भारतीय शास्त्रीय संगीत के विविध राग और उन्हें सुनने से फायदे :
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1. राग दुर्गा – आत्मविश्वास बढानेवाला.
2. राग यमन – कार्यशक्ति बढानेवाला.
3. राग देसकार – उत्थान व संतुलन साधनेवाला
4. राग बिलावल – अध्यात्मिक उन्नति व संतुलन साधनेवाला.
5. राग हंसध्वनि – सत्य असत्य को परिभाषित करनेवाला राग.
6. राग शाम कल्याण – मुलाधार उत्तेजित करनेवाला और आत्मविश्वास बढानेवाला.
7. राग हमीर – आक्रामकता बढानेवाला, यश देनेवाला, शक्ति और उर्जा निर्माण करनेवाला.
8. राग केदार – स्वकर्तृत्व पर पूर्ण विश्वास, भरपूर उर्जा निर्माण करनेवाला और मुलाधार उत्तेजित करनेवाला.
9. राग भूप – शांति निर्माण, संतुलन साधकर अहंकार मिटाता है.
10. राग अहिर भैरव – शुद्ध इच्छा, प्रेम एवं भक्ति भाव निर्माण करता है व आध्यात्मिक उन्नति, पोषक वातावरण निर्मित कारक.
11. राग भैरवी – भावना प्रधान राग, सर्व सदिच्छा पूर्ण कर प्रेम सशक्त और वृद्धि करता है.
12. राग मालकौस – अतिशय शांत एवं मधुर राग. प्रेमभाव निर्माण करता है व संसारिक सुख में वृद्धि करेगा.
13. राग भैरव – शांत वृत्ति व शुध्द इच्छा निर्माण करता है. आध्यात्मिक प्रगति के लिये पोषक एवं शिवत्व जागृत करनेवाला राग.
14. राग जयजयवंती – सुख समृद्धि और यश देने वाला राग. समस्या दूर करनेकी क्षमता.
15. राग भीम पलासी - संसार सुख व प्रेम देता है.
16. राग सारंग – अति मधुर राग. कल्पना शक्ति व कार्यकुशलता बढाकर नवनिर्मित ज्ञान प्रदान करता है, आत्मविश्वास बढाकर परिस्थिति का ज्ञान देता है.
17. राग गौरी – गुण वर्घक राग - शुद्ध ईच्छा, मर्यादाशीलता, प्रेम, उत्थान ,समाधान कारक.
पशु पक्षियों जैसा ही, मनुष्यों के पास भी शुरुआत में सिर्फ बोली थी, कोई भाषा नहीं थी। धीरे धीरे सभ्यता के विकास के साथ शब्दों के स्वरुप तय हुए, व्याकरण तैयार हुआ और अलग अलग सभ्यताओं के लिए अलग अलग भाषाएँ बनी। अभी के भारत की संस्कृति ही देख लें तो कई भाषाओँ के साथ साथ कई बोलियाँ भी मिल जायेंगी। जैसे ये भाषा के साथ होता है, वैसे ही ये संगीत के लिए भी होता है। एक सरगम और संगीत के एक प्रारूप के तय होने के साथ ही लोकगीतों से अलग, भारतीय शास्त्रीय संगीत का उदय हुआ।
भारतीय शास्त्रीय संगीत में स्त्रीलिंग और पुल्लिंग का भी भेद होता है, राग कम हैं और रागिनियाँ अधिक। रागों के लिए भाव भी होते हैं, परिवार भारत में महत्वपूर्ण इकाई है, इसलिए हर राग का परिवार भी होता है। धर्म से भारतीय संस्कृति के जुड़े होने के कारण हर राग, नटनागर यानि भगवान शिव से भी जुड़ा है। पांच राग भगवन शिव के पांच मुख से निकले बताये जाते हैं। सुबह की शुरुआत का राग भैरव (भूमि तत्व), हिंडोल (आकाश तत्व), दीपक (अग्नि तत्व), श्री (वायु तत्व) और मेघ (जल तत्व) शिव के हैं और छठा मालकौंस राग पार्वती का है।
उन्नीसवीं सदी के शुरुआत तक यही राग-रागिनी पद्दति भारतीय शास्त्रीय संगीत के वर्गीकरण के लिए इस्तेमाल होती थी। ऐसे चार मत होते थे, जिनमें से ये भरत मत के रागों के नाम हैं। भरत मत में हरेक राग की पांच पांच रागिनियाँ, आठ पुत्र राग और आठ वधु मानी जाती थी। हनुमत मत में भी रागों के नाम यही थे। रागिनियों, पुत्र रागों इत्यादि की गिनती बदलती थी। शिव मत के अनुसार भी छः राग माने जाते थे। प्रत्येक की छः-छः रागिनियाँ तथा आठ पुत्र मानते थे। इस मत में राग भैरव, राग श्री, राग मेघ, राग बसंत, राग पंचम, और राग नट नारायण होते थे।
सन 1810-20 के बीच इस पद्दति की आलोचना शुरू हुई और सुधार की जरूरत महसूस की जाने लगी। ये काम पचास साल बाद शुरू होना था। पंडित विष्णु नारायण भातखंडे का जन्म ही 1860 में हुआ (देहावसान-1936)। अधिकांश उत्तर भारत में जो आधुनिक थाट पद्दति आज जानी जाती है, उसके जन्मदाता पंडित भातखंडे थे। उन्होंने 1640 के आस पास के कर्णाटक शैली के विद्वान पंडित वेंकटमखिन की शैली के आधार पर वर्गीकरण का प्रयास शुरू किया। इस काम के लिए वो उत्तर भारत के कई शास्त्रीय घरानों में घुमते रहे।
बरसों की मेहनत से वो दस प्रमुख थाट में भारतीय शास्त्रीय संगीत को बाँट पाए। बिलावल, कल्याण, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावारी, भैरवी और तोडी थाट में आज संगीत बांटा जा सकता है। जैसे मालकौंस को भैरवी थाट में डाल सकते हैं, राग श्री को पूर्वी थाट में डालेंगे। थाट को परिवार के उपनाम की तरह समझिये। जैसे किसी के घर शादी का कार्ड देने आया कोई व्यक्ति पारिवारिक उपनाम से फलां परिवार को सादर आमंत्रण लिखकर छोड़ सकता है। उस आमंत्रण के उपनाम से कई लोग पहचाने जाते हैं इसलिए परिवार के कई लोगों में से एक या कुछ व्यक्ति चले जायेंगे।
थाट का बनना गणित पर आधारित है। सरगम के सात स्वरों में से पांच को विकृति दी जा सकती है, यानि कोमल और तीव्र स्वर भी होते हैं। इस तरह कुल सात शुद्ध स्वर और पांच विकृत, बारह स्वर होते हैं। अब अगर पर्मुटेशन-कॉम्बिनेशन इस्तेमाल करें और सा, पा को केवल शुद्ध स्वर, और रे, गा, म, धा, और नी का एक (कोमल या तीव्र) रूप इस्तेमाल करें तो कुल 32 स्वरुप बनेंगे। अपनी तलाश में पंडित भातखंडे को जो दस थाट प्रबल दिखे, उन्होंने उसमें ही सबको बांटा।
ये जो ज्यादातर थाट हैं, इनसे मिलते जुलते से पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत के चर्च मॉड भी मिल जाते हैं। एक अंतर ये कहा जा सकता है कि हाई ऑक्टेव पिच के लिए चर्च बच्चों का बंध्याकरण करके उनसे गवाता था। ऐसे एक गाने लायक किन्नर बच्चे के बंध्याकरण में कई बच्चों की मौत भी हो जाती थी। बाद में ये वहशी हरकत ख़त्म हुई तो ऑपेरा के कई हिस्से ही दोबारा तैयार करने पड़े। जो पुरानी पद्दति थी उसे गाने लायक बचपन से बंध्याकरण करके बच्चों को आज तैयार नहीं किया जा सकता। खुशकिस्मती से भारतीय परम्पराओं में ऐसी अमानवीयता नहीं होती, इसलिए रागों को गायब नहीं करना पड़ा।
ये जरूर है कि एक ही व्यक्ति का इतने वृहदाकार संगीत शास्त्र पर काम पूर्ण हो, ऐसा थोड़ा कठिन है। इस वजह से पंडित भातखंडे का वर्गीकरण भी पूरा नहीं माना जाता। दस थाटों में उनके वर्गीकरण पर आगे क्या प्रयास हुए, उन प्रयासों को कितनी सफलता मिली ये भी बहस का मुद्दा हो जाता है। अब आप अगर यहाँ तक पढ़ चुके हैं तो देखिये कि जो बात संगीत पर होनी थी वो धर्म से शुरू होकर गणित तक पहुँच गई। इतने पे भी स्थिति ये है कि हम ये बताने की कोशिश करें कि राग हिंडोल मारवा थाट का है, या कल्याण थाट का, तो एक बड़ी बहस खड़ी हो सकती है।
तो आप ये भी समझ सकते हैं कि माला की तरह, धर्म से होते हुए, संगीत को जोड़ते जो गणित तक पहुंचा है, वो सबको जोड़ता धागा ही संस्कृति है। हरेक हिस्से की अपनी महत्ता है, साथ आये तो और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
जैसे अब फ़िल्मी गानों में भजन नहीं होते, लोरियां नहीं होती, राखी-दिवाली या फसल की कटनी पर खुश होते किसानों के गाने नहीं होते, वैसे ही अब फ़िल्मी गाने प्रेरक भी नहीं होते। उनसे प्रकृति के बारे में सोचने जानने की कोई उत्सुकता नहीं जागती। संगीत की भारतीय जरूरतों को फ़िल्में अब पूरा नहीं करती, तुलनात्मक रूप से अगर पुराने गाने देखें तो ये अंतर नजर आ जाता है। ऐसा एक पुराना गाना लता मंगेशकर के प्रिय गानों में से एक “ज्योति कलश छलके” भी है। ये गाना १९६१ में आई फिल्म “भाभी की चूड़ियाँ” में था।
जैसा की उस दौर की ज्यादातर फिल्मों में होता था, इसे भी लता मंगेशकर ने ही गाया है। गीत के बोल पंडित नरेंद्र शर्मा के हैं, और संगीत सुधीर फड़के का दिया हुआ है। ये गाना राग भूपाली पर आधारित सबसे प्रसिद्ध गीतों में से एक होगा (और कोई इसपर आधारित हो भी तो हमें याद नहीं)। सुबह एक आम भारतीय घर में कैसे होती थी, या आज भी होती है, वो एक एक कर के गाने में सामने आती जाती है। अब शहरों में, कामकाजी महिलाओं के लिए सुबह ऐसी नहीं होती, माँ के ऑफिस की छुट्टी होना भी बच्चों के लिए उत्सव होता है।
जिस दौर का ये गाना है इसे मीना कुमारी पर फिल्माया गया है और उनके साथ कोई छोटा बच्चा है। इस शरारती से बाल कलाकार का नाम भी पता नहीं। सुबह उठाना, सूर्य को प्रणाम, आँगन में पानी छिड़कना, रंगोली जैसे रोज के कामों में लगी माँ है और वहीँ खेलता शरारत करता उसका बच्चा। कई लोगों के लिए ये नोस्टाल्जिया की फीलिंग भी शायद जगा दे। अगर गाने के बोल सुनेंगे तो भी निरर्थक ठूंसे गए शब्द नहीं मिलते। वो सूरज उगने की प्रक्रिया में आस पास होते बदलाव दर्शाते हैं। बादलों और क्षितिज का रंग बदलना, दूब-घास का ज्यादा हरा नजर आना, ओस की बची बूंदे और फूल, धरती को माँ की तरह सहेजती सहलाती माँ के प्यार जैसी उषा की किरणें।
भारत के शहरों में स्थितियां भले काफी बदल गई हैं, गावों-कस्बों में अब भी कुछ भी रामायण-महाभारत से बाहर नहीं होता। ये गाना भी यशोदा-कृष्ण की पृष्ठभूमि पर ही बनाया गया है। सुबह पर आधारित एक और गाना भी है, जो विजेता फिल्म का था। वो जो “मन आनंद आयो रे” वाला गाना है, वो राग अहीर भैरव पर आधारित है। दोनों देखिएगा, उम्मीद है सुबहें पसंद तो आने लगेंगी।
[ एडिट : मेरा ख़याल था कि राग के बारे में ज्यादा जानकारी पसंद नहीं की जायेगी इसलिए एक पैराग्राफ छोड़ दिया था। फिल्मों में अक्सर जो शास्त्रीय पर आधारित गाने के नाम पर अस्सी के दशक के बाद सुनाई देता रहा वो मुजरा होता था जो किसी तवायफ़ के कोठे पर चल रहा होता था। कोठे पर आम तौर पर ठुमरी चलती है। राग भूपाली में ठुमरी नहीं होती, इसलिए भी ये बाद की फिल्मों में कम सुनाई दिया। इस राग में सात सुरों में से सिर्फ पांच ही इस्तेमाल होते हैं, सभी सुर नहीं लगते। कोमल और दीर्घ स्वर भी नहीं होते इसलिए ये सीखने के लिए आसान रागों में से एक गिना जाता है। जो शास्त्रीय संगीत सीखते हैं उन्हें शुरू में राग यमन, राग भैरव के साथ राग भूपाली सिखाया जाता है।
संगीत को लिखने का लिहाज देखिये तो भारत में ज्यादातर श्रुति परंपरा रही है, इसलिए इंग्लिश म्यूजिकल नोटेशन की तरह इसे एक ही तयशुदा तरीके से नहीं लिखा जाता। भारत में फ़िलहाल लिखने के दो तरीके, भातखंडे और पालुस्कर दोनों प्रचलन में हैं। राग भूपाली को ही कर्णाटक संगीत में मोहनम कहते हैं और इस से बिलकुल मिलता जुलता एक राग देशकर भी होता है। देशकर और भूपाली में मामूली सा अंतर ये है कि भूपाली कल्याण थाट का होता है और देशकर, बिलावल थाट का। आरोह-अवरोह समझना भी मुश्किल नहीं होता।
सात सुर सा, रे, गा, म, पा, ध, नी एक क्रम में लगभग सबको पता होते ही हैं। राग भूपाली में म और नी इस्तेमाल नहीं किये जाते तो उन्हें हटा कर सीधे यानि बढ़ते क्रम में लिख देते हैं। बढ़ते क्रम में लिखना आरोह (आरोहण यानि उपर चढ़ना) हो जाएगा : सा, रे, गा, पा, ध, सा और अवरोह यानि उतारना होगा : सा, ध, पा, गा, रे, सा। समय के हिसाब से ये रात के पहले पहर का होता है और रस के हिसाब से इसे भक्ति रस का माना जाता है। इसी पर आधारित और फ़िल्मी गाने देखने हों तो एक गाना है “पंख होते तो उड़ आती रे” (सेहरा) या “दिल हुम हुम करे” (रुदाली का) सुन सकते हैं। लेकिन पुराने गाने के बदले बिलकुल ही नए गाने पर तुले हुए हैं तो हाल में एक नए वाले मनोज कुमार यानि अक्षय कुमार की फिल्म आई थी “नमस्ते लन्दन”। उसका एक गाना है “मैं जहाँ रहूँ”, वही तेरी याद साथ है वाला, वो भी इसी राग पर आधारित है। चुनते रहिये। ]
बाजारों चौराहों से गुजरते कभी कंप्यूटर ट्रेनिंग के इश्तेहार देखे हैं ? उनमें अक्सर एक सी शार्प सिखाने का प्रचार होता है | जावा के बगल में ही C # का निशान बना होता है | कभी सोचा है कि ये C# क्या है ? असल में ये एक म्यूजिक नोटेशन होता है | आम तौर पर जो आप हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में सात सुर जानते हैं वैसे ही अंग्रेजी में भी सात ही सुर होते हैं | लेकिन इनके अलावा एक कोमल स्वर के नाम से जाने जाने वाले सुर भी होते हैं |
हिंदी में हम लोग सात सुरों के लिए सा, रे, गा, मा जैसा लिखते हैं वैसे ही ये कोमल स्वर अंग्रेजी में जो होते हैं उनके नाम लिखने के लिए C# या F# इस्तेमाल होते हैं | इसी से प्रेरणा लेकर कंप्यूटर प्रोग्रामिंग लैंग्वेज का नाम सी शार्प (C#) रखा गया |
अब आप शायद सोच रहे होंगे कि सुर होते कितने हैं ? भारतीय शास्त्रीय संगीत में इनकी गिनती बारह होती है | अगर आप सोच रहे हैं कि आपने शास्त्रीय संगीत नहीं सुना इसलिए आपने सभी बारह सुर नहीं सुने तो आप फिर से गलत सोच रहे हैं | दूरदर्शन का जो पुराना वाला प्रचार होता था “मिले सुर मेरा तुम्हारा, तो सुर बने हमारा” वाला ! उसमें ये बारह के बारह इस्तेमाल होते हैं | अब फिर अगर आप कहीं ये सोच रहे हैं कि आपने पुराने ज़माने का ये प्रचार तो सुना ही नहीं इसलिए बारह सुर नहीं सुने तो आपने इश्किया फिल्म का “दिल तो बच्चा है जी” तो सुना ही होगा ? उसमें भी बारह सुर इस्तेमाल होते हैं |
इनके अलावा भी कई गाने हैं जो बारह सुर इस्तेमाल करते हैं | जो भी गाना राग भैरवी पर आधारित होता है उसमें ऐसा होगा | राग भैरवी सुबह के समय गाया जाने वाला राग है | किसी क्लासिकल म्यूजिक कॉन्सर्ट में गए होंगे तो आखरी वाला गाना राग भैरवी का होता है | बिलकुल वैसे ही जैसे बार बंद होते समय कैलिफोर्निया वाला गाना बजता है | इसपर आधारित कई गाने हैं, पुराने में “लागा चुनरी में दाग”, “रमैया वस्ता वैया”, “चिंगारी कोई भड़के” जैसे गाने हैं | नयी फिल्मों में जोधा-अकबर का “मनमोहना”, हेट स्टोरी वाला “आज फिर तुमपे प्यार आया है”, लक बाय चांस का “सपनों से भरे नैना” | बहुत से गाने हैं |
राग भैरवी कैसा होता है तो इसे भी सुन सकते हैं | आनन्द कुमार
संकलन अजय कर्मयोगी
