गुरुवार, 4 जनवरी 2018

bharat ka gyan gurukukul system



रेतीले धोरों वाला मरुभूमि राजस्थान एक वैभवशाली अनूठा प्रदेश हैं ! यहां की रंग-रंगीली वेशभूषा, रेतीले टीलों के पीछे धीमे स्वर में उठने वाला सुरीला संगीत, कलात्मक लोक नृत्य, स्वादिष्ठ खानपान, कलात्मक चित्रकारी व स्थापत्य कला की तो पूरे विश्व में धूम है ही, इसके अलावा इस वीर भूमि के इतिहास में कुछ ऐसी अनूठी परम्परायें हैं जो दुनियां के किसी भी देश के इतिहास में देखने को नही मिलती हैं ! युवराज को बचाने के लिये अपने पुत्र को बलिदान कर देने वाली पन्ना धाय जैसी मां के अलावा भी यहां एक वृक्ष बचाने के लिए आज से ढ़ाई सौ वर्ष पूर्व तीन सौ तिरेसठ स्त्री-पुरुषों का बलिदान रेत पर लिखी एक ऐसी महान गाथा हैं जिसे सुनकर हर व्यक्ति रोमांचित हुए बिना नही रह सकता हैं ! जिस एक पेड़ को बचाने के लिये विश्व कि सबसे बड़ी कुर्बानी दी गई वह वृक्ष है राजस्थान का सर्वाधिक महत्तवपूर्ण ‘‘खेजड़ी ‘‘ का वृक्ष ! इस वृक्ष को राजस्थान में कल्पवृक्ष के समान माना गया है ! खेजड़ी वृक्ष की बहुउपयोगिता को देखते हुये ही राजस्थान सरकार द्वारा इस वृक्ष को राज्य वृक्ष घोषित कर संरक्षित वृक्षो की सूची में शामिल किया है ! जोधपुर से महज पच्चीस किलोमीटर दूर आज से 285 वर्ष पूर्व सन् 1730 में खेजड़ी के वृक्ष को बचाने के लिए विश्नोई समाज के लोग एक के बाद एक कर पेड़ों से लिपटते रहे और राजा के कारिंदे उनको कुल्हाड़ियों से काटते रहे ! उनका एक ही लक्ष्य था कि “सिर सांचे रूंख रहे तो भी सस्ता जाण” यानि सिर कटने से पेड़ बचता है तो भी सस्ता मान ! पेड़ बचाने के लिए कुल 363 नर-नारियों ने अपना बलिदान दिया ! खून की नदी बह उठी, लेकिन राजा के कारिंदे नहीं थमे। ! आखिरकार राजा के आदेश पर भादवा सुदी दशम को यह क्रम थमा ! पूरी दुनिया में कहीं ऐसा उदाहरण नहीं है कि पेड़ों के बचाने के लिए एक साथ इतनी बड़ी संख्या में अपना बलिदान दिया हो ! सन् 1730 की भाद्रपद सुदी दशमी के दिन ‘‘खेजड़ी ‘‘ग्राम में ‘‘खेजड़ी‘‘ वृक्ष को बचाने के लिए तीन सौ तिरेसठ लोगों द्वारा किया गया बलिदान मनुष्य के प्रकृति प्रेम की अनोखी मिसाल हैं ! जोधपुर के राज अभयसिंह को अपने नए महल निर्माण के लिए चूने को पकाने के लिए लकड़ियों की आवश्यकता थी ! राजा का दीवान गिरधर दास भंडारी आज्ञा की पालना में कारिंदों को लेकर शहर से पच्चीस किलोमीटर दूर खेजड़ला स्थान पर पहुंच गया ! खेजड़ी के वृक्ष काटने को सूचना पर वे वहां एकत्र हो गए ! उन्होंने इसका विरोध किया, लेकिन दीवान नहीं माना ! उसने पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलाने का आदेश दिया ! इस पर अमृता देवी नाम की महिला ने पहल करते हुए खेजड़ी के वृक्ष पर बाहे डाल खड़ी हो गई ! राजा के कारिंदे इस पर नहीं रुके और उन्होंने अमृता देवी को कुल्हाड़ी से काट डाला ! इसके बाद एक-एक कर लोग आगे आते रहे और कटते रहे, लेकिन राजा के कारिंदे नहीं थमे ! एक-एक कर 84 गांवों के 217 परिवारों के 363 नर-नारियों ने इस अद्वितीय यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति दे दी ! इसकी सूचना राजा को मिली तो उसने इस पर रोक लगाई ! बाद में राजा ने आदेश जारी कर दिया कि मारवाड़ में कभी खेजड़ी का वृक्ष नहीं काटा जाएगा ! आज भी मारवाड़ में खेजड़ी के पेड़ को कहीं भी काटा नहीं जाता है ! खेजड़ला में हर साल भादवा सुदी दशम(इस बार 23 सितम्बर) को पेड़ बचाने को शहीद हुए इन 363 लोगों की याद में मेला भरता है ! विश्नोई समाज ने यहां पर शहीद स्मारक भी बनवा रखा है ! इस मेले में दूर-दूर से पर्यावरण विद् सहित बड़ी संख्या में लोग पहुंचते है ! इस दिन यहां होने वाले यज्ञ में करीब डेढ़ हजार किलोग्राम घी होम किया जाता है !  हमें कर्जदार होना चाहिए इन बलिदानियों का ! सरकार को भी चाहिए कि ऐसी बलिदान कथाओं को अपने पाठ्यक्रम में स्थान दे ! पाठक गणों से भी अनुरोध है कि इस शोर्य गाथा को अपने बच्चों को सुनाएं ! मित्रों को बताएं

गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

कर्मचारियों को बोनस में कार देता है यह बिजनेसमैन, बेटे ने की 5000 की नौकरी

कर्मचारियों को कार और फ्लैट देने वाले गुजरात के हीरा व्यवसायी के बारे में तो आपको याद ही होगा. पिछले दिनों गुजरात के हीरा व्यवसायी का नाम उस समय सुर्खियों में आया था जब उन्होंने अपने यहां काम करने वाले कर्मचारियों को दिवाली बोनस के रूप में गाड़ी और फ्लैट दिए थे.
  
   
नई दिल्ली : 
कर्मचारियों को कार और फ्लैट देने वाले गुजरात के हीरा व्यवसायी के बारे में तो आपको याद ही होगा. पिछले दिनों गुजरात के हीरा व्यवसायी का नाम उस समय सुर्खियों में आया था जब उन्होंने अपने यहां काम करने वाले कर्मचारियों को दिवाली बोनस के रूप में गाड़ी और फ्लैट दिए थे. हरे कृष्णा डायमंड एक्सपोर्ट के मालिक घनश्याम ढोलकिया ने इस बार दिवाली पर सुरक्षा का संदेश देते हुए अपने कर्मचारियों को ऐसा गिफ्ट दिया था कि उनके इस कदम से सभी हैरान थे. दरअसल इस बार उन्होंने हेलमेट गिफ्ट किया. इसके माध्यम से उन्होंने जिंदगी बचाने का संदेश दिया.
लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि करोड़ों का कारोबार करने वाले घनश्याम ढोलकिया के बेटे ने जिंदगी की शुरुआत में कितने रुपए की नौकरी की होगी. मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक ढोलकिया के बेटे ने 5000 रुपए की नौकरी की थी. दरअसल 6000 करोड़ रुपए का कारोबार करने वाले घनश्याम ढोलकिया ने अपने हितार्थ ढोलकिया को जिंदगी का मतलब समझाने और अपने पैरों पर खड़े होने के लिए घर से बाहर भेज दिया था.

बुधवार, 27 दिसंबर 2017

कर्मयोगी वह जो अपने समय और ऊर्जा को उत्पादक कार्य में लगाएं । किसी व्यक्ति की सर्वाधिक भलाई के लिए चार प्रशस्त मार्ग हैं - कर्म योग, भक्ति योग, ज्ञान योग, और राज योग, जिसे कुछ लोग ध्यान योग भी कहते हैं । इन चारों मार्गों में से हमने जानबूझकर कर्म योग का मार्ग चुना है | मानसिक नियंत्रण का नहीं, ज्ञान का नहीं, भक्ति का नहीं, अपितु क्रियाशीलता का मार्ग । इसका अर्थ यह नहीं है कि भक्ति, ज्ञान और ध्यान का हमारे जीवन में कोई स्थान नहीं है। इन चारों रास्तों का जीवन में अलग अलग महत्व है, ये कोई अभेद्य कक्ष नहीं हैं ।

हमारे पूर्व में बंगाल की खाड़ी, पश्चिम में अरब महासागर और दक्षिण में हिन्द महासागर है। हमारी समझ में आसानी के लिए हमने उन्हें अलग अलग नाम दिये है। लेकिन वस्तुतः तो वे पानी की एक ही चादर है। इसी प्रकार हमने हमारी अपनी समझ के लिए इन चार रास्तों का नाम अलग अलग रखा है, लेकिन वे सब जीवन में एक दूसरे के पूरक हैं। जहां कर्म की प्रधानता है, वह कर्म योग है और जहां ज्ञान की प्रबलता है, वह ज्ञान योग है | 

नाम उस तत्व के अनुसार दिया जाता है जो कि प्रबल होता है। उदाहरण के लिए, हर एक में तीन मूल गुण होते हैं, राज, तमस और सत्व। सभी में ये तीनों गुण विद्यमान हैं। आप को कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिलेगा, जिसमें केवल सत्व गुण हो, मिलावट रहित रजोगुण हो, या केवल तमोगुण ही हो ।

जब आप कहते हैं कि कोई तामसी प्रकृति का है तो इसका मतलब है कि उसमें यह तत्व विशेष प्रमुखता से है। जब कोई व्यक्ति आलसी, सुस्त, उनींदा हो, जिसमें किसी कार्य को करने का कोई उत्साह नहीं हो, हमेशा निष्क्रिय रहना पसंद करता हो, उस व्यक्ति में तमोगुण की प्रबलता कहा जाता है | 

एक आदमी जो कुछ न कुछ करने को सदा उत्सुक रहे, जो कर रहा है, उसके साथ और भी बहुत कुछ करना चाहे, यहां से वहां, वहां से यहाँ कूदता रहे, हमेशा ऊंचाई पर रहना पसंद करे, लेकिन बहुत अहंकारी हो, तो उस गतिविधि अवतार में हम रजोगुण की प्रमुखता कहते है। ऐसे लोगों को राजसी व्यक्ति कहा जा सकता है। और एक व्यक्ति जो चिंतनशील है, तनाव की अवस्था में भी जिसका मन शांत रहता है, जिसका कोई भी कार्य निरर्थक नहीं होता, जो अकारण कूदफांद और नृत्य नहीं करता, हमेशा सही दिशा में चलता है, ऐसे व्यक्ति को एक सात्विक व्यक्ति कहा जा सकता है। 

व्यक्ति की कोई भी गतिविधि इच्छाओं से परे नहीं है; 'मुझे यह चाहिए, मुझे वह चाहिए होता ही है | किन्तु यदि गतिविधि उच्च जीवन मूल्यों से प्रेरित है, तो यह एक सात्विक व्यक्ति का लक्षण है।

मैंने केवल आपको समझाने के लिए इन्हें अलग अलग वर्णित किया है, किन्तु कोई व्यक्ति केवल सात्विक, राजसी या तामसी नहीं पाया जाता, आदमी में इन तीनों का मिश्रण होता है। एक तत्व प्रमुख हो सकता है, किसी व्यक्ति के जीवन में कभी एक तत्व की प्रमुखता हो सकती है, किन्तु संभव है कि बाद में कभी किसी दूसरा तत्व की प्रधानता हो जाए | और जीवन के तीसरे चरण में तीसरा गुण प्रभावी हो जाए । एक ही जीवन में, संभव है कि उस व्यक्ति में ये तीनों ही गुण दिखाई दें । जीवन का एक चरण दूसरे चरणों से भिन्न हो सकता है | लेकिन जब जिस तत्व की प्रधानता हो, उसे विशेष नाम तब ही दिया जाता है । 

इसी प्रकार, जब हम कर्म योग की बात करते हैं, तो इसका मतलब है कि मुख्यतः आप जो करना चाहते हैं, उसी अनुरूप आपने विषय चुना है | अगर आप कर्म के मार्ग पर जाते हैं, तो इसका अर्थ है कि राजयोग, भक्ति योग और ज्ञान योग इस कर्मपथ के अधीन होंगे। जब हम कहते हैं कि एक व्यक्ति कर्म योगी है, तो इसका मतलब है कि शेष सभी तीनों योग उसके जीवन में जो कुछ भी घटता है, कर्म के मार्ग में अलग अलग अनुपात में योगदान करते हैं। वे सहयोगी हैं | वे इस मार्ग के सहायक हैं। वे केवल उसे अधिक सक्रिय होने में सहायता करते हैं |

एक कर्म योगी का मतलब यह नहीं है कि वह कभी प्रार्थना नहीं करता। अगर किसी को भी कर्म योगी कहा जाए, तो इसका अर्थ यह भी नहीं है कि वह ध्यान नहीं करता, या उसे योगासन की ज़रूरत नहीं है, या उसे प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं है, उसे पूजा की जरूरत नहीं है या उसे दर्शन शास्त्र की ज़रूरत नहीं है, या किसी चीज के गहन अर्थ में नहीं जाना है; या उसे केवल अपने हाथों और पैरों से काम करना चाहिए; नहीं यह ऐसा नहीं है। इसका अर्थ केवल इतना है कि कर्म योगी जब प्रार्थना करता है, तो वह काम करने के लिए अधिक शक्ति प्राप्त करने और सही मार्ग दिखाने की प्रार्थना करता है। उसके लिए प्रार्थना आवश्यक है, लेकिन जो वह करना चाहता है, उसे सही ढंग से करने की सामर्थ्य पाने के लिए | उसकी प्रार्थना, उसे प्रेरणा देती है | वह प्रार्थना करने के लिए प्रार्थना नहीं करता है, बल्कि वह उसे कर्म करने के लिए प्रेरित करती है। प्रार्थना उसे ऊर्जा देती है और उसे सही मार्ग पर भी रखती है। वह प्रार्थना करेगा, लेकिन केवल और केवल प्रार्थना नहीं करेगा, अपने कार्य की कीमत पर प्रार्थना नहीं करेगा। अपनी गतिविधि की कीमत पर, वह प्रार्थना नहीं करेगा

एक कर्मयोगी प्रार्थना करेंगा, लेकिन वह देखेगा कि उसकी प्रार्थना, उसकी पूजा, कार्य को शक्ति प्रदान करने की दिशा में योगदान करे । उसे सही दिशा में काम करने के लिए अधिक प्रकाश मिले । इसका अर्थ यह नहीं है कि कर्म योगी ध्यान नहीं करेंगे; या वह योग का अभ्यास आदि कुछ नहीं करेगा; या वह प्राणायाम से दूर रहेगा; या उसका आध्यात्म से कोई लेनादेना नहीं होगा, नहीं वह इन सब आध्यात्मिक प्रथाओं का उपयोग करेगा क्योंकि उसे काम करना है। उसे पूरी दक्षता और तीव्रता के साथ काम करना है, अपने कार्य में अधिक दक्षता प्राप्त करने के लिए, वह योगाभ्यास करेगा; वह राज योग के माध्यम से जो सीखता है, उस सब का उपयोग करता है । उसे ध्यान केंद्रित करना और अधिक शक्ति देता है, उसे इससे और अधिक स्थिरता मिलती है, जो काम के लिए बहुत ज़रूरी है | यदि आपका मन विचलित है, तो आप ठीक से अपना नेटवर्क नहीं बना सकते। अतः "चित्तवृष्टि निरोधाः" विचारों पर नियंत्रण बहुत आवश्यक है।

कर्मयोगी अपने मन को स्थिर करने के लिए सभी प्रथाओं का उपयोग करेंगे, क्योंकि स्थिर मस्तिष्क के साथ ही वह कुशलतापूर्वक काम कर सकता है। इस प्रकार राजयोग का भी कर्म योगी के जीवन में एक विशेष स्थान है। ज्ञान योग भी चीजों के मूल में जाने के लिए आवश्यक है, सही परिप्रेक्ष्य को समझने के लिए तत्वमीमांसा आवश्यक है | जब आप ज्ञान योग के मार्ग पर चलते हैं, तो आप गूढ़ और गहन होते हैं और यदि आपने अपने दिमाग को चीजों के गहन अर्थ की खोज में जाने के लिए प्रशिक्षित कर लिया किया है, तो यह कर्म योग के लिए उत्कृष्टता, पूर्णता, परिशुद्धता के लिए बहुत सहायक होता है | यदि कोई सतही ढंग से सोचता और निर्णय लेने वाला है, फैसले पारित करता है, तो वह जीवन में बुरी तरह असफल हो जायेगा। यदि उसे गहन चिंतन और उचित परिप्रेक्ष्य में चीजों को समझने की आदत है, तो वह सफल होगा । लेकिन, कोई कुछ कहे; उस पर त्वरित प्रतिक्रिया देना, बिना समझे अपनी राय बनाना, गहन आपदा में फंसाता है । किसी बात के गहन अर्थ को समझकर सही परिप्रेक्ष में निर्णय लेना, एक कर्म योगी के लिए जरूरी है | अतः कर्म योगी के लिए ज्ञान योग, भक्ति योग और राज योग बहुत आवश्यक हैं। यह अलग बात है कि वह इनका उपयोग कर्मयोग के बेहतर क्रियान्वयन के लिए करता है। वह उनका अभ्यास करता है, उनका उपयोग करता है, ताकि वह अधिक कुशलता से, सही और प्रभावी तरीके से काम करने में सक्षम हो। यही उसके प्रकरण में अन्य तीन योगों की भूमिका है।

मान लीजिए, कि ध्यान करने से एक कर्मयोगी को कर्म से विरक्ति हो जाती है, वह जितना अधिक ध्यान करता है, उतना कर्म से दूर हो जाता है, तो इसका अर्थ है कि उसके ध्यान में कुछ गड़बड़ है। उनके ध्यान करने का तरीका बहुत ग़लत है । यदि उसने कर्म का मार्ग चुना है, तो जब वह ध्यान करता है, तो उसका ध्यान उत्पादक होना चाहिए। उसके लिए क्या उत्पादक है? उसे अपने काम को करने पर अधिक जोर देना चाहिए। अगर आधे घंटे के ध्यान से, व्यक्ति ऊर्जा से परिपूर्ण हो जाता है, वह उत्साह के साथ काम करने लगता है तो यह ध्यान उसके लिए उपयोगी है | और मान लीजिये कि यदि आपको यह लगता है कि योगासन करने से आपको नींद आ रही है, तो इसका अर्थ है कि आपके योगासन में कुछ गंभीर गड़बड़ है। आपने शीर्षासन किया, या अन्य कोई आसन किए, तो आपमें उत्साह का संचार होना चाहिए । किन्तु अगर आप निद्रा महसूस करते हैं, तो आपके योगों के साथ कुछ गंभीर गलत है। यदि आप कुछ विचार कर रहे हैं, तो उसका योगदान आपकी गतिविधि के लिए होना चाहिए। इसके लिए आप ईश्वर से प्रार्थना कर सकते हैं, जब आप परमेश्वर के साथ मिलकर काम करते हैं तो वह आपको प्रकाश देता है, जिससे आपका आत्मविश्वास बढ़ता है | इसलिए यदि आप कर्म योगी हैं, तो आपकी प्रार्थना आपको काम करने और अधिक काम करने के लिए प्रेरित करेगी। आपका चिंतन, सोच, ध्यान भी आपको काम करने और अधिक काम करने के लिए प्रेरित करेगा। सब कुछ आपको अधिक काम करने में मदद करना चाहिए। यही एकमात्र परीक्षण है |

यदि आप आज आधे घंटे ध्यान करते हैं, आप कल दो घंटे और अगले दिन चार घंटे ध्यान करते हैं, तो फिर अपने आप को कर्म योगी मत कहिये । आप कर्म योगी नहीं हैं, आप भ्रमित हैं। यदि आप कर्म योगी हैं तो सिर्फ आधे घंटे का ध्यान पर्याप्त होना चाहिए, अन्यथा आपके पास अन्य चीजों के लिए समय नहीं होगा। यदि आपने कर्म योग का मार्ग चुना है, तो फिर आधे घंटे का ध्यान पर्याप्त है, किन्तु वह केंद्रित और मजबूत होना चाहिए। इससे आपको पर्याप्त ताकत मिलेगी | आपकी प्रार्थना, ध्यान और अन्य सभी योग ठीक तरह से सिलसिलेवार होना चाहिए, यदि आप अपने मार्ग के प्रति निष्ठावान हैं, तो समय विभाजन ठीक से किया जाना चाहिए ।

मैंने इस उदाहरण को कई बार दिया है | जैसे कि हम हमारे भोजन में सांबर लेते हैं। सांबर में दाल, पानी और नमक का अनुपात क्या है?इसका बड़ा हिस्सा दाल और पानी है, जबकि नमक कम है। लेकिन यह कम नमक क्या करता है? हालांकि यह बहुत कम है, किन्तु यह पूरे सांबर को स्वादिष्ट बना देता है। यह सांबार में फैलता है, इसी प्रकार ध्यान, चिंतन और प्रार्थना आदि का अनुपात कर्म योगी के जीवन में होना चाहिए। हमारा कार्य दाल और पानी के अनुपात में होना चाहिए। और भगवान का ध्यान, उस नमक की तरह होना चाहिए। यह थोड़ा कम हो सकता है, लेकिन यह पूरे जीवन, संपूर्ण दैनंदिन दिनचर्या को स्वाद देता है। जब आप हार्मोनियम बजाते है, तो उसमें एक मुख्य वस्तु है | उसकी भूमिका क्या है? यह पार्श्व में सबसे पीछे है | उसी प्रकार आपकी सभी गतिविधियों में, आपके दिमाग का भगवान के साथ तालमेल होना चाहिए। सुबह, जब आप अपना दिन शुरू करते हैं, तो ध्यान से या प्रार्थना के माध्यम से, भगवान के साथ संवाद करें, उनका आशीष लें । यह आधा घंटा शेष साढ़े तेईस घंटे आपके दिमाग में रहेगा। यही आपको सही रास्ते पर रखेगा | यह आपको कभी भी अपना आधार खोने नहीं देगा | यही भगवान के साथ ध्यान या सम्वाद का उद्देश्य है। "

यदि हम इस अनुपात खो देते हैं, तो हम न तो यहां रहेंगे और न ही वहां होंगे। एक बार दायित्व स्वीकार करने का अर्थ है, कि हमने अपना रास्ता चुन लिया है। अगर हमने इस पथ को चुना है तो पूरी योजना कार्य उन्मुख होना चाहिए। इस प्रकार, कार्य के प्रति हमारी प्रतिबद्धता स्पष्ट हो जाती है - कर्मयोगैकनिष्ठः | फिर आसन, प्रार्थना, ध्यान, स्वाध्याय के सभी अभ्यास सार्थक और उद्देश्यपूर्ण बनते हैं और हमारे जीवन में सही अनुपात में स्थापित होते हैं। हम अपने समय की सही योजना बनायें, ताकि हम घर या कार्यस्थल पर हमारी सभी जिम्मेदारियों को पूरा कर सकें | और फिर हमारे दायित्व को पूरा कर सकें। 

देसी जुगाड़ का कमाल बिना ड्राइवर ट्रैक्टर दौड़ाया

सोमवार, 25 दिसंबर 2017


#महाराज_हर्षवर्धन

गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद भारत मे चारो ओर अराजकता फैल गयी ! भारत की सीमाएं भी असुरक्षित हो चुकी थी, शत्रु हिन्दुओ को आँख दिखा रहे थे ।

भारत के थानेश्वर में राज-पुंज-तेज पुष्यभूति नामक पराक्रमी ओर दक्ष राजा हुए । बाण के अनुसार नागवंशीयो का अंत करके यह साम्राज्य स्थापित हुआ था । जिसने क्रम से आगे चलकर " हूण- हिरण-केशरी " ( हूण रूपी हिरणों को घातक सिंह के समान , " सिंधु - राज- ज्वरों  " ( सिंधु राजा को ज्वर के समान तड़पाने वाले ) गुर्जर प्रजारको ( गुर्जर राजाओ की नींद भग्न करने वाला )  गंधार के राजा को मदमस्त हाथी की तरह कुचल देने वाला, मालव देश की लक्ष्मी( सम्रद्धि )  का हरण करने वाला
तथा प्रतापशील राजा #राजाधिराज_प्रभाकर_वर्द्धन उतपन्न हुए ।

प्रभाकर वर्धन से पूर्व भी कई राजा हुए, लेकिन इस वंश को पहचान प्रभाकरवर्धन से ही मिली थी । प्रभाकर वर्द्धन ने अपने प्रताप ओर पराक्रम से , सिंध प्रदेश, गुर्जर प्रदेश ( पश्चिमी राजस्थान ) मालवा, पंजाब एवं कश्मीर के हूणों को परास्त किया !!

साक्ष्य ( बाँसखेड़ा तामपत्र - पंक्ति 1 से लेकर 7)

गुप्त साम्राज्य के पतन होने के बाद, उतरी भारत मे भिन्न भिन्न स्वतंत्र राज्यो के उदय के कारण , भारत की समतल भूमि में उबड़ खाबड़ आ गया ।  प्रभाकर ने अपनी सेना लेकर .. दूर तक धरती को समतल बनाया, ओर शत्रुओं का दमन किया !! इस प्रकार प्रभाकर वर्धन ने तलवार की धार से शत्रुओं का दमन कर  देश की उन्नति की  !! लेकिन  तत्कालीन राजनीति से यह स्पष्ठ हो जाता है, की उस समय भारत मे वर्चस्व की लड़ाई जोरो पर थी ।  बिहार - बंगाल का गोड़ राज्य भी स्वतंत्र हो गया था , मगध ओर मध्यदेश ( यूपी) में मौखरी बढ़ रहे थे । मालवा में उत्तर गुप्त शाशक प्रबल थे । गुजरात मे काठियावाड़ भी अपनी अलग राजनीति कर रहे थे, गुर्जर देश के प्रतिहार भी ताक में थे, सिंधु भी स्वतंत्र देश बन गया था, पंजाब और कश्मीर भी स्वतंत्र थे । चालुक्य - पल्लव- पांडव भी आपसी युद्ध मे व्यस्त थे , प्रभाकर के समय राष्ट्र की स्तिथि क्या थी ..... इसका अनुमान लगाइए ...

#हर्षवर्धन

प्रतापी राजा प्रभाकरवर्धन सहज स्वभाव से ही सूर्य भक्त थे, प्रतिदिन सूर्यपूजा करते, तथा सूर्यदेव से संतान प्राप्ति की कामना करते । अंततः भगवान सूर्य की कृपा से उनके दो तेजवान पुत्र और कन्या का जन्म हुआ । ज्येष्ठ राज्यवर्धन अत्यंत पराक्रमी ओर यशस्वी कुमार थे । उनके जन्म के कुछ समय बाद हर्ष का जन्म हुआ । हर्ष बाल्यकाल से ही तेजस्वी सुर थे, जिन्हें खेल में आज्ञा- भंग सहन नही होता था । चारो ओर पानी से घिरे समुद्र में स्नान करना, ओर समुद्र तटों पर घूमना हर्ष को बहुत पसंद था । कितना महत्वाकांशी बालक हर्ष था , वह विनीत भक्त भी था, उनके जन्म होते ही ज्योतिषों ने उनके चक्रवर्ती सम्राट बनने की भविष्यवाणी की थी ।

मौखरि वंश के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित कर अपनी शक्ति में ओर व्रद्धि कर ली ।

हूणों के साथ एक युद्ध मे प्रभाकरवर्धन बुरी तरह घायल हुए, हर्ष की माता भी बचपन मे ही स्वर्ग  सिधार गयी थी । प्रभाकरवर्धन भी इस लोक को जीतकर उस लोक को जीतने चले गए । किन्तु अपनी अंतिम यात्रा से पहले उन्होंने हर्ष को समाचार भेजा,

" अपने देश की रक्षा करो, राज्यभार ( शाशन ) को चलाओ, परिजन ओर प्रजा का पालन करो, शस्त्रो का अभ्यास करते रहना, चंचलता का अंत कर, शत्रुओं का पूर्ण नाशः करो , ऐसा आदेश देते हुए " राजसिंह प्रभाकरवर्धन ने आंखे बंद कर ली । ( हर्ष चरित्र - पेज 210- 233 )

प्रभाकरवर्धन बहुत लोकप्रिय राजा थे, उनके जाते ही प्रजा में जैसे विषाद छा गया, अग्निदेव की लपटों में चढ़कर प्रभाकरवर्धन स्वर्गलोक को जीतने चले गए ।

पित्रशोक में  हर्ष के  लिए राज्य एक रोग बन गया । वे  यह सोचने लगे, की अगर पिता की म्रत्यु का समाचार बड़े भाई राज्यवर्धन को पता चला, तो उनका क्या होगा ? राज्यवर्धन भी इस समय किसी अन्य प्रदेश पर चढ़ाई के लिए ही गए थे ।

" कहीं पिता की म्रत्यु का समाचार सुनकर बड़े भाई सन्यासी  हो गए, ओर वन- पहाड़ो में तपस्या करने चले गए तो ? हे ईश्वर !! अनाथ हो गयी यह पृथ्वी !! ऐसा सोचकर वे राज्यवर्धन के आने की राह देखने लगे ।

राज्यवर्धन हूणों पर विजय प्राप्त कर जब वापस लौटे, तो पूरे शरीर मे जगह जगह पट्टियां बंधी हुई थी । राजसभा में सबको मौन देखकर, राजा को सिंहासन पर ना पाकर राज्यवर्धन सब कुछ समझ गए, वहीं हुआ, जिसका डर था, पिता को ना पाकर राज्यवर्धन के हाथों से तलवार छूट गयी, ओर वे वैरागी हो गए ।

राज्यवर्धन के तलवार हाथ से छूटते ही, हर्ष के मन मे भय और शंका के घने बादलों ने जन्म ले लिया !  अगर ज्येष्ठ ही राज्य छोड़कर चले गए,  तो इस राज्य को चलाएगा कौन ? इस राज्य का भोग करेगा कौन ?

हर्ष ने मन ही मन मे खुद को धिक्कारा ..... लक्ष्मण का चरित्र भूल गए हो हर्ष ?? इतना क्या सोच रहे हो ? जहां भाई जाएंगे, वहीं तुम चले जाना !!

दोनो भाई एक दूसरे के आंसू पोंछ रहे थे, उसी समय एक अशुभ समाचार ओर आया, की जिस दिन उनके पिता की म्रत्यु  हुई थी उसी दिन दुस्ट मालव राज ने उनकी बहन के पति देव ग्रहवर्मा की हत्या कर, उनकी बहन के पैरों में बेड़िया डाल, जेल में डाल दिया है ।  ओर अब वह इस देश को  अनाथ समझकर इसपर भी आक्रमण करने वाला है ।

समाचार मिला ही कि राज्यवर्धन का खून खोल उठा, यह समाचार सुनते ही राज्यवर्धन मालव - विनाश के लिए उठ खड़े हुए । भीषण कृपाण को हाथ मे लेकर मालवराज कुल को मिटा देने के लिए राज्यवर्धन का पराक्रम जाग उठा " भला अंधेरा सूर्य का तिरस्कार करें, यह कभी हो सकता है ? "

हर्ष को मंगलकामना देकर राज्यवर्धन उसी घायल अवस्था मे मालव-राज को सबक सिखाने के लिए चल पड़े ।  वहां कुछ ही समय मे मालवराज ने राज्यवर्धन के आगे हथियार डाल दिये, राजवर्धन ने भी उनके इस तरह सुंता, जैसे चाबुक से घोड़ो को सुंता जाता है ।
मालव-राज पराजित तो हुए .... लेकिन इस युद्ध मे राज्यवर्धन को भी अपने प्राण गंवाने पड़े ।

राज्यवर्धन की म्रत्यु के बाद ही हर्ष को पता चला, मालवराज को परास्त करने के बाद, गोड़ों ने छल से राज्यवर्धन की हत्या कर दी ।

पहले माता , फिर -पिता, उसके बाद भाई, पूरा परिवार खोने के बाद अब हर्ष केवल एक पत्थर की मूर्ति थे ।

समय हर्ष के लोहे के शरीर, ओर ब्रज ह्रदय की परीक्षा ले रहा था । तभी तो उसपर दारुण दुःखों की बाढ़ आ रही थी । माता- पिता- बहनोई, भाई सब खो दिया, वह भी एकदम कम उम्र में ।

हर्षवर्धन पहले की तरह इसबार कमजोर नही लग रहे थे । आंखों में पानी भी था , ओर चेहरे पर क्रोध भी ।

" अधर्मी गोड़ राजा ने केवल अपयश ही कमाया है, देखता हूँ, वह दुर्बुद्धि कहाँ तक भागता है । "

तभी मंत्री सिंहनाद ने कहा " एक अधर्मी गोड़ राजा का वध करने से कोई लाभ नही होगा, ऐसा कुछ करो, की अन्य कोई राजा फिर ऐसा दुःसाहस ना कर सके । सम्पूर्ण पृथ्वी विजय की मर्यादा का पालन करो । राजलक्ष्मी को स्थिर कर पुनः पूरे विश्व मे आर्य धर्म ध्वज फहरा दो । कुत्तो ( शत्रु ) का वध करो, राज्य के कतंको को उखाड़ फेंको । अपने पिता , पितामह ओर भाई के मार्ग का अनुसरण करो । इस पृथ्वी की रक्षा के लिए अब केवल तुम बचे हो हर्ष !! अपनी अनाथ प्रजा को समझाओ, ओर राजाओ के सिर पर पांव रखो ।

स्पष्ठ है, की वृद्ध मंत्री यहां हर्ष को दिग्विजय की प्रेरणा दे रहे है ।

हर्ष ने भी शपथ ली, धनुष चिन्ह धारण कर में प्रतिज्ञा करता हूँ, की अपने राज्य में, इस पृथ्वी में , इस कलयुग में , में सतयुग की स्थापना करूँगा !

हर्ष ने तुरन्त सभी अन्य राज्यो में घोषणा करवा दी, सभी राजागण अपने हाथी, सेना तैयार रखे,  ओर जो युद्ध नही करना चाहते, वे अपना धनुष या शीश झुका दे ।

उसके बाद तो विजय का डंका ऐसा बजा की पूरे संसार ने इस युवा शक्ति का लोहा मान लिया ।

लगभग पुरे भारत मे हर्षवर्धन ने विजय प्राप्त की !! केवल चालुक्य वंश के पुलकेशिन द्वित्य के साथ युद्ध मे हर्ष को असफलता हाथ लगी ।

हर्ष का यह काल वास्तव में सतयुग की अनुभति था । आपस में सदैव लड़ने वाले राजवंश  एक ध्वज के नीचे आ गए ।

लेकिन समय हमेशा एक नही रहता, उम्र भर विजयो का स्वाद चखने वाले हर्ष को अंत मे हारना भी पड़ा ! यह बहुत बड़ी हार नही थी, बस मामूली नुकसान था, लेकिन इतना था, चालुक्य से वे पार ना सके ।

अब आधे भारत के  स्वामी थे हर्ष , ओर आधे भारत के स्वामी  ---- #वीर_राजपूत_पुलकेशिन संकलन अजय कर्मयोगी

रविवार, 24 दिसंबर 2017

1. मूलाधार चक्र :
यह शरीर का पहला चक्र है। गुदा और लिंग के बीच चार पंखुरियों वाला यह "आधार चक्र" है। 99.9% लोगों की चेतना इसी चक्र पर अटकी रहती है और वे इसी चक्र में रहकर मर जाते हैं। जिनके जीवन में भोग, संभोग और निद्रा की प्रधानता है, उनकी ऊर्जा इसी चक्र के आसपास एकत्रित रहती है।
मंत्र : "लं"
कैसे जाग्रत करें : मनुष्य तब तक पशुवत है, जब तक कि वह इस चक्र में जी रहा है.! इसीलिए भोग, निद्रा और संभोग पर संयम रखते हुए इस चक्र पर लगातार ध्यािन लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। इसको जाग्रत करने का दूसरा नियम है यम और नियम का पालन करते हुए साक्षी भाव में रहना।
प्रभाव : इस चक्र के जाग्रत होने पर व्यक्ति के भीतरवीरता, निर्भीकता और आनंद का भाव जाग्रत हो जाता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए वीरता, निर्भीकता और जागरूकता का होना जरूरी है।

2. स्वाधिष्ठान चक्र -
यह वह चक्र लिंग मूल से चार अंगुल ऊपर स्थित है, जिसकी छ: पंखुरियां हैं। अगर आपकी ऊर्जा इस चक्र पर ही एकत्रित है, वह आपके जीवन में आमोद-प्रमोद, मनोरंजन, घूमना-फिरना और मौज-मस्ती करने की प्रधानता रहेगी। यह सब करते हुए ही आपका जीवन कब व्यतीत हो जाएगा आपको पता भी नहीं चलेगा और हाथ फिर भी खाली रह जाएंगे।
मंत्र : "वं"
कैसे जाग्रत करें : जीवन में मनोरंजन जरूरी है, लेकिन मनोरंजन की आदत नहीं। मनोरंजन भी व्यक्ति की चेतना को बेहोशी में धकेलता है। फिल्म सच्ची नहीं होती. लेकिन उससे जुड़कर आप जो अनुभव करते हैं वह आपके बेहोश जीवन जीने का प्रमाण है। नाटक और मनोरंजन सच नहीं होते।
प्रभाव : इसके जाग्रत होने पर क्रूरता, गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास आदि दुर्गणों का नाश होता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए जरूरी है कि उक्त सारे दुर्गुण समाप्त हो, तभी सिद्धियां आपका द्वार खटखटाएंगी।

3. मणिपुरक चक्र :
नाभि के मूल में स्थित रक्त वर्ण का यह चक्र शरीर के अंतर्गत "मणिपुर" नामक तीसरा चक्र है, जो दस कमल पंखुरियों से युक्त है। जिस व्यक्ति की चेतना या ऊर्जा यहां एकत्रित है उसे काम करने की धुन-सी रहती है। ऐसे लोगों को कर्मयोगी कहते हैं। ये लोग दुनिया का हर कार्य करने के लिए तैयार रहते हैं।
मंत्र : "रं"
कैसे जाग्रत करें: आपके कार्य को सकारात्मक आयाम देने के लिए इस चक्र पर ध्यान लगाएंगे। पेट से श्वास लें।
प्रभाव : इसके सक्रिय होने से तृष्णा, ईर्ष्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह आदि कषाय-कल्मष दूर हो जाते हैं। यह चक्र मूल रूप से आत्मशक्ति प्रदान करता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए आत्मवान होना जरूरी है। आत्मवान होने के लिए यह अनुभव करना जरूरी है कि आप शरीर नहीं, आत्मा हैं। आत्मशक्ति, आत्मबल और आत्मसम्मान के साथ जीवन का कोई भी लक्ष्य दुर्लभ नहीं।

4. अनाहत चक्र
हृदय स्थल में स्थित स्वर्णिम वर्ण का द्वादश दल कमल की पंखुड़ियों से युक्त द्वादश स्वर्णाक्षरों से सुशोभित चक्र ही "अनाहत चक्र" है। अगर आपकी ऊर्जा अनाहत में सक्रिय है, तो आप एक सृजनशील व्यक्ति होंगे। हर क्षण आप कुछ न कुछ नया रचने की सोचते हैं.
मंत्र : "यं"
कैसे जाग्रत करें : हृदय पर संयम करने और ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। खासकर रात्रि को सोने से पूर्व इस चक्र पर ध्यान लगाने से यह अभ्यास से जाग्रत होने लगता है और "सुषुम्ना" इस चक्र को भेदकर ऊपर गमन करने लगती है।
प्रभाव : इसके सक्रिय होने पर लिप्सा, कपट, हिंसा, कुतर्क, चिंता, मोह, दंभ, अविवेक और अहंकार समाप्त हो जाते हैं। इस चक्र के जाग्रत होने से व्यक्ति के भीतर प्रेम और संवेदना का जागरण होता है। इसके जाग्रत होने पर व्यक्ति के समय ज्ञान स्वत: ही प्रकट होने लगता है। व्यक्ति अत्यंत आत्मविश्वस्त, सुरक्षित, चारित्रिक रूप से जिम्मेदार एवं भावनात्मक रूप से संतुलित व्यक्तित्व बन जाता हैं। ऐसा व्यक्ति अत्यंत हितैषी एवं बिना किसी स्वार्थ के मानवता प्रेमी एवं सर्वप्रिय बन जाता है।

5. विशुद्धि
चक्र
कंठ में सरस्वती का स्थान है, जहां "विशुद्ध चक्र" है और जो सोलह पंखुरियों वाला है। सामान्यतौर पर यदि आपकी ऊर्जा इस चक्र के आसपास एकत्रित है, तो आप अति शक्तिशाली होंगे।
मंत्र : "हं"
कैसे जाग्रत करें : कंठ में संयम करने और ध्यान लगाने से यह चक्र Iजाग्रत होने लगता है।
प्रभाव : इसके जाग्रत होने कर सोलह कलाओं और सोलह विभूतियों का ज्ञान हो जाता है। इसके जाग्रत होने से जहां भूख और प्यास को रोका जा सकता है वहीं मौसम के प्रभाव को भी रोका जा सकता है।

6. आज्ञाचक्र :
भ्रूमध्य (दोनों आंखों के बीच भृकुटी में) में "आज्ञा-चक्र" है। सामान्यतौर पर जिस व्यक्ति की ऊर्जा यहां ज्यादा सक्रिय है, तो ऐसा व्यक्ति बौद्धिक रूप से संपन्न, संवेदनशील और तेज दिमाग का बन जाता है लेकिन वह सब कुछ जानने के बावजूद मौन रहता है। "बौद्धिक सिद्धि" कहते हैं।
मंत्र : "ॐ"
कैसे जाग्रत करें : भृकुटी के मध्य ध्यान लगाते हुए साक्षी भाव में रहने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है।
प्रभाव : यहां अपार शक्तियां और सिद्धियां निवास करती हैं। इस "आज्ञा चक्र" का जागरण होने से ये सभी शक्तियां जाग पड़ती हैं, व्यक्ति एक सिद्धपुरुष बन जाता है।

7. सहस्रार चक्र :
"सहस्रार" की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है अर्थात जहां चोटी रखते हैं। यदि व्यक्ति यम, नियम का पालन करते हुए यहां तक पहुंच गया है तो वह आनंदमय शरीर में स्थित हो गया है। ऐसे व्यक्ति को संसार, संन्यास और सिद्धियों से कोई मतलब नहीं रहता है।
कैसे जाग्रत करें : "मूलाधार" से होते हुए ही "सहस्रार" तक पहुंचा जा सकता है। लगातार ध्यान करते रहने से यह "चक्र" जाग्रत हो जाता है और व्यक्ति परमहंस के पद को प्राप्त कर लेता है।
प्रभाव : शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण विद्युतीय और जैवीय विद्युत का संग्रह है। यही "मोक्ष" का द्वार है।अजय कर्मयोगी

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...