सोमवार, 13 नवंबर 2017

भगवान् शंकराचार्य तथा उनके परवर्ती आचार्यों के काल में आज ईरान के नाम से प्रसिद्ध देश के भी कुछ पूर्वी हिस्से और पूरा अफगानिस्तान बदरिकाश्रम में विद्यमान ज्योतिर्मठ (जोशीमठ) के पीठाचार्य शंकराचार्य के ही धार्मिक अधिकारक्षेत्र में आया करते थे, ऐसा मठाम्नाय-सेतु (महानुशासन) का अध्ययन करने से ज्ञात होता है। भारत वर्ष की चारों दिशाओं में विद्यमान चारों शंकराचार्य मठों के अधिकार क्षेत्र का निरूपण करते समय ज्योतिर्मठ के अधिकार क्षेत्र का निरूपण करते हुए इस बहुत ही प्राचीन ग्रन्थ में कहा गया है - "कुरु-काश्मीर-काम्बोज-पांचालादिविभागतः। ज्योतिर्मठवशा देशा उदीचीदिगवस्थिताः"॥२२॥ अर्थात् "कुरु देश, काश्मीर देश, काम्बोज देश और पांचाल आदि देशों में विभक्त उत्तर दिशा के जितने भी देश हैं, वे ज्योतिर्मठ के अधिकारक्षेत्र के अन्तर्गत आते हैं"। इस पोस्ट के साथ दिये गये मानचित्र को देखने से उस प्राचीन काल में इन सभी देशों की स्थिति का पता चलता है, सुदूर पश्चिम में गान्धार (कन्दहार, अफगानिस्तान) के भी आगे विद्यमान काम्बोज देश में आधुनिक अफगानिस्तान के कुछ दक्षिण पश्चिमी भूभाग और ईरान के कुछ पूर्वी भूभाग आ जाते हैं, ऐसा स्पष्ट इस मानचित्र में दिख रहा है। अहो! कैसा था वैदिक सनातन धर्म का वह अद्भुत स्वर्णिम युग !!! क्यों नहीं हमें ये सब तथ्य इतिहास में पढ़ाये जाते हैं, जिससे स्वाभिमान और गौरव से हमारा माथा ऊंचा और सीना चौड़ा हो सके...

यूनान में प्राचीन यूनानियों के आराध्य देवता अपोलो के २७०० वर्ष प्राचीन मन्दिर के प्रवेश द्वार पर यूनानी भाषा में लिखा है - "आत्मानं विद्धि" अर्थात् अपने आप को जानो। आश्चर्य है कि इस एक वाक्य में यूनानी दार्शनिकों व मनीषियों ने सभी वेदों तथा उपनिषदों के उपदेशों का सार रूप ज्ञान प्रस्तुत कर दिया गया है। इस सन्दर्भ में यह भी ध्यान देने योग्य है कि कई आधुनिक पुरातत्त्ववेत्ताओं ने यूनान के प्रसिद्ध देवता अपोलो के वैदिक रुद्र देव के साथ साम्य प्रदर्शित किया है। सत्य है कि प्राचीन विश्व में ईसाई व इसलाम धर्म के आने से पहले वैदिक आर्य देवताओं की ही विभिन्न स्वरूपों में पूजा उपासना होती थी, इसके प्रमाण सभी राष्ट्रों के पौराणिक कथानकों में सहज ही प्राप्त हो जाते हैं॥

सुदूर पूर्व में आस्ट्रेलिया के उत्तर में और फिलिपींस के दक्षिण-पूर्व में विद्यमान पापुआ द्वीप पर एक राज्य है जिसका नाम है - "जय-विजय," जिसकी राजधानी का नाम है - "वामन" - आश्चर्य है कि प्राचीन काल में भारतीय वैदिक संस्कृति कैसे इन सुदूर टापुओं तक पहुंची होगी, जिन टापुओं पर आज तक आधुनिक संस्कृति भी नहीं पहुंची है।

वैदिक सनातन धर्म के विभिन्न सम्प्रदायों का सामान्य परिचय: -- आज वैदिक सनातन धर्म के प्रमुख ४ सम्प्रदाय हैं – स्मार्त, वैष्णव, शैव एवं शाक्त। वास्तव में आज के सभी हिन्दू सम्प्रदाय इन्हीं ४ सम्प्रदायों में आ जाते हैं।भगवान् शिव, विष्णु, देवी, गणेश तथा सूर्य –
इन पांचों  देवताओं में से किसी एक की इष्ट देव रूप से तथा शेष की अङ्गरूप से पूजा करने वाला संप्रदाय “स्मार्त” कहलाता है; सभी मन्दिरों में जा कर भक्ति श्रद्धा के साथ मथा टेक लेने वाला आज का एक सामान्य हिन्दू वास्तव में इसी सम्प्रदाय के अन्दर आ जाता है। केवल भगवान् विष्णु अथवा उनके किसी अवतार भगवान् राम अथवा कृष्ण को ही परम आराध्य मानने वाले “वैष्णव”; भगवान् शिव के किसी एक स्वरूप को ही अपना परम आराध्य मानने वाले “शैव” तथा शक्ति अथवा देवी के किसी स्वरूप की पूजा करने वाले को “शाक्त” कहा जाता है। सबसे अधिक व्यापक स्मार्त सम्प्रदाय के परम आचार्य जगद्गुरु आदि शंकराचार्य भगवान् हैं, मत वैदिक उपनिषदों में निरूपित अद्वैत वेदान्त है, उपनिषद् गीता व ब्रह्मसूत्र धर्मग्रन्थ हैं तथा पंच-देव-उपासना उपासना-पद्धति है; जबकि अन्य सम्प्रदायों के अपने-अपने अलग-अलग आचार्य, मत-मतान्तर, धर्मग्रन्थ तथा उपासना-पद्धतियां हैं। प्राचीन काल में ॐकार स्वरूप भगवान् गणपति को ही परम आराध्य मानने वाला “गाणपत्य सम्प्रदाय” तथा भगवान् सूर्य देव की ही पूजा करने वाला “सौर सम्प्रदाय” – ये दो सम्प्रदाय भी विद्यमान होते थे; पर अब ये ऊपर उल्लिखित ४ सम्प्रदायों में ही मिल गये हैं, इनका अलग अस्तित्व अब देखने में नहीं आता। जबकि कुछ विद्वान् भारत के दक्षिणापथ में प्रसिद्ध भगवान् शिव के पुत्र स्कन्द स्वामी कुमार कार्तिकेय को ही परम आराध्य मान कर उपासना करने वाले “कौमार सम्प्रदाय” को एक अलग सम्प्रदाय मानते हैं; पर वास्तव में इस सम्प्रदाय को शैव सम्प्रदाय में ही मान लेना चाहिये। इन सभी सम्प्रदायों ने धर्म एवं अध्यात्म के क्षेत्र में ४ वेदों को ही सर्वश्रेष्ठ निर्विवाद प्रमाण माना है और उसे अपने-अपने सम्प्रदायों की आधारशिला स्वीकार किया है। अतः वेद भगवान् ही वास्तव में वैदिक सनातन धर्म का एकमात्र ऐसा धर्मग्रन्थ है, जिसे सभी सम्प्रदायों ने निर्विवाद हो एकमत से स्वीकार किया है; वेदों का सारभूत होने के कारण श्रीमद्भगवद्गीता को भी सभी संप्रदायों ने एकमत से स्वीकार किया है। अतः विभिन्न संप्रदायों में विभाजित हिन्दू धर्म को एकता के सूत्र में बांधने वाले धर्मग्रन्थ हैं – ४ वेद तथा उनका सारभूत श्रीमद्भगवद्गीता॥जय वेद नारायण॥


रविवार, 12 नवंबर 2017

कांग्रेस द्वारा हिन्दुओं पर किये गए अनेक एहसानों में से एक एहसान कांग्रेस ने देश की राजधानी दिल्ली स्थित दिल्ली विश्वविद्यालय में किया था। इस अहसान का पूरा श्रेय कांग्रेस को इसलिए और अधिक जाता है क्योंकि हिन्दुओं पर किये गए उसके इस एहसान में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका तत्कालीन कांग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की दुलारी बिटिया उपेन्द्र कौर ने निभाई थी। 
हिन्दुओं पर किया गया वह कांग्रेसी एहसान क्या था.?
इसकी जानकारी इस 🏼3 मिनट 53 सेकण्ड के वीडियो में सुप्रीमकोर्ट की प्रख्यात अधिवक्ता मोनिका अरोड़ा जी के श्रीमुख से सुनिए।
1400 साल पहले,200 साल तक 20 पिढीयों द्वारा पहाड़ को ऊपर से नीचे की तरफ तराशकर बनाया गया यह "कैलाश मंदिर ",ताजमहल से लाख गुना सुंदर और आकर्षक है ! भारतीय शिल्प कला का अद्भुत नमूना है .. !!

संपूर्ण हिन्दू पौराणिक कथाओं के शिल्प है ! विष्णु अवतार , महादेव से लेकर रामायण महाभारत भी मूर्तियों के रूप में दर्शाया गया है ! वो भी 1400 साल पहले ! पर देश इसके बारे में कहाँ जानता है ??

ये दुनिया की सर्वश्रेष्ठ वास्तुकला का अद्भुत नमूना है,
कैलाश मंदिर , वेरुळ लेणी (संभाजीनगर , महाराष्ट्र )!
--------------
अजय कर्मयोगी

शनिवार, 4 नवंबर 2017

ईज ऑफ़ डुइंग बिजनेस' कैसे किया जाता है 
1983 में यूनिलीवर को मरकरी (पारा) के थर्मामीटर बनाने वाली अपनी न्यूयॉर्क की फैक्ट्री वातावरण को नुकसान पहुँचाने की वजह से बन्द करनी पड़ी। पर वही फैक्ट्री उठ कर आ गई कोडाइकनाल में क्योंकि हमारी सरकारें 'ईज ऑफ़ डुइंग बिजनेस' में पहले से ही यकीन करती आई हैं। 2001 में पास के जंगलों-नदी को हुए भरी नुकसान की वजह से यह फैक्ट्री बन्द करनी पड़ी और यूनिलीवर ने माना कि उसने इन सालों में 13 क्विंटल मरकरी (जोर का झटका लगेगा लेकिन सच है) वातावरण में छोड़ा था। इसको ऐसे समझिये कि मरकरी एक ऐसा खतरनाक जहर है जिसका अगर 1 ग्राम प्रतिवर्ष 20 वर्ष तक वातावरण में छोड़ा जाये तो एक 20 एकड़ की झील इतनी जहरीली हो जाएगी कि उसकी मछलियां खाने लायक न रहेंगी। 
इस फैक्ट्री को अब तक पूरी तरह साफ़ नहीं किया गया है और मरकरी इससे अभी भी रिस रहा है। इलाके की आबादी इसकी सफाई की मांग कर रही है। 2002 में यूनिलीवर ने कहा था कि वह इतनी सफाई के लिए राजी है कि 1 किलोग्राम मिटटी में 10 मिलीग्राम मरकरी ही बचे, जबकि खुद इसके अपने मुख्यालय वाले लन्दन में 1 किग्रा मिटटी में 1 मिग्रा मरकरी को ही सुरक्षित माना गया है। लेकिन 2007 में यह एक भाड़े के संस्थान National Environmental Engineering Research Institute (NEERI) की रिपोर्ट ले आई कि 20-25 मिग्रा मरकरी रहने से भी काम चलेगा। इस संस्थान के भाड़े के 'विशेषज्ञों' के अनुसार ज्यादा सख्त कायदे से कंपनी को होने वाले नुकसान को भी ध्यान में रखना जरुरी है! सच बात है पूंजीवादी व्यवस्था में मुनाफे के सामने आम लोगों की जिंदगी-सेहत की क्या कीमत! लेकिन स्थानीय जनता और विधायक के विरोध पर तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 3 वैज्ञानिकों से मशविरा किया तो उन्होंने कंपनी के दावे को पूरे तरह से गलत ठहराया। कंपनी फिर भी मद्रास हाईकोर्ट में 20 मिग्रा से ज्यादा सफाई न करने का मुक़दमा लड़ती रही। 
अब आई बारी मोदी जी के 'मेक इन इण्डिया' के लिए 'ईज ऑफ़ डुइंग बिजनेस' करने की| तब के पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने 29 दिसंबर 2014 को एक पत्र लिखा जो 12 जुलाई 2015 को कंपनी के दावे के समर्थन में अदालत में भी पेश किया गया है। मंत्री जी कहते हैं कि उनके मंत्रालय ने इस पर पूरा वैज्ञानिक मंथन कर लिया है, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड व उनके मंत्रालय की ही साइंटिफिक एक्स

गुरुवार, 22 मई 2014


भारत की खेती को बर्बाद करने के लिए अंग्रेजो ने पहली सर्वे कराया की भरत के खेती को कैसे बर्बाद किया जाये ! अंग्रेजो ने जब सर्वे करा तो उनको एक बात पता चला कि भारत क किसान जो खेती करता है उसका केन्द्र बिन्दु है गाय !और उसका केन्द्र बिन्दु है बैल ! बैल गाय के बछड़े होते है !बछड़े बैल बनते है बेलों से खेत जोते जाते है फ़िर गाय दूध देती है किसान ढूध पिता है उसमे से शक्ति आती है तो खेतो मै मेंहनत करता है गाय गोबर देती है उस गोबर का खाद बनता है खाद मै ड़ालता है और खेत की शक्ति बढ़ता है गाय मूत्र देतीं है मूत्र को किसान कीटनाश्क के रूप मै प्रयोग मै लाता है तो गाय जो है वो भारतीय कृषि व्यवस्था के केन्द्र मै है !यह अंग्रेजो कि सरकार को पता चला तो अंग्रेज़ो ने एक कानून बनाकर भारत मै गाय का कत्ल करवाना आराम्भ किया तो १७६० मे इस देश मे अंग्रेज़ो के आदेश पर गाय का कत्ल होना शुरु हो गया ! कुछ लोगो को ऐसा लगता है और वो लोग कहते भी है कि राजीव भाई अंग्रेजो से पहले भी तो मुसलमान राजा थे ! वो भी तो गाय कत्ल करवाते थे ! मै आपको जानकारी देना चाहता हू कि एक -दो मुसलमान राजाओ को छोङ कर, भारत मै किसी भि राजा ने गाय क़ा कत्ल नही करवाया ! मुसलमानो के राजाओं के ज़माने मै तो भारत मै एस कानून रहा है कि जो गाय का कत्ल करे उसको फ़ासी कि सज़ा दी जाए ! यह अंग्रेज थे जिन्होने गाय कत्ल कारवाने के लिए व्यवस्थित रुप से कानून बनवा दिया और सन १७६० से भारत मई गाय का कत्ल करवाना अंग्रेजो ने शुरु किया !
गाय का कत्ल करवाते तो अंग्रेजो को दो फायदे होते थे ! एक तो भारत के किसान जो सबसे बड़ा पशुधन था गाय ! वो खत्म होत था ! गाय मरती थे तो दूध कम होता था ! गाय मरती थी तो गोबर कम होता था ! गोबर कम होता था ! गोबर कम होता था तो खाद कम होती थी ! गाय मरती थी तो मूत्र नहीं मिलता था ! किसानो के लिए जो कीटनासक दवायें बनतीं थीं उसमेँ कमी आती थी ! गाय का दूध नहीं मिलता था तो किसानोँ की शक्ति कम होती थी ! तो लगातार गाय के कत्ल होते चले जाने के कारण भारत की खेती का भी नाश होना शुरु हो गया और अंग्रेजो ने बहुत ही व्यवस्थित तरीके से इस देश मै कत्ल कारखानें खुलवाये !अंग्रेजो कि सरकार ने पुरे देश मै लगभग ३०० से ज्यादा कत्ल कारखाने खुलवाये ! जिनमे गाय और गौवंस का कत्ल किया जाता था ! हजारो कि संख्या मै लाखोँ कि संख्या मै गाय और गौवंश का कत्ल होता था

सोमवार, 19 मई 2014

ये कैसा लोकतंत्र है जहा जिसने कभी खेत में हल नहीं चलाया वो कृषि मंत्री बन जाता है ।
जिसे अपने गाव की सीमा का ज्ञान नहीं जिसने कभी SLR देखी नहीं वो रक्षा मंत्री बन जाता है ।
क्या वर्तमान सरकार अन्य सरकारों की भांति अपनी पार्टी की सुरक्षा के लिए देश की सुरक्षा को दाव पर लगा देगी ?
यदि ऐसा दौर मंत्रिमंडल के गठन हेतु चल रहा है तो हमें ऐसे अच्छे दिन मंजूर नहीं है मोदी जी ।
आपने महात्मा गाँधी जी के कांग्रेस मुक्त भारत के सपने को साकार कर दिया परन्तु आजादी के आन्दोलन के ब्रह्मास्त्र स्वदेशी का प्रत्यक्ष रूप से नाम लेने से भी बचते हो ।
जब भारत के परधानमंत्री को जनता ने चुना है तो क्या भारत का वित्त मंत्री वाणिज्य मंत्री ,गृहमंत्री ,विदेशमंत्री ,कृषि मंत्री ,रक्षामंत्री बहुराष्ट्रीय कंपनिया IMF और WORLD BANK के दबाव में तय करंगे वर्तमान राजनीती में कई व्यक्ति ऐसे है जो बहुराष्ट्रीय कंपनियो के हर षड़यंत्र से वाकिफ है
और वो डटकर मुकाबला कर सकते है । पर उन्हें मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलेगी ।
और ना ही ये पद की लालसा रखते है रही बात अनुभव की तो क्या आप को श्रेष्ठ भारतीय जैसा इमानदार देश भक्त और अनुभवी कोई अन्य व्यक्ति भाजपा में नज़र आता है क्या जो रक्षा मंत्री का पदभार संभाल सके ?
अब हमें दबाव डालना होगा ।
और स्वदेशी के प्रखर पक्षधर नेतृत्व को मंत्रिमंडल में शामिल करने हेतु दबाव बनाने की जरूरत है ।
मै यदि गलत हूँ तो मार्गदर्शन करे और यदि सही तो इस विचार को को आन्दोलन के रूप में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व तक पहुचाये ।

भारी बारिश के बाद भारी भीड़ इकठ्ठा हुई सनम लुआंग , रॉयल मैदान में  वैसे  कुछ लोग राजा की एक झलक पाने के लिए उत्साहित थी पर अधिकाँश भीड़ मैदान के चारो ऒर मुख्या घटना को देखने के लिए खड़ी थी - शाही जुताई समारोह ( Royal Ploughing Ceremony ).यह समारोह अच्छी फसल सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है।  जुताई समारोह महात्मा बुद्ध से भी पहले , 2500 साल पहले से आयोजित किया जाता है।  इस समारोह की तारीख ब्राह्मण ज्योतिसियो द्वारा सुनिश्चित की जाती है।  थाईलैंड अब भी कृषि प्रधान देश है , आधी से ज्यादा थाईलैंड की जनता कृषि पर ही निर्भर है। जुताई समारोह किसानो का मनोबल बढ़ने के लिए की जाती है , और वर्ष भर की फसल उत्पादन की भविस्यवाणी भी करी जाती है।  इस समारोह को रक ना क्वान कहा जाता है - मतलब पहली शुभ जुताई।  हालांकि राजा और शाही परिवार मौजूद होते है पर समारोह (2013 ) के प्रमुख है दो सफ़ेद बैल - प्र को फाह और प्र को साईं।  राजा की उम्र ज्यादा है इसलिए वो एक मुखिया बनाता है जो पुरे जुलूस के साथ खेत जोतता है।  जुलूस का नेतृत्व ब्राह्मणो द्वारा किया जाता है।  बैलो को सुन्दर कपड़ो गहनो से सजाया जाता है।  ब्राह्मण खेत में पानी और बीज छिड़कता है।  उसके बाद बैल खेत को तीन बार और जोतते है। उसके बाद बैल जो खाना पसंद करता है उसके हिसाब से ब्राह्मण साल की उपज की भविस्य वाणी करता है


सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...