, २५. खर, २६. नन्दन, २७. विजय, २८. जय, २९. मन्मथ, ३०. दुर्मुख, ३१. हेमलम्ब, ३२. विलम्ब, ३३. विकारी, ३४. शर्वरी, ३५. प्लव, ३६. शुभकृत्, ३७. शोभन, ३८. क्रोधी, ३९. विश्वावसु, ४०. पराभव।
रुद्र-४१. प्लवङ्ग, ४२. कीलक, ४३. सौम्य, ४४. साधारण, ४५. विरोधकृत्, ४६. परिधावी, ४७. प्रमादी, ४८. आनन्द, ४९. राक्षस, ५०. नल, ५१. पिङ्गल, ५२. कालयुक्त, ५३. सिद्धार्थ, ५४. रौद्र, ५५. दुर्मति, ५६. दुन्दुभि, ५७. रुधिरोद्गारी, ५८. रक्ताक्ष, ५९. क्रोधन, ६०. क्षय।
सिद्धार्थ बुद्ध के जन्म समय (३१-३-१८८७ ई.पू.) सिद्धार्थ (५३वां) संवत्सर था। विक्रमादित्य का शासन ८२ ई.पू. आरम्भ हो गया था। पर २५ वर्ष बाद जब विक्रम संवत् आरम्भ किया, उस समय विक्रम (१४वां) संवत्सर चल रहा था।
