शनिवार, 3 अगस्त 2019

धर्म ग्रंथ जो राष्ट्र को समृद्धि सशक्त और श्रेष्ठता पाठ पढ़ा कर पुरुषार्थ को जागृत करते हैं श्रेष्ठ ज्ञान का समन्वय हमारे धर्म ग्रंथों में है इसरो और नासा के खगोल वैज्ञानिक श्री ओम प्रकाश पांडे जी


रुद्राष्टाध्यायी का एक पूरा अध्याय
जो सेना को समर्पित है

यजुर्वेद में सबसे प्रभावशील देवता हैं - रुद्र । रुद्रदेवता
से  सम्बन्धित कुछ चुने  हुए मंत्रों से 'रुद्राष्टाध्यायी' का गठन हुआ है जिसका घर - घर में पूजाभाव से सस्वर पाठ किया जाता है। कई बटुकों को आज भी सम्पूर्ण 'रुद्राष्टाध्यायी' कंठस्थ होती है । 'रुद्राष्टाध्यायी'  में आठ अध्याय हैं । तीसरा अध्याय राष्ट्र की  सेना और सेनापति को समर्पित है । इस तीसरे अध्याय में  सत्रह मंत्र हैं , जो  वाजसनेयी शुक्ल यजुर्वेद संहिता के अध्याय 17  ( कंडिका 33 से 49 )  से लिये गये हैं ।आश्चर्य की बात केवल यह कि रुद्राष्टाध्यायी का पाठ जिन्हें आरोह -अवरोह के साथ कंठस्थ होता है ,वे भी इन मंत्रों के अर्थ की गम्भीरता से प्राय: परिचित नहीं होते। अर्थ ज्ञात न हो , तो मंत्र का प्रभाव कैसे जागृत हो।
आशु: शिशानो वृषभो न भीमो
घनाघन: क्षोभणश्चर्षषणीनाम्।
संक्रन्दनो  निमिष ऽ एक वीर:
शत सेनाऽअजयत्साकमिन्द्र:।।
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शुक्लयजुर्वेद.17.33.1
एक ही वीर सेनापति हो ,
जो भयानक सिंह की तरह दहाड़ कर
टूट पड़े शत्रुओं पर ।
एक ही सेनानायक हो ऐसा
कि हम विजयी हों ,
और काँपने लगे शत्रु की सेना।।1।
योद्धाओं ! शस्त्र उठाओ ,
अपना पराक्रम दिखाओ रणभूमि में ।
शत्रुओं का संहार करो
और विजय-पताका फहरा दो।।2।।
हे सेनानायक !
वीर सैनिकों के साथ प्रयाण करो ।
शत्रुओं को बलपूर्वक 
अपने वश में कर डालो ,
और राष्ट्र की रक्षा करो ।।3।।
अमर्त्य वीरपुत्रों !
तुम रिपुदल का नाश करने में निपुण हो ।
समर में अपना महारथ दिखाओ ,
सब ओर से शत्रुओं का भञ्जन करो ,
सब ओर से उन्हें नष्ट कर
हमारी रक्षा करो।।4।।
सेनापति !
तुम जानते हो उन अजेय सैनिकों को
जो रिपुदमन में हैं कुशल ,
उन्हें साथ में ले कर
प्रस्थान के लिये
रथ पर आरूढ होओ।।5।।
वज्र जैसे हाथों वाला सेनापति
बस , जीतने ही वाला है शत्रुओं की भूमि ।
लोगों ! सब मिल कर
उसका उत्साह-वर्द्धन करो।।6।।
हमारा सेनापति वही हो
जो दया छोड़ कर
नष्ट कर डाले शत्रुओं के समूह ,
किन्तु उन्हें अभय दे
जो हथियार डाल कर
आत्मसमर्पण कर दे।।7।।
हमारा सेनापति समर में
आगे-पीछे , दाँयें-बाँयें और मध्य में
शत्रुओं को परास्त कर
वायु के वेग से झपट कर
विजय प्राप्त करे।।8।।
ओ सेना के अधिपति !
पराक्रमी योद्धाओं !
अपने तन-मन में उत्साह जगाओ,
संयत हो कर उद्घोष करते हुए
विजय के लिये हुंकार भरो ।।9।।
 हमारे आयुध उन्नत हों ,
वेगवान् हों , संहार के लिये समर्थ हों ।
अश्वारोही , रथी कुशल हों ,
गगनभेदी जयघोष हो ।।10।।
ध्वजाएँ फहराती हों ,
शस्त्र हवा में ऊँचे लहराते हों ,
सेनापति के मन में
विजय का दृढ निश्चय हो
देववृंद युद्ध में सहायक हों।।11।।
ओ भयजन्य व्याधियों !
शत्रुओं के चित्त को लुभा कर
उनके अंगों को शिथिल कर दो ।
उनके हृदयों में घुस जाओ ,
जला-जला कर उन्हें
अज्ञान के अंधेरे में घोल दो।।12।।
ओ बाणों ! अस्त्र-शस्त्रों !
शत्रुसेना पर जा कर गिरो ।
एक-एक का विनाश करो ,
किसी को मत छोड़ो।।13।।
ओ वीर योद्धाओं ! जाओ ,
शीघ्र ही शत्रु पर आक्रमण करो।
तुम्हारी भुजाएँ हृष्ट-पुष्ट हों ,
तुम्हें दिव्य सहायताएँ सुलभ हों।।14।।
हे मरुद्गण !
शत्रु सेना बढी चली आ रही
हमसे स्पर्धा करती हुई ,
इसे प्रचंड वायु के वेग से ढँक दो इस तरह
कि ये एक-दूसरे को पहचान भी न सकें।।15।।
शिखाविहीन कुमारों की तरह
तीक्ष्ण बाण गिरते समरभूमि में यहाँ-वहाँ ,
सेनापति ! सबकी रक्षा करो।।16।।
हे राजन् !
तुम्हारी सेना के मर्मांगों को
ढँक देता हूँ कवच से ,
सोम उन अंगों को अमृत से भर दे,
वरुण उन्हें श्रेष्ठता दे ,
समस्त देवता विजय पर प्रसन्न हों।।17।।
वेदों में राष्ट्रभक्ति-
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लेख का प्रारम्भ अत्रि विक्रमार्क अन्तर्वेदी जी की श्रीसूक्त के पद की व्याख्या से करते हैं, फिर आगे बात करेंगे -
उपैतु मां देवसख: कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे।।
अर्थात् हे देव, हमें देवों के सखा कुबेर, और उनके
मित्र मणिभद्र तथा दक्ष
प्रजापति की कन्या कीर्ति (यश)
उपलब्ध करायें, जिससे हमें और राष्ट्र
को कीर्ति-समृद्धि प्राप्त हो।
ऋग्वेद के परिशिष्ट में प्राप्त श्रीसूक्त का यह सातवाँ मन्त्र है ।
उपैतु मां देवसख : कीर्तिश्च मणिना सह ।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥
७॥
हे महादेव सखा कुबेर ! मुझे मणि के साथ
कीर्ति भी प्राप्त हो । मैं इस राष्ट्र में
जन्मा हूँ । इसलिए यह मुझे कीर्ति और धन दें ।

प्रस्थला मद्रगान्धारा आरट्टा नामतः खशाः ।
वसातिसिन्धुसौवीरा इति प्रायोऽतिकुत्सिताः॥
--कर्णपर्व ४४
. आरट्टा नाम ते देशा बाह्लीका नाम ते जनाः |
वसातिसिन्धुसौवीरा इति प्रायो विकुत्सिताः ||(पाठान्तर)

धर्म हमारे राष्ट्र के कण-कण में संव्याप्त है इसलिए भारतीय राष्ट्रवाद आध्यात्मिक राष्ट्रीयता के
रूप में जाना जाता रहा है। यही कारण रहा है
कि हमारे ऋषियों ने भारत भूमि को माता कहा है। “माता भूमि पुत्रोहं पृथिव्याः” वाला यह राष्ट्र ही है जहाँ ऋषियों ने ब्रह्मज्ञान पाया व ब्रह्मसाक्षात्कार किया। विश्व को परिवार माननेकी सुंदर कल्पना भी इसी भूमि से उपजी है।
राष्ट्र का शाब्दिक अर्थ है-रातियों का संगम स्थल। राति शब्द देने
का पर्यायवाची है। राष्ट्रभूमि और
राष्ट्रजनों की यह संयुक्त इकाई राष्ट्र ईसीलिए कही जाती है
कि यहाँ राष्ट्रजन अपनी-अपनी देन राष्ट्रभूमि के चरणों में अर्पित करते है।
स्वामी विवेकानंद ने राष्ट्र को व्यष्टि का समष्टि में समर्पण कहते हुए
इसकी व्याख्या की है। आध्यात्मिक राष्ट्रीयता के उद्घोषक श्री अरविंद ने कहा है-राष्ट्र हमारी जन्मभूमि है।
 मनुस्मृति हमारे देश की साँस्कृतिक यात्रा की ओर संकेत करती है। भगवान मनु कहते हैं कि भारतवर्ष रूपी यह पावन अभियान सरस्वती और दृषद्वती नामक दो देवनदियों के मध्य देव विनिर्मित देश ब्रह्मावर्त से आरंभ
हुआ। सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम् ।
तं देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्तं प्रचक्षते ।।
तस्मिन्देशे  य  आचार:  पारम्पर्यक्रमागत: ।
वर्णानां  सान्तरालानां स सदाचार उच्यते ।।
एतद्देशप्रसूतस्य  सकाशादग्रजन्मन: ।
स्वं स्वं चरित्रम् शिक्षेरन्पृथिव्यां  सर्वमानवा:  ।।
--मनुस्मृति  १/१३६,१३७,१३९ 

 इस प्रकार मनु महाराज द्वारा सदाचार, नैतिकता देवत्व के सम्वर्द्धन प्रचार प्रसार में विश्वास रखने वाली भारतीय संस्कृति को बताया गया है।
 महाभारत के भीष्म पर्व में भारत
की यशोगाथा का वर्णन कुछ इस तरह हुआ है-
अत्रतेकीर्तयिष्यामिवर्षभारतभारतम्।
प्रिययमिंद्रस्यदेवस्यमनोवैंवस्वतस्यच॥
अर्थात् “हे भारत! अब मैं तुम्हें उस भारतवर्ष की कीर्ति सुनाता हूँ, जो देवराज इन्द्र को प्यारा था, जिस भारत को वैवस्वत मनु ने अपना प्रियपात्र बनाया था, भारतीय राष्ट्रवाद की व्याख्या करते हुए विष्णुपुराण में लिखा है-
 उत्तरम् यत् समुद्रस्य हिमाद्रे: चैव दक्षिणम्। वर्षम् तद्
भारतम् नाम भारती यत्र संतति:’ (२,३,१)।
इस प्रकार हमारे देश का प्राचीन नाम ब्रह्मावर्त  और  भारतवर्ष है ।
✍🏻अत्रि विक्रमार्क अन्तर्वेदी

अर्थववेद में ऋषियों ने कहा- भद्रं इच्छन्तः ऋषयः स्वर्विदः / तपो दीक्षां उपसेदु: अग्रे/ ततो राष्ट्रं बलं ओजश्च जातम्/ तदस्मै देवाः उपसं नमन्तु यानि आत्मज्ञानी ऋषियों ने जगत का कल्याण करने की इच्छा से सृष्टि के आरंभ में जो दीक्षा लेकर तप किया था, उससे राष्ट्र-निर्माण हुआ, राष्ट्रीय बल और ओज भी प्रकट हुआ। इसलिये सब विबुध होकर इस राष्ट्र के सामने नम्र होकर इसकी सेवा करें।

इस राष्ट्र का सीमांकन करते हुये ऋग्वेद में ऋषि में कहा था- यस्य इमे हिमवन्तो महित्वा यस्य समुद्रंरसया सह आहुः। यस्येंमे प्रदिशो यस्य तस्मै देवा हविषा विधेम।। अर्थात् हिमवान हिमालय जिसका गुण गा रहा है, नदियों समेत समुद्र जिसके यशोगान में निरत है, बाहु सदृश दिशाएं जिसकी वन्दना कर रही है, उस राष्ट्र-देव को हम अपना हविष्य अर्पित करें।

ऋषियों ने बार-बार जिस राष्ट्र-देव के आराधना और सेवा की बात की उसकी भगौलिक सीमाओं के बारे में जानने का सबसे अच्छा तरीका ये है कि वेदों में वर्णित नगर, नदी और स्थान जहाँ भी पायें जायें उसे ही हम वृहत्तर भारत की सीमा मान लें और अगर हम ऐसा करते हैं तो पश्चिम में हमें मिलता है आज का अफगानिस्तान जो कम से कम सातवीं-आठवीं सदी तक वृहत्तर भारत का हिस्सा था और पूर्ण हिन्दू था और जहाँ के अफ़रीदी और पख्तून लोगों का विशद वर्णन हमारे ऋग्वेद में मिलता है, जहाँ की नदियों, शहरों और पहाड़ों के नाम हमारे वेदों में बहुतायत से आयें हैं। जिन नदियों को आजकल हम आमू और काबुल नामों से जानते हैं, उन्हें वेदों में वक्षु और कुभा नदी कहा गया है। आमू दरिया वही है जिसे पार कर ह्वेनसांग भारत आये थे। इसी तरह वर्तमान काबुल संस्कृत साहित्य में कुभा नाम से जाना जाता था, आज का कांधार कभी गांधार था और स्वात को हम सुवास्तु नाम से जानते थे। बुद्ध अफगानिस्तान में लगभग 6 माह ठहरे थे। 843 ईस्वी में कल्लार नामक राजा ने अफगानिस्तान में हिन्दूशाही की स्थापना की थी और उन हिन्दू राजाओं को ‘काबुलशाह' या ‘महाराज धर्मपति' कहा जाता था। इन राजाओं में जयपाल और आनंदपाल का नाम तो इतिहास में रूचि रखने वाले लोग अवश्य जानते होंगे क्योंकि इन राजाओं ने लगभग 350 साल तक अरब आततायियों से मोर्चा लिया और उनको कभी सिंधु नदी पार करके भारत में  घुसने नहीं दिया, लेकिन 1019 में महमूद गजनी से त्रिलोचनपाल की हार के साथ अफगानिस्तान का हिन्दू इतिहास समाप्त हो गया और आज हालत ये है कि कभी हिन्दू राज्य रहे अफगानिस्तान में आज कुछेक हज़ार हिन्दू भी नहीं बचे हैं। देवी-देवताओं की भव्य-प्रतिमाएं किसी अजायबघर की धूल फाँक रहीं हैं तो बामियान की बुद्ध प्रतिमायें तालिबान के ध्वंस चिन्हों को सजाये अपनी संततियों को लज्जित कर रही है।

ये सब लिखने का हेतू ये नहीं है कि अफगानिस्तान के लिये आँसू बहाये जाये बल्कि ये है कि उन बिन्दुओं पर विमर्श हो जिसने अफगानिस्तान का ये हाल कर दिया। हिन्दुशाही राजा वीर थे, राष्ट्रभक्त थे और उनका राज्य उन सब मानकों पर खड़ा उतरता था जिस आधार पर किसी राज्य को आदर्श राज्य कहा जाये। मुस्लिम इतिहासकार फरिश्ता के अनुसार हिन्दूशाही राजाओं के खजाने को जब लूटा गया और लूट के माल को गजनी में प्रदर्शित किया गया तो पड़ोसी मुल्कों के राजदूतों की आंखें फटी की फटी रह गईं कि कोई राज्य इतना वैभवशाली भी हो सकता है। अलबरूनी और अल-उतबी ने लिखा है कि हिन्दूशाहियों के राज में मुसलमान, यहूदी, बौद्ध और हिन्दू सभी लोग मिल-जुलकर रहते थे और शासन द्वारा उनमें भेदभाव नहीं किया जाता था बल्कि उन्हें भी वो तमाम अधिकार प्राप्त थे जो किसी हिन्दू प्रजा को थे।

ये सब लिखने का हेतू ये है कि हमें इन प्रश्नों के उत्तर तलाशने हैं कि क्या खंडित राष्ट्रदेव की प्रतिमा की उपासना की जा सकती है? क्या राष्ट्र के अंदर सभी नागरिकों को भले ही उसकी राष्ट्रीय निष्ठा कुछ भी हो एक समान माना जा सकता है? क्या राष्ट्र-हित में स्वजन और परकीय मानसिकता का भेद नहीं मानना चाहिये? अगर सबके विकास और सबके हित की भावना से राष्ट्र की जड़े और उसके मूल नागरिकों की सुरक्षा संदिग्ध होती हो तो भी केवल "पोलिटिकल करेक्टनेस" के चलते उसे करते चले जाना सही है? मुहम्मद बिन क़ासिम सिंध को लूटने नहीं आया था बल्कि राजा दाहिर की शरणागत वत्सलता ने उसे आने पर मजबूर किया था। खोखले आदर्शवाद, इतिहास में अमर होने की चाह और पोलिटिकल करेक्टनेस की बीमारी ने दाहिर को तो मृत्यु के मुख में पहुँचाया ही साथ ही उसकी मासूम बेटियों को न जाने कितने दर्द झेलने पड़े और भारत के लिये अनवरत आक्रमणों का द्वार खुल गया। यही गलती अफगानिस्तान के भी हिन्दू राजाओं ने की थी जिसने नतीजे में कभी हिन्दू सूर्य से आलोकित होने वाला अफगानिस्तान आज भारत जीतने की मंशा रखने वाले लोगों की

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...