मंगलवार, 9 अप्रैल 2019

भारत की श्रेष्ठ परंपरा का वैज्ञानिक दृष्टिकोण व नवरात्र का महत्व



ये तय करना लगभग नामुमकिन है कि एक चक्र (सर्किल) शुरू कहाँ से हुआ और ख़त्म कहाँ पर। इस कारण शाक्त परम्पराओं को देखेंगे तो कठिनाई होगी। बरसों मैकले मॉडल की पढ़ाई और ईसाई नियमों पर बने कानूनों के कारण अवचेतन मन विविधता को स्वीकार करने में आनाकानी शुरू कर सकता है। शाक्त परम्पराओं में कुछ आदि काल से चली आ रही लोक-परम्पराएं हैं, कुछ तांत्रिक मत से आती हैं, और कुछ सनातन वैदिक। देवी की उपासना भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे लम्बे समय से जीवित है। स्त्री भी देवी हो सकती है, ऐसा मानने वाली दूसरी सभ्यताएं मिट गयीं, या मिटा डाली गयीं।

सबसे लम्बे समय तक परम्पराएं कैसे चलती हैं इसका उदाहरण आपको लोटे में दिख जाएगा। भारत के कई क्षेत्रों में पानी पीने या रखने के लिए जो लोटा होता है, उसके सबसे पुराने नमूने हड़प्पा-मोहनजोदड़ो की सिन्धु घाटी सभ्यता में मिलते हैं। मिट्टी के बर्तन बनाने का जो तरीका सिन्धु घाटी सभ्यता में इस्तेमाल होता था, वही तरीका असम के माजुली द्वीप के निवासी आज भी प्रयोग करते हैं। सभ्यता के लगातार होने के प्रमाण अगर अभी तक ढूंढें नहीं जा सके हैं तो सभ्यता लगातार जीवित नहीं थी, इस बात के भी कोई प्रमाण नहीं हैं। पहले सरस्वती नदी का अस्तित्व था कहने पर मजाक उड़ाया जाता था, अब आक्रमणकारी इसपर चुप्पी साधते भी दिख ही जायेंगे।

रोबर्ट रेडफील्ड नाम के मानव विज्ञानी (अन्थ्रोपोलोगिस्ट) ने भारत की धार्मिक मान्यताओं को बड़ी और छोटी धारा में बांटने की कोशिश की थी, जिसे बाद में मिल्टन सिंगर और एम.एन. विश्वास जैसे मानव विज्ञानियों ने बढ़ावा भी दिया। उनके हिसाब से बड़ी धारा वो होती थी जिसके लिखित ग्रन्थ थे, उन ग्रंथों को पढ़ने-समझने और समझाने वाला एक वर्ग था। उनके बड़े नेता होते थे जो उसके भाव को जन-जन तक पहुंचाते, धार्मिक तीर्थ होते थे और तिथियों का अपना पंचांग (कैलेंडर) भी होता था। जाहिर है विदेशी चश्मे से देखने के कारण उनसे समझने में कई गलतियाँ हुई हैं। छोटी धारा में वो अनगढ़ प्रथाओं और अंधविश्वासों वाली अलिखित ग्रामीण परम्पराओं को रखते थे।

शाक्त परम्पराओं में देखने पर उनकी अवधारणा की कमियां और स्पष्ट दिखती हैं। ग्रामीण भक्ति भाव का प्रयोग वैदिक रीतियों में भी होगा और संस्कृत में लिखे वैदिक मन्त्रों का प्रयोग तांत्रिक रीतियों में भी स्पष्ट दिख जाता है। दुर्गा पूजा और नवरात्रि का महत्व इसमें भी है कि जरा सा ध्यान देते ही ये आपकी आँख से सेकुलरिज्म का टिन का चश्मा उतार देती है। यहाँ कर्म और वचन तक ही नियम शेष नहीं होते (बांग्ला में “शेष होना” मतलब ख़त्म होना होता है)। यहाँ नियम मन और विचारों पर भी लागू होते हैं। ये कुछ कुछ वैसा है, जैसा भारतीय कानूनों में होने लगा है।

अदालतों में मंदिर के देवी-देवता को जीवित व्यक्ति का दर्जा दिया जाता है, उसकी ओर से कोई मित्र-बान्धव बनकर मुकदमा लड़ता है। शास्त्रों में भी कुछ ऐसा ही कहा जाता है। विशेषकर भक्तियोग सम्बन्धी अवधारणाओं में ये निर्देश होते हैं कि किस देवी या देवता को क्या माना जा सकता है। जैसे श्री कृष्ण के लिए सखा भाव बिलकुल मान्य होगा, लेकिन देवी दुर्गा का उपासक कोई पुरुष, देवी को सखा नहीं मान सकता, वो माता के ही भाव में रहेंगी। ये किसी “बड़ी धारा” में ढूंढना जरूरी नहीं, ये साधारण ग्रामीण नियमों में भी दिख जाएगा। कई मंदिरों में पुरुषों के अकेले साड़ी-चूड़ी जैसी चीज़ें चढ़ाने के प्रयास को अजीब सी हेय दृष्टि का सामना करना पड़ सकता है।

आयातित विचारधारा ने एक राजा के दूसरे से युद्ध को शैव और वैष्णव या शाक्तों के वैमनस्य के रूप में भी दिखाने की कोशिश की है। मंदिरों में जाने और दुर्गा पूजा करने का एक फायदा ये भी है कि इस अवधारणा में भी दर्जनों छेद नजर आ जायेंगे। शैव मंदिर हों या राम मंदिर, शायद ही कोई ऐसी जगह होगी जहाँ एक देवी-देवता के मंदिर में दूसरे को स्थान न दिया गया हो। अजंता-एल्लोरा के चित्र हों, कैलाश मंदिर या शिव के अन्य रूपों के नाम से जाने जाने वाले मंदिर हों, या फिर हजार राम मंदिर, देवी दुर्गा हर जगह दिखती हैं। शारदीय नवरात्र कभी कभी अकाल बोधन के नाम से तो इसलिए ही जाना जाता है क्योंकि श्री राम ने रावण पर विजय पाने के लिए इसी समय देवी उपासना की थी।

पर्व-त्यौहार उनके तर्कों में कई छेद दिखा देते हैं, इसलिए भारत की विविधता पर हमला करने वालों को परम्पराओं से विशेष चिढ़ रहती है। नाम और हुलिए से धोखा देने और भेष बदलने में वो माहिर हैं, ऐसे में सवाल ये भी है कि उन्हें पहचानें कैसे? ये बहुत आसान है। वो आपमें बिना वजह अपराध-बोध पैदा करना चाहेंगे। जैसे बिहार में मौसम अति के करीब होता है। गर्मी में लगातार पसीना पोंछने की जरूरत होगी और ठण्ड में कान ढकना होगा। यहाँ बाढ़ की वजह से आद्रता भी रहती है इसलिए मोटा तौलिया इस्तेमाल करने पर वो सूखेगा नहीं। गरीबी की वजह से सभी मोटा फर वाला तौलिया खरीदने में भी समर्थ नहीं है।

इसलिए बिहारियों के गले में आपको अक्सर “गमछा” टंगा मिल जाएगा। आयातित विचारधारा वाला तुरंत इसे “प्रतीकवाद” घोषित करके आपको वैचारिक रूप से नीचा दिखाने लगेगा। खुद वो गले में कोई महंगा दुपट्टा (जिसका पसीना पोछने या कान बांधने में उपयोग न हो) लपेटे सकता है। उस स्थिति में वो बिना बोले ही आपकी गरीबी के लिए आपको नीचा दिखाना चाहता है। ये जो अकारण ही आपको अपराधी सिद्ध करने की कोशिश है इसमें आक्रमणकारी सबसे आसानी से पहचान में आता है। नाज़ी गोएबेल्स के “नेम कालिंग” से सीखकर उन्होंने इसके लिए नारीवाद, भक्त, ब्राह्मणवाद, दलित चिंतन, ट्रोल जैसे कई शब्द भी बना रखे हैं।

भारत में “आप रुपी भोजन, पर रुपी श्रृंगार” की कहावत भी चलती है। आपको अपराधबोध करवाने के लिए वो आपके मांसाहारी होने का मजाक उड़ाएगा। अगर कहीं आप शाकाहारी हुए तो खाने-पीने की निजी स्वतंत्रता छीन रहे हो, ये कहकर आपको नीचा दिखायेगा। उन्हें असली दिक्कत भारत की विविधता से है। भारत उनके सामने इतने रूपों में आता है कि इतने वर्षों के हमलों में भी वो इसे नष्ट नहीं कर पाए हैं। एक तरीका होता तो वो उसे निम्न-नीच-निकृष्ट कहकर ख़त्म भी कर पाते। एक रूप को अनुचित कहने पर उनके सामने दूसरा प्रकट हो जाता है। दुर्गा पूजा और नवरात्र उनके लिए बड़ी समस्या है।

कहीं तीन महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली के रूप में देवी दिखती हैं, तो कहीं नव दुर्गा में उनके नौ रूप हो जाते हैं। वो चौंसठ योगिनी के रूप में भी पूजी जाती हैं और ललिता सहस्त्रनाम के हज़ार नामों से भी। कोस कोस पर बदलते पानी और वाणी की ही तरह हर भक्त के लिए देवी का रूप भी बदल जाता है। उन्हें दस तरीके से पहनी जाने वाली साड़ी की विविधता जनता में तो क्या मूर्तियों में भी अच्छी नहीं लगती। उन्हें सब एक ही बोरे जैसे परिधान में चाहिए।

बाकी नवरात्रि दुष्टों के दलन का पर्व भी है। भारत की विविधता के शत्रुओं के दमन के पर्व के रूप में भी इसे मना ही सकते हैं।

#नवरात्रि

दुर्गा सप्तशती का पाठ कुंजिका स्तोत्र के बिना हीन माना जाता है। अब ये कुंजिका स्तोत्र कौन किसे सिखा रहा होता है? इसका जवाब उसके अंत में है जहाँ “श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिवपार्वती संवादे” लिखा हुआ है। अगर स्त्रियों के लिए पाठ वर्जित होता तो भगवान शिव खुद ही अपनी पत्नी को सिखाने जैसी हरकत क्यों करते?

जहाँ तक पाठ की विधि का प्रश्न है चिदम्बर संहिता में पहले अर्गला फिर कीलक और अंत में कवच पढ़ने का विधान है। योगरत्नावाली में पाठ का क्रम बदल जाता है और वहां पहले कवच (बीज), फिर अर्गला (शक्ति) और अंत में कीलक पढ़ने का विधान है। गीता प्रेस वाली दुर्गा सप्तशती में ठीक से देखने पर ये मिल जायेगा।

उसके अलावा पाठ विधि के अंतर देखेंगे तो मेरु तंत्र, कटक तंत्र, मरिचिकल्प आदि में भी थोड़े बहुत अंतर मिल जायेंगे। दुर्गा सप्तशती के लिए कई विधियाँ तंत्रों में हैं और करीब उतनी ही वैदिक रीतियों में भी हैं। कोई दिन में एक चरित्र पढ़े, कोई केवल एक अध्याय, कोई पूरी ही हर दिन पाठ करे, ये सभी संभव हैं।

सकाम और निष्काम के पक्ष से देखें तो सुरथ और समाधी नाम के दो लोगों पर इसकी कहानी शुरू होती है। राजा सुरथ को इस जन्म में राज्य और आगे सावर्णिक (जिनके नाम से मन्वन्तर है) ऐसे राजा होने का वरदान मिला था। समाधी ने अहंकार आदि से मुक्ति मांगी तो उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इसलिए अलग अलग फल भी संभव हैं।

हाँ, जैसे स्कूल में गणित (मैथ्स) के शिक्षक से हिंदी व्याकरण के सवाल पूछने नहीं पहुँच जाते थे, वैसे ही हर ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे से सलाह मत लीजिये। पूछना ही हो तो जो कोई 10-20 साल से पूजा करता करवाता आ रहा हो, ऐसे किसी को ढूँढने का प्रयास कीजिये। घर से निकल कर कुर्सी छोड़कर ढूंढना मुश्किल लगे तो फिर अपने मन की कीजिये।

अपराध क्षमा पाठ के अंत में “एवं ज्ञात्वा महादेवी यथायोग्यं तथा कुरु” लिखा होता है। जो होगा, सही ही होगा।

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, रानी चेनम्मा, रानी अब्बक्का जैसी अंग्रेजों की गुलामी से ठीक पहले की रानियों का जिक्र होते ही एक सवाल दिमाग में आता है | युद्ध तलवारों से, तीरों से, भाले – फरसे जैसे हथियारों से लड़ा जाता था उस ज़माने में तो ! इनमे से कोई भी 5-7 किलो से कम वजन का नहीं होता | इतने भारी हथियारों के साथ दिन भर लड़ने के लिए stamina भी चाहिए और training भी |

रानी के साथ साथ उनकी सहेलियों, बेटियों, भतीजियों, दासियों के भी युद्ध में भाग लेने का जिक्र आता है | इन सब ने ये हथियार चलाने सीखे कैसे ? घुड़सवारी भी कोई महीने भर में सीख लेने की चीज़ नहीं है | उसमे भी दो चार साल की practice चाहिए | ढेर सारी खुली जगह भी चाहिए इन सब की training के लिए | Battle formation या व्यूह भी पता होना चाहिए युद्ध लड़ने के लिए, पहाड़ी और समतल, नदी और मैदानों में लड़ने के तरीके भी अलग अलग होते हैं | उन्हें सिखाने के लिए तो कागज़ कलम से सिखाना पड़ता है या बरसों युद्ध में भाग ले कर ही सीखा जा सकता है |

अभी का इतिहास हमें बताता है की पुराने ज़माने में लड़कियों को शिक्षा तो दी ही नहीं जाती थी | उनके गुरुकुल भी नहीं होते थे ! फिर ये सारी महिलाएं युद्ध लड़ना सीख कैसे गईं ? ब्राम्हणों के मन्त्र – बल से हुआ था या कोई और तरीका था सिखाने का ?

लड़कियों की शिक्षा तो नहीं होती थी न ? लड़कियों के गुरुकुल भी नहीं ही होते थे ?

आम तौर पर आपको दल हित चिन्तक और एक आयातित विचारधारा के प्रवर्तक ये बताएँगे कि भारत में स्त्री शिक्षा का कोई प्रावधान नहीं था | लड़कियों को कहने के लिए तो दुर्गा-काली कहा जाता था लेकिन उन्हें हथियार चलाना नहीं सिखाया जाता था | अगर आप रानी लक्ष्मीबाई का उदाहरण देंगे तो वो कहेंगे वो तो रानी थी | जब आप बताएँगे कि उन्होंने कुछ ही दिनों में 5000 स्त्री सैनिक कैसे जमा कर लिए थे तो वो कोई और कुतर्क गढ़ेंगे |

ऐसा करते समय वो एक बुरी सी चीज़ भूल जाते हैं | भारत श्रुति की परम्पराओं से चलता है | अब किताबें लिखने के बदले अगर लोगों ने उसे पूरा का पूरा याद ही कर रखा हो तो उसे मिटाना संभव नहीं होता | हर याद कर चुके व्यक्ति की हत्या कर डालेंगे तभी वो पूरी तरह ख़त्म होगा | एक भी अगर बचा रह गया तो वो किसी ना किसी को सिखा देने में कामयाब हो जायेगा | गुरुकुलों और अखाड़ों की परम्पराओं को तोड़ने के लिए हर घृणित षडयंत्र रचने के वाबजूद गोर साहब और उनके ये भूरे गुलाम नाकाम ही रहे |

इन तथाकथित दल हित चिंतकों और आयातित विचारधारा वाले प्रख्यात कहे जाने वाले नारीवादियों ने बड़े प्यार से जिनका नाम मनु-स्मृति इरानी रखा है उन्होंने कुछ दिन पहले एक फोटो लगाने का अभियान और चला दिया | उन्होंने हस्तशिल्प और हथकरघा को बढ़ावा देने के लिए हथकरघा से निर्मित साड़ी में अपनी तस्वीर डाल दी | सोशल मीडिया पर ये एक मुहीम की तरह जब शुरू हुआ तो कई महिलाओं ने इसमें शिरकत की | इसी कड़ी में चेन्नई के लॉयला कॉलेज की एक शिक्षिका ऐश्वर्या मानिवान्नन ने तस्वीर के बदले अपना विडियो डाला | वो सिलम्वम नाम से जाने जाने वाली लाठी चलाने की कला में भी अभ्यस्त हैं | उनका विडियो वायरल हो गया था

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...