शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

divya narendra and mark zuckerberg के लिए इमेज परिणाम


एक भारतीय ने की थी facebook की खोज । जुकरबर्ग मे चुरा लिया था प्रॉजेक्ट । पढ़ें पूरी खबर ।

महज 29 साल के दिव्य नरेंद्र अमरीका में रहने वाले अप्रावासी भारतीय हैं। उनके माता-पिता काफी समय पहले से अमरीका में ही आ बसे हैं। दिव्य का जन्म 18 मार्च 1982 को न्यूयार्क में हुआ था। जाहिर है कि दिव्य के पास भी अमरीकी नागरिकता है।पेशे से उनके माता-पिता डॉक्टर हैं। परंपरावादी। अंतर्मुखी। दूसरे भारतीय माता-
पिता की तरह वे भी दिव्य को डॉक्टर बनाना चाहते थे, पर दिव्य को यह मंजूर नहीं था। उनके अंदर एक एंटरप्रिन्योर बनने का सपना था। तमाम संघर्षों से जूझते हुए वह ऐसा करने में सफल भी हुए।और 2008 के अमेरिकी कोर्ट के फैसले के बाद यह बात पक्की भी हो गई कि दुनिया की सबसे बड़ी सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक का आइडिया दिव्य नरेंद्र का था।
दरअसल फेसबुक का जन्म हॉर्वर्ड कनेक्शन सोशल साइट की निर्माण प्रक्रिया के दौरान हुआ। दिव्य हॉर्वर्ड कनेक्शन प्रॉजेक्ट पर काफी आगे बढ़ चुके थे। उसके लंबे समय बाद जुकरबर्ग मौखिक समझौते के तहत उसमें शामिल हुए। पूरी चालाकी से उन्होंने इस प्रॉजेक्ट को हाईजैक कर लिया और बाद में बाकायदा फेसबुक नाम से डोमेन रजिस्टर्ड कर उस प्रॉजेक्ट को अमली जामा पहना दिया। इस बीच दिव्य और उनके सहयोगियों की जुकरबर्ग से तीखी नोकझोंक हुई। यूनिवर्सिटी मैनेजमेंट ने मामले में हस्तक्षेप किया और दिव्य को कोर्ट जाने की सलाह दी।
दिव्य ने जुकरबर्ग के खिलाफ 2004 में अमेरिका की एक अदालत में मुकदमा कर दिया। फैसला दिव्य और उनके दोस्तों के पक्ष में आया। जुकरबर्ग को हर्जाने के तौर पर 650 लाख डॉलर चुकाने पड़े, लेकिन दिव्य इससे संतुष्ट नहीं हुए। उनका तर्क था कि उस समय फेसबुक के शेयरों की जो बाजार में कीमत थी, उन्हें उसके हिसाब से हर्जाना नहीं दिया गया।
उनका कहना था कि हर्जाने का राशि फेसबुक की मौजूदा बाजार कीमत के आधार पर तय की जानी चाहिए। हाल ही में गोल्डमैन स्नैच ने फेसबुक की बाजार कीमत 50 बिलियन डॉलर आंकी थी। उन्होंने एक बार फिर 2008 मे मुकदमा दायर किया, लेकिन अमरीकी कोर्ट ने पिछले फैसले को ही बरकरार रखा। अमरीकी कोर्ट के फैसले के आईने में देखा जाए तो जो प्रसिद्धि आज मार्क जुकरबर्ग को मिली है, उसके सही हकदार facebook के असली निर्माता दिव्य नरेंद्र थे।
तो अंत जो लोग हमारे असली भारतीय इतिहास को जानते है वो बहुत आसानी से समझ जाएंगे कि भारतीयों द्वारा किए गए आविष्कारों को चोरी कर अपने नाम से दुनिया मे फैलाना अंग्रेज़ो की पुरानी आदत है ! वो बेशक गुरुत्वकर्षण सिद्धांत के नियम हो ,मर्करी बनाना हो ,कागज बनाना हो ,पलास्टिक सर्जरी करना हो या बापू तलपडे द्वारा हवाई जहाज उड़ाना हो या जगदीश चंद्र बसु द्वारा टेलीफोन का निर्माण करना हो ! और ऐसे सैंकड़ों आविष्कार हो ! या अंत मे भाई दिव्य नरेंद्र द्वारा facebook का निर्माण करना हो ! सब अंग्रेज़ो ने भारतीयो से चोरी कर अपने नाम से चिपकाया हुआ है !

मंगलवार, 20 फ़रवरी 2018

आजकल फेसबुक पर लिखना बेहद कम और सबको पढ़ना अधिक हो रहा है, इसी क्रम में कई ऐसे लोगों के पोस्ट पढ़े जिनकी शैली और लेखन बेहद शानदार है। आज इसी क्रम में Megha Maitrey मेघा मैत्रेय की एक पोस्ट पढ़ी है, बेहद शानदार है। आज के परिवेश पर आधारित इस आलेख को आप भी पढिये।

मॉल में कपड़े देख रही थी। बगल में ही एक माँ अपनी बारह-तेरह साल की बेटी के साथ शॉपिंग कर रही थी।माँ ने बेटी को एक कुरती दिखाया तो बेटी ने बड़ी बदतमीजी से पलट कर जवाब दिया,"मैं नहीं पहनूँगी, तुम ही पहन लो।" बात कहने का टोन कुछ ऐसा था कि मेरा चेहरा ना चाहते हुए भी सख्त हो गया। मुझसे नजर मिली तो झेंपते हुए आंटी हंसकर कहती है,"आजकल के बच्चे भी ना, बस अपनी मर्जी की करते हैं।" मैंने जवाब नहीं दिया, लेकिन बस दिमाग में यही आया कि मर्जी अपनी हो सकती है, पर छोटी-छोटी बातों में बदतमीजी करने का हक कहा से ला रहें हैं ये बच्चे?

हमारे देश में (infact पूरी दुनिया में) पौराणिक काल से माता-पिता का एक टाइप पाया जाता रहा है जो अनुशासन शब्द को बड़ा महत्व देता है, और इसके लिए कंटाप-घुसा,लत्तम-जूता हर प्रकार के तरीकों का उपयोग जरूरी मानता है। कोई भी child psychologist इनके तरीकों को गलत और extreme मानेगा।मैं भी सहमत हूँ। पर आप इस बात से इंकार नहीं कर सकतें की इस प्रकार के अभिभावकों की एक सफलता यह है, कि वे अस्सी साल के उम्र में जब घसीट कर बाथरूम जाना शुरू कर देते हैं, तो भी बेटे के दिमाग में उनसे पीछा छुड़ाने का ऑप्शन भूल कर भी नहीं आता।आप के घर में भी ऐसे उदाहरण हैं, जिनके लिये बाप बस बाप होता है, भले ही उनकी हड्डियों में जान और आवाज में कड़क खत्म हो चुकी हो।

इसके बाद इनके उलट बिल्कुल अलग प्रजाति आयी, जो अपने बच्चों के प्रति इतना warmth रखने लगी कि इनके ढ़ाइ किलोमीटर के रेडियस में आने वाला हर पड़ोसी का बच्चा जल कर मर जाये।इनका साफ़ कहना है, कि अगर बच्चा नियम से प्रतिदिन दो बार इनके सर पर चढ़ कर सूसू नहीं करेगा, तो ये खुद को अच्छा पैरेंट नहीं मानेंगे।
इस प्रजाति का सबसे प्रत्यक्ष असर यह है कि पहले बच्चा दोस्त से एक घूँसा खाता था, दो लगाता था, और फिर अगले दिन साथ खेलता था। पर अब चार साल के दो बच्चों कि लड़ाई कब अगले तीन सौ साल चलने वाली दो परिवारों की पुश्तैनी लड़ाई में बदल जायेगी, कहना मुश्किल है। समाज इतना टूट चूका है कि आप मुहल्ले के किसी के बच्चे को गलत करता देख प्यार से भी समझायेंगे, तो हो सकता है कि उसका पूरा परिवार दल-बल के साथ आप पर चढ़ाई कर दे (तुमने मेरे लाडले को कुछ कहने की हिम्मत कैसे की? कैसे? आखिर कैसे?)

हाल में ही जब चाइल्ड सायकॉलॉजी के एक कॉन्फ्रेंस में गयी थी तो वहाँ आयी एक वक्ता ने एक बात बोली, " हर वह माता-पिता जो अपने दो बच्चों के लिये हमेशा दो डेयरी मिल्क लाते हैं, अपने भविष्य के लिए खतरा पैदा कर रहें हैं। आज आपने उन्हें कन्डीशन किया है आपस में शेयरिंग नहीं करने के लिए, कल को वह आपके साथ भी नहीं करेगा।"
आगे उसने कहा,"अगर वो शेयर करने के लिए तैयार नहीं हैं तो आप दोनों पति-पत्नी उस चॉकलेट को खाइये और रैपर फेंकने के लिए बच्चे को थमा दीजिये, वो भी प्यार से, बिना गाली-गलौच के।"
इस सच्चाई को जांचने के लिए ज्यादा मेहनत की जरूरत नहीं है, बढ़ते वृद्धाश्रम और तिरस्कृत होते माता- पिता हर तरफ दिखेंगे।

Genration gap एक प्राकृतिक समस्या हैं और communication gap थोड़ी सांस्कृतिक, लेकिन माता-पिता को बोझ मानना और अपने स्टेट्स सिम्बल के लिए खतरा देखना सिर्फ कमीनापंथी है।
English-vinglish बहुत हद तक एक जमीनी हकीकत बयाँ करती हैं। अंग्रेजियत की बयार हमारे अंदर इतनी ज्यादा आ गयी हैं, कि नेट पर सर्फिंग ना कर पाने वाली और एस्केलेटर पर लड़खड़ा कर चढ़ने वाली माँ बच्चों को अपना इमेज बिगाड़ती हुई प्रतीत होती हैं। गाँव के मेरे दोस्त जो आज IIT पहुंच गए हैं, शरमाते हैं अपने ठेठ गंवार पिता पर।

समझ नहीं आता कि मेरी पीढ़ी इस बात को समझने के लिए तैयार क्यू नहीं हैं कि पिछले सौ सालों में जितनी तेजी से दुनिया बदली हैं, संस्कृति, और लाइफस्टाइल बदला हैं, वैसा मानव इतिहास में कभी नहीं हुआ।
आप नहीं करवा सकते विविध भारती वाली पीढ़ी से Baywatch हजम। और करवानी भी नहीं चाहिये। ये थोड़ी-बहुत बची हुई पुरानी चीजें हैं, जो हमें जड़ से जोड़े रखती हैं। उन्हें जब अपना लोग तो समझ आएगा कि वो भले ही cool ना दिखे पर खूबसूरत हैं अपनी तरह।
बाकी अभिभावकों को थोड़ा सावधान तो रहना ही चाहिए कि आपका बच्चा बस "सफल" ही ना बन कर रह जाये। वरना पश्चिम के पास बहुत पैसे हैं, उधर वृद्धाश्रम तिन टाइम का बढ़िया खाना देगी और सरकार भत्ता। यहाँ बहन की शादी, बच्चे की पढ़ाई,माँ की तीर्थयात्रा, पिता के श्राद्ध के बाद, जितनी सेविंग हम मिडल क्लास की होती हैं ना, अगर उसमें लात पड़ जाए तो हम एक बुखार के इलाज का खर्चा नहीं उठा पाएंगे शायद।

शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2018


70 वर्षों से 94% लोग चाहते हैं “गऊरक्षा”; कैसा निर्लज लोकतंत्र?
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पृथ्वी पर देवता और दानवों का बहुत पुराना इतिहास रहा है. इन दोनों को यदि “वेद” की दृष्टि से समझने का प्रयास करें तो स्पष्ट है की जो प्रकृति को सुरक्षित रखने के पक्ष में थे वे देव कहलाये और जो प्रकृति का अनैतिक रूप से दोहन और नष्ट करने के पक्ष में थे, वे दानव कहलाये.

यदि देव और दानव को इस परिभाषा से समझें, तो आज भी दो प्रकार के लोग हैं. एक जो प्रकृति को सुरक्षित रखने के पक्ष में हैं और दुसरे जो प्रकृति को अभी तक नहीं समझ पा रहे हैं. अत: आज भी देवों और दानवों में वही संग्राम की स्थिति है जो सदियों पूर्व थी.

इस लेख में “गऊमाँ” को केवल इतना समझा जाए कि वह प्रकृति के संतुलन में सबसे कारक जीव है. क्योंकि उनके द्वारा प्रदत गोमय (गोबर) इस पृथ्वी का शुद्ध भूमि तत्व है. उनके द्वारा गोमूत्र शुद्ध वायु तत्व है और क्षीर (दूध) शुद्ध जल तत्व है. इसी आधार पर गोमाता पृथ्वी को सबसे ज्यादा संतुलित करने वाली प्राणी है. यानि जो लोग “गऊमाँ” की रक्षा में लगे हुए हैं, उनमें देवत्व का भाव है. उनके शरीर में देव होने की तरंगें अधिक है. इसके विपरीत के लोगों में दानवत्व की तरंगें अधिक है.

“गऊमाँ” की रक्षा का भाव आज चरम पर है. इसे मैं आज भी देवता और दानवों के बीच की लड़ाई ही मानता  हूँ. क्योंकि लड़ाई के भाव वही है. रूप बदला है. इसलिए वर्तमान की सरकार यदि “गऊमाँ” की रक्षा के पक्ष में नहीं है या वह आवश्यक विषय नहीं मानती, तो यह भी दानवों की सरकार होगी. क्योंकि वे प्रकृति की संतुलन और उसकी रक्षा के पक्ष में खड़े लोग नहीं हैं.

भारत के दबंग और वरिष्ट राजनीतिज्ञ डॉ. सुब्रमनियम स्वामी ने संसद में “गऊमाँ” की रक्षा का निजी बिल ले कर आये, बहस भी हुई और उसे वापस भी ले लिया. यह भारतीय राजनीति में समझ से बाहर है की यह निर्णय किसके पक्ष में हुआ है? लेकिन इतना तय लगता है की यह “गऊमाँ” की रक्षा की दिशा में एक रोड़ा है. इसका आधार भी स्पष्ट है.

प्रधानमंत्री  के जीवन के पिछले 25 वर्षों के दर्शन को पढ़ा जाये तो स्पष्ट होता है की उनके पास “गऊमाँ” की समझ नहीं के बराबर है. यदि होता तो वे गुजरात में मुख्य मंत्री रहते हुए “गऊमाँ” के संवर्धन के स्थान पर होलिस्टियन / फ्रीजियन लाने का निर्णय नहीं लेते. यह अलग बात है की भारत के संतों का उन पर इतना प्रभाव है की तगड़े हस्तक्षेप के बाद अपने निर्णय को बदला. थोड़ी देवत्व की बुद्धि आई.

यह भी गौर करने लायक है की गुजरात में पहले से ही गीर और कांकरेज नाम की दो उन्नत नस्लें अमरीका और यूरोप में डंका बजा रही हैं. इन दोनों प्रजातियों की मांग विश्व के सभी राष्ट्रों में है. उनके क्षीर (दूध) की गुणवत्ता और अधिकता को संसार के लोग लोहा मानते हैं. लेकिन हमारी नीति नियनता को पता नहीं था. प्रतीत होता है कि वे आज भी “गऊमाँ” को केवल भौतिकता के आधार उपयोगी जीव मात्र मानते हैं. जबकि यह संसार भौतिकता बहुत कम और लगभग सम्पूर्ण तरंगीय है. क्वांटम फिजिक्स से यदि समझें तो यह 99.999 तरंगीय है. इस विषय का स्पष्टिकरण कभी सम्पादकीय लेख में लिखूंगा. इस आधार पर नरेंद्र मोदी को “गऊमाँ” की समझ केवल 0.0000004% हो सकता है. ऐसे में हम भारत के लोग “गऊरक्षा” के सम्बन्ध में वर्तमान सरकार से भी क्या आशा कर सकते हैं?

भारत में “गऊग्राम गोमंगल” यात्रा निकाली गई. 14 करोड़ लोगों ने गऊरक्षा के पक्ष में हस्ताक्षर किये. विश्व रिकार्ड हुआ. अभी तक इतना बड़ा हस्ताक्षर अभियान नहीं हुआ था. आज वह राष्ट्रपति भवन में धूल खा रहा है. ऐसे अभियानों से स्पष्ट हो चूका है कि भारत की 94% जनता “गऊरक्षा” के पक्ष में है. किसी प्रकार से “गऊरक्षा” का निजी बिल संसद में लाया भी गया, बहस भी हुई लेकिन वापस लिया गया. क्या यह लोकतंत्र की निर्लज्जता नहीं है. इस लोकतंत्र में एक व्यस्क लड़की के साथ बलात्कार होता है, कानून बदले जाते हैं. एक ईरिक्सा से दुर्घटना होती है कानून बदला जाता है. और इसी लोकतंत्र में 70 वर्षों से लगभग 3000 करोड़ “गऊमाँ” की निर्मम हत्या की गई, और वह भी 86% गऊमांस विदेशियों (निर्यात) को खिलाने के लिए.

जिस “गऊमाँ” के साथ 94% लोगों की आस्था जुडी है, संसद में 70 वर्षों से बहस का विषय तक नहीं बन रहा था. मुश्किल से डॉ सुब्रमनियम स्वामी द्वारा निजी बिल आया और बहस के बाद उसे वापस लिया गया. यह राजनैतिक चाल समझ से परे है. शायद श्रीराम मंदिर निर्माण की तरह “गऊरक्षा” के विषय को भी चुनावी प्रक्षेपास्त्र बनाकर चुनावी नारों के मिसाइल पर चढाने का प्रबंध हो रहा है. क्योंकि निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि अब 2019 का लोकसभा चुनाव श्रीराम मंदिर निर्माण के रथ पर बैठ कर नहीं जीत जा सकते.
साभार श्री निरंजन जी
भारत की तीन पीढ़ियों ने ऐसी निर्लज लोकतंत्र के साथ आस्था रखी है. आज 70 साल हो गए. प्रश्न है कि हम भारत के लोग कब तक ऐसी निर्लज लोकतंत्र के साथ जीयें. वर्तमान प्रधानमंत्री इस विषय के अंतिम सतरंज के मोहरे के रूप में थे. जिनपर भारत के लोगों ने विश्वास किया, उन्हें सर आँखों पर बिठाया. लेकिन लगता है कि इस बार भी भारत के लोगों को धोखा हुआ. “गऊरक्षा” के प्रश्न पर यह सरकारें भी बिकाऊ मोहरे साबित हो रही हैं. अत: अब निश्चित रूप से दिखने लगेगा कि वर्तमान पीढ़ियां इस निर्लज्ज लोकतंत्र की जड़ों को उखाड़ फेकने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं, जिनकी जड़ें आज भी ब्रिटेन में अपने लाभ के लिए पोषित हो रही है.

हम भारत के लोगों को “सत्ता का हस्तानान्तरण” नहीं ; पूर्ण स्वतंत्रता चाहिए. – जय भारत। जय गौ माता वंदे मातरम
अजय कर्मयोगी गुरुकुलम्
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बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

महाशिवरात्रि जो राष्ट्र व धर्म विरोधी षड्यंत्रकारीयो को मौन कर देती है

   


  निर्वाण-षटकम्’ ( आदिशंकराचार्य द्वारा लिखित)

मनो बुद्धि अहंकार चित्तानि नाहं
न च श्रोत्र जिव्हे न च घ्राण नेत्रे |
न च व्योम भूमि न तेजो न वायु:
चिदानंद रूपः शिवोहम शिवोहम ||1||

न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायुः
न वा सप्तधातु: न वा पञ्चकोशः |
न वाक्पाणिपादौ न च उपस्थ पायु
चिदानंदरूप: शिवोहम शिवोहम ||2||

न मे द्वेषरागौ न मे लोभ मोहौ
मदों नैव मे नैव मात्सर्यभावः |
न धर्मो नचार्थो न कामो न मोक्षः
चिदानंदरूप: शिवोहम शिवोहम ||3||

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खं
न मंत्रो न तीर्थं न वेदों न यज्ञः |
अहम् भोजनं नैव भोज्यम न भोक्ता
चिदानंद रूप: शिवोहम शिवोहम ||4||

न मे मृत्युशंका न मे जातिभेद:
पिता नैव मे नैव माता न जन्म |
न बंधू: न मित्रं गुरु: नैव शिष्यं
चिदानंद रूप: शिवोहम शिवोहम ||5||

अहम् निर्विकल्पो निराकार रूपो
विभुव्याप्य सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम |
सदा मे समत्वं न मुक्ति: न बंध:
चिदानंद रूप: शिवोहम शिवोहम ||6||

[मैं मन, बुद्धि, अहंकार और स्मृति नहीं हूँ, न मैं कान, जिह्वा, नाक और आँख हूँ। न मैं आकाश, भूमि, तेज और वायु ही हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ…]

[न मैं मुख्य प्राण हूँ और न ही मैं पञ्च प्राणों (प्राण, उदान, अपान, व्यान, समान) में कोई हूँ, न मैं सप्त धातुओं (त्वचा, मांस, मेद, रक्त, पेशी, अस्थि, मज्जा) में कोई हूँ और न पञ्च कोशों (अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय, आनंदमय) में से कोई, न मैं वाणी, हाथ, पैर हूँ और न मैं जननेंद्रिय या गुदा हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ…]

[न मुझमें राग और द्वेष हैं, न ही लोभ और मोह, न ही मुझमें मद है न ही ईर्ष्या की भावना, न मुझमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ही हैं, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ…]

[न मैं पुण्य हूँ, न पाप, न सुख और न दुःख, न मन्त्र, न तीर्थ, न वेद और न यज्ञ, मैं न भोजन हूँ, न खाया जाने वाला हूँ और न खाने वाला हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ…]

[न मुझे मृत्यु का भय है, न मुझमें जाति का कोई भेद है, न मेरा कोई पिता ही है, न कोई माता ही है, न मेरा जन्म हुआ है, न मेरा कोई भाई है, न कोई मित्र, न कोई गुरु ही है और न ही कोई शिष्य, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ…]

[मैं समस्त संदेहों से परे, बिना किसी आकार वाला, सर्वगत, सर्वव्यापक, सभी इन्द्रियों को व्याप्त करके स्थित हूँ, मैं सदैव समता में स्थित हूँ, न मुझमें मुक्ति है और न बंधन, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ…।

ॐ नम: शिवाय
हर हर महादेव

पृथ्वी पर
#शिव के प्रतिनिधि हैं..!!
पेड़-पौधे
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वनस्पति उपासना यानि पेड़-पौधों की पूजा हमारे संस्कृति का मुख्य अंग है... यह पद्घति अकारण नहीं शुरू हुई है...पेड़ों से हमें आक्सीजन, भोजन और जल तीनों मिलता है और इन्हीं से हमारा जीवन चलता है...।
ऐतरेय और कौषितकि ब्राह्मïण ग्रंथ में "प्राणौ वै वनस्पति:"। (ऐतरेय 2.4, कौषितकि 12.7) कहा गया है... जहां वनस्पतियों से हमारे जीवन को संचालित करने वाले तत्व मिलते हैं, वहीं वनस्पतियां ऐसे तत्वों को भी समाप्त करती हैं, जो हमारे जीवन को नुकसान पहुंचाते हैं..... इसीलिये वनस्पतियों को पृथ्वी पर शिव की प्रतिनिधि माना जाता हैं, जोकि कार्बन डाइ आक्साइड का हलाहल पीकर हमें जीवन अमृत आक्सीजन देती हैं...।
शुक्लयजुर्वेद का एक उदाहरण है- "नमो वृक्षेभ्यो हरिकेशेभ्य:।
क्षेत्राणां पतये नम:।
वनानां पतये नम:।
वृक्षाणां पतये नम:।
ओषधीनां पतये नम:।
कक्षाणां पतये नम:"। (यजुर्वेद 16.17.18)।
इसमें शिव को वृक्ष, वन, ओषधियों इत्यादि का स्वामी का कहा गया है.... देवताओं को उनके गुणानुरूप जीवों और पदार्थों का स्वामी नियुक्त किया गया है... यदि शिव वनस्पतियों के स्वामी कहे गये हैं तो इसका मतलब यह हुआ कि वनस्पतियों का गुण भी शिव जैसा होना चाहिये... शिव का शिवत्व बहुत व्यापक है....शिव का मलतब होता है सुंदर और वनस्पतियां भी पृथ्वी का श्रृंगार करती हैं... सुंदरता बढ़ाती हैं.. इस तरह से वनस्पतियों का व्यवहार उनको शिव का प्रतिनिधि साबित कर देता है.. वहीं दूसरी ओर शिव विश्वपूज्य व सर्वपूज्य इसलिये हुये क्योंकि उन्होने #विष पीकर संसार की रक्षा की और अमृत अन्य के लिये छोड़ दिया... विष पीकर अमृत छोड़ देना भी शिवत्व है... हमारे #पर्यावरण में वनस्पतियों की भूमिका शिव सरीखी है....। वनस्पतियां भी कार्बन डाइ आक्साइड जैसे विष को ग्रहण कर हमारे लिये आक्सीजन जैसी अमृत छोड़ देती हैं... यह बताने की आवश्कता नहीं है कि आक्सीजन के बिना जीवन की परिकल्पना नहीं की जा सकती.. एक बात और समझने की है, ओषधियां भी पेड़-पौधों से ही मिलती हैं.. ओषधियों के बारे में हमारे ग्रंथों में कहा गया है कि इनका जन्म देव के रौद्र रूप से हुआ है, इसलिये ओषधियां दोषों और विकारों को समाप्त करने में सक्षम है.. यह भी शिव का ही गुण हैं... सरल सी बात है कि वही शिव का जो स्वभाव है, वनस्पतियां का भाव है... ऐसे विचार कीजिये कि हमारे आस पास कितने ही शिव हैं...।

वेदों में पर्वत, जल, वायु, वर्षा और अग्नि को पर्यावरण का शोधक कहा है और इन सभी पर्यावरण शोधकों का मूल तो वनस्पतियां ही हैं.... वनस्पतियों के कम होने से सबसे पहला प्रभाव आक्सीजन के स्तर पर पड़ता है...।
वेदों में दो प्रकार के वायु की चर्चा है प्राणवायु और अपान वायु...। प्राणवायु से जीवन का संचार होता है और अपानवायु से सारीरिक दोषों का निवारण होता है....। उदाहरण देखें-
"आ वात वाहि भेषजं वि वात वाहि यद् रप:।
त्वं हि विश्व भेषज देवानां दूत ईयसे।।"
(अथर्ववेद 4.13.3)
वायु को विश्वभेषज कहा गया है... यानि की वल्र्ड डाक्टर...अथर्ववेद में वायु और सूर्य को रक्षक के रूप में वंदना की गई है.. उदाहरण देखें-"युवं वायो सविता च भुवनानि रक्षय:।"
(अथर्ववेद 4,24,3)।
अथर्ववेद शुद्घ वायु को औषधि मानता है... ताजी हवा शरीर में प्रवेश करते ही हम तरोताजा हो जाते हैं... बहुत से रोग बहुत से कष्ट ऐसे ही कट जाते हैं..लेकिन जब हमने पेड़-पौधों के महत्व को नकार दिया और हमें संकट से बचाने वाली वनस्पतियों के लिये हम संकट बने तो पर्यावरण का तंत्र खराब हो गया... हम आज जहर पीने को मजबूर हैं... वेदों में प्रदूषण के कारकों को क्रव्याद यानि जीव को सुखाकर निर्जीव करने वाला कहा गया है.. उदाहरण देखें-
"ये पर्वता: सोमपृष्ठा: आप:।
वात: पर्जन्य आदग्निनस्ते क्रव्यादमशीशमन।"
(अथर्ववेद 3.21.10)
तो वहीं यह भी कहा गया है कि यह वनस्पतियों के अभाव में पनपते हैं... जहां आज हम उत्सर्जन कम करने पर जोर दे रहे हैं तो वहीं वेदों ने शोधन बढ़ाने पर जोर दिया है... अथर्ववेद में तमाम ऐसे वनस्पतियों की सूची मिलती है जोकि पर्यावरण के शोध के रूप में काम करते हैं... इसमें #अश्वत्थ (पीपल),कुष्ठ (कठ), भद्र और चीपुत्र (#देवदार और चीड़), #प्लक्ष (#पिलखन और #पाकड़), न्यग्रौध (बड़), खदिर (खैर), #उदुम्बर (गूलर), अपामार्ग (चिरचिरा), और #गुग्गुल (गूगल) हैं...।
अथर्ववेद में कहा गया है कि इन वृक्षों से वायु शुद्घ होती है और पर्यावरण का संतुलन सही बना रहता है... हमारे प्राचीन साहित्य में वृक्षारोपण को बल दिया गया है.. अब तक हमने कई प्रथायें सुनी हैं कि पुत्र होने पर वहां एक वृक्ष रोपा जाता है... जबकि हम नहीं जानते कि मस्त्य पुराण में #दशपुत्रसमोद्रुम:' कहकर वृक्षों का महत्व बताया गया है...। दशपुत्रसमोद्रुम: का मतलब है, एक वृक्ष दश पुत्रों के समान है... ऐसा उदाहरण विश्व के अन्य साहित्यकोश से या संस्कृति से नहीं मिल सकता...।

शिव सदा कल्याण करें..।।
साभार- डॉ.अरुण के.पांडे

महाशिवरात्रि अर्थात् अमान्त माघ मास की कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि या पूर्णिमान्त फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी तिथि पर की जाने वाली पूजा, व्रत, उत्सव तथा जागरण।
शिवधर्म ग्रन्थ में शिवरात्रि पर रामलीला खेले जाने की भी बात कही गई है।
कश्मीर में शिवरात्रि हररात्रि है जो बिगड़कर हेरात कही जाती है, विगत वर्ष बंदीपुरा संबल में शिव मन्दिर की सफाई, जलाभिषेक तथा प्रसाद में अखरोट वितरण भी वहाँ के मुस्लिमों ने किया था।
कहते हैं कि भोलेनाथ और उमा पार्वती का विवाह इसी तिथि को हुआ था। खगोलीय दृष्टि से सूर्य एवं चन्द्रमा के मिलन की रात्रि है तथा संवत्सर की गणना का आधार माघ अमावस्या रही है, काल गणना के हेतु से यह त्योहार चतुर्दशी से तीन दिन पहले से लेकर दो दिन बाद प्रतिपदा तक चलता था।
भारतवर्ष में धनिष्ठा नक्षत्र में उत्तरायणारम्भ होने के समय कालगणना नियम बने थे, एक हजार वर्षों में अयन सरक कर श्रवण में जा पहुँचा था। यह एक बड़ा कारण 'श्रवण' का अनेक त्योहारों से जुड़े होने में है।
इस कारण महाशिवरात्रि को कुछ ग्रन्थ त्रयोदशी तिथि से संयुक्त प्रदोष व्यापिनी चतुर्दशी तिथि ग्रहण कर मनाये जाने की बात करते हैं, इसमें कारण 'नक्षत्र का प्राधान्य' है।
चूँकि तीज-त्योहारों के मनाये जाने सम्बन्धी नियम निर्देश बहुत पहले निश्चित किये गये थे इस कारण अब कालगणना सम्बन्ध नहीं रहा।
काल के भी ईश्वर महाकालेश्वर की जय बोलते हुये उत्सव मनाइये, आशुतोष तो अवढर दानी हैं ही किसी को भी निराश नहीं करते हैं। मन्दिरों में काँच न फैलायें और न बहुत अधिक फूल पत्तियाँ ले जाना आवश्यक है केवल जल चढ़ा देने से भी शिव उतने ही प्रसन्न होते हैं।
अजय कर्मयोगी
आपको "महाशिवरात्रि"की हार्दिक शुभकामनाएँ !

 शिव
का अर्थ
है
कल्याणकारी।
शिव
ने
सृष्टि के
कल्याण
के
लिए
ही समुद्रमंथन से उत्पन्न विष को अपने कंठ में
उतारा और नीलकंठ बन गए। शिव का जो कल्याण
करने का भाव है, वही शिवत्व कहलाता है। शिवोहम्
का उद्घोष वही व्यक्ति कर सकता है, जो अपने
भीतर इस शिवत्व को धारण कर लेता है। उसे अपने
आचार-व्यवहार में उतार लेता है।

 महाशिवरात्रि पर
शिव की उपासना तभी सार्थक होती है, जब हम
दूसरों के कल्याण के लिए विष पीने (मुश्किलें उठाने)
को भी उद्यत हो जाएं। इसी तरह हम शिवत्व
प्राप्त कर सकते हैं।

 शिव जी को त्रयंबक
भी कहा जाता है। त्रयंबकं यजामहे
सुगंधिपुष्टि वर्धनम्। उर्वारुकमिव बंधनात्
मृत्योर्मुक्षीय मामृतात।। त्रयंबक गंगा, यमुना और
सरस्वती की त्रिवेणी है, जिसके देवता महादेव हैं।
अत:  कुंभ पर अमृत प्राप्ति के लिए हम
शिवरात्रि को महादेव शिव के
प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं।

फाल्गुन मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी में उपवास,
रात्रि-जागरण और शिवार्चन करने का विधान है।
उपवास का तात्पर्य मात्र भोजन का त्याग नहीं है।

वराहोपनिषत् के अनुसार इष्टदेव (शिव) के समीप
वास ही उपवास कहा जाता है। भविष्यपुराण
का कहना है कि उपवास से तन और मन, दोनों शुद्ध
होते हैं। देवीपुराण में कहा गया है- भगवान (शिव)
का ध्यान, पूजन स्तोत्र-पाठ आदि के साथ वास
(रहना) करना ही सच्चा उपवास है। उपवास से
इंद्रियों को संयम के अनुशासन में लाया जाता है।

ईशान संहिता के अनुसार फाल्गुन-कृष्ण-
चतुर्दशी की अर्धरात्रि में शिवलिङ्ग सर्वप्रथम
प्रकट हुआ था। अनेक पुराणों में इस तिथि को शिव-
शक्ति के महामिलन की तिथि बताया गया है। इस
कारण शिवरात्रि के दिन शिव-
पार्वती का विवाहोत्सव बड़े धूमधाम से
मनाया जाता है। सही मायनों में शिवरात्रि शिवत्व
प्रदान करती है।

 शिवरात्रि के आध्यात्मिक संदेश
को जानना भी आवश्यक है।
शिव का माहात्म्य
त्रिदेव ब्रह्मा-विष्णु-महेश त्रिगुणात्मक सृष्टि के
संचालक माने जाते हैं। ये तीनों सृष्टि की रचना,
पालन और संहार करने वाली परब्रहम की तीन
विभूतियां हैं। इनमें महेश वेदों में रुद्र के नाम से
पुकारे गए हैं। रुद्र के कई अर्थ हैं- उग्र, महान,
दुखनाशक, संहारक, दुष्टों को दंड देने वाला, भयंकर,
पापियों को रुलाने वाला, धर्म का बोध कराने वाला,
प्राणदाता, संसार-सागर से तारने वाला आदि।

रुद्रोपासना यजुर्वेद के रुद्राध्याय में है। इसमें
वेदादि समस्त शास्त्रों का निचोड़ समाहित है।
अथर्वशिखोपनिषद् का कथन है- रुद्रो वै
सर्वा देवता: यानी रुद्र सर्वदेवमय हैं। बौधायनसूत्र
इससे आगे बढ़कर कहता है-रुद्रो ह्ये वैतत्सर्वम
यानी रुद्र सर्व-स्वरूप है ।

शिवपुराण कहता  है-
प्रणवो वाचकस्तस्य शिवस्य परमात्मन: अर्थात्
प्रणव (ॐ) परमेश्वर शिव का द्योतक है।
लिङ्गपुराण भी इसका समर्थन करता है- शम्भो:
प्रणववाच्यस्य यानी ॐकार वाचक है और शम्भु
(शिव) वाच्य हैं। प्रणव (ॐ) स्वरूप होने से शिव के
विराट रूप में अ-ब्रंा, उ-विष्णु और म-महेश
समा जाते हैं। इसी कारण इन्हें शैव महादेव कहकर
पुकारते हैं। जाबाल्य उपनिषद में शिव को पाप नाशक
तथा श्वेताश्वतरोपनिषद् इन्हें
मुक्तिदाता कहा गया है।
शास्त्रों का उद्घोष है- शेते तिष्ठति सर्व जगत्
यस्मिन् स: शिव: शम्भु विकाररहित:। अर्थात
जिसमें सारा जगत् शयन करता है, जो विकारों से
रहित है, वह शिव है। शिव का शाब्दिक अर्थ है-
कल्याणकारी, सुखदाता, मंगलदायक, विश्वनाथ
आदि। वस्तुत: शिव
परमात्मा या ब्रंा का ही नामांतरण है,
जो सृष्टि का सृजन, पालन और संहार अपनी त्रि-
विभूतियों (त्रिदेव) के माध्यम से करता है।

विद्येश्वर संहिता में ऋषि-मुनियों के पूछने पर
सूतजी उन्हें शिव-तत्त्व का रहस्य बताते हुए कहते
हैं कि एक मात्र भगवान शिव ही ब्रह्मरूप होने के
कारण निष्कल (निराकार) तथा साथ ही रूपवान होने
से वे सकल साकार भी हैं। शिवजी के निर्गुण-
निराकार स्वरूप की पूजा शिवलिङ्ग के माध्यम से
होती है।

शिवलिङ्ग इनके निराकार स्वरूप का प्रतीक
है। शिवलिङ्ग की आकृति ब्रह्म की द्योतक है,
इसीलिए वृहदधर्मपुराण में लिखा है कि शिवलिङ्ग में
सभी देवताओं का पूजन किया जा सकता है-
शिवलिङ्गेपि सर्वेषां देवानां पूजनं भवेत्।
सर्वलोकमये यस्माच्छिवशक्तिर्विभु: प्रभु:॥
शिवलिङ्ग में सारे लोक समाहित हैं। शिव-
शक्ति का युग्म-स्वरूप होने से शिवलिङ्ग सर्वपूज्य
है।

लिङ्गपुराण में कहा गया है कि शिवलिङ्ग
की अर्चना से समस्त देवी-देवताओं की पूजा स्वत:
संपन्न हो जाती है। शिवजी सकल (साकार) भी हैं,
इसलिए उनकी पूजा का आधारभूत विग्रह साकार-रूप
में प्राप्त होता है। शिवजी का साकार विग्रह उनके
सगुण-साकार स्वरूप का प्रतीक है।

 साक्षात्
परब्रह्म परमेश्वर होने से शिवजी का पूजन उनके
शिवलिङ्ग तथा विग्रह (मूर्ति), दोनों के माध्यम से
होता है।

रात्रि का तात्पर्य
रात्रि का शाब्दिक अर्थ है- सुख प्रदान करने वाली।
इस आनंददायिनी रात्रि की स्तुति ऋग्वेद के
रात्रिसूक्त में की गई है। उसका सार-संक्षेप यह है-
ये रात्रिरूपा देवी अपने उत्पन्न किए हुए जगत के
जीवों के शुभाशुभ कर्मो को विशेष रूप से देखती हैं
और उनके अनुरूप फल की व्यवस्था करने के लिए
अनेक विभूतियों को धारण करती है। ये
ज्ञानमयी ज्योति से जीवों के अज्ञानरूपी अंधकार
को समाप्त कर देती हैं।

 मार्कडेय पुराण में वर्णित
देवी-माहात्म्य के अंतर्गत
रात्रि को आध्याशक्ति का स्वरूप मानकर
उनका स्तवन किया गया है।

अत: जब शिव का रात्रि रूपीशक्ति से संयोग
होता है, तब शिवरात्रि का निर्माण होता है।

  ||●|| हर हर महादेव||●||

शुक्रवार, 19 जनवरी 2018


Ekam sat vipra bahudha vadanti

The Truth is one, the wise express it in numerous ways

(Rg Veda Samhita, 1.164.46)

अर्थात ब्रम्ह ईश्वर / अल्लाह / God एक ही सत्य का नाम है , विप्र (वेदज्ञ ) उसको अन्य अन्य नामों से पुकारते हैं / ऋग्वेद के अगर इस श्लोक से उपजे मंत्र को यदि विश्व अपना ले , तो विश्व शांति एक कल्पनातीत विषय नहीं है , लभ्य है , प्राप्य है /
विश्व में मूलतः दो धर्म है एक सनातन यानि हिन्दू धर्म जो कि भारत की धरती पर उतपन्न समस्त सम्प्रदायों वैष्णव शैव बौद्ध जैन सिख आदि ।

दूसरी तरफ है #अब्राह्मिक रिलिजन - यहूद ईसाई और इस्लाम जिनके पूर्वज ऐतिहासिक पैगम्बरी theology से निकले हैं ।

लेकिन मूलभूत फर्क सनातन मे और अब्राहमिक धर्मों मे ये है कि सनातन तो - सर्वे भवन्तु सुखिनः , और वसुधैव कुटुंबकम को स्वीकारता है , और सभी धर्मों को सच्चा धर्म मानता है , लेकिन अब्राह्मिक रिलिजन इस तथ्य को स्वीकारने से न सिर्फ इंकार करते है, बल्कि theologically दूसरों को उनका स्थान और सम्मान देने को तैयार भी नही हैं ।

सनातन परंपरा मे जब एक बालक उपनयन के बाद शिक्षा के लिए गुरु के पास जाता है , और उसकी जिज्ञासा होती है तो गुरु से पूंछता है -- " अथातो ब्रह्मजिज्ञासा " , अर्थात गुरुवर मुझे ब्रर्म्ह को जानने के बारे मे जिज्ञासा है / तो गुरु उसको विद्याअध्ययन तप शील ज्ञान गुण और धर्म की शिक्षा देते हैं / लेकिन शिष्य कहता है कि _" गुरुवर अब तो मेरे जिज्ञासा शांत करो " /

तब गुरु एक दिन कहते हैं - तद त्वं असि / जिसकी खोज मे तुम जिज्ञासु और आतुर हो वो तुम्हारे भीतर ही है , यानि वो ब्रम्ह तुम्ही हो / और फिर उसको ब्रंहत्व की प्राप्ति का मार्ग बताते है - यम नियम तप योग इत्यादि /

और एक समय जब वो शिष्य जगत के सत और मिथ्या का ज्ञान प्रपट कर समदर्शी ब्रंहत्व को प्राप्त कर लेता है तो वो कहता है कि - " अहं ब्रम्हाष्मि " /

लेकिन #अब्राहमिक मजहब और रेलीजन मे ब्रम्ह को प्राप्त करने का सिद्धान्त नहीं है , और न ही ये गुरु शिष्य परंपरा है / अल्लाह या God के द्वारा चुने हुये व्यक्ति पैगंबर / प्रॉफ़ेट के माध्यम से , वो परंबरमह अपने लोगों के लिए एक संघिता बद्ध संदेश प्रेषित करता है , जिसका पालन करना ही उसका मजहब और रेलीजन है / इस्लाम मे पैगंबर (PUBH) अल्लाह के द्वारा बताए मार्ग पर चलने का आदेश देता है , और वहीं इसाइयत मे जीसस प्रॉफ़ेट की शरण मे जाकर उन गुनाहों की माफी मिल सकती है (Redemption From Sin ) जिसका श्राप God ने उसकी आज्ञा के अनुपालन न करके ज्ञान का फल खाने के कारण ( Fruit From Tree Of Knowledge ) ईव को दिया था, कि इस अपराध के कारण तुम्हारी संततियाँ पैदायशी पापी (Sinner by Birth ) होंगी /

अब्राहमिक रेलीजन की सभी शाखाओं का ये क्लैम, कि उनका रेलीजन ही सच्चा रेलीजन है , आज दुनिया के गले की फांस बना हुआ है /

क्या #धर्म #मजहब और #रिलिजन के एक ही मायने होते हैं ?
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अब प्रश्न ये है कि #धर्म क्या है ?
"इति धारयति सः धर्मः" /
अर्थात जो धारण किया जाय वही धर्म है /
तो जिन #गुणों को जीवन मे धारण किया जाय , जो धर्म को परिभासित करते हैं , वे क्या हैं और उनके लक्षण क्या हैं ? तो धर्म के 10 लक्षण होते हैं जिनको धरण करने को ही धर्म कहते है /
क्या हैं वो 10 लक्षण ?
#धर्म_के_10_लक्षण
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.धर्म के 10 लक्षण हैं यानि 10 अंग है । उनको जीवन में प्राप्त करना और उसको व्यक्ति के चरित्र का अंग बनाना यानि धारण करना ही धर्म है।
" धृति क्षमा दमोस्तेय च सौच इन्द्रियनिग्रह ।
धी विद्या सत्य अक्रोधम दसकं धर्म लक्षणं ।।
1. धृति = धैर्य
2. क्षमा = करने की क्षमता प्राप्त करना
3. दम = कर्मेंन्द्रियों का दमन
4. स्तेय = चोरी न करना
5. सौच = मनसा वाचा कर्मणा व् शरीर को स्वच्छ रखना
6.धी- बुद्धि विवेक
7. इन्द्रियनिग्रह = ज्ञानेन्द्रियों पर नियंत्रण
8. विद्या
9. सत्य
10. अक्रोधम = क्रोध पर नियंत्रण रखना।
ये तो हुवा धर्म । लेकिन आम भारतीय कहता है कि सारे धर्म एक ही शिक्षा देते हैं / तो क्या इसमे कोई सच्चाई है ? या ये भी #इसाइ #इस्लामिक और #वामपंथियों का बिछाया हुआ माया जाल है ?

तो क्या #धर्म #मजहब और #रिलिजन के एक ही मायने होते हैं ?? आइये समझते है , आधुनिक #विश्वामित्र_Rajiv Malhotra के ब्लॉग से कि आखिर इन तीनों मे फर्क क्या है ?
#धर्म और #Religion में क्या अंतर है।।
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धर्म के अनेक अर्थ हैं जो इस बात पर निर्भर करता है कि किस सन्दर्भ में उसका प्रयोग किया जा रहा है।मोनियर - विलिएम की संस्कृत शब्दकोष के अनुसार इसके अनेक अर्थ हैं जिसमे conduct कर्तव्य अधिकार न्याय गुण नैतिकता ; धर्म के लक्षण , किसी नियम के तहत किया गया सद्कर्म । इसके और भी अर्थ सुझये गए हैं जैसे Law कानून या टोरा ( यहूदी) लोगो (ग्रीक) way / रास्ता (ईसाई) या यहाँ तक की ताओ (चीनी) ।
इनमे से कोई भी शब्द पूरी तरह से समर्थ नहीं है जो संस्कृत शब्द "धर्म" को सच्चे अर्थों में परिभाषित कर सके।पश्चिमी लेक्सिकन में धर्म का समानार्थी कोई शब्द ही नहीं है।
धर्म संस्कृत के धृ धातु से बना है जिसका अर्थ है " जो धारण करता हो ; या जिसके विना किसी वस्तु का कोई अस्तित्व संभव नहीं है। या जो ब्रम्हांड के harmony और स्टेबिलिटी को मेन्टेन रखता है। " धर्म के अंतर्गत कर्तव्य , नियमावली , सदशीलता गुड़ और नीतिशष्ट्र जैसे तमाम चीजों के प्राकृतिक और नैसर्गिक आचरण आते हैं । ब्रम्हांड के प्रत्येक इकाई का एक व्यक्तिगत धर्म होता है - एक इलेक्ट्रान, जिसका धर्म एक निश्चित दिशा में घूमना है , से लेकर बादल गैलक्सी पेड़ पौधे कीट पतंगे और मनुष्य सबका। मनुष्य के निर्जीव वस्तुओं के धर्म को समझने को ही हम भौतकी या फिजिक्स कहते हैं ।
ब्रिटिश उपनिवेशकारों ने रिलिजन के विचारों के आधार पर धर्म को समझने और समझाने (mapping) करने की कोशिस की जिससे वे भारतवासियों को समविसट कर सकें और उनको शासित कर सकें : उसके बाद भी धर्म की अवधारणा क्षदमवेशी (Elusive) ही रही।धर्म का रिलिजन में अनुवाद एक भ्रामक तथ्य है ; क्योंकि पश्चिमवासियों के अनुसार एक सच्चे रिलिजन के निम्नलिखित अनिवार्य अंग होते हैं :
(1) ये एक हु बहू परिभाषित ऐतिहासिक घटना पर आधारित God द्वारा प्रदत्त एक क़ानूनी किताब पर आधारित हैं ।
(2) एक ऐसी दैवीय शक्ति की प्रार्थना होनी चाहिए जो हमसे और ब्रम्हांड से अलग हो।
(3) किसी मानवीय संस्था से संचालित होनी चाहिए / जैसे चर्च :
(4) जिसमे औपचारिक सदस्य हों
(5) जो नियुक्त पुरोहित / पादरी द्वारा संचालित होना चाहिए।
(6) एक तयशुदा अनुष्ठानपन का ही पालन किया काना चाहिए।
लेकिन #धर्म किसी विशेष् स्वीकृत मत / मजहब या किसी विशेष पूजविधो से बंधा नहीं होता। किसी पश्चिम वासी के लिए "नास्तिक वृत्ति का ( Atheistic) religion " अपने आपमे एक विरोधाभाषी शब्द है। लेकिन बुद्धिज़्म जैनिज़्म और चार्वाक धर्म में किसी परंपरागत ईश्वर का कोई स्थान नहिं है ;कुछ हिन्दू विधाओं में तो ईश्वर के अस्तित्व पर ही विवाद है ; और न ही किसी एकमात्र देवता की पूजा की जाती है , और व्यक्ति अपने इष्टदेवता का चयन करने को स्वतंत्र है।
#धर्म जीवन के हर पहलु के सामञ्जस्यपूर्ण पूर्ति के सिद्धांत का प्रतिपादन करता है ; जैसे अर्थ काम और मोक्ष।अतः रिलिजन धर्म के विस्तृत एवरूप का मात्र एक हिस्सा (subset) भर है।
रिलिजन सिर्फ मनुष्य मात्र पर लागू होता है ,पूरे ब्रम्हांड पर नहीं ; इलेक्ट्रान बन्दर पौधों और गैलक्सी का कोई रिलिजन नहीं है , जबकि इन सबका अपना अपना धर्म है चाहे वे उसका पालन निरुद्देश्य ही क्यों न करते हों ।
चूँकि मानवता का सार उसके देवत्व (divinity) में है ; इसलिए सब अपने #धर्म को व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर , बिना बाहरी हस्तक्षेप के या इतिहास का सहारा लिए बिना भी जान सकते हैं । पाश्चात्य religions में एकमात्र संगठित केंद्रीय सत्ता है जो ऊपर से ( नियम /कानूनों) को प्रकट करती है और शासित करती है।
धार्मिक परम्पराओं में अधर्म का अर्थ मनुष्य को अपने दयित्वों को सही तरीके से न निभा पाने के अर्थों में लिया जाता है ; इसका अर्थ ये कत्तई नहीं होता कि एक मान्यताप्राप्त विश्वास के प्रस्ताव को अस्वीकार करना , या फिर तयशुदा कानूनों (Commandments/ Canaons) का उल्लंघन करना।
#धर्म का अनुवाद प्रायः 'विधि' (Law) में भी किया जाता है , लेकिन अगर यह विधि है तो इसके कुछ तयशुदा विधान/ नियम भी होने चाहिए :
(1) इसको एक अथॉरिटी द्वारा प्रख्यायित (promulgated) और निर्णीत (डिक्री) किया जाना चाहिए , जिसकी एक निर्धारित क्षेत्र में सार्वभौमिक राजनैतिक सत्ता स्थापित हो।
(2) ये अनिवार्य और बाध्यकारी होना चाहिए
(3) किसी कोर्ट द्वारा व्याख्या निर्णय और बलपूर्वक क्रियान्वयन होने की व्यवस्था भी होनी चाहिए
(4) इन विधानों को भंग करने पर सजा/पेनाल्टी होनी चाहिए।
लेकिन धर्म की परम्परा में ऐसा कोई व्याख्या उपलब्ध नही है।
रोमन सम्राट कांस्टिन्टिने ने धर्मविधान (canon laws) के सिस्टम की शुरुवात की जिसका निर्धारण और बलपूर्वक क्रियान्वयन चर्च किया करता था। यहूदी ईश्वर का आधारभूत स्रोत इज़राइल का ईश्वर (God) था। पश्चिमी रेलिजन इस बात से सहमति जाहिर करते हैं कि ईश्वर के विधानों (Laws ऑफ़ God ) का पालन अवश्य होना चाहिए क्योंकि ये सार्वभौमिक सत्ता का ईश्वरीय आदेश है। इसलिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण (critical) हो जाता है कि झूठे ईश्वरों (false Gods) की निंदा/ भर्त्सना किया जाय और उनको पराजित किया जाय; क्योंकि वे सच्चे विधि (true laws) को कमजोर करने के लिए नकली (illigitimate) आदेश पारित कर सकते हैं ।और यदि कई ईश्वरों (dieties) के अस्तित्व को स्वीकार किया गया तो ये निर्णय लेने में भ्रम की स्थिति पैदा होगी कि सच्चा विधि/विधान कौन सा है।
वहीँ दूसरी तरफ (धर्म में ) ऐसे किसी भी सार्वभौमिक सत्ता का रिकॉर्ड / जिक्र नहीं है जो किसी क्षेत्र विशेष में या विशेष समयकाल मे, बिभिन्न धर्म -शास्त्रो (Texrs of Dharma for society) को व्याख्यायित करता हो , और न ही ऐसा कोई दावा कि ईश्वर ने उन सामाजिक विधानों (शाश्त्रो) के रहस्य को स्वयं बताया (revealed) हो, या फिर किसी शासक द्वारा उनका पालन करवाया जाना बाध्यकारी हो । सामजिक विधानों के किसी भी धर्म शाश्त्र के रचयिता को किसी भी राजा द्वारा नियुक्त नहीं किया गया था , और न ही उन्होंने कानून प्रवर्तक (Law Enforcer) की भूमिका में किसी (राजसत्ता ) को अपनी सेवाएं अर्पित की थी , या कभी भी किसी राजसत्ता के किसी भी रूप में कोई अंग रहे थे । वे आधुनिक काल के विधि वेत्ता (Jurists) के बजाय आज के सामजिक विज्ञानियों के समतुल्य थे।प्रसिद्द याज्ञवल्क स्मृति की रचना एक तपस्वी द्वारा सुदूर अभ्यारण्य में किया गया था।प्रसिद्द मनुस्मृति की रचना मनु के आश्रम में की गयी थी जिसकी शुरुवात में ही वे बताया गया है कि , उन्होंने समाधिस्त अवस्था में पूंछे गए प्रश्नो का उत्तर दिया था।मनु (1-82) में वे ऋषियों को बताते हैं कि हर युग का अपना अलग विशिष्ट सामाजिक और व्याहारिक धर्म होता है ।
धर्मशाष्ट्र किसी भी नियम को बलपूर्वक बाध्यकारी नहीं बनाते ; बल्कि एक प्रचलित परिपाटी का वर्णन भर करते हैं।कई परम्परागत स्मृतियाँ (Codified Social Dharma ) किसी वर्गविशेष (community) की प्रचलित स्थानीय रीतिरिवाज का ही वर्णन करती हैं ।( इनमे अन्तर्निहित ) महत्वपूर्ण सिद्धांत ये था कि वर्गविशेष के अंदर से ही आत्मनियंत्रण और अनुशासन को स्थापित करना। स्मतीतियों ने धर्मोपदेशक के आसन पर बैठ

बुधवार, 17 जनवरी 2018

संस्कृत पाली प्राकृत और देवनागरी लिपि व्याकरण का

किस तरह हजारों वर्षों तक याद रखे गए वेद........

दुनिया के प्रथम ग्रंथ वेद में आज तक कोई परिवर्तन नहीं हुआ। इसका कारण है उसके छंदबद्ध होने की अद्भुत शैली और वेदपाठ करने की खास विधि। यही कारण है कि उनमें किसी भी प्रकार का जोड़-घटाव नहीं किया जा सकता। शोधकर्ता मानते हैं कि वेदों के मूल दर्शन और ज्ञान को सुरक्षित रखने की ऋषि-मुनियों ने एक तकनीक खोजी थी जिसके बल पर ही यह संभव हो पाया और आज तक वेद अपरिवर्तनशील बने रहे। हालांकि कुछ विद्वानों का यह भी मानना है कि वेद के कुछ सूत्र खो गए हैं और छंदों के बीच के शब्दों में हेरफेर किए गए हैं।
बहुत से विद्वान मैक्समूलर पर हिन्दू धर्मग्रंथों को विकृत करने का आरोप लगाते हैं। यह भी कहा जाता है कि मैक्समूलर, विलियम हंटर और लॉर्ड टॉमस बैबिंग्टन मैकॉले इन तीन लोगों के कारण भारत के धर्म और इतिहास का विकृतिकरण हुआ है। भारतीय समाज को तोड़ने के लिए यह सारा षड़यंत्र रचा गया। हालांकि यह विवाद का विषय है। लेकिन हम यहां बताना चाहते हैं कि किस तरह वेदपाठ किया जाता है।
प्रारंभिक वैदिक काल में कागज तो होते नहीं थे। तब लोग ताड़पत्रों पर या फिर शिलाखंडों पर लिखते थे। लेकिन जब हजारों लोगों को सिखाने की बात हो तो? और भी कई कारण थे जिसके चलते ज्ञान को संवरक्षित करने के लिए मनुष्य के चित्त को ही कागज बना दिया गया। सभी वेदमंत्रों की संभाल बिना किसी कागज-स्याही के ही की गयी है। अर्थात प्राचीनकाल के लोगों ने वेदों को कंठस्थ करने की एक परंपरा शुरू की। यहां यह बताना जरूरी है कि कोई भी किताब को सिर्फ रटने से वह कंठस्थ नहीं होती। वह लंबे समय तक याद रहे इसके लिए एक खास छंद और व्याकरणबद्ध विधि की खोज की गई। इसी विधी को भी वैदिक ऋषियों ने कई प्रकारों में बांटा है।
मूलग्रंथ संरक्षण की इतनी सुरक्षित पद्धति को जानने ही अपने आपमें अद्भुत है। हिंदुओं के पूर्वजों ने विभिन्न प्रकार से वेद मन्त्रों को स्मरण करने की विधियों का अविष्कार किया था, जिसके चलते वेदमन्त्रों की स्वर-संगत और उच्चारण का रक्षण कभी नहीं हुआ।
वैदिक ऋषियों ने व्याकरण के नियमों के आधार पर यह सुनिश्चित किया कि वेद मंत्र का गान करते हुए एक भी अक्षर, मात्रा या स्वर में किसी भी प्रकार का फेरबदल न हो सके और वेदपाठी उसे सरलता से कंठस्थ कर ले। इसमें फेरबदल इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि यदि कोई ऐसा करता है तो छंदों का पहले से अंतिम क्रम पूरी तरह गड़बड़ा जाता। लेकिन जिससे छंदों को कंठस्थ कर लिया है उसे पहला सूत्र याद आने के साथ ही छंद के आगे के सूत्र स्वत: ही उच्चारित होने लगते हैं।
दरअसल, ऋषियों ने शब्द के प्रत्येक अक्षर को उच्चारित करने में लगने वाले समय को निर्धारित किया और समय की इस इकाई या समय के अंतराल को 'मंत्र' नाम दिया। वेद मन्त्रों को शुद्धस्वरूप में उच्चारित करने के लिए विधिवत विश्वसन क्रिया के द्वारा शरीर के एक खास हिस्से में वांछित स्पंदन निर्माण करने की प्रक्रिया के विज्ञान को जिस वेदांग में बताया गया है, उसे 'शिक्षा' कहते हैं। यदि आप वैदिक मंत्र को संहिता में देखें तो आपको अक्षरों के पीछे कुछ चिन्ह मिलेंगे। यह चिन्ह 'स्वर चिन्ह' कहलाते हैं, जो मन्त्रों की उच्चारण पद्धति को दर्शाते हैं। इन चिन्हों से यह पक्का हो जाता है कि वेद मन्त्रों में अक्षर, मात्रा, बिंदु, विसर्ग का भी बदलाव नहीं हो सकता है।
परंपरागत गुरुकुलों में विद्यार्थी वेदमंत्रों के पठन में इन स्वरों के नियत स्थान को हाथ व सिर की विशिष्ट गतिविधि द्वारा स्मरण रखते हैं। अतः आप उन्हें वेदमंत्रों के पठन में हाथ व सिर की विशिष्ट गतिविधियां करते हुए देख सकते हैं और यदि मंत्रपठन में अल्प-सी भी त्रुटी पाई गयी तो वे आसानी से ठीक कर लेते हैं। इसके अलावा अलग-अलग गुरुकुल, पठन की विभिन्न प्रणालियों में अपनी विशेषता रखते हुए भी स्वरों की एक समान पद्धति को निर्धारित करते हैं। जिससे प्रत्येक वैदिक मंत्र की शुद्धता का पता उसके अंतिम अक्षर तक लगाया जा सके।
वेदमन्त्रों या छंदों के शब्दों को साथ में विविध प्रकारों में बांधा गया है, जैसे- 'वाक्य', 'पद', 'क्रम', 'जटा', 'माला', 'शिखा', 'रेखा', 'ध्वज', 'दंड', 'रथ' और 'घन'। ये सभी एक वैदिक मंत्र के शब्दों को विविध क्रम-संचयों में पढ़ने की विधि को प्रस्तुत करते हैं।
जिन्होंने मंत्रगान की उच्च श्रेणी घन का अभ्यास किया है उन्हें घनपठिन् कहते हैं। इसी तरह जटापाठी, मालापाठी, शिखापाठी आदि होते है। 'पठिन्' का अर्थ है जिसने पाठ सीखा हो। जब हम किसी घनपठिन् से घनपाठ का गान सुनते हैं तो हम देख सकते हैं कि वे मंत्र के कुछ शब्दों को अलग-अलग तरीकों से लयबद्ध, आगे-पीछे गा रहे हैं। यह अत्यंत कर्णप्रिय होता है। सभी तरह के पाठ को सुनने की अद्भुत और अलग अनुभूति होती है। मात्र सुनने से ही लगता है कि मानों कानों में अमृतरस घुल गया हो।
उपर जो पाठ के प्रकार बताएं गए है उन सभी के गान की विधि अलग अलग होती है। वेदमंत्र के शब्दों को साथ-साथ इस तरह गूंथा गया है, जिससे उनका प्रयोग बोलने में और आगे-पीछे सस्वर पठन में हो सके। पठनविधि के किसी विशेष प्रकार को अपनाए बिना 'वाक्य पाठ' और 'संहिता पाठ' में मंत्रों का गान उनके मूल क्रम में ही किया जाता है।
'वाक्य पाठ' में मंत्रों के कुछ शब्दों को एक साथ मिलाकर संयुक्त किया जाता है। जिसे 'संधि' कहते हैं। संहिता पाठ के बाद आता है पदपाठ। पदपाठ में शब्दों का संधि-विच्छेद करके लगातार पढ़ते हैं। इसके पश्चात क्रमपाठ है। क्रमपाठ में मंत्र के शब्दों को पहला-दूसरा, दूसरा-तीसरा, तीसरा-चौथा और इसी तरह अंतिम शब्द तक जोड़े बनाकर (1-2, 2-3, 3-4,..) याद किया जाता है।
जटापाठ में पहले शब्द को दूसरे के साथ, दूसरे को तीसरे के साथ और इसी क्रम में आगे-पीछे जाते हुए (1-2, 2-3, 3-4, ..), सम्पूर्ण मंत्र को गाया जाता है। शिखापाठ में जटा की अपेक्षा, दो के स्थान पर तीन शब्द सम्मिलित होते हैं और क्रमानुसार (1-2-3, 2-3-4,…) आगे-पीछे जाते हुए, सम्पूर्ण मंत्रगान होता है। इन पठन विधियों की अपेक्षा घनपाठ अधिक कठिन है। घनपाठ में चार भेद होते हैं। इसमें मंत्र के शब्दों के मूल क्रम में विशिष्ट प्रकार के फेर बदल से विविध क्रमसंचयों में संयोजित करके आगे-पीछे गाया जाता है। इन सबको विस्तारपूर्वक अंकगणित की सहायता से समझा जा सकता है।
संहिता और पद पाठ, प्रकृति पाठ कहलाते हैं। क्योंकि इसमें शब्दों का पठन एकबार ही उनके प्राकृतिक क्रम अर्थात मूल स्वरूप में किया जाता है। अन्य विधियों का समावेश 'विकृति पाठ' (गान की कृत्रिम विधि) के वर्ग में होता है। क्रमपाठ में शब्दों को उनके नियमित प्राकृतिक क्रम (एक-दो-तीन) में ही प्रस्तुत किया जाता है। उसमें शब्दों के क्रम को उलटा करके नही पढ़ा जाता, जैसे पहला शब्द- दूसरे के बाद और दूसरा- तीसरे के बाद (2-1,3-2,—) इत्यादि। अतः उसका समावेश पूर्णतया विकृति पाठ में नहीं होता है। क्रमपाठ को छोड़कर, विकृति पाठ के आठ प्रकार हैं, जो सहजता से याद रखने के लिए, इस छंद में कहे गए हैं:-
जटा, माला, शिखा, रेखा, ध्वज, दण्डो, रथो, घनः
इत्यस्तौ- विक्र्तयः प्रोक्तः क्रमपुर्व महर्षिभिः
इन सभी गान विधियों का अभिप्राय वेदों की स्वर-शैली और उच्चारण की शुद्धता को सदा के लिए सुरक्षित करना है। पदपाठ में शब्द मूल क्रम में, क्रमपाठ में दो शब्द एकसाथ और जटापाठ में शब्द आगे-पीछे जाते हुए भी, संख्या में अनुरूप होते हैं। सभी पाठ विधियों में शब्दों की संख्या को गिनकर आपस में मिलान किया जा सकता है।
गौरतलब है कि इतिहास के लम्बे संकटमय काल के दौरान उत्तर भारत पश्चिम एशिया के क्रूर आक्रान्ताओं और उनके वंशजों के बर्बर आक्रमणों से अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्षरत था। आक्रांतानों ने यहां के धर्म और धर्मग्रंथों को मिटाने के भरपूर प्रयास किए जाकि इतिहस से इस धर्म और संस्कृति का नामोनिशान मिट जाए और नया धर्म स्थापित हो, लेकिन जब यह जाना किया कि लाखों की संख्या में ब्राह्मणों ने अपने चित्त या मन में वेदों को कंठस्थ कर रखा है तो उन्होंने संस्कृत पाठशालाओं और गुरुकुलों को नष्ट करना शुरू किया और ब्राह्मणों को धर्मान्तरित किया।ऐसे समय में उत्तर भारत के जंगलों में बचे हुए ब्राह्मण और दक्षिण भारत के वेदपाठियों ने वेदमन्त्रों का रक्षण किया    

#वैदिक_संस्कृत_एवम_प्राकृत_भाषा_एवं_लिपि_संशय_निवारण
आर्य भाषा की लिपि देवनागरी है। देवनागरी को देवनागरी इसलिए कहा गया है , क्यूंकि यह देवों की भाषा है। भाषाएँ दो प्रकार की होती है।
(1)कल्पित और
(2) अपौरुषेय (ईश्वरीय वैज्ञानिक)
कल्पित भाषा का आधार कल्पना के अतिरिक्त और कोई नहीं होता। ऐसी भाषा में वर्णरचना का आधार भी वैज्ञानिक के स्थान पर काल्पनिक होता है।
अपौरुषेय भाषा का आधार नित्य अनादि वाणी होता है। उसमें समय समय पर परिवर्तन होते रहते है परन्तु वह अपना मूल आधार अनादि अपौरुषेय वाणी को कभी नहीं छोड़ती। ऐसी भाषा का आधार भी अनादि विज्ञान ही होता है।
वैदिक वर्णमाला में मुख्यतः 17 अक्षर है। इन 17 अक्षरों में कितने अक्षर केवल प्रयत्नशील अर्थात मुख और जिव्हा की इधर-उधर गति आकुंचन और प्रसारण से बोले जाते है , और किसी विशेष स्थान से इनका कोई सम्बन्ध नहीं होता। उन्हें स्वर कहते है।
जिनके उच्चारण में स्वर और प्रयत्न दोनों की सहायता लेनी पड़ती है उन्हें व्यंजन कहते है।
कितने ही अवांतर भेद हो जाने पर हमारी इस वर्णमाला के अक्षर 64 हो जाते है। यजुर्वेद में इन्हीं १७ अक्षरों की नीचे के मंत्र द्वारा स्पष्ट गणना है-
“”अग्निरेकाक्षरेण, अश्विनौ द्व्यक्षरेण, विष्णु: त्र्यक्षरेण, सोमश्चतुरक्षेण, पूषा पंचाक्षरेण, सविता षडक्षरेण, मरुत: सप्ताक्षरेण, बृहस्पति अष्टाक्षरेण, मित्रो नवाक्षरेण, वरुणो दशाक्षरेण, इन्द्र एकादशाक्षरेण, विश्वदेवा द्वादशाक्षरेण, वसवस्त्रयोदशाक्षरेण,रुद्रश्चतुर्दशाक्षरेण, आदित्या: पंचदशाक्षरेण, अदिति: षोडशाक्षरेण, प्रजापति: सप्तदशाक्षरेण। “”
(यजुर्वेद ९-३१-३४)
इस प्रकार यह मूलरूप से 17अक्षरों की वर्णमाला वैदिक होने से अनादि और अपौरुषेय है। वर्णमाला के 17 अक्षरों का मूल एक ही अकार है। यह अकार ही अपने स्थान और प्रयत्नों के भेद से अनेक प्रकार का हो जाता है। ओष्ठ बंद करके यदि अकार का उच्चारण किया जाए तो पकार हो जावेगा और यदि अकार का ही कंठ से उच्चारण करें तो ककार सुनाई देगा। इस प्रकार से सभी वर्णों के विषय में समझ लेना चाहिये। अकार प्रत्येक उच्चारण में उपस्थित रहता है, बिना उसकी सहायता के न कोई वर्ण भलीभांति बोला जा सकता है और न सुनाई देता है। इसलिए अकार के निम्न अनेक अर्थ है-
” सब, कुल, पूर्ण, व्यापक, अव्यय, एक और अखंड आदि अकार अक्षर के ही अर्थ है। इन अर्थों को देखकर अकार अक्षर व्यापक और अखंड प्रतीत होता है। क्यूंकि शेष अक्षर उसी में प्रविष्ट होने से इन्हीं के रूप में ही प्रतीत होते है। उपनिषद् में ब्राह्मण कम् और खम् दो अर्थ है। इसलिए इस अपौरुषेय वर्णमाला का उच्चारण करते समय हम एक प्रकार से ब्रह्म की उपासना कर रहे होते है। वर्णों के शब्द बनते हैं और शब्दों का समुदाय भाषा है। इस प्रकार से हिंदी भाषा को ‘ब्रह्मवादिनी’ भी कह सकते है। “”
इस प्रकार देवनागरी लिपि में प्रत्येक अक्षर का उच्चारण करते समय हम ब्रह्म की उपासना कर रहे होते है। इसलिए देवनागरी हमारी संस्कृति का प्रतीक है। हमारी संस्कृति वैदिक है। वैदिक संस्कृति वेद द्वारा भगवान की देन है और वेदों के अनादि होने से हमारी संस्कृति और हमारी भाषा भी अनादि और अपौरुषेय है। एक और तथ्य यह है कि हमारी भाषा में सभी भाषाओँ के शब्द लिखे और पढ़े जा सकते है क्यूंकि इसके 64 अक्षर किसी भी शब्द की तथा उच्चारण की किसी भी न्यूनता को रहने नहीं देते।
देवनागरी लिपि के विकास की जहाँ तक बात है कि इक्ष्वाकु आर्यावर्त का प्रथम राजा हुआ। इक्ष्वाकु के समय अक्षर स्याही आदि से लिखने की लिपि का विकास किया। ऐसा प्रतीत होता है। इक्ष्वाकु के समय वेद को कंठस्थ करने की रीती कुछ कम होने लगी थी । जिस लिपि में वेद लिखे गए उसका नाम देवनागरी है। विद्वान अर्थात देव लोगों ने संकेत से अक्षर लिखना प्रारम्भ किया इसलिए भी इसका नाम देवनागरी है।
इस प्रकार से यह भाषा अपौरुषेय एवं वैदिक काल की भाषा है जिसकी लिपि का विकास भी वैदिक काल में हो गया था।
  अब आते है पाली भाषा पर ,
तो सर्व प्रथम आपको बता दे यह भाषा का विकास बहूत बाद में हुआ था ।
पुरानी भाषा कौनसी संस्कृत या पाली
एक लेखक ने संस्कृत को नवीन भाषा बताया उसका आधार उसने शिलालेख आदि बताये | लेकिन यह आधार अयुक्त है क्यूंकि प्राकृत भाषा लोक भाषा थी जब यह शिलालेख आदि लिखे गये थे जबकि संस्कृत केवल कुछ विद्वान लोगो की भाषा थी |
शिलालेख आदि का संदेश आम जन को कोई सुचना या राज्य की परियोजना अथवा कोई संदेश के लिए होता था | आमजन के लिए उन्ही की समझने लायक भाषा में ही संदेश लिखा जाएगा | जैसे आज हिंदी का प्रचलन है तो कोई भी सरकारी घोषणा संस्कृत में नही दी जायेगी बल्कि हिंदी में ही दी जायेगी | इस बात का प्रबल प्रमाण एक जैन लेखक के द्वारा मिलता है जिससे सिद्ध होता है कि प्राकृत बुद्ध ,महावीर के समय की सामान्य जन की भाषा थी –
” जैन आचार्य हरीभद्र सूरी दशवेकालीक टीका की भूमिका 101 पर लिखता है –
” बाल स्त्री मूढ़ मूर्खाणा मूणा चारित्रकांगक्षि
णाम |
अनुग्रहार्थ तत्वज्ञ: सिद्धांत: प्राकृत: स्मृत : ||
अर्थात बाल ,मूढ़ ,मुर्ख के लिए जैन सिद्धांत प्राकृत में दिया गया | ”
इससे सिद्ध है कि संस्कृत भाषा भी महावीर आदि के समय थी महावीर का काल चन्द्रगुप्त से पुराना मानना होगा क्यूंकि तथाकथित इतिहासकार उसे चन्द्रगुप्त का जैन बनना मानते है यदि इसे न माने तो अशोक का चौथा उतराधिकारी शालीशुक मौर्य जैन था | इससे जैन मत इससे भी प्राचीन सिद्ध होता है | अत: संस्कृत की प्राचीनता हरीभद्र अनुसार शालिशुक से पुरानी तो हो ही जाती है |
संस्कृत में ग्रन्थ लेखन का ही कार्य होता था ग्रंथो को भोजपत्र या ताड़पत्र पर लिखा जाता था जिसका काल अधिक नही होता था अधिक से अधिक १०० वर्ष के अंदर वो नष्ट हो जाता था | उसकी पुनरावृत्ति दुसरे ताड़ या भोज पत्र पर हो जाती थी इस तरह नया संस्करण निकाल पुराने ग्रंथो के वचन सुरक्षित रखे जाते थे | आज जो पांडूलिपि मिलती है वो ग्रन्थ के वास्तविक काल की न हो उसके अंत के संस्करणो की है | अच्छी क्वालिटी का कागज भी ६००-७०० साल में टूट टूट नष्ट हो जाता है | इसलिए पांडूलिपि ,शिलालेख यह वास्तविक आधार नही कौनसी भाषा प्राचीन है यह जानने का |
इसका आधार है उस भाषा में लिखे विभिन्न व्याकरण ग्रन्थ जिनमे उसके शब्द विकार ,शब्द सिद्धि दर्शाई जाती है |
प्राकृत के अध्ययन हेतु निम्न सामग्री है –
(१) भरत का नाट्य शास्त्र –
भरत मुनि का उलेख महाभारत में होने से तथा भरत मुनि द्वारा प्राकृत सूत्र दिए जाने से प्राकृत का काल भी महाभारत समकक्ष तो बैठता ही है |
कोहल – मार्कण्डेय कवीन्द्र के अनुसार कोहल के ग्रन्थ में भी प्राकृत का उलेख है |
वाल्मीकि सूत्र – यह प्राकृत भाषा के व्याकरण के सूत्र है इन पर अप्पय दीक्षित की व्याख्या है यह वाल्मीक जी की रचना है | इससे यह सम्भव है प्राकृत भी तथाकथित मूलनिवासियों की भाषा नही बल्कि आर्यों की ही भाषा है ।
शाकल्य – यह ऋग्वेद के एक शाखा के रचेयता है तथा प्राचीन ऋषि है | मार्कंड कवीन्द्र के अनुसार शाकल्य ऋषि प्राकृत पर लिखे है |
लगभग त्रेताकाल से दोनों भाषाए चली है संस्कृत और प्राकृत |
वररुचिकृत प्राकृत लक्षण – यह प्राकृत अध्ययन में सबसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ है | इसमें भामह व्याख्या भी है| भामाह विक्रम सम्वत पूर्व के आसपास था |
प्राकृतदीपिका – यह अभिनवगुप्त द्वारा लिखा ग्रन्थ है |
चंडकृत प्राकृत लक्षण – इसमें महाराष्ट्र तथा जैन प्राकृतो का वर्णन है |
हेमचन्द्र का प्राकृत व्याकरण – यह प्राकृत के शब्दानुशासन का ग्रन्थ है |
प्राकृत पिंगल – इसमें प्राकृत के पद्यो और छन्दों का संग्रह है |
यह सब प्राकृत के जान्ने के ग्रन्थ है | इन सबसे एक निष्कर्ष निकलता है कि संस्कृत में किसी शब्द सिद्धि संस्कृत धातु से प्रत्यय उपसर्ग से ही हो जाती है | अर्थात संस्कृत में किसी अन्य भाषा से कोई शब्द उधार नही लिया लेकिन आगे जब इन प्राकृत व्याकरण ग्रंथो के प्रमाण देखोगे तो पता चलेगा कि संस्कृत के कई अपभ्रंश इस भाषा में लिए गये है अपभ्रष कहलाता है एक भाषा के शुद्ध रूप का बिगड़ कर अन्य भाषा में प्रयुक्त होना इससे अपभ्रश प्रयोग वाली भाषा आत्मजा और शुद्ध प्रयोग वाली जनक सिद्ध हो जाती है |
अब प्राकृत के सामान्य नियम समझिये –
प्राकृत में तीन प्रकार के शब्द प्रयोग करे गये है –
“ समानशब्द विभ्रष्ट देशीगतथापि च – भरतनाट्य शास्त्र १७/३
अर्थात समान ,विभ्रष्ट और देशी पद प्राकृत में है |
इसी पर हरिपाल कृत टीका में लिखा है –
“ तद्भव: तत्समो देशी त्रिविध: प्राकृतकम: “ अर्थात संस्कृत के सदृश्य ,संस्कृत से विकृत और देशी यह तीन प्रकार के शब्द प्राकृत में है |
जैन आचार्य हेमचन्द्र अभिधान चिंतामणि की स्वोपज्ञ टीका में इस बात के प्रमाण देता है कि प्राकृत में प्रयुक्त देशज शब्द भी संस्कृत से आये है –
“ गोसो देश्याम | संस्कृतेsपि
तुंगी देश्याम | संस्कृतेsपि
अब संस्कृत के तत्सम का प्राकृत में किस तरह विकार हो तद्भव होता है यह निम्न नियम से पाया जाता है –
“ ए ओ आर पराणि अ अं आरपरं अ पाअए णत्थि |
व स आर मज्झिमाइ अ क च वग्ग तवग्ग णिहणाइ || “
अर्थात ए ओकार से परे अर्थात ऐ औ अंकार के परे अर्थात विसर्ग नहीं होता अर्थात संस्कृत में आये विसर्ग का प्राकृत में लोप हो जाता है | तथा व सकार के मध्य के श ष वर्ण तथा क च त वर्गो के निधनानि ङ ञ न का भी प्राकृत में लोप कर देते है |
यहा स्पष्ट पता चल रहा है कि प्राकृत संस्कृत के कुछ शब्द को तद्भव कर बनाई गयी भाषा है अर्थात इसके शब्द संस्कृत से उधार लिए गये है |
साहित्य रत्नाकार नामक ग्रन्थ में निम्न श्लोक मिलता है जिससे पता चलता है कि किन किन वर्णों को लुप्त कर प्राकृत वर्णमाला रची –
“ ऐ औ कं क: ऋ ऋ(दीर्घ स्वर में ) लृ लृ(दीर्घ) प्लुप्त श षाबिंदुश्चतुर्थी क्वचित |
प्रान्ते न क्ष डं ञा पृथग द्विवचन नाष्टादश प्राकृते |
रूपञ्चापि यदातमेपदकृत यद्वा परस्मैपद्म |
भेदों नैव तयोर्न लिंगनियमस्ताद्र्ग्यथा संस्कृते ||
अर्थात ऐ औ कं क: ऋकार लृकार प्लुत श ष अबिंदु तथा ४ विभक्ति प्रांत में न क्ष ङ ञ और द्विवचन यह १८ प्राकृत में नही रहे |
यहा भी संस्कृत से प्राकृत का बनना बताया जा रहा है |
प्राकृत पैंगल में उग्गाह छंद में निम्नलिखित गाथा है –
“ एऔ अं म ल पुरऔ सआर ,पुब्बेहि बे बि वण्णाई |
कच्चबग्गे अन्ता दहबणा पाउए ण हूअति || “
ए ओ अं म ल के अगले वर्ण ऐ औ : य व स से पहले दो वर्ण श ष तथा क वर्ग और त वर्ग के अंतिम वर्ण ङ णञ प्राकृत में नही होते | अर्थात प्राकृत में इनका लोप हो जाता है |
संस्कृत से बदलाव लाने के आलावा भी प्राकृत का सिलसिला यही न रुका यह भाषा बार बार बदल बदल नये नये रूप में आती गयी पहले शौरसेनी प्राकृत हुई फिर मागधी में हुआ |
मागधी में संस्कृत के स के स्थान पर श कर कुछ शब्द बना लिए गये – जैसे सामवेद से शामवेद इस पर नामिसाधू श्लोक 12 में व्याख्यात है – “ रसयोर्लशौ मागधिकायाम “
अर्थात र के स्थान पर ल और स के स्थान पर श अर्थात संस्कृत में पुरुष शब्द ष का ल विकार हो माधवी प्राकृत में – पुलिश हो गयी | इसी तरह फिर अर्धमागधी प्राकृत हुई | इसके बाद जैन में श्वेताम्बर सम्प्रदाय की प्राकृत का प्रचलन हुआ इसे महाराष्ट्री भी कहते है | रामदासकृत सेतुबंध टीका में लिखा है – “ महाराष्ट्रभाषाया बहुवचने sप्येकवचन प्रयोगात पृष्ठ 174 तथाच –युद्ध = जुज्झ (सेतुबंध पृष्ठ 502 )
यहा उदाहरण दे बताया है संस्कृत के युद्ध का महाराष्ट्री प्राकृत में किस तरह रूपान्तर हुआ |
अश्वघोष के दो नाटको के त्रुटीयुक्त पत्ते चीन में प्राप्त हुए है अध्यापक लूडर्स (जर्मन ) ने उन्हें जोड़ एक लेख लिखा जिसका अनुवाद श्रीमती तुहिनिका चैटर्जी ने किया –
“ पेज 40 पर लूडर्स लिखता है – “ we can distinguish clearly at least three dialects
अर्थात प्राकृत की तीन बोलिया अश्वगोष के काव्य में है |
यहा स्पष्ट है संकलन
अजय कर्मयोगी

सोमवार, 15 जनवरी 2018

आपके #स्वास्थ्य से संबंधित कुछ विशेष रोचक जानकारी जिसे पढ़कर आप लाभ उठा सकते हैं.....

प्रस्तुत है आपके स्वास्थ्य, चिकित्सा से जुड़े हुए 100 तथ्य...

1. रोगी के रोग की चिकित्सा करने वाले निकृष्ट , रोग के कारणों की चिकित्सा करने वाले औसत और रोग-मुक्त रखने वाले श्रेष्ठ चिकित्सक होते हैं ।*
.                                             ----अष्टांग ह्रदयम्

2. लकवा - सोडियम की कमी के कारण होता है ।
3. हाई बीपी में -  स्नान व सोने से पूर्व एक गिलास जल का सेवन करें तथा स्नान करते समय थोड़ा सा नमक पानी मे डालकर स्नान करे ।
4. लो बीपी में - सेंधा नमक डालकर पानी पीयें ।
5. कूबड़ निकलना - फास्फोरस की कमी ।
6. कफ - फास्फोरस की कमी से कफ बिगड़ता है , शरीर में फास्फोरस की पूर्ति हेतु आर्सेनिक की उपस्थिति जरुरी है । गुड व शहद खाएं....
7. दमा, अस्थमा - सल्फर की कमी ।
8. सिजेरियन आपरेशन - आयरन , कैल्शियम की कमी ।
9. सभी क्षारीय वस्तुएं दिन डूबने के बाद खायें ।
10. अम्लीय वस्तुएं व फल दिन डूबने से पहले खायें ।
11. जम्भाई - शरीर में आक्सीजन की कमी ।
12. जुकाम - जो प्रातः काल जूस पीते हैं वो उस में काला नमक व अदरक डालकर पियें ।
13. ताम्बे का पानी - प्रातः खड़े होकर नंगे पाँव कतई पानी ना पियें ।
14.  किडनी - भूलकर भी खड़े होकर गिलास का पानी ना पिये ।
15. गिलास एक रेखीय होता है तथा इसका सर्फेसटेन्स अधिक होता है । गिलास अंग्रेजो ( पुर्तगाल) की सभ्यता से आयी है अतः लोटे का पानी पियें,  लोटे का कम  सर्फेसटेन्स होता है ।

16. अस्थमा , मधुमेह , कैसर से गहरे रंग की वनस्पतियाँ बचाती हैं ।

17. वास्तु के अनुसार जिस घर में जितना खुला स्थान होगा उस घर के लोगों का दिमाग व हृदय भी उतना ही खुला होगा ।
18. परम्परायें वहीँ विकसित होगीं जहाँ जलवायु के अनुसार व्यवस्थायें विकसित होगीं ।
19. पथरी - अर्जुन की छाल सेवन से पथरी की समस्यायें ना के बराबर हो जाती है ।
20. RO का पानी कभी ना पियें यह गुणवत्ता को स्थिर नहीं रखता । कुएँ का पानी पियें । दूसरी बारिश के बाद का पानी पीने के लिए सबसे अच्छा , पानी की सफाई के लिए सहिजन की फली सबसे बेहतर है ।
21. सोकर उठते समय हमेशा दायीं करवट से उठें या जिधर का स्वर चल रहा हो उधर करवट लेकर उठें ।
22. पेट के बल सोने से हर्निया, प्रोस्टेट, एपेंडिक्स की समस्या आती है ।
23.  भोजन के लिए पूर्व दिशा , पढाई के लिए उत्तर दिशा बेहतर है ।

24. गैस की समस्या होने पर भोजन में अजवाइन मिलाना शुरू कर दें ।
25.  चीनी के अन्दर सल्फर होता जो कि पटाखों में प्रयोग होता है , यह शरीर में जाने के बाद बाहर नहीं निकलता है। चीनी खाने से पित्त बढ़ता है ।
26.  शुक्रोज हजम नहीं होता है फ्रेक्टोज हजम होता है और भगवान् की हर मीठी चीज में फ्रेक्टोज है ।
27. वात के असर में नींद कम आती है ।
28.  कफ के प्रभाव में व्यक्ति प्रेम अधिक करता है ।
29. कफ के असर में पढाई कम होती है ।
30. पित्त के असर में पढाई अधिक होती है ।
31. योग-प्राणायाम-  कफ प्रवृति वालों को नहीं करना चाहिए , वात प्रवृति वालों को थोडा,  पित्त प्रवृति वालों को ज्यादा करना चाहिए ।
32.  आँखों के रोग - कैट्रेक्टस, मोतियाविन्द, ग्लूकोमा , आँखों का लाल होना आदि ज्यादातर रोग कफ के कारण होता है ।
33. शाम को वात-नाशक चीजें खानी चाहिए ।
34. पित्त प्रवृति वालों को प्रातः 4 बजे जाग जाना चाहिए ।
35. सोते समय रक्त दवाव सामान्य या सामान्य से कम होता है ।
36. व्यायाम - वात रोगियों के लिए मालिश के बाद व्यायाम , पित्त वालों को व्यायाम के बाद मालिश करनी चाहिए । कफ के लोगों को स्नान के बाद मालिश करनी चाहिए ।
37. भारत की जलवायु वात प्रकृति की है , दौड़ की बजाय सूर्य नमस्कार करना चाहिए ।
38. जो माताएं घरेलू कार्य खूब करती हैं उनके लिए व्यायाम जरुरी नहीं ।
39. निद्रा से पित्त शांत होता है , मालिश से वायु शांति होती है , उल्टी से कफ शांत होता है तथा उपवास ( लंघन ) से बुखार शांत होता है ।
40.  भारी वस्तुयें शरीर का रक्तदाब बढाती है , क्योंकि उनका गुरुत्व अधिक होता है ।
41. दुनियां के महान वैज्ञानिकों का स्कूली शिक्षा का सफ़र अच्छा नहीं रहा वे अच्छे विद्यार्थी नही रहे
42. माँस खाने वालों के शरीर से अम्ल-स्राव करने वाली ग्रंथियाँ प्रभावित होती हैं ।
43. तेल हमेशा गाढ़ा खाना चाहिएं सिर्फ लकडी वाली घाणी का , दूध हमेशा पतला पीना चाहिए ।
44. छिलके वाली दाल-सब्जियों से कोलेस्ट्रोल हमेशा घटता है ।
45. कोलेस्ट्रोल की बढ़ी हुई स्थिति में इन्सुलिन खून में नहीं जा पाता है । ब्लड शुगर का सम्बन्ध ग्लूकोस के साथ नहीं अपितु कोलेस्ट्रोल के साथ है ।
46. मिर्गी दौरे में अमोनिया या चूने की गंध सूँघानी चाहिए ।
47. सिरदर्द में एक चुटकी नौसादर व अदरक का रस रोगी को सुंघायें ।
48. भोजन के पहले मीठा खाने से बाद में खट्टा खाने से शुगर नहीं होता है ।
49. भोजन के आधे घंटे पहले सलाद खाएं उसके बाद भोजन करें ।
50. अवसाद में आयरन , कैल्शियम , फास्फोरस की कमी हो जाती है । फास्फोरस गुड और अमरुद में अधिक है ।
51.  पीले केले में आयरन कम और कैल्शियम अधिक होता है । हरे केले में कैल्शियम थोडा कम लेकिन फास्फोरस ज्यादा होता है तथा लाल केले में कैल्शियम कम आयरन ज्यादा होता है । हर हरी चीज में भरपूर फास्फोरस होती है, वही हरी चीज पकने के बाद पीली हो जाती है जिसमे कैल्शियम अधिक होता है ।
52.  छोटे केले में बड़े केले से ज्यादा कैल्शियम होता है ।
53. रसौली की गलाने वाली सारी दवाएँ चूने से बनती हैं ।
54.  हेपेटाइट्स A से E तक के लिए चूना बेहतर दवा है
55. एंटी टिटनेस के लिए हाईपेरियम 200 की दो-दो बूंद 10-10 मिनट पर तीन बार दे ।
56. ऐसी चोट जिसमे खून जम गया हो उसके लिए नैट्रमसल्फ दो-दो बूंद 10-10 मिनट पर तीन बार दें । बच्चो को एक बूंद पानी में डालकर दें ।
57. मोटे लोगों में कैल्शियम की कमी होती है अतः त्रिफला दें । त्रिकूट ( सोंठ+कालीमिर्च+ मघा पीपली ) भी दे सकते हैं ।
58. अस्थमा में नारियल दें । नारियल फल होते हुए भी क्षारीय है । दालचीनी + गुड + नारियल दें ।
59. चूना बालों को मजबूत करता है तथा आँखों की रोशनी बढाता है ।
60.  दूध का सर्फेसटेंसेज कम होने से त्वचा का कचरा बाहर निकाल देता है ।
61.  गाय की घी सबसे अधिक पित्तवर्धक व कफ व वायुनाशक है ।
62.  जिस भोजन में सामान्य प्रकाश व हवा का स्पर्श ना हो उसे नहीं खाना चाहिए । जैसे - प्रेशर कूकर
63.  गौ-मूत्र अर्क आँखों में ना डालें ।
64.  गाय के दूध में घी मिलाकर देने से कफ की संभावना कम होती है लेकिन चीनी मिलाकर देने से कफ बढ़ता है ।
65.  मासिक के दौरान वायु बढ़ जाता है , ३-४ दिन स्त्रियों को उल्टा सोना चाहिए इससे  गर्भाशय फैलने का खतरा नहीं रहता है । दर्द की स्थति में गर्म पानी में देशी घी दो चम्मच डालकर पियें ।

66. रात में आलू खाने से वजन बढ़ता है ।

67. भोजन के बाद बज्रासन में बैठने से वात नियंत्रित होता है, भोजन पचता है
68. भोजन के बाद कंघी करें कंघी करते समय आपके बालों में कंघी के दांत चुभने चाहिए । बाल जल्द सफ़ेद नहीं होगा ।
69. अजवाईन अपान वायु को बढ़ा देता है जिससे पेट की समस्यायें कम होती है ।
70. अगर पेट में मल बंध गया है तो अदरक का रस या सोंठ का प्रयोग करें ।

71. कब्ज होने की अवस्था में सुबह पानी पीकर कुछ देर एडियों के बल चलना चाहिए ।

72. रास्ता चलने, श्रम कार्य के बाद थकने पर या धातु गर्म होने पर दायीं करवट लेटना चाहिए ।
73. जो दिन मे दायीं करवट लेता है तथा रात्रि में बायीं करवट लेता है उसे थकान व शारीरिक पीड़ा कम होती है ।

74.  बिना कैल्शियम की उपस्थिति के कोई भी विटामिन व पोषक तत्व पूर्ण कार्य नहीं करते है ।

75. स्वस्थ्य व्यक्ति सिर्फ 5 मिनट शौच में लगाता है ।
76. भोजन करते समय डकार आपके भोजन को पूर्ण और हाजमे को संतुष्टि का संकेत है ।
77. सुबह के नाश्ते में फल , दोपहर को दही व रात्रि को दूध का सेवन करना चाहिए ।
78. रात्रि को कभी भी अधिक प्रोटीन वाली वस्तुयें नहीं खानी चाहिए । जैसे - दाल , पनीर , राजमा , लोबिया आदि ।

79.  शौच और भोजन के समय मुंह बंद रखें , भोजन के समय टी वी ना देखें ।
80. मासिक चक्र के दौरान स्त्री को ठंडे पानी से स्नान , व आग से दूर रहना चाहिए ।
81. जो बीमारी जितनी देर से आती है , वह उतनी देर से जाती भी है ।
82. जो बीमारी अंदर से आती है , उसका समाधान भी अंदर से ही होना चाहिए ।
83. एलोपैथी ने एक ही चीज दी है , दर्द से राहत । आज एलोपैथी की दवाओं के कारण ही लोगों की किडनी , लीवर , आतें , हृदय ख़राब हो रहे हैं । एलोपैथी एक बिमारी खत्म करती है तो साइड इफेक्ट देकर भी जाती है ।
84. खाने की बस्तु में कभी भी अलग से नमक नहीं डालना चाहिए , ब्लड-प्रेशर बढ़ता है ।
85. रंगों द्वारा चिकित्सा करने के लिए इंद्रधनुष को समझ लें , पहले जामुनी , फिर नीला अंत में लाल रंग ।
86 . छोटे बच्चों को सबसे अधिक सोना चाहिए , क्योंकि उनमें वह कफ प्रवृति होती है , स्त्री को भी पुरुष से अधिक विश्राम करना चाहिए ।
87. जो सूर्य निकलने के बाद उठते हैं , उन्हें पेट की बीमारियां होती है , क्योंकि बड़ी आँत मल के चूसने लगता है ।
88.  बिना शरीर की गंदगी निकाले स्वास्थ्य शरीर की कल्पना निरर्थक है , मल-मूत्र से 5% , कार्बन डाई ऑक्साइड छोड़ने से 22 %, तथा पसीना निकलने लगभग 70 % शरीर से विजातीय तत्व निकलते हैं ।
89. चिंता , क्रोध , ईष्या करने से गलत हार्मोन्स का निर्माण होता है जिससे कब्ज , बबासीर , अजीर्ण , अपच , रक्तचाप , थायरायड की समस्या उतपन्न होती है ।
90.  गर्मियों में बेल , गुलकंद , तरबूजा , खरबूजा व सर्दियों में सफ़ेद मूसली , सोंठ का प्रयोग करें ।

91. प्रसव के बाद माँ का पीला दूध बच्चे की प्रतिरोधक क्षमता को 10 गुना बढ़ा देता है । बच्चो को टीके लगाने की आवश्यकता नहीं होती  है ।

92. रात को सोते समय सर्दियों में देशी मधु लगाकर सोयें त्वचा में निखार आएगा ।
93. दुनिया में कोई चीज व्यर्थ नहीं , हमें उपयोग करना आना चाहिए ।
94. जो अपने दुखों को दूर करके दूसरों के भी दुःखों को दूर करता है , वही मोक्ष का अधिकारी है ।
95. सोने से आधे घंटे पूर्व जल का सेवन करने से वायु नियंत्रित होती है , लकवा , हार्ट-अटैक का खतरा कम होता है ।
96. स्नान से पूर्व और भोजन के बाद पेशाब जाने से रक्तचाप नियंत्रित होता है ।
97 . तेज धूप में चलने के बाद , शारीरिक श्रम करने के बाद , शौच से आने के तुरंत बाद जल का सेवन निषिद्ध है ।
98. त्रिफला अमृत है जिससे वात, पित्त , कफ तीनो शांत होते हैं । इसके अतिरिक्त भोजन के बाद पान व चूना ।  देशी गाय का घी , गौ-मूत्र भी त्रिदोष नाशक है ।
99. इस विश्व की सबसे मँहगी दवा लार है , जो प्रकृति ने तुम्हें अनमोल दी है ,  इसे ना थूके ।
100. तम्बाकू खाने से लार का क्षय होता है जिससे भोजन पचने में दिक्कत होती जिस से गले के कैंसर की बीमारी होती है अजय कर्मयोगी

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...