महातांडवसाक्षिणी
ललितासहस्रनाम में एक अवधारणा है > महातांडवसाक्षिणी।
नृत्य के तीन विंब और तीन अभिप्राय हैं
>[१]जब शून्य [शव] पर आद्या नृत्य कर रही है।
यह प्रलयकाल है,तिरोभाव की अवस्था।
ब्रह्म निष्क्रिय है और साक्षी है,त्रिगुणात्मक शक्ति नृत्य-निरत है।
[२]जब शिवा-शिव परस्पर साक्षी होकर के अथवा दोनों मिल कर युगलनृत्य कर रहे हैं।यह सृष्टिकाल है।
[३]
प्रलयकाल के आगमन का नृत्य, जब परम- भैरव सृष्टि को समेट कर आत्मसात करते
हुए तांडवनृत्य कर रहे हैं!वहां भगवती महातांडवसाक्षिणी हैं।
शिव के आनन्दनृत्य की चर्चा!!
संसार
की अन्य परंपराओं में कहीं ऐसा है या नहीं? मैं नहीं जानता , कि नृत्य के
माध्यम से विश्वबोध[सृष्टि; आविर्भाव- तिरोभाव] की विवेचना की गयी हो !
महान
कलावेत्ता आनन्द कुमारस्वामी जी ने पुस्तक लिखी > THE DANCE OF
SHIVA[A.K.Coomaarsvami] नटवर हों या नटराज!!रास हो या कालियनृत्य !
विचारकों ने उसी प्रकार से व्याख्या की है, जैसे तांडव और लास की।
महाकवि जयशंकरप्रसाद ने इस नृत्य का प्रसंग इस प्रकार चित्रित किया है >>>>>
चिति का स्वरूप यह नित्य जगत।
वह रूप बदलता है शत-शत,
कण विरह-मिलनमय नृत्य-निरत,
उल्लासपूर्ण आनन्द सतत।
[कामायनी : जयशंकर प्रसाद]
सनातन धर्म - हसता नाचता धर्म
इमे जीवा वि मृतैराववृत्रन्नभूद्भद्रा देवहूतिर्नो अद्य । प्राञ्चो अगाम नृतये हसाय द्राघीय आयुः प्रतरं दधानाः ॥
ऋग्वेद
में नृत सूनृत आदि शब्दों का प्रयोग बहुलता से है। ऋग्वेद में खोजेंगे तो
पदे-पदे प्राप्त होगा। उन सभी मन्त्रों को यहाँ लिख पाना सम्भव नहीं है।
नृ से नृत्य .. नृ अर्थात् वह मनुष्य जो नृत्य कर सकता है, जहाँ नृत्य है वही सूनृत है और जहाँ नृत्य की अवस्था नहीं वह अनृत है।
वैदिक ऋषि की कामना दीर्घायु होकर हसते नाचते हुये मृत्यु को वरण करने की है।
वेद
मन्त्रों में अंगुलियाँ फैलाकर नृत्य करने की बात है, इन्द्र भी नर्तक है
शिव भी । अग्नीषोमात्मक जगत् हरिहर रूप है। अग्नि रुद्र हैं सोम को हरि कह
सकते हैं , सोम हरिताभ है।
ऋषियों ने नाचते गाते हुये ही ईश भक्ति की क्योंकि ईश्वर भी नाचता हुआ और हसता हुआ है।
नाच गोविन्दा नाच
अयं वां कृष्णो अश्विना हवते वाजिनीवसू । मध्वः सोमस्य पीतये ॥
दसवीं
सदी में राजा भोज से पूर्व मालवा की धारा नगरी ने साहित्य, संगीत और कला
के क्षेत्र में उज्जयिनी के वैभव को बहुत पीछे छोड़ दिया था। वह समय भोज के
पितृव्य मुञ्ज का था, जिन्हें वाक्पतिराज द्वितीय के नाम से जाना जाता
है।मुञ्ज का शासनकाल सन् 974 से 994 तक का माना जाता है । राजा मुञ्ज ने 16
बार चालुक्यवंशी राजा तैलपदेव पर आक्रमण किया। अंतिम युद्ध के बाद मुञ्ज
तैलपदेव को बंदी बना कर उज्जयिनी ले आये, और फिर उदारतापूर्वक छोड़ भी दिया ।
कुछ ही दिनों बाद तैलपदेव ने फिर आक्रमण कर दिया, और मुञ्ज को पराजय झेलना
पड़ी । कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए मृत्यु का वरण करना पड़ा ।
वाक्पतिराज
मुञ्ज विद्वानों, कवियों और कलाकारों से प्रेम करते थे , वे सरस्वती के
अनन्य उपासक थे । राजा मुञ्ज की मृत्यु पर कही गई उक्ति धार के लोगों की
जुबान पर अब तक है। ” गते मुञ्जे यश:पुञ्जे निरालम्बा सरस्वती “, अर्थात्
यशस्वी मुञ्ज के चले जाने से तो सरस्वती का भी सहारा चला गया।
मुञ्ज
के समय में धारानगरी में दो भाई रहते थे । बड़े भाई का नाम था धनञ्जय ,और
छोटे का नाम था धनिक। दोनों भाई साहित्य में रुचि रखने वाले योग्य विद्वान्
थे। दोनों ही कुशाग्र थे, और दोनों पर ही मुञ्ज की स्नेह-दृष्टि थी। यह
समय आज से लगभग 1100 वर्ष पहले का है। सभाओं में भास, कालिदास, भट्टनारायण,
भवभूति के नाटक खेले जाने की परम्परा थी। धनञ्जय और धनिक दोनों की ही गहरी
रुचि संस्कृत नाटकों में थी, प्राय: दोनों मिल कर ही नाट्यनिर्देशन और
रंगकर्म करते, और मुञ्ज की उपस्थिति में नाट्यसभाओं का आयोजन होता।
उन
दिनों धारा नगरी में नाटक एक आन्दोलन की तरह था, और ये दोनों भाई ही इस
सांस्कृतिक आन्दोलन के सूत्रधार थे। इसी दौर में बड़े भाई धनञ्जय ने
नाट्यशास्त्र पर तीन सौ कारिकाएँ लिखीं, और छोटे भाई धनिक ने उन कारिकाओं
पर साथ ही साथ ‘अवलोक’ नामक टीका भी लिखी। धनञ्जय की इन कारिकाओं का संग्रह
” दशरूपकम् ” के नाम से जाना
जाता है। यह ‘दशरूपक’ प्राचीन
नाट्यशास्त्र का आधुनिक संस्करण माना जाता है, और ग्यारह सदियाँ बीत जाने
के बाद आज भी यही एक ग्रंथ है, जिसके सूत्र नाटककारों की अमूल्य निधि समझे
जाते हैं ।
मालवा की सांस्कृतिक राजधानी रही धारा नगरी में लिखा गया
‘दशरूपकम्’ भरत मुनि के नाट्यशास्त्र के बाद सबसे ज्यादा लोकप्रिय ग्रंथ
है। यह ग्रंथ चार प्रकाशों (अध्यायों )
में बाँटा गया है। ‘दशरूपकम्’
में नाटक के लक्षण, नाटक की पञ्चसन्धियों, कथावस्तु के भेदों के साथ नायक
और नायिकाओं के भेदों को सरलतापूर्वक समझाया गया है। नाटक में रसों की
महत्ता, पात्रों की संख्या, मंचनिर्माण की प्रक्रिया और रसास्वादन के
प्रकारों पर भी विस्तार से चर्चा हुई है ।
‘दशरूपकम्’ में जो
कारिकाएँ हैं , वे सामान्यत: कुछ सूत्रों को मिलाकर बने हुए सम्पूर्ण छंद
हैं। उदाहरण के लिये देखिए- “अवस्थानुकृतिर्नाट्यं। रूपं दृश्यतयोच्यते।
रूपकं तत्समारोपात्। दशधैव रसाश्रयम्। “धनञ्जय ने बहुत ही अच्छी तरह समझाया
है कि नाटक अवस्था की अनुकृति है। नाटक “रस” पर ही आश्रित होता है, और
नृत्य “भाव” पर आश्रित होता है। ताल और लय पर जो होता है, वह “नृत्त”
कहलाता है। धनिक ने अपनी अवलोक टीका से ‘दशरूपकम्’ में चार चाँद लगा दिये
हैं। संस्कृत साहित्य के अत्यंत महत्वपूर्ण और चुने हुए काव्य-अंशों को एक
जगह ला कर धनिक ने बड़े भाई की इस अनुपम कृति को रोचक बना दिया है।
‘दशरूपकम्’ एक विश्वस्तर का शास्त्रीय ग्रंथ है, किंतु आप इसे विविध रसों
से परिपूर्ण आह्लादमयी कविता की तरह भी आराम से पढ सकते हैं।
दशरूपककार
धनञ्जय के बाद नाट्यशास्त्र का कोई बड़ा आचार्य अब तक नहीं हुआ। धनञ्जय के
बाद भट्टनायक, महिमभट्ट, क्षेमेन्द्र , मम्मट, शारदातनय, विश्वनाथ आदि ने
धनञ्जय की शैली तो अपनायी, किन्तु शारदातनय को छोड़ कर कोई भी नाट्यशास्त्र
के नहीं, काव्यशास्त्र के ही आचार्य हुए।
नि:सन्देह ‘दशरूपक’ अकेले
धनञ्जय का पराक्रम नहीं है। छोटे भाई धनिक की बहुमूल्य टीका को वहाँ से हटा
लिया जाए, तो शायद यह एक नीरस ग्रंथ हो। पूरे ‘दशरूपकम्’ में धारा नगरी के
इन दोनों भाइयों की उपस्थिति साथ-साथ अनुभव होती है। धनिक ने तो बाद में
‘काव्यनिर्णय’ ग्रंथ भी लिखा था। धनिक का पुत्र वसन्ताचार्य भी बड़ा
विद्वान् था। वह भी मुञ्ज की राजसभा में सम्मानित हुआ था।
दशरूपक के
समापन में धनञ्जय ने एक श्लोक लिखा है, जिसमें वे धारनरेश के प्रति अत्यंत
कृतज्ञ होकर कहते हैं कि मुञ्ज की राजसभा में कुशलता को प्राप्त करने वाले
विष्णुपुत्र धनञ्जय ने पंडितों के मन को प्रसन्नता व प्रेम में बाँध लेने वाले इस दशरूपक का “आविष्कार ” किया है।
“विष्णो: सुतेनापि धनञ्जयेन विद्वन्मनोरागनिबन्धहेतु: ।
आविष्कृतं मुञ्जमहीशगोष्ठीवैदग्धभाजा दशरूपमेतत्।।” अत्रि विक्रमार्क
नृत्य शब्द की अर्थ पूर्ण प्रस्तुतिऔर भाव की अभिव्यक्ति का सुंदर सृजन है। भारतीय मनीषा ने नृत्य के शास्त्र का विकास किया है
और संसार को ऐसा सुंदर उपहार दिया जिसका विज्ञान,
गणित, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, नृशास्त्र और राजनीतिक शास्त्र है। यह ऋग्वेद से लेकर नाट्यवेद तक का अभिन्न अंग है।
हम
नृत्य को केवल चक्कर लेना भर समझते हैं तो समझना चाहिए कि बिल्कुल नहीं
समझते। समरांगण सूत्रधार का अंतिम अध्याय पांडुलिपियों में अधूरा मिला,
अपराजितपृच्छा में भी नृत्य सूत्र अधूरा था, अशोकमल्ल का नृत्य अध्याय
अधूरा, अभिनय दर्पण का पाठ खंडित और नृत्तसंग्रह भी आधा अधूरा... इस विषय
को अनेकविध जानने का उपाय था विष्णुधर्मोत्तर पुराण का नृत्तसूत्र, महाराणा
कुम्भा कृत नृत्य रत्नकोश और मानसोल्लास की चतुर्थ विंशति, पुंडरिक विट्ठल
का नर्तन निर्णय, जॉय सेनापति की नृत्य रत्नावली और भारताचार्य का नाट्य
शास्त्र... भारत की यह विरासत दरबार से लेकर जनजातियों तक बनी रही है।
भारत
ने नाट्यकला को वेद का दर्जा दिया है। पंचम वेद अर्थात् नाट्यशास्त्र।
इसकी रचना का श्रेय आचार्य भरत को दिया जाता है लेकिन उन्होंने प्राचीन
नाट्य शास्त्र को पितामह प्रोक्त कहा है। यह विश्वास व्यक्त किया है कि
अनेक शास्त्र जो पहले थे, उनकी रचना किसने की? स्मृति में भी उन रचनाकारों
के नाम नहीं रहे... तो जो-जो जिस विषय का प्रवर्तनकर्ता रहा, वह उसका
पितामह माना गया!
भरत ने स्वयं अपने विषय के लिए "ब्रह्मभरत" कहा है।
अनेक ग्रंथों में इस विभूतिप्रद ग्रंथ का उल्लेख है। महाभारत के आरण्यक
पर्व तक यह कहकर ऋषि रूप भरतसिंह का उल्लेख किया है कि वे नृत्य, गीत
विद्या के विशेषज्ञ हैं और लंकेश रावण की सभा में प्रतिष्ठित थे : ऋषिं
भरतशार्दूल नृत्यगीतविशारदाः।
कितने आश्चर्य की बात है कि भारत के पास
प्रदर्शनधर्मी कलाओं के शताधिक ग्रंथ और उनकी टीकाएं हैं। नाट्य शास्त्र की
टीका तो स्वयं आचार्य अभिनव गुप्त ने की और दशरूपक, नाट्यदर्पण,
अभिनयदर्पण, नाट्य लक्षण रत्नकोष की चर्चा के बिना कोई टीका पूरी ही नहीं
होती। लोक भाषाओं में भी नाटक लिखे और मंचित हुए। इनके तीन स्वरूप हैं :
घरेलू नाटक, पथीय नाटक और मंचीय नाटक। नाटक जीवन का दर्शन है और जीवन के
लिए ही जीवंत होता है...।
नाट्य रंगमंच और राेम
भारत में नाटकों की
सुदीर्घ परंपरा रही है। यूं तो वेदों में नाटकाें की तरह के संवाद मिलते
हैं, किंतु स्वतन्त्र नाट्यशास्त्र भी कम पुराना नहीं है। उसमें
पूर्ववर्ती शैलालिन सूत्रादि के स्मरण से ज्ञात होता है कि भरताचार्य,
जिनका काल चौथी सदी ईसापूर्व से लेकर पहली सदी तक अनुमानित किया गया है, से
पूर्व भी इस संबंध में काेई विशिष्ट शास्त्र भारत में विद्यमान था।
हरिवंश, रामायण आदि में कई नाटकों के मंचन के संकेत मिलते हैं और
नाट्यशास्त्र में भी नाटकों के मंचन होते रहने की लोक परंपरा के संदर्भ
मिलते हैं। दरअसल नाट्यशास्त्र की रचना के मूल में लोक और वेद का
सम्मिश्रण करने का विचार ही निहित है।
नाटकों की प्रस्तुति का
उद्देश्य था - ये राज्य सदा फले-फूले। इस रंगमंच की आशाओं को समृद्धि
सुलभ हो तथा प्रेक्षाकारक सज्जों को वेदों में वर्णित धर्म की प्राप्ति हो
-
राष्ट्र प्रवर्धतां चैव रंगस्याशा समृद्धयतु।
प्रेक्षाकर्तुर्महान्धर्मो भवतु ब्रह्मभावित:।। (नाट्यशास्त्र 5, 108)
नाट्यशास्त्र
का सबसे गौरवशाली पहलू है नाट्यशाला की रचना। द्वितीय अध्याय में
रंगमण्डप, रंगपीठ के संबंध में जो वर्णन है, वह दुनियाभर में अनूठा ही है
क्योंकि उसमें षड्दारुक, नेपथ्यगृह के साथ साथ ऊह, प्रत्यूह, संजवन,
सालभंजिका सहित निर्यूह, कुहर, चित्र जालक, गवाक्ष, कपोताली, कुट्टिम और
अनेकानेक स्तंभों वाली नाट्यशाला के संबंध में जो विवरण आया है, वह भारतीय
रंगमंचीय विधान की विराटता को दर्शाता है। भारत कें गुहाओं के काल से लेकर
राजधानियों में भी रंगमंचों की रचनाएं हुई हैं। महराणा कुंभा कृत सगीतराज,
श्रीकुमार के शिल्परत्नम्, मानसोल्लास, मानसार आदि में भी रंगमंचीय
स्वरूप का संदर्भ निर्माण के क्रम में आया है।
कई आश्चर्य है इस
नाट्यशाला की रचना में, कल मुझे रोम की संस्कृतिकर्मी सुजान्ने फेर्रअरी
Suzanne Ferrari ने अपनी एक साइट्स के बारे में बताया तो उसमें नाट्यशाला
का विवरण पढ़कर भारतीय परंपरा की ओर झांकने का मन बन गया। वैसे भारत का रोम
के साथ संबंध पुराना संबंध रहा है। रोम के व्यापारियों का भारत आना जाना
रहता था। पंचसिद्धांतिका का रोमकसिद्धांत, सूर्यसिद्धांत आदि का यवनपुर... न
जाने कितने संदर्भ हमारे पास हैं मगर एक संदर्भ नाट्यशाला का भी है...
तुलना की जा सकती है। साभार श्रीकृष्ण जुगन

