बुधवार, 22 नवंबर 2017

विश्व की पहली भूगोल पुस्तक - श्री विष्णु पुराण . World's first Geography Book - Shri Vishnu Puran

जी हाँ! ठीक शीर्षक पढ़ा आपने, पृथ्वी का संपूर्ण लिखित वर्णन सबसे पहले विष्णु पुराण में देखने को मिलता है... विष्णु पुराण के रचियता है... महान ऋषि पाराशर...

ऋषि पाराशर महर्षि वसिष्ठ के पौत्र, गोत्रप्रवर्तक, वैदिक सूक्तों के द्रष्टा एवं ग्रंथकार थे... राक्षस द्वारा मारे गए वसिष्ठ के पुत्र शक्ति से इनका जन्म हुआ। बड़े होने पर माता अदृश्यंती से पिता की मृत्यु की बात ज्ञात होने पर राक्षसों के नाश के निमित्त इन्होंने राक्षस सत्र नामक यज्ञ शुरू किया जिसमें अनेक निरपराध राक्षस मारे जाने लगे। यह देखकर पुलस्त्य आदि ऋषियों ने उपदेश देकर इनकी राक्षसों के विनाश से निवृत्त किया और पुराण प्रवक्ता होने का वर दिया। इसके पश्चात् इन्होने विष्णु पुराण की रचना की...

यह पुराण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा प्राचीन है। इस पुराण में आकाश आदि भूतों का परिमाण, समुद्र, सूर्य आदि का परिमाण, पर्वत, देवतादि की उत्पत्ति, मन्वन्तर, कल्प-विभाग, सम्पूर्ण धर्म एवं देवर्षि तथा राजर्षियों के चरित्र का विशद वर्णन है। अष्टादश महापुराणों में श्रीविष्णुपुराण का स्थान बहुत ऊँचा है। इसमें अन्य विषयों के साथ भूगोल, ज्योतिष, कर्मकाण्ड, राजवंश और श्रीकृष्ण-चरित्र आदि कई प्रंसगों का बड़ा ही अनूठा और विशद वर्णन किया गया है।

यहाँ स्वयं भगवान् कृष्ण महादेवजी के साथ अपनी अभिन्नता प्रकट करते हुए श्रीमुखसे कहते हैं-

“त्वया यदभयं दत्तं तद्दत्तमखिलं मया।
मत्तोऽविभिन्नमात्मानं द्रुष्टुमर्हसि शङ्कर।
योऽहं स त्वं जगच्चेदं सदेवासुरमानुषम्।
मत्तो नान्यदशेषं यत्तत्त्वं ज्ञातुमिहार्हसि।
अविद्यामोहितात्मानः पुरुषा भिन्नदर्शिनः।
वन्दति भेदं पश्यन्ति चावयोरन्तरं हर॥"

इस पुराण में इस समय सात हजार श्लोक उपलब्ध हैं। कई ग्रन्थों में इसकी श्लोक संख्या तेईस हजार बताई जाती है। विष्णु पुराण में पुराणों के पांचों लक्षणों अथवा वर्ण्य-विषयों-सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित का वर्णन है। सभी विषयों का सानुपातिक उल्लेख किया गया है। बीच-बीच में अध्यात्म-विवेचन, कलिकर्म और सदाचार आदि पर भी प्रकाश डाला गया है।

ये निम्नलिखित भागों मे वर्णित है-

१. पूर्व भाग-प्रथम अंश
२. पूर्व भाग-द्वितीय अंश
३. पूर्व भाग-तीसरा अंश
४. पूर्व भाग-चतुर्थ अंश
५. पूर्व भाग-पंचम अंश
६. पूर्व भाग-छठा अंश
७. उत्तरभाग

यहाँ पर मैं सारे भागों का संछिप्त वर्णन भी नहीं करना चाहता... क्योकिं लेख के अत्याधिक लम्बे हो जाने की सम्भावना है ... परन्तु लेख की विषय वस्तु के हिसाब से इसके "पूर्व भाग-द्वितीय अंश" का परिचय देना चाहूँगा .... इस भाग में ऋषि पाराशर ने पृथ्वी के द्वीपों, महाद्वीपों, समुद्रों, पर्वतों, व धरती के समस्त भूभाग का विस्तृत वर्णन किया है...

ये वर्णन विष्णु पुराण में ऋषि पाराशर जी श्री मैत्रेय ऋषि से कर रहे हैं उनके अनुसार इसका वर्णन सहस्त्र वर्षों में भी नहीं हो सकता है। यह केवल अति संक्षेप वर्णन है। हम इससे इसकी महानता तथा व्यापकता का अंदाजा लगा सकते हैं...

जो मनुष्य भक्ति और आदर के साथ विष्णु पुराण को पढते और सुनते है,वे दोनों यहां मनोवांछित भोग भोगकर विष्णुलोक में जाते है।

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ऋषि पाराशर के अनुसार ये पृथ्वी सात महाद्वीपों में बंटी हुई है... (आधुनिक समय में भी ये ७ Continents में विभाजित है यानि - Asia, Africa, North America, South America, Antarctica, Europe, and Australia)

ऋषि पाराशर के अनुसार इन महाद्वीपों के नाम हैं -

१. जम्बूद्वीप
२. प्लक्षद्वीप
३. शाल्मलद्वीप
४. कुशद्वीप
५. क्रौंचद्वीप
६. शाकद्वीप
७. पुष्करद्वीप

ये सातों द्वीप चारों ओर से क्रमशः खारे पानी, नाना प्रकार के द्रव्यों और मीठे जल के समुद्रों से घिरे हैं। ये सभी द्वीप एक के बाद एक दूसरे को घेरे हुए बने हैं, और इन्हें घेरे हुए सातों समुद्र हैं। जम्बुद्वीप इन सब के मध्य में स्थित है।
इनमे से जम्बुद्वीप का सबसे विस्तृत वर्णन मिलता है... इसी में हमारा भारतवर्ष स्थित है...

सभी द्वीपों के मध्य में जम्बुद्वीप स्थित है। इस द्वीप के मध्य में सुवर्णमय सुमेरु पर्वत स्थित है। इसकी ऊंचाई चौरासी हजार योजन है और नीचे कई ओर यह सोलह हजार योजन पृथ्वी के अन्दर घुसा हुआ है। इसका विस्तार, ऊपरी भाग में बत्तीस हजार योजन है, तथा नीचे तलहटी में केवल सोलह हजार योजन है। इस प्रकार यह पर्वत कमल रूपी पृथ्वी की कर्णिका के समान है।

सुमेरु के दक्षिण में हिमवान, हेमकूट तथा निषध नामक वर्ष पर्वत हैं, जो भिन्न भिन्न वर्षों का भाग करते हैं। सुमेरु के उत्तर में नील, श्वेत और शृंगी वर्षपर्वत हैं। इनमें निषध और नील एक एक लाख योजन तक फ़ैले हुए हैं। हेमकूट और श्वेत पर्वत नब्बे नब्बे हजार योजन फ़ैले हुए हैं। हिमवान और शृंगी अस्सी अस्सी हजार योजन फ़ैले हुए हैं।
मेरु पर्वत के दक्षिण में पहला वर्ष भारतवर्ष कहलाता है, दूसरा किम्पुरुषवर्ष तथा तीसरा हरिवर्ष है। इसके दक्षिण में रम्यकवर्ष, हिरण्यमयवर्ष और तीसरा उत्तरकुरुवर्ष है।  उत्तरकुरुवर्ष द्वीपमण्डल की सीमा पार होने के कारण भारतवर्ष के समान धनुषाकार है।

इन सबों का विस्तार नौ हजार योजन प्रतिवर्ष है। इन सब के मध्य में इलावृतवर्ष है, जो कि सुमेरु पर्वत के चारों ओर नौ हजार योजन फ़ैला हुआ है। एवं इसके चारों ओर चार पर्वत हैं, जो कि ईश्वरीकृत कीलियां हैं, जो कि सुमेरु को धारण करती हैं,

ये सभी पर्वत इस प्रकार से हैं:-

पूर्व में मंदराचल
दक्षिण में गंधमादन
पश्चिम में विपुल
उत्तर में सुपार्श्व

ये सभी दस दस हजार योजन ऊंचे हैं। इन पर्वतों पर ध्वजाओं समान क्रमश कदम्ब, जम्बु, पीपल और वट वृक्ष हैं। इनमें जम्बु वृक्ष सबसे बड़ा होने के कारण इस द्वीप का नाम जम्बुद्वीप पड़ा है। यहाँ से जम्बु नद नामक नदी बहती है। उसका जल का पान करने से बुढ़ापा अथवा इन्द्रियक्षय नहीं होता। उसके मिनारे की मृत्तिका (मिट्टी) रस से मिल जाने के कारण सूखने पर जम्बुनद नामक सुवर्ण बनकर सिद्धपुरुषों का आभूषण बनती है।

मेरु पर्वत के पूर्व में भद्राश्ववर्ष है, और पश्चिम में केतुमालवर्ष है। इन दोनों के बीच में इलावृतवर्ष है। इस प्रकार उसके पूर्व की ओर चैत्ररथ , दक्षिण की ओर गन्धमादन, पश्चिम की ओर वैभ्राज और उत्तर की ओर नन्दन नामक वन हैं। तथा सदा देवताओं से सेवनीय अरुणोद, महाभद्र, असितोद और मानस – ये चार सरोवर हैं।

मेरु के पूर्व में

शीताम्भ,
कुमुद,
कुररी,
माल्यवान,
वैवंक आदि पर्वत हैं।

मेरु के दक्षिण में

त्रिकूट,
शिशिर,
पतंग,
रुचक
और निषाद आदि पर्वत हैं।

मेरु के उत्तर में

शंखकूट,
ऋषभ,
हंस,
नाग
और कालंज पर्वत हैं।

समुद्र के उत्तर तथा हिमालय के दक्षिण में भारतवर्ष स्थित है। इसका विस्तार नौ हजार योजन है। यह स्वर्ग अपवर्ग प्राप्त कराने वाली कर्मभूमि है। इसमें सात कुलपर्वत हैं: महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान, ऋक्ष, विंध्य और पारियात्र ।

भारतवर्ष के नौ भाग हैं:

इन्द्रद्वीप,
कसेरु,
ताम्रपर्ण,
गभस्तिमान,
नागद्वीप,
सौम्य,
गन्धर्व
और वारुण, तथा यह समुद्र से घिरा हुआ द्वीप उनमें नवां है।

यह द्वीप उत्तर से दक्षिण तक सहस्र योजन है। यहाँ चारों वर्णों के लोग मध्य में रहते हैं। शतद्रू और चंद्रभागा आदि नदियां हिमालय से, वेद और स्मृति आदि पारियात्र से, नर्मदा और सुरसा आदि विंध्याचल से, तापी, पयोष्णी और निर्विन्ध्या आदि ऋक्ष्यगिरि से निकली हैं। गोदावरी, भीमरथी, कृष्णवेणी, सह्य पर्वत से; कृतमाला और ताम्रपर्णी आदि मलयाचल से, त्रिसामा और आर्यकुल्या आदि महेन्द्रगिरि से तथा ऋषिकुल्या एवंकुमारी आदि नदियां शुक्तिमान पर्वत से निकलीं हैं। इनकी और सहस्रों शाखाएं और उपनदियां हैं।

इन नदियों के तटों पर कुरु, पांचाल, मध्याअदि देशों के; पूर्व देश और कामरूप के; पुण्ड्र, कलिंग, मगध और दक्षिणात्य लोग, अपरान्तदेशवासी, सौराष्ट्रगण, तहा शूर, आभीर एवं अर्बुदगण, कारूष, मालव और पारियात्र निवासी; सौवीर, सन्धव, हूण; शाल्व, कोशल देश के निवासी तथा मद्र, आराम, अम्बष्ठ और पारसी गण रहते हैं। भारतवर्ष में ही चारों युग हैं, अन्यत्र कहीं नहीं। इस जम्बूद्वीप को बाहर से लाख योजन वाले खारे पानी के वलयाकार समुद्र ने चारों ओर से घेरा हुआ है। जम्बूद्वीप का विस्तार एक लाख योजन है।

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प्लक्षद्वीप का वर्णन -

प्लक्षद्वीप का विस्तार जम्बूद्वीप से दुगुना है। यहां बीच में एक विशाल प्लक्ष वृक्ष लगा हुआ है। यहां के स्वामि मेधातिथि के सात पुत्र हुए हैं। ये थे:
शान्तहय,
शिशिर,
सुखोदय,
आनंद,
शिव,
क्षेमक,
ध्रुव ।

यहां इस द्वीप के भी भारतवर्ष की भांति ही सात पुत्रों में सात भाग बांटे गये, जो उन्हीं के नामों पर रखे गये थे: शान्तहयवर्ष, इत्यादि।

इनकी मर्यादा निश्चित करने वाले सात पर्वत हैं:

गोमेद,
चंद्र,
नारद,
दुन्दुभि,
सोमक,
सुमना
और वैभ्राज।

इन वर्षों की सात ही समुद्रगामिनी नदियां हैं अनुतप्ता, शिखि, विपाशा, त्रिदिवा, अक्लमा, अमृता और सुकृता। इनके अलावा सहस्रों छोटे छोटे पर्वत और नदियां हैं। इन लोगों में ना तो वृद्धि ना ही ह्रास होता है। सदा त्रेतायुग समान रहता है। यहां चार जातियां आर्यक, कुरुर, विदिश्य और भावी क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं। यहीं जम्बू वृक्ष के परिमाण वाला एक प्लक्ष (पाकड़) वृक्ष है। इसी के ऊपर इस द्वीप का नाम पड़ा है।

प्लक्षद्वीप अपने ही परिमाण वाले इक्षुरस के सागर से घिरा हुआ है।

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शाल्मल द्वीप का वर्णन

इस द्वीप के स्वामि वीरवर वपुष्मान थे। इनके सात पुत्रों :
श्वेत,
हरित,
जीमूत,
रोहित,
वैद्युत,
मानस
और सुप्रभ के नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं। इक्षुरस सागर अपने से दूने विस्तार वाले शाल्मल द्वीप से चारों ओर से घिरा हुआ है। यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।

इसमें महाद्वीप में
कुमुद,
उन्नत,
बलाहक,
द्रोणाचल,
कंक,
महिष,
ककुद्मान नामक सात पर्वत हैं।

इस महाद्वीप में -
योनि,
तोया,
वितृष्णा,
चंद्रा,
विमुक्ता,
विमोचनी
एवं निवृत्ति नामक सात नदियां हैं।

यहाँ -
श्वेत,
हरित,
जीमूत,
रोहित,
वैद्युत,
मानस
और सुप्रभ नामक सात वर्ष हैं।

यहां -
कपिल,
अरुण,
पीत
और कृष्ण नामक चार वर्ण हैं।

यहां शाल्मल (सेमल) का अति विशाल वृक्ष है। यह महाद्वीप अपने से दुगुने विस्तार वाले सुरासमुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है।

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कुश द्वीप का वर्णन

इस द्वीप के स्वामि वीरवर ज्योतिष्मान थे।

इनके सात पुत्रों :
उद्भिद,
वेणुमान,
वैरथ,
लम्बन,
धृति,
प्रभाकर,
कपिल

इनके नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं। मदिरा सागर अपने से दूने विस्तार वाले कुश द्वीप से चारों ओर से घिरा हुआ है। यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।

पर्वत -
विद्रुम,
हेमशौल,
द्युतिमान,
पुष्पवान,
कुशेशय,
हरि
और मन्दराचल नामक सात पर्वत हैं।

नदियां -

धूतपापा,
शिवा,
पवित्रा,
सम्मति,
विद्युत,
अम्भा
और मही नामक सात नदियां हैं।

सात वर्ष -

उद्भिद,
वेणुमान,
वैरथ,
लम्बन,
धृति,
प्रभाकर,
कपिल नामक सात वर्ष हैं।

वर्ण -

दमी,
शुष्मी,
स्नेह
और मन्देह नामक चार वर्ण हैं।

यहां कुश का अति विशाल वृक्ष है। यह महाद्वीप अपने ही बराबर के द्रव्य से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है।

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क्रौंच द्वीप का वर्णन -

इस द्वीप के स्वामि वीरवर द्युतिमान थे।

इनके सात पुत्रों :

कुशल,
मन्दग,
उष्ण,
पीवर,
अन्धकारक,
मुनि
और दुन्दुभि के नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं। यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष

सोमवार, 13 नवंबर 2017

भगवान् शंकराचार्य तथा उनके परवर्ती आचार्यों के काल में आज ईरान के नाम से प्रसिद्ध देश के भी कुछ पूर्वी हिस्से और पूरा अफगानिस्तान बदरिकाश्रम में विद्यमान ज्योतिर्मठ (जोशीमठ) के पीठाचार्य शंकराचार्य के ही धार्मिक अधिकारक्षेत्र में आया करते थे, ऐसा मठाम्नाय-सेतु (महानुशासन) का अध्ययन करने से ज्ञात होता है। भारत वर्ष की चारों दिशाओं में विद्यमान चारों शंकराचार्य मठों के अधिकार क्षेत्र का निरूपण करते समय ज्योतिर्मठ के अधिकार क्षेत्र का निरूपण करते हुए इस बहुत ही प्राचीन ग्रन्थ में कहा गया है - "कुरु-काश्मीर-काम्बोज-पांचालादिविभागतः। ज्योतिर्मठवशा देशा उदीचीदिगवस्थिताः"॥२२॥ अर्थात् "कुरु देश, काश्मीर देश, काम्बोज देश और पांचाल आदि देशों में विभक्त उत्तर दिशा के जितने भी देश हैं, वे ज्योतिर्मठ के अधिकारक्षेत्र के अन्तर्गत आते हैं"। इस पोस्ट के साथ दिये गये मानचित्र को देखने से उस प्राचीन काल में इन सभी देशों की स्थिति का पता चलता है, सुदूर पश्चिम में गान्धार (कन्दहार, अफगानिस्तान) के भी आगे विद्यमान काम्बोज देश में आधुनिक अफगानिस्तान के कुछ दक्षिण पश्चिमी भूभाग और ईरान के कुछ पूर्वी भूभाग आ जाते हैं, ऐसा स्पष्ट इस मानचित्र में दिख रहा है। अहो! कैसा था वैदिक सनातन धर्म का वह अद्भुत स्वर्णिम युग !!! क्यों नहीं हमें ये सब तथ्य इतिहास में पढ़ाये जाते हैं, जिससे स्वाभिमान और गौरव से हमारा माथा ऊंचा और सीना चौड़ा हो सके...

यूनान में प्राचीन यूनानियों के आराध्य देवता अपोलो के २७०० वर्ष प्राचीन मन्दिर के प्रवेश द्वार पर यूनानी भाषा में लिखा है - "आत्मानं विद्धि" अर्थात् अपने आप को जानो। आश्चर्य है कि इस एक वाक्य में यूनानी दार्शनिकों व मनीषियों ने सभी वेदों तथा उपनिषदों के उपदेशों का सार रूप ज्ञान प्रस्तुत कर दिया गया है। इस सन्दर्भ में यह भी ध्यान देने योग्य है कि कई आधुनिक पुरातत्त्ववेत्ताओं ने यूनान के प्रसिद्ध देवता अपोलो के वैदिक रुद्र देव के साथ साम्य प्रदर्शित किया है। सत्य है कि प्राचीन विश्व में ईसाई व इसलाम धर्म के आने से पहले वैदिक आर्य देवताओं की ही विभिन्न स्वरूपों में पूजा उपासना होती थी, इसके प्रमाण सभी राष्ट्रों के पौराणिक कथानकों में सहज ही प्राप्त हो जाते हैं॥

सुदूर पूर्व में आस्ट्रेलिया के उत्तर में और फिलिपींस के दक्षिण-पूर्व में विद्यमान पापुआ द्वीप पर एक राज्य है जिसका नाम है - "जय-विजय," जिसकी राजधानी का नाम है - "वामन" - आश्चर्य है कि प्राचीन काल में भारतीय वैदिक संस्कृति कैसे इन सुदूर टापुओं तक पहुंची होगी, जिन टापुओं पर आज तक आधुनिक संस्कृति भी नहीं पहुंची है।

वैदिक सनातन धर्म के विभिन्न सम्प्रदायों का सामान्य परिचय: -- आज वैदिक सनातन धर्म के प्रमुख ४ सम्प्रदाय हैं – स्मार्त, वैष्णव, शैव एवं शाक्त। वास्तव में आज के सभी हिन्दू सम्प्रदाय इन्हीं ४ सम्प्रदायों में आ जाते हैं।भगवान् शिव, विष्णु, देवी, गणेश तथा सूर्य –
इन पांचों  देवताओं में से किसी एक की इष्ट देव रूप से तथा शेष की अङ्गरूप से पूजा करने वाला संप्रदाय “स्मार्त” कहलाता है; सभी मन्दिरों में जा कर भक्ति श्रद्धा के साथ मथा टेक लेने वाला आज का एक सामान्य हिन्दू वास्तव में इसी सम्प्रदाय के अन्दर आ जाता है। केवल भगवान् विष्णु अथवा उनके किसी अवतार भगवान् राम अथवा कृष्ण को ही परम आराध्य मानने वाले “वैष्णव”; भगवान् शिव के किसी एक स्वरूप को ही अपना परम आराध्य मानने वाले “शैव” तथा शक्ति अथवा देवी के किसी स्वरूप की पूजा करने वाले को “शाक्त” कहा जाता है। सबसे अधिक व्यापक स्मार्त सम्प्रदाय के परम आचार्य जगद्गुरु आदि शंकराचार्य भगवान् हैं, मत वैदिक उपनिषदों में निरूपित अद्वैत वेदान्त है, उपनिषद् गीता व ब्रह्मसूत्र धर्मग्रन्थ हैं तथा पंच-देव-उपासना उपासना-पद्धति है; जबकि अन्य सम्प्रदायों के अपने-अपने अलग-अलग आचार्य, मत-मतान्तर, धर्मग्रन्थ तथा उपासना-पद्धतियां हैं। प्राचीन काल में ॐकार स्वरूप भगवान् गणपति को ही परम आराध्य मानने वाला “गाणपत्य सम्प्रदाय” तथा भगवान् सूर्य देव की ही पूजा करने वाला “सौर सम्प्रदाय” – ये दो सम्प्रदाय भी विद्यमान होते थे; पर अब ये ऊपर उल्लिखित ४ सम्प्रदायों में ही मिल गये हैं, इनका अलग अस्तित्व अब देखने में नहीं आता। जबकि कुछ विद्वान् भारत के दक्षिणापथ में प्रसिद्ध भगवान् शिव के पुत्र स्कन्द स्वामी कुमार कार्तिकेय को ही परम आराध्य मान कर उपासना करने वाले “कौमार सम्प्रदाय” को एक अलग सम्प्रदाय मानते हैं; पर वास्तव में इस सम्प्रदाय को शैव सम्प्रदाय में ही मान लेना चाहिये। इन सभी सम्प्रदायों ने धर्म एवं अध्यात्म के क्षेत्र में ४ वेदों को ही सर्वश्रेष्ठ निर्विवाद प्रमाण माना है और उसे अपने-अपने सम्प्रदायों की आधारशिला स्वीकार किया है। अतः वेद भगवान् ही वास्तव में वैदिक सनातन धर्म का एकमात्र ऐसा धर्मग्रन्थ है, जिसे सभी सम्प्रदायों ने निर्विवाद हो एकमत से स्वीकार किया है; वेदों का सारभूत होने के कारण श्रीमद्भगवद्गीता को भी सभी संप्रदायों ने एकमत से स्वीकार किया है। अतः विभिन्न संप्रदायों में विभाजित हिन्दू धर्म को एकता के सूत्र में बांधने वाले धर्मग्रन्थ हैं – ४ वेद तथा उनका सारभूत श्रीमद्भगवद्गीता॥जय वेद नारायण॥


रविवार, 12 नवंबर 2017

कांग्रेस द्वारा हिन्दुओं पर किये गए अनेक एहसानों में से एक एहसान कांग्रेस ने देश की राजधानी दिल्ली स्थित दिल्ली विश्वविद्यालय में किया था। इस अहसान का पूरा श्रेय कांग्रेस को इसलिए और अधिक जाता है क्योंकि हिन्दुओं पर किये गए उसके इस एहसान में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका तत्कालीन कांग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की दुलारी बिटिया उपेन्द्र कौर ने निभाई थी। 
हिन्दुओं पर किया गया वह कांग्रेसी एहसान क्या था.?
इसकी जानकारी इस 🏼3 मिनट 53 सेकण्ड के वीडियो में सुप्रीमकोर्ट की प्रख्यात अधिवक्ता मोनिका अरोड़ा जी के श्रीमुख से सुनिए।
1400 साल पहले,200 साल तक 20 पिढीयों द्वारा पहाड़ को ऊपर से नीचे की तरफ तराशकर बनाया गया यह "कैलाश मंदिर ",ताजमहल से लाख गुना सुंदर और आकर्षक है ! भारतीय शिल्प कला का अद्भुत नमूना है .. !!

संपूर्ण हिन्दू पौराणिक कथाओं के शिल्प है ! विष्णु अवतार , महादेव से लेकर रामायण महाभारत भी मूर्तियों के रूप में दर्शाया गया है ! वो भी 1400 साल पहले ! पर देश इसके बारे में कहाँ जानता है ??

ये दुनिया की सर्वश्रेष्ठ वास्तुकला का अद्भुत नमूना है,
कैलाश मंदिर , वेरुळ लेणी (संभाजीनगर , महाराष्ट्र )!
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अजय कर्मयोगी

शनिवार, 4 नवंबर 2017

ईज ऑफ़ डुइंग बिजनेस' कैसे किया जाता है 
1983 में यूनिलीवर को मरकरी (पारा) के थर्मामीटर बनाने वाली अपनी न्यूयॉर्क की फैक्ट्री वातावरण को नुकसान पहुँचाने की वजह से बन्द करनी पड़ी। पर वही फैक्ट्री उठ कर आ गई कोडाइकनाल में क्योंकि हमारी सरकारें 'ईज ऑफ़ डुइंग बिजनेस' में पहले से ही यकीन करती आई हैं। 2001 में पास के जंगलों-नदी को हुए भरी नुकसान की वजह से यह फैक्ट्री बन्द करनी पड़ी और यूनिलीवर ने माना कि उसने इन सालों में 13 क्विंटल मरकरी (जोर का झटका लगेगा लेकिन सच है) वातावरण में छोड़ा था। इसको ऐसे समझिये कि मरकरी एक ऐसा खतरनाक जहर है जिसका अगर 1 ग्राम प्रतिवर्ष 20 वर्ष तक वातावरण में छोड़ा जाये तो एक 20 एकड़ की झील इतनी जहरीली हो जाएगी कि उसकी मछलियां खाने लायक न रहेंगी। 
इस फैक्ट्री को अब तक पूरी तरह साफ़ नहीं किया गया है और मरकरी इससे अभी भी रिस रहा है। इलाके की आबादी इसकी सफाई की मांग कर रही है। 2002 में यूनिलीवर ने कहा था कि वह इतनी सफाई के लिए राजी है कि 1 किलोग्राम मिटटी में 10 मिलीग्राम मरकरी ही बचे, जबकि खुद इसके अपने मुख्यालय वाले लन्दन में 1 किग्रा मिटटी में 1 मिग्रा मरकरी को ही सुरक्षित माना गया है। लेकिन 2007 में यह एक भाड़े के संस्थान National Environmental Engineering Research Institute (NEERI) की रिपोर्ट ले आई कि 20-25 मिग्रा मरकरी रहने से भी काम चलेगा। इस संस्थान के भाड़े के 'विशेषज्ञों' के अनुसार ज्यादा सख्त कायदे से कंपनी को होने वाले नुकसान को भी ध्यान में रखना जरुरी है! सच बात है पूंजीवादी व्यवस्था में मुनाफे के सामने आम लोगों की जिंदगी-सेहत की क्या कीमत! लेकिन स्थानीय जनता और विधायक के विरोध पर तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 3 वैज्ञानिकों से मशविरा किया तो उन्होंने कंपनी के दावे को पूरे तरह से गलत ठहराया। कंपनी फिर भी मद्रास हाईकोर्ट में 20 मिग्रा से ज्यादा सफाई न करने का मुक़दमा लड़ती रही। 
अब आई बारी मोदी जी के 'मेक इन इण्डिया' के लिए 'ईज ऑफ़ डुइंग बिजनेस' करने की| तब के पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने 29 दिसंबर 2014 को एक पत्र लिखा जो 12 जुलाई 2015 को कंपनी के दावे के समर्थन में अदालत में भी पेश किया गया है। मंत्री जी कहते हैं कि उनके मंत्रालय ने इस पर पूरा वैज्ञानिक मंथन कर लिया है, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड व उनके मंत्रालय की ही साइंटिफिक एक्स

गुरुवार, 22 मई 2014


भारत की खेती को बर्बाद करने के लिए अंग्रेजो ने पहली सर्वे कराया की भरत के खेती को कैसे बर्बाद किया जाये ! अंग्रेजो ने जब सर्वे करा तो उनको एक बात पता चला कि भारत क किसान जो खेती करता है उसका केन्द्र बिन्दु है गाय !और उसका केन्द्र बिन्दु है बैल ! बैल गाय के बछड़े होते है !बछड़े बैल बनते है बेलों से खेत जोते जाते है फ़िर गाय दूध देती है किसान ढूध पिता है उसमे से शक्ति आती है तो खेतो मै मेंहनत करता है गाय गोबर देती है उस गोबर का खाद बनता है खाद मै ड़ालता है और खेत की शक्ति बढ़ता है गाय मूत्र देतीं है मूत्र को किसान कीटनाश्क के रूप मै प्रयोग मै लाता है तो गाय जो है वो भारतीय कृषि व्यवस्था के केन्द्र मै है !यह अंग्रेजो कि सरकार को पता चला तो अंग्रेज़ो ने एक कानून बनाकर भारत मै गाय का कत्ल करवाना आराम्भ किया तो १७६० मे इस देश मे अंग्रेज़ो के आदेश पर गाय का कत्ल होना शुरु हो गया ! कुछ लोगो को ऐसा लगता है और वो लोग कहते भी है कि राजीव भाई अंग्रेजो से पहले भी तो मुसलमान राजा थे ! वो भी तो गाय कत्ल करवाते थे ! मै आपको जानकारी देना चाहता हू कि एक -दो मुसलमान राजाओ को छोङ कर, भारत मै किसी भि राजा ने गाय क़ा कत्ल नही करवाया ! मुसलमानो के राजाओं के ज़माने मै तो भारत मै एस कानून रहा है कि जो गाय का कत्ल करे उसको फ़ासी कि सज़ा दी जाए ! यह अंग्रेज थे जिन्होने गाय कत्ल कारवाने के लिए व्यवस्थित रुप से कानून बनवा दिया और सन १७६० से भारत मई गाय का कत्ल करवाना अंग्रेजो ने शुरु किया !
गाय का कत्ल करवाते तो अंग्रेजो को दो फायदे होते थे ! एक तो भारत के किसान जो सबसे बड़ा पशुधन था गाय ! वो खत्म होत था ! गाय मरती थे तो दूध कम होता था ! गाय मरती थी तो गोबर कम होता था ! गोबर कम होता था ! गोबर कम होता था तो खाद कम होती थी ! गाय मरती थी तो मूत्र नहीं मिलता था ! किसानो के लिए जो कीटनासक दवायें बनतीं थीं उसमेँ कमी आती थी ! गाय का दूध नहीं मिलता था तो किसानोँ की शक्ति कम होती थी ! तो लगातार गाय के कत्ल होते चले जाने के कारण भारत की खेती का भी नाश होना शुरु हो गया और अंग्रेजो ने बहुत ही व्यवस्थित तरीके से इस देश मै कत्ल कारखानें खुलवाये !अंग्रेजो कि सरकार ने पुरे देश मै लगभग ३०० से ज्यादा कत्ल कारखाने खुलवाये ! जिनमे गाय और गौवंस का कत्ल किया जाता था ! हजारो कि संख्या मै लाखोँ कि संख्या मै गाय और गौवंश का कत्ल होता था

सोमवार, 19 मई 2014

ये कैसा लोकतंत्र है जहा जिसने कभी खेत में हल नहीं चलाया वो कृषि मंत्री बन जाता है ।
जिसे अपने गाव की सीमा का ज्ञान नहीं जिसने कभी SLR देखी नहीं वो रक्षा मंत्री बन जाता है ।
क्या वर्तमान सरकार अन्य सरकारों की भांति अपनी पार्टी की सुरक्षा के लिए देश की सुरक्षा को दाव पर लगा देगी ?
यदि ऐसा दौर मंत्रिमंडल के गठन हेतु चल रहा है तो हमें ऐसे अच्छे दिन मंजूर नहीं है मोदी जी ।
आपने महात्मा गाँधी जी के कांग्रेस मुक्त भारत के सपने को साकार कर दिया परन्तु आजादी के आन्दोलन के ब्रह्मास्त्र स्वदेशी का प्रत्यक्ष रूप से नाम लेने से भी बचते हो ।
जब भारत के परधानमंत्री को जनता ने चुना है तो क्या भारत का वित्त मंत्री वाणिज्य मंत्री ,गृहमंत्री ,विदेशमंत्री ,कृषि मंत्री ,रक्षामंत्री बहुराष्ट्रीय कंपनिया IMF और WORLD BANK के दबाव में तय करंगे वर्तमान राजनीती में कई व्यक्ति ऐसे है जो बहुराष्ट्रीय कंपनियो के हर षड़यंत्र से वाकिफ है
और वो डटकर मुकाबला कर सकते है । पर उन्हें मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलेगी ।
और ना ही ये पद की लालसा रखते है रही बात अनुभव की तो क्या आप को श्रेष्ठ भारतीय जैसा इमानदार देश भक्त और अनुभवी कोई अन्य व्यक्ति भाजपा में नज़र आता है क्या जो रक्षा मंत्री का पदभार संभाल सके ?
अब हमें दबाव डालना होगा ।
और स्वदेशी के प्रखर पक्षधर नेतृत्व को मंत्रिमंडल में शामिल करने हेतु दबाव बनाने की जरूरत है ।
मै यदि गलत हूँ तो मार्गदर्शन करे और यदि सही तो इस विचार को को आन्दोलन के रूप में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व तक पहुचाये ।

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...