बुधवार, 28 अगस्त 2019

लुप्त हो चुकी 133 चिकित्सा पद्धतियों को पुनर्स्थापित करने का समय आ गया है


आयुर्वेद सप्ताह में मैंने वादा किया था आपसे कि कुछ आयुर्वेद का उन्नत विज्ञान, वर्तमान मॉडर्न साइंस में चोरी हो रहा आयुर्वेद और सनातन विज्ञान पर कुछ पोस्ट रखूँगा। कुल 157 चिकित्सा पद्धति हैं अभी 21वीं सदी में उनमें कुछ 65 चिकित्सा पद्धतियों पर मैंने खुद रीसर्च किये हैं जो कहीं ना कहीं आयुर्वेद से ही चोरी हुयीं हैं। वर्तमान भविष्य और हमारे पुरखो का विज्ञान, अभी हो रहें रिसर्च, भविष्य में होने वाली साईड ईफेक्ट और कैसे वापस आयुर्वेद पर आयेंगें उनका ठप्पा लगाकर उनके संदर्भ में कुछ टॉपिक पर बात करूँगा। बचपन में मैं सोचता था कि आखिर भारत 250 साल गुलाम रहा तब भी मॉडर्न सायन्स की इतनी तरक्की क्यूँ हुई। सवाल हमें बहुत आगे ले जाते हैं। एक प्रयास है आप सबको इस उन्नत सनातन विज्ञान से रुबरु करवाना और एक सोच देना। अनंत द्वार खुलेंगे आपके सामने नये संशोधन के जो हमारे पूर्वज अनंत खजाना छोडकर गये हैं हमारे लिये। जो मॉडर्न साइन्स इतना चोरी करने के बावजूद भी अभी सिर्फ 2% हैं उनके आगे। आईये मिलवाता हूँ एक छछूँदर से। Dr. OTTO HEINRICH WARBERG करके एक भाई साहब हुए जिसने एक संशोधन किया(ऐसा गुगल बताता है)कि अगर "मानव शरीर अलक्लाईन है तो उसे कैंसर तो क्या सर्दी भी नहीं हो सकती।" इस बात पर भाईसाहब को नोबेल मिला सन् 1931 में और ठप्पा अपने नाम कर गये। विदेशों में खासकर यूरोपियन और अमेरिकन देशों में आज इस सिद्धांत का बहुत बडा चलन हैं. लोग आचरण भी कर रहे हैं और वहाँ के डॉक्टर भी अपनी अच्छी जेब भरते हैं। आइये समझाता हूँ एसिड अल्कलाइन क्या है? चरक, सुश्रुत और कश्यप ऋषि हुए आज से करीब 4500 से 5000 साल पहले जिनके ग्रंथ चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और कश्यप संहिता को आयुर्वेद के आधार स्तंभ माना जाता हैं। अब चरक ऋषि ने वात पित्त कफ का सिद्धांत दिया और सबसे महत्वपूर्ण बात जो उन्होंने कही "दोष धातु मलमूत्रम् ही शरीरम्।" तीन दोष, सात धातु और तीन दुष्य ही शरीर हैं। इतना सरल समझाया शरीर को अगर कोई इनसे आगे शरीर को, समझा दे तो मैं उनका गुलाम हो जाऊँगा। तीन दोष-- वात, पित्त, कफ,, सात धातु-- रस, रक्त, माँस, मज्जा, चरबी, हड्डी और शुक्र,, तीन दुष्य-- मल, मूत्र और पसीना। जरा देखना अपने शरीर को इनसे आगे कुछ है? अब सबसे जटिल है तीन दोष को समझना--- वात, पित्त, कफ। आज के आयुर्वेद वाले लगभग इनको कोई नहीं समझ पाए हैं. इसलिये सटीक ईलाज भी नहीं कर पाते। अब तीन दोष को समझ लिया तो सात धातु आसान हो जाती है। सात धातु संतुलित है तो मल मूत्र पसीना संतुलित ही रहेगा। हम तीन दोष को समझना सामान्य मनुष्य के बस की बात नहीं थी। थोड़े जटिल हैं जो कोई उन्नत आयुर्वेदाचार्य ही समझ सकता हैं। फिर चरक ऋषि के शिष्य हुए वागभट्ट जी जिसने आयुर्वेद को जन सामान्य और खासकर गरीब लोगों के लिये एक सिद्धांत स्थापित किया (याद रखना बायोलोजिकल सूट को संचालित करने के बहुत माध्यम हैं जिसमें कुछ माध्यम को #MD सिरिज़ में रुबरु करवा चुका हूँ।)। क्या था? ......अम्ल-क्षार अम्ल यानी एसिड और क्षार यानी अलक्लाईन। वह भी आज से 4000 साल पहले। जो ऊपर जो बताया छछूँदर उनसे 4000 साल पहले। एसिड-अलक्लाईन अब यह सिद्धांत इतना सरल क्यूँ है? क्योंकि आपको दोष और बाकी जटिल ज्ञान में नहीं पड़ना सिर्फ देखना है एसिड यानी अम्ल बढ़ा है तो अल्कलाइन वाली चीजें प्रयोग करो.... अल्कलाइन यानी क्षार बढ़ा है तो अम्लीय चीजें इस्तेमाल करो। अब अम्ल क्षार का सिद्धांत वागभट्ट जीने दिया 4000 साल पहले... तो तब कोई ज्यादा बीमार नहीं होते थे.... बस कभी ऋतु परिवर्तन के दौरान कुछ छोटी मोटी समस्याएं और समाधान तुरंत यानी इंस्टन्ट आयुर्वेद जो OTTO WARBERG चुरा गया एलोपैथी भी इनसे निकला हुआ इनका एक अलग हिस्सा(गुगल करना समझ जाओगे) भाई साहब नोबेल ले गये ठप्पा लगा दिया पर एसिड अल्कलाइन और आयुर्वेद के तीन दोष को पूरी तरह समझ नहीं पाये। जो वागभट्ट जी आयुर्वेद के तीन दोष को समझने के बाद दिया था अम्ल क्षार का सिद्धांत और पूरी दुनिया झूल रही है इस भूलभुलैया में। 10 में से 9 बीमार.... भारत की बात नहीं कर रहा हूँ.... भारत में तो इतने बीमार भी नहीं जितने बड़े बड़े रोगी यूरोप और अमेरीका में हैं.... जरा स्वास्थ्य बजट देख लेना गुगल में.... कौन सा देश प्रति व्यक्ति कितना खर्च करता है स्वास्थ्य के पीछे समझ जाओगे। अब अम्ल-क्षार हैं क्या? साभार अनन्त मांगलिया

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...